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Adultery अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play)
अनीता उलझन
 
अगली सुबह की रोशनी बंगले की खिड़कियों से छनकर आ रही थी, लेकिन अनीता के लिए यह सुबह किसी भारी इम्तिहान जैसी थी। राज अभी तक साइट से वापस नहीं आया था; उसने फोन पर बताया था कि वह किसी बेहद ज़रूरी काम में फँस गया है और उसे आने में दोपहर हो जाएगी।
 
अनीता ने किसी तरह खुद को संभाला। अनीता ने नीली साड़ी पहनी है और वह आईने में अपनी ब्रा की स्ट्रैप्स ठीक कर रही है। तभी दरवाजे पर दस्तक होती है। अनीता का दिल जोर से धड़कने लगता है।
 
अनीता: (धीमी और कांपती आवाज़ में) "आ... आ जाओ।"
 
दरवाजा खुलता है और करीम हाथ में चाय की ट्रे लिए अंदर आता है। उसके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान है जो अनीता की रूह कँपा देती है।
 
अनीता ने जैसे ही उसे देखा, उसे वही सब याद आने लगा—उसका 'करीम-करीम' चिल्लाना, अपनी छातियों को मसलने की बातें करना और वह चरमसुख जहाँ उसने करीम को अपनी जाँघों के बीच बुला लिया था। उसका चेहरा और उसकी गर्दन शर्म से पूरी तरह लाल  हो गए।
 
करीम: (मेज पर चाय रखते हुए, बहुत धीमी और भारी आवाज़ में) "मालकिन... आपकी चाय। मालिक तो चले गए... हमने सोचा आपको इस वक्त चाय की बहुत ज़रूरत होगी... आखिर कल रात की थकान जो बहुत रही होगी।"
 
उसके लहज़े में जो तिरछापन था, वह अनीता के कलेजे को चीर गया। जैसे ही अनीता चाय उठाने के लिए आगे बढ़ी, करीम ने अपनी नज़रें ऊपर उठाईं और सीधे अनीता की आँखों में देखा।
 
अनीता के हाथ चाय का कप उठाते हुए बुरी तरह कांपने लगे।  करीम की भूखी नज़रें जानबूझकर अनीता के उस नीले ब्लाउज के गले पर टिकी थीं, जहाँ से कल रात उसने उन मखमली और नंगे 'चूचों' को पूरी तरह देखा था। वह धीरे-धीरे अपनी जीभ से होंठ चाटता है, जैसे कोई स्वादिष्ट चीज याद कर रहा हो।
 
 
करीम (अनीता के कांपते हाथों को देखते हुए, एक कुटिल मुस्कान के साथ): अरे अनीता बेटी, लगता है आपको नीला कलर बेहद पसंद है... है ना?"
 
अनीता (हड़बड़ाकर अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करने की नाकाम कोशिश करते हुए): "ऐसी... ऐसी कोई बात नहीं है करीम। बस पहन लिया..."
 
करीम (एक कदम और करीब आकर): "हमको तो सब याद है मालकिन। कल रात भी जब आपने वो नीला कपड़ा पहना था, तभी हम समझ गए थे कि आपकी पसंद कितनी नशीली है।"
 
करीम (नीली ब्लाउज के गले से झलकती उसकी गोरी 'तवचा' पर नज़रें गड़ाते हुए): "आज इस नीले ब्लाउज में आपकी गोराई कुछ ज़्यादा ही फट के बाहर आ रही है। पर सच कहें... इस नीले रंग के नीचे जो सफेद दूधिया माल है, वो किसी को भी अंधा कर दे। हमारी आँखें तो बस इन्हीं पर अटकी हैं... सोच रहे हैं, कितनी नरम होंगी ये... कितनी रसीली।"
 
 
अनीता (साँसें तेज लेते हुए, घबराहट में): "करीम! तुम... तुम बहुत ज़्यादा बोल रहे हो। अपनी हद में रहो।"
 
करीम (हल्के से हँसते हुए): "हद तो मालकिन कल रात ही टूट गयी थी... जब आपने बड़े सुकून से हमरे सामने अपना नीला बदन नंगा कर दिया था। आज तो बस हमरी आँखें इस नीले रंग के नीचे छिपे खज़ाने को डूबते देख रही हैं। क्या आप जानती हैं, आपकी वो आहें... 'करीम, आओ ना'... वो हमें रात भर सोने नहीं देतीं।"
 
वह एक कदम आगे बढ़ता है और सीधे अनीता की आँखों में देखता है
 
करीम: (भारी आवाज में) "अनीता बेटी, हम आपसे बहुत नाराज़ हैं। जब अंदर आप हमरा नाम पुकार रही थीं, जब तड़प के कह रही थीं कि 'करीम, मसल दो इन्हें'... तो आपने हमें पहले काहे नहीं बताया? अगर आप इस काले करीम को इतना चाहती हैं, तो जे बात हमसे काहे छिपाई?"
 
करीम के मुँह से ये शब्द सुनते ही कमरे में जैसे मौत का सन्नाटा छा गया। अनीता के हाथ में चाय का प्याला किसी सूखे पत्ते की तरह थरथराने लगा।
 
उसे अपनी कानों पर यकीन नहीं हो रहा था कि एक नौकर, जो कल तक उसके सामने नज़रें झुकाकर खड़ा रहता था, आज इतनी हिम्मत दिखा रहा है और सीधे उसके उस 'गंदे खेल' को हकीकत मानकर सवाल कर रहा है।
 
अनीता की जुबान जैसे तालू से चिपक गई। वह चाहकर भी यह नहीं कह पा रही थी कि वह सिर्फ एक 'रोल-प्ले' था।
 
करीम: "मालिक तो चले गए बेटी... अब तो हम आपके सामने खड़े हैं। असली करीम। का अब भी आप सिर्फ हमरा नाम ही लेंगी या हमें वो हक भी देंगी जो आप कल रात चीख-चीख कर माँग रही थीं?"
 
अनीता का सांस लेना दूभर हो गया। उसकी नीली साड़ी के पल्लू के नीचे उसका सुडौल सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था। करीम की इस बेबाकी ने उसे डरा भी दिया था और उसके बदन में एक अजीब सी सिहरन पैदा कर दी थी।
 
अनीता: (गुस्से और डर को छिपाते हुए, चाय का प्याला मेज पर जोर से पटककर) "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझसे इस तरह बात करने की? तुम एक नौकर हो करीम, अपनी हद में रहो! जो तुमने कल रात सुना या देखा... वह सिर्फ..."
 
इससे पहले कि अनीता बात पूरी करती, करीम झपट्टा मारकर उसकी गोरी कलाई जकड़ लेता है और उसे अपने सीने से सटा लेता है।
 
करीम: (अनीता के कान के पास फुसफुसाते हुए) "हद तो आपने पार की है अनीता बेटी, कल रात हमरा नाम ले-लेकर। अब जे नाटक बंद कीजिये। हमने कल दरवाज़े की दरार से आपकी आँखों में देख लिया था कि आप का चाहती हैं।"
 
करीम अपनी दूसरी हथेली अनीता की चिकनी कमर पर रखकर उसे भींचता है। अनीता के वक्ष करीम के सीने में दब जाते हैं।
 
अनीता: (लड़खड़ाती आवाज़ में, पीछे धकेलने की नाकाम कोशिश करते हुए) "नहीं करीम... रुको! वह... वह सब सिर्फ एक खेल था। मालिक ने 'करीम' बन कर जो किया वो अलग बात थी, लेकिन तुम... तुम असलियत में वो सब नहीं कर सकते!"
 
अनीता की आँखों में घबराहट साफ़ दिख रही थी। भले ही कुछ देर पहले उसने 'करीम' का नाम लेकर बिस्तर पर आहें भरी थीं, लेकिन अब जब असली करीम उसके इतने करीब था, तो उसे अपनी भयानक गलती का अहसास हो रहा था।
 
उसे डर लग रहा था कि बात अब उसके हाथ से निकलकर हवस की उस खाई में जा रही है जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं।
 
करीम: (मुस्कान के साथ) "मालकिन, खेल मालिक खेल रहे थे... लेकिन तड़प आप रही थीं। अब जब असली करीम सामने खड़ा है, तो आप पीछे काहे हट रही हैं? अब मना मत कीजिये मालकिन... शब्द आपके ही थे। आपने ही कहा था कि 'मसल दो इन्हें'... 'ये तुम्हारे ही हैं, निचोड़ दो इन्हें'"
 
इतना कहते ही करीम ने एक झटके में अनीता की साड़ी का पल्लू उसके कंधे से नीचे गिरा दिया। अनीता के मुँह से एक दबी हुई चीख निकली। पल्लू गिरते ही उसका नीला ब्लाउज और उसमें कसी हुई उसकी सुडौल छातियाँ  करीम की नज़रों के सामने किसी भेंट की तरह पेश थीं।
 
करीम: (हवस भरी आवाज़ में, अपनी उँगलियों को ब्लाउज पर सरकाते हुए) "अरे वाह मालकिन, ये तो बिल्कुल रस भरी आम जैसी हैं! कल रात से हम सोच रहे थे कि इनका स्वाद कैसा होगा... अब तो बस इन्हें सहलाने का मन कर रहा है।"
 
करीम ने बिना एक पल गँवाए अपने दोनों बड़े, काले हाथों को आगे बढ़ाया और अनीता की दोनों छातियों को ब्लाउज के ऊपर से ही अपनी विशाल मुट्ठियों में भर लिया। उसने उन्हें इतनी बेरहमी और ताकत से भींचा कि अनीता का पूरा शरीर पीछे की ओर मुड़ गया।
 
अनीता: (दर्द और सदमे में चीखते हुए) "आह्ह... करीम... नहीं...!" छोड़ो मुझे... बहुत तेज़ दर्द हो रहा है!"
 
करीम रुकने वाला नहीं था; वह उन्हें बुरी तरह निचोड़ने लगा, ठीक वैसे ही जैसे अनीता ने कल रात माँग की थी। अब उसे अहसास हो रहा था कि एक नौकर के मज़दूर वाले हाथों और मालिक के कोमल हाथों में कितना फर्क होता है। करीम के उन विशाल काले हाथों में अनीता के स्तन बहुत छोटे और नाज़ुक लग रहे थे।
 
करीम (हवस भरी आवाज़ में): "अरे वाह मालकिन, ई तो बिल्कुल मक्खन जैसा माल है! जितना दबा रहे हैं, उतना ही फूलता जा रहा है। कल रात से हमरे हाथ तरस रहे थे इनको मसलने के लिए।"
 
अनीता की आँखें पथरा सी गईं। वह दर्द से कराह रही थी, लेकिन उस दर्द के नीचे एक ऐसी उत्तेजना की लहर दौड़ रही थी जिसे उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था।
 
उसके मन में दो आवाजें एक साथ लड़ रही थीं—एक तरफ वह मालकिन थी, जिसकी अस्मत, सम्मान और शादी की दीवारें अभी भी मजबूत थीं। दूसरी तरफ वह औरत थी, जिसके बदन ने कल रात के उस नशे में 'करीम' का नाम पुकारा था, और अब असली करीम के स्पर्श में वही नशा फिर से जाग रहा था।
 
उसके मन में बार-बार एक ही सवाल घूम रहा था— ये क्या हो रहा है? मैंने तो सिर्फ एक खेल खेला था... राज के साथ... फैंटसी में। लेकिन अब ये असलियत बन रही है। ये गलत है... बहुत गलत है। मैं राज की बीवी हूँ। मैं एक सम्मानित औरत हूँ। फिर भी... ये गर्मी... ये स्पर्श... क्यों इतना अच्छा लग रहा है?
 
करीम (अनीता के चेहरे के करीब आकर): "कहिये मालकिन, मज़ा आ रहा है ना?ई छातियाँ जब हमरे काले हाथों में घुटती हैं, तो मालकिन और नौकर का फर्क ही खत्म हो जाता है।"
 
अनीता का गला सूख गया था, वह कुछ कहना चाहती थी लेकिन उसके मुँह से बस 'आह... उफ़...' जैसी सिसकियाँ निकल रही थीं।
 
करीम ने अब अपनी उँगलियों के पोरों से ब्लाउज के ऊपर से ही उसके निप्पलों को अपनी गिरफ्त में लिया और उन्हें ज़ोर से मरोड़ा कि अनीता में एक बिजली सी दौड़ गई।
 
करीम ने अब अपना सिर झुकाया। उसकी गरम साँसें अनीता की गर्दन पर पड़ीं। फिर धीरे-धीरे उसने अपने होंठ उसकी नाजुक गर्दन पर रख दिए। पहले हल्का-सा चुंबन... फिर एक गहरा, गीला किस। उसकी जीभ ने अनीता की गर्दन की नस पर सरकना शुरू किया।
 
करीम: (फुसफुसाते हुए, आवाज़ में भारी हवस) "मालकिन... आपकी ये गोरी गर्दन... कितनी नरम है। कल रात हम सोच रहे थे कि इसे चूमने में कितना मज़ा आएगा। अब देखिए... आपका बदन कितना काँप रहा है। आपका दिल भी हमें बता रहा है कि आप चाहती हैं।"
 
उसके होंठ अब नीचे की ओर सरकने लगे। अनीता के ब्लाउज के गले से थोड़ा ऊपर, जहाँ से उसकी छातियों की शुरुआत दिख रही थी। उसने वहाँ एक गहरा चुंबन किया, फिर अपनी जीभ से हल्का-सा चाटा। अनीता का पूरा शरीर एक झटके के साथ काँप उठा। उसकी साँसें तेज़ और अनियमित हो गईं।
 
अनीता के मन में तूफान और तेज़ हो गया— नहीं... नहीं... ये नहीं होना चाहिए। मैं ये नहीं चाहती। या चाहती हूँ? ओह गॉड... राज... अगर राज को पता चला तो? मैं क्या कर रही हूँ? ये नौकर है... ये मेरे घर का काम करने वाला है। मैंने खुद को इतना नीचे कैसे गिरा लिया? लेकिन... ये स्पर्श... ये गर्मी... क्यों रुक नहीं पा रही हूँ?
 
उसका दिमाग चीख रहा था—रुको! लेकिन उसका बदन अब करीम के साथ ताल मिला रहा था। उसकी छातियाँ और ऊपर उठ रही थीं, जैसे करीम के हाथों में और दबना चाहती हों।
 
करीम ने अब एक हाथ अनीता की कमर से हटाकर उसके ब्लाउज के हुक पर रख दिया। उसने धीरे से पहला हुक खोलना शुरू किया।
 
करीम: (आँखों में चमक, होंठ अनीता के कानों पर) "बस एक हुक... मालकिन। बस एक बार देखने दो इन गोरी छातियों को दिन की रोशनी में। कल रात अंधेरे में देखा था... आज पूरा मजा लूँगा। आपकी ये निप्पल्स... कितनी सख्त हो गई हैं। देखो, ब्लाउज के ऊपर से ही कितनी उभर आई हैं।"
 
उसने दूसरा हुक भी खोल दिया। ब्लाउज अब ढीला पड़ने लगा। अनीता की ब्रा की लेस अब दिख रही थी। करीम की साँसें और तेज़ हो गईं।
 
करीम के हाथों की पकड़ और उसके बदन की गर्मी ने अनीता को एक पल के लिए सुन्न कर दिया था। लेकिन जैसे ही उसे अहसास हुआ कि एक नौकर उसकी अस्मत के साथ क्या कर रहा है और वह कितनी दूर निकल आई है, उसके अंदर की मालकिन जाग उठी।
 
उसने अपनी पूरी ताकत जुटाई और करीम के सीने पर हाथ रखकर उसे ज़ोर से पीछे धकेला। करीम इस अचानक हुए हमले के लिए तैयार नहीं था और दो कदम पीछे जा गिरा। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता, अनीता ने आगे बढ़कर उसके चेहरे पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया।
 
"चटाक!" की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी।
 
अनीता की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने कांपते हाथों से अपना ब्लाउज ठीक किया और साड़ी का पल्लू अपने बदन पर लपेट लिया।
 
अनीता: (फूट-फूट कर रोते हुए) "तुम्हारी... तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे छूने की? वह... वह सब सिर्फ एक रोल-प्ले था! वह मेरा और मेरे पति का निजी पल था। तुम एक नौकर हो और तुम्हें अपनी औकात में रहना चाहिए था! तुमने जो कुछ देखा, वह तुम्हें कभी देखना ही नहीं चाहिए था। निकल जाओ यहाँ से! अभी के अभी!"
 
करीम अपना गाल पकड़कर खड़ा था। करीम की आँखों में पहले हैरानी आई, फिर धीरे-धीरे वह हैरानी एक घने काले गुस्से और उलझन में बदल गई।
 
करीम: (गुस्से और झल्लाहट भरी आवाज़ में) "काहे मारी हमको? हई काहे किया मालकिनकल रात से आप 'करीम-करीम' चिल्ला रही थीं, तब तो बड़ा मज़ा आ रहा था? अब जब हम सच में आ गए, तो ई थप्पड़?"
 
अनीता कांप रही थी। उसने रोते हुए अपना ब्लाउज संभालने की कोशिश की, लेकिन करीम ने उसे मौका नहीं दिया। उसने अनीता के दोनों हाथों को झटके से पकड़ा और उसे दीवार से सटा दिया। उसकी ताकत के आगे अनीता बेबस थी।
 
करीम: (अनीता के चेहरे के एकदम करीब आकर) "बड़ी ऊँची जात वाली बनती हैं? कल रात जब मालिक आपको रगड़ रहे थे और आप मेरा नाम ले-लेकर आहें भर रही थीं, तब आपकी औकात कहाँ थी? अब हमरी बारी है... हम नहीं रुकेंगे।"
 
अनीता ने विरोध करने के लिए अपना मुँह खोला, लेकिन करीम ने एक हाथ से उसके दोनों हाथों को ऊपर की ओर दबोच लिया और दूसरे हाथ से उसके खुले हुए ब्लाउज के पल्लों को पूरी तरह हटा दिया। ब्लाउज अब उसके कंधों से नीचे लटक रहा था, लेकिन अनीता के बदन पर उसकी बारीक ब्रा अभी भी मौजूद थी। करीम की भूखी निगाहें उस पतली लेस वाली ब्रा के ऊपर से उभरती हुई अनीता की गोरी छातियों पर टिक गईं। डर और उत्तेजना के मारे अनीता का सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था।
 
करीम ने अपनी गर्दन झुकाई और पूरी हैवानियत के साथ अपनी जीभ अनीता के सीने के बीचों-बीच, जहाँ ब्रा की लेस खत्म हो रही थी, वहाँ फेर दी। वह उसके पसीने और इत्र की महक को चाटते हुए ब्रा के कप्स के किनारे-किनारे अपनी जीभ सरकाने लगा। अनीता के शरीर में फिर से एक सिहरन दौड़ गई, लेकिन इस बार डर और ग्लानि की मात्रा कहीं ज़्यादा थी। वह बेबसी में अपनी आँखें बंद किए सिसक रही थी।
जैसे ही करीम ने ब्रा के पतले कपड़े के ऊपर से ही उसके सख्त हो चुके निप्पल को अपने मुँह में लेने की कोशिश की, अनीता ने अपनी बची-कुची पूरी ताकत झोंक दी। उसने अपने घुटने से उसे धक्का दिया और किसी तरह खुद को छुड़ाकर पीछे हटी। उसके बाल बिखर चुके थे, ब्लाउज अस्त-व्यस्त, ब्रा के बाहर झलकती उसकी त्वचा लाल हो रही थी और उसकी आँखों से बेतहाशा आँसू गिर रहे थे।
 
अनीता: (गिड़गिड़ाते हुए और फूट-फूट कर रोते हुए) "करीम... बस करो! खुदा के वास्ते ऐसा मत करो! मैं भीख माँगती हूँ तुमसे... रुक जाओ। वह... वह सब एक गलती थी, एक खेल था। मैं होश में नहीं थी।"
 
अनीता ने अपने कांपते हुए हाथ करीम के सामने जोड़ लिए। उसकी आवाज़ में अब मालकिन वाली कड़क नहीं, बल्कि एक बेबस औरत की चीख थी।
 
अनीता: "करीम, खुदा का खौफ करो! तुम एक नौकर हो, और मैं... मैं तुम्हारे मालिक की पत्नी हूँ। मेरे साथ ऐसा मत करो, वरना हम दोनों की ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी। प्लीज... खुदा के वास्ते यहाँ से चले जाओ!"
 
करीम वहीं खड़ा हाँफ रहा था। अनीता का इस तरह 'खुदा के वास्ते' कहना और उसके आगे हाथ जोड़ना, उसके बढ़ते हुए कदमों को एक पल के लिए थाम गया।
 
करीम ने अपनी मुट्ठियाँ कसीं, मानो वह अपनी अनियंत्रित इच्छाओं को जबरन काबू में कर रहा हो। अनीता को इस तरह टूटकर रोते और गिड़गिड़ाते देख उसकी कड़वाहट कम होने के बजाय और गहरी हो गई। उसने पीछे हटते हुए अपने हाथ झाड़े, जैसे वह खुद पर लगे किसी दाग को साफ कर रहा हो।
 
उसने कमरे से बाहर निकलने के लिए कदम बढ़ाए, लेकिन दरवाज़े पर पहुँचकर वह रुक गया। उसने मुड़कर अनीता की तरफ देखा, जो फर्श पर सिमटी हुई अपना बदन ढंकने की नाकाम कोशिश कर रही थी। करीम की आँखों में अब कोई वासना नहीं थी, बल्कि एक तीखा तिरस्कार था।
 
करीम: (कठोर और चुभती हुई आवाज़ में) "जा रहे हैं हम... खुदा के वास्ते ही सही, पर जा रहे हैं। लेकिन एक बात कान खोलकर सुन लीजिये मालकिन... आज जो भी हुआ, उसके गुनहगार हम अकेले नहीं हैं।"
 
अनीता ने रोते हुए उसकी तरफ देखा, उसकी आँखों में डर और सवाल दोनों थे।
 
करीम: "हम तो अपनी हद में थे। हम तो सिर्फ वह नौकर थे जो आपके हुकुम का इंतज़ार करता है। पर आपने क्या किया?"
 
उसने हाथ के इशारे से कमरे की तरफ इशारा किया जहाँ कल रात का खेल हुआ था।
 
करीम: (कंपकपाती और साफ़ आवाज़ में) "माफ़ कर दीजिये मालकिन... मेरी हिम्मत अकेले नहीं बढ़ी थी। अगर आप और मालिक दरवाज़ा खुला छोड़कर वह सब न करते, तो मैं कभी न देखता। और अगर मेरी आँखों ने वह सब न देखा होता और मेरे कानों ने आपका वह बुलावा न सुना होता, तो मैं कभी अपनी हद पार न करता।"
 
अनीता ने फटी आँखों से उसे देखा, लेकिन करीम अब रुकने वाला नहीं था। उसने अनीता को नीचा दिखाने के लिए वे सारी बातें दोहराना शुरू कर दीं जो उसने कमरे के अंदर सुनी थीं।
 
करीम:  "क्या गलती थी मेरी? जब आप चीख-चीख कर मेरा नाम ले रही थीं... जब आप कह रही थीं 'करीम, मसल दो इन्हें'... 'करीम, आज अपनी मालकिन का सारा रस पी जा'... तब मैं बाहर खड़ा थरथरा रहा था। आपने मेरा नाम लिया, आपने अपनी उन चीज़ों को मेरा बताया जिन्हें मालिक छू रहे थे।"
 
अनीता अपनी शर्मिंदगी की चरम सीमा पर थी। करीम के मुँह से वे शब्द दोबारा सुनना उसके लिए किसी नर्क से कम नहीं था।
 
करीम: (हिकारत से देखते हुए) "आपने खुद हमें उकसाया था मालकिन! एक नौकर के सामने आप अपनी नग्नता और गंदी चाहतें परोसेंगी, तो वह पत्थर का थोड़े ही बना है? गलती मेरी नहीं, आपकी यादों और आपकी जुबान की है।"
 
करीम: (हिकारत भरी मुस्कान के साथ) "आज थप्पड़ मारकर और खुदा का नाम लेकर आप खुद को पाक-साफ नहीं बना सकतीं। आईने में अपनी शक्ल देखियेगा..."
 
इतना कहकर करीम मुड़ा और तेज़ी से कमरे से बाहर निकल गया। पीछे रह गई थी तो सिर्फ अनीता, जो अपने ही घर में, अपने ही बिस्तर के पास, अपनी शर्मिंदगी के बोझ तले दबी जा रही थी। कमरे में अभी भी करीम की बातों की गूँज थी, जो उसे अहसास दिला रही थी कि उसका 'रोल-प्ले' अब उसकी हकीकत को निगल चुका है।
Deepak Kapoor
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RE: अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play) - by Deepak.kapoor - 19-01-2026, 01:36 AM



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