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Misc. Erotica महीन को अपने रंग में रंग दिया
#10
पार्ट 2: दिल की उथल-पुथल
Holi का दिन करीब आता जा रहा था। ऑफिस में माहौल रंगीन हो गया था — लोग पिचकारियाँ ला रहे थे, गुलाल की थैलियाँ टेबल पर रखी रहतीं, और लंच ब्रेक में होली सॉन्ग्स बजते। सब हँसते, प्लान बनाते — "इस बार बॉस को भी नहीं छोड़ेंगे!"

लेकिन माहीन चुपचाप अपनी सीट पर बैठी कोडिंग करती रहती। उसका मन कहीं और था। आर्यन की वो बात बार-बार याद आती — "जिंदगी में थोड़ा रंग चाहिए ना?" वो सोचती, "क्या सच में चाहिए? मेरी जिंदगी तो Upperwale ki रहमत से भरी है — फैसल है, फैमिली है, अच्छी जॉब है। फिर ये खालीपन क्यों? क्या मैं कमजोर हूँ जो ऐसे ख्यालात आ रहे हैं?" उसकी आँखें कभी-कभी नम हो जातीं, और वो बाथरूम में जाकर चेहरा धोती।

"Upperwale मुझे माफ करना। मैं फैसल की वफादार हूँ, लेकिन ये उदासी... ये दिल की पुकार क्यों?" वो याद करती फैसल की आखिरी विजिट — वो रात जब फैसल ने उसे गले लगाया था, और कहा था, "माहीन, तुम मेरी दुनिया हो। दूरियाँ बस टेम्परेरी हैं।" लेकिन अब वो दूरियाँ जैसे अनंत लगतीं। माहीन सोचती, "फैसल, तुम्हें पता है मैं कितना सह रही हूँ? रातें अकेली, दिन खाली। क्या प्यार सिर्फ़ यादों से जीता है?"

रात को घर लौटकर माहीन ***** पढ़ती। में dua मांगती, "या Upper Wale मेरे दिल को सुकून दे। फैसल को जल्दी वापस बुला। ये अजीब से ख्यालात क्यों आ रहे हैं? क्या मैं गुनाह की तरफ बढ़ रही हूँ?" लेकिन ***** के बाद भी मन शांत नहीं होता। वो बेड पर लेटती और फैसल की यादों में खो जाती। शादी की पहली रात याद आती — फैसल ने कितने प्यार से उसे छुआ था, कितना सम्मान दिया था। वो रातें जब फैसल घर पर होता, तो सुबह उठकर वो उसके लिए चाय बनाती, और फैसल पीछे से गले लगाकर कहता, "माहीन, तुम मेरी जान हो।"

अब वो सब दूर था। दुबई की व्यस्त जिंदगी ने फैसल को बदल दिया था — कॉल्स कम हो गई थीं, बातें छोटी। माहीन सोचती, "क्या मैं ही ज्यादा उम्मीद करने लगी हूँ? या सच में अकेलापन खा रहा है मुझे? फैसल, काश तुम समझते मेरा दर्द। मैं रोज रोती हूँ, लेकिन तुम्हें बताती नहीं — डरती हूँ कि तुम और दूर हो जाओगे।" उसकी छाती भारी हो जाती, और वो तकिए में मुँह छिपाकर सिसकियाँ लेती। "


Upperwale ताकत दो। लेकिन ये खालीपन... ये जैसे कोई हिस्सा मिसिंग है।"अम्मी से फोन पर बात होती। अम्मी कहतीं, "बेटी, सब्र रखो। फैसल अच्छा लड़का है, जल्दी आएगा। माहीन हाँ कहती, लेकिन दिल में एक सवाल उठता — "अम्मी, क्या सब्र से सब ठीक हो जाता है? क्या औरत का दिल कभी थकता नहीं? मैं बचपन से सब सहती आई हूँ

— कॉलेज में हिजाब की वजह से दोस्त कम, कॉलेज में लड़कों की नजरें, शादी में दूरियाँ। क्या जिंदगी बस सहना है?" वो ये बात किसी से शेयर नहीं करती। फैमिली में ऐसे ख्यालात गुनाह समझे जाते। उसकी छोटी बहन सारा तो अभी कॉलेज में थी — माहीन उसे देखकर सोचती, "मैं भी कभी ऐसी ही थी — बेफिक्र, पाक। अब क्या हो गया है मुझे? क्या ये अकेलापन मुझे बदल रहा है?

Upperwale, मुझे वापस वैसी बना दो।" लेकिन रातें और लंबी लगतीं, और नींद नहीं आती। वो कभी-कभी पुरानी फोटोज देखती — फैसल के साथ हनीमून की, जहां वो खुश थी। लेकिन अब वो खुशी दूर लगती। दिल में एक डर — क्या ये दूरियाँ हमें अलग कर देंगी? क्या फैसल वहाँ खुश है? क्या वो भी मेरी तरह रोता है?

ऑफिस में आर्यन के साथ काम करते वक्त माहीन का दिल तेज़ धड़कता। आर्यन पास आकर कोड एक्सप्लेन करता, तो उसकी साँसें माहीन की गर्दन पर पड़तीं। आर्यन की खुशबू — एक हल्की सी परफ्यूम, जो मर्दाना लगती। माहीन शरमाकर नजरें झुका लेती। लेकिन मन में विचार आता, "आर्यन जी कितने कॉन्फिडेंट हैं। हमेशा मुस्कुराते। फैसल भी पहले ऐसे ही था। लेकिन अब... आर्यन की बातों में एक अजीब सा सुकून है। क्या ये गुनाह है?"

आर्यन कभी-कभी कंप्लीमेंट देता — "माहीन, तुम्हारा ये हिजाब बहुत सूट करता है। तुम्हारी आँखें और चमकती हैं।" माहीन लाल हो जाती, "आर्यन जी, बस कीजिए। ये ऑफिस है। लेकिन... शुक्रिया।" अंदर से एक मीठी सी सिहरन होती। पहली बार किसी गैर मर्द की तारीफ़ ने उसे अच्छा लगा। वो सोचती, "ये क्यों अच्छा लग रहा है?

फैसल की तारीफ़ से अलग क्यों? Upperwale माफ करना। मैं कमजोर हूँ। लेकिन ये भावनाएँ... जैसे कोई नई जिंदगी की झलक।"एक दिन लंच में आर्यन ने फिर होली की बात छेड़ी। "माहीन, पार्टी में आ रही हो ना? मैं स्पेशल ठंडाई बनाऊंगा — बिना भांग वाली, तुम्हारे लिए।

" माहीन हिचकिचाई। दिल में दो आवाज़ें — एक कहती, "मत जाओ, गुनाह है। फैसल नाराज़ होगा। अम्मी क्या कहेंगी?" दूसरी फुसफुसाती, "बस एक दिन। थोड़ा बदलाव। अकेलापन कम होगा। आर्यन के साथ बातें करके दिल हल्का होता है।" उसकी आँखें नम हो गईं। आर्यन ने देखा तो चिंता से पूछा, "माहीन, क्या हुआ? उदास क्यों?"

माहीन ने सिर झुका लिया, "कुछ नहीं आर्यन जी। बस... जिंदगी कभी-कभी भारी लगती है।" आर्यन का दिल पिघला — वो सोचता, "माहीन इतनी मजबूत दिखती है, लेकिन अंदर से टूट रही है। काश मैं उसके दर्द को शेयर कर पाता।" लेकिन बाहर से बस कहा, "माहीन, होली जैसे त्योहार खुशियाँ लाते हैं। ट्राई करो। मैं साथ हूँ।" माहीन का दिल धड़का — "साथ हूँ" सुनकर एक गर्माहट महसूस हुई। लेकिन गिल्ट की लहर — "फैसल, मुझे माफ कर दो। मैं सिर्फ़ दोस्ती कर रही हूँ।

"घर जाकर माहीन ने वार्डरोब खोला। उसने एक लाइट पिंक सलवार-कमीज निकाली — जो फैसल ने गिफ्ट की थी। आईने के सामने खड़ी होकर ट्राई की। दुपट्टा सिर पर रखा, लेकिन हल्का सा साइड किया ताकि चेहरा ज्यादा दिखे। खुद को देखकर सोची, "क्या मैं ये पार्टी के लिए तैयार कर रही हूँ? नहीं, बस ऐसे ही। लेकिन आर्यन जी की तारीफ़... काश फैसल भी अब ऐसे कहता।" उसकी आँखों में आँसू आ गए। "फैसल, तुम क्यों नहीं समझते मेरा दर्द? मैं तड़प रही हूँ।"

रात को फैसल से कॉल आई। फैसल थका हुआ लगा — "माहीन, आज मीटिंग थी। तुम ठीक हो?" माहीन ने होली पार्टी की बात छिपाई। बस कहा, "सब ठीक है। तुम कब आओगे?" फैसल ने कहा, "अगले महीने ट्राई करूंगा।" कॉल कटने के बाद माहीन रोने लगी। तकिए में मुँह छिपाकर। "फैसल, मुझे माफ कर दो। मैं कमजोर पड़ रही हूँ। लेकिन ये अकेलापन... ये जैसे मुझे किसी नए रास्ते की तरफ खींच रहा है।

Upperwale सही रास्ता दिखा।"अगले दिन ऑफिस में होली पार्टी शुरू हो गई। माहीन आई — देर से, लेकिन आई। हिजाब में, लेकिन मुस्कुराती। आर्यन ने दूर से देखा तो दिल खुश हो गया। वो पास आया, हाथ में हल्का गुलाल। "वेलकम माहीन। आज थोड़ा रंग लगेगा?"

माहीन का दिल तेज़ धड़का। गिल्ट की लहर आई —, फैमिली सब याद आए।

लेकिन आँखें आर्यन से मिलीं तो कुछ पिघल सा गया। वो फुसफुसाई, "बस थोड़ा सा... सिर्फ़ गाल पर।" आर्यन ने धीरे से गुलाल लगाया — माहीन के गाल पर। स्पर्श हल्का, लेकिन बिजली सा। माहीन की आँखें बंद हो गईं एक पल के लिए। दिल में तूफान — खुशी, डर, गिल्ट, और एक अजीब सी चाहत। "ये रंग... कितना मीठा लग रहा है। लेकिन फैसल, मैं क्या कर रही हूँ? Faisal mere wafadar Shauhar mujhe माफ करना
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RE: महीन को अपने रंग में रंग दिया - by razaraj2 - 19-01-2026, 11:00 PM



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