19-01-2026, 08:43 AM
भाग ~ १६
मैं और अनीता अपने अपने पाले में बैलों के पीछे चलते हुए गेहूं की गहाई कर रहे थे। श्यामू काका एक बड़ा सा लट्ठ लिए गेहूं को किनारों से ठेल कर वापस पाले में बैलों के नीचे उछाल दे रहे थे। इधर मैं और अनीता बार बार एक दूसरे को देखते और यूं ही मुस्कुरा उठते। मैं ये तो जानता था कि मुझे अपनी छोटी बहन का साथ अच्छा लगने लगा है और हमारे बीच जो चल रहा था उससे मुझे एक अलग ही सुखद अनुभूति हो रही थी इसी लिए उससे नजरें मिलने पर मैं मुस्कुरा उठता था। मगर मैं ये नहीं समझ पा रहा था कि अनीता क्यों मुझे देख के मुस्कुरा उठती थी। मैं जानना चाहता था कि उसके मन में क्या है। क्या वो भी मेरी तरह वही महसूस कर रही है जो मैं महसूस कर रहा हूं।
खैर शाम ढलने से पहले ही काका के कहने पर गहाई रोक दी हम दोनों ने। थोड़ी देर में मां, दोनों काकी और दशरथ काका हमारे तरफ आए। काका ने कहा कि कल से सुनीता और रानी भी आएंगी और गहाई में हमारी मदद करेंगी। इसके साथ ही बारी बारी से हमें आमों को भी ताकना होगा।
उसके बाद हम घर जाने लगे। बापू और दोनों काका अभी खेतों पर ही थे जबकि बाकी हम सब घर की तरफ चल पड़े थे। मैं और अनीता आगे आगे चल रहे थे जबकि मां और दोनों काकी एक साथ पीछे पीछे बातें करते हुए आ रहीं थी।
"क्या हुआ।" अनीता को धीरे चलता देख मैंने पूछा─"चला नहीं जा रहा क्या तुझसे।"
"पांव दुख रहे हैं राजू।" उसने मेरी तरफ देख के कहा─"बहुत थक गई हूं...सच्ची में।"
"थक तो जाएगी ही।" मैंने कहा─"दोनों जून घंटों बैलों के पीछे चलना जो पड़ता है। तू कहे तो अपने कंधे में लाद लूं तुझे।"
"क..क्या???" अनीता ने चौंक कर कहा─"मां देखेगी तो मुझे ही डांटेगी।"
"कुछ नहीं बोलेगी।" मैंने कहा─"और अगर कुछ बोलेगी तो कह दूंगा कि तू थक गई है इस लिए मैंने खुद तुझे अपनी पीठ पर बैठा लिया है।"
"नहीं...रहने दे।" अनीता ने कहा─"तू भी तो बहुत थक गया है। वैसे भी घर अब ज्यादा दूर नहीं है। मैं चल लूंगी।"
"ठीक है।" मैंने कहा─"मैं रात में तेरे पांव दबा दूंगा तो तुझे आराम मिल जाएगा।"
"ये क्या कह रहा है तू।" अनीता ने हैरानी से देखा─"तू मेरे पांव दबाएगा???"
"हां तो क्या हुआ।" मैंने कहा─"तू मेरी छोटी बहन है...मेरी प्यारी बहन है। थक गई है तो इतना तो कर ही सकता हूं मैं। वैसे भी तुझे प्यार करता हूं तो तुझे दर्द में कैसे देख सकता हूं मैं।"
अनीता हैरानी से एकटक देखने लगी मुझे। इधर मेरा दिल फिर से धक धक करने लगा।
"नहीं राजू।" फिर उसने कहा─"तू मेरे पांव दबाएगा तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा।"
"क्यों।"
"बस ऐसे ही।"
"पर मैं तो अपनी प्यारी बहन के पाव दबाऊंगा।" मैंने कहा─"और हां सुन...मुझे अच्छा लगेगा ऐसा करने से।"
"तो फिर मैं भी तेरे पांव दबाऊंगी।" अनीता ने एक नजर पीछे पीछे आ रहीं मां और दोनों काकी पर डालने के बाद कहा─"मैं भी तुझसे प्यार करती हूं। मैं भी तुझे दर्द में नहीं देख सकूंगी।"
"वैसे कितनी अजीब बात है न।" मैंने धड़कते दिल से वो बोला जो एकाएक ही मैं महसूस करने लगा था─"मतलब कि हम एक दूसरे से प्यार करते हैं इस लिए एक दूसरे का पाव दबाने को बोल रहे हैं...है न।"
"हां ये तो तूने सही कहा।" अनीता हल्के से चौंकी।
"इसका मतलब।" मैंने कहा─"अगर हमारे बीच ये प्यार न हो तो हम एक दूसरे के लिए ऐसा कर ही नहीं सकते...है न।"
"ह..हां शायद तू ठीक कह रहा है।" अनीता को भी जैसे ये एहसास हुआ─"तो क्या इस प्यार की वजह से हम ऐसा करने को बोल रहे हैं।"
"हां।" मैंने कहा─"और तुझे पता है वो नरेश क्या बोल रहा था।"
"क्या।"
"कह रहा था कि प्यार में लोग ऐसे ही काम करते हैं।" मैंने कहा─"मतलब कि दोनों लोग एक दूसरे के लिए ही सोचते हैं और एक दूसरे की खुशी के लिए कुछ भी करते हैं।"
"क्या सच में।" अनीता को आँखें फैली।
"हां।" मैंने सिर हिलाया─"मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा था उसकी बात का। पर अब जब हम दोनों एक दूसरे के लिए ये सब करने को कह रहे हैं तो लग रहा है कि शायद वो सच कह रहा था।"
"हाय दय्या...इसका तो ये मतलब हुआ न राजू कि हम दोनों प्रेमी हैं।" अनीता की आँखें आश्चर्य से फट पड़ीं।
"ये...ये तू क्या कह रही है।" मैं खुद भी चकित हो उठा─"हम प्रेमी कैसे हो सकते हैं।"
"अरे तू ही तो बता रहा है कि नरेश प्रेमियों के बारे में ऐसा ऐसा बोल रहा था।" अनीता ने कहा─"और अब ये भी बता रहा है कि प्रेमी लोग ही एक दूसरे के लिए ऐसा कहते और करते हैं। तो जब हम भी वैसा ही एक दूसरे को कह रहे हैं और एक दूसरे के लिए करने को कह रहे हैं तो प्रेमी ही हुए न।"
"पर हम तो भाई बहन हैं न।" मैं उलझ सा गया─"और हमारा प्यार भाई बहन वाला है।"
"हां ये तो है।" अनीता के चेहरे पर सोचो के भाव उभर आए─"तो फिर हम दोनों वैसा ही एक दूसरे के लिए क्यों कर रहे हैं जैसे प्रेमी लोग एक दूसरे के लिए करते हैं।"
"मुझे क्या पता।" मैं सच में थोड़ी दुविधा में पड़ गया─"लगता है इस बारे में मुझे नरेश और बबलू से पूछना पड़ेगा। उन्हें पता होगा कि हम दोनों एक दूसरे के लिए वैसा ही करने को क्यों बोल रहे हैं जो प्रेमी लोग एक दूसरे को बोलते हैं।"
"न..नहीं जाने दे।" अनीता ने कहा─"तू उनसे इस बारे में कोई बात नहीं करेगा और न ही तू उनसे मिलेगा। तूने मुझसे वादा किया है न कि तू अब से उनका साथ नहीं करेगा।"
"हां मुझे याद है।" मैंने कहा─"लेकिन फिर ये कैसे पता चलेगा कि हम एक दूसरे के लिए ऐसा क्यों करने को बोल रहे हैं।"
"हां तो क्या हो गया।" अनीता ने कहा─"ये जानना जरूरी है क्या। वैसे भी श्यामू काका ने बताया था कि ये सब भाई बहन के बीच का प्यार होता है...हां राजू...काका की बात ही सच होगी क्योंकि काका उमर में नरेश और बबलू से बड़े हैं तो जितना काका को पता होगा उतना उन्हें थोड़े न पता होगा।"
"शायद तू सही कह रही है।" मैंने सहमति में सिर हिला कर कहा─"खैर जाने दे इस बात को। मैं तो इतना जानता हूं कि तू मेरी बहन है और मैं तुझे बहुत प्यार करता हूं। तेरी खुशी में ही मेरी खुशी है...हां।"
"मैं भी तुझसे बहुत प्यार करती हूं।" अनीता भला कहां पीछे रहने वाली थी─"तेरी खुशी में ही मेरी खुशी है। अगर तू मेरे लिए कुछ भी कर सकता है तो मैं भी तेरे लिए कुछ भी कर सकती हूं...हां।"
"अरे राजू बेटा सुन तो।" तभी पीछे से मां ने पुकारा।
मैं और अनीता अपनी जगह पर रुक गए और पलट कर मां को देखने लगे। दोनों काकी अपने अपने घर की तरफ मुड़ गईं थी और मां अकेले ही हमारे पीछे आ रही थी।
"क्या हुआ मां।" वो जैसे ही पास आई तो मैंने पूछा।
"घर चल... लाला की दुकान से कुछ सामान मंगवाना है।" मां ने कहा─"घर में मसाले खत्म हो गए हैं। तुझे कुछ पैसे दूंगी तो ले आना।"
"ठीक है मां।"
थोड़ी देर में जब हम घर पहुंचे तो मां ने संदूक से निकाल के कुछ पैसे दिए मुझे और बताया कि क्या क्या सामान लाना है। पैसे ले कर मैं लाला की दुकान की तरफ दौड़ गया। दुकान से ला कर मैंने सारा सामान मां को पकड़ाया और फिर आंगन में खाट बिछा कर उसमें आराम करने लगा। अनीता भी मेरे पास आ कर बैठ गई।
"नहाने नहीं गई तू।" मैंने पूछा उससे।
"पसीना तो सुखा लूं।" उसने कहा─"ऐसे नहाने लगूंगी तो नुकसान कर देगा।"
"हां ये तो है।"
"अच्छा..पांव दबा दूं तेरे।"
"न..नहीं।" मैं हल्के से चौंका─"बापू ने देख लिया तो बहुत डांटेंगे।"
"पर बापू तो अभी आए ही नहीं।"
"हां पर कभी भी आ सकते हैं।"
"एक काम कर।" अनीता ने कहा─"अंदर कमरे में चल। वहीं दबा दूंगी तेरे पांव।"
"अरे रहने दे पागल।" मैं उठ कर बैठ गया─"तुझे इतना परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। खा पी के रात में सोना ही है। रात भर जब अच्छे से सोऊंगा तो सब ठीक हो जाएगा।"
अनीता मुझे एकटक देखने लगी। उसके चेहरे पर संसार भर की मासूमियत उभर आई थी। गर्मी के कारण उसके चेहरे पर पसीने की हल्की बूंदें झिलमिला रहीं थी। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा। मेरा मन किया कि आगे बढूं और उसे चूम लूं।
"तू भूल रहा है कि हमारे बीच क्या बातें हुईं थी।" फिर उसने कहा─"हमने फैसला किया था कि एक दूसरे की हर बात मानेंगे और एक दूसरे के दर्द को दूर करेंगे।"
"हां मुझे याद है।" मैंने सिर हिलाया─"पर यार मुझे अच्छा नहीं लगेगा कि मेरी प्यारी बहन मेरे पांव दबाए।"
"क्यों अच्छा नहीं लगेगा।"
"बस ऐसे ही।" मैंने कहा─"पांव तो वो दबाती है जो नौकरानी होती है। तू मेरी नौकरानी थोड़े न है....तू तो मेरी बहन है...मेरी जान है।"
"अच्छा।" उसके चेहरे पर चमक उभरी।
"और नहीं तो क्या।" मैं मुस्कुरा उठा─"मैं भले ही तेरे पांव दबाऊं चलेगा...लेकिन तू मेरे पांव दबाए ये मुझे अच्छा नहीं लगेगा।"
अनीता बड़े गौर से देखने लगी मुझे। उसके चेहरे पर एकाएक कई सारे रंग आते जाते नजर आए। इधर मेरी धड़कनें फिर से तेज हो गईं थी। मैं समझ नहीं पाता था कि जब भी मैं उससे ऐसी बातें करता था तो मेरी धड़कनें क्यों बढ़ जाती हैं।
"बहुत अजीब बातें करता है तू।" फिर उसने मासूमियत से कहा─"लेकिन फिर भी मुझे बहुत अच्छ लगता जब तू मेरे लिए ऐसा बोलता है।"
"क्या सच में।" मैं एकदम अंदर ही अंदर खुश हो गया।
"हां राजू।" अनीता मुस्कुराई─"एक बात बताऊं....अभी तक मुझे तेरी ये बातें अजीब ही लगती थीं लेकिन अब तेरी बातें सुन के मुझे अच्छा लगता है। एक बात और...मेरा मन करता है कि तू ऐसी ही बातें करे और मैं बस सुनती जाऊं।"
"तो ठीक है फिर।" मैं खुश हो कर बोला─"अब से मैं तुझसे ऐसी ही बातें करूंगा।"
"हां।" अनीता भी खुशी से मुस्कुराई।
"तू भी मुझसे ऐसी बातें करेगी न।"
"पर मेरे से तो तेरे जैसी बातें करना आएगा ही नहीं।" अनीता एकाएक मायूस सी हो गई।
"इसमें कौन सी बड़ी बात है।" मैंने कहा─"मुझे भी तो नहीं आता....पर मैं वही बोलता हूं जो अंदर से मेरा दिल कहता है। मतलब तेरे साथ रहने से मुझे जो जो महसूस होता है वहीं बोलता हूं।"
"अच्छा।" अनीता की आँखें हैरानी से फैलीं─"फिर मैं भी ऐसा ही करुंगी...हां।"
"अरे अनीता।" तभी मां ने आवाज लगाई─"अब बैठी ही रहेगी या नहाने भी जाएगी।"
"हां मां जा रही हूं।" अनीता ने ऊंचे स्वर में मां से कहा फिर मुझसे सामान्य स्वर में बोली─"चल तू भी चलेगा नहाने।"
"हां चल।"
हम दोनों खुशी खुशी चल पड़े कुएं की तरफ। मां नहा चुकी थी इस लिए कुएं में अब कोई नहीं था। मैं और अनीता जल्दी ही घर के पीछे कुएं में पहुंच गए।
"तू अपने कपड़े उतार।" अनीता ने रस्सी बाल्टी उठाते हुए मुझसे कहा─"तब तक मैं पानी खींचती हूं...और हां तू रोकेगा नहीं मुझे। मेरा जब तक मन करेगा तब तक नहलाऊंगी तुझे।"
"ठीक है पर यदि हमें देर हुई और मां ने गुस्सा किया तो।" मैंने कपड़े उतारते हुए कहा।
"तेरे लिए थोड़ी सी डांट खा लूंगी।" अनीता मुस्कुराई─"जैसे हमेशा खाती हूं...ही ही ही।"
मैं समझ गया कि वो अब वही करेगी जो उसने कहा है। असल में वो भी वही करने लगी थी जो अब उसका दिल कह रहा था।
मैं पत्थर के चौड़े पाट पर बैठ गया। कुछ ही देर में अनीता ने कुएं से पानी खींचा और उसे लिए मेरी तरफ आई।
"चल बापू की तरह हर हर गंगे बोल।"
जैसे ही उसने मेरे सिर पर पानी डालना शुरू किया मैं हर हर गंगे बोलते हुए दोनों हाथों से अपना बदन मलने लगा। इस वक्त कुएं का शीतल और ठंडा पानी बदन में पड़ने से बड़ा ही आनंद आ रहा था।
"अरे तू भी साथ साथ नहा ले न।" मैंने एकाएक उठ कर उससे कहा─"ऐसे में एक ही समय पर हम एक साथ नहा लेंगे वरना अगर देर हुई तो मां डांटेगी।"
"हां ये तो सही कह रहा है तू।" अनीता को मेरी बात सही लगी इस लिए वो सहमत हो गई।
"ला दे बाल्टी।" मैंने उसके हाथ से बाल्टी लेते हुए कहा─"चल अब तू बैठ मैं पानी खींचता हूं।"
अनीता ने मजबूरन बाल्टी मुझे पकड़ा दी और जा कर पाट पर बैठ गई।
"मेरे सिर पर पानी मत डालना तू।" फिर उसने कहा─"कल दोपहर को मूड़ धोऊंगी मैं।"
"ठीक है।"
जल्दी ही मैंने कुएं से पानी खींचा और फिर जा कर अनीता का सिर बचा के उसके ऊपर डालने लगा। अनीता फटाफट दोनों हाथ चला कर अपना बदन मलने लगी।
"राजू कितना मस्त लग रहा है।" जैसे ही बाल्टी का पानी खत्म हुआ तो उसने खुशी से कहा─"लगता है बस नहाती रहूं।"
"हां तो तू नहा न।" मैंने दुबारा कुएं पर बाल्टी डालते हुए कहा─"मैं पानी खींच खींच के तुझे भी अच्छे से नहला दूंगा और खुद भी नहा लूंगा।"
"पर मुझे अच्छा नहीं लगेगा राजू।" अनीता ने कहा─"मुझे भी पानी खींचने दे न।"
"नहीं अभी तू नहा।" मैंने कहा─"तू मुझे कल नदी में जितना चाहे नहलाना लेकिन कुएं से पानी मैं ही खींचूंगा।"
मैंने जल्दी से बाल्टी बाहर खींची और जा कर अनीता को नहलाया। उसके बाद एक और बाल्टी पानी खींचा और फिर उसे पाट के पास रख मैं खड़े खड़े ही अपने बदन पर माटी लगाने लगा। इधर अनीता पत्थर के पाट पर अपनी एड़ियां घिसने लगी थी।
पूरे बदन में और सिर में माटी लगाने के बाद मैंने बाल्टी के पानी को पूरा सिर से डाल लिया। एक ही बार ही आधे से ज्यादा माटी मेरे बदन से उतर गई। उसके बाद मैंने फिर से पानी खींचा और फिर से उसे सिर पर डाल लिया।
"बैठ के नहा न।" अनीता ने कहा─"तेरा आधा पानी तो मेरे ऊपर ही गिर जा रहा है।"
"तूने माटी नहीं लगाया क्या।" मैंने अनीता से पूछा।
"तेरे सामने थोड़े न लगाऊंगी।" अनीता मुस्कुराई और थोड़ा लजाई भी─"तेरी तरह अपने कपड़े उतार कर बदन में माटी नहीं लगा सकती।"
"अच्छा।" मैं बोला─"फिर कैसे लगाएगी।"
"तू नहीं होता तो कुर्ता उतार देती।" अनीता ने कहा─"फिर लगाती।"
"मतलब मैं न होता तो पूरा नंगी हो जाती तू।" मैंने हैरानी से आँखें फैला कर उसे देखा।
"नहीं...पागल है क्या तू।" अनीता ने चौंक कर कहा─"मैं नंगी थोड़े न होती।"
"तूने ही तो कहा कि कुर्ता उतार देती।"
"हां तो उसके अंदर मैं कमीज पहनती हूं।" अनीता फिर थोड़ा लजाई─"कुर्ता उतार देती और कमीज पहने रहती। उससे माटी लगाने में आसानी होती है।"
"अगर ऐसा है तो तू अभी भी तो अपना कुर्ता उतार सकती है।" मैंने एकदम से भोलापन दिखाया─"कमीज तो तू पहने ही है...उसमें क्या है। अच्छे से माटी लगा के नहा ले...तभी अच्छा महसूस होगा। गर्मी से जो पसीना बहता है उस तरह में वो भी अच्छे से बदन में से छूट जाएगा। वरना ऐसे ही गंध मारता रहेगा।"
"नहीं...मैं तेरे सामने कुर्ता नहीं उतार सकती।" अनीता बोली─"समझा कर बुद्धू।"
"अब इसमें समझना क्या है भला।" मैंने नासमझने का नाटक किया─"कमीज तो तू पहने ही रहेगी न तो फिर क्या समस्या है।"
"ऐसा तुझे लगता है।" अनीता ने घूर कर देखा मुझे─"पर मुझे तो पता है कि समस्या क्या है। अब चल ये बातें छोड़ और पानी खींच...या मुझे ही बाल्टी दे...मैं खींचती हूं।"
"क्या यार।" मैंने बुरा सा मुंह बनाया─"तेरे भले के लिए कह रहा हूं फिर भी मेरी बात नहीं मान रही तू। पहले तो बड़ा कह रही थी कि मेरी हर बात मानेगी और मेरे कहने पर कुछ भी करेगी।"
"अच्छा ठीक है।" अनीता कुछ पल सोच के बोली─"एक काम कर...जरा देख के आ बापू तो नहीं आए खेत से और मां को भी देख लेना वो क्या कर रही है।"
मुझे उसके कहने का मतलब तो समझ न आया लेकिन उसके कहने पर मैं झट अंदर की तरफ भागता हुआ गया। आंगन में नजर घुमाई....बापू अभी नहीं आए थे। फिर मैंने मां की तलाश में नजरें घुमाई तो वो मुझे रसोई में दिखी। रात के लिए खाना बनाने में लगी थी वो। मैं फौरन पलट कर वापस कुएं के पास आया।
"बापू तो अभी तक नहीं आए।" फिर मैंने अनीता को बताया─"और मां रसोई में खाना बनाने में लगी है। वैसे बापू और मां को देख आने के लिए क्यों कहा तूने।"
"वो इस लिए ताकि जब मैं कुर्ता उतार कर सिर्फ कमीज पहने रहूं तो उन दोनों में से कोई यहां आ न जाए। तू न होता तो मां के आने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन तेरे सामने अगर मैं सिर्फ कमीज में रहूंगी तो मां बहुत डांटेगी मुझे और बापू ने अगर मुझे ऐसे दिख लिया तो वो भी डांटेंगे। ऊपर से मुझे बहुत लाज भी आएगी जिससे मैं बापू से नजरें न मिला सकूंगी फिर।"
"अच्छा तो ये बात है।" मैं समझते हुए बोला─"पर अभी तो बापू आए ही नहीं हैं और मां रसोई में खाना बनाने में लगी हुई है इस लिए तू आराम से कुर्ता उतार सकती है न।"
"अब तूने कहा है तो तेरे कहने पर उतारना ही पड़ेगा मुझे।" अनीता ने थोड़ा शर्माते हुए कहा─"लेकिन तू मुझसे वादा कर कि ये बात तू भूल कर भी किसी को नहीं बताएगा।"
"हां ठीक है नहीं बताऊंगा।" मेरी धड़कनें ये सोच कर एकाएक तेज हो गईं कि अनीता सच में मेरे कहने पर अपना कुर्ता उतारने वाली है।
मेरे वादा करते ही अनीता ने बैठे बैठे ही अपने कुर्ते को उतारना शुरू कर दिया। उसका चेहरा एकाएक शर्म से सुर्ख पड़ने लगा था। लेकिन चेहरे पर वैसे भाव नहीं थे जैसे उस दिन नदी पर उसके द्वारा कुर्ता उतारे जाने पर उभर आए थे। उस दिन वो मेरे कहने पर कुर्ता उतारने तो लगी थी लेकिन उसके चेहरे पर मजबूरी और बेबसी साफ दिखने लगी थी। बाद में मेरे रोक देने पर वो जाने क्या सोचते हुए मुझसे लिपट कर रोने लगी थी।
खैर मैं धड़कते दिल के साथ उसे ही देखे जा रहा था। थोड़ी ही देर में जब कुर्ता थोड़ा ऊपर हो गया तो मुझे फिर से उसका पेट दिखने लगा। मेरी धड़कनों के साथ साथ मेरी सांसें भी तेज होने लगीं। एकाएक मुझे होश आया तो मैं ये सोच कर झट से कुएं में बाल्टी डालने लगा कि कहीं अनीता ये न सोच बैठे कि मैंने गलत नीयत से उसे करता उतारने के लिए कहा है और अब उसे कुर्ता उतारते हुए यूं एकटक देख भी रहा हूं।
जब मैं कुएं से पानी खींच कर पलटा तो देखा अनीता अपने कुर्ते को उतार कर एक तरफ रख रही थी। अब उसके ऊपरी बदन पर सिर्फ सफेद रंग की कमीज थी जो गीली हो चुकी थी और अब उसके सीने और पीठ पर चिपकी हुई थी। ये देख कर मुझे थोड़ा झटका सा लगा और मेरे अंदर हलचल भी मच गई।
कुछ साल पहले तक मैंने उसे ऊपर से नंगा देखा था लेकिन पिछले कुछ सालों से मैंने कभी इस तरह कमीज में भी नहीं देखा था। जाहिर है वो भी मेरी तरह जवान हो चुकी थी। अब क्योंकि मैं एक लड़का था तो मेरी जवानी सिर्फ कच्छा उतार दिए जाने पर ही लोगों को दिखाई देती जबकि अनीता एक लड़की थी तो उसकी जवानी सीने में उभरे उभारों से लोगों को उसके कपड़ों के ऊपर से भी नजर आ जाती है।
खैर मैंने खुद की हालत को किसी तरह सामान्य किया और आगे बढ़ कर उसके करीब आया।
"उतार लिया....चल अब मैं पानी डाल रहा हूं तेरे ऊपर।" मैंने सामान्य भाव से ही कहा ताकि उसे अटपटा न लगे और वो मेरे सामने खुद को सामान्य बनाए रख सके─"उसके बाद तू भी जल्दी से माटी लगा लेना।"
कहने के साथ ही मैं उसके सामने खड़ा हो कर बाल्टी का पानी उसका सिर बचा कर उस पर डालने लगा। न चाहते हुए भी अनीता अपने हाथों को बदन के अलग अलग हिस्सों पर मलने से रोक न सकी। इस चक्कर में उसका सीना मेरे सामने खुल सा गया और मैंने उसके दुधिया उभारों को स्पष्ट रूप से कमीज में देखा। सफेद रंग की पतली सी कमीज थी वो। पानी में गीला हो जाने से कमीज पूरी उसके उभारों पर चिपक गई थी जिससे उसके भूरे रंग के चूचक साफ दिखने लगे थे।
मैं लगातार पानी की धार उसके ऊपर डाले जा रहा था और मेरी निगाहें उसके सीने के उन चूचकों पर जमी थीं। अनीता का सारा ध्यान अपना बदन मलने पर था। इस बीच कई बार उसकी हथेली और उसकी कलाई उसकी छातियों से टकराई जिससे वो अजीब तरह से इधर उधर हिले और पिचके। पलक झपकते ही मेरे पूरे बदन में सनसनी दौड़ गई। कच्छे के अंदर कैद मेरे लंड में हलचल होने लगी। तभी बाल्टी का पानी खत्म हो गया और अच्छा हुआ कि मुझे होश भी आ गया वरना निश्चित ही अनीता मुझे अपनी छातियों पर घूरते हुए देख लेती। उसके बाद ये भी निश्चित था कि वो असहज हो जाती और वो ये भी सोच बैठती कि मेरे मन में उसके प्रति इस वक्त क्या चल रहा है।
"चल अब तू माटी लगा।" मैं बाल्टी ले कर फिर से कुएं की तरफ बढ़ चला─"तब तक मैं पानी खींच के खुद नहा रहा हूं।"
मेरे अच्छे और सामान्य बर्ताव को देख अनीता काफी ज्यादा सहज दिख रही थी और अब उसका शर्माना भी कम हो गया था। हालांकि उसने अपनी छातियों को छुपाने के लिए अपने दोनों घुटनों को छातियों से चिपका लिया था। खैर जैसे ही मैं कुएं में बाल्टी डालने लगा तो उसने पास ही रखी माटी को झट अपनी उंगलियों से कुरेद कर लिया और फिर उसे जल्दी जल्दी अपनी दोनों हथेलियों में घिस कर उसका पानी मिश्रित गाढ़ा घोल जैसा बनाया और फिर बाकी बची माटी को अपने पास ही रख उस घोल बन चुकी माटी को अपने बदन में लगाना शुरू कर दिया। पहले उसने दोनों हाथों पर लगाया। चेहरे पर लगाया और फिर एक नजर मेरी तरफ देखा। मैं पानी खींचने में लगा हुआ था। ये देख उसने झट से बाकी बचा घोल अपने पेट और कमीज के अंदर हाथ डाल कर छातियों पर लगाया। फिर थोड़ा कमर और पीठ पर लगाने की कोशिश की।
मतलब जबतक मैं कुएं से पानी खींच कर वापस उसके पास आया तब तक में उसने ये सारी क्रिया कर ली थी। जाहिर है वो मेरे सामने उस माटी को कमीज के अंदर हाथ डाल कर अपनी छातियों पर नहीं लगा सकती थी क्योंकि ऐसा करने से उसे लाज आती और उसकी समझ के अनुसार उसकी छातियां मुझे नजर आ जातीं।
जारी है.............
मैं और अनीता अपने अपने पाले में बैलों के पीछे चलते हुए गेहूं की गहाई कर रहे थे। श्यामू काका एक बड़ा सा लट्ठ लिए गेहूं को किनारों से ठेल कर वापस पाले में बैलों के नीचे उछाल दे रहे थे। इधर मैं और अनीता बार बार एक दूसरे को देखते और यूं ही मुस्कुरा उठते। मैं ये तो जानता था कि मुझे अपनी छोटी बहन का साथ अच्छा लगने लगा है और हमारे बीच जो चल रहा था उससे मुझे एक अलग ही सुखद अनुभूति हो रही थी इसी लिए उससे नजरें मिलने पर मैं मुस्कुरा उठता था। मगर मैं ये नहीं समझ पा रहा था कि अनीता क्यों मुझे देख के मुस्कुरा उठती थी। मैं जानना चाहता था कि उसके मन में क्या है। क्या वो भी मेरी तरह वही महसूस कर रही है जो मैं महसूस कर रहा हूं।
खैर शाम ढलने से पहले ही काका के कहने पर गहाई रोक दी हम दोनों ने। थोड़ी देर में मां, दोनों काकी और दशरथ काका हमारे तरफ आए। काका ने कहा कि कल से सुनीता और रानी भी आएंगी और गहाई में हमारी मदद करेंगी। इसके साथ ही बारी बारी से हमें आमों को भी ताकना होगा।
उसके बाद हम घर जाने लगे। बापू और दोनों काका अभी खेतों पर ही थे जबकि बाकी हम सब घर की तरफ चल पड़े थे। मैं और अनीता आगे आगे चल रहे थे जबकि मां और दोनों काकी एक साथ पीछे पीछे बातें करते हुए आ रहीं थी।
"क्या हुआ।" अनीता को धीरे चलता देख मैंने पूछा─"चला नहीं जा रहा क्या तुझसे।"
"पांव दुख रहे हैं राजू।" उसने मेरी तरफ देख के कहा─"बहुत थक गई हूं...सच्ची में।"
"थक तो जाएगी ही।" मैंने कहा─"दोनों जून घंटों बैलों के पीछे चलना जो पड़ता है। तू कहे तो अपने कंधे में लाद लूं तुझे।"
"क..क्या???" अनीता ने चौंक कर कहा─"मां देखेगी तो मुझे ही डांटेगी।"
"कुछ नहीं बोलेगी।" मैंने कहा─"और अगर कुछ बोलेगी तो कह दूंगा कि तू थक गई है इस लिए मैंने खुद तुझे अपनी पीठ पर बैठा लिया है।"
"नहीं...रहने दे।" अनीता ने कहा─"तू भी तो बहुत थक गया है। वैसे भी घर अब ज्यादा दूर नहीं है। मैं चल लूंगी।"
"ठीक है।" मैंने कहा─"मैं रात में तेरे पांव दबा दूंगा तो तुझे आराम मिल जाएगा।"
"ये क्या कह रहा है तू।" अनीता ने हैरानी से देखा─"तू मेरे पांव दबाएगा???"
"हां तो क्या हुआ।" मैंने कहा─"तू मेरी छोटी बहन है...मेरी प्यारी बहन है। थक गई है तो इतना तो कर ही सकता हूं मैं। वैसे भी तुझे प्यार करता हूं तो तुझे दर्द में कैसे देख सकता हूं मैं।"
अनीता हैरानी से एकटक देखने लगी मुझे। इधर मेरा दिल फिर से धक धक करने लगा।
"नहीं राजू।" फिर उसने कहा─"तू मेरे पांव दबाएगा तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा।"
"क्यों।"
"बस ऐसे ही।"
"पर मैं तो अपनी प्यारी बहन के पाव दबाऊंगा।" मैंने कहा─"और हां सुन...मुझे अच्छा लगेगा ऐसा करने से।"
"तो फिर मैं भी तेरे पांव दबाऊंगी।" अनीता ने एक नजर पीछे पीछे आ रहीं मां और दोनों काकी पर डालने के बाद कहा─"मैं भी तुझसे प्यार करती हूं। मैं भी तुझे दर्द में नहीं देख सकूंगी।"
"वैसे कितनी अजीब बात है न।" मैंने धड़कते दिल से वो बोला जो एकाएक ही मैं महसूस करने लगा था─"मतलब कि हम एक दूसरे से प्यार करते हैं इस लिए एक दूसरे का पाव दबाने को बोल रहे हैं...है न।"
"हां ये तो तूने सही कहा।" अनीता हल्के से चौंकी।
"इसका मतलब।" मैंने कहा─"अगर हमारे बीच ये प्यार न हो तो हम एक दूसरे के लिए ऐसा कर ही नहीं सकते...है न।"
"ह..हां शायद तू ठीक कह रहा है।" अनीता को भी जैसे ये एहसास हुआ─"तो क्या इस प्यार की वजह से हम ऐसा करने को बोल रहे हैं।"
"हां।" मैंने कहा─"और तुझे पता है वो नरेश क्या बोल रहा था।"
"क्या।"
"कह रहा था कि प्यार में लोग ऐसे ही काम करते हैं।" मैंने कहा─"मतलब कि दोनों लोग एक दूसरे के लिए ही सोचते हैं और एक दूसरे की खुशी के लिए कुछ भी करते हैं।"
"क्या सच में।" अनीता को आँखें फैली।
"हां।" मैंने सिर हिलाया─"मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा था उसकी बात का। पर अब जब हम दोनों एक दूसरे के लिए ये सब करने को कह रहे हैं तो लग रहा है कि शायद वो सच कह रहा था।"
"हाय दय्या...इसका तो ये मतलब हुआ न राजू कि हम दोनों प्रेमी हैं।" अनीता की आँखें आश्चर्य से फट पड़ीं।
"ये...ये तू क्या कह रही है।" मैं खुद भी चकित हो उठा─"हम प्रेमी कैसे हो सकते हैं।"
"अरे तू ही तो बता रहा है कि नरेश प्रेमियों के बारे में ऐसा ऐसा बोल रहा था।" अनीता ने कहा─"और अब ये भी बता रहा है कि प्रेमी लोग ही एक दूसरे के लिए ऐसा कहते और करते हैं। तो जब हम भी वैसा ही एक दूसरे को कह रहे हैं और एक दूसरे के लिए करने को कह रहे हैं तो प्रेमी ही हुए न।"
"पर हम तो भाई बहन हैं न।" मैं उलझ सा गया─"और हमारा प्यार भाई बहन वाला है।"
"हां ये तो है।" अनीता के चेहरे पर सोचो के भाव उभर आए─"तो फिर हम दोनों वैसा ही एक दूसरे के लिए क्यों कर रहे हैं जैसे प्रेमी लोग एक दूसरे के लिए करते हैं।"
"मुझे क्या पता।" मैं सच में थोड़ी दुविधा में पड़ गया─"लगता है इस बारे में मुझे नरेश और बबलू से पूछना पड़ेगा। उन्हें पता होगा कि हम दोनों एक दूसरे के लिए वैसा ही करने को क्यों बोल रहे हैं जो प्रेमी लोग एक दूसरे को बोलते हैं।"
"न..नहीं जाने दे।" अनीता ने कहा─"तू उनसे इस बारे में कोई बात नहीं करेगा और न ही तू उनसे मिलेगा। तूने मुझसे वादा किया है न कि तू अब से उनका साथ नहीं करेगा।"
"हां मुझे याद है।" मैंने कहा─"लेकिन फिर ये कैसे पता चलेगा कि हम एक दूसरे के लिए ऐसा क्यों करने को बोल रहे हैं।"
"हां तो क्या हो गया।" अनीता ने कहा─"ये जानना जरूरी है क्या। वैसे भी श्यामू काका ने बताया था कि ये सब भाई बहन के बीच का प्यार होता है...हां राजू...काका की बात ही सच होगी क्योंकि काका उमर में नरेश और बबलू से बड़े हैं तो जितना काका को पता होगा उतना उन्हें थोड़े न पता होगा।"
"शायद तू सही कह रही है।" मैंने सहमति में सिर हिला कर कहा─"खैर जाने दे इस बात को। मैं तो इतना जानता हूं कि तू मेरी बहन है और मैं तुझे बहुत प्यार करता हूं। तेरी खुशी में ही मेरी खुशी है...हां।"
"मैं भी तुझसे बहुत प्यार करती हूं।" अनीता भला कहां पीछे रहने वाली थी─"तेरी खुशी में ही मेरी खुशी है। अगर तू मेरे लिए कुछ भी कर सकता है तो मैं भी तेरे लिए कुछ भी कर सकती हूं...हां।"
"अरे राजू बेटा सुन तो।" तभी पीछे से मां ने पुकारा।
मैं और अनीता अपनी जगह पर रुक गए और पलट कर मां को देखने लगे। दोनों काकी अपने अपने घर की तरफ मुड़ गईं थी और मां अकेले ही हमारे पीछे आ रही थी।
"क्या हुआ मां।" वो जैसे ही पास आई तो मैंने पूछा।
"घर चल... लाला की दुकान से कुछ सामान मंगवाना है।" मां ने कहा─"घर में मसाले खत्म हो गए हैं। तुझे कुछ पैसे दूंगी तो ले आना।"
"ठीक है मां।"
थोड़ी देर में जब हम घर पहुंचे तो मां ने संदूक से निकाल के कुछ पैसे दिए मुझे और बताया कि क्या क्या सामान लाना है। पैसे ले कर मैं लाला की दुकान की तरफ दौड़ गया। दुकान से ला कर मैंने सारा सामान मां को पकड़ाया और फिर आंगन में खाट बिछा कर उसमें आराम करने लगा। अनीता भी मेरे पास आ कर बैठ गई।
"नहाने नहीं गई तू।" मैंने पूछा उससे।
"पसीना तो सुखा लूं।" उसने कहा─"ऐसे नहाने लगूंगी तो नुकसान कर देगा।"
"हां ये तो है।"
"अच्छा..पांव दबा दूं तेरे।"
"न..नहीं।" मैं हल्के से चौंका─"बापू ने देख लिया तो बहुत डांटेंगे।"
"पर बापू तो अभी आए ही नहीं।"
"हां पर कभी भी आ सकते हैं।"
"एक काम कर।" अनीता ने कहा─"अंदर कमरे में चल। वहीं दबा दूंगी तेरे पांव।"
"अरे रहने दे पागल।" मैं उठ कर बैठ गया─"तुझे इतना परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। खा पी के रात में सोना ही है। रात भर जब अच्छे से सोऊंगा तो सब ठीक हो जाएगा।"
अनीता मुझे एकटक देखने लगी। उसके चेहरे पर संसार भर की मासूमियत उभर आई थी। गर्मी के कारण उसके चेहरे पर पसीने की हल्की बूंदें झिलमिला रहीं थी। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा। मेरा मन किया कि आगे बढूं और उसे चूम लूं।
"तू भूल रहा है कि हमारे बीच क्या बातें हुईं थी।" फिर उसने कहा─"हमने फैसला किया था कि एक दूसरे की हर बात मानेंगे और एक दूसरे के दर्द को दूर करेंगे।"
"हां मुझे याद है।" मैंने सिर हिलाया─"पर यार मुझे अच्छा नहीं लगेगा कि मेरी प्यारी बहन मेरे पांव दबाए।"
"क्यों अच्छा नहीं लगेगा।"
"बस ऐसे ही।" मैंने कहा─"पांव तो वो दबाती है जो नौकरानी होती है। तू मेरी नौकरानी थोड़े न है....तू तो मेरी बहन है...मेरी जान है।"
"अच्छा।" उसके चेहरे पर चमक उभरी।
"और नहीं तो क्या।" मैं मुस्कुरा उठा─"मैं भले ही तेरे पांव दबाऊं चलेगा...लेकिन तू मेरे पांव दबाए ये मुझे अच्छा नहीं लगेगा।"
अनीता बड़े गौर से देखने लगी मुझे। उसके चेहरे पर एकाएक कई सारे रंग आते जाते नजर आए। इधर मेरी धड़कनें फिर से तेज हो गईं थी। मैं समझ नहीं पाता था कि जब भी मैं उससे ऐसी बातें करता था तो मेरी धड़कनें क्यों बढ़ जाती हैं।
"बहुत अजीब बातें करता है तू।" फिर उसने मासूमियत से कहा─"लेकिन फिर भी मुझे बहुत अच्छ लगता जब तू मेरे लिए ऐसा बोलता है।"
"क्या सच में।" मैं एकदम अंदर ही अंदर खुश हो गया।
"हां राजू।" अनीता मुस्कुराई─"एक बात बताऊं....अभी तक मुझे तेरी ये बातें अजीब ही लगती थीं लेकिन अब तेरी बातें सुन के मुझे अच्छा लगता है। एक बात और...मेरा मन करता है कि तू ऐसी ही बातें करे और मैं बस सुनती जाऊं।"
"तो ठीक है फिर।" मैं खुश हो कर बोला─"अब से मैं तुझसे ऐसी ही बातें करूंगा।"
"हां।" अनीता भी खुशी से मुस्कुराई।
"तू भी मुझसे ऐसी बातें करेगी न।"
"पर मेरे से तो तेरे जैसी बातें करना आएगा ही नहीं।" अनीता एकाएक मायूस सी हो गई।
"इसमें कौन सी बड़ी बात है।" मैंने कहा─"मुझे भी तो नहीं आता....पर मैं वही बोलता हूं जो अंदर से मेरा दिल कहता है। मतलब तेरे साथ रहने से मुझे जो जो महसूस होता है वहीं बोलता हूं।"
"अच्छा।" अनीता की आँखें हैरानी से फैलीं─"फिर मैं भी ऐसा ही करुंगी...हां।"
"अरे अनीता।" तभी मां ने आवाज लगाई─"अब बैठी ही रहेगी या नहाने भी जाएगी।"
"हां मां जा रही हूं।" अनीता ने ऊंचे स्वर में मां से कहा फिर मुझसे सामान्य स्वर में बोली─"चल तू भी चलेगा नहाने।"
"हां चल।"
हम दोनों खुशी खुशी चल पड़े कुएं की तरफ। मां नहा चुकी थी इस लिए कुएं में अब कोई नहीं था। मैं और अनीता जल्दी ही घर के पीछे कुएं में पहुंच गए।
"तू अपने कपड़े उतार।" अनीता ने रस्सी बाल्टी उठाते हुए मुझसे कहा─"तब तक मैं पानी खींचती हूं...और हां तू रोकेगा नहीं मुझे। मेरा जब तक मन करेगा तब तक नहलाऊंगी तुझे।"
"ठीक है पर यदि हमें देर हुई और मां ने गुस्सा किया तो।" मैंने कपड़े उतारते हुए कहा।
"तेरे लिए थोड़ी सी डांट खा लूंगी।" अनीता मुस्कुराई─"जैसे हमेशा खाती हूं...ही ही ही।"
मैं समझ गया कि वो अब वही करेगी जो उसने कहा है। असल में वो भी वही करने लगी थी जो अब उसका दिल कह रहा था।
मैं पत्थर के चौड़े पाट पर बैठ गया। कुछ ही देर में अनीता ने कुएं से पानी खींचा और उसे लिए मेरी तरफ आई।
"चल बापू की तरह हर हर गंगे बोल।"
जैसे ही उसने मेरे सिर पर पानी डालना शुरू किया मैं हर हर गंगे बोलते हुए दोनों हाथों से अपना बदन मलने लगा। इस वक्त कुएं का शीतल और ठंडा पानी बदन में पड़ने से बड़ा ही आनंद आ रहा था।
"अरे तू भी साथ साथ नहा ले न।" मैंने एकाएक उठ कर उससे कहा─"ऐसे में एक ही समय पर हम एक साथ नहा लेंगे वरना अगर देर हुई तो मां डांटेगी।"
"हां ये तो सही कह रहा है तू।" अनीता को मेरी बात सही लगी इस लिए वो सहमत हो गई।
"ला दे बाल्टी।" मैंने उसके हाथ से बाल्टी लेते हुए कहा─"चल अब तू बैठ मैं पानी खींचता हूं।"
अनीता ने मजबूरन बाल्टी मुझे पकड़ा दी और जा कर पाट पर बैठ गई।
"मेरे सिर पर पानी मत डालना तू।" फिर उसने कहा─"कल दोपहर को मूड़ धोऊंगी मैं।"
"ठीक है।"
जल्दी ही मैंने कुएं से पानी खींचा और फिर जा कर अनीता का सिर बचा के उसके ऊपर डालने लगा। अनीता फटाफट दोनों हाथ चला कर अपना बदन मलने लगी।
"राजू कितना मस्त लग रहा है।" जैसे ही बाल्टी का पानी खत्म हुआ तो उसने खुशी से कहा─"लगता है बस नहाती रहूं।"
"हां तो तू नहा न।" मैंने दुबारा कुएं पर बाल्टी डालते हुए कहा─"मैं पानी खींच खींच के तुझे भी अच्छे से नहला दूंगा और खुद भी नहा लूंगा।"
"पर मुझे अच्छा नहीं लगेगा राजू।" अनीता ने कहा─"मुझे भी पानी खींचने दे न।"
"नहीं अभी तू नहा।" मैंने कहा─"तू मुझे कल नदी में जितना चाहे नहलाना लेकिन कुएं से पानी मैं ही खींचूंगा।"
मैंने जल्दी से बाल्टी बाहर खींची और जा कर अनीता को नहलाया। उसके बाद एक और बाल्टी पानी खींचा और फिर उसे पाट के पास रख मैं खड़े खड़े ही अपने बदन पर माटी लगाने लगा। इधर अनीता पत्थर के पाट पर अपनी एड़ियां घिसने लगी थी।
पूरे बदन में और सिर में माटी लगाने के बाद मैंने बाल्टी के पानी को पूरा सिर से डाल लिया। एक ही बार ही आधे से ज्यादा माटी मेरे बदन से उतर गई। उसके बाद मैंने फिर से पानी खींचा और फिर से उसे सिर पर डाल लिया।
"बैठ के नहा न।" अनीता ने कहा─"तेरा आधा पानी तो मेरे ऊपर ही गिर जा रहा है।"
"तूने माटी नहीं लगाया क्या।" मैंने अनीता से पूछा।
"तेरे सामने थोड़े न लगाऊंगी।" अनीता मुस्कुराई और थोड़ा लजाई भी─"तेरी तरह अपने कपड़े उतार कर बदन में माटी नहीं लगा सकती।"
"अच्छा।" मैं बोला─"फिर कैसे लगाएगी।"
"तू नहीं होता तो कुर्ता उतार देती।" अनीता ने कहा─"फिर लगाती।"
"मतलब मैं न होता तो पूरा नंगी हो जाती तू।" मैंने हैरानी से आँखें फैला कर उसे देखा।
"नहीं...पागल है क्या तू।" अनीता ने चौंक कर कहा─"मैं नंगी थोड़े न होती।"
"तूने ही तो कहा कि कुर्ता उतार देती।"
"हां तो उसके अंदर मैं कमीज पहनती हूं।" अनीता फिर थोड़ा लजाई─"कुर्ता उतार देती और कमीज पहने रहती। उससे माटी लगाने में आसानी होती है।"
"अगर ऐसा है तो तू अभी भी तो अपना कुर्ता उतार सकती है।" मैंने एकदम से भोलापन दिखाया─"कमीज तो तू पहने ही है...उसमें क्या है। अच्छे से माटी लगा के नहा ले...तभी अच्छा महसूस होगा। गर्मी से जो पसीना बहता है उस तरह में वो भी अच्छे से बदन में से छूट जाएगा। वरना ऐसे ही गंध मारता रहेगा।"
"नहीं...मैं तेरे सामने कुर्ता नहीं उतार सकती।" अनीता बोली─"समझा कर बुद्धू।"
"अब इसमें समझना क्या है भला।" मैंने नासमझने का नाटक किया─"कमीज तो तू पहने ही रहेगी न तो फिर क्या समस्या है।"
"ऐसा तुझे लगता है।" अनीता ने घूर कर देखा मुझे─"पर मुझे तो पता है कि समस्या क्या है। अब चल ये बातें छोड़ और पानी खींच...या मुझे ही बाल्टी दे...मैं खींचती हूं।"
"क्या यार।" मैंने बुरा सा मुंह बनाया─"तेरे भले के लिए कह रहा हूं फिर भी मेरी बात नहीं मान रही तू। पहले तो बड़ा कह रही थी कि मेरी हर बात मानेगी और मेरे कहने पर कुछ भी करेगी।"
"अच्छा ठीक है।" अनीता कुछ पल सोच के बोली─"एक काम कर...जरा देख के आ बापू तो नहीं आए खेत से और मां को भी देख लेना वो क्या कर रही है।"
मुझे उसके कहने का मतलब तो समझ न आया लेकिन उसके कहने पर मैं झट अंदर की तरफ भागता हुआ गया। आंगन में नजर घुमाई....बापू अभी नहीं आए थे। फिर मैंने मां की तलाश में नजरें घुमाई तो वो मुझे रसोई में दिखी। रात के लिए खाना बनाने में लगी थी वो। मैं फौरन पलट कर वापस कुएं के पास आया।
"बापू तो अभी तक नहीं आए।" फिर मैंने अनीता को बताया─"और मां रसोई में खाना बनाने में लगी है। वैसे बापू और मां को देख आने के लिए क्यों कहा तूने।"
"वो इस लिए ताकि जब मैं कुर्ता उतार कर सिर्फ कमीज पहने रहूं तो उन दोनों में से कोई यहां आ न जाए। तू न होता तो मां के आने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन तेरे सामने अगर मैं सिर्फ कमीज में रहूंगी तो मां बहुत डांटेगी मुझे और बापू ने अगर मुझे ऐसे दिख लिया तो वो भी डांटेंगे। ऊपर से मुझे बहुत लाज भी आएगी जिससे मैं बापू से नजरें न मिला सकूंगी फिर।"
"अच्छा तो ये बात है।" मैं समझते हुए बोला─"पर अभी तो बापू आए ही नहीं हैं और मां रसोई में खाना बनाने में लगी हुई है इस लिए तू आराम से कुर्ता उतार सकती है न।"
"अब तूने कहा है तो तेरे कहने पर उतारना ही पड़ेगा मुझे।" अनीता ने थोड़ा शर्माते हुए कहा─"लेकिन तू मुझसे वादा कर कि ये बात तू भूल कर भी किसी को नहीं बताएगा।"
"हां ठीक है नहीं बताऊंगा।" मेरी धड़कनें ये सोच कर एकाएक तेज हो गईं कि अनीता सच में मेरे कहने पर अपना कुर्ता उतारने वाली है।
मेरे वादा करते ही अनीता ने बैठे बैठे ही अपने कुर्ते को उतारना शुरू कर दिया। उसका चेहरा एकाएक शर्म से सुर्ख पड़ने लगा था। लेकिन चेहरे पर वैसे भाव नहीं थे जैसे उस दिन नदी पर उसके द्वारा कुर्ता उतारे जाने पर उभर आए थे। उस दिन वो मेरे कहने पर कुर्ता उतारने तो लगी थी लेकिन उसके चेहरे पर मजबूरी और बेबसी साफ दिखने लगी थी। बाद में मेरे रोक देने पर वो जाने क्या सोचते हुए मुझसे लिपट कर रोने लगी थी।
खैर मैं धड़कते दिल के साथ उसे ही देखे जा रहा था। थोड़ी ही देर में जब कुर्ता थोड़ा ऊपर हो गया तो मुझे फिर से उसका पेट दिखने लगा। मेरी धड़कनों के साथ साथ मेरी सांसें भी तेज होने लगीं। एकाएक मुझे होश आया तो मैं ये सोच कर झट से कुएं में बाल्टी डालने लगा कि कहीं अनीता ये न सोच बैठे कि मैंने गलत नीयत से उसे करता उतारने के लिए कहा है और अब उसे कुर्ता उतारते हुए यूं एकटक देख भी रहा हूं।
जब मैं कुएं से पानी खींच कर पलटा तो देखा अनीता अपने कुर्ते को उतार कर एक तरफ रख रही थी। अब उसके ऊपरी बदन पर सिर्फ सफेद रंग की कमीज थी जो गीली हो चुकी थी और अब उसके सीने और पीठ पर चिपकी हुई थी। ये देख कर मुझे थोड़ा झटका सा लगा और मेरे अंदर हलचल भी मच गई।
कुछ साल पहले तक मैंने उसे ऊपर से नंगा देखा था लेकिन पिछले कुछ सालों से मैंने कभी इस तरह कमीज में भी नहीं देखा था। जाहिर है वो भी मेरी तरह जवान हो चुकी थी। अब क्योंकि मैं एक लड़का था तो मेरी जवानी सिर्फ कच्छा उतार दिए जाने पर ही लोगों को दिखाई देती जबकि अनीता एक लड़की थी तो उसकी जवानी सीने में उभरे उभारों से लोगों को उसके कपड़ों के ऊपर से भी नजर आ जाती है।
खैर मैंने खुद की हालत को किसी तरह सामान्य किया और आगे बढ़ कर उसके करीब आया।
"उतार लिया....चल अब मैं पानी डाल रहा हूं तेरे ऊपर।" मैंने सामान्य भाव से ही कहा ताकि उसे अटपटा न लगे और वो मेरे सामने खुद को सामान्य बनाए रख सके─"उसके बाद तू भी जल्दी से माटी लगा लेना।"
कहने के साथ ही मैं उसके सामने खड़ा हो कर बाल्टी का पानी उसका सिर बचा कर उस पर डालने लगा। न चाहते हुए भी अनीता अपने हाथों को बदन के अलग अलग हिस्सों पर मलने से रोक न सकी। इस चक्कर में उसका सीना मेरे सामने खुल सा गया और मैंने उसके दुधिया उभारों को स्पष्ट रूप से कमीज में देखा। सफेद रंग की पतली सी कमीज थी वो। पानी में गीला हो जाने से कमीज पूरी उसके उभारों पर चिपक गई थी जिससे उसके भूरे रंग के चूचक साफ दिखने लगे थे।
मैं लगातार पानी की धार उसके ऊपर डाले जा रहा था और मेरी निगाहें उसके सीने के उन चूचकों पर जमी थीं। अनीता का सारा ध्यान अपना बदन मलने पर था। इस बीच कई बार उसकी हथेली और उसकी कलाई उसकी छातियों से टकराई जिससे वो अजीब तरह से इधर उधर हिले और पिचके। पलक झपकते ही मेरे पूरे बदन में सनसनी दौड़ गई। कच्छे के अंदर कैद मेरे लंड में हलचल होने लगी। तभी बाल्टी का पानी खत्म हो गया और अच्छा हुआ कि मुझे होश भी आ गया वरना निश्चित ही अनीता मुझे अपनी छातियों पर घूरते हुए देख लेती। उसके बाद ये भी निश्चित था कि वो असहज हो जाती और वो ये भी सोच बैठती कि मेरे मन में उसके प्रति इस वक्त क्या चल रहा है।
"चल अब तू माटी लगा।" मैं बाल्टी ले कर फिर से कुएं की तरफ बढ़ चला─"तब तक मैं पानी खींच के खुद नहा रहा हूं।"
मेरे अच्छे और सामान्य बर्ताव को देख अनीता काफी ज्यादा सहज दिख रही थी और अब उसका शर्माना भी कम हो गया था। हालांकि उसने अपनी छातियों को छुपाने के लिए अपने दोनों घुटनों को छातियों से चिपका लिया था। खैर जैसे ही मैं कुएं में बाल्टी डालने लगा तो उसने पास ही रखी माटी को झट अपनी उंगलियों से कुरेद कर लिया और फिर उसे जल्दी जल्दी अपनी दोनों हथेलियों में घिस कर उसका पानी मिश्रित गाढ़ा घोल जैसा बनाया और फिर बाकी बची माटी को अपने पास ही रख उस घोल बन चुकी माटी को अपने बदन में लगाना शुरू कर दिया। पहले उसने दोनों हाथों पर लगाया। चेहरे पर लगाया और फिर एक नजर मेरी तरफ देखा। मैं पानी खींचने में लगा हुआ था। ये देख उसने झट से बाकी बचा घोल अपने पेट और कमीज के अंदर हाथ डाल कर छातियों पर लगाया। फिर थोड़ा कमर और पीठ पर लगाने की कोशिश की।
मतलब जबतक मैं कुएं से पानी खींच कर वापस उसके पास आया तब तक में उसने ये सारी क्रिया कर ली थी। जाहिर है वो मेरे सामने उस माटी को कमीज के अंदर हाथ डाल कर अपनी छातियों पर नहीं लगा सकती थी क्योंकि ऐसा करने से उसे लाज आती और उसकी समझ के अनुसार उसकी छातियां मुझे नजर आ जातीं।
जारी है.............


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