17-01-2026, 10:23 PM
करीम की कोठरी
यह दृश्य उस काली रात का है, जब कोठरी की दीवारों के बीच करीम की हवस अपने उफान पर थी। वह अपनी खटिया पर नंगा लेटा था, आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था, बस एक नशा था—अनीता के बदन का नशा।
उसका हाथ अपनी मर्दानगी पर था, जो किसी खूँखार जानवर की तरह फड़क रही थी। वह बार-बार बंद आँखों से उन दृश्यों को दोहरा रहा था जो उसने दरवाजे की दरार से देखे थे।
करीम: (हाँफते हुए, एक भारी सिसकारी भरते हुए) "अरे मोर मैया... साला, आज तो कलेजा मुँह को आ गया! ई का देख लिया हमने? मेमसाब... नहीं, उ तो साक्षात जन्नत की अप्सरा निकलीं। आज तक तो बस साड़ी के पल्लू से झांकती उनकी कमर देख के ही हमरा ईमान डोल जाता था, पर आज... आज तो सब उघड़ गया।"
(करीम ने अपनी मुट्ठी को अपने 10 इंच के काले अंग पर और मजबूती से भींचा। उसकी साँसें तेज हो गईं जैसे वह फिर से उस बेडरूम में पहुँच गया हो।)
करीम: "उई माँ! उ उनके चूचे... कसम खुदा की, साहब जब उन्हें अपने मुँह में भर रहे थे, तो हमरी जान ही निकल गई। सफेद संगमरमर जैसे गोरे अउर भारी... अउर उ उन पर तने हुए सुर्ख लाल निप्पल! जैसे दूध के कटोरे में दो कश्मीरी मिर्च रख दी हों। मन करता था कि दरार चीर के भीतर घुस जाऊँ अउर साहब के मुँह से छीन के खुद उन्हें कुचल दूँ। साला, इतना गोरा मांस तो हमने पूरी उमर में नहीं देखा। अउर उ जब साहब उन्हें मसल रहे थे, तो कैसे मेमसाब का पूरा बदन मछली की तरह फड़क रहा था।"
वह खटिया पर करवट बदलता है, पसीने की बूंदें उसके चौड़े सीने पर चमक रही हैं।
करीम: "अउर उ उनका पेट... हाय दैया! साड़ी के नीचे उ जो मखमली खजाना छुपा रहता था, आज उसका दीदार हुआ। एकदम सपाट अउर रेशम जैसा चिकना पेट... अउर उ बीच में बनी उनकी नाभि! साला, ई धुन्नी है कि साक्षात शहद का कुआँ? हम तो देख रहे थे कि कैसे साहब अपनी जीभ उसके भीतर डाल रहे थे। हमरा तो जी कर रहा था कि अपनी नाक उस नाभि में रगड़ दूँ अउर मेमसाब की उस भीनी-भीनी खुशबू को अपनी रगों में उतार लूँ। मेमसाब का उ पेट जब थपेड़ों से हिल रहा था, तो साला हमरा जे कालिया लुंगी फाड़ने को बेताब था।"
करीम का हाथ अब उसके औजार पर पागलों की तरह चलने लगा। उसकी आवाज़ अब और भी हिंसक हो गई थी।
करीम: "अउर सबसे बड़ा कहर तो तब टूटा जब मेमसाब ने उ सहारा लिया अउर साहब ने उन्हें पीछे से झुकाया। अरे बाप रे! उ उनकी गाँड... साला, उ कोई शरीर का हिस्सा नहीं, पूरा का पूरा कयामत का मंजर था! इतनी भारी, इतनी गोल अउर इतनी चिकनी... जैसे किसी ने मलाई के दो पहाड़ जोड़ दिए हों। जब साहब के थपेड़े उन गोरे नितम्बों पर पड़ रहे थे, अउर उ 'चटाक-चटाक' की आवाज़ आ रही थी, तो साला हमरा खून खौल उठा। आइने में उ उनकी जाँघों के बीच की गुलाबी दरार... उ उनकी योंनी... उफ़! साला एकदम ताज़ी कली जैसी लग रही थी, जो साहब के लंड के लिए पानी छोड़ रही थी।"
करीम ने अपनी आँखें जोर से मींच लीं, उसे अनीता की वे चीखें याद आईं जिनमें उसका नाम पुकारा जा रहा था।
करीम: "अनीता बिटिया... तुम पुकार रही थीं 'करीम-करीम'... तुम्हें का पता था कि असली करीम बाहर खड़ा अपनी किस्मत पे रो रहा है? साहब का 7 इंच का खिलौना तो बस रास्ता बना रहा था, पर जब ई 10 इंच का असली मुसल तुम्हारे भीतर जाएगा, तब तुम्हें असली करीम का जोर पता चलेगा। साला, साहब का तो बच्चा लग रहा था हमरी इस लाठी के आगे। मोटाई देख रहे हो? ई जब मेमसाब की अंतड़ियों को छुएगा, तब उ सचमुच की 'मैया-मैया' चिल्लायेंगी।"
कोठरी में सन्नाटा था, पर करीम के दिमाग में कल के प्लान का शोर था।
करीम: "कल... कल जब साहब दफ्तर निकल जाएंगे, तब ई कोठरी का शेर उस महल में घुसेगा। मेमसाब, अब तुम हमसे आँखें नहीं चुरा पाओगी। तुमने आइने में हमें देख लिया है, अउर हम जान गए हैं कि तुम्हें 'करीम' नाम पुकारने में कितना मज़ा आता है। कल जब हम चाय लेके जाएंगे, तो कोई पर्दा नहीं रहेगा। तुम्हारी उन लंबी अउर मखमली जाँघों को हम अपनी बाहों में जकड़ेंगे अउर तुम्हें बताएंगे कि जिस नाम को तुम हवस में ले रही थीं, उ नाम वाला मर्द कितना खूंखार है।"
करीम: (एक गहरी और कामुक मुस्कान के साथ) "कल तुम्हारी उ गुलाबी गुफा को ई करीम पूरी तरह तहस-नहस कर देगा। एक-एक कोना चाटेंगे... एक-एक इंच नापेंगे। तुम्हारी उ भारी गाँड को जब हम अपने हाथों से मसलेंगे, तब तुम्हें पता चलेगा कि असली 'सेवा' का मज़ा क्या होता है। कल सुबह का सूरज तुम्हारी बर्बादी अउर हमरी आज़ादी लेके आएगा, मालकिन। कल कोई नाटक नहीं... कल तो बस 10 इंच का असली धचका लगेगा!"
करीम ने एक आखिरी झटका दिया और उसका गाढ़ा सफेद रस उसकी कोठरी के फर्श पर बिखर गया। वह हाँफते हुए खटिया पर गिर पड़ा, पर उसकी आँखें अभी भी कल सुबह के उस मंजर को देख रही थीं जहाँ अनीता उसके नीचे दबी होगी।
Deepak Kapoor
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