19-01-2026, 08:40 AM
भाग ~ १५
दूसरे दिन भी सुबह मैं और अनीता खेतों पर गए और वहां गहाई की। फिर दोपहर होने से पहले काका के कहने पर हमने गहाई करना रोका। उसके बाद हम घर की तरफ चल दिए। इस बार मां हमारे साथ थी इस लिए नदी में जाने का मौका नहीं मिला हमें। इस बात से अनीता और मैं दोनों ही थोड़ा मायूस हो गए थे। मां से नदी में नहाने जाने की बात बोल नहीं सकते थे क्योंकि मां जाने न देती।
दोपहर में जब हम सब खा पी कर आराम कर रहे थे तो मंजू काकी की दोनों बेटियां आ गईं थी। उन्हें देखते ही मुझे खयाल आ गया था कि जब ये दोनों अपने मामा के साथ नाहरपुर गईं थी तभी मेरे बापू ने इनकी मां के साथ नया रिश्ता बनाना शुरू किया था। उसके बाद वो दोनों इतना आगे बढ़ गए थे कि रिश्ते की सारी मर्यादा ही तोड़ डाली थी।
सुनीता और रानी आंगन के दूसरी तरफ वाले बरामदे में अनीता के साथ चंदा खेल रहीं थी और मैं थोड़ी ही दूरी पर खाट बिछाए लेटा हुआ था। मां ने कहा था कि आराम कर ले इस लिए आराम ही कर रहा था। मां भी रसोई के पास वाले बरामदे में खाट पर लेटी आराम कर रही थी। बापू कहीं गए थे। मैंने सुनीता से पूछा था कि उसके बापू(मझले काका) कहां हैं तो उसने बताया था कि वो अभी थोड़ी देर पहले ही खेतों की तरफ चले गए हैं।
तब से खाट पर पड़ा मैं यही सोच रहा था कि क्या बापू मंजू काकी के घर गए होंगे। मतलब कि हो सकता है उन्हें ये अंदाजा हो गया हो कि उनका मझला भाई खेत चला गया होगा। उसकी दोनों बेटियां तो हमारे घर आ गई हैं। तो अगर दशरथ काका खेत चले गए होंगे तो निश्चित ही मंजू काकी घर में इस वक्त अकेली ही होंगी।
मुझे याद आया कि सुनीता और रानी के आने के कुछ ही देर बाद बापू घर से चले गए थे। मैं सोचने लगा कि क्या मुझे मंजू काकी के घर जा कर ये देखना चाहिए। मैं काफी देर से खुद को रोके हुए था मगर जब मन न माना तो उठ बैठा। पास ही डोरी में लटकी अपनी शर्ट पहनी और चल पड़ा बाहर की तरफ।
"कहां जा रहा है राजू।" तभी पीछे से अनीता ने मुझे जाता देख पूछ लिया।
"मझले काका के घर जा रहा हूं।"
"आ न तू भी खेल हमारे साथ।" उसने कहा।
"आता हूं थोड़ी देर में।"
कहने के साथ ही मैं तेजी से बाहर निकल गया। मेरे मन में हलचल मची हुई थी। बार बार यही खयाल आ रहा था कि अगर सच में काका खेत चले गए होंगे तो काकी घर पर अकेली होंगी और मेरे बापू इस मौके पर चौका मारने ही गए होंगे उनके घर।
तेज तेज चलते हुए मैं कुछ ही देर में मझले काका के घर पहुंच गया। मझले काका और छोटे काका के घर अगल बगल ही बने थे। सामने की सड़क बाएं तरफ मुड़ जाती थी जिससे घर का सामने वाला हिस्सा थोड़ा टेढ़ा जैसा दिखता था। दोनों घरों के पीछे काफी खाली जगह थी जिसे चारों तरफ से बारी लगा के रूंध दिया गया था। बारी में कई सारे झाड़ झंखाड़ थे जिसकी वजह से आर पार का न के बराबर ही दिखता था। इसके अलावा कई सारे पेड़ पौधे भी लगे हुए थे। दोनों घरों के पीछे तरफ ही कुआं था जिसमें दोनों काका और काकी का अपना अपना नहाना धोना होता था।
मैं जब काका के घर के सामने पहुंचा तो मेरी नजर श्यामू काका के घर के बाहर जो थोड़ा सा मैदान था वहां पड़ी। श्यामू काका ने बाहर ही नीम के पेड़ के नीचे खाट बिछा रखी थी जिसमें बापू और उनके साथ गांव का एक और आदमी बैठा हुआ था। दोनों बातें कर रहे थे जबकि श्यामू काका थोड़ी ही दूर पर घर के बाहरी दीवार से सटी हुई बनी पट्टी पर बैठे हुए थे। जैसा कि मैंने बताया घर के सामने वाली सड़क मुड़ जाती थी जिसकी वजह से घर का सामना मझले काका के घर के सामने से थोड़ा टेढ़ा दिखता था। इस वजह से श्यामू काका मुझे बगल से बैठे दिख रहे थे। मतलब मुझे देखने के लिए उनको अपनी गर्दन थोड़ा सा टेढ़ी करनी पड़ती।
खैर बापू को छोटे काका के घर के बाहर गांव के किसी आदमी के साथ बातें करता देख मैंने राहत की सांस ली। मगर अगले ही पल ये भी सोचने लगा कि क्या मेरे बापू घर से यहां इस आदमी से बातें करने ही आए होंगे। या फिर ये हो सकता है कि वो मंजू काकी के घर ही आते रहे होंगे लेकिन श्यामू काका के घर के बाहर उन्होंने उस आदमी को देखा होगा या फिर उस आदमी ने ही बापू को देखा होगा। ऐसे में या तो उसने बापू को अपने पास बुला लिया होगा या फिर बापू को ही मजबूरन उसके पास जाना पड़ गया रहा होगा। खैर जो भी हो...अच्छी बात यही थी कि वो मंजू काकी के घर में नहीं थे। बापू के नजरिए से सोचा जाए तो ये उनका दुर्भाग्य हो गया था। वरना मौका तो बहुत ही अच्छा था उनके पास मंजू काकी के पास जा कर उनके साथ कुछ भी करने का। बशर्ते मंजू काकी उन्हें कुछ करने देतीं।
खैर बापू को वहां बैठा देख मैं सोचने लगा कि अब मैं क्या करूं। मतलब मंजू काकी के घर जाऊं या यहीं से वापस अपने घर लौट जाऊं। सहसा मुझे अनीता का खयाल आया। उसने मुझसे पूछा था कि कहां जा रहा है। मतलब उसे ये लगा था कि मैं अपने दोस्त बबलू के पास जा रहा हूं जबकि मैंने उससे वादा किया था कि अब से उसके साथ नहीं रहूंगा। मैं अपनी बहन को दुबारा नाराज नहीं करना चाहता था। वैसे भी उसके साथ आज मेरा जिस तरह का समय गुजरा था वो बहुत ही अनोखा और मजेदार रहा था।
अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी मंजू काकी घर से बाहर निकलती दिखाई दीं। उन्हें देख मैं फौरन सड़क से उनके घर के अंदर की तरफ मुड़ चला।
उधर काकी के हाथ में कोई बर्तन था जिसे लिए वो मवेशियों के पास पहुंची और उस बर्तन को एक नाद में उलट दिया। शायद बर्तन में वो कुछ मवेशियों के लिए लाई थीं।
"क्या कर रही हो काकी।" मैंने उनके पास पहुंचते ही पूछा।
"गाय के भूसे में चोकर डालने आई थी राजू।" काकी ने बताया─"तुम इस वक्त खड़ी दुपहरी में यहां किसी काम से आए हो क्या।"
"हां वो...मैं काका के पास ये पूछने आया था कि गहाई अभी करेंगे या थोड़ा और ठंडी बेरा हो जाने पर करेंगे।" मैंने फटाफट बहाना बना कर कहा।
"तुम्हारे काका तो कुछ देर पहले खेत चले गए हैं।" काकी ने कहा─"पर तुम अभी मत जाना वहां। ठंडी बेरा हो जाने पर ही गहाई शुरू होगी।"
"तो फिर काका खड़ी दुपहरी में क्यों खेत चले गए हैं।" मैंने पूछा─"छोटे काका और बापू तो अभी यहीं हैं।"
"अरे...अब क्या बताऊं तुम्हें।" काकी ने अजीब भाव से कहा─"मुझसे नाराज हो गए थे तो खेत ही चले गए।"
"क..क्या??? मतलब क्यों नाराज हो गए थे वो तुमसे।" मैंने हैरानी से पूछा।
"अंदर आओ बताती हूं।"
मैं काकी के साथ अंदर की तरफ चल पड़ा। एकाएक ही मन में कई तरह के विचार उठने लगे थे। जल्दी ही मैं और काकी अन्दर आंगन वाले बरामदे में आ गए। मैं वहीं पास ही रखी खाट पर जा के बैठ गया।
"हां अब बताओ काकी।" मैंने उत्सुकता में पूछा─"काका क्यों नाराज हो गए थे तुमसे।"
"तुम अभी छोटे हो इस लिए शायद न समझो।" काकी ने कहा─"ये जो मरद लोग होते हैं न...सब एक जैसे होते हैं और अपने ही मन की करते हैं।"
"आखिर हुआ क्या है काकी।"
"खा पी कर हम सब आराम कर रहे थे।" काकी ने बताना शुरू किया─"कुछ देर पहले अचानक सुनीता और रानी ने कहा कि वो दोनों बड़ी मां(मेरी मां) के घर अपनी अनीता जीजी के साथ चंदा खेलने के लिए जाना चाहती हैं। मैंने सोचा ये दोनों चली जाएंगी तो थोड़ा चैन से कुछ देर सो लूंगी वरना इनके शोर शराबे में ठीक से आराम भी नहीं कर पाती मैं। खैर जैसे ही वो दोनों यहां से गईं तो अचानक तुम्हारे काका मेरे पास आ धमके और पता है क्या कहने लगे।"
"क..क्या कहने लगे वो??" अंजानी आशंका से मेरी धड़कनें तेज हो गईं।
"उफ्फ मुझे तो बताने में भी शर्म आती है राजू।" मंजू काकी ने बेबस भाव से कहा─"पर तुमसे भला कहां अब कुछ छुपा रह गया है इस लिए बता देती हूं। मैं इसी खाट में लेटी हुई थी जिसमें अभी तुम बैठे हो। तुम्हारे काका आए फिर पूंछा बच्चियां कहां गईं हैं। हालांकि वो यहीं पास में ही बैठे पान सुपाड़ी खा रहे थे और उन्होंने दोनों बच्चियों की बातें सुन ली थी, फिर भी मुझसे पूछ रहे थे। खैर मैंने बताया कि वो दोनों जीजी के घर गईं हैं। इतना सुनते ही जैसे वो खुश हो गए...झट से बोले फिर तो बढ़िया मौका है तुझे चो...चोदने का।"
"क...क्या???? ऐसा कहा काका ने।" मैंने आश्चर्य से पूछा।
"हां राजू।" काकी ने कहा─"और फिर बिना मेरी मर्जी जाने कहने लगे....चल सीधी हो के लेट का और अपना धोती साया ऊपर कर ले।"
"फिर???"
"उनकी ऐसी बातें सुन कर मेरा दिमाग खराब हो गया।" मंजू काकी ने कहा─"एक तो वैसे ही कटाई कर कर के थकी हुई थी, ऊपर से सुनीता ने खाना भी नहीं बताया था तो खेत से आने के बाद नहा धो के खाना बनाया। फिर सबको खिलाया पिलाया और अब ऊपर से उनके लिए धोती साया ऊपर करूं। मतलब समझते ही नहीं कि मैं भी इंसान हूं और मुझे भी थकान और पीड़ा महसूस होती है। पर नहीं....उन्हें इससे क्या। जब जिस वक्त उनकी इच्छा होगी तो उनके कहने पर मैं किसी गुलाम की तरह अपना धोती साया ऊपर उठा लूं और वो मेरी टांगों के बीच अपना खूंटा डाल कर धक्के लगाने लगें।"
"तो...तो क्या तुमने उनके कहने पर अपना धोती साया ऊपर नहीं उठाया फिर।" मैंने धड़कते दिल से पूछा।
"मैंने साफ मना कर दिया था।" काकी ने कहा─"कह दिया था कि मेरे बस का नहीं है ये। मैं भी इंसान हूं और काम कर कर के बुरी तरह थक गई हूं। एक आदमी ये भी सोचता है कि खड़ी दुपहरी में क्यों ऐसा काम करे जिससे गर्मी में और भी बुरा हाल हो जाए मगर उनको तो बस पानी निकालने से मतलब है। जब मैंने साफ मना कर दिया तो गुस्सा होने लगे। उनके गुस्सा होने पर भी जब मैं राजी न हुई तो गालियां देते हुए और पैर पटकते हुए खेत की तरफ चले गए।"
"तुमने रोका नहीं उनको।"
"जिसे सिर्फ अपने सुख की पड़ी हो ऐसे आदमी को क्यों रोकूं मैं।" काकी ने कहा─"मैंने नहीं रोका उन्हें...।"
"क्या काकी...मेरे इतने अच्छे काका को नाराज कर दिया तुमने।" मैंने उन्हें छेड़ा─"अभी अगर मेरे बापू ने ऐसा बोला होता तो क्या उन्हें भी मना कर देती तुम।"
"र...राजू।" काकी ने आँखें फैला कर कहा─"कुछ तो शर्म करो। कैसी बातें कर रहे हो तुम।"
"लो अब मैं अपनी काकी से मजाक भी न करूं।" मैंने भोलापन दिखा कर बुरा सा मुंह बनाया।
"बिल्कुल करो मजाक।" काकी ने कहा─"लेकिन इस तरह का नहीं राजू। मत भूलो कि मैं तुम्हारी भौजी नहीं बल्कि काकी हूं। कोई भी लड़का अपनी काकी से ऐसा मजाक नहीं करता।"
"मंजू....मेरी प्यारी मंजू।" ये बोलते हुए मैं एकदम से हंसने लगा।
काकी ये सुन कर बुरी तरह शर्मा गईं।
"हाय दय्या राजू कितने खराब हो तुम।" काकी ने शर्म से जबरन आँखें दिखा कर कहा।
"वैसे बापू छोटे काका के घर के बाहर ही बैठे हैं।" मैंने उन्हें फिर छेड़ा।
"अच्छा अब समझी।" काकी ने कहा─"घर में तुमने अपने बापू को नहीं देखा होगा तो सोचा होगा वो मेरे घर आए होंगे। इसी लिए ये देखने तुम यहां आए हो और मुझसे बहाना बना रहे थे...है न।"
"न..नहीं नहीं काकी।" मैं बुरी तरह सकपका गया─"मैं सच में गहाई करने के बारे में ही पूछने आया था काका से।"
"ये बात तो तुम घर में जीजी से भी पूछ सकते थे।" काकी ने मेरी चोरी पकड़ ली─"खड़ी दुपहरी में यहां आने की क्या जरूरत थी। मतलब साफ है कि तुम यही जांच करने आए हो कि जेठ जी मेरे घर आए हैं या नहीं।"
इस बार कोई बहाना न बना सका मैं। मेरी चोरी सच में पकड़ ली थी काकी ने। मैं सिर झुका लेने के सिवा कुछ न कर सका।
"कितने शैतान हो गए हो तुम।" तभी काकी ने कहा─"एक ही दिन में कितना बदल गए हो। मैं तो तुम्हें कितना भोला और नादान समझती थी राजू।"
मैं अब भी कुछ न बोला। ये अलग बात है कि अन्दर ही अंदर मुझे बुरा लगने लगा था। काकी का ऐसा कहना पता नहीं क्यों मुझे अच्छा नहीं लग रहा था।
"अब तुम ये गलत बोल रही हो काकी।" मैंने एक झटके में सिर उठा कर और थोड़ा नाराज हो कर बोला─"मैं तो अब भी कहीं न कहीं भोला और नादान ही हूं पर तुम और बापू क्या हो। जो तुम दोनों ने किया क्या वो बहुत अच्छा था।"
मेरी ये बात सुनते ही काकी हक्की बक्की सी देखने लगी मुझे। शायद उन्हें उम्मीद नहीं थी कि मैं ऐसा बोल सकता हूं उन्हें। फिर एकदम से उनके चेहरे पर शर्म और अपराध भाव उभर आए।
"तुम्हारा जो मन करे करो।" मैं खाट से उतर कर बोला─"मुझे उससे कोई लेना देना नहीं है...जा रहा हूं।"
काकी ने मुझे रोका मगर मैं न रुका। मेरा दिमाग खराब हो गया था। मन ही मन काकी को बुरा भला कहते हुए मैं अपने घर की तरफ चल पड़ा। उधर काकी एकाएक घबरा उठीं थी और साथ ही पछताने भी लगीं थी कि क्यों उन्होंने मुझे ऐसा कहा।
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घर पहुंच कर मैं भी अनीता और सुनीता व रानी के साथ चंदा खेलने लगा। अनीता बार बार मेरी तरफ देखती थी क्योंकि मेरे चेहरे पर थोड़ा नाराजगी के भाव थे। वो जानना चाहती थी कि मैं किस लिए नाराज दिख रहा हूं मगर सुनीता और रानी की मौजूदगी में उसने मुझसे पूछा नहीं। खैर ऐसे ही हम काफी देर तक खेलते रहे जिससे समय थोड़ा गुजर गया। बापू अभी तक घर नहीं आए थे। हालांकि अब मैं ये सोच भी नहीं रहा था कि वो श्यामू काका के यहां से मंजू काकी के घर गए होंगे या नहीं।
कुछ देर में मां आई और मुझसे कहा कि मैं खेतों पर जाऊं। मां के कहने पर मैंने जब खेलना बंद कर दिया तो अनीता ने भी खेलना बंद कर दिया। सुनीता और रानी भी उठ कर अपने घर जाने लगीं।
"तू अगर थक गई हो तो न जा खेत।" मां ने अनीता से कहा─"राजू अपने काका के साथ गहाई कर लेगा। तू रात के लिए खाना बना लेना।"
"अभी तो रात का खाना बनाने में बहुत समय है मां।" अनीता ने कहा─"अभी मैं भी राजू के साथ जाऊंगी। शाम होने से पहले ही आ जाऊंगी। उसके बाद जल्दी से जूठे बर्तन धो के खाना बना लूंगी।"
"ठीक है जा फिर अपने भाई के साथ।" मां ने कहा─"जूठे बर्तन मैं लूंगी। उसके बाद ही आऊंगी अब।"
"चल राजू हम चलते हैं।" अनीता ने खुश हो के कहा मुझसे।
मैं बिना कुछ बोले चल पड़ा बाहर की तरफ। अभी हम बाहर ही पहुंचे थे कि तभी अनीता एकदम से चौंक कर बोली─"राजू रुक थोड़ा। नमकीन गुड़ लाना तो भूल ही गई मैं।"
मेरा जवाब सुने बिना ही वो पलटी और दौड़ते हुए अंदर की तरफ चली गई। मैं नीम के पेड़ के पास खड़ा उसके आने का इंतज़ार करने लगा। थोड़ी ही देर में वो भागते हुए आई।
"ले आई मैं।" फिर उसने अपनी कमर के पास दुपट्टे में छुपाया नमकीन गुड़ दिखाते हुए बोली─"चल अब।"
इतने में ही उसकी सांसें फूल गईं थी जिससे उसके सीने के उभार ऊपर नीचे होने लगे थे। मैंने एक नजर उसे देखा और चल पड़ा।
"क्या हुआ चुप क्यों है तू।" रास्ते में उसने मुझसे पूछा─"खेलते समय भी नाराज दिख रहा था तू। कुछ हुआ है क्या।"
"नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।" मैंने हल्के से मुस्कुरा कर उससे कहा─"तू मेरे साथ है तो अब सब ठीक है।"
अनीता ध्यान से देखने लगी मुझे। जैसे समझने की कोशिश कर रही हो कि मेरे ऐसा बोलने का क्या मतलब है या मेरे मन में इस वक्त क्या चल रहा है।
"किसी किसी वक्त तेरी बातें मुझे बिल्कुल भी समझ नहीं आती।" फिर उसने कहा─"पता नहीं क्या बोल देता है। मैं सोचती ही रह जाती हूं। तू साफ साफ क्यों नहीं बोला करता है।"
"अरे बुद्धू तो मैं हूं।" मैंने कहा─"फिर तुझे क्यों नहीं समझ आती मेरी बात।"
"शायद मैं भी बुद्धू हूं ही ही ही।" अनीता बोली और खुद ही हंसने लगी।
मैं भी उसकी बात पर मुस्कुरा उठा। सच में अब मेरा मूड ठीक हो गया था। मुझे हैरानी भी हुई कि उससे बातें करते ही मेरा मूड ठीक हो गया है। तभी तो उसकी बात पर मुस्कुराने लगा था।
"अच्छा बता न क्यों नाराज था उस समय।" उसने फिर से पूछा।
"जाने दे न।" मैंने कहा─"अब सिर्फ ये मायने रखता है कि तेरे साथ होने से मैं ठीक हूं।"
"क्या सच कह रहा है तू।" अनीता ने चलते हुए मेरी तरफ देखा─"मतलब सच में मैं तेरे साथ हूं तो तुझे अच्छा लग रहा है।"
"हां...क्या तुझे मेरे साथ अच्छा नहीं लग रहा।"
"हां मुझे भी अच्छा लग रहा है।" अनीता ने मुस्कुरा कर कहा─"पर आज से पहले...मतलब कल तक ऐसा नहीं लगता था।"
"क्यों।" मैं मन ही मन ये सोच के चौंका कि वो भी वही महसूस कर रही है जो मैं महसूस कर रहा था─"कल तक कैसा लगता था तुझे।"
"यही लगता था कि तू मेरी आंखों के सामने न आया करे।" अनीता ने कहा─"क्योंकि तू हर वक्त मुझे तंग करता था न। गलती तेरी होती थी फिर भी मां मुझे ही डांटती थी इस लिए तुझ पर गुस्सा आता था मुझे।"
"चल वो सब भूल जाते हैं।" मैंने कहा─"अब से हम कोई झगड़ा नहीं करेंगे बल्कि अच्छे से रहेंगे और एक दूसरे को आज जैसे ही प्यार करेंगे।"
"हां ठीक है।" अनीता ने खुशी से कहा─"अब से हम कोई झगड़ा नहीं करेंगे।"
"मैं तेरी खुशी के लिए कुछ भी करूंगा और तू मेरी खुशी के लिए कुछ भी करना।" मैंने उससे कहा─"बोल करेगी न ऐसा।"
"अगर तू ऐसा करेगा तो हां मैं भी करूंगी।" अनीता ने गर्दन घुमा कर मेरी आंखों में देखा।
"मैं तो पक्का करूंगा अनीता।" मैंने कहा─"तुझे भरोसा न हो तो आजमा के देख ले।"
"मुझे भरोसा है तुझ पर।"
ऐसी ही मीठी मीठी बातें करते हुए हम दोनों थोड़ी देर में खेत पहुंच गए। वहां पर मझले काका खेतों से पुल्लियां उठा उठा कर खलिहान में इकट्ठा कर रहे थे। अभी सिर्फ वो ही थे खेत में।
"और कोई नहीं आया क्या काका।" मैंने उनसे पूछा।
"आते ही होंगे करेजा।" काका ने कहा─"तू एक काम कर जरा आमों की तरफ का चक्कर लगा ले। थोड़ी देर पहले मैंने दो तीन लड़कों को देखा था वहां...फिर जा के भगाया उनको।"
"ठीक है काका।" मैंने कहा─"मैं एक चक्कर लगा के आता हूं...चल अनीता।"
मैं और अनीता आमों की तरफ चल पड़े।
"अच्छा हुआ काका ने हमें आमों का चक्कर लगाने के लिए कह दिया।" थोड़ी दूर चलने के बाद सहसा अनीता ने कहा─"अब हम दोनों आराम से वहां छांव में बैठ के नमकीन गुड़ खाएंगे। किसी को पता भी नहीं चलेगा...हां।"
"तू हर वक्त नमकीन गुड़ को ही याद करती रहती है क्या।" मैं हंसते हुए बोला─"घर से चलते समय भी तुझे इसकी याद आ गई थी तो तू उल्टे पैर भाग कर अन्दर इन्हें लेने चली गई थी और अब यहां फिर से इसी की बात।"
मेरी बात सुन कर अनीता झेंप गई और शर्मा कर मुस्कुराने लगी।
"वैसे एक बात कहूं।" मैंने धड़कते दिल से कहा─"तू जब शर्माती है तो और भी अच्छी लगती है।"
"धत्त...क्या बोलता है।" अनीता मेरी बात सुन और ज्यादा शर्मा गई। उसके गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठों पर बहुत ही गहरी मुस्कान उभर आई थी।
"ले..अब मैं अपनी प्यारी बहन की तारीफ भी न करूं।" मैंने मुंह बनाया तो वो हंस पड़ी।
"अच्छा तो तू इस तरह मेरी तारीफ कर रहा है।" वो मुस्कुराते हुए बोली।
"हां और क्या।" मैंने कहा─"तुझे अच्छा नहीं लगा तो बता दे...नहीं करूंगा अब से।"
"मैंने ये नहीं कहा कि मुझे अच्छा नहीं लगा।" अनीता ने कहा─"बल्कि मुझे तो बहुत अच्छा लग रहा है कि मेरा भाई मेरी तारीफ कर रहा है।"
"देख आदमी तारीफ उसी की करता है जो सुंदर और प्यारा होता है।" मैंने जैसे उसे शीशे में उतारा─"तू सुंदर और प्यारी है इस लिए तेरी तारीफ कर रहा हूं।"
"अच्छा क्या सच में।" अनीता पहले तो चौंकी फिर थोड़ा शर्माते हुए बोली─"मतलब क्या सच में मैं तुझे सुंदर और प्यारी दिखती हूं।"
"हां तू बहुत प्यारी है और सुंदर भी।" मेरा दिल जोरों से धक धक करने लगा─"और जब तू इस तरह शर्माती है तो और भी अच्छी लगती है।"
"धत्त....चुप कर तू।" अनीता अपनी तारीफ से खुश तो बहुत हुई लेकिन शर्माने की बात से उसे शर्म आने लगी।
"अच्छा चल छोड़ इस बात को।" मैंने बात बदली─"तू इस तरफ देख...मैं उस तरफ देख लेता हूं।"
अनीता को बोल कर मैं दूसरी तरफ वाले पेड़ों की तरफ बढ़ चला। तभी एक तरफ दो तीन लड़के थोड़ा दूर खड़े नजर आए। वो हमारे आमों की तरफ ही देख रहे थे। जैसे ही उनकी नजर मुझ पर पड़ी तो वो तीनों उल्टे पैर भाग खड़े हुए वहां से। जमीन पर आम के कुछ पत्ते गिरे पड़े थे। जाहिर है जब दोपहर में यहां कोई नहीं था तब कोई न कोई अमिया चोर यहां अमिया झोरने आया था।
"सुबह के वक्त जब हम दोनों यहां आए थे तब ये पत्ते नहीं थे न।" तभी अनीता मेरी तरफ आते हुए बोली─"लगता है दोपहर में किसी ने अमिया झोरी हैं।"
"सही कहा।" मैंने दूर एक तरफ हाथ से इशारा कर कहा─"देख उधर...वो लड़के यहां अमिया झोरने की फिराक में ही थे। अभी जब उनकी नजर मुझ पर पड़ी तो देख साले कैसे भागे जा रहे हैं।"
"हां सही कह रहा है तू।" अनीता उस तरफ देखते हुए बोली─"तीन जने दिख रहे हैं। मतलब अब दोपहर में भी यहां किसी न किसी को आम ताकने के लिए रहना होगा। तभी बचेंगे आम...नहीं तो ये लोग सब झोर डालेंगे।"
"कल से मैं खा पी कर आ जाया करूंगा यहां।" मैंने कहा─"फिर देखता हूं कैसे ये साले अमिया झोरते हैं।"
"मैं भी तेरे साथ आऊंगी।" अनीता ने झट से कहा─"लाएगा न मुझे भी अपने साथ।"
"मां अगर आने देगी तो आ जाना।" मैंने कहा─"चल अभी तो तुझे नमकीन गुड़ खाना है न।"
"अरे हां...मैं तो भूल ही गई थी।" अनीता आँखें फैला कर मुस्कुरा उठी─"चल जल्दी...नहीं तो बाकी लोग भी अगर आ गए तो हमें गहाई करने जाना पड़ेगा।"
मैं मुस्कुराते हुए उसके साथ उसी जगह पर आया जिस जगह पर सुबह बैठ कर हमने नमकीन गुड़ खाया था। अनीता ने कमर से अपना दुपट्टा छोरा और फिर उसके अंदर से नमकीन गुड़ हाथ में ले कर दुपट्टे को पेड़ की जड़ में रख दिया। उसके बाद बैठने के लिए जैसे ही वो झुकी सुबह की तरह फिर से उसके कुर्ते का गला फैल गया और उसके साथ ही अंदर पहनी सफेद कमीज का भी जिससे मुझे आधे से ज्यादा उसकी छातियां दिख गईं। पलक झपकते ही ये देख कर मेरे पूरे बदन में झुरझुरी दौड़ गई।
"अरे खड़ा क्यों है।" तभी वो बैठने के बाद बोली─"बैठ न जल्दी।"
मैं झट से बैठ गया। अब तक उसने अपनी गोंद में नमकीन और गुड़ वाले दोनों कागजों को खोल लिया था। मेरे देखते ही देखते उसने दोनों में से थोड़ा थोड़ा नमकीन गुड़ हाथ में लिया और फिर मेरे मुंह की तरफ बढ़ाया।
"ले पहले तू खा।" फिर उसने मुस्कुराते हुए कहा तो मैंने इस तरह मुंह खोल दिया जैसे अचानक मैं उसके सम्मोहन में फंस गया होऊं।
मुंह में नमकीन गुड़ चबाते हुए मैंने भी कागज़ों से नमकीन गुड़ हाथ में ले कर उसके मुख की तरफ बढ़ाया। पहले वो मुस्कुराई फिर धीरे से अपना मुंह खोल दिया तो मैंने आहिस्ता से उसके मुंह में नमकीन गुड़ डाल दिया।
"कितना अच्छा लग रहा है न।" वो मुंह चलाते हुए मगर मुस्कुरा कर बोली।
"हां।" मैंने कहा─"ऐसा लग रहा है जैसे हम दोनों प्रेमी हैं....है न।"
मेरी ये बात सुनते ही अनीता एकदम से चौंक पड़ी। उसकी आँखें हैरानी से फैल गईं। नमकीन गुड़ चबाता हुआ उसका मुंह एकदम रुक गया।
"ये...ये क्या कह रहा है तू।" फिर उसने हैरानी से कहा─"क्या हम प्रेमी हैं।"
मुझे अपनी कही हुई बात का थोड़ा देर से एहसास हुआ और जब हुआ तो मैं खुद बुरी तरह चौंक पड़ा। एक ही पल में मेरी धड़कनें रुक सी गईं। समझ न आया कि अब क्या बोलूं। मैं जानता था कि अनीता भले ही मुझसे उमर में छोटी है लेकिन इतना तो उसे भी पता होगा कि प्रेमी प्रेमिका क्या होते हैं या किसे कहते हैं। उसके बाद जब उसने हैरानी से पूछा तो मुझे समझ ही न आया कि क्या बोलूं। मैंने खुद को सम्हाला और फटाफट कोई जवाब सोचने लगा।
"बता न राजू।" अनीता मुझे चुप देख बोली─"क्या सच में हम प्रेमी हैं। ऐसा कैसे कह सकता है तू।"
"अरे तो क्या हो गया।" मैंने अपनी बौखलाहट को छुपाते हुए कहा─"मैंने तो बस ऐसे ही कहा था। कह देने से हम प्रेमी थोड़े न हो जाएंगे।"
"पर राजू...तूने ऐसा कैसे कह दिया।" अनीता अपलक मुझे ही देखे जा रही थी।
"अरे पागल मैंने तो ऐसा बोल कर सिर्फ उदाहरण दिया था।" मैंने कहा─"क्योंकि सुना है प्रेमी लोग भी इसी तरह एक दूसरे को खिलाते पिलाते हैं।"
"क्या वो लोग सच में ऐसा करते हैं।" अनीता ने चकित भाव से पूछा।
"देख...मैंने तो नहीं देखा कभी।" मैंने कहा─"सिर्फ सुना है मैंने ऐसा....अब ये सच है या झूठ मुझे नहीं पता।"
"किससे सुना है तूने।" अनीता ने एकाएक मुझे घूरते हुए पूछा─"क्या तेरे उस दोस्त बबलू ने ये बताया है तुझे।"
"हां....और नरेश ने भी बताया था।" मैंने कहा─"नरेश को पहले पता नहीं था। उसने किसी से सुना था कि बहुत पहले कई ऐसे प्रेमी थे जो आज भले ही इस दुनिया में नहीं है मगर उनका प्रेम अमर है।"
"क्या सच में।" अनीता को यकीन न हुआ─"कौन थे वो।"
"उनका नाम....रुक याद करता हूं।" मैं अपने दिमाग पर जोर डालते हुए बोला─"हां याद आया...नरेश उन लोगों का नाम लैला मजनू....शीरी फरहाद और सोनी...माह....महिवाल हां सोनी महिवाल बताया था।"
"बड़ी अजीब बात है।" अनीता ने सिर खुजाते हुए कहा─"मैंने तो अब से पहले कभी ये नाम नहीं सुने।"
"छोड़ जाने दे न।" मैंने कहा─"और जल्दी से इसे खा कर चलते हैं यहां से।"
"हां ठीक है।"
कहने के साथ ही अनीता और मैं फिर से नमकीन गुड़ खाने लगे। इधर मैं ये भी सोचने लगा कि क्या सच में अनीता को ऐसे प्रेमियों के बारे में कुछ पता नहीं है। और क्या उसे ये भी पता नहीं है कि प्रेम क्या होता है। तभी मुझे याद आया कि जब शुरू में मैंने उससे प्रेमी वाली बात कही थी तब वो एकदम चौंक पड़ी थी और कहने लगी थी मैं ऐसा कैसे कह सकता हूं। मतलब...मतलब वो थोड़ा बहुत जानती है कि प्रेमी क्या होता है या प्रेम क्या होता है। मैं सोचने लगा कि इस बारे में उसे कितना पता होगा। वैसे मुझे भी तो ज्यादा पता नहीं है। बस उतना ही पता है जितना नरेश और बबलू ने बताया था।
"अच्छा सुन न।" तभी अनीता ने चुप्पी तोड़ी─"क्या तुझे पता है प्रेम क्या होता है।"
"मुझे कैसे पता होगा।" मैंने सफेद झूठ बोला। असल में मैं उसे ये नहीं जताना चाहता था कि मैं इस बारे में जानता हूं क्योंकि हो सकता है कि इस बात से वो ये सोचने लगे कि मैं अभी जो कर रहा हूं उसके पीछे कहीं मेरा कोई उल्टा सीधा इरादा तो नहीं है। इस लिए बोला─"मुझे कैसे पता होगा भला....मैंने थोड़े न कभी किसी से प्रेम किया है।"
"अच्छा...जब तुझे नहीं पता है तो ये कैसे पता है कि प्रेम किसी से किया जाता है।"
अनीता ने जब ये कहा तो मैं अंदर ही अंदर बुरी तरह चौंक पड़ा। अंजाने में मैं जो बोल गया था अनीता ने उसे ऐसा पकड़ा था कि मैं सोच भी नहीं सकता था। खैर मैं भी इतना जल्दी मात खा जाने वाला नहीं था।
"क्योंकि ये बात मुझे उन्हीं दोनों से पता चली थी।" मैंने कहा─"उन्होंने ही बताया था कि प्रेम दो लोगों में होता है और वो दो लोग एक दूसरे से प्रेम करते हैं।"
"अच्छा तो कैसे करते हैं वो प्रेम।" अनीता ने पूछा।
"मुझे नहीं पता।" मैं सच में प्रेम के ज्ञान से पूरा परिचित नहीं था इस लिए बोला─"और मैंने पूछा भी नहीं उनसे। तू ही बता....क्या तुझे पता है इसके बारे में।"
"मुझे पता होता तो तुझसे क्यों पूछती बुद्धू।" अनीता कह कर हंस पड़ी।
"क्या सच में तुझे नहीं पता।" मैंने संदेह की दृष्टि से उसे देखा।
"अब क्या कसम खा के बोलूं।" उसने मुझे घूरा।
"नहीं...छोड़ इस बात को।" कहने के साथ ही मैं उठ कर खड़ा हो गया─"बाकी का तू खा ले। मैं नहीं खाऊंगा....और थोड़ा जल्दी कर।"
"बस थोड़ा सा ही बचा है।" अनीता ने दोनों कागजों को गोंद से उठा लिया और फिर खड़े हो कर कहा─"ले थोड़ा सा तू ले ले और बाकी मैं खा लेती हूं।"
कुछ देर बाद हम दोनों हाथ मुंह साफ कर के खलिहान तरफ आ गए। मैंने मझले काका को बताया कि तीन लोग अमिया झोरने के फिराक में थोड़ा दूर खड़े थे।
मां के अलावा सब आ गए थे। श्यामू काका ने दोनों पाले में बैलों को जुएं में नध दिया था। इस लिए हम दोनों अपनी अपनी तरफ के पाले में जा कर बैलों को हांकने लगे।
जारी है...........
दूसरे दिन भी सुबह मैं और अनीता खेतों पर गए और वहां गहाई की। फिर दोपहर होने से पहले काका के कहने पर हमने गहाई करना रोका। उसके बाद हम घर की तरफ चल दिए। इस बार मां हमारे साथ थी इस लिए नदी में जाने का मौका नहीं मिला हमें। इस बात से अनीता और मैं दोनों ही थोड़ा मायूस हो गए थे। मां से नदी में नहाने जाने की बात बोल नहीं सकते थे क्योंकि मां जाने न देती।
दोपहर में जब हम सब खा पी कर आराम कर रहे थे तो मंजू काकी की दोनों बेटियां आ गईं थी। उन्हें देखते ही मुझे खयाल आ गया था कि जब ये दोनों अपने मामा के साथ नाहरपुर गईं थी तभी मेरे बापू ने इनकी मां के साथ नया रिश्ता बनाना शुरू किया था। उसके बाद वो दोनों इतना आगे बढ़ गए थे कि रिश्ते की सारी मर्यादा ही तोड़ डाली थी।
सुनीता और रानी आंगन के दूसरी तरफ वाले बरामदे में अनीता के साथ चंदा खेल रहीं थी और मैं थोड़ी ही दूरी पर खाट बिछाए लेटा हुआ था। मां ने कहा था कि आराम कर ले इस लिए आराम ही कर रहा था। मां भी रसोई के पास वाले बरामदे में खाट पर लेटी आराम कर रही थी। बापू कहीं गए थे। मैंने सुनीता से पूछा था कि उसके बापू(मझले काका) कहां हैं तो उसने बताया था कि वो अभी थोड़ी देर पहले ही खेतों की तरफ चले गए हैं।
तब से खाट पर पड़ा मैं यही सोच रहा था कि क्या बापू मंजू काकी के घर गए होंगे। मतलब कि हो सकता है उन्हें ये अंदाजा हो गया हो कि उनका मझला भाई खेत चला गया होगा। उसकी दोनों बेटियां तो हमारे घर आ गई हैं। तो अगर दशरथ काका खेत चले गए होंगे तो निश्चित ही मंजू काकी घर में इस वक्त अकेली ही होंगी।
मुझे याद आया कि सुनीता और रानी के आने के कुछ ही देर बाद बापू घर से चले गए थे। मैं सोचने लगा कि क्या मुझे मंजू काकी के घर जा कर ये देखना चाहिए। मैं काफी देर से खुद को रोके हुए था मगर जब मन न माना तो उठ बैठा। पास ही डोरी में लटकी अपनी शर्ट पहनी और चल पड़ा बाहर की तरफ।
"कहां जा रहा है राजू।" तभी पीछे से अनीता ने मुझे जाता देख पूछ लिया।
"मझले काका के घर जा रहा हूं।"
"आ न तू भी खेल हमारे साथ।" उसने कहा।
"आता हूं थोड़ी देर में।"
कहने के साथ ही मैं तेजी से बाहर निकल गया। मेरे मन में हलचल मची हुई थी। बार बार यही खयाल आ रहा था कि अगर सच में काका खेत चले गए होंगे तो काकी घर पर अकेली होंगी और मेरे बापू इस मौके पर चौका मारने ही गए होंगे उनके घर।
तेज तेज चलते हुए मैं कुछ ही देर में मझले काका के घर पहुंच गया। मझले काका और छोटे काका के घर अगल बगल ही बने थे। सामने की सड़क बाएं तरफ मुड़ जाती थी जिससे घर का सामने वाला हिस्सा थोड़ा टेढ़ा जैसा दिखता था। दोनों घरों के पीछे काफी खाली जगह थी जिसे चारों तरफ से बारी लगा के रूंध दिया गया था। बारी में कई सारे झाड़ झंखाड़ थे जिसकी वजह से आर पार का न के बराबर ही दिखता था। इसके अलावा कई सारे पेड़ पौधे भी लगे हुए थे। दोनों घरों के पीछे तरफ ही कुआं था जिसमें दोनों काका और काकी का अपना अपना नहाना धोना होता था।
मैं जब काका के घर के सामने पहुंचा तो मेरी नजर श्यामू काका के घर के बाहर जो थोड़ा सा मैदान था वहां पड़ी। श्यामू काका ने बाहर ही नीम के पेड़ के नीचे खाट बिछा रखी थी जिसमें बापू और उनके साथ गांव का एक और आदमी बैठा हुआ था। दोनों बातें कर रहे थे जबकि श्यामू काका थोड़ी ही दूर पर घर के बाहरी दीवार से सटी हुई बनी पट्टी पर बैठे हुए थे। जैसा कि मैंने बताया घर के सामने वाली सड़क मुड़ जाती थी जिसकी वजह से घर का सामना मझले काका के घर के सामने से थोड़ा टेढ़ा दिखता था। इस वजह से श्यामू काका मुझे बगल से बैठे दिख रहे थे। मतलब मुझे देखने के लिए उनको अपनी गर्दन थोड़ा सा टेढ़ी करनी पड़ती।
खैर बापू को छोटे काका के घर के बाहर गांव के किसी आदमी के साथ बातें करता देख मैंने राहत की सांस ली। मगर अगले ही पल ये भी सोचने लगा कि क्या मेरे बापू घर से यहां इस आदमी से बातें करने ही आए होंगे। या फिर ये हो सकता है कि वो मंजू काकी के घर ही आते रहे होंगे लेकिन श्यामू काका के घर के बाहर उन्होंने उस आदमी को देखा होगा या फिर उस आदमी ने ही बापू को देखा होगा। ऐसे में या तो उसने बापू को अपने पास बुला लिया होगा या फिर बापू को ही मजबूरन उसके पास जाना पड़ गया रहा होगा। खैर जो भी हो...अच्छी बात यही थी कि वो मंजू काकी के घर में नहीं थे। बापू के नजरिए से सोचा जाए तो ये उनका दुर्भाग्य हो गया था। वरना मौका तो बहुत ही अच्छा था उनके पास मंजू काकी के पास जा कर उनके साथ कुछ भी करने का। बशर्ते मंजू काकी उन्हें कुछ करने देतीं।
खैर बापू को वहां बैठा देख मैं सोचने लगा कि अब मैं क्या करूं। मतलब मंजू काकी के घर जाऊं या यहीं से वापस अपने घर लौट जाऊं। सहसा मुझे अनीता का खयाल आया। उसने मुझसे पूछा था कि कहां जा रहा है। मतलब उसे ये लगा था कि मैं अपने दोस्त बबलू के पास जा रहा हूं जबकि मैंने उससे वादा किया था कि अब से उसके साथ नहीं रहूंगा। मैं अपनी बहन को दुबारा नाराज नहीं करना चाहता था। वैसे भी उसके साथ आज मेरा जिस तरह का समय गुजरा था वो बहुत ही अनोखा और मजेदार रहा था।
अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी मंजू काकी घर से बाहर निकलती दिखाई दीं। उन्हें देख मैं फौरन सड़क से उनके घर के अंदर की तरफ मुड़ चला।
उधर काकी के हाथ में कोई बर्तन था जिसे लिए वो मवेशियों के पास पहुंची और उस बर्तन को एक नाद में उलट दिया। शायद बर्तन में वो कुछ मवेशियों के लिए लाई थीं।
"क्या कर रही हो काकी।" मैंने उनके पास पहुंचते ही पूछा।
"गाय के भूसे में चोकर डालने आई थी राजू।" काकी ने बताया─"तुम इस वक्त खड़ी दुपहरी में यहां किसी काम से आए हो क्या।"
"हां वो...मैं काका के पास ये पूछने आया था कि गहाई अभी करेंगे या थोड़ा और ठंडी बेरा हो जाने पर करेंगे।" मैंने फटाफट बहाना बना कर कहा।
"तुम्हारे काका तो कुछ देर पहले खेत चले गए हैं।" काकी ने कहा─"पर तुम अभी मत जाना वहां। ठंडी बेरा हो जाने पर ही गहाई शुरू होगी।"
"तो फिर काका खड़ी दुपहरी में क्यों खेत चले गए हैं।" मैंने पूछा─"छोटे काका और बापू तो अभी यहीं हैं।"
"अरे...अब क्या बताऊं तुम्हें।" काकी ने अजीब भाव से कहा─"मुझसे नाराज हो गए थे तो खेत ही चले गए।"
"क..क्या??? मतलब क्यों नाराज हो गए थे वो तुमसे।" मैंने हैरानी से पूछा।
"अंदर आओ बताती हूं।"
मैं काकी के साथ अंदर की तरफ चल पड़ा। एकाएक ही मन में कई तरह के विचार उठने लगे थे। जल्दी ही मैं और काकी अन्दर आंगन वाले बरामदे में आ गए। मैं वहीं पास ही रखी खाट पर जा के बैठ गया।
"हां अब बताओ काकी।" मैंने उत्सुकता में पूछा─"काका क्यों नाराज हो गए थे तुमसे।"
"तुम अभी छोटे हो इस लिए शायद न समझो।" काकी ने कहा─"ये जो मरद लोग होते हैं न...सब एक जैसे होते हैं और अपने ही मन की करते हैं।"
"आखिर हुआ क्या है काकी।"
"खा पी कर हम सब आराम कर रहे थे।" काकी ने बताना शुरू किया─"कुछ देर पहले अचानक सुनीता और रानी ने कहा कि वो दोनों बड़ी मां(मेरी मां) के घर अपनी अनीता जीजी के साथ चंदा खेलने के लिए जाना चाहती हैं। मैंने सोचा ये दोनों चली जाएंगी तो थोड़ा चैन से कुछ देर सो लूंगी वरना इनके शोर शराबे में ठीक से आराम भी नहीं कर पाती मैं। खैर जैसे ही वो दोनों यहां से गईं तो अचानक तुम्हारे काका मेरे पास आ धमके और पता है क्या कहने लगे।"
"क..क्या कहने लगे वो??" अंजानी आशंका से मेरी धड़कनें तेज हो गईं।
"उफ्फ मुझे तो बताने में भी शर्म आती है राजू।" मंजू काकी ने बेबस भाव से कहा─"पर तुमसे भला कहां अब कुछ छुपा रह गया है इस लिए बता देती हूं। मैं इसी खाट में लेटी हुई थी जिसमें अभी तुम बैठे हो। तुम्हारे काका आए फिर पूंछा बच्चियां कहां गईं हैं। हालांकि वो यहीं पास में ही बैठे पान सुपाड़ी खा रहे थे और उन्होंने दोनों बच्चियों की बातें सुन ली थी, फिर भी मुझसे पूछ रहे थे। खैर मैंने बताया कि वो दोनों जीजी के घर गईं हैं। इतना सुनते ही जैसे वो खुश हो गए...झट से बोले फिर तो बढ़िया मौका है तुझे चो...चोदने का।"
"क...क्या???? ऐसा कहा काका ने।" मैंने आश्चर्य से पूछा।
"हां राजू।" काकी ने कहा─"और फिर बिना मेरी मर्जी जाने कहने लगे....चल सीधी हो के लेट का और अपना धोती साया ऊपर कर ले।"
"फिर???"
"उनकी ऐसी बातें सुन कर मेरा दिमाग खराब हो गया।" मंजू काकी ने कहा─"एक तो वैसे ही कटाई कर कर के थकी हुई थी, ऊपर से सुनीता ने खाना भी नहीं बताया था तो खेत से आने के बाद नहा धो के खाना बनाया। फिर सबको खिलाया पिलाया और अब ऊपर से उनके लिए धोती साया ऊपर करूं। मतलब समझते ही नहीं कि मैं भी इंसान हूं और मुझे भी थकान और पीड़ा महसूस होती है। पर नहीं....उन्हें इससे क्या। जब जिस वक्त उनकी इच्छा होगी तो उनके कहने पर मैं किसी गुलाम की तरह अपना धोती साया ऊपर उठा लूं और वो मेरी टांगों के बीच अपना खूंटा डाल कर धक्के लगाने लगें।"
"तो...तो क्या तुमने उनके कहने पर अपना धोती साया ऊपर नहीं उठाया फिर।" मैंने धड़कते दिल से पूछा।
"मैंने साफ मना कर दिया था।" काकी ने कहा─"कह दिया था कि मेरे बस का नहीं है ये। मैं भी इंसान हूं और काम कर कर के बुरी तरह थक गई हूं। एक आदमी ये भी सोचता है कि खड़ी दुपहरी में क्यों ऐसा काम करे जिससे गर्मी में और भी बुरा हाल हो जाए मगर उनको तो बस पानी निकालने से मतलब है। जब मैंने साफ मना कर दिया तो गुस्सा होने लगे। उनके गुस्सा होने पर भी जब मैं राजी न हुई तो गालियां देते हुए और पैर पटकते हुए खेत की तरफ चले गए।"
"तुमने रोका नहीं उनको।"
"जिसे सिर्फ अपने सुख की पड़ी हो ऐसे आदमी को क्यों रोकूं मैं।" काकी ने कहा─"मैंने नहीं रोका उन्हें...।"
"क्या काकी...मेरे इतने अच्छे काका को नाराज कर दिया तुमने।" मैंने उन्हें छेड़ा─"अभी अगर मेरे बापू ने ऐसा बोला होता तो क्या उन्हें भी मना कर देती तुम।"
"र...राजू।" काकी ने आँखें फैला कर कहा─"कुछ तो शर्म करो। कैसी बातें कर रहे हो तुम।"
"लो अब मैं अपनी काकी से मजाक भी न करूं।" मैंने भोलापन दिखा कर बुरा सा मुंह बनाया।
"बिल्कुल करो मजाक।" काकी ने कहा─"लेकिन इस तरह का नहीं राजू। मत भूलो कि मैं तुम्हारी भौजी नहीं बल्कि काकी हूं। कोई भी लड़का अपनी काकी से ऐसा मजाक नहीं करता।"
"मंजू....मेरी प्यारी मंजू।" ये बोलते हुए मैं एकदम से हंसने लगा।
काकी ये सुन कर बुरी तरह शर्मा गईं।
"हाय दय्या राजू कितने खराब हो तुम।" काकी ने शर्म से जबरन आँखें दिखा कर कहा।
"वैसे बापू छोटे काका के घर के बाहर ही बैठे हैं।" मैंने उन्हें फिर छेड़ा।
"अच्छा अब समझी।" काकी ने कहा─"घर में तुमने अपने बापू को नहीं देखा होगा तो सोचा होगा वो मेरे घर आए होंगे। इसी लिए ये देखने तुम यहां आए हो और मुझसे बहाना बना रहे थे...है न।"
"न..नहीं नहीं काकी।" मैं बुरी तरह सकपका गया─"मैं सच में गहाई करने के बारे में ही पूछने आया था काका से।"
"ये बात तो तुम घर में जीजी से भी पूछ सकते थे।" काकी ने मेरी चोरी पकड़ ली─"खड़ी दुपहरी में यहां आने की क्या जरूरत थी। मतलब साफ है कि तुम यही जांच करने आए हो कि जेठ जी मेरे घर आए हैं या नहीं।"
इस बार कोई बहाना न बना सका मैं। मेरी चोरी सच में पकड़ ली थी काकी ने। मैं सिर झुका लेने के सिवा कुछ न कर सका।
"कितने शैतान हो गए हो तुम।" तभी काकी ने कहा─"एक ही दिन में कितना बदल गए हो। मैं तो तुम्हें कितना भोला और नादान समझती थी राजू।"
मैं अब भी कुछ न बोला। ये अलग बात है कि अन्दर ही अंदर मुझे बुरा लगने लगा था। काकी का ऐसा कहना पता नहीं क्यों मुझे अच्छा नहीं लग रहा था।
"अब तुम ये गलत बोल रही हो काकी।" मैंने एक झटके में सिर उठा कर और थोड़ा नाराज हो कर बोला─"मैं तो अब भी कहीं न कहीं भोला और नादान ही हूं पर तुम और बापू क्या हो। जो तुम दोनों ने किया क्या वो बहुत अच्छा था।"
मेरी ये बात सुनते ही काकी हक्की बक्की सी देखने लगी मुझे। शायद उन्हें उम्मीद नहीं थी कि मैं ऐसा बोल सकता हूं उन्हें। फिर एकदम से उनके चेहरे पर शर्म और अपराध भाव उभर आए।
"तुम्हारा जो मन करे करो।" मैं खाट से उतर कर बोला─"मुझे उससे कोई लेना देना नहीं है...जा रहा हूं।"
काकी ने मुझे रोका मगर मैं न रुका। मेरा दिमाग खराब हो गया था। मन ही मन काकी को बुरा भला कहते हुए मैं अपने घर की तरफ चल पड़ा। उधर काकी एकाएक घबरा उठीं थी और साथ ही पछताने भी लगीं थी कि क्यों उन्होंने मुझे ऐसा कहा।
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घर पहुंच कर मैं भी अनीता और सुनीता व रानी के साथ चंदा खेलने लगा। अनीता बार बार मेरी तरफ देखती थी क्योंकि मेरे चेहरे पर थोड़ा नाराजगी के भाव थे। वो जानना चाहती थी कि मैं किस लिए नाराज दिख रहा हूं मगर सुनीता और रानी की मौजूदगी में उसने मुझसे पूछा नहीं। खैर ऐसे ही हम काफी देर तक खेलते रहे जिससे समय थोड़ा गुजर गया। बापू अभी तक घर नहीं आए थे। हालांकि अब मैं ये सोच भी नहीं रहा था कि वो श्यामू काका के यहां से मंजू काकी के घर गए होंगे या नहीं।
कुछ देर में मां आई और मुझसे कहा कि मैं खेतों पर जाऊं। मां के कहने पर मैंने जब खेलना बंद कर दिया तो अनीता ने भी खेलना बंद कर दिया। सुनीता और रानी भी उठ कर अपने घर जाने लगीं।
"तू अगर थक गई हो तो न जा खेत।" मां ने अनीता से कहा─"राजू अपने काका के साथ गहाई कर लेगा। तू रात के लिए खाना बना लेना।"
"अभी तो रात का खाना बनाने में बहुत समय है मां।" अनीता ने कहा─"अभी मैं भी राजू के साथ जाऊंगी। शाम होने से पहले ही आ जाऊंगी। उसके बाद जल्दी से जूठे बर्तन धो के खाना बना लूंगी।"
"ठीक है जा फिर अपने भाई के साथ।" मां ने कहा─"जूठे बर्तन मैं लूंगी। उसके बाद ही आऊंगी अब।"
"चल राजू हम चलते हैं।" अनीता ने खुश हो के कहा मुझसे।
मैं बिना कुछ बोले चल पड़ा बाहर की तरफ। अभी हम बाहर ही पहुंचे थे कि तभी अनीता एकदम से चौंक कर बोली─"राजू रुक थोड़ा। नमकीन गुड़ लाना तो भूल ही गई मैं।"
मेरा जवाब सुने बिना ही वो पलटी और दौड़ते हुए अंदर की तरफ चली गई। मैं नीम के पेड़ के पास खड़ा उसके आने का इंतज़ार करने लगा। थोड़ी ही देर में वो भागते हुए आई।
"ले आई मैं।" फिर उसने अपनी कमर के पास दुपट्टे में छुपाया नमकीन गुड़ दिखाते हुए बोली─"चल अब।"
इतने में ही उसकी सांसें फूल गईं थी जिससे उसके सीने के उभार ऊपर नीचे होने लगे थे। मैंने एक नजर उसे देखा और चल पड़ा।
"क्या हुआ चुप क्यों है तू।" रास्ते में उसने मुझसे पूछा─"खेलते समय भी नाराज दिख रहा था तू। कुछ हुआ है क्या।"
"नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।" मैंने हल्के से मुस्कुरा कर उससे कहा─"तू मेरे साथ है तो अब सब ठीक है।"
अनीता ध्यान से देखने लगी मुझे। जैसे समझने की कोशिश कर रही हो कि मेरे ऐसा बोलने का क्या मतलब है या मेरे मन में इस वक्त क्या चल रहा है।
"किसी किसी वक्त तेरी बातें मुझे बिल्कुल भी समझ नहीं आती।" फिर उसने कहा─"पता नहीं क्या बोल देता है। मैं सोचती ही रह जाती हूं। तू साफ साफ क्यों नहीं बोला करता है।"
"अरे बुद्धू तो मैं हूं।" मैंने कहा─"फिर तुझे क्यों नहीं समझ आती मेरी बात।"
"शायद मैं भी बुद्धू हूं ही ही ही।" अनीता बोली और खुद ही हंसने लगी।
मैं भी उसकी बात पर मुस्कुरा उठा। सच में अब मेरा मूड ठीक हो गया था। मुझे हैरानी भी हुई कि उससे बातें करते ही मेरा मूड ठीक हो गया है। तभी तो उसकी बात पर मुस्कुराने लगा था।
"अच्छा बता न क्यों नाराज था उस समय।" उसने फिर से पूछा।
"जाने दे न।" मैंने कहा─"अब सिर्फ ये मायने रखता है कि तेरे साथ होने से मैं ठीक हूं।"
"क्या सच कह रहा है तू।" अनीता ने चलते हुए मेरी तरफ देखा─"मतलब सच में मैं तेरे साथ हूं तो तुझे अच्छा लग रहा है।"
"हां...क्या तुझे मेरे साथ अच्छा नहीं लग रहा।"
"हां मुझे भी अच्छा लग रहा है।" अनीता ने मुस्कुरा कर कहा─"पर आज से पहले...मतलब कल तक ऐसा नहीं लगता था।"
"क्यों।" मैं मन ही मन ये सोच के चौंका कि वो भी वही महसूस कर रही है जो मैं महसूस कर रहा था─"कल तक कैसा लगता था तुझे।"
"यही लगता था कि तू मेरी आंखों के सामने न आया करे।" अनीता ने कहा─"क्योंकि तू हर वक्त मुझे तंग करता था न। गलती तेरी होती थी फिर भी मां मुझे ही डांटती थी इस लिए तुझ पर गुस्सा आता था मुझे।"
"चल वो सब भूल जाते हैं।" मैंने कहा─"अब से हम कोई झगड़ा नहीं करेंगे बल्कि अच्छे से रहेंगे और एक दूसरे को आज जैसे ही प्यार करेंगे।"
"हां ठीक है।" अनीता ने खुशी से कहा─"अब से हम कोई झगड़ा नहीं करेंगे।"
"मैं तेरी खुशी के लिए कुछ भी करूंगा और तू मेरी खुशी के लिए कुछ भी करना।" मैंने उससे कहा─"बोल करेगी न ऐसा।"
"अगर तू ऐसा करेगा तो हां मैं भी करूंगी।" अनीता ने गर्दन घुमा कर मेरी आंखों में देखा।
"मैं तो पक्का करूंगा अनीता।" मैंने कहा─"तुझे भरोसा न हो तो आजमा के देख ले।"
"मुझे भरोसा है तुझ पर।"
ऐसी ही मीठी मीठी बातें करते हुए हम दोनों थोड़ी देर में खेत पहुंच गए। वहां पर मझले काका खेतों से पुल्लियां उठा उठा कर खलिहान में इकट्ठा कर रहे थे। अभी सिर्फ वो ही थे खेत में।
"और कोई नहीं आया क्या काका।" मैंने उनसे पूछा।
"आते ही होंगे करेजा।" काका ने कहा─"तू एक काम कर जरा आमों की तरफ का चक्कर लगा ले। थोड़ी देर पहले मैंने दो तीन लड़कों को देखा था वहां...फिर जा के भगाया उनको।"
"ठीक है काका।" मैंने कहा─"मैं एक चक्कर लगा के आता हूं...चल अनीता।"
मैं और अनीता आमों की तरफ चल पड़े।
"अच्छा हुआ काका ने हमें आमों का चक्कर लगाने के लिए कह दिया।" थोड़ी दूर चलने के बाद सहसा अनीता ने कहा─"अब हम दोनों आराम से वहां छांव में बैठ के नमकीन गुड़ खाएंगे। किसी को पता भी नहीं चलेगा...हां।"
"तू हर वक्त नमकीन गुड़ को ही याद करती रहती है क्या।" मैं हंसते हुए बोला─"घर से चलते समय भी तुझे इसकी याद आ गई थी तो तू उल्टे पैर भाग कर अन्दर इन्हें लेने चली गई थी और अब यहां फिर से इसी की बात।"
मेरी बात सुन कर अनीता झेंप गई और शर्मा कर मुस्कुराने लगी।
"वैसे एक बात कहूं।" मैंने धड़कते दिल से कहा─"तू जब शर्माती है तो और भी अच्छी लगती है।"
"धत्त...क्या बोलता है।" अनीता मेरी बात सुन और ज्यादा शर्मा गई। उसके गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठों पर बहुत ही गहरी मुस्कान उभर आई थी।
"ले..अब मैं अपनी प्यारी बहन की तारीफ भी न करूं।" मैंने मुंह बनाया तो वो हंस पड़ी।
"अच्छा तो तू इस तरह मेरी तारीफ कर रहा है।" वो मुस्कुराते हुए बोली।
"हां और क्या।" मैंने कहा─"तुझे अच्छा नहीं लगा तो बता दे...नहीं करूंगा अब से।"
"मैंने ये नहीं कहा कि मुझे अच्छा नहीं लगा।" अनीता ने कहा─"बल्कि मुझे तो बहुत अच्छा लग रहा है कि मेरा भाई मेरी तारीफ कर रहा है।"
"देख आदमी तारीफ उसी की करता है जो सुंदर और प्यारा होता है।" मैंने जैसे उसे शीशे में उतारा─"तू सुंदर और प्यारी है इस लिए तेरी तारीफ कर रहा हूं।"
"अच्छा क्या सच में।" अनीता पहले तो चौंकी फिर थोड़ा शर्माते हुए बोली─"मतलब क्या सच में मैं तुझे सुंदर और प्यारी दिखती हूं।"
"हां तू बहुत प्यारी है और सुंदर भी।" मेरा दिल जोरों से धक धक करने लगा─"और जब तू इस तरह शर्माती है तो और भी अच्छी लगती है।"
"धत्त....चुप कर तू।" अनीता अपनी तारीफ से खुश तो बहुत हुई लेकिन शर्माने की बात से उसे शर्म आने लगी।
"अच्छा चल छोड़ इस बात को।" मैंने बात बदली─"तू इस तरफ देख...मैं उस तरफ देख लेता हूं।"
अनीता को बोल कर मैं दूसरी तरफ वाले पेड़ों की तरफ बढ़ चला। तभी एक तरफ दो तीन लड़के थोड़ा दूर खड़े नजर आए। वो हमारे आमों की तरफ ही देख रहे थे। जैसे ही उनकी नजर मुझ पर पड़ी तो वो तीनों उल्टे पैर भाग खड़े हुए वहां से। जमीन पर आम के कुछ पत्ते गिरे पड़े थे। जाहिर है जब दोपहर में यहां कोई नहीं था तब कोई न कोई अमिया चोर यहां अमिया झोरने आया था।
"सुबह के वक्त जब हम दोनों यहां आए थे तब ये पत्ते नहीं थे न।" तभी अनीता मेरी तरफ आते हुए बोली─"लगता है दोपहर में किसी ने अमिया झोरी हैं।"
"सही कहा।" मैंने दूर एक तरफ हाथ से इशारा कर कहा─"देख उधर...वो लड़के यहां अमिया झोरने की फिराक में ही थे। अभी जब उनकी नजर मुझ पर पड़ी तो देख साले कैसे भागे जा रहे हैं।"
"हां सही कह रहा है तू।" अनीता उस तरफ देखते हुए बोली─"तीन जने दिख रहे हैं। मतलब अब दोपहर में भी यहां किसी न किसी को आम ताकने के लिए रहना होगा। तभी बचेंगे आम...नहीं तो ये लोग सब झोर डालेंगे।"
"कल से मैं खा पी कर आ जाया करूंगा यहां।" मैंने कहा─"फिर देखता हूं कैसे ये साले अमिया झोरते हैं।"
"मैं भी तेरे साथ आऊंगी।" अनीता ने झट से कहा─"लाएगा न मुझे भी अपने साथ।"
"मां अगर आने देगी तो आ जाना।" मैंने कहा─"चल अभी तो तुझे नमकीन गुड़ खाना है न।"
"अरे हां...मैं तो भूल ही गई थी।" अनीता आँखें फैला कर मुस्कुरा उठी─"चल जल्दी...नहीं तो बाकी लोग भी अगर आ गए तो हमें गहाई करने जाना पड़ेगा।"
मैं मुस्कुराते हुए उसके साथ उसी जगह पर आया जिस जगह पर सुबह बैठ कर हमने नमकीन गुड़ खाया था। अनीता ने कमर से अपना दुपट्टा छोरा और फिर उसके अंदर से नमकीन गुड़ हाथ में ले कर दुपट्टे को पेड़ की जड़ में रख दिया। उसके बाद बैठने के लिए जैसे ही वो झुकी सुबह की तरह फिर से उसके कुर्ते का गला फैल गया और उसके साथ ही अंदर पहनी सफेद कमीज का भी जिससे मुझे आधे से ज्यादा उसकी छातियां दिख गईं। पलक झपकते ही ये देख कर मेरे पूरे बदन में झुरझुरी दौड़ गई।
"अरे खड़ा क्यों है।" तभी वो बैठने के बाद बोली─"बैठ न जल्दी।"
मैं झट से बैठ गया। अब तक उसने अपनी गोंद में नमकीन और गुड़ वाले दोनों कागजों को खोल लिया था। मेरे देखते ही देखते उसने दोनों में से थोड़ा थोड़ा नमकीन गुड़ हाथ में लिया और फिर मेरे मुंह की तरफ बढ़ाया।
"ले पहले तू खा।" फिर उसने मुस्कुराते हुए कहा तो मैंने इस तरह मुंह खोल दिया जैसे अचानक मैं उसके सम्मोहन में फंस गया होऊं।
मुंह में नमकीन गुड़ चबाते हुए मैंने भी कागज़ों से नमकीन गुड़ हाथ में ले कर उसके मुख की तरफ बढ़ाया। पहले वो मुस्कुराई फिर धीरे से अपना मुंह खोल दिया तो मैंने आहिस्ता से उसके मुंह में नमकीन गुड़ डाल दिया।
"कितना अच्छा लग रहा है न।" वो मुंह चलाते हुए मगर मुस्कुरा कर बोली।
"हां।" मैंने कहा─"ऐसा लग रहा है जैसे हम दोनों प्रेमी हैं....है न।"
मेरी ये बात सुनते ही अनीता एकदम से चौंक पड़ी। उसकी आँखें हैरानी से फैल गईं। नमकीन गुड़ चबाता हुआ उसका मुंह एकदम रुक गया।
"ये...ये क्या कह रहा है तू।" फिर उसने हैरानी से कहा─"क्या हम प्रेमी हैं।"
मुझे अपनी कही हुई बात का थोड़ा देर से एहसास हुआ और जब हुआ तो मैं खुद बुरी तरह चौंक पड़ा। एक ही पल में मेरी धड़कनें रुक सी गईं। समझ न आया कि अब क्या बोलूं। मैं जानता था कि अनीता भले ही मुझसे उमर में छोटी है लेकिन इतना तो उसे भी पता होगा कि प्रेमी प्रेमिका क्या होते हैं या किसे कहते हैं। उसके बाद जब उसने हैरानी से पूछा तो मुझे समझ ही न आया कि क्या बोलूं। मैंने खुद को सम्हाला और फटाफट कोई जवाब सोचने लगा।
"बता न राजू।" अनीता मुझे चुप देख बोली─"क्या सच में हम प्रेमी हैं। ऐसा कैसे कह सकता है तू।"
"अरे तो क्या हो गया।" मैंने अपनी बौखलाहट को छुपाते हुए कहा─"मैंने तो बस ऐसे ही कहा था। कह देने से हम प्रेमी थोड़े न हो जाएंगे।"
"पर राजू...तूने ऐसा कैसे कह दिया।" अनीता अपलक मुझे ही देखे जा रही थी।
"अरे पागल मैंने तो ऐसा बोल कर सिर्फ उदाहरण दिया था।" मैंने कहा─"क्योंकि सुना है प्रेमी लोग भी इसी तरह एक दूसरे को खिलाते पिलाते हैं।"
"क्या वो लोग सच में ऐसा करते हैं।" अनीता ने चकित भाव से पूछा।
"देख...मैंने तो नहीं देखा कभी।" मैंने कहा─"सिर्फ सुना है मैंने ऐसा....अब ये सच है या झूठ मुझे नहीं पता।"
"किससे सुना है तूने।" अनीता ने एकाएक मुझे घूरते हुए पूछा─"क्या तेरे उस दोस्त बबलू ने ये बताया है तुझे।"
"हां....और नरेश ने भी बताया था।" मैंने कहा─"नरेश को पहले पता नहीं था। उसने किसी से सुना था कि बहुत पहले कई ऐसे प्रेमी थे जो आज भले ही इस दुनिया में नहीं है मगर उनका प्रेम अमर है।"
"क्या सच में।" अनीता को यकीन न हुआ─"कौन थे वो।"
"उनका नाम....रुक याद करता हूं।" मैं अपने दिमाग पर जोर डालते हुए बोला─"हां याद आया...नरेश उन लोगों का नाम लैला मजनू....शीरी फरहाद और सोनी...माह....महिवाल हां सोनी महिवाल बताया था।"
"बड़ी अजीब बात है।" अनीता ने सिर खुजाते हुए कहा─"मैंने तो अब से पहले कभी ये नाम नहीं सुने।"
"छोड़ जाने दे न।" मैंने कहा─"और जल्दी से इसे खा कर चलते हैं यहां से।"
"हां ठीक है।"
कहने के साथ ही अनीता और मैं फिर से नमकीन गुड़ खाने लगे। इधर मैं ये भी सोचने लगा कि क्या सच में अनीता को ऐसे प्रेमियों के बारे में कुछ पता नहीं है। और क्या उसे ये भी पता नहीं है कि प्रेम क्या होता है। तभी मुझे याद आया कि जब शुरू में मैंने उससे प्रेमी वाली बात कही थी तब वो एकदम चौंक पड़ी थी और कहने लगी थी मैं ऐसा कैसे कह सकता हूं। मतलब...मतलब वो थोड़ा बहुत जानती है कि प्रेमी क्या होता है या प्रेम क्या होता है। मैं सोचने लगा कि इस बारे में उसे कितना पता होगा। वैसे मुझे भी तो ज्यादा पता नहीं है। बस उतना ही पता है जितना नरेश और बबलू ने बताया था।
"अच्छा सुन न।" तभी अनीता ने चुप्पी तोड़ी─"क्या तुझे पता है प्रेम क्या होता है।"
"मुझे कैसे पता होगा।" मैंने सफेद झूठ बोला। असल में मैं उसे ये नहीं जताना चाहता था कि मैं इस बारे में जानता हूं क्योंकि हो सकता है कि इस बात से वो ये सोचने लगे कि मैं अभी जो कर रहा हूं उसके पीछे कहीं मेरा कोई उल्टा सीधा इरादा तो नहीं है। इस लिए बोला─"मुझे कैसे पता होगा भला....मैंने थोड़े न कभी किसी से प्रेम किया है।"
"अच्छा...जब तुझे नहीं पता है तो ये कैसे पता है कि प्रेम किसी से किया जाता है।"
अनीता ने जब ये कहा तो मैं अंदर ही अंदर बुरी तरह चौंक पड़ा। अंजाने में मैं जो बोल गया था अनीता ने उसे ऐसा पकड़ा था कि मैं सोच भी नहीं सकता था। खैर मैं भी इतना जल्दी मात खा जाने वाला नहीं था।
"क्योंकि ये बात मुझे उन्हीं दोनों से पता चली थी।" मैंने कहा─"उन्होंने ही बताया था कि प्रेम दो लोगों में होता है और वो दो लोग एक दूसरे से प्रेम करते हैं।"
"अच्छा तो कैसे करते हैं वो प्रेम।" अनीता ने पूछा।
"मुझे नहीं पता।" मैं सच में प्रेम के ज्ञान से पूरा परिचित नहीं था इस लिए बोला─"और मैंने पूछा भी नहीं उनसे। तू ही बता....क्या तुझे पता है इसके बारे में।"
"मुझे पता होता तो तुझसे क्यों पूछती बुद्धू।" अनीता कह कर हंस पड़ी।
"क्या सच में तुझे नहीं पता।" मैंने संदेह की दृष्टि से उसे देखा।
"अब क्या कसम खा के बोलूं।" उसने मुझे घूरा।
"नहीं...छोड़ इस बात को।" कहने के साथ ही मैं उठ कर खड़ा हो गया─"बाकी का तू खा ले। मैं नहीं खाऊंगा....और थोड़ा जल्दी कर।"
"बस थोड़ा सा ही बचा है।" अनीता ने दोनों कागजों को गोंद से उठा लिया और फिर खड़े हो कर कहा─"ले थोड़ा सा तू ले ले और बाकी मैं खा लेती हूं।"
कुछ देर बाद हम दोनों हाथ मुंह साफ कर के खलिहान तरफ आ गए। मैंने मझले काका को बताया कि तीन लोग अमिया झोरने के फिराक में थोड़ा दूर खड़े थे।
मां के अलावा सब आ गए थे। श्यामू काका ने दोनों पाले में बैलों को जुएं में नध दिया था। इस लिए हम दोनों अपनी अपनी तरफ के पाले में जा कर बैलों को हांकने लगे।
जारी है...........


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