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Misc. Erotica सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance
#12
परदे के पीछे का हमाम

शेर अब घर में इतना घुल-मिल गया था कि सरताज और मीरा दोनों उसे एक भरोसेमंद हिस्सा मानने लगे थे। बाहर से वो वही विनम्र, मेहनती नौकर था—सुबह उठकर घर साफ करता, बाजार जाता, ज्योति की देखभाल में मदद करता।

लेकिन अंदर से उसका शिकारी मन हर पल मीरा के बदन को नाप रहा था। वो रातों में उन पुरानी तस्वीरों को देखकर अपनी हवस शांत करता, लेकिन अब वो हवस इतनी भड़क चुकी थी कि सिर्फ कल्पना काफी नहीं थी। उसे असली नजारा चाहिए था।

उसने जान लिया था कि मीरा रोज़ सुबह सरताज के ड्यूटी पर जाने के बाद स्नान करती है। बस, यही उसका मौका था।

दोपहर के वक्त, जब मीरा अपनी दोपहर की नींद ले रही थी, शेर ने हाथ में एक छोटी छेनी और हथौड़ी ली। उसने बड़ी सावधानी से बाथरूम के पीछे वाले स्टोर रूम की ओर से दीवार का मुआयना किया। वहां एक लकड़ी का पुराना कैबिनेट था, जिसके पीछे की दीवार सीधे मीरा के बाथरूम के शावर एरिया में खुलती थी।

उसने कैबिनेट को थोड़ा खिसकाया और दीवार के एक कोने पर काम शुरू किया। वह हर चोट बड़ी सावधानी से कर रहा था ताकि आवाज़ बाहर न जाए।

शेर [आंतरिक विचार]: 'आज तो किस्मत खुलेगी हमारी। सरताज साब को लगता है कि उनकी मेमसाब महलों की रानी है, पर आज हम देखेंगे कि उस रेशमी साड़ी के नीचे का खज़ाना कैसा दिखता है। वो स्तन... दूध से भरे, सूजे हुए... वो कूल्हे, गोल और भारी... और वो बीच की जगह... उफ्फ, आज सब नंगा देखूंगा। शंकर भाई की अमानत, आज मेरी आंखों की थाली में परोसी जाएगी


लगभग एक घंटे की मेहनत के बाद, उसने एक बारीक सुराख बना दिया। यह सुराख बाहर से नज़र नहीं आता था क्योंकि उसने उसके आगे लकड़ी का एक छोटा गुटका फिट कर दिया था जिसे ज़रूरत पड़ने पर हटाया जा सके।

________________________________________

मीरा दीवान-ख़ाने से गुस्लख़ाने की तरफ़ जा रही थी।

मीरा: (शेर को देखते हुए, शांति से) "शेर, मैं नहाने जा रही हूँ। तुम ज़रा गुसलखाने के पास वाले स्टोर रूम से साफ़ तौलिये ले आना। मुझे बाथरोब भी वहीं चाहिए।"

शेर: (विनम्रता से सिर झुकाते हुए, लेकिन आंखों में कुटिल चमक) "जी, मेमसाब। मैं अभी लाता हूं।" उसके मन में उथल-पुथल थी—ये मौका था।

वो फौरन स्टोर रूम में जा घुसा। कैबिनेट के पीछे छिपकर, उसने लकड़ी का गुटका हटाया और आंख लगा दी।

शेर ने उस झरोखे से, उसने जन्नत का वो अलौकिक मंजर देख लिया जो उसके लिए पूरी तरह हराम था।

वहाँ थी मीरा, पूरी तरह से नग्न। गुसलखाने के सफेद बल्ब की तेज़ रौशनी में, उसका  जिस्म किसी संगमरमर की मूर्ति की तरह चमक रहा था। रौशनी में उसकी हर बनावट, हर उभार स्पष्ट दिखाई दे रहा था। वह दुनिया और आस-पास की हर चीज़ से बेख़बर, अपनी गहरी सोच में डूबी हुई थी।

किनारे की छोटी मेज पर, उसकी साड़ी पड़ी थी। उसके साथ ही, उसके रेशमी ब्रा और पैंटी भी रखे थे। अंदर, वह पूरी तरह से नग्न थी। इस अचानक और स्पष्ट नग्नता को देखकर शेर की साँस उसके फेफड़ों में ही ठहर गई, उसका ध्यान पूरी तरह उसी मंज़र पर केंद्रित हो गया।

शेर और नज़दीक झुका। पूरी तरह से अनजान मीरा संगमरमर के उस टब के पास खड़ी थी। पानी की नन्हीं बूँदें उसकी दमकती पीठ पर ऐसे फिसल रही थीं, जैसे किसी ने असली हीरे जड़ दिए हों। तभी, अपने जूड़े को संभालने के लिए उसने धीरे से अपने हाथ ऊपर उठाए, और जैसे ही यह गति हुई, उसके स्तन... किसी शाही सिंहासन की तरह ऊपर उठ गए। वे पूरी तरह आज़ाद थे, किसी बंधन से परे, अपनी पूरी शान के साथ।

शेर [आंतरिक चीख]: 'मेरा खुदा... तूने मुझे सदियों का प्यासा बनाकर इस हराम कुएं पर क्यों लाकर खड़ा कर दिया! ये स्तन... उफ्फ, इतने भरे, इतने गोल... जैसे पके आम, छूने की देर है। और वो चूचियां... गहरे सुर्ख रंग की,  ठंड और उत्तेजना से गर्व से तन कर खड़ी। मन करता है चूस लूं, काट लूं, दबा दूं—जब तक दूध न निकल आए।'

उसके होंठ सूखे पत्ते की तरह खुले रह गए। उसके स्तन भीगे हुए थे, हर गोलाई साफ़ नज़र आ रही थी। और उसकी चूचियाँ... गहरे सुर्ख रंग की, जो अब ठंड और उत्तेजना से गर्व से तन कर खड़ी थीं।

उसकी कमर में एक नाज़ुक सा ख़म था, और फिर... फिर उसने एक पैर उठाकर टब के किनारे पर रख दिया।

उसकी जांघों के बीचों-बीच, पानी से दमकती हुई और पूरी तरह चिकनी... उसकी चूत सामने थी। उसके होंठ नरम थे और हल्के फूले हुए थे—गुलाबी, गीले, जैसे कोई फूल पानी से भीगा हो।

शेर का औज़ार उसकी पैंट में फड़क रहा था, दर्द करने लगा। वो खुद को सहलाने लगा, तेज-तेज, मीरा की हर हरकत पर।

शेर [वहशी दरख्वास्त]: "बस एक बार छू लूं! खुदा के लिए, सिर्फ एक बार... जो इन आंखों ने देखा है, उसे मेरे हाथ महसूस कर लें! तेरी ये गर्म, गीली जगह... मैं उंगली डालूं, चाटूं, घुसूं—तब तक जब तक तू तड़प न उठे।"

अपने गुनगुनाने की मस्ती में डूबी हुई, मीरा के हाथ नीचे आए और उसने अपने उभारों पर साबुन रगड़ना शुरू किया। वह बेख़बर थी कि उसके हाथ अनजाने में ही उन्हें मसल रहे थे, और फिर उसने अपनी उंगलियों के बीच अपनी चूचियों को बड़ी नज़ाकत से दबा लिया। इस उत्तेजक दृश्य को देखकर शेर का गला बिल्कुल सूख गया, और उसके मुँह से तीव्रता से एक दबी हुई सिसकी फूटने ही वाली थी।

और फिर, साबुन का वह सफ़ेद झाग धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ने लगा... पहले उसने मीरा की गहरी नाभि के चारों ओर एक नशीला घेरा बनाया, और फिर वहाँ से फिसलकर... सीधा उसकी जाँघों के बीच चला गया।

दीवार के उस गुप्त छेद से अपनी आँखें हटाना शेर के लिए नामुमकिन सा हो रहा था। मीरा मैडम का वह रूप, उनकी देह की वह मादकता उसके भीतर एक अजीब सी आग सुलगा रही थी। लेकिन तभी उसे याद आया कि वह यहाँ खाली हाथ नहीं आया था; उसे तौलिया और बाथरोब मैडम तक पहुँचाना था। अगर उसने देर की, तो शायद मैडम को शक हो जाता।

उसने एक गहरी, भारी सांस ली और अपनी उत्तेजना को काबू में करने की कोशिश की। वह दबे पाँव, बिल्ली की तरह खामोशी से उस छेद वाली जगह से हटा और बाथरूम के मुख्य दरवाज़े की ओर बढ़ा। उसके मन में अभी भी वही दृश्य घूम रहे थे जो उसने अभी-अभी देखे थे।

बाथरूम के दरवाज़े के पास पहुँचकर उसने अपनी आवाज़ को जितना हो सके उतना सीधा और आज्ञाकारी बनाने की कोशिश की। उसने धीमी आवाज़ में पुकारा:

शेर: "मीरा मैडम, ओ तौलिया और बाथरोब कहाँ रख दूँ? हम ले आए हैं।"

अंदर से मीरा मैडम की शांत आवाज़ आई:"दरवाज़े के हैंडल पर छोड़ दो।"

शेर ने  धीमे स्वर में कहा, "ठीक है मैडम।"

फिर वह दबे पाँव आगे बढ़ा और  तौलिया तथा बाथरोब दरवाज़े के हैंडल पर सावधानी से टाँग दिया।

जैसे ही उसने तौलिया रखा, उसने जानबूझकर अपने जूते से ज़मीन पर थोड़ी ज़ोर से आवाज़ की, ताकि मीरा मैडम को लगे कि वह वहाँ से जा रहा है।

"ले, अभी थोड़ा आगे जाके वापस आता हूँ!" बुदबुदाते हुए, वह दबे पाँव दो कदम पीछे हटा, और फिर तेज़ी से, किसी बिल्ली की तरह वापस पलटा।

शेर [अंतिम कसम]: "तू मेरी मेमसाहब है, पर आज इस छेद से मैंने तुझे अपनी रूह में उतार लिया है।"

तभी पानी का तेज़  बंद हो गया। मीरा ने बाथटब के शीतल जल से बाहर कदम रखा। एक पल को हवा के ठंडे झोंके से उसकी देह सिहर उठी। वह क्षण भर के लिए वहीं खड़ी रही, पूरी तरह नग्न, उसकी देह पर टब के पानी की बूँदें चमक रही थीं। कुछ बूँदें उसकी गोरी त्वचा पर बहकर उसकी उभरी हुई छातियों के कगार पर ठहरी हुई थीं।

वह पानी की बूँदें अब भी उसके वक्षों के बीच की घाटी से नीचे सरक रही थीं। धीरे-धीरे, मीरा बाथरूम के दरवाज़े की ओर बढ़ी।

दरवाज़े के पास पहुँचकर, उसने अपनी लंबी, मुलायम उँगलियों से दरवाज़े को एकदम हल्का-सा खोला—बस इतना कि वह बाहर देख सके। उसकी नज़र दरवाज़े के हुक पर टँगे तौलिये  और बाथरोब पर पड़ी। उसने अपनी नग्न देह को दरवाज़े की आड़ में छिपाते हुए, बाहर हाथ बढ़ाया और बिना देर किए, लटकते हुए तौलिये और बाथरोब को झट से अंदर खींच लिया और दरवाज़े को फ़ौरन बंद कर दिया। अब वह उस नर्म, रोएँदार तौलिये से अपनी देह को सहलाने के लिए तैयार थी।

शेर ने अपनी आँखें झरोखे पर जमाई रखीं। वह साँस रोके सब देख रहा था।

मीरा मैडम का वह अनजाने में पलटना... यह तो सीधा हमला था! उनके कसे हुए, दमकते नितम्ब पलक झपकते ही झरोखे से दिखाई दिए। शेर का खून उसके सिर में दौड़ने लगा, उसकी आँखें पागलपन से चमक उठीं।

उसके चूतर... । वो संगमरमर को पिघलाकर बनाए गए दो मुकम्मल चाँद थे...

"हाय राम! बस इसको ही खा जाऊँ! देख तो कितना गुड़ जैसा माल है! भइया, आज तो मेरा दिल निकल जाएगा रे!"

सबसे पहले, उसने तौलिये को अपने गीले, खुले बालों पर लपेटा। फिर, वह नीचे की ओर आई। उसने हल्के हाथों से अपनी गरदन और कंधों को सुखाया। मीरा ने तौलिये के एक कोने को सावधानी से उठाया और उसे अपने वक्षों पर रखा। उसने बहुत धीरे-धीरे, सहलाते हुए, अपने उन्नत और भरे हुए स्तनों को पोंछना शुरू किया। तौलिये का हर स्पर्श उसके लिए एक सुखद अनुभूति था।

वह दोनों ओर बारी-बारी से तौलिये से थपथपाकर पानी की बूँदें हटा रही थी। जब तौलिया उसके गुलाबी निपल्स को छूता, तो वह एक दबी हुई आह भर लेती—यह एक पूरी तरह से निजी, वासना से भरा क्षण था।

वक्षों को सुखाने के बाद, उसका हाथ स्वाभाविक रूप से नीचे की ओर सरका। उसने अपने योनि  क्षेत्र को पोंछना शुरू किया। तौलिये को वहाँ ज़रा ज़्यादा देर तक ठहराया गया, क्योंकि वहाँ की त्वचा ज़्यादा नमी लिए हुए थी। इस अत्यंत निजी क्रिया को वह बिना किसी झिझक के कर रही थी।

तौलिये का हर मुलायम घर्षण उसके अंदर एक धीमी, दबी हुई गर्मी जगा रहा था। जब वह उस नाज़ुक हिस्से को पोंछ रही थी, तो उसकी आँखें फिर से बंद हो गईं, और उसके होंठों पर एक मंद मुस्कान तैर गई।

बाहर, झरोखे पर टिकी आँखें शेर की थीं, जो इस पूरी प्रक्रिया का साक्षी बन रहा था। मीरा के इस पूर्ण नग्न नृत्य को देखकर उसकी साँसें फिर अटक गईं थीं।

जब उसने देखा कि मीरा तौलिये से अपने वक्षों को सहला रही है, तो शेर के दिमाग में तूफ़ान उठ गया।

"अरे, ... काश, वह तौलिया नहीं, बल्कि मेरे हाथ होते," उसने अपने दाँत भींचते हुए सोचा। "यह मेरे हाथ होते जो उसके भरपूर स्तनों को इतनी नरमी से सहलाते... उन्हें इतना धीमा स्पर्श देते।"

और फिर, जब मीरा ने अपने गुप्तांग को तौलिये से सुखाना शुरू किया, तो शेर की कल्पना बेकाबू हो गई।

"हे भगवान! अब... अब यह तौलिया नहीं... यह मेरा कठोर हाथ होना चाहिए। तौलिये की जगह मेरा हाथ... जो उस नाज़ुक जगह को पोंछता, सहलाता... जो उस छुपी हुई नमी को महसूस करता। वह मुस्कान... वह उस कपड़े के स्पर्श की नहीं, मेरी उँगलियों के स्पर्श की होनी चाहिए!"

शेर का बदन पसीने से भीग गया। उसकी आँखें लाल हो गईं।

मीरा ने नीले रंग की पैंटी उठाई। यह इतनी छोटी थी कि उनके सुंदर, कसे हुए नितम्बों को मुश्किल से ही ढक पा रही थी। यह बस एक पतली कपड़े की पट्टी जैसी थी जो उनके पीछे के उभार को काट रही थी, जिससे उनकी गोलाई और भी ज़्यादा स्पष्ट दिखाई दे रही थी। उन्होंने धीरे-धीरे इसे अपनी चिकनी जांघों पर ऊपर चढ़ाया।

फिर उसने अपनी नीली ब्रा पहनी। जैसे ही उसने हुक लगाए, उसके भारी और भरे हुए स्तन उस कपड़े में कैद होने के लिए छटपटाने लगे। कपड़ा इतना तंग था कि स्तनों का ऊपरी हिस्सा बाहर की ओर छलक रहा था।

मीरा: (आईने में अपनी बदलती काया को देखते हुए, चेहरे पर एक हल्की लाली और शर्म के साथ खुद से बुदबुदाई) "हे भगवान... सब कुछ कितना छोटा और तंग हो गया है। ऐसा लग रहा है जैसे ये अभी फट जाएंगे। मुझे जल्द ही नए सेट खरीदने पड़ेंगे... वरना ये संभालना मुश्किल हो जाएगा।"

उसने आईने में अपनी छवि देखी। उसके चेहरे पर एक प्राकृतिक लालिमा थी, जो उसकी शर्म और बढ़ते हुए सौंदर्य का मिश्रण थी।

मीरा: (आईने में खुद को निहारते हुए, अपने पेट पर हाथ फेरते हुए) "मीरा... अभी तो बस तीसरा महीना ही शुरू हुआ है। पेट तो अभी भी लगभग सपाट ही है, पर..."

उसने किनारे से मुड़कर अपने पीछे के हिस्से को देखा और फिर अपने सीने की ओर नज़र डाली।

मीरा: (मुस्कुराते हुए, धीमी आवाज़ में खुद से) "पर ये स्तन... ये तो कितने भारी हो गए हैं। और गांड भी... साड़ियाँ भी अब ढंग से नहीं आतीं। सरताज की तो चाँदी है, उन्हें तो मेरा ये नया रूप बहुत पसंद आएगा... पर वो घर पर हों तब न।"

उसने अपनी उंगलियों से ब्रा के किनारों को ठीक करने की कोशिश की, जिससे उसके स्तनों में एक मदहोश कर देने वाली हलचल हुई।

________________________________________

दीवार के पीछे: शेर की दरिंदगी

सुराख के उस पार, शेर की हालत खराब हो रही थी। उसकी आँखें सुराख से ऐसे चिपकी थीं जैसे कोई प्यासा कुआँ देख रहा हो। उसकी साँसें इतनी भारी थीं कि उसे डर था कि कहीं मीरा सुन न ले।

शेर [आंतरिक विचार]: (अपनी लार गटकते हुए, आँखें फाड़कर देखते हुए) 'ओह तेरी... नीला रंग! कसम से, मेमसाब तो कतई ज़हर लग रही है। ई पैंटी है कि बस एक धागा? साला, आधा खज़ाना तो वैसे ही बाहर झाँक रहा है। और उफ... वो छाती! ई ब्रा तो बेचारी दम तोड़ रही है। देखो कैसे वो गोरा मांस उस नीले कपड़े को फाड़ के बाहर आने को बेताब है।'

जब मीरा ने आईने में खुद को निहारा और अपने स्तनों के भारीपन को हाथों से सहारा दिया, तो शेर का कलेजा मुँह को आ गया।

शेर [आंतरिक विचार]: 'रब्बा! ई हाथ हमारे होने चाहिए थे। ई नीला रंग उनकी गोरी रंगत पे अइसन खिल रहा है कि मन करता है कि अभी दीवार फाँद जाऊँ। मेमसाब बोल रही हैं कि नया खरीदना पड़ेगा... अरे काहे? ई तंग कपड़े ही तो असली मजा दे रहे हैं। ई जो उभार है, जो मरोड़ है... ई साला सरताज की किस्मत में कहाँ! वो तो बस ड्यूटी करता रहे, असली माल तो हमरी आँखों के सामने परोसा गया है।'

उन्होंने धीरे से आईने के सामने खुद को घुमाया। वह अपने जिस्म को निहार रही थीं। वह थोड़ा सा मुस्कुराईं, मानो अपने सुडौल शरीर से संतुष्ट हों।

कुछ देर खुद को निहारने के बाद, मीरा ने पास रखे बाथरोब की ओर हाथ बढ़ाया। बाथरोब  रेशम जैसा और सफेद था। उन्होंने उसे उठाया और धीरे से अपनी बाहों में पहना। बाथरोब खुला ही था, जिससे उसके अंडरगारमेंट्स अभी भी दिखाई दे रहे थे। उन्होंने बाथरोब की डोरी उठाई और आराम से कमर पर एक ढीली गाँठ बाँध ली।

शेर का विचार: "अरे! यह क्या कर दिया! अब सब छिप गया! कम से कम थोड़ा खुला तो रखती!"

बाथरोब पहनने के बाद, मीरा ने एक लंबी साँस ली और अपने बालों को सँवारना शुरू किया। वह गुसलखाने से बाहर निकलने के लिए तैयार थीं।

मीरा कुछ गुनगुना रही थी, अपनी ही दुनिया में मगन। उसे क्या पता था कि दरवाज़े के उस पार एक आदमी उसकी आज़ादी को, उसकी मासूमियत को अपनी हवस में हमेशा के लिए कैद कर चुका है।

आखिरकार, शेर काँपते हुए, लड़खड़ाकर पीछे हटा। उसका बदन जल रहा था। वो जानता था कि वो यह मंज़र मरते दम तक नहीं भूल पाएगा—वो पानी से भीगे हुए स्तन, वो गुलाबी कली का मासूम झाँकना, और वो दो बेदाग, सफेद चाँद जिन पर खुदा ने भी कोई निशान नहीं छोड़ा था।

और वह यह भी जानता था—यह सिर्फ़ शुरुआत थी। यह अंत नहीं था। मीरा मैडम के साथ यह चोरी-छिपे का खेल अभी शुरू हुआ था।

शेर ने तेज़ कदमों से गलियारा पार किया। वह एक अंधेरे कोने में रुका, जहाँ कोई उसे देख न सके।

उसने अपने धड़कते हुए औज़ार पर कसकर हाथ रखा—एक ऐसा स्पर्श जो प्रतिज्ञा से भरा था। उसने दबी हुई आवाज़ में क़सम खाई, उसकी आँखें अँधेरे में भी चमक रही थीं।

शेर का संकल्प: "मां कसम! अगली बार, ये आंखें सिर्फ देखेंगी नहीं। ये हाथ छूएंगे, ये होंठ चखेंगे, और ये जिस्म... अपना हक वसूलेगा! मीरा... तू सरताज की है, लेकिन अब मेरी भी होगी। मैं तुझे तड़पा-तड़पा के भोगूंगा, तेरी हर चीख सुनूंगा, तेरी हर सिहरन महसूस करूंगा। शंकर भाई का वादा... मैं पूरा करूंगा।"
Deepak Kapoor
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RE: सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance - by Deepak.kapoor - 20-01-2026, 12:57 PM



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