16-01-2026, 07:35 AM
भाग ~ १२
उस वक्त दोपहर हो चुकी थी जब मां खलिहान में हमारे पास पहुंची। आते ही उसने अनीता से कहा कि वो घर जा कर फटाफट खाना बनाए। तब तक उसकी जगह दशरथ काका बैलों को हाँकेंगे।
अनीता बैलों के पीछे पीछे चलते हुए थक चुकी थी इस लिए जैसे ही मां ने उसे घर जाने को कहा तो वो खुश हो गई और साथ ही मेरी तरफ देख कर मुझे ये सोच के चिढ़ाया कि ले तू ऐसे ही लगा रहेगा अब।
"तू अपनी बहन के साथ जा करेजा।" तभी श्यामू काका ने मुझसे कहा─"नहा धो के और खा पी के बाद में बिटिया के साथ ही वापस आ जाना।"
काका की ये बात सुनते ही जहां अनीता का चेहरा उतर गया वहीं मैं हंस पड़ा। खैर मैं और अनीता घर की तरफ चल पड़े। मेरी जगह बैलों को हांकने का काम अब श्यामू काका खुद ही करने लगे थे।
"हाय आज कितनी गर्मी है।" रास्ते में अनीता अपने दुपट्टे से चेहरे और गले का पसीना पोंछते हुए बोली─"मैं तो पूरा भीग गई हूं। पूरे शरीर में किसकिसी हो रही है।"
"सही कहा...गर्मी तो आज है ही।" मैंने सिर हिला कर कहा─"चल नदी में नहाने चलते हैं।"
"मन तो कर रहा है नदी में नहाने का।" अनीता ने थोड़ी मायूसी में कहा─"पर मां ने कहा है कि घर जा के फटाफट खाना बनाना है मुझे।"
"अरे तो क्या हुआ।" मैंने कहा─"घर जा के भी तो पहले तू नहाएगी ही। उसके बाद ही तो खाना बनाएगी। इससे अच्छा ये है कि यहीं नदी में नहा ले...फिर घर जा के सिर्फ तुझे खाना ही बनाना पड़ेगा।"
"अगर देर हो गई तो मां डांटेगी।"
"अरे हम जल्दी नहा के चल देंगे घर की तरफ।"
"लेकिन अगर मां को पता चला कि मैं तेरे साथ नदी में नहाने गई थी और इस वजह से खाना बनाने में देर हुई तो????"
"ऐसा कुछ नहीं होगा।" मैंने कहा─"और मां को कैसे पता चल जाएगा भला। न मैं मां को कुछ बताऊंगा और न ही तू बताएगी। हम नदी में जा कर मस्त चार पांच डुबकियां लगाएंगे...थोड़ा तैरेंगे और फिर झट घर चले जाएंगे।"
"ठीक है।" अनीता के चेहरे पर खुशी की चमक उभर आई─"बस तू मेरे साथ छल मत करना।"
"अरे नहीं करूंगा।"
"तेरा कोई भरोसा नहीं है।" अनीता फिर से थोड़ा मायूस हुई─"तू हमेशा मां से मुझे डांट पड़वाता है जबकि गलती भी तेरी ही होती है।"
"वो तो मैं बस ऐसे ही तुझे छेड़ता रहता हूं।" मैंने हल्के से मुस्कुरा कर कहा─"तुझे छेड़ने में मुझे मजा आता है।"
"अरे हां...तूने सुना न आज छोटे काका हमारे झगड़े के बारे में क्या बोल रहे थे।" अनीता को एकदम से याद आया तो उसने मुस्कुराते हुए कहा।
"हां सुना मैंने।" मैंने सिर हिलाया─"अगर उनकी बातें सच हैं तो इसका मतलब हम दोनों जो एक दूसरे से झगड़ा करते हैं वो भी हमारा प्यार ही है।"
"मुझे तो नहीं लगता ऐसा।" अनीता ने शेखी से मुंह बना के कहा─"तू तो कभी कभी मुझे अपना दुश्मन मान के मारता भी है। अगर मुझसे प्यार करता तो क्या ऐसे मारता मुझे।"
अनीता की बात सुन कर जाने क्यों मेरे अंदर अजीब सी लहर उठी। एक ऐसी लहर जो आज से पहले कभी महसूस नहीं की थी मैंने। उसको अपलक देखता रह गया मैं और वो अभी भी शेखी से मुंह बनाए मेरे साथ चलती जा रही थी। जब मैं चुपचाप उसे देखते हुए चलता ही रहा तो सहसा उसे मेरे चुप हो जाने का एहसास। उसने गर्दन घुमा कर मेरी तरफ देखा।
"अब ऐसे क्या देख रहा है।" फिर वो मुझे अपनी तरफ अपलक देखता देख बोली─"क्या मैंने गलत कहा।"
"न..नहीं वो...ऐसी बात नहीं है।" मैं थोड़ा सकपका सा गया─"कह तो तू सही रही है कि मैं तुझे कभी कभी मार देता हूं लेकिन ये सच नहीं है कि मैं तुझे अपना दुश्मन मान लेता हूं।"
"फिर क्यों मारता है मुझे।" अनीता ने भोली सूरत बना के मुझे देखा।
"बताया न कि मजा आता है तुझे छेड़ने में और तुझे परेशान करने में।" मेरा दिल जाने क्यों एकाएक धड़कने लगा था।
"कैसा भाई है तू।" अनीता ने मेरे बाजू में हल्के से मार कर कहा─"अपनी बहन को मारने में और छेड़ने में मजा आता है तुझे। सच में बहुत गंदा है तू। जा मुझे तुझसे बात ही नहीं करना अब।"
अनीता ने ये कह कर सच में रूठ जाने जैसा चेहरा बना लिया। ये देख मैं मुस्कुरा उठा।
"तू बात न भी करेगी तब भी तुझे छेड़ूँगा।" मैंने उसके सिर पर एक चपत लगा कर कहा─"समझी...छिपकली।"
"मुझसे दूर रह तू।"
"अरे श्यामू काका की बात भूल गई क्या तू।" मैंने मुस्कुरा कर कहा─"हमारा इस तरह झगड़ा करना भी प्यार है।"
"चल झूठा।" अनीता ने कहा─"मैं बुद्धू नहीं हूं जो इतना भी न समझूं कि ये तेरा प्यार है या कुछ और।"
"ऐसे तो मैं भी कह सकता हूं कि तेरा मुझसे झगड़ा करना भी प्यार नहीं है।" मैंने कहा─"मतलब तू अपने भाई को अपना दुश्मन मानती है।"
"हाय दय्या कितना झूठा है तू।" अनीता ने आँखें फैला कर कहा─"मैं तो तुझे अपना भाई ही मानती हूं...तू ही मुझे अपनी बहन नहीं मानता।"
"मैं तो मानता हूं।" मैंने एकाएक उसकी तारीफ करने का सोच कर कहा─"तुझे पता है मैं अक्सर अपने दोस्त बबलू से बोला करता हूं कि तू मेरी सबसे प्यारी बहन है। जब तक तुझे देख नहीं लेता और जब तक तुझे छेड़ नहीं लेता तब तक मुझे कुछ अच्छा ही नहीं लगता।"
मेरी ये बात सुनते ही अनीता ने आश्चर्य से मेरी तरफ देखा। उसकी आंखों में अविश्वास साफ दिख रहा था।
"तू ये झूठ कह रहा है न मुझसे।" फिर उसने कहा─"तू मुझे झूठ मूठ का बहला रहा है न।"
"अब तुझे भरोसा नहीं है तो मैं क्या करूं।" मैंने मायूसी दिखाई─"पर सच तो यही है कि तू मेरी प्यारी बहन है। सुनीता और रानी से भी ज्यादा चाहता हूं तुझे।"
अनीता ये सुन कर और भी हैरत से देखने लगी मुझे। इस बार वो फौरन कुछ न बोली।
"क्या तू सच कह रहा है।" फिर उसने थोड़ा गंभीर हो कर पूछा─"क्या सच में तू मुझे सुनीता और रानी से भी ज्यादा चाहता है।"
"हां...बस मैं तुझे कभी दिखाता नहीं हूं।" मैं भी थोड़ा गंभीर हो गया─"तू भी तो कभी अपना प्यार नहीं दिखाती मुझे। इसी लिए तुझसे झगड़ा करता रहता हूं। अगर तू भी मुझे अपना प्यार दिखाए तो मैं भी तुझे अपना प्यार दिखाऊं और फिर इस तरह झगड़ा न करूं तुझसे।"
अनीता इतना ज्यादा हैरान थी कि उसे अब भी शायद मेरी बातों पर भरोसा नहीं हो रहा था। हम दोनों ही चलते चलते रुक गए थे और एक दूसरे की आंखों में देख रहे थे।
"देख मुझे अभी भी तेरी बात पर भरोसा नहीं हो रहा है।" फिर उसने कहा─"लेकिन फिर भी मैं मान लेती हूं। बाकी मैं तो अब आगे से तुझसे झगड़ा नहीं करूंगी।"
"ठीक है।" मैंने कहा─"तो मेरा भी वादा है तुझसे कि मैं भी तुझसे झगड़ा नहीं करूंगा पर हां तुझे थोड़ा बहुत छेड़ूँगा जरूर क्योंकि जब तक तुझे छेड़ूंगा नहीं तो मुझे कुछ अच्छा ही नहीं लगेगा।"
"मतलब तू खुद को अच्छा लगवाने के लिए मुझे छेड़ेगा।" अनीता ने आँखें फैला कर कहा─"तो ठीक है...मैं भी छेड़ूंगी तुझे।"
"मतलब तुझे भी मुझे छेड़ने से अच्छा लगता है।" मैंने मुस्कुरा कर कहा─"अरे छिपकली यही तो हमारा प्यार है। श्यामू काका यही तो बता रहे थे हमें।"
"अरे हां तू सही कह रहा है।" अनीता ने चौंक कर कहा।
"चल अब...वरना देर हो जाएगी।" मैंने कहा─"पहले हम नदी में नहाएंगे फिर घर जाएंगे...ठीक है।"
"हां चल।"
अनीता ने खुशी से कहा। फिर अचानक उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझे ले कर चलने लगी। आम तौर पर ऐसा मैं ही किया करता हूं...मतलब उसका हाथ पकड़ कर जबरदस्ती उसे कहीं ले जाने के लिए खींचता हूं मगर आज उसने खुद मेरा हाथ पकड़ा और खुशी से मुझे नदी तरफ ले जाने लगी थी।
थोड़ी ही देर में हम दोनों नदी के पास पहुंच गए। अनीता अभी भी खुश दिख रही थी। उसे खुश देख मुझे भी अच्छा लग रहा था लेकिन इसके साथ ही मुझे अपने अंदर कुछ अजीब सा भी महसूस हो रहा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों था।
"काश तेरी तरह मैं भी अपने कपड़े उतार कर नदी में कूद जाती।" नदी के पास पहुंचते ही वो मेरा हाथ छोड़ कर लेकिन थोड़ा मायूस हो कर बोली─"तो कितना मजा आता नहाने में।"
"अरे तो उतार दे न।" मैंने लापरवाही से कहा─"यहां हमारे सिवा है ही कौन।"
"पागल है क्या।" अनीता मेरी बात सुन कर चौंक पड़ी─"और कोई नहीं है तो क्या हुआ तू तो है। तेरे सामने मैं कैसे कपड़े उतार सकती हूं।"
"क्यों....इसमें क्या है।" मैंने भोलापन दिखाया─"जब मैं तेरे सामने अपने कपड़े उतार सकता हूं तो तू भी तो उतार सकती है।"
"एकदम बुद्धू है क्या तू।" अनीता ने आँखें फैला कर कहा─"इतना बड़ा हो गया है फिर भी ऐसी बात करता है। क्या तुझे पता नहीं है कि जब कोई लड़की बड़ी हो जाती है तो वो किसी के सामने अपने कपड़े नहीं उतारती।"
"पर तू तो मेरी बहन है न।" मैंने कहा─"पहले भी तो तू मेरे सामने कपड़े उतारा करती थी।"
"हां तो पहले मैं बहुत छोटी थी इस लिए कपड़े उतार देती थी।" अनीता ने थोड़ा लजा कर कहा─"और तू भी जब छोटा था तो सबके सामने पूरा नंगा ही हो जाता था मगर अब क्या तू पहले जैसे नंगा होता है सबके सामने...नहीं न। क्योंकि अब तू बड़ा हो गया है तो तुझे नंगा होने में शर्म आने लगी है। ऐसे ही मैं बड़ी हो गई हूं तो मुझे भी कपड़ा उतारने में शर्म ही आएगी न।"
"कितनी अजीब बात है न बड़े हो जाने पर कपड़े उतारने में शर्म आने लगती है।" मैंने कहा─"लेकिन अगर इस वक्त हम कपड़े उतार लेंगे तो क्या हो जाएगा भला। देख मैं तो तेरे सामने अब भी पूरा नंगा हो सकता हूं। मुझे तो कोई शर्म नहीं आएगी....फिर तुझे क्यों आएगी शर्म।"
"क्योंकि तू बेशर्म है और मैं नहीं हूं।" अनीता ने फिर से मेरे बाजू में हल्के से मार कर कहा─"मैं तेरे सामने तेरी तरह कपड़े उतार कर नंगी नहीं हो सकती। अच्छा अब ये बातें छोड़ और जल्दी से नहाते हैं। अगर खाना बनाने में मुझे देर हो गई तो मां बहुत डांटेगी।"
मुझे भी लगा कि अब देर नहीं करना चाहिए। इस लिए मैं फटाफट अपने कपड़े उतारने लगा। जबकि अनीता वहीं नदी के किनारे रखे एक चपटे पत्थर पर बैठ के हाथ मुंह धोने लगी।
कपड़े उतार कर मैं नदी में उतरने लगा। गर्मी में जब मस्त शीतल और ठंडे पानी का स्पर्श हुआ तो मन खुशी से लहक उठा। मैं सिर्फ कच्छे में था। जल्दी ही मैं नदी के बीच पहुंच गया और फटाफट डुबकी लगाने लगा। बड़ा ही मजा आया। उधर अनीता मुझे डुबकी लगाते देख मुस्कुराई।
"आ जा न तू भी।" मैंने उसे बुलाया─"यहां पर मस्त ठंडा पानी है। कसम से बड़ा मजा आ रहा है।"
अनीता मुस्कुराते हुए उठी और धीरे धीरे नदी में उतरने लगी। उसने अपना दुपट्टा पाट पर ही रख दिया था। उसके बदन में पीले रंग का कुर्ता और सलवार था। थोड़ी ही देर में वो कमर तक नदी में उतर आई। वो मुझसे बस थोड़ी ही दूरी पर थी इस लिए मैं हाथों से पानी उछाल उछाल कर उसको भिगोने लगा। वो मेरे ऐसा करते ही खुद को बचाने की कोशिश करने लगी मगर जब वो समझ गई कि उसका भीगना निश्चित है तो वो भी हाथों से पानी उछाल उछाल कर मुझ पर डालने लगी।
कुछ ही पलों में अनीता पूरा भीग गई। उसका पीला कुर्ता भीग जाने के कारण उसके बदन से चिपक गया और उसके सीने के उभार साफ नजर आने लगे। तभी मैंने एकदम से पानी में डुबकी लगाई और एक ही पल में अंदर ही अंदर उसके पास पहुंच गया। जैसे ही उसे एहसास हुआ कि मैं बिल्कुल करीब आ गया हूं तो वो मुझसे दूर भागने लगी मगर मैंने पीछे से पकड़ लिया उसे।
"क्या कर रहा है राजू।" अनीता चीखते हुए हंसी─"छोड़ दे मुझे नहीं तो डूब जाऊंगी।"
"तो डूब जा न।" मैं उसे पीछे से पकड़े एकदम से नीचे की तरफ खींचा तो वो छटपटाते हुए पानी में डूबती चली गई।
पानी के अंदर वो बुरी तरह छटपटाई और ऊपर की तरफ उठने के लिए जोर लगाने लगी।
"कुत्ता डुबो के मार डालेगा क्या मुझे।" ऊपर आते ही वो तेज तेज सांस ले कर चिल्लाई─"दूर हट मुझसे।"
"अरे डर क्यों रही है छिपकली।" मैंने उसे अपनी तरफ घुमा कर कहा─"तूने कैसे सोच लिया कि मैं अपनी प्यारी बहन को डुबो के मार डालूंगा।"
मेरी बात सुनते ही अनीता ने अपने चेहरे का पानी पोछ कर मुझे ध्यान से देखा। हम दोनों बिल्कुल करीब थे इस लिए मैं उसके चेहरे के एक एक भाव साफ देख सकता था।
"क्या सच में तुझे ऐसा लगता है।" मैंने बड़े प्यार से उसे देखते हुए पूछा।
"पर तूने अचानक से मुझे अंदर खींच लिया तो मैं डर ही गई थी।" फिर उसने मासूम सी शक्ल बना के कहा।
"तुझे डरने की कोई जरूरत नहीं है।" मैंने अचानक उसके चेहरे को दोनों हाथों से थाम लिया─"तेरा भाई हूं...भले ही तुझसे झगड़ा करता हूं...छेड़ता हूं लेकिन फिर भी तुझे बहुत मानता हूं....तुझे प्यार करता हूं।"
अनीता गौर से देखने लगी मुझे। आंखों में अजीब से भाव थे। ऐसे भाव से उसने आज से पहले कभी नहीं देखा था मुझे।
"आज तुझे क्या हो गया है राजू।" फिर जाने क्या सोच के वो धीमे से बोली─"आज से पहले तो तू कभी ऐसी बातें नहीं करता था मुझसे।"
"क्योंकि आज से पहले तू मुझे इतनी प्यारी नहीं लगती थी।" मैंने मुस्कुरा कर उसके दाएं गाल पर हल्के से चपत लगाई─"हमेशा छिपकली ही नजर आती थी।"
"मारूंगी अगर छिपकली बोलेगा तो।" उसने मासूमियत से आँखें दिखाई।
"फिर क्या बोलूं।"
"मेरा नाम ले...और क्या।"
"तू भी तो मुझे कुत्ता...कमीना कहती है।"
"अब से नहीं कहूंगी।" अनीता ने मेरी आंखों में देखते हुए कहा─"पर तू भी गंदी हरकतें नहीं करेगा।"
"मैंने कब गंदी हरकत की।"
"कल कमरे में गंदी हरकत नहीं की थी तूने??"
"मुझे तो ऐसा कुछ भी याद नहीं है।" मैं समझ तो गया पर अंजान बन के बोला─"तू साफ साफ बता मैंने क्या किया था जिसे तू गंदी हरकत बता रही है।"
अनीता फौरन कुछ न बोली। एकाएक ही उसके चेहरे पर लाज के भाव उभर आए। फिर वो मुझसे नजरें हटा कर धीमे से बोली─"कल कमरे में जब तू मुझे पीछे से पकड़े हुए था तब तू मेरे सी..सीने को जोर से दबाए हुए था...क्या याद नहीं तुझे।"
"अच्छा वो। मैंने एकदम से याद आ जाने का नाटक किया─"मैंने तेरा दू...दूध पकड़ रखा था उसकी बात कर रही है क्या तू।"
"धत्त...क्या बोल रहा है ये।" अनीता बुरी तरह लजा कर बोली─"अपनी बहन से कोई भाई ऐसे बोलता है क्या।"
"पर मैं तो ऐसा ही बोलूंगा।" मैंने एकदम से भोलापन दिखाया─"और फिर गलत क्या बोल रहा हूं मैं....मैंने तेरा दूध ही तो पकड़ा था। उसे कुछ और कहते हैं क्या।"
"बस कर अब।" अनीता सच में बहुत शर्माने लगी थी─"तुझे बिल्कुल भी शर्म नहीं है क्या।"
"अच्छा तू बता उसे कुछ और बोलते हैं क्या।" मैंने कहा─"अगर कुछ और बोलते हैं तो तू मुझे बता दे। मैं अब से वही बोलूंगा।"
"तू कुछ मत बोल समझा।" अनीता ने शर्म से मुस्कुरा कर कहा─"और अब ये बातें बंद कर दे। मुझे नहाने दे...देर हो रही है।"
"चल मैं तुझे नहलाता हूं।" मैंने कहा─"जैसे छोटे में मां नहलाती थी।"
"न तू रहने दे।" अनीता ने मुझे दूर धकेला─"मैं खुद नहा लूंगी। तू भी खुद नहा और जल्दी बाहर निकल।"
"तेरी इसी बात से साबित हो गया कि तू अपने भाई को जरा भी प्यार नहीं करती।" मैंने ऐसा मुंह बना लिया जैसे इस बात से मुझे दुख हुआ हो─"अगर प्यार करती तो मेरी किसी बात से इंकार न करती। मैं तो तुझे सच्चे दिल से अपनी बहन मानता हूं....तुझे प्यार करता हूं। इसी लिए तो तुझे नहलाने को कहा और तू.....।"
अनीता ने आँखें फैला कर देखा मुझे।
"मतलब मैं तुझे नहलाने से मना कर रही हूं तो मैं तुझे प्यार नहीं करती...ये क्या बात हुई।" अनीता ने कहा।
"हां...यही बात हुई।" मैंने उदास सी शक्ल बना कर कहा─"मैं ही मूर्ख हूं जो ये समझ बैठा था कि मेरी प्यारी बहन मुझे भी वैसा ही प्यार करती है जैसे मैं उसे करता हूं। अब पता चल गया मुझे....तू झूठ बोल रही थी मुझसे। जा मुझे अब तुझसे कोई बात नहीं करना।"
कहने के साथ ही मैं उससे दूर होने लगा। ये देख अनीता एकदम से बेचैन और बेबस सी नजर आने लगी। अगले ही पल वो मेरी तरफ तेजी से बढ़ी।
"ऐसे न बोल राजू।" फिर वो मेरे करीब आ कर गंभीरता से बोली─"मैं भी तुझे प्यार करती हूं। मेरा यकीन कर।"
"बस बस मुझे झूठी तसल्ली न दे तू।" मैं उससे फिर दूर हुआ─"इतना भोला और मूर्ख नहीं हूं मैं जितना तू समझती है। मैं समझ गया हूं कि तू बस दिखावा करती है...सच में प्यार नहीं करती है मुझसे।"
अनीता की शक्ल रो देने वाली हो गई। अगले ही पल उसकी आंखों में आंसू भी दिखने लगे। वो अपलक इस तरह मुझे देखे जा रही थी जैसे उसे मेरी बात से कितना दुख हुआ है।
"अच्छा बता कैसे यकीन करेगा तू।" वो फिर से मेरे करीब आती हुई बोली─"तू जो बोलेगा वही करूंगी....फिर तो यकीन करेगा न मुझ पर।"
मेरी धड़कनें एकाएक तेज हो गईं। मन में जाने कब से पाप पालने लगा था मैं जो मुझे बार बार ऐसा कुछ करने को मजबूर कर देता था जो मैंने इसके पहले कभी सोचा तक नहीं था।
"अब बोल न।" मुझे चुप देख वो व्याकुलता से बोली─"बता ऐसा क्या करूं जिससे तुझे यकीन हो जाए।"
"मतलब मेरे कहने पर तू कुछ भी करेगी।" मैंने धड़कते दिल से उसको परखा।
"हां कुछ भी करूंगी।" उसने पूरी दृढ़ता से कहा─"मैं तुझे दिखाऊंगी कि जैसे तू मुझे प्यार करता है वैसे ही मैं भी तुझे प्यार करती हूं। अब बता जल्दी....क्या करूं मैं।"
मैं जल्दी नहीं बोल सकता था क्योंकि उसे शक हो जाता इस लिए थोड़ा सोचने का नाटक किया। वो इंतजार में मुझे ही देखे जा रही थी।
"ठीक है।" मैंने सोच लेने का दिखावा किया फिर बोला─"अगर तू सच में मुझसे प्यार करती है तो अभी मेरी तरह अपने कपड़े उतार के दिखा।"
अनीता ये सुन कर बुरी तरह चौंक पड़ी। आश्चर्य और अविश्वास से आँखें फाड़े मुझे देखने लगी। इधर मेरी धड़कनें ये सोच कर रुक सी गईं कि कहीं वो मेरी ये बात सुन कर गुस्सा तो नहीं हो जाएगी।
"र..राजू...क्या सच में तू यही चाहता है।" फिर उसने कांपती आवाज में पूछा।
"ह...हां।" मुझे उसकी मासूम सी शक्ल देख बुरा तो लगा मगर मैंने खुद को पत्थर बना लिया।
अनीता बहुत ज्यादा बेबस और मजबूर नजर आने लगी थी। लाज से उसका चेहरा सुर्ख पड़ गया था। कोई और परिस्थिति होती तो शायद वो झट से ऐसा करने से इंकार कर देती मगर इस वक्त जाने क्यों उस पर मुझसे प्यार करने की बात साबित करने की सनक सवार हो गई थी।
उसने नदी के बाहर चारों तरफ कई बार घूम घूम कर नजरें दौड़ाई। जाहिर है ये देखने के लिए नदी के आस पास हमारे अलावा कोई तीसरा इंसान तो नहीं है। जब वो संतुष्ट हो गई कि कोई नहीं है तो उसने मेरी तरफ देखते हुए अपने हाथ पानी के नीचे की तरफ बढ़ाए। इधर मेरी धड़कनें एकाएक ये सोच कर काफी तेज चलने लगीं कि क्या सच में वो अपने कपड़े उतार कर मेरी तरह ऊपर से नंगी होने वाली है।
मैं मन ही मन आश्चर्यचकित हो चला था। सांसें रोके मैं उसकी हर प्रक्रिया को बड़े ध्यान से देखे जा रहा था। अगले कुछ ही पलों में मैंने देखा पानी के अंदर से उसके दोनों हाथ बाहर आए। उसने दोनों हाथों से अपने कुर्ते का निचला छोर पकड़ रखा था। मेरे देखते ही देखते उसने कुर्ते को ऊपर उठाना शुरू कर दिया। कुछ ही पलों में उसका गेहुएं रंग का सपाट पेट दिखने लगा और उसके बीच झलकती उसकी छोटी सी मगर सुंदर सी नाभी भी। मेरी धड़कनें अब धाड़ धाड़ कर के बजने लगीं।
कुर्ता क्योंकि पानी में भीग जाने से गीला हो गया था इस लिए ऊपर सरकने में थोड़ा समय लग रहा था। जल्दी ही अनीता ने उसे इतना ऊपर उठा लिया कि कुर्ते के अंदर पहने जाने वाली उसकी सफेद रंग की छोटी सी कमीज दिखने लगी। घर में मैंने जाने कितनी ही बार उसकी इस कमीज को देखा था लेकिन कभी ये नहीं सोचा था कि इस छोटे से कपड़े को वो कुर्ते के अंदर पहनती है। जिसको पहनने के बाद उसके दूध थोड़ा दब जाते हैं और साथ ही उसके छोटे छोटे निप्पल भी किसी को नहीं दिखते।
गीला कुर्ता जब थोड़ा और ऊपर हुआ तो अनीता की वो सफेद गीली कमीज भी उसके साथ ऊपर उठने लगी। मेरा हलक सूखने लगा। अगले कुछ ही पलों में मुझे अनीता के सीने के उभारों का निचला हिस्सा दिखने लगा जो पेट से कहीं ज्यादा साफ और गोरा दिख रहा था।
अनीता अपने गीले कुर्ते को किसी तरह ऊपर सरकाए जा रही थी और इधर अब मुझे एकाएक घबराहट होने लगी थी। मन में तरह तरह के खयाल उभरने लगे थे। इस लिए नहीं कि अचानक से कोई आ न जाए बल्कि इस लिए कि इस सबके चलते अनीता मेरे बारे में....मतलब अपने भाई के बारे में क्या सोचेगी। जाहिर है अच्छा तो नहीं ही सोचेगी क्योंकि कोई भी भाई अपनी बहन को ऐसा कुछ करने को नहीं कह सकता।
"रु..रुक जा अनीता।" मैं घबराहट में बोल पड़ा─"अपना कुर्ता नीचे कर ले मेरी प्यारी बहन।"
मेरी ये बात सुनते ही कुर्ता उतारने की क्रिया कर रहे अनीता के हाथ रुक गए। उसके बाद उसने अपने हाथों को थोड़ा सा नीचे किया ताकि हाथों के बीच से वो मुझे देख सके।
"क्या हुआ।" फिर वो मासूमियत से बोली─"मुझे कुर्ता नीचे करने को क्यों बोल रहा है।"
"क्योंकि मैं समझ गया हूं कि तू भी मुझसे प्यार करती है।" मैंने आगे बढ़ कर उसके बीच में ही रुके हाथों को नीचे किया जिससे उसका कुर्ता भी नीचे हो गया─"अब तुझे अपना कुर्ता उतारने की जरूरत नहीं है। मैं अपनी प्यारी बहन को ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता....मुझे माफ कर दे।"
अनीता की आँखें छलक पड़ीं। पता नहीं उसे क्या हुआ कि एकदम से मुझसे लिपट गई। पहले तो मैं चौंका मगर फिर मैंने भी उसे खुद से छुपका लिया। तभी मुझे उसकी सिसकियां सुनाई दीं।
"अरे...क्या हुआ तुझे।" मैंने झट से उसे खुद से अलग किया─"तू रो क्यों रही है पागल।"
"पता नहीं क्यों मुझे रोना आ गया है राजू।" उसने अपने आंसू पोंछते हुए मासूमियत से कहा─"और पता है उस वक्त मुझे ऐसा लग रहा था कि अगर तू मुझे नहीं रोकता तो जाने मेरा क्या बिगड़ जाएगा।"
"पागल है तू।" मैंने उसे फिर से छुपका लिया─"मानता हूं कि मैं थोड़ा कम बुद्धि का हूं लेकिन इतना मुझे भी पता है कि अभी जो तू कर रही थी वो गलत था।"
"जब तुझे पता था तो क्यों ऐसा करवा रहा था मुझसे।" उसने बड़ी मासूमियत से कहा─"इसी लिए कहती हूं कि तू बहुत गंदा है....हां।"
"चल मान लिया कि मैं गंदा हूं।" मैंने फिर उसे खुद से अलग किया─"लेकिन तेरे ऐसा करने से मैं ये तो जान गया कि तू सच में मुझे बहुत प्यार करती है....मतलब मेरे कहने पर कुछ भी कर सकती है तू। सच कहता हूं अनीता....मुझे इस बात से बहुत खुशी हो रही है।"
"हां तू तो खुश होगा ही।" अनीता ने मेरे बाजू में इस बार थोड़ा जोर से मारा─"मुझे नंगा करवा के मेरे दू....मतलब मेरे उनको देख लिया....गंदा कहीं का।"
"हा हा हा...तू भी दूध बोलने जा रही थी न।" मैं ठहाका लग कर हंस पड़ा─"इसका मतलब उनको दूध ही कहते हैं।"
"धत्त बेशर्म।" अनीता बुरी तरह शर्मा गई।
"पर मैंने तेरे दूध नहीं देखे अनीता।" मैंने हंसना बंद कर के कहा─"मैंने सही समय पर तुझे रोक दिया था....वरना तेरे दूध दिख ही जाते मुझे।"
"बेशरम चुप कर जा अब।" अनीता ने लाज और गुस्से में मुझे घूंसा मार दिया।
मैं हंसते हुए उससे दूर चला गया और पानी में डुबकी लगाने लगा। उधर अनीता शर्म से मुस्कुराते हुए किनारे तरफ जाने लगी।
कुछ देर बाद हम दोनों नहा कर घर की तरफ चल पड़े। अनीता को देख कर मुझे बार बार हंसी आ रही थी मगर मैं अपनी हंसी को रोके हुए था क्योंकि अगर हंसता तो अनीता को बुरा लगता और वो गुस्सा भी हो जाती। वो मेरे साथ ही चल रही थी। उसके कपड़े गीले थे और उसके बदन से चिपके हुए थे। दुपट्टे को उसने अपने सीने पर इस तरह फैलाया हुआ था कि उसके उभार किसी को स्पष्ट नज़र न आएं।
सारे रास्ते हम दोनों चुप ही रहे थे। ये अलग बात है कि जब भी वो मेरी तरफ देखती तो जाने क्या सोच कर लजा जाती और मुस्कुरा उठती। खैर ऐसे ही कुछ देर में हम घर पहुंच गए। अनीता ने कमरे में जा कर अपने कपड़े बदले और मैं लुंगी ले कर घर के पीछे कुएं तरफ चला गया। थोड़ी ही देर में अनीता भी अपने गीले कपड़े ले कर आ गई।
"अब क्यों उतार दिए तूने ये कपड़े।" मैंने उसे छेड़ा─"उस वक्त तो नहीं उतारे थे।"
"चुप कर।" अनीता ने झूठा गुस्सा दिखाया─"नहीं तो तेरी लुंगी खींच दूंगी। फिर नंगा घूमेगा तू।"
"तेरी तरह नहीं हूं मैं जो कपड़े उतारने में नाटक करे।" मैंने कहा─"मैं तो तेरे कहने पर एक पल में अपनी ये लुंगी खुद ही खींच कर नंगा हो जाऊंगा।"
"हां जानती हूं।" अनीता ने कहा─"तुझे ऐसा करने में लाज तो आएगी ही नहीं।"
"लुंगी खींच दूं क्या।" मैंने कच्छे को पानी से धोते हुए उसे डराया।
"खींच दे...मेरा क्या जाएगा।" अनीता मुस्कुरा उठी।
उसे लगा मैं बस उसे छेड़ रहा हूं मगर मैं ठहरा बेझिझक कुछ भी कर गुजरने वाला। इस लिए अगले ही पल मैंने लुंगी का छोर खींच कर फैला दिया। पलक झपकते ही मैं आगे से नंगा हो गया जबकि मेरे पोंद(नितंब) लुंगी में ढंके रहे।
अनीता की नजर जैसे ही मेरे झूलते हुए लंड पर पड़ी तो उसकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं। फिर एकदम से उसे होश आया तो हड़बड़ा कर चीख पड़ी वो।
"कुत्ते....कमीने....बंद कर इसे वरना तेरा सिर फोड़ दूंगी।" अनीता चीखते हुए बोली और अपने गीले कपड़े वहीं छोड़ अंदर की तरफ भाग गई।
मैं जोर जोर से हंसा और लुंगी को ठीक से कमर में लपेट कर गीले कच्छे को वहीं एक डोरी में डाल कर अंदर चल पड़ा। अचानक मुझे खयाल आया कि कहीं अनीता ये बात मां को न बता दे। ये सोचते ही मैं परेशान हो गया और थोड़ा घबरा भी उठा।
जारी है.............
उस वक्त दोपहर हो चुकी थी जब मां खलिहान में हमारे पास पहुंची। आते ही उसने अनीता से कहा कि वो घर जा कर फटाफट खाना बनाए। तब तक उसकी जगह दशरथ काका बैलों को हाँकेंगे।
अनीता बैलों के पीछे पीछे चलते हुए थक चुकी थी इस लिए जैसे ही मां ने उसे घर जाने को कहा तो वो खुश हो गई और साथ ही मेरी तरफ देख कर मुझे ये सोच के चिढ़ाया कि ले तू ऐसे ही लगा रहेगा अब।
"तू अपनी बहन के साथ जा करेजा।" तभी श्यामू काका ने मुझसे कहा─"नहा धो के और खा पी के बाद में बिटिया के साथ ही वापस आ जाना।"
काका की ये बात सुनते ही जहां अनीता का चेहरा उतर गया वहीं मैं हंस पड़ा। खैर मैं और अनीता घर की तरफ चल पड़े। मेरी जगह बैलों को हांकने का काम अब श्यामू काका खुद ही करने लगे थे।
"हाय आज कितनी गर्मी है।" रास्ते में अनीता अपने दुपट्टे से चेहरे और गले का पसीना पोंछते हुए बोली─"मैं तो पूरा भीग गई हूं। पूरे शरीर में किसकिसी हो रही है।"
"सही कहा...गर्मी तो आज है ही।" मैंने सिर हिला कर कहा─"चल नदी में नहाने चलते हैं।"
"मन तो कर रहा है नदी में नहाने का।" अनीता ने थोड़ी मायूसी में कहा─"पर मां ने कहा है कि घर जा के फटाफट खाना बनाना है मुझे।"
"अरे तो क्या हुआ।" मैंने कहा─"घर जा के भी तो पहले तू नहाएगी ही। उसके बाद ही तो खाना बनाएगी। इससे अच्छा ये है कि यहीं नदी में नहा ले...फिर घर जा के सिर्फ तुझे खाना ही बनाना पड़ेगा।"
"अगर देर हो गई तो मां डांटेगी।"
"अरे हम जल्दी नहा के चल देंगे घर की तरफ।"
"लेकिन अगर मां को पता चला कि मैं तेरे साथ नदी में नहाने गई थी और इस वजह से खाना बनाने में देर हुई तो????"
"ऐसा कुछ नहीं होगा।" मैंने कहा─"और मां को कैसे पता चल जाएगा भला। न मैं मां को कुछ बताऊंगा और न ही तू बताएगी। हम नदी में जा कर मस्त चार पांच डुबकियां लगाएंगे...थोड़ा तैरेंगे और फिर झट घर चले जाएंगे।"
"ठीक है।" अनीता के चेहरे पर खुशी की चमक उभर आई─"बस तू मेरे साथ छल मत करना।"
"अरे नहीं करूंगा।"
"तेरा कोई भरोसा नहीं है।" अनीता फिर से थोड़ा मायूस हुई─"तू हमेशा मां से मुझे डांट पड़वाता है जबकि गलती भी तेरी ही होती है।"
"वो तो मैं बस ऐसे ही तुझे छेड़ता रहता हूं।" मैंने हल्के से मुस्कुरा कर कहा─"तुझे छेड़ने में मुझे मजा आता है।"
"अरे हां...तूने सुना न आज छोटे काका हमारे झगड़े के बारे में क्या बोल रहे थे।" अनीता को एकदम से याद आया तो उसने मुस्कुराते हुए कहा।
"हां सुना मैंने।" मैंने सिर हिलाया─"अगर उनकी बातें सच हैं तो इसका मतलब हम दोनों जो एक दूसरे से झगड़ा करते हैं वो भी हमारा प्यार ही है।"
"मुझे तो नहीं लगता ऐसा।" अनीता ने शेखी से मुंह बना के कहा─"तू तो कभी कभी मुझे अपना दुश्मन मान के मारता भी है। अगर मुझसे प्यार करता तो क्या ऐसे मारता मुझे।"
अनीता की बात सुन कर जाने क्यों मेरे अंदर अजीब सी लहर उठी। एक ऐसी लहर जो आज से पहले कभी महसूस नहीं की थी मैंने। उसको अपलक देखता रह गया मैं और वो अभी भी शेखी से मुंह बनाए मेरे साथ चलती जा रही थी। जब मैं चुपचाप उसे देखते हुए चलता ही रहा तो सहसा उसे मेरे चुप हो जाने का एहसास। उसने गर्दन घुमा कर मेरी तरफ देखा।
"अब ऐसे क्या देख रहा है।" फिर वो मुझे अपनी तरफ अपलक देखता देख बोली─"क्या मैंने गलत कहा।"
"न..नहीं वो...ऐसी बात नहीं है।" मैं थोड़ा सकपका सा गया─"कह तो तू सही रही है कि मैं तुझे कभी कभी मार देता हूं लेकिन ये सच नहीं है कि मैं तुझे अपना दुश्मन मान लेता हूं।"
"फिर क्यों मारता है मुझे।" अनीता ने भोली सूरत बना के मुझे देखा।
"बताया न कि मजा आता है तुझे छेड़ने में और तुझे परेशान करने में।" मेरा दिल जाने क्यों एकाएक धड़कने लगा था।
"कैसा भाई है तू।" अनीता ने मेरे बाजू में हल्के से मार कर कहा─"अपनी बहन को मारने में और छेड़ने में मजा आता है तुझे। सच में बहुत गंदा है तू। जा मुझे तुझसे बात ही नहीं करना अब।"
अनीता ने ये कह कर सच में रूठ जाने जैसा चेहरा बना लिया। ये देख मैं मुस्कुरा उठा।
"तू बात न भी करेगी तब भी तुझे छेड़ूँगा।" मैंने उसके सिर पर एक चपत लगा कर कहा─"समझी...छिपकली।"
"मुझसे दूर रह तू।"
"अरे श्यामू काका की बात भूल गई क्या तू।" मैंने मुस्कुरा कर कहा─"हमारा इस तरह झगड़ा करना भी प्यार है।"
"चल झूठा।" अनीता ने कहा─"मैं बुद्धू नहीं हूं जो इतना भी न समझूं कि ये तेरा प्यार है या कुछ और।"
"ऐसे तो मैं भी कह सकता हूं कि तेरा मुझसे झगड़ा करना भी प्यार नहीं है।" मैंने कहा─"मतलब तू अपने भाई को अपना दुश्मन मानती है।"
"हाय दय्या कितना झूठा है तू।" अनीता ने आँखें फैला कर कहा─"मैं तो तुझे अपना भाई ही मानती हूं...तू ही मुझे अपनी बहन नहीं मानता।"
"मैं तो मानता हूं।" मैंने एकाएक उसकी तारीफ करने का सोच कर कहा─"तुझे पता है मैं अक्सर अपने दोस्त बबलू से बोला करता हूं कि तू मेरी सबसे प्यारी बहन है। जब तक तुझे देख नहीं लेता और जब तक तुझे छेड़ नहीं लेता तब तक मुझे कुछ अच्छा ही नहीं लगता।"
मेरी ये बात सुनते ही अनीता ने आश्चर्य से मेरी तरफ देखा। उसकी आंखों में अविश्वास साफ दिख रहा था।
"तू ये झूठ कह रहा है न मुझसे।" फिर उसने कहा─"तू मुझे झूठ मूठ का बहला रहा है न।"
"अब तुझे भरोसा नहीं है तो मैं क्या करूं।" मैंने मायूसी दिखाई─"पर सच तो यही है कि तू मेरी प्यारी बहन है। सुनीता और रानी से भी ज्यादा चाहता हूं तुझे।"
अनीता ये सुन कर और भी हैरत से देखने लगी मुझे। इस बार वो फौरन कुछ न बोली।
"क्या तू सच कह रहा है।" फिर उसने थोड़ा गंभीर हो कर पूछा─"क्या सच में तू मुझे सुनीता और रानी से भी ज्यादा चाहता है।"
"हां...बस मैं तुझे कभी दिखाता नहीं हूं।" मैं भी थोड़ा गंभीर हो गया─"तू भी तो कभी अपना प्यार नहीं दिखाती मुझे। इसी लिए तुझसे झगड़ा करता रहता हूं। अगर तू भी मुझे अपना प्यार दिखाए तो मैं भी तुझे अपना प्यार दिखाऊं और फिर इस तरह झगड़ा न करूं तुझसे।"
अनीता इतना ज्यादा हैरान थी कि उसे अब भी शायद मेरी बातों पर भरोसा नहीं हो रहा था। हम दोनों ही चलते चलते रुक गए थे और एक दूसरे की आंखों में देख रहे थे।
"देख मुझे अभी भी तेरी बात पर भरोसा नहीं हो रहा है।" फिर उसने कहा─"लेकिन फिर भी मैं मान लेती हूं। बाकी मैं तो अब आगे से तुझसे झगड़ा नहीं करूंगी।"
"ठीक है।" मैंने कहा─"तो मेरा भी वादा है तुझसे कि मैं भी तुझसे झगड़ा नहीं करूंगा पर हां तुझे थोड़ा बहुत छेड़ूँगा जरूर क्योंकि जब तक तुझे छेड़ूंगा नहीं तो मुझे कुछ अच्छा ही नहीं लगेगा।"
"मतलब तू खुद को अच्छा लगवाने के लिए मुझे छेड़ेगा।" अनीता ने आँखें फैला कर कहा─"तो ठीक है...मैं भी छेड़ूंगी तुझे।"
"मतलब तुझे भी मुझे छेड़ने से अच्छा लगता है।" मैंने मुस्कुरा कर कहा─"अरे छिपकली यही तो हमारा प्यार है। श्यामू काका यही तो बता रहे थे हमें।"
"अरे हां तू सही कह रहा है।" अनीता ने चौंक कर कहा।
"चल अब...वरना देर हो जाएगी।" मैंने कहा─"पहले हम नदी में नहाएंगे फिर घर जाएंगे...ठीक है।"
"हां चल।"
अनीता ने खुशी से कहा। फिर अचानक उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझे ले कर चलने लगी। आम तौर पर ऐसा मैं ही किया करता हूं...मतलब उसका हाथ पकड़ कर जबरदस्ती उसे कहीं ले जाने के लिए खींचता हूं मगर आज उसने खुद मेरा हाथ पकड़ा और खुशी से मुझे नदी तरफ ले जाने लगी थी।
थोड़ी ही देर में हम दोनों नदी के पास पहुंच गए। अनीता अभी भी खुश दिख रही थी। उसे खुश देख मुझे भी अच्छा लग रहा था लेकिन इसके साथ ही मुझे अपने अंदर कुछ अजीब सा भी महसूस हो रहा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों था।
"काश तेरी तरह मैं भी अपने कपड़े उतार कर नदी में कूद जाती।" नदी के पास पहुंचते ही वो मेरा हाथ छोड़ कर लेकिन थोड़ा मायूस हो कर बोली─"तो कितना मजा आता नहाने में।"
"अरे तो उतार दे न।" मैंने लापरवाही से कहा─"यहां हमारे सिवा है ही कौन।"
"पागल है क्या।" अनीता मेरी बात सुन कर चौंक पड़ी─"और कोई नहीं है तो क्या हुआ तू तो है। तेरे सामने मैं कैसे कपड़े उतार सकती हूं।"
"क्यों....इसमें क्या है।" मैंने भोलापन दिखाया─"जब मैं तेरे सामने अपने कपड़े उतार सकता हूं तो तू भी तो उतार सकती है।"
"एकदम बुद्धू है क्या तू।" अनीता ने आँखें फैला कर कहा─"इतना बड़ा हो गया है फिर भी ऐसी बात करता है। क्या तुझे पता नहीं है कि जब कोई लड़की बड़ी हो जाती है तो वो किसी के सामने अपने कपड़े नहीं उतारती।"
"पर तू तो मेरी बहन है न।" मैंने कहा─"पहले भी तो तू मेरे सामने कपड़े उतारा करती थी।"
"हां तो पहले मैं बहुत छोटी थी इस लिए कपड़े उतार देती थी।" अनीता ने थोड़ा लजा कर कहा─"और तू भी जब छोटा था तो सबके सामने पूरा नंगा ही हो जाता था मगर अब क्या तू पहले जैसे नंगा होता है सबके सामने...नहीं न। क्योंकि अब तू बड़ा हो गया है तो तुझे नंगा होने में शर्म आने लगी है। ऐसे ही मैं बड़ी हो गई हूं तो मुझे भी कपड़ा उतारने में शर्म ही आएगी न।"
"कितनी अजीब बात है न बड़े हो जाने पर कपड़े उतारने में शर्म आने लगती है।" मैंने कहा─"लेकिन अगर इस वक्त हम कपड़े उतार लेंगे तो क्या हो जाएगा भला। देख मैं तो तेरे सामने अब भी पूरा नंगा हो सकता हूं। मुझे तो कोई शर्म नहीं आएगी....फिर तुझे क्यों आएगी शर्म।"
"क्योंकि तू बेशर्म है और मैं नहीं हूं।" अनीता ने फिर से मेरे बाजू में हल्के से मार कर कहा─"मैं तेरे सामने तेरी तरह कपड़े उतार कर नंगी नहीं हो सकती। अच्छा अब ये बातें छोड़ और जल्दी से नहाते हैं। अगर खाना बनाने में मुझे देर हो गई तो मां बहुत डांटेगी।"
मुझे भी लगा कि अब देर नहीं करना चाहिए। इस लिए मैं फटाफट अपने कपड़े उतारने लगा। जबकि अनीता वहीं नदी के किनारे रखे एक चपटे पत्थर पर बैठ के हाथ मुंह धोने लगी।
कपड़े उतार कर मैं नदी में उतरने लगा। गर्मी में जब मस्त शीतल और ठंडे पानी का स्पर्श हुआ तो मन खुशी से लहक उठा। मैं सिर्फ कच्छे में था। जल्दी ही मैं नदी के बीच पहुंच गया और फटाफट डुबकी लगाने लगा। बड़ा ही मजा आया। उधर अनीता मुझे डुबकी लगाते देख मुस्कुराई।
"आ जा न तू भी।" मैंने उसे बुलाया─"यहां पर मस्त ठंडा पानी है। कसम से बड़ा मजा आ रहा है।"
अनीता मुस्कुराते हुए उठी और धीरे धीरे नदी में उतरने लगी। उसने अपना दुपट्टा पाट पर ही रख दिया था। उसके बदन में पीले रंग का कुर्ता और सलवार था। थोड़ी ही देर में वो कमर तक नदी में उतर आई। वो मुझसे बस थोड़ी ही दूरी पर थी इस लिए मैं हाथों से पानी उछाल उछाल कर उसको भिगोने लगा। वो मेरे ऐसा करते ही खुद को बचाने की कोशिश करने लगी मगर जब वो समझ गई कि उसका भीगना निश्चित है तो वो भी हाथों से पानी उछाल उछाल कर मुझ पर डालने लगी।
कुछ ही पलों में अनीता पूरा भीग गई। उसका पीला कुर्ता भीग जाने के कारण उसके बदन से चिपक गया और उसके सीने के उभार साफ नजर आने लगे। तभी मैंने एकदम से पानी में डुबकी लगाई और एक ही पल में अंदर ही अंदर उसके पास पहुंच गया। जैसे ही उसे एहसास हुआ कि मैं बिल्कुल करीब आ गया हूं तो वो मुझसे दूर भागने लगी मगर मैंने पीछे से पकड़ लिया उसे।
"क्या कर रहा है राजू।" अनीता चीखते हुए हंसी─"छोड़ दे मुझे नहीं तो डूब जाऊंगी।"
"तो डूब जा न।" मैं उसे पीछे से पकड़े एकदम से नीचे की तरफ खींचा तो वो छटपटाते हुए पानी में डूबती चली गई।
पानी के अंदर वो बुरी तरह छटपटाई और ऊपर की तरफ उठने के लिए जोर लगाने लगी।
"कुत्ता डुबो के मार डालेगा क्या मुझे।" ऊपर आते ही वो तेज तेज सांस ले कर चिल्लाई─"दूर हट मुझसे।"
"अरे डर क्यों रही है छिपकली।" मैंने उसे अपनी तरफ घुमा कर कहा─"तूने कैसे सोच लिया कि मैं अपनी प्यारी बहन को डुबो के मार डालूंगा।"
मेरी बात सुनते ही अनीता ने अपने चेहरे का पानी पोछ कर मुझे ध्यान से देखा। हम दोनों बिल्कुल करीब थे इस लिए मैं उसके चेहरे के एक एक भाव साफ देख सकता था।
"क्या सच में तुझे ऐसा लगता है।" मैंने बड़े प्यार से उसे देखते हुए पूछा।
"पर तूने अचानक से मुझे अंदर खींच लिया तो मैं डर ही गई थी।" फिर उसने मासूम सी शक्ल बना के कहा।
"तुझे डरने की कोई जरूरत नहीं है।" मैंने अचानक उसके चेहरे को दोनों हाथों से थाम लिया─"तेरा भाई हूं...भले ही तुझसे झगड़ा करता हूं...छेड़ता हूं लेकिन फिर भी तुझे बहुत मानता हूं....तुझे प्यार करता हूं।"
अनीता गौर से देखने लगी मुझे। आंखों में अजीब से भाव थे। ऐसे भाव से उसने आज से पहले कभी नहीं देखा था मुझे।
"आज तुझे क्या हो गया है राजू।" फिर जाने क्या सोच के वो धीमे से बोली─"आज से पहले तो तू कभी ऐसी बातें नहीं करता था मुझसे।"
"क्योंकि आज से पहले तू मुझे इतनी प्यारी नहीं लगती थी।" मैंने मुस्कुरा कर उसके दाएं गाल पर हल्के से चपत लगाई─"हमेशा छिपकली ही नजर आती थी।"
"मारूंगी अगर छिपकली बोलेगा तो।" उसने मासूमियत से आँखें दिखाई।
"फिर क्या बोलूं।"
"मेरा नाम ले...और क्या।"
"तू भी तो मुझे कुत्ता...कमीना कहती है।"
"अब से नहीं कहूंगी।" अनीता ने मेरी आंखों में देखते हुए कहा─"पर तू भी गंदी हरकतें नहीं करेगा।"
"मैंने कब गंदी हरकत की।"
"कल कमरे में गंदी हरकत नहीं की थी तूने??"
"मुझे तो ऐसा कुछ भी याद नहीं है।" मैं समझ तो गया पर अंजान बन के बोला─"तू साफ साफ बता मैंने क्या किया था जिसे तू गंदी हरकत बता रही है।"
अनीता फौरन कुछ न बोली। एकाएक ही उसके चेहरे पर लाज के भाव उभर आए। फिर वो मुझसे नजरें हटा कर धीमे से बोली─"कल कमरे में जब तू मुझे पीछे से पकड़े हुए था तब तू मेरे सी..सीने को जोर से दबाए हुए था...क्या याद नहीं तुझे।"
"अच्छा वो। मैंने एकदम से याद आ जाने का नाटक किया─"मैंने तेरा दू...दूध पकड़ रखा था उसकी बात कर रही है क्या तू।"
"धत्त...क्या बोल रहा है ये।" अनीता बुरी तरह लजा कर बोली─"अपनी बहन से कोई भाई ऐसे बोलता है क्या।"
"पर मैं तो ऐसा ही बोलूंगा।" मैंने एकदम से भोलापन दिखाया─"और फिर गलत क्या बोल रहा हूं मैं....मैंने तेरा दूध ही तो पकड़ा था। उसे कुछ और कहते हैं क्या।"
"बस कर अब।" अनीता सच में बहुत शर्माने लगी थी─"तुझे बिल्कुल भी शर्म नहीं है क्या।"
"अच्छा तू बता उसे कुछ और बोलते हैं क्या।" मैंने कहा─"अगर कुछ और बोलते हैं तो तू मुझे बता दे। मैं अब से वही बोलूंगा।"
"तू कुछ मत बोल समझा।" अनीता ने शर्म से मुस्कुरा कर कहा─"और अब ये बातें बंद कर दे। मुझे नहाने दे...देर हो रही है।"
"चल मैं तुझे नहलाता हूं।" मैंने कहा─"जैसे छोटे में मां नहलाती थी।"
"न तू रहने दे।" अनीता ने मुझे दूर धकेला─"मैं खुद नहा लूंगी। तू भी खुद नहा और जल्दी बाहर निकल।"
"तेरी इसी बात से साबित हो गया कि तू अपने भाई को जरा भी प्यार नहीं करती।" मैंने ऐसा मुंह बना लिया जैसे इस बात से मुझे दुख हुआ हो─"अगर प्यार करती तो मेरी किसी बात से इंकार न करती। मैं तो तुझे सच्चे दिल से अपनी बहन मानता हूं....तुझे प्यार करता हूं। इसी लिए तो तुझे नहलाने को कहा और तू.....।"
अनीता ने आँखें फैला कर देखा मुझे।
"मतलब मैं तुझे नहलाने से मना कर रही हूं तो मैं तुझे प्यार नहीं करती...ये क्या बात हुई।" अनीता ने कहा।
"हां...यही बात हुई।" मैंने उदास सी शक्ल बना कर कहा─"मैं ही मूर्ख हूं जो ये समझ बैठा था कि मेरी प्यारी बहन मुझे भी वैसा ही प्यार करती है जैसे मैं उसे करता हूं। अब पता चल गया मुझे....तू झूठ बोल रही थी मुझसे। जा मुझे अब तुझसे कोई बात नहीं करना।"
कहने के साथ ही मैं उससे दूर होने लगा। ये देख अनीता एकदम से बेचैन और बेबस सी नजर आने लगी। अगले ही पल वो मेरी तरफ तेजी से बढ़ी।
"ऐसे न बोल राजू।" फिर वो मेरे करीब आ कर गंभीरता से बोली─"मैं भी तुझे प्यार करती हूं। मेरा यकीन कर।"
"बस बस मुझे झूठी तसल्ली न दे तू।" मैं उससे फिर दूर हुआ─"इतना भोला और मूर्ख नहीं हूं मैं जितना तू समझती है। मैं समझ गया हूं कि तू बस दिखावा करती है...सच में प्यार नहीं करती है मुझसे।"
अनीता की शक्ल रो देने वाली हो गई। अगले ही पल उसकी आंखों में आंसू भी दिखने लगे। वो अपलक इस तरह मुझे देखे जा रही थी जैसे उसे मेरी बात से कितना दुख हुआ है।
"अच्छा बता कैसे यकीन करेगा तू।" वो फिर से मेरे करीब आती हुई बोली─"तू जो बोलेगा वही करूंगी....फिर तो यकीन करेगा न मुझ पर।"
मेरी धड़कनें एकाएक तेज हो गईं। मन में जाने कब से पाप पालने लगा था मैं जो मुझे बार बार ऐसा कुछ करने को मजबूर कर देता था जो मैंने इसके पहले कभी सोचा तक नहीं था।
"अब बोल न।" मुझे चुप देख वो व्याकुलता से बोली─"बता ऐसा क्या करूं जिससे तुझे यकीन हो जाए।"
"मतलब मेरे कहने पर तू कुछ भी करेगी।" मैंने धड़कते दिल से उसको परखा।
"हां कुछ भी करूंगी।" उसने पूरी दृढ़ता से कहा─"मैं तुझे दिखाऊंगी कि जैसे तू मुझे प्यार करता है वैसे ही मैं भी तुझे प्यार करती हूं। अब बता जल्दी....क्या करूं मैं।"
मैं जल्दी नहीं बोल सकता था क्योंकि उसे शक हो जाता इस लिए थोड़ा सोचने का नाटक किया। वो इंतजार में मुझे ही देखे जा रही थी।
"ठीक है।" मैंने सोच लेने का दिखावा किया फिर बोला─"अगर तू सच में मुझसे प्यार करती है तो अभी मेरी तरह अपने कपड़े उतार के दिखा।"
अनीता ये सुन कर बुरी तरह चौंक पड़ी। आश्चर्य और अविश्वास से आँखें फाड़े मुझे देखने लगी। इधर मेरी धड़कनें ये सोच कर रुक सी गईं कि कहीं वो मेरी ये बात सुन कर गुस्सा तो नहीं हो जाएगी।
"र..राजू...क्या सच में तू यही चाहता है।" फिर उसने कांपती आवाज में पूछा।
"ह...हां।" मुझे उसकी मासूम सी शक्ल देख बुरा तो लगा मगर मैंने खुद को पत्थर बना लिया।
अनीता बहुत ज्यादा बेबस और मजबूर नजर आने लगी थी। लाज से उसका चेहरा सुर्ख पड़ गया था। कोई और परिस्थिति होती तो शायद वो झट से ऐसा करने से इंकार कर देती मगर इस वक्त जाने क्यों उस पर मुझसे प्यार करने की बात साबित करने की सनक सवार हो गई थी।
उसने नदी के बाहर चारों तरफ कई बार घूम घूम कर नजरें दौड़ाई। जाहिर है ये देखने के लिए नदी के आस पास हमारे अलावा कोई तीसरा इंसान तो नहीं है। जब वो संतुष्ट हो गई कि कोई नहीं है तो उसने मेरी तरफ देखते हुए अपने हाथ पानी के नीचे की तरफ बढ़ाए। इधर मेरी धड़कनें एकाएक ये सोच कर काफी तेज चलने लगीं कि क्या सच में वो अपने कपड़े उतार कर मेरी तरह ऊपर से नंगी होने वाली है।
मैं मन ही मन आश्चर्यचकित हो चला था। सांसें रोके मैं उसकी हर प्रक्रिया को बड़े ध्यान से देखे जा रहा था। अगले कुछ ही पलों में मैंने देखा पानी के अंदर से उसके दोनों हाथ बाहर आए। उसने दोनों हाथों से अपने कुर्ते का निचला छोर पकड़ रखा था। मेरे देखते ही देखते उसने कुर्ते को ऊपर उठाना शुरू कर दिया। कुछ ही पलों में उसका गेहुएं रंग का सपाट पेट दिखने लगा और उसके बीच झलकती उसकी छोटी सी मगर सुंदर सी नाभी भी। मेरी धड़कनें अब धाड़ धाड़ कर के बजने लगीं।
कुर्ता क्योंकि पानी में भीग जाने से गीला हो गया था इस लिए ऊपर सरकने में थोड़ा समय लग रहा था। जल्दी ही अनीता ने उसे इतना ऊपर उठा लिया कि कुर्ते के अंदर पहने जाने वाली उसकी सफेद रंग की छोटी सी कमीज दिखने लगी। घर में मैंने जाने कितनी ही बार उसकी इस कमीज को देखा था लेकिन कभी ये नहीं सोचा था कि इस छोटे से कपड़े को वो कुर्ते के अंदर पहनती है। जिसको पहनने के बाद उसके दूध थोड़ा दब जाते हैं और साथ ही उसके छोटे छोटे निप्पल भी किसी को नहीं दिखते।
गीला कुर्ता जब थोड़ा और ऊपर हुआ तो अनीता की वो सफेद गीली कमीज भी उसके साथ ऊपर उठने लगी। मेरा हलक सूखने लगा। अगले कुछ ही पलों में मुझे अनीता के सीने के उभारों का निचला हिस्सा दिखने लगा जो पेट से कहीं ज्यादा साफ और गोरा दिख रहा था।
अनीता अपने गीले कुर्ते को किसी तरह ऊपर सरकाए जा रही थी और इधर अब मुझे एकाएक घबराहट होने लगी थी। मन में तरह तरह के खयाल उभरने लगे थे। इस लिए नहीं कि अचानक से कोई आ न जाए बल्कि इस लिए कि इस सबके चलते अनीता मेरे बारे में....मतलब अपने भाई के बारे में क्या सोचेगी। जाहिर है अच्छा तो नहीं ही सोचेगी क्योंकि कोई भी भाई अपनी बहन को ऐसा कुछ करने को नहीं कह सकता।
"रु..रुक जा अनीता।" मैं घबराहट में बोल पड़ा─"अपना कुर्ता नीचे कर ले मेरी प्यारी बहन।"
मेरी ये बात सुनते ही कुर्ता उतारने की क्रिया कर रहे अनीता के हाथ रुक गए। उसके बाद उसने अपने हाथों को थोड़ा सा नीचे किया ताकि हाथों के बीच से वो मुझे देख सके।
"क्या हुआ।" फिर वो मासूमियत से बोली─"मुझे कुर्ता नीचे करने को क्यों बोल रहा है।"
"क्योंकि मैं समझ गया हूं कि तू भी मुझसे प्यार करती है।" मैंने आगे बढ़ कर उसके बीच में ही रुके हाथों को नीचे किया जिससे उसका कुर्ता भी नीचे हो गया─"अब तुझे अपना कुर्ता उतारने की जरूरत नहीं है। मैं अपनी प्यारी बहन को ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता....मुझे माफ कर दे।"
अनीता की आँखें छलक पड़ीं। पता नहीं उसे क्या हुआ कि एकदम से मुझसे लिपट गई। पहले तो मैं चौंका मगर फिर मैंने भी उसे खुद से छुपका लिया। तभी मुझे उसकी सिसकियां सुनाई दीं।
"अरे...क्या हुआ तुझे।" मैंने झट से उसे खुद से अलग किया─"तू रो क्यों रही है पागल।"
"पता नहीं क्यों मुझे रोना आ गया है राजू।" उसने अपने आंसू पोंछते हुए मासूमियत से कहा─"और पता है उस वक्त मुझे ऐसा लग रहा था कि अगर तू मुझे नहीं रोकता तो जाने मेरा क्या बिगड़ जाएगा।"
"पागल है तू।" मैंने उसे फिर से छुपका लिया─"मानता हूं कि मैं थोड़ा कम बुद्धि का हूं लेकिन इतना मुझे भी पता है कि अभी जो तू कर रही थी वो गलत था।"
"जब तुझे पता था तो क्यों ऐसा करवा रहा था मुझसे।" उसने बड़ी मासूमियत से कहा─"इसी लिए कहती हूं कि तू बहुत गंदा है....हां।"
"चल मान लिया कि मैं गंदा हूं।" मैंने फिर उसे खुद से अलग किया─"लेकिन तेरे ऐसा करने से मैं ये तो जान गया कि तू सच में मुझे बहुत प्यार करती है....मतलब मेरे कहने पर कुछ भी कर सकती है तू। सच कहता हूं अनीता....मुझे इस बात से बहुत खुशी हो रही है।"
"हां तू तो खुश होगा ही।" अनीता ने मेरे बाजू में इस बार थोड़ा जोर से मारा─"मुझे नंगा करवा के मेरे दू....मतलब मेरे उनको देख लिया....गंदा कहीं का।"
"हा हा हा...तू भी दूध बोलने जा रही थी न।" मैं ठहाका लग कर हंस पड़ा─"इसका मतलब उनको दूध ही कहते हैं।"
"धत्त बेशर्म।" अनीता बुरी तरह शर्मा गई।
"पर मैंने तेरे दूध नहीं देखे अनीता।" मैंने हंसना बंद कर के कहा─"मैंने सही समय पर तुझे रोक दिया था....वरना तेरे दूध दिख ही जाते मुझे।"
"बेशरम चुप कर जा अब।" अनीता ने लाज और गुस्से में मुझे घूंसा मार दिया।
मैं हंसते हुए उससे दूर चला गया और पानी में डुबकी लगाने लगा। उधर अनीता शर्म से मुस्कुराते हुए किनारे तरफ जाने लगी।
कुछ देर बाद हम दोनों नहा कर घर की तरफ चल पड़े। अनीता को देख कर मुझे बार बार हंसी आ रही थी मगर मैं अपनी हंसी को रोके हुए था क्योंकि अगर हंसता तो अनीता को बुरा लगता और वो गुस्सा भी हो जाती। वो मेरे साथ ही चल रही थी। उसके कपड़े गीले थे और उसके बदन से चिपके हुए थे। दुपट्टे को उसने अपने सीने पर इस तरह फैलाया हुआ था कि उसके उभार किसी को स्पष्ट नज़र न आएं।
सारे रास्ते हम दोनों चुप ही रहे थे। ये अलग बात है कि जब भी वो मेरी तरफ देखती तो जाने क्या सोच कर लजा जाती और मुस्कुरा उठती। खैर ऐसे ही कुछ देर में हम घर पहुंच गए। अनीता ने कमरे में जा कर अपने कपड़े बदले और मैं लुंगी ले कर घर के पीछे कुएं तरफ चला गया। थोड़ी ही देर में अनीता भी अपने गीले कपड़े ले कर आ गई।
"अब क्यों उतार दिए तूने ये कपड़े।" मैंने उसे छेड़ा─"उस वक्त तो नहीं उतारे थे।"
"चुप कर।" अनीता ने झूठा गुस्सा दिखाया─"नहीं तो तेरी लुंगी खींच दूंगी। फिर नंगा घूमेगा तू।"
"तेरी तरह नहीं हूं मैं जो कपड़े उतारने में नाटक करे।" मैंने कहा─"मैं तो तेरे कहने पर एक पल में अपनी ये लुंगी खुद ही खींच कर नंगा हो जाऊंगा।"
"हां जानती हूं।" अनीता ने कहा─"तुझे ऐसा करने में लाज तो आएगी ही नहीं।"
"लुंगी खींच दूं क्या।" मैंने कच्छे को पानी से धोते हुए उसे डराया।
"खींच दे...मेरा क्या जाएगा।" अनीता मुस्कुरा उठी।
उसे लगा मैं बस उसे छेड़ रहा हूं मगर मैं ठहरा बेझिझक कुछ भी कर गुजरने वाला। इस लिए अगले ही पल मैंने लुंगी का छोर खींच कर फैला दिया। पलक झपकते ही मैं आगे से नंगा हो गया जबकि मेरे पोंद(नितंब) लुंगी में ढंके रहे।
अनीता की नजर जैसे ही मेरे झूलते हुए लंड पर पड़ी तो उसकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं। फिर एकदम से उसे होश आया तो हड़बड़ा कर चीख पड़ी वो।
"कुत्ते....कमीने....बंद कर इसे वरना तेरा सिर फोड़ दूंगी।" अनीता चीखते हुए बोली और अपने गीले कपड़े वहीं छोड़ अंदर की तरफ भाग गई।
मैं जोर जोर से हंसा और लुंगी को ठीक से कमर में लपेट कर गीले कच्छे को वहीं एक डोरी में डाल कर अंदर चल पड़ा। अचानक मुझे खयाल आया कि कहीं अनीता ये बात मां को न बता दे। ये सोचते ही मैं परेशान हो गया और थोड़ा घबरा भी उठा।
जारी है.............


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