17-01-2026, 08:01 PM
(This post was last modified: 23-05-2026, 01:07 PM by razaraj2. Edited 5 times in total. Edited 5 times in total.)
भाग 9: ऑफिस की पहली झलक और बढ़ती उत्तेजनाआयशा सुबह उठी, उसका मन उत्तेजना से भरा हुआ था।
पहला दिन ऑफिस का – नई जिंदगी की शुरुआत।
वो बाथरूम गई, नहाई, और फिर ***** मांग रही थी – मुझे सही राह पर रखो।" ***** खत्म होने के बाद वो तैयार होने लगी।
अंदर एंटी-ब्रा पहनी – पसीना सोखने वाली, कंफर्टेबल।
फिर सलवार सूट – सफेद कुर्ता, ब्लैक सलवार, जो उसके कर्व्स को हल्का सा हाइलाइट कर रहा था।
उपर से फुल बुर्का डाला – काला, पूरा ढकने वाला। "सुरक्षित रहूंगी, इज्जत नहीं खोऊंगी," वो आईने में देखकर सोची।
इरफ़ान को नाश्ता दिया, चाय दी।
इरफ़ान ने कहा, "अच्छा दिन हो। लेकिन याद रखना, घर जल्दी लौटना।"
आयशा ने मुस्कुराकर हां कहा, और घर से निकल गई। ऑटो लिया, ऑफिस की तरफ।
रास्ते में वो सोच रही थी – "कैसा होगा दिन? लोग कैसे होंगे?"
ऑफिस पहुंची – EventMasters India का बड़ा बिल्डिंग।
वो अंदर गई, सिक्योरिटी से आईडी दिखाई। HR ने वेलकम किया – "आयशा, वेलकम टू द टीम।"
वो आयशा को इंडक्शन रूम ले गई।
वहां कुछ नए लोग थे – ट्रेनिंग सेशन।
HR ने काम समझाया – इवेंट प्लानिंग, क्लाइंट कॉल्स, कोऑर्डिनेशन। आयशा नोट्स लेती रही, ध्यान से सुनती।
लेकिन बुर्का की वजह से लोग जज कर रहे थे – कुछ हंसते, कुछ अजीब देखते।
"ये क्या बुर्का में?" एक लड़की ने फुसफुसाया।
आयशा को बुरा लगा, लेकिन चुप रही। ट्रेनिंग के बाद आयशा को डेस्क असाइन किया गया – ओपन क्यूबिकल, कंप्यूटर, फोन।
वो बैठी, ईमेल चेक करने लगी।
पास के क्यूबिकल से एक लड़का आया – नाम अजय, राहुल का दोस्त।
"हाय, न्यू जोइनी? मैं अजय, इवेंट कोऑर्डिनेटर।" आयशा ने सिर झुकाकर जवाब दिया, "हां, आयशा।"
अजय ने मुस्कुराकर कहा, "बुर्का अच्छा है, लेकिन यहां गर्मी है। कंफर्टेबल हो?"
आयशा शरमाई, "हां, ठीक हूं।"
लेकिन अंदर से असहज – लोग देख रहे थे। दोपहर का वक्त – लंच टाइम।
आयशा कैंटीन गई, बुर्का संभालते।
वहां भीड़ थी – लड़के-लड़कियां, हंसते-खाते।
वो एक कोने में बैठी, अपना टिफिन खोला – घर का खाना। तभी कुछ लड़कियां आईं – सुनैना, प्रिया, नेहा।
सब *, मॉडर्न ड्रेस में – शॉर्ट टॉप, जींस।
सुनैना ने कहा, "हाय, न्यू है? साथ खाएं?"
आयशा ने हां कहा, खुश हुई। खाना खाते हुए बातें हुईं – "कहां से हो? क्या काम?"
सुनैना ने आयशा का बुर्का देखा, "तुम्हारी तरह पाकीज़ा औरत आज तक नहीं देखी।
बुर्का पहनकर आई हो, कम से कम चेहरे से नकाब हटा दिया करो।"
प्रिया ने जोड़ा, "हां, यहां सब ओपन हैं। बुर्का में असहज लगती हो।" आयशा को ठीक लगा – ऑफिस था, लोग जज कर रहे थे।
"हां, शायद अगले दिन से," वो बोली।
दोस्ती हो गई – सुनैना ने नंबर एक्सचेंज किया।
"कुछ प्रॉब्लम हो तो बताना।" लंच बाद आयशा राहुल के केबिन गई – असाइनमेंट लेने।
राहुल बैठा था, कंप्यूटर पर।
आयशा अंदर गई, "सर, आयशा। न्यू जोइनी।"
राहुल ने सिर उठाया, चेहरा देखा – दिल में हलचल। "ये... वही," वो सोचा।
उसका दिल धड़का, गर्मी दौड़ी।
लंड में हलचल – खड़ा होने लगा, लेकिन टेबल के नीचे छिपा।
आयशा नहीं देख पाई। राहुल ने कंट्रोल किया, "हां, बैठो। काम है – ये इवेंट प्लान।"
वो समझाने लगा, लेकिन आंखें आयशा के चेहरे पर।
"इतनी खूबसूरत... बुर्का में भी आकर्षक।"
उसका लंड पूरी तरह सख्त – पैंट में तंबू। आयशा ध्यान से सुन रही थी, नोट्स लेती।
लेकिन राहुल के मन में कल्पना – बुर्का उतारना, आयशा का जिस्म देखना।
दिन खत्म – आयशा बाहर आई।
सुनैना आदि चिढ़ातीं – "बुर्का गर्ल, कल बिना बुर्के आना!" आयशा घर लौटी।
इरफ़ान ने पूछा, "दिन कैसा रहा?"
आयशा ने सब बताया – लोग, काम, लड़कियां, जजमेंट।
इरफ़ान ने कहा, "सावधानी से। बुर्का पहनती रहो।" रूटीन – डिनर, टीवी।
रात सेक्स – इरफ़ान ने शुरू किया।
आयशा के मन में राहुल – "उसकी आंखें..."
सेक्स खत्म, आयशा प्यासी रही। Usse apne shauhar pr gussa aaya lekin wo man marker so gyi
भाग 10: दिन बीतते गए और चाहत की आगसमय की रफ्तार कभी-कभी इतनी तेज होती है कि पता ही नहीं चलता कब हफ्ते महीनों में बदल जाते हैं।
आयशा के लिए भी यही हुआ।
ऑफिस जॉइन करने के बाद पहले दिन की घबराहट अब एक रूटीन में बदल चुकी थी।
हर सुबह वो उठती, ***** पढ़ती, इरफ़ान के लिए नाश्ता बनाती, और फिर तैयार होकर ऑफिस निकल जाती। बुर्का अब उसकी आदत बन गया था – अंदर सूट, ऊपर बुर्का, चेहरा दिखता लेकिन नकाब हटा हुआ।
ऑफिस में लोग अब उसे जानने लगे थे – "बुर्का वाली आयशा" से "आयशा मैम" तक का सफर।
लेकिन इन दो महीनों में बहुत कुछ बदला था, खासकर राहुल के मन में।
राहुल की नजरें आयशा पर टिकी रहतीं – हर मीटिंग में, हर कॉरिडोर में। पहले हफ्ते की बात है।
आयशा अपने डेस्क पर बैठी ईमेल चेक कर रही थी।
राहुल पास से गुजरा, रुक गया।
"आयशा, वो प्रोजेक्ट का अपडेट?" उसने पूछा, लेकिन आंखें आयशा के चेहरे पर। आयशा ने सिर उठाया, "हां सर, मैं मेल कर रही हूं।"
राहुल मुस्कुराया, "गुड। अगर हेल्प चाहिए तो बताना।"
लेकिन उसके मन में – "ये चेहरा... इतना सुंदर। बुर्का के नीचे क्या होगा?"
उसकी प्यास बढ़ रही थी, हर दिन। दूसरे हफ्ते एक मीटिंग हुई – टीम मीटिंग, इवेंट प्लानिंग की।
राहुल प्रेजेंट कर रहा था, आयशा नोट्स ले रही थी।
राहुल की नजरें बार-बार आयशा पर – उसकी उंगलियां पेन पर, होंठ हल्के से काटते हुए।
मीटिंग के बाद राहुल ने कहा, "आयशा, स्टे बैक। डिटेल्स डिसकस करें।" आयशा रुकी, दोनों अकेले।
राहुल करीब आया, टेबल पर झुका।
"तुम्हारा आइडिया अच्छा था।" उसका हाथ गलती से आयशा की उंगली छू गया।
आयशा की सिहरन – "क्या था ये?" लेकिन वो चुप रही। राहुल के मन में आग – "ये स्पर्श... और चाहता हूं।"
घर लौटकर आयशा ने इरफ़ान से बात की, लेकिन मन में वो स्पर्श।
रात सेक्स हुआ – इरफ़ान के साथ, लेकिन आयशा के मन में राहुल।
वो प्यासी रही, जैसे हर रात। तीसरे हफ्ते एक इवेंट साइट विजिट – बाहर, एक हॉल में।
राहुल और आयशा साथ गए।
कार में – राहुल ड्राइव कर रहा, आयशा बगल में।
बातें हुईं – "तुम्हारी फैमिली कैसी है?" राहुल ने पूछा। आयशा ने बताया, "शादी हो चुकी है, पति सॉफ्टवेयर इंजीनियर।"
राहुल का दिल जला – "शादीशुदा? लेकिन मैं तो चाहता हूं इसे।"
साइट पर – राहुल आयशा को दिखा रहा था, करीब खड़े।
उसका कंधा आयशा के कंधे से छू गया। आयशा का दिल धड़का, "ये क्या?" लेकिन काम पर फोकस।
राहुल की प्यास बढ़ी – "ये खुशबू... ये बॉडी।"
घर लौटकर आयशा थक गई, लेकिन रात इरफ़ान के साथ – फिर राहुल का खयाल।
प्यास बनी रही।
पहला दिन ऑफिस का – नई जिंदगी की शुरुआत।
वो बाथरूम गई, नहाई, और फिर ***** मांग रही थी – मुझे सही राह पर रखो।" ***** खत्म होने के बाद वो तैयार होने लगी।
अंदर एंटी-ब्रा पहनी – पसीना सोखने वाली, कंफर्टेबल।
फिर सलवार सूट – सफेद कुर्ता, ब्लैक सलवार, जो उसके कर्व्स को हल्का सा हाइलाइट कर रहा था।
उपर से फुल बुर्का डाला – काला, पूरा ढकने वाला। "सुरक्षित रहूंगी, इज्जत नहीं खोऊंगी," वो आईने में देखकर सोची।
इरफ़ान को नाश्ता दिया, चाय दी।
इरफ़ान ने कहा, "अच्छा दिन हो। लेकिन याद रखना, घर जल्दी लौटना।"
आयशा ने मुस्कुराकर हां कहा, और घर से निकल गई। ऑटो लिया, ऑफिस की तरफ।
रास्ते में वो सोच रही थी – "कैसा होगा दिन? लोग कैसे होंगे?"
ऑफिस पहुंची – EventMasters India का बड़ा बिल्डिंग।
वो अंदर गई, सिक्योरिटी से आईडी दिखाई। HR ने वेलकम किया – "आयशा, वेलकम टू द टीम।"
वो आयशा को इंडक्शन रूम ले गई।
वहां कुछ नए लोग थे – ट्रेनिंग सेशन।
HR ने काम समझाया – इवेंट प्लानिंग, क्लाइंट कॉल्स, कोऑर्डिनेशन। आयशा नोट्स लेती रही, ध्यान से सुनती।
लेकिन बुर्का की वजह से लोग जज कर रहे थे – कुछ हंसते, कुछ अजीब देखते।
"ये क्या बुर्का में?" एक लड़की ने फुसफुसाया।
आयशा को बुरा लगा, लेकिन चुप रही। ट्रेनिंग के बाद आयशा को डेस्क असाइन किया गया – ओपन क्यूबिकल, कंप्यूटर, फोन।
वो बैठी, ईमेल चेक करने लगी।
पास के क्यूबिकल से एक लड़का आया – नाम अजय, राहुल का दोस्त।
"हाय, न्यू जोइनी? मैं अजय, इवेंट कोऑर्डिनेटर।" आयशा ने सिर झुकाकर जवाब दिया, "हां, आयशा।"
अजय ने मुस्कुराकर कहा, "बुर्का अच्छा है, लेकिन यहां गर्मी है। कंफर्टेबल हो?"
आयशा शरमाई, "हां, ठीक हूं।"
लेकिन अंदर से असहज – लोग देख रहे थे। दोपहर का वक्त – लंच टाइम।
आयशा कैंटीन गई, बुर्का संभालते।
वहां भीड़ थी – लड़के-लड़कियां, हंसते-खाते।
वो एक कोने में बैठी, अपना टिफिन खोला – घर का खाना। तभी कुछ लड़कियां आईं – सुनैना, प्रिया, नेहा।
सब *, मॉडर्न ड्रेस में – शॉर्ट टॉप, जींस।
सुनैना ने कहा, "हाय, न्यू है? साथ खाएं?"
आयशा ने हां कहा, खुश हुई। खाना खाते हुए बातें हुईं – "कहां से हो? क्या काम?"
सुनैना ने आयशा का बुर्का देखा, "तुम्हारी तरह पाकीज़ा औरत आज तक नहीं देखी।
बुर्का पहनकर आई हो, कम से कम चेहरे से नकाब हटा दिया करो।"
प्रिया ने जोड़ा, "हां, यहां सब ओपन हैं। बुर्का में असहज लगती हो।" आयशा को ठीक लगा – ऑफिस था, लोग जज कर रहे थे।
"हां, शायद अगले दिन से," वो बोली।
दोस्ती हो गई – सुनैना ने नंबर एक्सचेंज किया।
"कुछ प्रॉब्लम हो तो बताना।" लंच बाद आयशा राहुल के केबिन गई – असाइनमेंट लेने।
राहुल बैठा था, कंप्यूटर पर।
आयशा अंदर गई, "सर, आयशा। न्यू जोइनी।"
राहुल ने सिर उठाया, चेहरा देखा – दिल में हलचल। "ये... वही," वो सोचा।
उसका दिल धड़का, गर्मी दौड़ी।
लंड में हलचल – खड़ा होने लगा, लेकिन टेबल के नीचे छिपा।
आयशा नहीं देख पाई। राहुल ने कंट्रोल किया, "हां, बैठो। काम है – ये इवेंट प्लान।"
वो समझाने लगा, लेकिन आंखें आयशा के चेहरे पर।
"इतनी खूबसूरत... बुर्का में भी आकर्षक।"
उसका लंड पूरी तरह सख्त – पैंट में तंबू। आयशा ध्यान से सुन रही थी, नोट्स लेती।
लेकिन राहुल के मन में कल्पना – बुर्का उतारना, आयशा का जिस्म देखना।
दिन खत्म – आयशा बाहर आई।
सुनैना आदि चिढ़ातीं – "बुर्का गर्ल, कल बिना बुर्के आना!" आयशा घर लौटी।
इरफ़ान ने पूछा, "दिन कैसा रहा?"
आयशा ने सब बताया – लोग, काम, लड़कियां, जजमेंट।
इरफ़ान ने कहा, "सावधानी से। बुर्का पहनती रहो।" रूटीन – डिनर, टीवी।
रात सेक्स – इरफ़ान ने शुरू किया।
आयशा के मन में राहुल – "उसकी आंखें..."
सेक्स खत्म, आयशा प्यासी रही। Usse apne shauhar pr gussa aaya lekin wo man marker so gyi
भाग 10: दिन बीतते गए और चाहत की आगसमय की रफ्तार कभी-कभी इतनी तेज होती है कि पता ही नहीं चलता कब हफ्ते महीनों में बदल जाते हैं।
आयशा के लिए भी यही हुआ।
ऑफिस जॉइन करने के बाद पहले दिन की घबराहट अब एक रूटीन में बदल चुकी थी।
हर सुबह वो उठती, ***** पढ़ती, इरफ़ान के लिए नाश्ता बनाती, और फिर तैयार होकर ऑफिस निकल जाती। बुर्का अब उसकी आदत बन गया था – अंदर सूट, ऊपर बुर्का, चेहरा दिखता लेकिन नकाब हटा हुआ।
ऑफिस में लोग अब उसे जानने लगे थे – "बुर्का वाली आयशा" से "आयशा मैम" तक का सफर।
लेकिन इन दो महीनों में बहुत कुछ बदला था, खासकर राहुल के मन में।
राहुल की नजरें आयशा पर टिकी रहतीं – हर मीटिंग में, हर कॉरिडोर में। पहले हफ्ते की बात है।
आयशा अपने डेस्क पर बैठी ईमेल चेक कर रही थी।
राहुल पास से गुजरा, रुक गया।
"आयशा, वो प्रोजेक्ट का अपडेट?" उसने पूछा, लेकिन आंखें आयशा के चेहरे पर। आयशा ने सिर उठाया, "हां सर, मैं मेल कर रही हूं।"
राहुल मुस्कुराया, "गुड। अगर हेल्प चाहिए तो बताना।"
लेकिन उसके मन में – "ये चेहरा... इतना सुंदर। बुर्का के नीचे क्या होगा?"
उसकी प्यास बढ़ रही थी, हर दिन। दूसरे हफ्ते एक मीटिंग हुई – टीम मीटिंग, इवेंट प्लानिंग की।
राहुल प्रेजेंट कर रहा था, आयशा नोट्स ले रही थी।
राहुल की नजरें बार-बार आयशा पर – उसकी उंगलियां पेन पर, होंठ हल्के से काटते हुए।
मीटिंग के बाद राहुल ने कहा, "आयशा, स्टे बैक। डिटेल्स डिसकस करें।" आयशा रुकी, दोनों अकेले।
राहुल करीब आया, टेबल पर झुका।
"तुम्हारा आइडिया अच्छा था।" उसका हाथ गलती से आयशा की उंगली छू गया।
आयशा की सिहरन – "क्या था ये?" लेकिन वो चुप रही। राहुल के मन में आग – "ये स्पर्श... और चाहता हूं।"
घर लौटकर आयशा ने इरफ़ान से बात की, लेकिन मन में वो स्पर्श।
रात सेक्स हुआ – इरफ़ान के साथ, लेकिन आयशा के मन में राहुल।
वो प्यासी रही, जैसे हर रात। तीसरे हफ्ते एक इवेंट साइट विजिट – बाहर, एक हॉल में।
राहुल और आयशा साथ गए।
कार में – राहुल ड्राइव कर रहा, आयशा बगल में।
बातें हुईं – "तुम्हारी फैमिली कैसी है?" राहुल ने पूछा। आयशा ने बताया, "शादी हो चुकी है, पति सॉफ्टवेयर इंजीनियर।"
राहुल का दिल जला – "शादीशुदा? लेकिन मैं तो चाहता हूं इसे।"
साइट पर – राहुल आयशा को दिखा रहा था, करीब खड़े।
उसका कंधा आयशा के कंधे से छू गया। आयशा का दिल धड़का, "ये क्या?" लेकिन काम पर फोकस।
राहुल की प्यास बढ़ी – "ये खुशबू... ये बॉडी।"
घर लौटकर आयशा थक गई, लेकिन रात इरफ़ान के साथ – फिर राहुल का खयाल।
प्यास बनी रही।


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