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Adultery हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)
#42
भाग ~ १३



तेल कंघी कर के और कपड़े वगैरह पहन कर मैं कमरे से बाहर निकला और चौके के पास जा कर बैठ गया। थोड़ी ही दूरी पर अनीता रसोई में खाना बना रही थी। मुझ पर नजर पड़ते ही उसने गुस्से से मुंह बना लिया।

इधर मेरी धड़कनें बढ़ी हुईं थी। अंदर घबराहट भी हो रही थी। मन में यही था कि अनीता कहीं मां को मेरी करतूत न बता दे। वैसे तो मां ज्यादातर मेरा ही पक्ष लेती थी लेकिन इस तरह की बात पर संभव था कि वो नाराज या गुस्सा हो जाए। ये सब सोच कर मैं फौरन उठा और रसोई में अनीता के पास गया।

"यहां क्यों आया है।" मुझे अपने पास आया देख वो नाराजगी दिखाते हुए बोली─"चला जा नहीं तो गरम गरम चिमटा छुआ दूंगी तुझे...बेशरम कहीं का।"

"माफ कर दे मुझे।" मैंने कान पकड़ कर उससे मिन्नत की─"मैं बस तुझे छेड़ रहा था। बाकी मेरा कोई गलत मतलब नहीं था।"

"मुझसे बात मत कर।" अनीता ने रोटी सेंकते हुए कहा─"तू बहुत कमीना है...बबलू की संगत में गंदी गंदी बातें सीख गया है तू। आने दे मां को...तेरी सारी करतूत बताऊंगी उसे।"

"मेरी प्यारी बहन....ऐसा मत करना मैं तेरे आगे हाथ जोड़ता हूं।" मैंने सच में अपने हाथ जोड़ लिए─"भगवान के लिए मां को कुछ मत बताना....नहीं तो बहुत मारेगी मुझे।"

"तू मार ही खाने के लायक है।" अनीता ने कहा─"जब तेरी अच्छे से कुटाई होगी तभी सुधरेगा तू।"

"कैसी बहन है तू।" मैंने मासूम सी शक्ल बना कर कहा─"क्या यही तेरा प्यार है। मां से मार खिला कर क्या तुझे खुशी होगी...बता।"

"तो क्यों ऐसा गंदा काम करता है तू।" अनीता ने मेरी तरफ पलट कर देखा। 

"नहीं करूंगा।" मैंने कान पकड़ लिए─"अब से ऐसा नहीं करूंगा...सच्ची में।"

अनीता अपलक देखने लगी मुझे। मैं पूरी तरह मासूम और बेचारा वाली शक्ल बनाए उसे ही देख रहा था। दोनों हाथों से अब भी अपने कानों को पकड़ रखा था मैंने।

"बस इस बार माफ कर दे मुझे।" मैंने फिर मिन्नत की─"देख तुझसे बड़ा हूं फिर भी तेरे आगे हाथ जोड़ रहा हूं...तेरे पांव पड़ रहा हूं...तुझसे मिन्नतें कर रहा हूं। इस बार माफ कर दे...अगली बार से ऐसा नहीं करूंगा।"

"सच कह रहा है न।" अनीता ने संदेह की दृष्टि से देखा मुझे।

"तेरी कसम।" मैंने झट उसके सिर पर हाथ रख दिया─"तू जानती है कि मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूं इस लिए तेरी झूठी कसम नहीं खा सकता।"

"ठीक है।" अनीता ने सामान्य हो कर कहा─"अब दुबारा ऐसा न करना। चल जा बैठ जा वहां पर।"

"तूने माफ कर दिया न मुझे।" 

"हां माफ कर दिया।"

"अब मां को नहीं बताएगी न।"

"हां नहीं बताऊंगी...जा अब।"

"तू कितनी अच्छी है बहन है मेरी।"

"हां वो तो मैं हूं।"

"तू सच में मुझसे बहुत प्यार करती है।"

"हां तू मेरा भाई जो है।"

"मैं भी तुझसे बहुत प्यार करता हूं।"

"हां ठीक है...अब जा रोटियां बनाने दे मुझे।"

"तुझे पता है मेरा क्या मन कर रहा है।"

"क्या मन कर रहा है तेरा।" अनीता ने सवालिया भाव से मुझे देखा।

"मेरा मन कर रहा है....मेरा मन कर रहा है कि मैं अपनी इस प्यारी बहन का गाल चूम लूं।" मैंने कहा और झट से उसका चेहरा थाम कर सच में उसका दाहिना गाल चूम लिया।

"अरे...ये क्या कर रहा है तू।" अनीता बुरी तरह हड़बड़ा गई। 

"अपनी प्यारी बहन को प्यार कर रहा हूं।"

"कर लिया न....अब जा यहां से।" अनीता ने चिमटे से उस जगह इशारा किया जहां मैं रसोई में आने से पहले बैठा था।

"तू भी कर न।" मैंने मासूम सी शक्ल बना के उसको देखा─"तू भी मेरा गाल चूम न।"

"राजू अब बस कर न।" अनीता ने परेशान हो कर कहा─"क्यों तंग कर रहा है मुझे।"

"कहां तंग कर रहा हूं तुझे।" मैंने भोलापन दिखाया─"गाल चूमने को ही तो बोल रहा हूं तुझे।"

"मुझे नहीं चूमना तेरा गंदा गाल।" अनीता ने चिढ़ कर कहा─"अब जा यहां से नहीं तो सच में गरम गरम चिमटा छुआ दूंगी। फिर रोते हुए भागेगा यहां से।"

"हां ठीक है छुआ दे चिमटा।" मैंने रूठ जाने वाली शक्ल बना कर कहा─"पर मैं तब तक नहीं जाऊंगा जब तक तू भी मेरा गाल नहीं चूमेगी।"

अनीता असहाय भाव से देखने लगी मुझे। वो सच में अब परेशान हो चुकी थी मुझसे। उसके चेहरे पर नाराजगी और गुस्सा साफ देखा जा सकता था। फिर उसने आँखें बंद कर के दो तीन गहरी सांस ले कर अपना गुस्सा शांत किया।

"अच्छा..तेरा गाल चूम लूंगी तो चुपचाप चला जाएगा न यहां से।" फिर आँखें खोल कर उसने मुझसे कहा।

"हां...पक्का चला जाऊंगा।"

अनीता थोड़ा आगे सरकी और फिर मेरे बाएं गाल को धीरे से चूम लिया। उसके गुलाब की पंखुड़ियों जैसे कोमल होठों का स्पर्श महसूस करते ही मेरे पूरे बदन में झुरझुरी सी हुई। 

"तेरे होंठ कितने कोमल हैं अनीता।" जैसे ही वो मेरा गाल चूम कर पीछे सरकी तो मैंने मुस्कुरा कर कहा।

"ह..हां अब जा तू यहां से।" मेरी बात सुनते ही वो थोड़ा लजा गई─"मुझे अब रोटी बनाने दे। मां बापू के आने का समय हो रहा है।"

मैंने भी अब उसे परेशान करना ठीक नहीं समझा। इस लिए मुस्कुराते हुए वापस आ कर अपनी जगह पर बैठ गया। मैंने देखा अनीता मंद मंद मुस्कुरा रही थी। पता नहीं क्या चल रहा था उसके मन में।

#########

दोपहर खा पी कर मैं घर के बाहर खाट बिछा कर लेटा हुआ था। बाहर थोड़ी अच्छी हवा चल रही थी जिससे गर्मी से राहत महसूस हो रही थी। मां ने कहा था कि थोड़ी देर आराम कर ले फिर अनीता को ले कर खेतों पर चले जाना। 

खाट पर लेटा मैं उस सबके बारे में सोच रहा था जो कल से ले कर अब तक घटा था। खाते समय एक बार बबलू आया था मेरे घर। उसने मुझे नदी पर नहाने चलने को कहा था लेकिन मैंने उसे बता दिया था कि मैं घर पर ही नहा चुका हूं और अब खाने के बाद थोड़ा आराम कर के खेत चला जाऊंगा। आम तौर पर मैं उसके साथ ही अपना ज्यादातर समय बिताता था लेकिन कल से उसके साथ रहने का कोई अवसर ही नहीं मिला था मुझे। दूसरी बात मेरी खुद भी इच्छा नहीं हो रही थी उसके साथ कहीं खेलने जाने की। मुझे नहीं पता ऐसा क्यों था मगर सच यही था।

खैर खाट पर लेटा मैं यही सोच रहा था कि अचानक से कितना कुछ बदल गया है। मैं इस बदलाव को महसूस भी कर रहा था तभी तो इस सबके बारे में इतना सोच रहा था। मैं सोच रहा था कि कैसे कल मैंने खेत वाले मकान में बापू और मंजू काकी को चुदाई करते देखा और फिर कैसे उसके बाद मैंने काकी से उस सबके बारे में पूछा। कैसे काकी ने बापू के साथ अपने इस नाजायज रिश्ते के बारे में सब कुछ बताया। उसके बाद कैसे कल रात मंजू काकी ने अपने घर में मेरे लंड की मुट्ठ लगाई। 

मैंने कभी सपने में भी इस सबके बारे में कल्पना नहीं की थी। इतना ही नहीं अनीता और मेरे साथ भी कुछ ऐसा घटा जो घटता तो पहले भी थोड़ा बहुत था लेकिन उसके बारे में हम दोनों ने ही कभी ध्यान नहीं दिया था। बात अगर यहीं खत्म हो जाती तो शायद इसे भुला भी दिया जाता मगर कल से अब तक मेरे और अनीता के बीच कई ऐसी बातें और घटनाएं हो चुकीं थी जिसके कारण अब इसे आसानी से भुलाया नहीं जा सकता था।

मैं सोचने लगा कि जब मैं नहीं भुला पा रहा हूं तो शायद अनीता भी नहीं भुला पा रही होगी। एक पल के लिए मान भी लूं कि वो इस सबके बारे में ज्यादा ध्यान नहीं दे रही होगी लेकिन ये नहीं माना जा सकता कि उसे ये सब किसी पल याद न आता होगा। तो जब याद आता होगा तब तो वो इस बारे में सोचती ही होगी। सवाल यही है कि आखिर वो इस सबके बारे में क्या सोचती होगी। मैंने बहुत सोचा मगर कुछ समझ न आया। 

अचानक मुझे याद आया कि आज नदी में मेरे कहने पर वो अपने प्यार को साबित करने के लिए कुर्ता उतारने लगी थी। अगर मैंने उसे रोका न होता तो पक्का कुर्ता उतार कर वो ऊपर से नंगी हो जाती। उस वक्त...उस वक्त जरूर उसके मन में बहुत कुछ चलता रहा होगा। हालांकि बाद में मेरे रोक देने पर वो मुझसे लिपट कर रोने ही लगी थी और पूछने पर बताया भी था उसने कि अगर मैं उसे न रोकता तो उसे ऐसा लगता जैसे उसका कुछ बिगड़ गया है। 

मैं सोचने लगा कि आखिर क्या बिगड़ जाने की बात कह रही थी वो। इस बारे में भी मैंने बहुत सोचा मगर कुछ समझ न आया। उसके बाद घर के पीछे कुएं में तो मैंने हद ही कर दी थी। लुंगी खोल कर उसको अपना लंड ही दिखा दिया था मैंने। मुझे पता है कि उसको मुझसे ऐसा कर देने की जरा भी उम्मीद नहीं रही होगी...शायद इसी लिए वो गुस्सा हो गई थी और रसोई में भी गुस्से से वो सब कहा था मुझसे। वो तो अच्छा हुआ कि मैंने मिन्नतें कर के उसे बहला फुसला लिया था वरना उसके बता देने से मां के द्वारा मेरी पिटाई होना निश्चित था।

खैर जो भी हो ये तो पक्की बात है कि कुएं में मेरा लंड देखने के बाद अपने सामने उसने जरूर बहुत कुछ सोचा होगा। आश्चर्य तो उसे कुएं पर ही बहुत हुआ था....ठीक वैसे ही जैसे मंजू काकी को मेरा लंड देख के हुआ था। इसका मतलब काकी की तरह अनीता ने भी मेरे पास इतना बड़ा लंड होने की उम्मीद नहीं की रही होगी।

"चल राजू...उठा जा।" तभी मेरे कानों में अनीता की आवाज पड़ी─"खेत नहीं चलना क्या तुझे।"

मैंने झट से आँखें खोल कर उसकी तरफ देखा। नहाने के बाद उसने जो कपड़े पहने थे वो इस वक्त उसके बदन में नहीं थे। शायद खेत में गहाई करने का सोच कर उसने फिर से कपड़े बदल लिए थे।

"मां बापू चले गए क्या।" मैंने उठते हुए पूछा।

"अभी नहीं।" अनीता ने बताया─"वो बाद में आएंगे।" 

"ठीक है।" मैंने खाट से उतर कर कहा─"लेकिन यार धूप बहुत है।"

"रुक मैं तेरे लिए बापू की कोई पुरानी साफी ले कर आती हूं।" अनीता ने कहा─"उसे सिर पर बांध लेगा तो सिर में धूप नहीं लगेगी।"

"हां ये ठीक रहेगा।" मैंने मुस्कुरा कर कहा─"मेरी बहन तो सच में मुझे बहुत प्यार करती है। तभी तो मेरी सेहत का खयाल है तुझे।"

"चल अब तू बातें न बना।" अनीता थोड़ा शर्मा कर बोली─"तू बैठ...मैं आती हूं साफी ले कर।"

मैं वापस खाट पर बैठ गया। मैं उसे ऐसा बोलना नहीं चाहता था मगर जाने क्यों उसकी बात सुन कर मेरे मन में ऐसा बोल देने का कीड़ा कुलबुला उठा था। खैर थोड़ी ही देर में वो साफी ले कर आ गई।

"ये ले बांध ले सिर पर।" 

मैंने उससे साफी ली और उसे सिर पर बांधने लगा। वो मुझे ही देख रही थी। मेरे मन में फिर से शरारत सूझी।

"ऐसे क्या देख रही है।" मैंने उसे छेड़ा─"खा तो नहीं जाएगी मुझे।"

"तुझ कड़वे करेले को कौन खाएगा।" उसने बुरा सा मुंह बना कर कहा।

"तेरे सिवा कौन खा सकता है भला।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा─"वैसे मेरे पास एक खाने वाली चीज है....खाना हो तो बता।"

"क्या सच में।" अनीता एकदम से खुश हो कर बोली─"क्या लाला की दुकान से कुछ खरीद के लाया है। मुझे भी दे न।"

मैं उसकी बात सुन कर जोड़ों से हंसने लगा। मुझे ये सोच के हंसी आई कि मैं उसे बता कुछ और रहा था और वो समझ कुछ और रही थी और अब मांग भी रही थी मुझसे।

"ऐसे हंस क्यों रहा है तू।" मुझे हंसता देख अनीता ने आँखें सिकोड़ कर मुझे देखा।

"बस ऐसे ही....जाने दे।" मैंने उसे बताना बिल्कुल भी ठीक नहीं समझा वरना एक ही पल में शामत आ जाती─"चल अब खेत चलते हैं।"

"अगर कुछ खरीद कर लाया है तो मुझे भी दे न।" अनीता मेरे साथ चलती हुई मासूमियत से बोली।

अब मैं उसे कैसे बताता कि मेरे पास जो चीज है वो लाला के दुकान से खरीदी हुई नहीं है बल्कि मेरी अपनी है। मगर उसे तो ऐसा ही लग रहा था और अब अगर मैं उसे नहीं दूंगा तो वो नाराज हो जाएगी मुझ पर। वैसे भी लंड दिखाने वाले कांड से वो गुस्सा हो गई थी और अब फिर से कोई नया कांड कर देना मेरी सेहत के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं हो सकता था। 

"जो लाया था उसे तो मैंने खा लिया है।" मैंने उससे कहा─"पर तू बता क्या खाएगी। मैं अभी लाला की दुकान से खरीद दूंगा तुझे।"

"सच में????"

"हां सच में।" मैंने कहा─"तू मेरी प्यारी बहन है तो तेरे लिए कुछ भी खरीद दूंगा...पर तू भी उतनी ही बड़ी चीज खरीदने को कहना जिसे मैं खरीद सकूं।"

"मुझे कोई बड़ी चीज नहीं चाहिए।" अनीता ने अपनी ईमानदारी दिखाई─"तू मुझे बस मिट्ठी गोली खरीद दे।"

"ठीक है आ जा फिर।"

मैं उसे लिए जल्दी ही लाला की दुकान पर पहुंच गया। वहां से मैंने आठ आने की मिट्ठी गोली खरीदी और एक रुपए में नमकीन और गुड़ खरीदा। 

"नमकीन गुड़ क्यों लिया तूने।" रास्ते में अनीता ने पूछा─"और तेरे पास इतने पैसे कहां से आए।"

"मझले काका ने एक दिन दो रुपए दिए थे मुझे।" मैंने बताया─"उसमें से आठ आने की एक दिन मैंने लाला की दुकान से मिट्ठी गोली खरीद के खा ली थी। बाकी ये बचे थे तो आज ये ले लिया।"

"मुझे भी नमकीन गुड़ देगा न।" अनीता ने बड़ी उम्मीद से मेरी तरफ देखा।

"अरे सिर्फ अपने लिए थोड़ी खरीदा है मैंने।" मैंने कहा─"तेरे लिए भी खरीदा है। खेत में हम दोनों साथ में खाएंगे....ठीक है न।"

"हां" अनीता खुशी से बोली।

कुछ ही देर में हम दोनों खेतों पर पहुंच गए। खेतों पर इस वक्त हम दोनों के सिवा कोई नहीं था। काका लोग और दोनों काकी घर गई हुई थीं। मैं और अनीता मकान के बाहर ही नीम के पेड़ के पास जा कर बैठ गए।

"अरे राजू।" हम बैठे ही थे कि अचानक उठ कर अनीता बोली─"बापू ने कहा था कि आमों की तरफ जा के भी देख लेना कि कहीं कोई अमियाँ तोड़ने तो नहीं आया।"

"अच्छा...चल फिर जल्दी।" मैं फौरन उठ कर बोला─"वहीं पेड़ों की छांव में बैठ कर नमकीन गुड़ खाएंगे।"

हम दोनों तेजी से आमों की तरफ चल पड़े। हमारे खेतों के एक तरफ आमों के सात आठ पेड़ थे। थोड़ी ही दूरी पर नदी थी। हम जल्दी ही आम के पेड़ों के पास पहुंच गए। पेड़ों की छांव में आए तो ठंडी हवा लगी जिससे मन प्रसन्न हो गया।

"तू उस तरफ देख जा के।" मैंने अनीता से कहा─"और मैं इस तरफ देख लेता हूं।"

"ठीक है।"

हम दोनों अपनी अपनी तरफ के पेड़ों का घूम घूम कर मुआयना करने लगे। कोई नहीं था यहां। इस लिए हम दोनों एक पेड़ के नीचे थोड़ा साफ कर के बैठ गए।

"नमकीन गुड़ के साथ अगर अमिया भी खाएं तो और भी अच्छा स्वाद आएगा।" अनीता ने कहा─"वैसे भी मुझे अमिया बहुत अच्छी लगती हैं...रुक मैं अभी थोड़ी बड़ी बड़ी अमिया तोड़ती हूं।"

कहने के साथ ही अनीता झट से उठी और पेड़ों पर नजर घुमाने लगी। उसके साथ मैं भी उठ गया था और उसी के जैसे पेड़ों पर अमिया देखने लगा था।

"राजू वो देख।" अनीता ने एक डाली की तरफ इशारा किया─"उस डाल पर बड़ी बड़ी अमियों का गुच्छा लगा है।"

"हां तो तोड़ ले न उसे।" मैंने कहा।

अनीता ने आगे बढ़ कर उस गुच्छे की तरफ हाथ बढ़ाया मगर गुच्छा उसकी पहुंच से दूर था। उसने उछल कर उस गुच्छे को पकड़ने की कोशिश की मगर गुच्छा तब भी दूर था।

"ये तो मेरे हाथ में ही नहीं आ रहा।" फिर उसने हताश हो कर मेरी तरफ देखा─"तू कद में मुझसे बड़ा है...तू देख भला।"

मैं आगे बढ़ा और अमिया को तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाया मगर समझ आया कि वो गुच्छा मेरी पहुंच से भी दूर है। मैंने उछल कर तोड़ने की भी कोशिश की मगर उस तक नहीं पहुंचा।

"कोई दूसरी अमिया देख के यार।" मैंने हार मान कर कहा─"ये मेरे पहुंच से भी दूर है।"

"पर इस गुच्छे की अमिया बाकियों से बड़ी हैं राजू।" अनीता ने कहा।

"पत्थर से निशाना लगाऊं क्या इन्हें।" मैंने कहा।

"नहीं राजू...ऐसे में पत्थर लगने से ये कुचल जाएंगी।"

"फिर तो यही रास्ता है कि जो पास में हैं उसी को तोड़ लेते हैं।" 

"नहीं...मुझे यही वाली अमिया चाहिए।" अनीता ने जैसे जिद कर ली─"अरे हां...एक काम तू मुझे ऊपर उठा दे तो मैं तोड़ लूंगी इस गुच्छे को।"

"पागल है क्या।" मैंने उसे घूरा─"तू इतनी भारी है...मैं कैसे उठा पाऊंगा तुझे।"

"ज्यादा बकवास न कर।" अनीता ने आँखें दिखाई─"तुझसे तो हल्की ही हूं। चल अब देर न कर....उठा मुझे।"

अनीता मेरी तरफ पीठ कर के उस गुच्छे के नीचे खड़ी हो गई थी और सिर ऊपर कर के गुच्छे को देखने लगी थी। मैं मजबूरन आगे बढ़ा और पीछे से झुक कर दोनों हाथों से उसकी टांगों को समेटा और जोर लगा कर उसे ऊपर उठाना शुरू कर दिया।

"रु...रुक रुक...अरे रुक जा राजू।" अभी मैंने थोड़ा सा ही उठाया था कि अनीता ने घबरा कर कहा।

"अब क्या हुआ।"

"मुझे आगे से उठा न।" उसने कहा─"ताकि ऐसे में मैं गिरूं न और सहारे के लिए हाथों से तुझे पकड़ सकूं।"

मैं घूम कर उसके सामने आया और झुक कर फिर से उसकी टांगों को समेट लिया। उसके बाद जोर लगा कर उसे उठाना शुरू किया। अनीता ने खुद को गिरने से बचाने के लिए अपने दोनों हाथ मेरे कंधों पर रख लिए। सच कह रही थी वो...भारी नहीं हल्की ही थी वो। मैंने बड़े आराम से उसको उठा लिया था।

"थोड़ा और ऊपर राजू।" तभी उसने कहा─"हां हां बस बस।"

"पकड़ में आ गया न गुच्छा।" मैंने पूछा। 

उसको दोनों हाथों से जकड़े था मैं और मेरा चेहरा उसके पेट को छू रहा था इस लिए मैं ऊपर नहीं देख पा रहा था।

"हां पकड़ लिया मैंने।" ऊपर से अनीता ने बताया─"तू बस इतने में ही मुझे पकड़े रह।"

"जल्दी तोड़ ले उसे।"

अनीता हल्की तो थी और मुझे उसको उठाए रखने में ज्यादा मेहनत भी नहीं पड़ रही थी लेकिन उसके पेट से मेरा चेहरा बार बार टकरा जा रहा था जिससे मुझे अजीब सा महसूस होने लगा था। अचानक ही मेरे मन में अजीब अजीब से खयाल आने लगे थे।

"तोड़ लिया मैंने।" तभी ऊपर से अनीता ने कहा─"अब धीरे धीरे नीचे उतार मुझे।"

मैंने ऐसा ही किया। वो धीरे धीरे मेरे द्वारा पकड़ ढीली कर देने से नीचे सरकने लगी। इसके साथ ही मेरा चेहरा उसके पेट से होते हुए ऊपर उसकी छातियों के उभारों से टकराया तो मुझे एकदम मुलायम और सुखद अनुभूति हुई। जैसे ही मुझे खयाल आया कि ये उसकी छातियां हैं तो मेरी धड़कनें तेज हो गईं। उसकी दोनों छातियों के बीच मेरा मुंह और नाक था। अपने चेहरे पर मुझे मुलायम और थोड़ी गर्म सी चीज महसूस हुई और मेरी सांसें थम सी गईं। पता नहीं क्या हुआ मुझे कि मैंने उसकी एक छाती पर मुंह दबा दिया। उफ्फ कितना मुलायम था उसका दूध। अपने होठों पर मुझे उसका छोटा सा निप्पल भी महसूस हुआ।

"क्या कर रहा है राजू।" तभी अनीता धीरे से सिसकी─"गिरा देगा क्या मुझे।"

"ऐसे कैसे गिर जाएगी तू।" मैंने उसकी उस छाती से फौरन मुंह हटा कर कहा─"तू मेरी प्यारी बहन है तो कैसे गिरा सकता हूं तुझे।"

कुछ ही पलों में मैंने उसे नीचे खड़ा कर दिया। अनीता ने अमिया का गुच्छा लिए एक बार मुझे देखा फिर बोली─"देख बाकी अमिया से बड़ी हैं न ये अमिया।"

"हां सही कह रही है तू।" मैंने ये सोच कर राहत की सांस ली कि उसे मेरी करतूत का पता नहीं चला─"चल अब जल्दी से नमकीन गुड़ खाते हैं। अगर घर वाले आ गए तो गड़बड़ हो जाएगी।"

"हां चल जल्दी खा लेते हैं।"

हम दोनों वापस उसी जगह पर आ गए जिस जगह पर पहले साफ कर के बैठे थे। अनीता ने गर्मी लगने के कारण अपना दुपट्टा पेड़ की जड़ में रख दिया और झट बैठ गई। बैठते वक्त जब वो झुकी थी तो उसके कुर्ते का गला आगे की तरफ फैल गया था जिसके अंदर उसकी छातियां कुछ पलों के लिए मुझे साफ दिखीं थी। कुर्ते के अंदर सफेद कमीज पहने थी वो। झुकने से कुर्ते के साथ वो भी थोड़ा फैल गई थी और मुझे उसकी आधी चूचियों के दर्शन हो गए। पलक झपकते ही मेरे पूरे जिस्म में झुरझुरी दौड़ गई थी।

"खड़ा क्यों है तू।" तभी अनीता ने मेरा ध्यान भंग किया─"जल्दी बैठ न।"

मैं झट उसके सामने बैठ गया। नमकीन गुड़ मैंने पहले ही पेड़ की जड़ में रख दिया था जिसे अनीता ने कागज खोल कर बाहर निकाल दिया था। दूसरे कागज में नमकीन थी जिसे उसने गुड़ की ही तरह कागज खोल के फैला दिया था। नमकीन गुड़ देख अनीता का चेहरा खुशी से चमक रहा था। मैं बार बार उसे ही देखने लगता था। आज से पहले भी मैं उसे देखता आया था लेकिन आज वो मुझे अलग ही दिख रही थी। 

मैं बार बार ये भूल जाता था कि वो मेरी वही बहन है जिससे मैं कल तक झगड़ा करता आया था। हमारा आपस में कभी नहीं बनता था। हर दिन हर वक्त उससे मेरा झगड़ा होता था मगर आज मेरा उससे झगड़ा करने का बिल्कुल भी मन नहीं कर रहा था। पहले जब उस पर नजर पड़ती थी तो मेरी यही कोशिश रहती थी कि उसे तंग करूं...उसे परेशान करूं....या फिर उसे पीट दूं मगर आज ऐसा करने का मन ही नहीं कर रहा था। बस यही मन कर रहा था कि उसे चुपचाप देखता रहूं। वो मुझसे किसी भी बात पर नाराज न हो। मैं समझ नहीं पा रहा था कि मेरा मन ऐसा क्यों कर रहा था।

"अब तू टुकुर टुकुर मुझे क्यों देख रहा है।" अनीता एकदम से बोली तो मैं चौंक पड़ा─"खाता क्यों नहीं...या चाहता है कि सारा मैं ही खा लूं। अगर ऐसा तो ठीक है...मैं सारा नमकीन गुड़ खा लेती हूं...फिर न कहना मुझे....हां।"

"ठीक है तू ही खा ले सारा।" मैं मुस्कुरा कर बोल पड़ा।

ये सुन कर उसने हैरानी से मुझे देखा। मुंह में नमकीन गुड़ चबा रही थी वो मगर मेरी बात सुनते ही उसका चबाना रुक गया।

"क्या तू सच कह रहा है।" फिर उसने उसी हैरानी से कहा─"मतलब सच में मैं ये सब अकेले खा लूं।"

"हां खा ले न।" मैंने मुस्कुरा कर ही कहा।

"मैं सच में खा लूंगी।" अनीता को अब भी यकीन नहीं हो रहा था─"फिर बाद में न बोलना कि मुझे नहीं बचाया।"

"हां नहीं बोलूंगा।" मैंने कहा─"तू सारा खा ले।"

अनीता बड़ा हैरान हुई कि ऐसा क्यों कह रहा हूं मैं। उसके चेहरे पर हैरानी के साथ साथ उलझन के भाव भी उभर आए।

"तेरी तबियत तो ठीक है न राजू।" फिर उसने कहा─"आज तू अजीब बर्ताव कर रहा है मेरे साथ।"

"अब मैंने क्या किया।" मैंने कहा─"तू मेरी प्यारी बहन है....बता ही चुका हूं कि तुझे बहुत प्यार करता हूं मैं। इसी लिए कह रहा हूं कि तू सारा खा ले...मैं कुछ नहीं कहूंगा।"

"आज से पहले तो कभी ऐसा नहीं कहा तूने।" अनीता ने मासूमियत से कहा।

"हां सही कहा।" मैंने कहा─"आज से पहले इस लिए नहीं कहा क्योंकि तब मुझे एहसास नहीं था कि हम दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। आज जब श्यामू काका ने हमें समझाया तो समझ आया कि सच में हमारा झगड़ना एक तरह का प्यार ही है। तो जब वो झगड़ना प्यार है तो बिना झगड़ा किए ही प्यार से रहें तो कितना अच्छा होगा...है न।"

"हां सही कह रहा है तू।" अनीता ने अब आराम से नमकीन गुड़ चबाते हुए कहा─"हमें एक दूसरे से लड़ना नहीं चाहिए। हमारे झगड़ने से मां को कितना चिल्लाना पड़ता है।"

"सही कहा तूने।" मैंने सिर हिलाया─"इस लिए मैंने सोचा है कि अब से यही कोशिश करूंगा कि मैं तुझसे झगड़ा न करूं बल्कि तू मुझसे छोटी है तो तुझे बस प्यार करूं और जो मैं अपने लिए दुकान से खरीद के लाऊं वो तुझे भी खुशी से खिलाऊं। ये ठीक रहेगा न।"

"हां इससे अच्छा तो कुछ हो ही नहीं सकता।" अनीता ने खुश हो कर कहा─"अगर तू सच में ऐसा करेगा तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा और हां...मैं भी ऐसा ही करूंगी...पक्का।"

"एक बात और।" मैंने कुछ सोच कर कहा─"तुझे तो पता है कि मैं थोड़ बुद्धू हूं इस वजह से मैं कभी कभी जाने अंजाने कुछ गलत कर बैठता हूं। तो अगर मुझसे कभी ऐसा हो जाए तो तू मुझसे नाराज न होना और न ही गुस्सा करना। अगर तुझसे कोई गलती हो जाएगी तो मैं भी तुझ पर गुस्सा नहीं करूंगा। हम दोनों के बीच की बात सिर्फ हमारे ही बीच में रहेगी। उसमें मां बापू को बता देने वाली बात नहीं होगी....क्या कहती है।"

"ठीक है....मुझे मंजूर है।" अनीता ने कुछ पल सोचा फिर झट से सहमति दे दी।

"चल अब जल्दी जल्दी खा ले।" मैंने कहा─"मां बापू आते ही होंगे।"

"तू भी खा न।" 

अनीता ने कागज से नमकीन और गुड ले कर मेरे मुंह की तरफ बढ़ाया तो मैंने मुस्कुराते हुए मुंह खोल दिया। मुझे खिला कर वो थोड़ा मुस्कुराई और मुंह चलाने लगी।

"रुक मैं भी तुझे खिलाता हूं।" 

कहने के साथ ही मैंने कागज से थोड़ी नमकीन और थोड़ा गुड़ लिया। फिर उसे अनीता के मुंह की तरफ बढ़ाया तो उसने भी मुस्कुरा कर मुंह खोल दिया।

"अरे तू तो मुझसे भी ज्यादा मुंह फाड़ती है रे।" ये कहते हुए मैंने उसे छेड़ा तो उसने आँखें दिखाई मुझे। 

मुंह में नमकीन गुड़ भर गया था इस लिए फौरन वो कुछ बोल न सकी थी। 

"अरे मैं तो छेड़ रहा था तुझे।" मैंने उसके गाल को हल्के से सहला कर कहा─"तू आराम से खा।"

"अच्छा सुन।" जब उसका मुंह थोड़ा खाली हुआ तो उसने कहा─"क्या तू मेरी एक बात मानेगा।"

"हां बोल न।"

"तू न...उस बबलू के साथ मत रहा कर।" अनीता ने कहा─"मुझे वो अच्छा नहीं लगता। वो अच्छा लड़का नहीं है।"

"उसने तुझे कुछ बोला क्या।" मैंने चौंक कर उसे देखा। मेरे मन में पलक झपकते ही अनेकों खयाल उभर आए थे।

"नहीं...उसने कहा तो कुछ नहीं।" अनीता ने फिर से हाथ में नमकीन गुड़ ले कर मेरे मुंह की तरफ बढ़ाया जिसे मैंने मुंह खोल कर अंदर ले लिया। उधर अनीता ने खिलाने के बाद आगे कहा─"लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि वो अच्छा लड़का नहीं है।"

"ऐसा कैसे कह सकती है तू।" मैं सोच में पड़ गया।

"क्योंकि तू उसकी संगत में ही बिगड़ रहा है।" अनीता ने जैसे खुल कर बताने का सोच लिया─"पहले तू ऐसा नहीं था मगर अब गंदी हरकतें करने लगा है।"

मैं समझ गया वो किस बारे में बोल रही है। इस लिए इस बार मैं कुछ बोल न सका।

"देख राजू...मैं उमर में तुझसे छोटी हूं इस लिए अच्छा नहीं लगता कि मैं तुझे कोई बात समझाऊं।" अनीता थोड़ा गंभीर हो कर बोली─"मैं तुझे इसी लिए कुत्ता कमीना कहती थी क्योंकि तू उस बबलू के साथ रहता है और वो अच्छा लड़का नहीं है।"

"ठीक है अब से नहीं रहूंगा उसके साथ।" मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा।

"तू भी जानता है कि मां तुझसे कितना प्यार करती है।" अनीता ने कहा─"तेरी गलती होने पर भी वो हमेशा मुझे ही डांटती है इस लिए तुझे भी ऐसा काम करना चाहिए जिससे मां को तेरे किसी काम से या तेरी किसी हरकत से बुरा न लगे।"

"हां मैं समझता हूं ये बात।" मैं ये सोच के अंदर ही अंदर थोड़ा हैरान हुआ कि अनीता कितनी समझदारी की बातें कर रही है मुझसे। मैं तो अब तक यहीं समझता था कि मेरी तरह वो भी भोली और नादान है।

"और हां...मुझे भी ये देख के अच्छा लगेगा कि मेरा भाई ऐसे गंदे लड़के का साथ नहीं करता।" अनीता ने फिर से मुझे खिला कर कहा─"तू मेरी ये बात मानेगा न राजू।"

"तूने इतना प्यार से कहा है तो जरूर मानूंगा।" मैंने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा─"पर उसके अलावा मेरी किसी और से ऐसी दोस्ती नहीं है तो फिर किसके साथ खेलने जाऊंगा।"

"अब तू छोटा बच्चा नहीं रहा जो इस तरह खेलने जाए।" अनीता ने कहा─"अब तू बड़ा हो गया है इस लिए बापू और काका लोगों की तरह खेतों में काम कर सकता है। खाली समय में घर में ही हम कोई खेल खेल कर समय बिता सकते हैं।"

"हां ये भी ठीक कहा तूने।" मैंने सिर हिलाया─"तो फिर ठीक है....अब से मैं ऐसा ही करूंगा। मैं रोज काका लोगों के साथ खेतों में काम करूंगा और जब समय मिलेगा तो घर में तेरे साथ खेलूंगा।"

"हम दोनों चंदा खेला करेंगे।" अनीता ने खुश हो के कहा─"मैं तुझे चंदा में रोज हराऊंगी।"

"अरे कभी कभी मुझे भी जिता देना।" मैं मुस्कुरा उठा─"वरना फिर मैं नहीं खेलूंगा।"

"अच्छा चल ठीक है।" अनीता हंस पड़ी─"चार बार जब मैं जीतूंगी तो एक बार तुझे भी जिता दूंगी।"

"मेरी प्यारी बहन ऐसा करेगी मेरे साथ।" मैंने मासूम सी शक्ल बनाई।

"तुझसे छोटी हूं तो इतना तो हक बनता है न मेरा।" अनीता शेखी से मुस्कुराई।

अभी मैं कुछ बोलने ही वाला था कि तभी बापू की आवाज सुनाई दी मुझे। अनीता ने भी उनकी आवाज सुनी।



जारी है................
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हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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RE: हवस और नादानियां ~ (आप-बीती) - by Rajan Raghuwanshi - 16-01-2026, 07:56 AM



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