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Adultery हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)
#48
भाग ~ १४




"हाय दय्या बापू आ गए राजू।" अनीता हड़बड़ा कर नमकीन गुड़ कागज में लपेटने लगी─"चल जल्दी...अगर वो इधर आ गए और हमें नमकीन गुड़ खाते देख लिया तो डांटेंगे।"

"तू इसे छुपा ले जल्दी।" मैं जल्दी से उठते हुए बोला─"और हां अपना मुंह भी अच्छे से पोंछ ले। तेरे मुंह के आस पास नमकीन और गुड लगा हुआ है।"

अनीता झट अपने दुपट्टे को उठा कर उससे अपना मुंह साफ करने लगी। मैंने भी हाथ से अपने मुंह को टटोला। जल्दी ही हम दोनों खलिहान की तरफ चल पड़े।

उसके बाद सारा समय गेहूं की गहाई करने में ही गुजरा। बैलों के पीछे चलते चलते मैं और अनीता बहुत थक गए थे। फिर जब श्यामू काका ने बैलों को जुएं से छोरा तब जा कर हम दोनों को फुर्सत मिली और जान में जान आई।

"आज तो तुम दोनों बहुत थक गए होगे न।" दशरथ काका ने मुस्कुराते हुए पूछा।

"हां काका...बहुत ज्यादा।" मैंने थके लहजे में कहा─"अब तो पांव में जान ही नहीं है।"

"हां जानता हूं करेजा।" उन्होंने सिर हिलाया─"तेरे साथ आज अनीता बिटिया भी बहुत थक गई है। ऐसे कामों में मेहनत बहुत लगती है। खैर अब तुम दोनों घर जाओ।"

तभी मझली काकी और छोटी काकी हमारे पास आ गईं। वो दोनों खेतों में गेहूं की कटाई कर रहीं थी। जबकि मां बापू के साथ पुल्लियां बांध रही थी।

मंजू काकी को देखते ही मैं उनसे नजरें चुराने लगा। मेरी धड़कनें एकाएक तेज हो गईं। कल रात का सारा किस्सा एक झटके में याद आ गया मुझे। उधर वो बिल्कुल सामान्य थीं। ऐसा लगा जैसे उन्हें कल रात की घटना से कोई फर्क ही नहीं पड़ा था या फिर शायद ऐसा हो सकता था कि वो सबके सामने ऐसा कुछ भी जाहिर नहीं होने देना चाहती थीं।

"घर जा रही हो क्या काकी।" तभी अनीता ने उन दोनों की तरफ देख उनसे पूछा।

"हां बिटिया।" मंजू काकी ने कहा─"घर जा के खाना पीना भी तो बनाना है। वैसे सुनीता को कह तो आई थी मैं कि खाना बना लेना पर क्या पता वो भूल गई हो और खेलने में व्यस्त हो गई हो।"

दशरथ काका की मौजूदगी में छोटी काकी ने अपना चेहरा घूंघट से ढंक रखा था। वो उनके सामने बोल नहीं सकतीं थी। जेठ भय‌ऊ के रिश्ते में यही नियम...यही रीति रिवाज था हमारे गांव में।

खैर उसके बाद मैं और अनीता दोनों काकियों के साथ ही घर की तरफ चल पड़े। दिन ढलने वाला था फिर भी गर्मी अभी भी महसूस हो रही थी।

अनीता और संगीता काकी आपस में बातें करते हुए आगे आगे जा रहीं थी जबकि मैं और मंजू काकी उनके पीछे चल रहे थे। मेरी इच्छा तो नहीं थी उनके साथ चलने की लेकिन जैसे ही अनीता और छोटी काकी थोड़ा आगे बढ़ीं और मैं भी उनके पीछे थोड़ा तेजी से बढ़ने लगा तो मंजू काकी ने झट मेरा हाथ पकड़ लिया था। फिर इशारे से कहा कि  मैं उनके साथ ही चलूं। इस लिए मजबूरी में मैं उनके साथ चलने लगा था। मेरी धड़कनें बढ़ी हुईं थी। मन में कई तरह के सवाल आ रहे थे।

"तुमने किसी को कुछ बताया तो नहीं न।" मंजू काकी ने धीमे से मुझसे पूछा।

"न..नहीं।" मैंने भी धीमे से जवाब दिया।

"तुम्हें पता है मैं सारा दिन यही सोच सोच के घबराई हुई थी कि कहीं तुम किसी को उस बारे में बता न दो।" काकी ने कहा─"इस चक्कर में मैं ठीक से कटाई भी नहीं कर पा रही थी। कई बार जीजी ने टोक कर मुझसे पूछा था कि मेरा ध्यान किधर है।"

"फिर???"

"फिर क्या।" काकी ने कहा─"मैं उन्हें भला कैसे बताती कि मेरा ध्यान कहां है या मैं क्या सोच सोच के अंदर ही अंदर घबराई हुई हूं।"

"हम्म्म्म।"

"राजू...तुम कभी भूल कर भी किसी को उस बारे में मत बताना।" मंजू काकी ने धीमे स्वर में ही जैसे मिन्नतें की─"वरना बहुत बड़ा अनर्थ हो जाएगा। समझ रहे हो न।"

"हां।" मैंने धीमे से ही कहा। फिर सहसा मुझे कुछ याद आया तो मैंने उनसे पूछा─"अच्छा ये बताओ काकी कल रात मैंने ऐसा क्या कर दिया था जो तुम गुस्सा हो गई थी।"

"जाने दो उस बात को।" काकी ने बात को टालना चाहा─"भूल जाओ सब...मैं अब तुमसे गुस्सा नहीं हूं। तुम बस ये बातें किसी को मत बताना। याद रखना कि तुमने वो सब न बताने के लिए जीजी की कसम खाई है।"

"मैं किसी को नहीं बताऊंगा काकी।" मैंने कहा─"अच्छा एक बात पूछूं तुमसे।"

"हां पूछो।"

"कल के बाद क्या तुम बापू से दुबारा मिली हो।" मैंने धड़कते दिल से पूछा।

"नहीं...मैं नहीं मिली उनसे और न ही उन्होंने मुझसे मिलने की कोशिश की।" मंजू काकी ने एक नजर आगे आगे चल रहीं अनीता और छोटी काकी को देख कर कहा─"पर तुम ये क्यों पूछ रहे हो। क्या तुम ये सोच रहे हो कि मैंने और तुम्हारे बापू ने फिर से वो सब किया होगा।"

"तो क्या नहीं किया ऐसा।" मैंने कहा।

"राजू...तुम्हारे द्वारा देख लेने के बाद अब ये मुमकिन नहीं है।" मंजू काकी ने असहज भाव से कहा─"अब अगर तुम्हारे बापू ऐसा करने का सोचेंगे भी तो मैं उन्हें ऐसा नहीं करने दूंगी।"

"क्यों???"

"बस ऐसे ही।" काकी ने कहा─"पहले मैं उनकी बातों में और उनके प्रेम में आ गई थी और बहक भी गई थी। मुझे अच्छे बुरे का खयाल तो था लेकिन उनके प्रेम में अंधी हो कर वो सब करती चली गई थी। पर अब नहीं...मुझे समझ आ गया है कि ये बिल्कुल भी ठीक नहीं है। अगर दुर्भाग्य से किसी दिन तुम्हारे काका द्वारा पकड़ी गई या उन्हें पता चल गया तो मैं कहीं की न रहूंगी। किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगी। तुम्हारे काका मुझे धक्के मार के घर से निकाल देंगे और मेरी बेटियां बिना मां के हो जाएंगी। इस लिए अब से मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूंगी तुम्हारे बापू के साथ।"

मंजू काकी की बातें सुन कर मैं सोच में पड़ गया। अंदर ही अंदर मुझे ये सोच कर खुशी भी हुई कि काकी अब बापू के साथ कुछ नहीं करेंगी।

"पर अगर बापू ने तुम्हें इसके लिए मजबूर किया तो।" मैंने पूछा।

"नहीं करेंगे वो मजबूर।" काकी ने कहा─"और अगर करेंगे तो उन्हें अच्छे से समझा दूंगी। उन्हें समझा दूंगी कि अगर वो मेरे साथ जोर जबरदस्ती करेंगे तो सारी लोक लाज भूल कर सबको बता दूंगी। फिर भले ही इसके बाद मेरे साथ भी कितना ही बुरा क्यों न हो जाए।"

"वैसे काकी।" मैंने झिझकते हुए पूछा─"तुमने और बापू ने कितनी बार चु..चुदाई की है अब तक।"

"र...राजू चुप करो।" मंजू काकी ने एकदम से घबरा कर मुझे देखा और फिर आगे आगे चल रहीं अनीता और छोटी काकी को देख बोलीं─"तुम्हें जरा भी खयाल नहीं है क्या कि ऐसी बात अगर उन दोनों के कानों में पड़ गई तो कितना बड़ा गजब हो जाएगा।"

"पर मैंने तो बहुत धीमी आवाज में तुमसे पूछा था काकी।" मैंने भोलापन दिखाया─"इतनी दूर से उन्हें थोड़े न सुनाई देगा।"

"फिर भी तुम्हें इस तरह खुलेआम ऐसी बात मुंह से नहीं निकालनी चाहिए।" काकी ने धीमे स्वर में कहा।

"ठीक है अब से नहीं निकालूंगा।" मैंने कहा─"लेकिन जो मैंने पूछा है उसका जवाब तो दो।"

"देखो मैं तुम्हें सब कुछ बता चुकी हूं।" काकी ने कहा─"तो अब उस बारे में कुछ मत पूछो।"

"बस ये बता दो फिर कुछ नहीं पूछूंगा।"

काकी ने बेबस भाव से मेरी तरफ देखा। 

"पक्का फिर कुछ नहीं पूछोगे न।"

"हां पक्का।"

"हमें ऐसा काम करने के लिए रोज मौका नहीं मिलता था।" फिर काकी ने बताया─"इस एक महीने में ऐसा करने के लिए हमें चार पांच बार ही मौका मिला था। कल खेत के उस कमरे में भी हमने पहली बार ही किया था। मैं तो वहां ऐसा करना ही नहीं चाहती थी क्योंकि तुम्हारे काका खेतों पर ही थे। वो यही समझ रहे थे कि मैं दोपहर का खाना बनाने के लिए घर चली गई हूं। वैसे मैं घर ही जाने वाली थी मगर हंसिया रखने के लिए मकान के उस कमरे की तरफ जाने लगी। सोचा था कमरे में हंसिया रख दूंगी और फिर घर चली जाऊंगी। मुझे नहीं पता था कि कमरे में तुम्हारे बापू आराम कर रहे हैं। फिर जब उन्होंने मुझे वहां आया देखा तो उन्होंने एकदम से पकड़ लिया था मुझे।"

"क्या सच में???"

"हां।" काकी ने कहा─"मैं तो बुरी तरह घबरा ही गई थी और फिर उनसे छोड़ देने की मिन्नतें भी करने लगी थी मगर वो नहीं माने। कहने लगे कि इस वक्त यहां कोई नहीं है। उनका भाई खेतों पर पुल्लियां बांध रहा है तो वो यहां आएगा नहीं। उनका छोटा भाई भी खेतों में काम पर लगा हुआ है। कहने का मतलब ये कि जेठ जी के अनुसार इस काम के लिए हमारे पास बहुत ही अच्छा मौका है। अब क्योंकि मैं तो उनके प्रेम में और उनके प्यार करने के अंदाज में बावरी हो चुकी थी इस लिए जल्दी ही मान गई। उसके बाद ही उन्होंने वो सब करना शुरू कर दिया था।"

"अच्छा तो ये बात है।" मैं धीमे से बोला─"पर मैं भी तो खेतों पर था। क्या तुम दोनों को ये पता नहीं था।"

"पता था।" काकी ने बताया─"लेकिन हमें यही लगा था कि तुम हमेशा की तरह अपने दोस्त के साथ खेलने के लिए खेतों से चले गए होगे। अगर हमें पता होता कि तुम अभी भी खेतों पर हो और कमरे में ही आ जाओगे तो भला हम क्यों ऐसा काम करते।"

"हां ये बात भी ठीक है।" मैंने सिर हिलाया।

"अब जान लिया न सब कुछ।" काकी ने कहा─"अब कुछ मत पूछना मुझसे और न ही मुझसे ऐसी बातें करना सबके सामने।"

"ठीक है।"

"अच्छा एक बताओ।" काकी को कुछ याद आया तो उन्होंने पूछा─"कल जब मैं उस कमरे से चली आई थी तब तुम्हारे बापू ने तुमसे उस बारे में क्या कुछ कहा था।"

"हां...वो बस यही समझा रहे थे कि मैं इस बारे में कभी किसी को कुछ न बताऊं।" मैंने बताया─"फिर उन्होंने मुझे मां की कसम भी खिलाई।"

"अच्छा ऐसा क्या।" काकी के चेहरे पर हैरानी के भाव उभरे─"और तुमने उनसे कुछ नहीं पूछा। मतलब कि क्या तुमने उनसे ये जानने की कोशिश नहीं कि वो मेरे साथ वो सब क्यों और कैसे कर रहे थे।"

"मैं भला उनसे कैसे उस बारे में पूछ सकता था।" मैंने कहा─"मैं तो उस वक्त चुपचाप ही खड़ा था वहां। हां मन ही मन जरूर उस सबको देख के हैरान था।"

"राजू चल।" तभी सामने से अनीता ने आवाज दी।

काकी और मैंने देखा वो छोटी काकी के साथ रुक गई थी। असल में उस जगह से छोटी काकी और मंजू काकी के घर की तरफ को रास्ता मुड़ जाता है इस लिए अनीता ने मुझे हमारे घर की तरफ जाने के लिए आवाज दी थी।

खैर दोनों काकी अपने घर की तरफ जाने वाली पगडंडी पर जाने लगीं और मैं अनीता के साथ अपने घर की तरफ चल पड़ा।

"नमकीन गुड़ खाएगा क्या।" रास्ते में अनीता ने मुस्कुराते हुए पूछा।

"अभी बचा के रखा है क्या तूने।" मैंने हैरानी से पूछा।

"हां...वो क्या है कि दुबारा खाने का मौका ही नहीं मिला।" अनीता ने कहा─"और काका लोगों के सामने इसे निकाल नहीं सकती थी।"

"कहां छिपा रखा था तूने।"

"दुपट्टे में और दुपट्टे को कमर में बांध लिया था।" उसने बताया─"किसी को नहीं पता चला कि मैंने कुछ छुपा रखा है...देखा तुझसे ज्यादा होशियार हूं मैं।"

मैं उसकी इस बात पर मुस्कुरा उठा। उसके होठों पर भी गहरी मुस्कान थिरक रही थी।

"मेरी प्यारी बहन है न।" मैंने कहा─"इस लिए होशियार तो होगी ही।"

"तू भी होशियार है।" उसने अपनी एक उंगली को मेरे दाएं गाल में हल्के से चुभाया─"बस थोड़ा बुद्धू है...हां।"

"अच्छा कल फिर नहाने चलेगी मेरे साथ नदी में।" मैंने बात बदल कर उससे पूछा।

"क्यों...ताकि तू फिर से मुझे कुर्ता उतारने को कहे।" अनीता ने तिरछी नजरों से देखते हुए कहा─"न...मैं तो अब नहीं जाऊंगी तेरे साथ।"

"अरे अब मैं ऐसा करने को नहीं बोलूंगा तुझे।" मैंने कहा─"अब से मैं सिर्फ वो करूंगा जो तू बोलेगी...सच्ची।"

अनीता पलट कर एकटक देखने लगी मुझे। गर्मी के कारण उसके चेहरे पर पसीने की बूंदें ऐसे लग रहीं थी जैसे सुबह के वक्त गुलाब के फूलों पर शबनम की बूंदें चमक रही होती हैं। जाने क्यों मेरी धड़कनें एकाएक तेज हो गईं।

"तू सच में आज बहुत अजीब बातें कर रहा है।" फिर उसने कहा─"सच सच बता क्या हुआ है तुझे।"

"अ...अरे कुछ नहीं हुआ है मुझे।" मैं उसकी बात पर सकपका गया था फिर सम्हल कर बोला─"ये तो....ये तो बस तेरे लिए मेरा प्यार है। भूल गई क्या श्यामू काका ने सुबह खेतों पर क्या बताया था हमें।"

"अच्छा हां।" अनीता को समझ आया तो उसकी आँखें फैल गईं।

"देख ले...मैं तुझसे कितना प्यार करता हूं।" मैंने धड़कते दिल से कहा─"मतलब कि ये तक बोल रहा हूं कि सिर्फ वही करूंगा जो तू कहेगी।"

"हां तो इसमें क्या है।" अनीता ने कहा─"मैं भी तो ऐसा कर सकती हूं।"

"पर तूने ऐसा बोला तो नहीं मुझसे।" मैंने कहा─"जबकि मैंने इतनी बड़ी बात बोल दी तुझे।"

"ठीक है।" अनीता ने कहा─"तो अब से मैं भी सिर्फ वही करूंगी जो तू कहेगा....अब बोल।"

"और अगर नहीं किया तो।"

"अरे करूंगी...पक्का।"

"चल ठीक है फिर।" मैंने कहा─"कल तू फिर से मेरे साथ नदी में नहाने चलेगी...बोल चलेगी न।"

"हां चलूंगी...अब खुश।"

"नहीं...पहले तू खुश होगी फिर मैं खुश होऊंगा।" मैंने कहा।

"मतलब???"

"देख तू मुझसे छोटी है और प्यारी भी है।" मैंने कहा─"इस लिए जब तू खुश होगी तभी मुझे खुशी महसूस होगी।"

"हैं...क्या तू सच कह रहा है।" अनीता ने आश्चर्य से देखा मुझे।

"तेरी कसम।"

"हां तू मार ही दे मुझे।" अनीता ने मुस्कुरा कर देखा मुझे─"हर वक्त मेरी ही कसम खाता है....गंदा कहीं का।"

"अच्छा चल अपनी कसम खाता हूं।" मैंने कहा─"अब ठीक है न।"

"राजू...तू बात बात पर ऐसे कसम न खाया कर।" अनीता ने गंभीर हो कर कहा─"मुझे अच्छा नहीं लगता तेरा बार बार कसम खाना। मुझे तुझ पर भरोसा है इस लिए अब से तू कसम नहीं खाएगा...समझा न।"

"ठीक है।" मैंने मुस्कुरा कर कहा─"तूने कह दिया तो अब से कसम नहीं खाया करूंगा।"

"देख अपना घर आ गया।" अनीता ने कहा─"मैं तो जाते ही सबसे पहले कुएं में नहाऊंगी...तू क्या करेगा।"

"मैं भी तेरे साथ नहाऊंगा।" मैंने कहा।

"अच्छा...मतलब जो मैं करूंगी वही तू भी करेगा।" अनीता ने आँखें फैला कर पूछा।

"तू बोलेगी तो नहीं करूंगा।" मैंने मायूस हो के उदास सी शक्ल बना ली।

"अरे मैं ऐसा नहीं बोलूंगी।" अनीता ने मेरे सिर के बालों पर हाथ फेरा─"तेरा जो मन करे कर...बस शैतानी मत करना।"

"मैं कहां शैतानी करता हूं।" मैंने भोली सूरत बना के कहा─"मैं तो एकदम भोला और बुद्धू हूं।"

अनीता ये सुन खिलखिला कर हंसने लगी। उसके मोतियों जैसे दांत चमकने लगे। उसके हंसने पर मैंने और भी ज्यादा बुद्धू शक्ल बना ली जिससे वो और भी ज्यादा हंसने लगी।

"तुझे मुझ पर हंसी आ रही है।" मैंने पूछा।

"तू बात ही ऐसी करता है।" 

अनीता हंसते हुए घर के अंदर दाखिल हुई। उसके पीछे मैं भी अंदर दाखिल हुआ। मैं मन ही मन सोचने लगा था कि एक दिन में हम दोनों भाई बहन कितना बदल गए हैं। कल तक हम सिर्फ झगड़ा करते थे। कभी भी एक दूसरे से ऐसे प्यार से बात नहीं करते थे। मैं सोचने लगा कि क्या ये सिर्फ श्यामू काका की बातों का असर था या कुछ और जो फिलहाल मैं सोच नहीं पा रहा हूं। मगर एक सच ये था कि मुझे अनीता से ऐसी बातें करने में बड़ा अच्छा महसूस होता था। मेरा दिल करता था कि बस उसके ही पास रहूं।

#######

"राजू...अब बस कर दे न।" कुएं में अनीता मेरे द्वारा उसको नहलाने पर बोली─"और कितना नहलाएगा मुझे।"

मैं काफी देर से उसे नहला रहा था। कुएं से बाल्टी में पानी खींचता और बाल्टी का सारा पानी धीरे धीरे कर के उसके ऊपर डाल देता। अनीता हर बार यही बोलती कि अब बस कर दे मगर मैं नहीं मान रहा था।

"तू बस नहा अनीता।" आज से पहले बहुत कम ऐसा हुआ था जब मैं इतना प्यार से उसका नाम लेता था वरना छिपकली ही बोलता था उसे─"आज तेरा ये भाई तुझे इतना नहलाएगा कि तुझे सुबह तक गर्मी नहीं लगेगी।"

"अरे अब बस कर दे न।" अनीता पत्थर के पाट में बैठी थी लेकिन ये कहते हुए खड़ी हो गई─"मां बापू आते होंगे और अगर उन्होंने अभी तक हमें नहाते ही देखा तो डांटेंगे।"

"अच्छा एक बाल्टी और नहा ले।" कुएं से पानी खींच कर बाल्टी पकड़े मैं बोला─"इसके बाद नहीं डालूंगा।"

"ठीक है डाल दे।" कहते हुए अनीता वापस पाट पर बैठ गई─"उसके बाद मैं भी तुझे ऐसे ही नहलाऊंगी।"

मैंने मुस्कुराते हुए बाल्टी का पानी उसके सिर पर डालना शुरू कर दिया। पानी सिर से बहते हुए उसके पूरे बदन को भिगोने लगा। सिर से चेहरे पर जब लगातार पानी बहता तो उसकी सांसें फूलने लगती और वो सांस लेने के लिए छटपटाने लगती।

"कितना खराब है तू सांस भी नहीं लेने देता मुझे।" जैसे ही बाल्टी का पानी खत्म हुआ तो उसने जोर जोर से सांस लेते हुए कहा─"पता है कितना सांस भर जाती है। एकदम दम घुटने लगता है।"

"पहले क्यों नहीं बताया मुझे।" मैंने भोलापन दिखाया─"मुझे लगा तुझे मजा आ रहा होगा। इसी लिए तो ऐसे नहला रहा था तुझे।"

"मजा तो सच में आ रहा था राजू।" अनीता मुस्कुराते हुए खड़ी हुई─"चल अब मैं तुझे नहलाती हूं।"

"रहने दे...कुएं से पानी खींच खींच के थक जाएगी तू।" मैंने कहा─"तू जा कपड़े बदल ले। मैं आता हूँ नहा के।"

"नहीं...मैं भी तुझे नहलाऊंगी।" अनीता गीले कपड़े पहने मेरे पास आते हुए बोली─"तूने मुझे नहलाने में इतना सारा पानी कुएं से खींचा...तू भी तो थक गया होगा। ला दे बाल्टी मुझे।"

"अरे मैं खुद नहा लूंगा न।" मैंने कहा─"तू जा कपड़े बदल ले।"

"न मतलब न।" अनीता ने कमर में हाथ रख के कहा─"तूने इतना प्यार से मुझे नहलाया है...इतनी मेहनत की है तो मैं भी नहलाऊंगी तुझे। देख अगर मैंने ऐसा नहीं किया तो मुझे बहुत बुरा लगेगा। मान जा न राजू....मुझे बाल्टी दे दे।"

"अच्छा ठीक है।" मैंने बाल्टी उसकी तरफ बढ़ाई─"पर तू बस एक बाल्टी पानी ही खींचेगी कुएं से।"

"मेरा जितना मन करेगा उतना नहलाऊंगी तुझे।" अनीता ने बाल्टी ले कर कहा─"चल अब तू कपड़े उतार के बैठ जा पाट पर।"

मैं जानता था कि वो मानेगी नहीं इस लिए उसे नाराज करना ठीक नहीं समझा मैंने। अगले ही पल मैंने जल्दी से कपड़े उतारे और सिर्फ कच्छा पहने पाट पर बैठ गया। उधर अनीता कुएं से पानी खींच रही थी।

उसका कुर्ता सलवार पानी में भीगा हुआ था इस लिए उसके बदन से चिपका हुआ था। जैसे ही कुएं से बाल्टी ऊपर आई तो उसने बाल्टी को पकड़ा और फिर मेरी तरफ पलटी। उफ्फ उसकी छातियां साफ दिख रहीं थी मुझे। पूरा कुर्ता उसकी छातियों पर चिपक गया था।

"चल बापू की तरह हर हर गंगे बोल।" फिर वो बाल्टी का पानी मेरे सिर के ऊपर धीरे धीरे डालते हुए बोली।

मैं सच में उसके पानी डालने पर हर हर गंगे बोलने लगा और हाथों से पूरे बदन को मलने लगा। थोड़ी ही देर में बाल्टी का पानी खत्म हो गया तो वो पलट कर फिर से कुएं में बाल्टी डालने लगी। 

नहाते तो हम पहले भी थे कभी कभी इस तरह मगर तब ऐसा एक दूसरे को तंग करने के लिए करते थे मगर आज ऐसा कुछ भी नहीं था। मैं उसे नहलाने में खुशी महसूस कर रहा था और अब वो मुझे खुशी से नहला रही थी।

जब तक उसने दूसरी बार पानी से भरी बाल्टी कुएं से खींची तब तक मैंने अपने पूरे बदन को अच्छे से मल लिया था।

"अरे माटी नहीं लगाएगा क्या बदन में।" बाल्टी लिए मेरी तरफ आते हुए उसने पूछा।

"लगाऊंगा न।" मैंने कहा─"तू ये बाल्टी यहीं रख दे और जा अब।"

"न मैं अभी नहीं जाऊंगी।" उसने बाल्टी मेरे पास रख कर कहा─"तू माटी लगा ले...फिर मैं पानी डालूंगी तेरे ऊपर।"

"मुझे पता है तू मेरे लिए अपना प्यार साबित करना चाहती है।" मैं खड़ा हुआ और फिर उसके कंधे पकड़ कर बोला─"पर तुझे ऐसा करने की जरूरत नहीं है पगली। मैं ऐसे ही महसूस कर सकता हूं कि तू मुझे बहुत चाहती है। अब मैं ये चाहता हूं कि मेरी प्यारी बहन ज्यादा परेशान न हो। तूने अभी बहुत ज्यादा नहाया है और कपड़े भी गीले पहने हैं...ऐसे में तू बीमार भी हो सकती है। इस लिए तू जा और कपड़े बदल ले। मैं नहा के आता हूं थोड़ी देर में।"

अनीता अपलक देखे जा रही थी मुझे। उसकी आंखों में मासूमियत थी और साथ ही प्यार भी। मेरा दिल किया उसके फूले हुए गाल चूम लूं मगर फिर मैंने अपना इरादा बदल दिया। कहीं वो गलत न समझ ले।

"कल मैं नदी में तेरे साथ नहाने चलूंगी।" फिर उसने कहा─"वहां खूब नहलाऊंगी तुझे और तू मुझे मना नहीं करेगा....समझ गया न।"

"हां ठीक है।" मैं मुस्कुरा उठा─"चल अब तू जा।"

वो जैसे ही जाने के लिए मुड़ी तो मेरा मन मचल उठा और मैंने झट कहा─"ठहर जरा।"

उसने पलट कर मेरी तरफ देखा। आंखों से इशारा कर पूछा क्या है। मैं धीरे से उसके पास बढ़ा और उसका चेहरा दोनों हथेली में ले कर झट से उसके फूले हुए गाल को चूम लिया। मेरे ऐसा करते ही वो चौंक पड़ी।

"अब जा।" मैंने उसे छोड़ कर कहा।

"तूने मेरा गाल क्यों चूमा।" उसने हैरानी से मुझे देखा।

"बस ऐसे ही।" मैंने कहा─"तू बहुत प्यारी लग रही थी इस लिए तेरा गाल चूमने का मन किया तो चूम लिया। तुझे बुरा लगा क्या।"

"न..नहीं।" वो थोड़ा लजा कर बोली─"चल अब मैं जा रही हूं। तू नहा ले जल्दी।"

कह कर वो मुस्कुराते हुए चली गई। कुछ देर के लिए मेरी धड़कनें बढ़ गईं थी मगर उसे मुस्कुराते हुए जाता देख मैंने राहत की सांस ली। खैर उसके बाद मैं नहाने में लग गया। नहाते हुए यही सोच रहा था कि एकाएक अनीता का साथ कितना अच्छा लगने लगा है मुझे।


जारी है.............
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हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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RE: हवस और नादानियां ~ (आप-बीती) - by Rajan Raghuwanshi - 17-01-2026, 10:26 AM



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