17-01-2026, 06:19 PM
ऽऽऽअगले दिन की सुबह आरोही के लिए एक नई शुरुआत जैसी लग रही थी, लेकिन उसके मन में कल की घटनाएं अभी भी घूम रही थीं।
पेशाब की वह विवशता, राहुल की टीजिंग, सिंक में वह अपमानजनक पल—और सबसे बढ़कर उसकी गुदा में ऊँगली डालना। यह सब कुछ उसे रात भर सोने नहीं दिया था। लेकिन साथ ही जब भी वह गुदा में ऊँगली डालने को याद करती उसकी योनि में चिकनाई सी बढ़ने लगती। सच कहें तो वह मन ही मन राहुल से कम अपने शरीर से अधिक व्यथित थी।
वह सुबह छह बजे राहुल के फ्लैट पर पहुँची, चाबी से दरवाजा खोला, और लॉग बुक में एंट्री की। राहुल पहले से ही उठा हुआ था, लेकिन आज उसका मूड अलग लग रहा था। वह ट्रेडमिल पर नहीं था, बल्कि किचन में कॉफी बना रहा था।
आरोही को देखते ही उसने मुस्कुराकर कहा, "आ गई मैडम जी। आज थोड़ा लेट हो गई? कोई बात नहीं, आओ, कॉफी पियो।"
उसकी आवाज में एक नरमी थी, जो आरोही को चौंका गई। वह आमतौर पर सख्त या टीज करने वाला होता था, लेकिन आज जैसे कोई दोस्त बात कर रहा हो। नहीं तो जैसे ही लेट सुना तो आरोही को लगा की आज तो गई। आरोही ने हल्के से सिर हिलाया और पास गई। राहुल ने उसे कॉफी का मग थमाया और उसके कंधे पर हाथ रखा।
"कैसी हो आज? कल थक गई थी ना? सिंक में मूतना आसान थोड़े होता है। बैठो, थोड़ी देर बातें करते हैं।" मुस्कुराते हुए राहुल ने कहा। और सहलाते हुए उसे बैठाया।
आरोही सोफे पर बैठ गई, थोड़ा सा बनावटी मुस्कान बिखेरी लेकिन उसके मन में संदेह था। "क्या आज कुछ अलग होगा?" वह सोच रही थी।
राहुल उसके बगल में बैठा और बोला, "तुम्हारी आंखों में थकान दिख रही है। घर पर सब ठीक है? अमित कैसा है? सब ठीक चल रहा है ना?" उसकी बातों में एक असली चिंता लग रही थी। एक हाथ आरोही को कंधे को थामे हुए थे।
आरोही ने कॉफी का कप पकड़ा था और बोली, "जी, ठीक हैं। डॉक्टर कह रहे हैं कि आशा तो है लेकन बाकी तो आप जानते ही हैं। लेकिन... पैसे की टेंशन है। जो आपको पता ही है।"
राहुल ने उसका हाथ पकड़ लिया, नरमी से। और चूमते हुए बोला "अब चिंता क्यों करनी है। मैं हूँ ना। तुम बस ऐसे ही गुड गर्ल बनी रहो। तुम्हारे परिवार को कुछ नहीं होने दूँगा। चाची जी, अमित सबको संभाल लेंगे। तुम बस मेरा कहना मानती रहो, सब ठीक हो जाएगा।"
उसके शब्द आरोही के दिल को छू गए। इतने दिनों से वह जो संघर्ष कर रही थी, उस पर राहुल के शब्द मानों किसी बांध को तोड़ दिए हों। राहुल की यह बातें उसे भावुक कर रही थीं। आंखे छलछला आईं "धन्यवाद सर... आपने बहुत मदद की है।"
राहुल ने उसे गले लगा लिया, जैसे कोई प्रेमी हो। "जानेमन, रो मत। मैं हूँ ना। बस उस परिधि की गांड़ में बहुत चर्बी है। एक दिन उतारेंगे अच्छे से।" परिधि के बारे में यह अच्छा तो नहीं लगा लेकिन जैसी हिकारत से परिधि उसे देखती थी उसे बहुत बुरा नहीं लगा।
वह राहुल के गले लगी थी राहुल का सहारा उसे महसूस हो रहा था। और राहुल भी पूरे हक से उसे चिपकाए हुए था। अब धीरे-धीरे उसका हाथ नीचे सरक गया—आरोही के गुदाज से कसे हुए नितंबों पर।
प्यार भरे व्यवहार से गदगद आरोही इस हमले से हल्की सी सिहर उठी। "सर..." वह बहुत हल्के से बोली, लेकिन राहुल ने अनसुना कर दिया। वैसे भी आरोही रोकने के लिए शायद कह भी नहीं रही थी।
उसने आरोही को उठाकर अपनी गोद में बिठा लिया, और उसके चेहरे को और बालों को सहलाते हुए बातें जारी रखी।
"तुम्हारा परिवार कितना अच्छा रहता अगर अमित-सुमित दोनों मूर्खता ना करते। उनको कितना समझाया था। और परिधि का बच्चा कैसा है? उसे चीजें मिल गईं थीं?"
उसके शब्द प्यार भरे थे, लेकिन उसके हाथ अब फिर से आरोही के नितंबों को मसल रहे थे, लेकिन हल्के-हल्के, हौले-हौले। धीरे-धीरे, लेकिन लगातार, एक प्यार की गर्माहट जैसे। आरोही को अच्छा लग रहा और नहीं भी लग रहा था—जहाँ दिमाग कहता कि यह अपमानजनक है। लेकिन साथ ही एक अजीब सी गुदगुदी हो रही थी। उसके शरीर में एक गर्माहट फैलने लगी, जो वह रोक नहीं पा रही थी।
"सर... मत करो," वह धीरे से बोली, लेकिन राहुल ने हंसकर कहा, "क्यों? तुम्हारी गांड कितनी सॉफ्ट है। एकदम शेप में मुझे पसंद है। अमित ने लगता है अच्छे से रगड़ा नहीं है।"
और फिर एक हल्का सा थप्पड़ मारा। चटऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ...............
आरोही की सिसकारी जोर से निकली, लेकिन जैसे किसी मस्ती में हो—"उंहऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ..."
लेकिन वह कुछ नहीं बोली। राहुल की बातें जारी थीं—"तुम्हारी सास भी अच्छी हैं। तुम्हें बचाने के लिए लड़ने आ गईं थीं। इस मामले में भाग्यशाली हो। घर के मर्द नालायक निकले। कोई नहीं मर्द की सारी जरूरत के लिए मैं हूँ ना।"
उसके शब्द आरोही को अच्छा अहसास दे रहे थे, जैसे कोई अपना हो। लेकिन वह सुन नहीं रही थी। लेकिन साथ ही थप्पड़ जारी थे—हल्के, लेकिन बार-बार। हर थप्पड़ के साथ आरोही का शरीर सिहरता, और नीचे एक गीलापन महसूस होने लगा।
"यह क्या हो रहा है? अच्छा क्यों लग रहा है?" वह खुद से लड़ रही थी, लेकिन योनि गीली हो रही थी।
अब राहुल ने आरोही को गोद से उतारा। तो आरोही को कुछ समय तक अजीब सा लगा मानों कोई मस्ती छूट गई हो। उसे होश ही नहीं आया। राहुल ने चुटकी बजाई और बोला, "चलो, आज साथ में ब्रेकफास्ट बनाते हैं। तुम बताओ, क्या बनाओ?" वह प्यार से पूछ रहा था, लेकिन आरोही के नितंबों पर हाथ फिरा रहा था।
आरोही ने कहा, "परांठे?" राहुल ने हाँ में सिर हिलाया कहा, और आरोही काम करने लगी। राहुल वहीं खड़ा होकर उससे बातें करता रहा। लेकिन बीच-बीच में आरोही की गांड सहलाता और हल्के से थप्पड़ मारता।
"तुम कितनी क्यूट हो, आरोही। तुम्हारे हर अंग में नशा है। तुम्हारे चूतर सहलाने और गांड़ का नशा ही अलग है। तुम्हारे जैसे लड़की मिली, तो जिंदगी बन जाए।"
उसके शब्द आरोही के दिल को छू रहे थे, लेकिन नितंब और उसकी गोलाइयों को सहलाते, कुचलते दबाते और थप्पड़ मारते हाथ उसे असहज कर रहे थे। हर छुअन के साथ एक झनझनाहट होती, और योनि में गीलापन बढ़ता।
आरोही को अच्छा भी लग रहा था—लेकिन यह गलत था, लेकिन शरीर साथ नहीं दे रहा था। वह काम करती रही, लेकिन मन में गिल्ट था।
"अमित अगर होश में आया और उसे पता चलेगा तो क्या कहेगा?" लेकिन वह कर भी क्या सकती थी। वह बंधन में तो थी ही। नाश्ता बन गया और दोनों वापस हॉल में आ गए।
थोड़ी देर बाद राहुल का फोन बजा। वह बात करने लगा—किसी बिजनेस कॉल था।
"हां, भाई, डील फाइनल है। आज शाम मीटिंग रख लो।"
वह फोन पर बात करता रहा, लेकिन आरोही को देखकर इशारा किया—पास आओ। आरोही पास गई, और राहुल ने उसे अपनी ओर खींच लिया। लेकिन गोद में नहीं बैठाया बल्किल खड़ा रखा। फोन कान पर लगाए, वह आरोही की लैगिंग को नीचे सरकाने लगा।
आरोही एकदम से चौंक गई—"सर... क्या कर रहे हो?" वह धीरे से डरते हुए बोली।
लेकिन राहुल ने आंख से इशारा किया—चुप। आरोही एकदम चुप। लैगिंग नीचे सरक गई, और गोरे चिकने नितंब नंगे हो गए। राहुल ने उन उभारों को सहलाना शुरू कर दिया—धीरे-धीरे, उंगलियां गोलाई पर घुमाते हुए।
आरोही की सांस तेज हो गई। "आहऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ... ऊँहहहहऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ..."
लेकिन वह हिलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई, या क्या पता आरोही के पैर इस आनंद से रूक गए?
राहुल बात करता रहा—"हाँ, प्रॉफिट मार्जिन 20% रखेंगे।"
लेकिन हाथ नितंब पर था, सहला रहा था। कुछ देर बाद आरोही की सिसकारी निकलने लगी—"उंह... आह..." हल्की, लेकिन अनकंट्रोल।
राहुल ने एक बार देखा, मुस्कुराया, और सहलाना जारी रखा। आरोही की योनि अब पूरी गीली हो गई थी, वह बहने लगी। वह महसूस कर रही थी। शर्म से उसका चेहरा लाल था, लेकिन सनसनी रोक नहीं पा रही थी। और वैसे भी अब उसकी योनि भी नंगी थी।
फोन खत्म होने के बाद राहुल ने आरोही को झुकाया। "झुको तो जरा, देखूं तेरे इस मस्त खजाने को।"
आरोही हिचकिचाई—"सर... प्लीज, शर्म आती है।"
लेकिन राहुल ने जोर दिया—"झुको।"
आरोही कमर से झुक गई, अब नितंब खुलकर ऊपर की ओर आ गए। राहुल ने दोनों भागों को दोनों हाथों में संभाला और दबाया—जोर से।
आरोही की चीख निकली—"आऽऽह..." लेकिन साथ ही एक सुखद सिहरन। राहुल ने देखा—"कितनी परफेक्ट है। लगता है तेरी पति ने तेरी गांड़ का स्वाद नहीं लिया है।"
आरोही को झुककर गांड दिखाने में बहुत शर्म महसूस हो रही थी—और ऊपर से उसके पति का नाम और स्वाद लेना। उसको अजीब लग रहा था, लेकिन उत्तेजना भी थी।
"यह क्या हो रहा है? मैं क्यों एंजॉय कर रही हूं?" गिल्ट बढ़ रहा था। राहुल ने उसे सीधा किया और गले लगा लिया।
"जानेमन, घबराओ। मैं तुम्हें कभी परेशान नहीं होने दूँगा। बस ऐसे ही गुड गर्ल बनी रहना।"
फिर राहुल ने जैसे कुछ हुआ ही नहीं, बातें शुरू कीं। "तुम्हारे घर की समस्या सॉल्व कर दूंगा।" उसके शब्द प्यार भरे थे, भावनात्मक सहारा दे रहे थे।
आरोही अब भावुकता में रो पड़ी—"सर, आप बहुत अच्छे हो। लेकिन... यह सब..." राहुल ने चुप कराया—"शशश... चिंता मत करो। मैं तुम्हारा हूं। परिवार जैसा।"
आरोही को अच्छा लग रहा था—किसी ने इतना सहारा दिया था। लेकिन गीली योनि उसे याद दिला रही थी। शाम हुई, आरोही घर गई—गीली योनि, भावनात्मक अहसास, और गिल्ट के साथ। "अमित, माफ करना। लेकिन राहुल... क्या वह वाकई अच्छा है?" वह सोच रही थी, रात भर नींद नहीं आई।
पेशाब की वह विवशता, राहुल की टीजिंग, सिंक में वह अपमानजनक पल—और सबसे बढ़कर उसकी गुदा में ऊँगली डालना। यह सब कुछ उसे रात भर सोने नहीं दिया था। लेकिन साथ ही जब भी वह गुदा में ऊँगली डालने को याद करती उसकी योनि में चिकनाई सी बढ़ने लगती। सच कहें तो वह मन ही मन राहुल से कम अपने शरीर से अधिक व्यथित थी।
वह सुबह छह बजे राहुल के फ्लैट पर पहुँची, चाबी से दरवाजा खोला, और लॉग बुक में एंट्री की। राहुल पहले से ही उठा हुआ था, लेकिन आज उसका मूड अलग लग रहा था। वह ट्रेडमिल पर नहीं था, बल्कि किचन में कॉफी बना रहा था।
आरोही को देखते ही उसने मुस्कुराकर कहा, "आ गई मैडम जी। आज थोड़ा लेट हो गई? कोई बात नहीं, आओ, कॉफी पियो।"
उसकी आवाज में एक नरमी थी, जो आरोही को चौंका गई। वह आमतौर पर सख्त या टीज करने वाला होता था, लेकिन आज जैसे कोई दोस्त बात कर रहा हो। नहीं तो जैसे ही लेट सुना तो आरोही को लगा की आज तो गई। आरोही ने हल्के से सिर हिलाया और पास गई। राहुल ने उसे कॉफी का मग थमाया और उसके कंधे पर हाथ रखा।
"कैसी हो आज? कल थक गई थी ना? सिंक में मूतना आसान थोड़े होता है। बैठो, थोड़ी देर बातें करते हैं।" मुस्कुराते हुए राहुल ने कहा। और सहलाते हुए उसे बैठाया।
आरोही सोफे पर बैठ गई, थोड़ा सा बनावटी मुस्कान बिखेरी लेकिन उसके मन में संदेह था। "क्या आज कुछ अलग होगा?" वह सोच रही थी।
राहुल उसके बगल में बैठा और बोला, "तुम्हारी आंखों में थकान दिख रही है। घर पर सब ठीक है? अमित कैसा है? सब ठीक चल रहा है ना?" उसकी बातों में एक असली चिंता लग रही थी। एक हाथ आरोही को कंधे को थामे हुए थे।
आरोही ने कॉफी का कप पकड़ा था और बोली, "जी, ठीक हैं। डॉक्टर कह रहे हैं कि आशा तो है लेकन बाकी तो आप जानते ही हैं। लेकिन... पैसे की टेंशन है। जो आपको पता ही है।"
राहुल ने उसका हाथ पकड़ लिया, नरमी से। और चूमते हुए बोला "अब चिंता क्यों करनी है। मैं हूँ ना। तुम बस ऐसे ही गुड गर्ल बनी रहो। तुम्हारे परिवार को कुछ नहीं होने दूँगा। चाची जी, अमित सबको संभाल लेंगे। तुम बस मेरा कहना मानती रहो, सब ठीक हो जाएगा।"
उसके शब्द आरोही के दिल को छू गए। इतने दिनों से वह जो संघर्ष कर रही थी, उस पर राहुल के शब्द मानों किसी बांध को तोड़ दिए हों। राहुल की यह बातें उसे भावुक कर रही थीं। आंखे छलछला आईं "धन्यवाद सर... आपने बहुत मदद की है।"
राहुल ने उसे गले लगा लिया, जैसे कोई प्रेमी हो। "जानेमन, रो मत। मैं हूँ ना। बस उस परिधि की गांड़ में बहुत चर्बी है। एक दिन उतारेंगे अच्छे से।" परिधि के बारे में यह अच्छा तो नहीं लगा लेकिन जैसी हिकारत से परिधि उसे देखती थी उसे बहुत बुरा नहीं लगा।
वह राहुल के गले लगी थी राहुल का सहारा उसे महसूस हो रहा था। और राहुल भी पूरे हक से उसे चिपकाए हुए था। अब धीरे-धीरे उसका हाथ नीचे सरक गया—आरोही के गुदाज से कसे हुए नितंबों पर।
प्यार भरे व्यवहार से गदगद आरोही इस हमले से हल्की सी सिहर उठी। "सर..." वह बहुत हल्के से बोली, लेकिन राहुल ने अनसुना कर दिया। वैसे भी आरोही रोकने के लिए शायद कह भी नहीं रही थी।
उसने आरोही को उठाकर अपनी गोद में बिठा लिया, और उसके चेहरे को और बालों को सहलाते हुए बातें जारी रखी।
"तुम्हारा परिवार कितना अच्छा रहता अगर अमित-सुमित दोनों मूर्खता ना करते। उनको कितना समझाया था। और परिधि का बच्चा कैसा है? उसे चीजें मिल गईं थीं?"
उसके शब्द प्यार भरे थे, लेकिन उसके हाथ अब फिर से आरोही के नितंबों को मसल रहे थे, लेकिन हल्के-हल्के, हौले-हौले। धीरे-धीरे, लेकिन लगातार, एक प्यार की गर्माहट जैसे। आरोही को अच्छा लग रहा और नहीं भी लग रहा था—जहाँ दिमाग कहता कि यह अपमानजनक है। लेकिन साथ ही एक अजीब सी गुदगुदी हो रही थी। उसके शरीर में एक गर्माहट फैलने लगी, जो वह रोक नहीं पा रही थी।
"सर... मत करो," वह धीरे से बोली, लेकिन राहुल ने हंसकर कहा, "क्यों? तुम्हारी गांड कितनी सॉफ्ट है। एकदम शेप में मुझे पसंद है। अमित ने लगता है अच्छे से रगड़ा नहीं है।"
और फिर एक हल्का सा थप्पड़ मारा। चटऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ...............
आरोही की सिसकारी जोर से निकली, लेकिन जैसे किसी मस्ती में हो—"उंहऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ..."
लेकिन वह कुछ नहीं बोली। राहुल की बातें जारी थीं—"तुम्हारी सास भी अच्छी हैं। तुम्हें बचाने के लिए लड़ने आ गईं थीं। इस मामले में भाग्यशाली हो। घर के मर्द नालायक निकले। कोई नहीं मर्द की सारी जरूरत के लिए मैं हूँ ना।"
उसके शब्द आरोही को अच्छा अहसास दे रहे थे, जैसे कोई अपना हो। लेकिन वह सुन नहीं रही थी। लेकिन साथ ही थप्पड़ जारी थे—हल्के, लेकिन बार-बार। हर थप्पड़ के साथ आरोही का शरीर सिहरता, और नीचे एक गीलापन महसूस होने लगा।
"यह क्या हो रहा है? अच्छा क्यों लग रहा है?" वह खुद से लड़ रही थी, लेकिन योनि गीली हो रही थी।
अब राहुल ने आरोही को गोद से उतारा। तो आरोही को कुछ समय तक अजीब सा लगा मानों कोई मस्ती छूट गई हो। उसे होश ही नहीं आया। राहुल ने चुटकी बजाई और बोला, "चलो, आज साथ में ब्रेकफास्ट बनाते हैं। तुम बताओ, क्या बनाओ?" वह प्यार से पूछ रहा था, लेकिन आरोही के नितंबों पर हाथ फिरा रहा था।
आरोही ने कहा, "परांठे?" राहुल ने हाँ में सिर हिलाया कहा, और आरोही काम करने लगी। राहुल वहीं खड़ा होकर उससे बातें करता रहा। लेकिन बीच-बीच में आरोही की गांड सहलाता और हल्के से थप्पड़ मारता।
"तुम कितनी क्यूट हो, आरोही। तुम्हारे हर अंग में नशा है। तुम्हारे चूतर सहलाने और गांड़ का नशा ही अलग है। तुम्हारे जैसे लड़की मिली, तो जिंदगी बन जाए।"
उसके शब्द आरोही के दिल को छू रहे थे, लेकिन नितंब और उसकी गोलाइयों को सहलाते, कुचलते दबाते और थप्पड़ मारते हाथ उसे असहज कर रहे थे। हर छुअन के साथ एक झनझनाहट होती, और योनि में गीलापन बढ़ता।
आरोही को अच्छा भी लग रहा था—लेकिन यह गलत था, लेकिन शरीर साथ नहीं दे रहा था। वह काम करती रही, लेकिन मन में गिल्ट था।
"अमित अगर होश में आया और उसे पता चलेगा तो क्या कहेगा?" लेकिन वह कर भी क्या सकती थी। वह बंधन में तो थी ही। नाश्ता बन गया और दोनों वापस हॉल में आ गए।
थोड़ी देर बाद राहुल का फोन बजा। वह बात करने लगा—किसी बिजनेस कॉल था।
"हां, भाई, डील फाइनल है। आज शाम मीटिंग रख लो।"
वह फोन पर बात करता रहा, लेकिन आरोही को देखकर इशारा किया—पास आओ। आरोही पास गई, और राहुल ने उसे अपनी ओर खींच लिया। लेकिन गोद में नहीं बैठाया बल्किल खड़ा रखा। फोन कान पर लगाए, वह आरोही की लैगिंग को नीचे सरकाने लगा।
आरोही एकदम से चौंक गई—"सर... क्या कर रहे हो?" वह धीरे से डरते हुए बोली।
लेकिन राहुल ने आंख से इशारा किया—चुप। आरोही एकदम चुप। लैगिंग नीचे सरक गई, और गोरे चिकने नितंब नंगे हो गए। राहुल ने उन उभारों को सहलाना शुरू कर दिया—धीरे-धीरे, उंगलियां गोलाई पर घुमाते हुए।
आरोही की सांस तेज हो गई। "आहऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ... ऊँहहहहऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ..."
लेकिन वह हिलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई, या क्या पता आरोही के पैर इस आनंद से रूक गए?
राहुल बात करता रहा—"हाँ, प्रॉफिट मार्जिन 20% रखेंगे।"
लेकिन हाथ नितंब पर था, सहला रहा था। कुछ देर बाद आरोही की सिसकारी निकलने लगी—"उंह... आह..." हल्की, लेकिन अनकंट्रोल।
राहुल ने एक बार देखा, मुस्कुराया, और सहलाना जारी रखा। आरोही की योनि अब पूरी गीली हो गई थी, वह बहने लगी। वह महसूस कर रही थी। शर्म से उसका चेहरा लाल था, लेकिन सनसनी रोक नहीं पा रही थी। और वैसे भी अब उसकी योनि भी नंगी थी।
फोन खत्म होने के बाद राहुल ने आरोही को झुकाया। "झुको तो जरा, देखूं तेरे इस मस्त खजाने को।"
आरोही हिचकिचाई—"सर... प्लीज, शर्म आती है।"
लेकिन राहुल ने जोर दिया—"झुको।"
आरोही कमर से झुक गई, अब नितंब खुलकर ऊपर की ओर आ गए। राहुल ने दोनों भागों को दोनों हाथों में संभाला और दबाया—जोर से।
आरोही की चीख निकली—"आऽऽह..." लेकिन साथ ही एक सुखद सिहरन। राहुल ने देखा—"कितनी परफेक्ट है। लगता है तेरी पति ने तेरी गांड़ का स्वाद नहीं लिया है।"
आरोही को झुककर गांड दिखाने में बहुत शर्म महसूस हो रही थी—और ऊपर से उसके पति का नाम और स्वाद लेना। उसको अजीब लग रहा था, लेकिन उत्तेजना भी थी।
"यह क्या हो रहा है? मैं क्यों एंजॉय कर रही हूं?" गिल्ट बढ़ रहा था। राहुल ने उसे सीधा किया और गले लगा लिया।
"जानेमन, घबराओ। मैं तुम्हें कभी परेशान नहीं होने दूँगा। बस ऐसे ही गुड गर्ल बनी रहना।"
फिर राहुल ने जैसे कुछ हुआ ही नहीं, बातें शुरू कीं। "तुम्हारे घर की समस्या सॉल्व कर दूंगा।" उसके शब्द प्यार भरे थे, भावनात्मक सहारा दे रहे थे।
आरोही अब भावुकता में रो पड़ी—"सर, आप बहुत अच्छे हो। लेकिन... यह सब..." राहुल ने चुप कराया—"शशश... चिंता मत करो। मैं तुम्हारा हूं। परिवार जैसा।"
आरोही को अच्छा लग रहा था—किसी ने इतना सहारा दिया था। लेकिन गीली योनि उसे याद दिला रही थी। शाम हुई, आरोही घर गई—गीली योनि, भावनात्मक अहसास, और गिल्ट के साथ। "अमित, माफ करना। लेकिन राहुल... क्या वह वाकई अच्छा है?" वह सोच रही थी, रात भर नींद नहीं आई।


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