16-01-2026, 11:22 AM
शेर की हवस भरी दीवानगी
शेर का व्यक्तित्व पहली नजर में एक साधारण, मेहनती भारतीय गृहस्थ जैसा लगता था—एक ऐसा आदमी जो कड़ी धूप में काम करके अपना रंग सांवला कर चुका हो।
उसकी लंबाई 5'9" इंच थी, जो उसे मजबूत और दबंग कद-काठी देती थी। उम्र करीब 40 वर्ष। उसकी आंखें गहरी और काली थीं। ये आंखें मीरा को देखकर चमक उठती थीं, लेकिन दुनिया के सामने वो हमेशा झुकी रहतीं—एक वफादार नौकर का नकाब ओढ़े हुए।
जब शेर पहली बार सरताज सिंह के घर की दहलीज पर कदम रखा, तो उसके मन में सिर्फ बदला था। वो सोचता था कि वो सरताज की पत्नी मीरा को बस देखेगा, उसकी कमजोरियां तलाशेगा, और फिर शंकर भाई के अधूरे वादे को पूरा करेगा। लेकिन जैसे ही उसकी नजर मीरा पर पड़ी, सब कुछ बदल गया। शंकर भाई ने मीरा की खूबसूरती के किस्से सुनाए थे—उसकी वो रेशमी त्वचा, वो सुडौल जिस्म, वो आंखें जो किसी को भी मोहित कर दें। लेकिन हकीकत उससे कहीं ज्यादा ज्वलंत थी। मीरा गर्भावस्था के तीसरे महीने में थी, और उसका बदन अब पहले से ज्यादा भरा-भरा लग रहा था—एक ऐसी परिपक्व सुंदरता जो किसी भी मर्द की रगों में आग लगा दे।
मीरा लिविंग रूम के बीचों-बीच खड़ी थी। उसकी लंबाई 5'6" इंच। उसका चेहरा गोरा और चमकदार था, होंठ गुलाबी और पूरे, आंखें बड़ी और अभिव्यंजक—जिनमें एक मासूमियत थी जो उसके आत्मविश्वास से झलकती थी।
उसने गहरे नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी, जो उसके बदन पर ऐसे लिपटी हुई थी जैसे किसी ने उसके हर कर्व को नापकर सिल दी हो। साड़ी को उसने अपनी पतली लेकिन अब थोड़ी भरी कमर पर नीचे बांधा था, जिससे उसकी नाभि का वो गहरा गड्ढा हल्का सा झांक रहा था। पेट का वो हल्का उभार—गर्भावस्था की वजह से—उसे और भी ज्यादा आकर्षक बना रहा था, जैसे कोई पका हुआ फल जो छूने की प्रतीक्षा कर रहा हो।
शेर [आंतरिक विचार]: (उसे ऊपर से नीचे तक निहारते हुए, अपनी सूखी लार निगलते हुए) 'हे भगवान... ई का देख रहे हैं हम? शंकर भाई ने सच ही कहा था कि ई मेहरारू (औरत) नाहीं, साक्षात अप्सरा है। लेकिन ये तो आग की लपट है! ये कमर... ये नाभि... जैसे किसी ने मक्खन से तराशा हो। और ये उभार... उफ्फ! मन करता है अभी दबोच लूं, चूस लूं, काट लूं।'
मीरा का जिस्म पूरी तरह सुडौल था, एक सक्रिय जीवनशैली की वजह से उसमें एक कसाव था, लेकिन फिर भी एक ऐसी कोमलता थी जो उसे और भी ज़्यादा लुभावना बना रही थी। उसके स्तन अब पहले से ज्यादा भरे हुए थे, ब्लाउज में कैद लेकिन किसी भी पल बाहर आने को बेताब। कूल्हे गोल और भारी, जो चलते समय एक मादक लय में थिरकते थे। उसकी जांघें मजबूत लेकिन मुलायम, जैसे रेशम की परतें। पूरा बदन एक कामुक मूर्ति की तरह था—जिसे देखकर किसी भी मर्द की सांसें तेज हो जाएं।
मीरा: (आवाज़ में एक मिठास और अधिकार लिए) "तो तुम्हारा नाम शेर है? चंदन ने तुम्हारे बारे में बहुत तारीफ की थी। उम्मीद है तुम इस घर की ज़िम्मेदारी अच्छे से निभाओगे।"
शेर: (नजरें झुकाकर, लेकिन तिरछी नजर से उसके पल्लू से झांकते स्तनों को ताड़ते हुए) "जी मेमसाब... हम तो बस एक अदना सा नौकर हैं। आपकी सेवा ही हमारा नसीब है। उसके मन में उथल-पुथल थी—वो कल्पना कर रहा था कि कैसे वो मीरा को अपनी बाहों में जकड़ ले, उसके होंठों को चूमे, उसके बदन को नोचे।“
सरताज: (गंभीरता से) "देखो शेर, चंदन मेरा पुराना साथी है। अब जब तक वो ठीक नहीं होता, इस घर की सुरक्षा और व्यवस्था की कमान तुम्हारे हाथ में है। मीरा की हालत तुम देख ही रहे हो, उसे किसी भी चीज़ की कमी नहीं होनी चाहिए। ज्योति का ख्याल रखना, और घर के सारे काम संभालना।"
मीरा: (मुस्कुराते हुए) "शेर, तुम बस रसोई और बाज़ार का ख्याल रखना। बाक़ी भारी काम मैं धीरे-धीरे देख लूंगी, पर हाँ, ज्योति का ध्यान सबसे पहले आता है।"
शेर ने बड़ी विनम्रता से सिर झुकाया , लेकिन उसके मन में तूफान था|
शेर दरअसल शंकर का सौतेला भाई है। यह वही शंकर है जिसने मीरा और उसकी ननद रिया के जीवन को ब्लैकमेल के जरिए नर्क बना दिया था। उस वक्त मीरा की शादी रिया के भाई आरव से हुई थी। शंकर की धमकियों और ज़िल्लत से तंग आकर मीरा ने अपने कॉलेज के पुराने साथी सरताज से मदद मांगी थी। सरताज ने न केवल शंकर का अंत किया, बल्कि मीरा को उस दलदल से सुरक्षित बाहर निकाला।
जब सरताज ने शंकर को खत्म किया था, तो उसने वे सभी सबूत, तस्वीरें और यादें भी जलाकर खाक कर दी थीं जिनका इस्तेमाल शंकर ब्लैकमेलिंग के लिए करता था। सरताज को लगा था कि उसने मीरा के अतीत के हर कांटे को उखाड़ फेंका है। लेकिन वह 'शेर' नाम के उस कांटे को भूल गया जो अब उसके ही घर के बगीचे में उग आया था।
यही कारण है कि शेर के दिल में सरताज के प्रति प्रतिशोध और मीरा के प्रति एक हिंसक अधिकार की भावना जल रही है। शंकर ने मरते वक्त शेर से एक वादा किया था—कि जब वह मीरा के जिस्म से अपना मन भर लेगा, तो वह उसे शेर के हवाले कर देगा। अब शंकर तो नहीं रहा, लेकिन शेर उस 'वादे' को पूरा करने के लिए सरताज के घर में एक साये की तरह घुस आया है।
शेर के मन की कड़वाहट: एक आंतरिक संवाद
जब मीरा कमरे से बाहर गई, शेर वहीं खड़ा उसे जाते हुए घूरता रहा। उसके दिमाग में पुरानी यादें ताज़ा हो गईं।
शेर [आंतरिक विचार]: (दाँत पीसते हुए) 'सरताज सिंह... तूने मेरे भाई को मारकर सोचा कि तू जीत गया? आज तू वर्दी पहन के जिस औरत की हिफाज़त का दम भरता है, वो मेरे भाई की अमानत थी। शंकर भाई ने कहा था कि एक बार वो इससे खेल लें, फिर ये मेरी होगी। तूने उसे मार दिया, पर उस वादे को मैं आज भी सीने से लगाए बैठा हूँ। मीरा... तेरी ये भरी हुई देह, ये सूजे हुए स्तन, ये थिरकते कूल्हे—सब मेरा हक है। मैं तुझे तड़पा-तड़पा के भोगूंगा, तेरी जांघों के बीच की वो गर्माहट चखूंगा, और सरताज की आंखों के सामने तेरी खुशियां छीन लूंगा। तू सिर्फ एक खिलौना है—मेरा खिलौना।
'
उसने अपनी सांवली हथेलियों को देखा, जो मीरा के रेशमी बदन को छूने के लिए तड़प रही थीं। वो कल्पना करता कि कैसे वो अपनी उंगलियां मीरा की नाभि में डुबोएगा, उसके स्तनों को मसलते हुए दबाएगा, और उसके होंठों को काटते हुए चूसेगा। उसकी सांसें तेज हो गईं, और नीचे का तनाव असहनीय।
शेर [आंतरिक विचार]: (अंधेरे कोने में खड़ा होकर मीरा को दूर से देखते हुए) 'सरताज सिंह... तूने सोचा कि तूने सब कुछ जला दिया? वो कागज़, वो तस्वीरें... सब राख हो गईं? पर ई दिमाग में जो आग तूने लगाई है, उसे कैसे बुझाएगा? शंकर भाई की वो आखिरी बातें आज भी मेरे कानों में गूँजती हैं। उन्होंने कहा था—"शेर, ये औरत सोना है, बस इसे तपाना आना चाहिए।" तूने उन्हें मार दिया, पर उनकी हवस अब मेरी रगों में दौड़ रही है।'
शेर ने अब उस घर में अपनी जगह पूरी तरह से पक्की कर ली थी, लेकिन वफ़ादार नौकर का चोला अब बस एक दिखावा था। उसके अंदर का जानवर हर दिन और ज़्यादा बेलगाम होता जा रहा था।
मीरा का वो भरता हुआ जिस्म... उस जिस्म ने शेर की रातों की नींद हराम कर दी थी और दिन में भी बस उसी के ख़याल उसकी नसों में ख़ून की तरह दौड़ते थे।
एक दिन रसोई में शेर बर्तन धो रहा था, जब मीरा धीमी गति से पास से गुजरी। शेर ने सिर झुकाया, लेकिन तिरछी नजर से उसके पैरों से लेकर कूल्हों तक सब नाप लिया।
शेर [आंतरिक विचार]: (उसकी थिरकती चाल देखते हुए, अपनी जीभ से होंठ चाटते हुए) 'अरे रब्बा... क्या चीज बन गई है ये मेमसाब। पहले तो बस एक औरत थी, अब तो जलती हुई आग है। देह मांस से भर गई है, जैसे पका फल डाल से टूटने वाला हो। ये कूल्हे... उफ्फ, इतने गोल, इतने भारी—चलते समय वो मटक, वो लय... मन करता है पीछे से पकड़ लूं, दबा दूं, और अपनी कमर से सटा लूं।'
मीरा रुक गई और एक बर्तन उठाने के लिए झुकी। शेर की सांसें थम गईं। ब्लाउज के गले से उसके स्तनों की गहरी लकीर झांक रही थी—भारी, गोल उभार जो गर्भावस्था से सूजे हुए थे। वो किसी भी पल ब्लाउज फाड़कर बाहर आने को तैयार लगते थे।
शेर [आंतरिक विचार]: 'ख़ासकर इसके... उफ्फ़! ये फटे हुए उभार! जब ये चलती है तो वो भी साथ-साथ झूलते हैं... एक मदहोश कर देने वाली लय में। ऐसा लगता है जैसे कोई पके हुए फल... बस छूने भर की देर है।'
मीरा: (सहजता से) "शेर, तुमने ज्योति को दूध पिला दिया?"
शेर: "जी, मेमसाब। बिटिया रानी तो पेट भर के दूध पीके एकदम घोड़े बेचकर सो रही हैं। आप फिकर ना करियो, हम हैं न सब सम्हालने के लिए।"
शेर [आंतरिक विचार]: (उसकी गहरी साँसों के साथ ऊपर-नीचे होते उसके सीने को घूरते हुए) 'हाँ मेमसाब! बिटिया को तो पिला दिया, पर अब हमरी बारी है। ई जो दूध से भरे कलश लिए डोल रही हो न, बस मन करता है कि यहीं धर दबोचूँ। कलेजा मुँह को आ जाता है देख के! बस कुछ दिन और... फिर ई बदन पर हमरा हक़ होगा। ई छाती का दूध अब हम पियेंगे... और तब तक पियेंगे जब तक तुम्हारी जाँघों के बीच से शहद न टपकने लगे।'
मीरा ने पास खड़े शेर को देखा, उसकी नम्रता पर हल्की सी मुस्कान दी।
शेर फिर से अपने काम में जुट गया, लेकिन उसके हाथ अब काँप रहे थे, और उसकी आँखें जल रही थीं।
जब वो तेज़ी से चलती तो साड़ी के नीचे उनकी थिरकन साफ पता चलती। शेर की भूखी नज़रें सब देखती थीं—ये सिर्फ खूबसूरती नहीं थी, ये पका हुआ फल था। और पके हुए फल को..."चखने के लिए ही तोड़ा जाता है।"
और उसके कूल्हे... पहले कहाँ इतने थे! अब तो उनमें गजब का उभार था। गोल, गहरे, और साड़ी में से झाँकते थे।
"इसकी कमर का हर मोड़... हर झटका... कसम से, ईमान डिगा देता है। ये औरत अब पाप बन चुकी है मेरे लिए।"
साड़ी तो उसके जिस्म पर ऐसे चिपकी रहती थी मानो दर्जी ने बदन पर ही सिल दी हो। हर उतार-चढ़ाव को ऐसे दिखाती थी जैसे पूरी दुनिया को दावत दे रही हो। और जब वो मटकती हुई आगे चलती, तो शेर की दुनिया बस उसके थिरकते कूल्हों पर आकर टिक जाती थी।
वो मटक... वो जान-बूझकर चलती हुई क़ातिल लय।
"रोज देखता हूँ... रोज जलता हूँ... पर ये आँखें हैं कि हटती ही नहीं।"
उसका गला सूख जाता, हाथ भिंचकर मुट्ठियाँ बन जाते, और दिमाग में बस गंदे-गंदे ख्याल चक्कर काटते। उसने उसके जिस्म की बनावट को अपनी आँखों में कैद कर लिया था और उसकी गरमाहट को महसूस करने के ख्वाब देखता था।
"एक बार... बस एक बार वो जिस्म मेरे सामने खुल जाए..."
रातों में वही तस्वीर उसका पीछा नहीं छोड़ती थी—उसका वो नरम, फैला हुआ बदन उससे आकर सट जाए... उसे अपनी आगोश में भर ले।
यहाँ तक कि उसकी महक भी बदल गई थी। मिट्टी जैसी। नशीली। एकदम तेज।
जब वो पास से गुज़रती तो वो ट्रे पकड़ने, दरवाज़ा खोलने या परदा ठीक करने के बहाने उसकी महक को अपनी साँसों में खींच लेता था। लेकिन अंदर ही अंदर, उसके सब्र का बाँध अब टूटने लगा था।
"हाथ छू जाए बस एक बार... या उस उभार के पास जाकर रुक जाए... तो सच और ख्याल में कोई फर्क ही नहीं बचेगा।"
वो अब हद से बहुत आगे निकल चुका था। और ये बात वो खुद भी जानता था।
अपनी हालत की वजह से, मीरा अक्सर अपनी तकलीफों में इतनी उलझी रहती कि उसे शेर की गड़ी हुई नज़रों का एहसास ही नहीं होता था। वो उसे तब घूरता था जब वो नहीं देख रही होती, उसकी आँखें मीरा के जिस्म के हर मोड़ को नापती थीं।
उसके स्तन, उसके कूल्हे, और उसके पेट का वो हल्का सा उभार... ये सब मिलकर उसके अंदर एक जुनून को और भड़का रहे थे। लेकिन दुनिया की नज़रों में, शेर अभी भी एक वफादार और ईमानदार नौकर का नकाब पहने हुए था, और अपनी असली नीयत और हवस को बड़ी सफाई से छिपाए हुए था।
अब शेर को समझ में आने लगा था कि उसका भाई, शंकर, मीरा के पीछे इतना पागल क्यों था। शंकर ने कहानियों से ज़्यादा कुछ और भी छोड़ा था... उसने शेर को मीरा की कुछ पुरानी तस्वीरें भी भेजी थीं। उनमें साड़ी में लिपटी उसकी तस्वीरें भी थीं, जिनमें वो किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी।
लेकिन शंकर ने कहीं से एक और तस्वीर का जुगाड़ कर लिया था, एक ऐसी तस्वीर जिसमें वो बस अपनी चोली-पैंटी में थी। शेर ने उन तस्वीरों को संभाल कर रखा था, और अब हर रात कोठी से लगे अपने कमरे में उन्हें घूरता रहता था।
एक शांत शाम ,दीवान-ख़ाने में मीरा घुटनों के बल बैठी थी, एक नीची संदूकची के पास, कपड़ों का ढेर छाँट रही थी। पास ही, शेर फ़र्श पर पोंछा लगा रहा था, जबकि उसकी आँखें तो मीरा की हर एक हरकत पर गड़ी हुई थीं।
वह बड़ी बेफिक्री और सादगी से आगे की ओर झुकी, संदूक में गहरे रखे एक चादर को निकालने के लिए।
और बस एक ही पल में...
शेर की साँसें हलक़ में ही अटक गईं। मीरा का पल्लू सरक गया, और ब्लाउज़ के अंदर का हिस्सा आँखों के सामने नंगा हो गया।
उसके स्तन—भरे हुए, सूजे हुए, किसी देवी की मूरत जैसे—एकदम से सामने आ गए।
शेर [आंतरिक पुकार]: 'ओह... रब्बा... ये सपना तो नहीं है! ये सपना तो नहीं है!'
शेर जहाँ था वहीं जम गया, हाथ में पोंछा ढीला पड़ गया। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसकी साँस हलक़ में अटक गई, और दिल छाती में हथौड़े की तरह बजने लगा।
शेर [आंतरिक विचार]: 'इतना सुंदर... इतना भरा हुआ... इतना असली... मेरी गंदी सोच से भी कहीं ज़्यादा!'
वो सामने थे। गर्भावस्था की वजह से सूजे हुए। ग़ुरूर से भरे हुए। उस धीमी, दर्द भरी कशिश के साथ नीचे की ओर लटके हुए जो उसे पागल कर देती थी।
लेकिन क़यामत तो वो चूचियाँ थीं... वो दो उभार जो उसके ब्लाउज की क़ैद से आज़ाद हो गए थे। गहरे सुर्ख रंग की, जैसे जंगली बेर पक गए हों। सख्त... फूली हुई... नोक पर एक तनाव था, जिसे देखकर ही ज़बान सूख जाए। और उनका हल्का सा नीचे की ओर झुकाव... वो कोई झुकाव नहीं था, वो एक दावतनामा था। एक ख़ामोश पुकार थी।
शेर के दिमाग में उनकी आवाज़ गूंजने लगी।
शेर [आंतरिक संवाद]: 'ये तो बुला रही हैं... आ... आ और छू ले मुझे... अपनी हथेलियों में भर ले इनका बोझ... इन सख्त कलियों को अपने होंठों से चख ले...'
उसके दिमागी संतुलन का धागा चटक कर टूट गया।
शेर [आंतरिक चीख]: 'ये नज़ारा नहीं... ये दावानल है! ये एक ऐसी आग थी जो बाहर नहीं, मेरे अंदर लगी थी! मेरी रंगों में खून नहीं, खौलता हुआ लावा दौड़ने लगा था!'
शेर का मुँह हैरत और हवस से खुला का खुला रह गया... उसने थूक निगलने की कोशिश की। साँस जैसे फेफड़ों में ही जम गई थी।
मीरा ने चादर निकाली, और पल्लू ठीक करते हुए उठी। वह शेर की ओर पलटी, उसकी मुद्रा पूरी तरह से शांत और सहज थी।
मीरा: (उठते हुए, शांति से) "शेर, क्या हुआ? पोंछा रुक क्यों गया?"
शेर को जवाब देने में एक पल लगा। उसकी साँसें अभी भी तेज़ थीं, और आँखों में उस दर्शन का जलता हुआ निशान बाकी था।
शेर [आंतरिक विचार]: 'हाँ! पोंछा रुक गया है, क्योंकि अब हाथों का काम कुछ और करने को तड़प रहा है!'
उसकी हथेलियों में एक अजीब सी झनझनाहट होने लगी, एक ऐसी मीठी-मीठी तड़प कि बस... बस आगे बढ़कर उन दोनों भरे-भरे गोलों को थाम ले। उनका बोझ महसूस करें, उनकी गर्मी को अपनी उँगलियों में सोख ले, और फिर अपने अंगूठे को धीरे-धीरे उन सख्त चूचियों पर फिराए जब तक वो और तन न जाए। वो उस बदन को अपने बदन से लगाकर उसका स्वाद लेना चाहता था।
पोंछे का डंडा उसके हाथ में काँप रहा था।
मीरा: (नजदीक आकर, थोड़ा चिंतित होते हुए) "तुम ठीक हो, शेर? तुम्हारे हाथ काँप रहे हैं। तुम्हें शायद आराम की ज़रूरत है।"
उसके इस नज़दीक आने से शेर का दिमाग़ भभक उठा। उसके दिमाग़ में एक कमज़ोर सी आवाज़ चीखी,
"हट जा यहाँ से! पागल हो गया है क्या! पकड़ा जाएगा!"—लेकिन एक दूसरी, गहरी और ताक़तवर आवाज़ ने फुसफुसाया:
शेर [आंतरिक संवाद]: 'बस एक बार छूने से क्या होगा... किसी को पता नहीं चलेगा... बस एक उँगली...'
वो साँस नहीं ले पा रहा था। कुछ सोच नहीं पा रहा था। उसे बस अपनी भूख, अपनी हवस महसूस हो रही थी।
उसका औज़ार उसकी मोटी पैंट के कपड़े को फाड़ने के लिए तड़प उठा। वो दर्द कर रहा था, फड़क रहा था, और उसकी नोक पर हवस की एक बूँद चमक रही थी, जो उस खुरदुरे कपड़े में जज़्ब हो गई। वह अपनी इस बेकाबू तड़प से लड़ रहा था कि बस एक कदम आगे बढ़ जाए... बस इतना कि उसकी उँगलियाँ उस सुनहरी चमड़ी को छू सकें...
मीरा: (अब चिंतित होकर, उसे देखते हुए) "तुम सच में ठीक नहीं लग रहे। तुम जाओ और पानी पीकर आओ। मैं किसी और को बुला लूँगी।"
मीरा का दयालु स्पर्श उसे ब्रेक लगाने पर मजबूर कर गया। उसके अंदर बैठे शिकारी ने फुसफुसाया:
शेर [आंतरिक फ़ुसफुसाहट]: 'अभी नहीं... शिकार हमेशा सही वक़्त पर किया जाता है। ये फल अभी पेड़ पर है... इसे तोड़ने का मज़ा तब है जब ये खुद तेरी गोद में आकर गिरे।'
शेर ने एक गहरी साँस ली, जिससे उसका चेहरा शांत दिखाई दे।
शेर: (सामान्य होते हुए) "जी मेमसाहब, मैं ठीक हूँ। बस... ज़रा चक्कर आ गया था। मैं अभी बाल्टी में पानी बदल कर आता हूँ।"
वह तेज़ी से मुड़ा और बाल्टी उठाने के बहाने उस कमरे से लगभग भाग गया, ताकि उस हवस के तूफ़ान से कुछ देर के लिए दूर हो सके जिसने उसे जकड़ लिया था।
मीरा: (स्वयं से, मन ही मन) 'शेर को अचानक क्या हुआ? वह इतना खोया-खोया सा क्यों लग रहा था? चक्कर आने की बात तो कह रहा था, पर उसकी आँखों में वो कैसी अजीब सी चमक थी... जैसे वह यहाँ होकर भी कहीं और था।'
तभी मीरा ने महसूस किया कि काम के दौरान उसका भारी पल्लू पूरी तरह कंधे से सरक गया था। उसकी नीली ब्रा और उसके उभारों की गहराई साफ़ झलक रही थी। उसका दिल धक से रह गया।
मीरा: (चेहरे पर शर्म की लाली दौड़ गई, हड़बड़ी में पल्लू को वापस ठीक करते हुए) 'हे भगवान! मेरा पल्लू गिर गया था क्या... क्या शेर ने देख लिया? तभी वह इतना हड़बड़ा गया था? ओफ मीरा! तुम्हें अपनी हालत का ख्याल रखना चाहिए था। पर वह तो बेचारा सीधा-साधा नौकर है, शायद शर्म के मारे ही वहां से भाग खड़ा हुआ।'
कमरे के अंदर मीरा ने एक लंबी सांस ली।
मीरा: (खुद को समझाते हुए) 'शायद वह सच कह रहा था, गर्मी और थकान से उसे चक्कर आ गया होगा। बेचारा सीधा-साधा नौकर है, कितना ख्याल रखता है मेरा। मुझे ऐसी गंदी बातें नहीं सोचनी चाहिए। वह तो बस मदद कर रहा था।'
मीरा जिंदगी अब सरताज के इर्द-गिर्द घूमती थी। सरताज—वो आदमी जिसने उसे अंधेरे से बाहर निकाला था, जिसने उसके अतीत के हर जख्म को सींचा था, और जिसने उसे वो प्यार दिया था जो मीरा ने कभी सोचा भी नहीं था कि उसे मिलेगा। शादी के बाद से मीरा का हर पल सरताज के नाम था।
उसकी आंखों में सरताज की वो गहरी, सुरक्षित नजर थी। उसके स्पर्श में वो सुरक्षा थी जो मीरा को सालों बाद महसूस हुई थी। गर्भावस्था के इन महीनों में सरताज का ख्याल और भी ज्यादा था—वो रात को उसके पैर दबाता, सुबह उसे चाय बनाकर लाता, और हर छोटी-छोटी बात पर उसकी तारीफ करता। मीरा को लगता था कि उसकी दुनिया अब पूरी हो चुकी है—एक प्यार करने वाला पति, एक प्यारी बेटी ज्योति, और अब आने वाला ये नया बच्चा।
मीरा के लिए शेर सिर्फ एक नौकर था—एक भरोसेमंद, मेहनती मददगार जिसे चंदन ने भेजा था, और सरताज ने घर में जगह दी थी।। मीरा उसे देखती थी तो बस एक मुस्कान दे देती—वही मुस्कान जो वो किसी भी मेहनती इंसान को देती। कभी-कभी जब वो थक जाती, या कमर दर्द करती, तो वो शेर से कह देती, “शेर, जरा ये सामान उठा दो,” या “बाजार से ये ला दो।” और शेर हमेशा बिना किसी शिकायत के कर देता। मीरा को अच्छा लगता कि घर में एक ऐसा आदमी है जो इतनी आसानी से काम संभाल लेता है। वो सोचती, ‘बेचारा कितना मेहनती है। चंदन ने सही कहा था—ये भरोसेमंद है।’
रात को जब सरताज घर लौटा, मीरा ने उसे गले लगाया। सरताज ने उसके पेट पर हाथ रखा, बच्चे से बात की, और मीरा की कमर सहलाते हुए कहा,
सरताज: “आज कैसी रही तुम?”
मीरा: (मुस्कुराते हुए, सरताज के सीने से लगकर) “बहुत अच्छी। शेर ने आज ज्योति को अच्छे से संभाला। बेचारा दिन भर काम करता रहता है। तुमने सही चुना उसे।”
सरताज ने हंसकर कहा, “हां, चंदन ने कहा था वो ईमानदार है। तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए।”
मीरा ने सरताज के होंठों पर हल्का सा चुंबन दिया।
मीरा अंदाज़ा भी नहीं था कि वह शेर के सब्र की उस पतली दीवार को ढहाने के कितने करीब आ गई थी। शेर के लिए वह अब सिर्फ एक याद नहीं, बल्कि एक शिकार थी जिसे वह धीरे-धीरे अपनी बाहों के घेरे में खींच रहा था।
Deepak Kapoor
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