15-01-2026, 01:48 PM
(This post was last modified: 23-05-2026, 01:11 PM by razaraj2. Edited 7 times in total. Edited 7 times in total.)
Ye Story Ayesha ki hai jo ki ek conservative begum hai or uska jivan naukri karne k bad kaise badla wo aapko is story m pata chalega
1: नज़रों का पहला टकराव
अहमदाबाद की पुरानी हवेलियों और नई अपार्टमेंट्स के बीच बसा एक मोहल्ला था – जहां सुबह की अजान और शाम की घंटियां एक साथ गूंजती थीं। इसी मोहल्ले में एक छोटे से तीन कमरों वाले घर में रहती थी आयशा खान। उम्र 28 साल। गोरी चिट्टी रंगत, बड़ी-बड़ी काली आंखें जो के नीचे से भी चमकतीं, लंबे घने बाल जो हमेशा दुपट्टे या में छिपे रहते।
उसकी मुस्कान ऐसी थी कि पड़ोस की औरतें कहतीं, "आयशा की हंसी सुनकर दिल खुश हो जाता है।"लेकिन आयशा का दिल खुद खुश नहीं था।पांच साल पहले उसकी शादी इरफ़ान से हुई थी। इरफ़ान अच्छा इंसान था –
कंपनी में अच्छी पोस्ट, पांच वक्त की घर लौटकर आयशा से बात करता, कभी-कभी हाथ पकड़कर कहता, "तू मेरी ज़िंदगी है।" लेकिन वो प्यार जो रातों को नींद उड़ा दे, जो छूने पर शरीर में बिजली दौड़ा दे, वो कहीं गायब था।
इरफ़ान की ज़िंदगी एक रूटीन थी – सुबह ऑफिस, शाम घर, वीकेंड पर फैमिली विजिट। सेक्स भी वैसा ही था – हफ्ते में एक बार, अंधेरे में, जल्दी-जल्दी, बिना किसी बातचीत के। आयशा सोचती, "शायद यही शादी है। सब यही जीते हैं।"फिर भी उसके मन में एक खालीपन था।
वो 28 की थी – जवान, खूबसूरत, और महसूस करने की चाहत से भरी हुई। लेकिन वो चाहत कहीं दब गई थी।उसकी दो सबसे करीबी सहेलियां थीं – फातिमा और ज़ारा।
फातिमा – 29 साल, कॉलेज टीचर, शादीशुदा, लेकिन बच्चे नहीं। वो हमेशा आयशा को कहती, "तू इतनी खूबसूरत है आयशा, क्यों खुद को इतना बंद रखती है? ज़िंदगी एक बार मिलती है।"
ज़ारा – 27 साल, फैशन डिज़ाइनर, अनमैरिड, सबसे बोल्ड। वो कहती, "अगर दिल किसी पर लग जाए तो रोकना नहीं। मैं तो रोकूंगी नहीं।"
दोनों आयशा की सहेलियां जानती थीं कि आयशा के अंदर कुछ कमी है, लेकिन वो कभी ज़्यादा नहीं पूछतीं।
बस साथ देतीं।एक सामान्य दोपहर थी। तीनों ने फैसला किया कि आज पुराने कैफे की बजाय कुछ नया ट्राई करेंगे। ज़ारा ने सजेस्ट किया, "चलो 'The Brew Corner' चलते हैं। वो नया कैफे है, मिक्स्ड क्राउड आता है, म्यूजिक भी अच्छा चलता है।"
आयशा हिचकिचाई। "मिक्स्ड क्राउड? अच्छा रहेगा?"
फातिमा ने हंसकर कहा, "अरे, बस कॉफी पीने जा रहे हैं। क्या डर रही है?"
आयशा ने हां कहा। उसने काला पहना, नीचे सफेद कुर्ता और हल्की टाइट सलवार। वो जानती थी कि उसके कर्व्स हल्के से दिखते हैं, लेकिन वो खुद को कवर करके रखती थी।कैफे पहुंचते ही माहौल अलग था।
हल्का म्यूजिक, कॉफी की खुशबू, और लोग-लड़कियां सब मिक्स। तीनों ने एक कोने की टेबल पकड़ी।उसी कैफे के आयशा घर लौटी, उसके कदम भारी थे। अमेरिका की ट्रिप की बात अब तय हो चुकी थी
कोने में बैठा था राहुल शर्मा। 32 साल का राहुल – लंबा, चौड़ी छाती, अच्छा चेहरा, हल्की दाढ़ी। वो बिज़नेसमैन था, इवेंट मैनेजमेंट की कंपनी चलाता था।
साथ में उसके दोस्त थे – अजय (हमेशा पार्टी प्लान करने वाला), नीता (जर्नलिस्ट, बहुत बातूनी), और सोनिया (नीता की सहेली, फ्लर्टी टाइप)।अजय ने अचानक कोहनी मारी। "भाई, वो देख... वो लड़की में। क्या कमाल है!"
राहुल ने अनमने ढंग से मुड़कर देखा। और फिर... उसकी नज़र ठहर गई।
आयशा उस वक्त फातिमा से कुछ कह रही थी और हंस पड़ी। उसकी आंखें चमकीं। राहुल को लगा जैसे कोई करंट लगा हो। वो खुद को रोक नहीं पाया। उसकी आंखें आयशा पर अटक गईं।और ठीक उसी पल आयशा ने भी मुड़कर देखा। उनकी नज़रें मिलीं।
बस एक सेकंड।
लेकिन उस एक सेकंड में वक्त रुक गया।
आयशा की सांस थम गई। उसने जल्दी नज़रें हटा लीं, लेकिन दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
राहुल ने भी नज़रें नहीं हटाईं। वो सोच रहा था, "ये कौन है? इतनी खूबसूरत... और वो नज़र..."राहुल ने बहाना बनाया। "अरे, मेरे दोस्तों का ग्रुप बड़ा है, जगह कम पड़ रही है। चलो उस तरफ चलते हैं।" वो धीरे-धीरे आयशा वाली टेबल के पास पहुंचा।
"एक्सक्यूज़ मी," उसने मुस्कुराकर कहा, "क्या ये सीट खाली है? हम थोड़ा एडजस्ट कर लें?"ज़ारा ने तुरंत मुस्कुराकर कहा, "बिलकुल भाई, बैठ जाइए।"
फातिमा ने आयशा की तरफ देखा और आंख मारी। आयशा शरमा गई।राहुल बैठ गया। "हाय, मैं राहुल शर्मा। इवेंट प्लानर हूं।
"
आयशा ने हल्के से सिर झुकाकर कहा, "आयशा... खान।"
बातें शुरू हुईं – पहले साधारण। मौसम, कैफे का म्यूजिक, शहर की ट्रैफिक।
फिर धीरे-धीरे। राहुल ने पूछा, "आप लोग यहां पहली बार?"
ज़ारा ने हंसकर कहा, "हां, आज ट्राई कर रहे हैं। आयशा को बाहर कम निकलने देते हैं लोग।"
आयशा ने शरमाते हुए कहा, "ऐसा नहीं है..."राहुल की नज़रें बार-बार आयशा पर जा रही थीं। वो देख रहा था कैसे आयशा ठीक करती है, कैसे उंगलियां कॉफी कप पर रखती है।
आयशा को भी महसूस हो रहा था – ये नज़रें अलग हैं। गहरी हैं।नीता और सोनिया दूर से देख रही थीं। नीता ने अजय से कहा, "लगता है राहुल को कोई पसंद आ गई।"
अजय हंसा, "अरे, इंटरफेथ लग रहा है। मज़ा आएगा।"करीब आधा घंटा बात हुई। फिर राहुल उठा। "अच्छा लगा मिलकर। शायद फिर मिलें।"
उसने सबको गुडबाय कहा, लेकिन आखिरी नज़र आयशा पर ठहरी।
आयशा ने भी देखा। दिल फिर धड़का।घर लौटते वक्त आयशा चुप थी। फातिमा ने पूछा, "क्या हुआ? चुप क्यों है?"
आयशा ने कहा, "कुछ नहीं... बस..."
रात को बिस्तर पर लेटी वो सोच रही थी। राहुल का चेहरा आंखों के सामने। उसकी मुस्कान। उसकी आवाज़।
इरफ़ान सो रहा था। आयशा ने आंखें बंद कीं। लेकिन नींद नहीं आ रही थी।
उसके मन में पहली बार किसी गैर-मर्द की तस्वीर इतनी साफ थी।और वो नहीं जानती थी कि ये सिर्फ शुरुआत है।
भाग 2: रात की बेचैनी और अधूरी तड़प
रात के करीब 11 बजे थे। आयशा बिस्तर पर लेटी हुई थी, लेकिन नींद कहीं दूर भाग गई थी।
इरफ़ान उसके बगल में सो रहा था – उसकी सांसें नियमित, शांत, जैसे हर रात होती हैं। कमरे में सिर्फ़ पंखे की हल्की आवाज़ और बाहर से आती गाड़ियों की दूर की गूंज।
आयशा ने करवट बदली, लेकिन उसका मन कैफ़े की उस शाम में अटका हुआ था। राहुल... वो नाम बार-बार उसके दिमाग में घूम रहा था।वो सोचने लगी – राहुल की वो मुस्कान, वो गहरी आंखें जो उस पर ठहर गई थीं। "कितना कॉन्फिडेंट था वो... और वो तरीका बात करने का, जैसे वो मुझे जानता हो।"
आयशा की सांसें थोड़ी तेज़ हो गईं। वो कल्पना करने लगी – अगर वो फिर मिले तो क्या होगा? क्या वो उसका हाथ पकड़ेगा? क्या वो उसे गले लगाएगा? उसके मन में एक अजीब सी हलचल शुरू हो गई। उसके शरीर में गर्मी फैलने लगी, जैसे कोई आग सुलग रही हो।
Ayesha ने आंखें बंद कीं और राहुल की छवि को और गहरा किया। वो सोच रही थी, "उसकी छाती कितनी चौड़ी होगी... उसके हाथ कितने मजबूत। अगर वो मुझे छुए तो..." उसकी पाकीज़ा चूत में हल्की सी नमी महसूस हुई। वो बेचैन हो गई। इरफ़ान सो रहा था
, लेकिन आयशा का शरीर अब जग चुका था। वो धीरे-धीरे अपने कपड़ों पर हाथ फेरने लगी। पहले कुर्ते पर, जो उसके गोल-मटोल स्तनों को ढक रहा था। उसके स्तन – करीब 34C साइज़ के, मुलायम, गोल, गुलाबी निप्पल्स जो अब सख्त हो रहे थे।
वो उठकर बैठ गई, कमरे की लाइट बंद थी, सिर्फ़ बाहर से आती स्ट्रीट लाइट की हल्की रोशनी। आयशा ने धीरे से अपना कुर्ता ऊपर किया और निकाल दिया। उसके नीचे ब्रा नहीं थी – घर पर वो अक्सर फ्री रहती। उसके स्तन आज़ाद हो गए, हल्की ठंडी हवा से निप्पल्स और सख्त हो गए।
वो अपने स्तनों पर हाथ फेरने लगी, धीरे-धीरे मसलते हुए। "ओह... राहुल," वो मन ही मन बड़बड़ाई। उसकी सांसें तेज़ हो गईं। फिर वो सलवार की नाड़ी खोलने लगी। धीरे-धीरे सलवार नीचे सरकाई, और उसे बिस्तर के किनारे फेंक दिया। अब वो पूरी नंगी थी –
उसका जवान जिस्म, गोरा रंग, पतली कमर (करीब 28 इंच), चौड़ी हिप्स (36 इंच), और वो पाकीज़ा चूत जो साफ-शेव्ड थी, गुलाबी, और अब गीली हो चुकी थी। उसके पैर लंबे, जांघें मुलायम, और वो जगह जहां अब आग लगी हुई थी।आयशा ने अपनी पाकीज़ा चूत पर हाथ रखा – गर्म, नम।
वो उंगली से क्लिटोरिस को सहलाने लगी, लेकिन रोक ली। "नहीं... ये गलत है," वो सोची, लेकिन तड़प बढ़ रही थी। वो इरफ़ान की तरफ मुड़ी। "शायद वो... वो मुझे संतुष्ट कर दे।"
वो धीरे से इरफ़ान को हिलाया। "इरफ़ान... जागो ना।"इरफ़ान आंखें मलते हुए उठा। "क्या हुआ आयशा?
नींद नहीं आ रही?" उसने पूछा, अभी भी आधा सोते हुए। आयशा ने उसे गले लगा लिया, उसके नंगे शरीर से इरफ़ान का शरीर छुआ। इरफ़ान चौंका, लेकिन मुस्कुराया। "ओह... आज मूड है?"
उसने कहा और आयशा को किस किया। आयशा ने जवाब दिया, लेकिन उसके मन में राहुल था। इरफ़ान ने अपना पजामा उतारा। उसका लंड – होने की वजह से कटे हुए, – करीब 5 इंच लंबा, औसत मोटाई, सख्त हो रहा था। आयशा ने उसे हाथ में लिया, सहलाया, लेकिन तुलना करने लगी – "राहुल का कितना बड़ा होगा?
"इरफ़ान आयशा के ऊपर आ गया। उसने आयशा के स्तनों को मसला – ज़ोर से, लेकिन बिना पैशन के। आयशा मोअन की, "आह... इरफ़ान..." लेकिन वो नकली था।
इरफ़ान ने अपना लंड आयशा की पाकीज़ा चूत पर रगड़ा – वो पहले से गीली थी, राहुल की सोच से। फिर धक्का मारा – अंदर घुस गया। आयशा की चूत टाइट थी, लेकिन गीली होने से आसानी से ले लिया। इरफ़ान ने धक्के शुरू किए –
पहले धीरे, फिर तेज़। आयशा की कमर ऊपर-नीचे हो रही थी, उसके स्तन उछल रहे थे। वो सोच रही थी, "और जोर से... जैसे राहुल करेगा।"चुदाई शुरू हुई – इरफ़ान का लंड अंदर-बाहर, आयशा की मोअन्स कमरे में गूंज रही थीं।
"ओह इरफ़ान... हां..." लेकिन इरफ़ान का स्टैमिना कम था। धक्के तेज़ हुए, लेकिन सिर्फ़ 5 मिनट बाद वो सांस फूलने लगा। आयशा की पाकीज़ा चूत अभी गर्म थी, वो ऑर्गेज्म के करीब भी नहीं पहुंची थी। इरफ़ान ने ज़ोर से धक्का मारा, "आह... आयशा!" और 10 मिनट में ही झड़ गया –
उसका गर्म सीमेन आयशा के अंदर। वो थककर आयशा के बगल में लेट गया, सांस लेते हुए। "अच्छा था ना?" उसने पूछा।आयशा ने हां कहा, लेकिन अंदर से वो प्यासी रह गई। उसकी चूत अभी भी गीली थी, तड़प रही थी।
वो उठी, बाथरूम गई, खुद को साफ किया। आईने में देखा – उसका जिस्म अभी भी गर्म, निप्पल्स सख्त। "ये क्या कर रही हूं? राहुल की वजह से..." वो सोच रही थी। लेकिन अब वो तड़प और बढ़ गई थी।
रात भर वो जागती रही, राहुल के बारे में सोचते हुए।सुबह होने वाली थी, लेकिन आयशा का दिल अब बदल चुका था। वो जानती थी, ये सिर्फ शुरुआत है।
सुबह की पहली किरण कमरे में घुसी, लेकिन आयशा की आंखें पहले से खुली थीं। रात की वो बेचैनी अब एक भारी बोझ बन चुकी थी। वो बिस्तर पर बैठी, चादर से खुद को ढके, खुद से सवाल कर रही थी। "मैं कैसे एक गैर मर्द के बारे में ऐसा सोच सकती हूं? वो भी ... राहुल।
मैं शादीशुदा हूं, ये सब गलत है। मुझे माफ़ करे, मैंने खुद को इतना गिरा दिया।" गिल्ट की तेज़ लहर उसके सीने में उठी। आंसू उसके गालों पर बहने लगे। "कैसे मैं इरफ़ान के साथ रहते हुए किसी और के बारे में... वो भी ऐसे विचार।"आयशा ने फैसला किया कि अब बस। वो उठी, वुज़ू किया, और की चादर बिछाई। पढ़ते हुए वो बार-बार तौबा मांग रही थी। ", मुझे माफ़ कर दो। मैंने गलत सोचा, गलत महसूस किया। मुझे अपनी सही राह पर रखो, मुझे कमज़ोर मत होने दो।" वो बार-बार कर रही थी – "... ।" * खत्म होने के बाद वो थोड़ा शांत हुई।
"अब कभी राहुल के बारे में नहीं सोचूंगी। ये सब खत्म।" लेकिन दिल की गहराई में वो जानती थी कि ये इतना आसान नहीं।अब अगले दिन की रूटीन में लग जाना था। आयशा ने खुद को व्यस्त रखने का फैसला किया। सुबह 7:30 बजे वो किचन में पहुंची। इरफ़ान अभी सो रहा था। वो चाय बनाई – दो कप, एक उसके लिए, एक इरफ़ान के लिए। चाय उबालते हुए उसका मन पैरासान हो गया। "राहुल की मुस्कान... वो कैफ़े में कैसे देख रहा था।" वो चम्मच जोर से हिलाने लगी, लेकिन खयाल नहीं गया।
"नहीं, *!" वो खुद को डांटी और इरफ़ान को जगाने गई। "उठो, चाय तैयार है।" इरफ़ान उठा, उसे किस किया, लेकिन आयशा ने नज़रें झुका लीं।8 बजे इरफ़ान नाश्ता करके ऑफिस निकल गया।
आयशा अकेली रह गई। वो घर की सफ़ाई शुरू की – पहले बेडरूम से। बिस्तर ठीक करते हुए रात की याद आई। "राहुल अगर यहां होता तो..." वो रुक गई, सिर झटका। "पागल हो गई?" फिर वो झाड़ू लगाने लगी, हर कमरे में। लिविंग रूम में सोफा साफ करते हुए बार-बार ध्यान राहुल की तरफ गया।
"उसकी आवाज़... इतनी गहरी। क्या वो भी मेरे बारे में सोचता होगा?" मन पैरासान था, लेकिन वो जोर से झाड़ू चलाती रही।9:30 बजे वो कपड़े धोने लगी। वॉशिंग मशीन में कपड़े डालते हुए, पानी की आवाज़ में भी राहुल का नाम गूंज रहा था। "राहुल शर्मा... *, लेकिन इतना आकर्षक।"
वो मशीन चला दी और बालकनी में गई, जहां से शहर की गलियां दिखती थीं। "शायद वो कहीं इसी शहर में है।" खयाल आया, और वो वापस अंदर भागी। "बस कर आयशा, इरफ़ान तेरा पति है।"10:30 बजे खाना बनाने का वक्त। वो सब्जियां काटने लगी – आलू, टमाटर, प्याज़। चाकू चलाते हुए उंगली पर छोटा कट लग गया। "ओह!" खून देखकर राहुल का खयाल – "वो पट्टी बांधता।"
वो हंस पड़ी, फिर गिल्ट हुआ। "******, मुझे माफ़ करो!" वो नेक्स्ट आधा घंटा चिकन करी बनाती रही – मसाले डालते, हिलाते। लेकिन हर बार चम्मच हिलाने पर राहुल। "क्या वो मुझे मैसेज करेगा?" मन पैरासान था, सिर दर्द होने लगा। दोपहर 12 बजे वो नहाने गई। शावर के नीचे, पानी उसके जिस्म पर गिर रहा था। स्तनों पर साबुन लगाते हुए रात की तड़प याद आई।
"राहुल का स्पर्श..." वो रुक गई, पानी बंद किया। "नहीं!"1 बजे लंच किया – अकेले, टीवी पर न्यूज़ लगाया, लेकिन ध्यान नहीं। शाम 3 बजे वो सहेलियों से बात करने का फैसला किया। फोन लगाया फातिमा को। "आओ घर, बात करनी है। ज़ारा को भी बुला ले।" आधे घंटे बाद दोनों आईं। चाय बनाई, बिस्किट रखे। आयशा ने सब बता दिया – गिल्ट, *****, पैरासान मन, बार-बार राहुल के खयाल। "मैं कैसे ऐसा सोच सकती हूं?
ये गुनाह है।"फातिमा और ज़ारा ने पहले गंभीरता से सुना, फिर मज़ा लेना शुरू किया। ज़ारा हंस पड़ी, "अरे वाह, भाभी! तू तो राहुल के जाल में फंस गई। वो कितना हैंडसम था ना? उसकी आंखें... अगर मैं होती तो ज़रूर फ्लर्ट करती।"
फातिमा ने उकसाया, "हां आयशा, थोड़ा मज़ा ले ले। इरफ़ान अच्छा है, लेकिन तू हमेशा घर में क्यों कैद? बाहर निकल, नौकरी कर। नए लोग मिलेंगे, राहुल जैसा कोई मिल जाए तो क्या बात!" ज़ारा ने जोड़ा, "हां, नौकरी कर ले। तू पढ़ी-लिखी है, फैशन स्टोर में या कॉलेज में। घर से बाहर निकलेगी तो ऐसे खयाल आएंगे, लेकिन मज़ेदार होंगे।
राहुल से मिलने का चांस भी मिलेगा!"आयशा ने कहा, "नहीं, मैं नहीं करूंगी।" लेकिन सहेलियों की बातें उसके मन में घर कर गईं। "नौकरी... बाहर निकलना... राहुल से मिलना।
" शाम हो गई, सहेलियां चली गईं। आयशा ने इरफ़ान के लिए डिनर तैयार किया, लेकिन मन में नौकरी का खयाल घूम रहा था। गिल्ट कम हुआ, लेकिन उत्सुकता बढ़ गई। अब वो सोच रही थी, "शायद नौकरी करके ज़िंदगी बदल जाए।"
1: नज़रों का पहला टकराव
अहमदाबाद की पुरानी हवेलियों और नई अपार्टमेंट्स के बीच बसा एक मोहल्ला था – जहां सुबह की अजान और शाम की घंटियां एक साथ गूंजती थीं। इसी मोहल्ले में एक छोटे से तीन कमरों वाले घर में रहती थी आयशा खान। उम्र 28 साल। गोरी चिट्टी रंगत, बड़ी-बड़ी काली आंखें जो के नीचे से भी चमकतीं, लंबे घने बाल जो हमेशा दुपट्टे या में छिपे रहते।
उसकी मुस्कान ऐसी थी कि पड़ोस की औरतें कहतीं, "आयशा की हंसी सुनकर दिल खुश हो जाता है।"लेकिन आयशा का दिल खुद खुश नहीं था।पांच साल पहले उसकी शादी इरफ़ान से हुई थी। इरफ़ान अच्छा इंसान था –
कंपनी में अच्छी पोस्ट, पांच वक्त की घर लौटकर आयशा से बात करता, कभी-कभी हाथ पकड़कर कहता, "तू मेरी ज़िंदगी है।" लेकिन वो प्यार जो रातों को नींद उड़ा दे, जो छूने पर शरीर में बिजली दौड़ा दे, वो कहीं गायब था।
इरफ़ान की ज़िंदगी एक रूटीन थी – सुबह ऑफिस, शाम घर, वीकेंड पर फैमिली विजिट। सेक्स भी वैसा ही था – हफ्ते में एक बार, अंधेरे में, जल्दी-जल्दी, बिना किसी बातचीत के। आयशा सोचती, "शायद यही शादी है। सब यही जीते हैं।"फिर भी उसके मन में एक खालीपन था।
वो 28 की थी – जवान, खूबसूरत, और महसूस करने की चाहत से भरी हुई। लेकिन वो चाहत कहीं दब गई थी।उसकी दो सबसे करीबी सहेलियां थीं – फातिमा और ज़ारा।
फातिमा – 29 साल, कॉलेज टीचर, शादीशुदा, लेकिन बच्चे नहीं। वो हमेशा आयशा को कहती, "तू इतनी खूबसूरत है आयशा, क्यों खुद को इतना बंद रखती है? ज़िंदगी एक बार मिलती है।"
ज़ारा – 27 साल, फैशन डिज़ाइनर, अनमैरिड, सबसे बोल्ड। वो कहती, "अगर दिल किसी पर लग जाए तो रोकना नहीं। मैं तो रोकूंगी नहीं।"
दोनों आयशा की सहेलियां जानती थीं कि आयशा के अंदर कुछ कमी है, लेकिन वो कभी ज़्यादा नहीं पूछतीं।
बस साथ देतीं।एक सामान्य दोपहर थी। तीनों ने फैसला किया कि आज पुराने कैफे की बजाय कुछ नया ट्राई करेंगे। ज़ारा ने सजेस्ट किया, "चलो 'The Brew Corner' चलते हैं। वो नया कैफे है, मिक्स्ड क्राउड आता है, म्यूजिक भी अच्छा चलता है।"
आयशा हिचकिचाई। "मिक्स्ड क्राउड? अच्छा रहेगा?"
फातिमा ने हंसकर कहा, "अरे, बस कॉफी पीने जा रहे हैं। क्या डर रही है?"
आयशा ने हां कहा। उसने काला पहना, नीचे सफेद कुर्ता और हल्की टाइट सलवार। वो जानती थी कि उसके कर्व्स हल्के से दिखते हैं, लेकिन वो खुद को कवर करके रखती थी।कैफे पहुंचते ही माहौल अलग था।
हल्का म्यूजिक, कॉफी की खुशबू, और लोग-लड़कियां सब मिक्स। तीनों ने एक कोने की टेबल पकड़ी।उसी कैफे के आयशा घर लौटी, उसके कदम भारी थे। अमेरिका की ट्रिप की बात अब तय हो चुकी थी
कोने में बैठा था राहुल शर्मा। 32 साल का राहुल – लंबा, चौड़ी छाती, अच्छा चेहरा, हल्की दाढ़ी। वो बिज़नेसमैन था, इवेंट मैनेजमेंट की कंपनी चलाता था।
साथ में उसके दोस्त थे – अजय (हमेशा पार्टी प्लान करने वाला), नीता (जर्नलिस्ट, बहुत बातूनी), और सोनिया (नीता की सहेली, फ्लर्टी टाइप)।अजय ने अचानक कोहनी मारी। "भाई, वो देख... वो लड़की में। क्या कमाल है!"
राहुल ने अनमने ढंग से मुड़कर देखा। और फिर... उसकी नज़र ठहर गई।
आयशा उस वक्त फातिमा से कुछ कह रही थी और हंस पड़ी। उसकी आंखें चमकीं। राहुल को लगा जैसे कोई करंट लगा हो। वो खुद को रोक नहीं पाया। उसकी आंखें आयशा पर अटक गईं।और ठीक उसी पल आयशा ने भी मुड़कर देखा। उनकी नज़रें मिलीं।
बस एक सेकंड।
लेकिन उस एक सेकंड में वक्त रुक गया।
आयशा की सांस थम गई। उसने जल्दी नज़रें हटा लीं, लेकिन दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
राहुल ने भी नज़रें नहीं हटाईं। वो सोच रहा था, "ये कौन है? इतनी खूबसूरत... और वो नज़र..."राहुल ने बहाना बनाया। "अरे, मेरे दोस्तों का ग्रुप बड़ा है, जगह कम पड़ रही है। चलो उस तरफ चलते हैं।" वो धीरे-धीरे आयशा वाली टेबल के पास पहुंचा।
"एक्सक्यूज़ मी," उसने मुस्कुराकर कहा, "क्या ये सीट खाली है? हम थोड़ा एडजस्ट कर लें?"ज़ारा ने तुरंत मुस्कुराकर कहा, "बिलकुल भाई, बैठ जाइए।"
फातिमा ने आयशा की तरफ देखा और आंख मारी। आयशा शरमा गई।राहुल बैठ गया। "हाय, मैं राहुल शर्मा। इवेंट प्लानर हूं।
"
आयशा ने हल्के से सिर झुकाकर कहा, "आयशा... खान।"
बातें शुरू हुईं – पहले साधारण। मौसम, कैफे का म्यूजिक, शहर की ट्रैफिक।
फिर धीरे-धीरे। राहुल ने पूछा, "आप लोग यहां पहली बार?"
ज़ारा ने हंसकर कहा, "हां, आज ट्राई कर रहे हैं। आयशा को बाहर कम निकलने देते हैं लोग।"
आयशा ने शरमाते हुए कहा, "ऐसा नहीं है..."राहुल की नज़रें बार-बार आयशा पर जा रही थीं। वो देख रहा था कैसे आयशा ठीक करती है, कैसे उंगलियां कॉफी कप पर रखती है।
आयशा को भी महसूस हो रहा था – ये नज़रें अलग हैं। गहरी हैं।नीता और सोनिया दूर से देख रही थीं। नीता ने अजय से कहा, "लगता है राहुल को कोई पसंद आ गई।"
अजय हंसा, "अरे, इंटरफेथ लग रहा है। मज़ा आएगा।"करीब आधा घंटा बात हुई। फिर राहुल उठा। "अच्छा लगा मिलकर। शायद फिर मिलें।"
उसने सबको गुडबाय कहा, लेकिन आखिरी नज़र आयशा पर ठहरी।
आयशा ने भी देखा। दिल फिर धड़का।घर लौटते वक्त आयशा चुप थी। फातिमा ने पूछा, "क्या हुआ? चुप क्यों है?"
आयशा ने कहा, "कुछ नहीं... बस..."
रात को बिस्तर पर लेटी वो सोच रही थी। राहुल का चेहरा आंखों के सामने। उसकी मुस्कान। उसकी आवाज़।
इरफ़ान सो रहा था। आयशा ने आंखें बंद कीं। लेकिन नींद नहीं आ रही थी।
उसके मन में पहली बार किसी गैर-मर्द की तस्वीर इतनी साफ थी।और वो नहीं जानती थी कि ये सिर्फ शुरुआत है।
भाग 2: रात की बेचैनी और अधूरी तड़प
रात के करीब 11 बजे थे। आयशा बिस्तर पर लेटी हुई थी, लेकिन नींद कहीं दूर भाग गई थी।
इरफ़ान उसके बगल में सो रहा था – उसकी सांसें नियमित, शांत, जैसे हर रात होती हैं। कमरे में सिर्फ़ पंखे की हल्की आवाज़ और बाहर से आती गाड़ियों की दूर की गूंज।
आयशा ने करवट बदली, लेकिन उसका मन कैफ़े की उस शाम में अटका हुआ था। राहुल... वो नाम बार-बार उसके दिमाग में घूम रहा था।वो सोचने लगी – राहुल की वो मुस्कान, वो गहरी आंखें जो उस पर ठहर गई थीं। "कितना कॉन्फिडेंट था वो... और वो तरीका बात करने का, जैसे वो मुझे जानता हो।"
आयशा की सांसें थोड़ी तेज़ हो गईं। वो कल्पना करने लगी – अगर वो फिर मिले तो क्या होगा? क्या वो उसका हाथ पकड़ेगा? क्या वो उसे गले लगाएगा? उसके मन में एक अजीब सी हलचल शुरू हो गई। उसके शरीर में गर्मी फैलने लगी, जैसे कोई आग सुलग रही हो।
Ayesha ने आंखें बंद कीं और राहुल की छवि को और गहरा किया। वो सोच रही थी, "उसकी छाती कितनी चौड़ी होगी... उसके हाथ कितने मजबूत। अगर वो मुझे छुए तो..." उसकी पाकीज़ा चूत में हल्की सी नमी महसूस हुई। वो बेचैन हो गई। इरफ़ान सो रहा था
, लेकिन आयशा का शरीर अब जग चुका था। वो धीरे-धीरे अपने कपड़ों पर हाथ फेरने लगी। पहले कुर्ते पर, जो उसके गोल-मटोल स्तनों को ढक रहा था। उसके स्तन – करीब 34C साइज़ के, मुलायम, गोल, गुलाबी निप्पल्स जो अब सख्त हो रहे थे।
वो उठकर बैठ गई, कमरे की लाइट बंद थी, सिर्फ़ बाहर से आती स्ट्रीट लाइट की हल्की रोशनी। आयशा ने धीरे से अपना कुर्ता ऊपर किया और निकाल दिया। उसके नीचे ब्रा नहीं थी – घर पर वो अक्सर फ्री रहती। उसके स्तन आज़ाद हो गए, हल्की ठंडी हवा से निप्पल्स और सख्त हो गए।
वो अपने स्तनों पर हाथ फेरने लगी, धीरे-धीरे मसलते हुए। "ओह... राहुल," वो मन ही मन बड़बड़ाई। उसकी सांसें तेज़ हो गईं। फिर वो सलवार की नाड़ी खोलने लगी। धीरे-धीरे सलवार नीचे सरकाई, और उसे बिस्तर के किनारे फेंक दिया। अब वो पूरी नंगी थी –
उसका जवान जिस्म, गोरा रंग, पतली कमर (करीब 28 इंच), चौड़ी हिप्स (36 इंच), और वो पाकीज़ा चूत जो साफ-शेव्ड थी, गुलाबी, और अब गीली हो चुकी थी। उसके पैर लंबे, जांघें मुलायम, और वो जगह जहां अब आग लगी हुई थी।आयशा ने अपनी पाकीज़ा चूत पर हाथ रखा – गर्म, नम।
वो उंगली से क्लिटोरिस को सहलाने लगी, लेकिन रोक ली। "नहीं... ये गलत है," वो सोची, लेकिन तड़प बढ़ रही थी। वो इरफ़ान की तरफ मुड़ी। "शायद वो... वो मुझे संतुष्ट कर दे।"
वो धीरे से इरफ़ान को हिलाया। "इरफ़ान... जागो ना।"इरफ़ान आंखें मलते हुए उठा। "क्या हुआ आयशा?
नींद नहीं आ रही?" उसने पूछा, अभी भी आधा सोते हुए। आयशा ने उसे गले लगा लिया, उसके नंगे शरीर से इरफ़ान का शरीर छुआ। इरफ़ान चौंका, लेकिन मुस्कुराया। "ओह... आज मूड है?"
उसने कहा और आयशा को किस किया। आयशा ने जवाब दिया, लेकिन उसके मन में राहुल था। इरफ़ान ने अपना पजामा उतारा। उसका लंड – होने की वजह से कटे हुए, – करीब 5 इंच लंबा, औसत मोटाई, सख्त हो रहा था। आयशा ने उसे हाथ में लिया, सहलाया, लेकिन तुलना करने लगी – "राहुल का कितना बड़ा होगा?
"इरफ़ान आयशा के ऊपर आ गया। उसने आयशा के स्तनों को मसला – ज़ोर से, लेकिन बिना पैशन के। आयशा मोअन की, "आह... इरफ़ान..." लेकिन वो नकली था।
इरफ़ान ने अपना लंड आयशा की पाकीज़ा चूत पर रगड़ा – वो पहले से गीली थी, राहुल की सोच से। फिर धक्का मारा – अंदर घुस गया। आयशा की चूत टाइट थी, लेकिन गीली होने से आसानी से ले लिया। इरफ़ान ने धक्के शुरू किए –
पहले धीरे, फिर तेज़। आयशा की कमर ऊपर-नीचे हो रही थी, उसके स्तन उछल रहे थे। वो सोच रही थी, "और जोर से... जैसे राहुल करेगा।"चुदाई शुरू हुई – इरफ़ान का लंड अंदर-बाहर, आयशा की मोअन्स कमरे में गूंज रही थीं।
"ओह इरफ़ान... हां..." लेकिन इरफ़ान का स्टैमिना कम था। धक्के तेज़ हुए, लेकिन सिर्फ़ 5 मिनट बाद वो सांस फूलने लगा। आयशा की पाकीज़ा चूत अभी गर्म थी, वो ऑर्गेज्म के करीब भी नहीं पहुंची थी। इरफ़ान ने ज़ोर से धक्का मारा, "आह... आयशा!" और 10 मिनट में ही झड़ गया –
उसका गर्म सीमेन आयशा के अंदर। वो थककर आयशा के बगल में लेट गया, सांस लेते हुए। "अच्छा था ना?" उसने पूछा।आयशा ने हां कहा, लेकिन अंदर से वो प्यासी रह गई। उसकी चूत अभी भी गीली थी, तड़प रही थी।
वो उठी, बाथरूम गई, खुद को साफ किया। आईने में देखा – उसका जिस्म अभी भी गर्म, निप्पल्स सख्त। "ये क्या कर रही हूं? राहुल की वजह से..." वो सोच रही थी। लेकिन अब वो तड़प और बढ़ गई थी।
रात भर वो जागती रही, राहुल के बारे में सोचते हुए।सुबह होने वाली थी, लेकिन आयशा का दिल अब बदल चुका था। वो जानती थी, ये सिर्फ शुरुआत है।
सुबह की पहली किरण कमरे में घुसी, लेकिन आयशा की आंखें पहले से खुली थीं। रात की वो बेचैनी अब एक भारी बोझ बन चुकी थी। वो बिस्तर पर बैठी, चादर से खुद को ढके, खुद से सवाल कर रही थी। "मैं कैसे एक गैर मर्द के बारे में ऐसा सोच सकती हूं? वो भी ... राहुल।
मैं शादीशुदा हूं, ये सब गलत है। मुझे माफ़ करे, मैंने खुद को इतना गिरा दिया।" गिल्ट की तेज़ लहर उसके सीने में उठी। आंसू उसके गालों पर बहने लगे। "कैसे मैं इरफ़ान के साथ रहते हुए किसी और के बारे में... वो भी ऐसे विचार।"आयशा ने फैसला किया कि अब बस। वो उठी, वुज़ू किया, और की चादर बिछाई। पढ़ते हुए वो बार-बार तौबा मांग रही थी। ", मुझे माफ़ कर दो। मैंने गलत सोचा, गलत महसूस किया। मुझे अपनी सही राह पर रखो, मुझे कमज़ोर मत होने दो।" वो बार-बार कर रही थी – "... ।" * खत्म होने के बाद वो थोड़ा शांत हुई।
"अब कभी राहुल के बारे में नहीं सोचूंगी। ये सब खत्म।" लेकिन दिल की गहराई में वो जानती थी कि ये इतना आसान नहीं।अब अगले दिन की रूटीन में लग जाना था। आयशा ने खुद को व्यस्त रखने का फैसला किया। सुबह 7:30 बजे वो किचन में पहुंची। इरफ़ान अभी सो रहा था। वो चाय बनाई – दो कप, एक उसके लिए, एक इरफ़ान के लिए। चाय उबालते हुए उसका मन पैरासान हो गया। "राहुल की मुस्कान... वो कैफ़े में कैसे देख रहा था।" वो चम्मच जोर से हिलाने लगी, लेकिन खयाल नहीं गया।
"नहीं, *!" वो खुद को डांटी और इरफ़ान को जगाने गई। "उठो, चाय तैयार है।" इरफ़ान उठा, उसे किस किया, लेकिन आयशा ने नज़रें झुका लीं।8 बजे इरफ़ान नाश्ता करके ऑफिस निकल गया।
आयशा अकेली रह गई। वो घर की सफ़ाई शुरू की – पहले बेडरूम से। बिस्तर ठीक करते हुए रात की याद आई। "राहुल अगर यहां होता तो..." वो रुक गई, सिर झटका। "पागल हो गई?" फिर वो झाड़ू लगाने लगी, हर कमरे में। लिविंग रूम में सोफा साफ करते हुए बार-बार ध्यान राहुल की तरफ गया।
"उसकी आवाज़... इतनी गहरी। क्या वो भी मेरे बारे में सोचता होगा?" मन पैरासान था, लेकिन वो जोर से झाड़ू चलाती रही।9:30 बजे वो कपड़े धोने लगी। वॉशिंग मशीन में कपड़े डालते हुए, पानी की आवाज़ में भी राहुल का नाम गूंज रहा था। "राहुल शर्मा... *, लेकिन इतना आकर्षक।"
वो मशीन चला दी और बालकनी में गई, जहां से शहर की गलियां दिखती थीं। "शायद वो कहीं इसी शहर में है।" खयाल आया, और वो वापस अंदर भागी। "बस कर आयशा, इरफ़ान तेरा पति है।"10:30 बजे खाना बनाने का वक्त। वो सब्जियां काटने लगी – आलू, टमाटर, प्याज़। चाकू चलाते हुए उंगली पर छोटा कट लग गया। "ओह!" खून देखकर राहुल का खयाल – "वो पट्टी बांधता।"
वो हंस पड़ी, फिर गिल्ट हुआ। "******, मुझे माफ़ करो!" वो नेक्स्ट आधा घंटा चिकन करी बनाती रही – मसाले डालते, हिलाते। लेकिन हर बार चम्मच हिलाने पर राहुल। "क्या वो मुझे मैसेज करेगा?" मन पैरासान था, सिर दर्द होने लगा। दोपहर 12 बजे वो नहाने गई। शावर के नीचे, पानी उसके जिस्म पर गिर रहा था। स्तनों पर साबुन लगाते हुए रात की तड़प याद आई।
"राहुल का स्पर्श..." वो रुक गई, पानी बंद किया। "नहीं!"1 बजे लंच किया – अकेले, टीवी पर न्यूज़ लगाया, लेकिन ध्यान नहीं। शाम 3 बजे वो सहेलियों से बात करने का फैसला किया। फोन लगाया फातिमा को। "आओ घर, बात करनी है। ज़ारा को भी बुला ले।" आधे घंटे बाद दोनों आईं। चाय बनाई, बिस्किट रखे। आयशा ने सब बता दिया – गिल्ट, *****, पैरासान मन, बार-बार राहुल के खयाल। "मैं कैसे ऐसा सोच सकती हूं?
ये गुनाह है।"फातिमा और ज़ारा ने पहले गंभीरता से सुना, फिर मज़ा लेना शुरू किया। ज़ारा हंस पड़ी, "अरे वाह, भाभी! तू तो राहुल के जाल में फंस गई। वो कितना हैंडसम था ना? उसकी आंखें... अगर मैं होती तो ज़रूर फ्लर्ट करती।"
फातिमा ने उकसाया, "हां आयशा, थोड़ा मज़ा ले ले। इरफ़ान अच्छा है, लेकिन तू हमेशा घर में क्यों कैद? बाहर निकल, नौकरी कर। नए लोग मिलेंगे, राहुल जैसा कोई मिल जाए तो क्या बात!" ज़ारा ने जोड़ा, "हां, नौकरी कर ले। तू पढ़ी-लिखी है, फैशन स्टोर में या कॉलेज में। घर से बाहर निकलेगी तो ऐसे खयाल आएंगे, लेकिन मज़ेदार होंगे।
राहुल से मिलने का चांस भी मिलेगा!"आयशा ने कहा, "नहीं, मैं नहीं करूंगी।" लेकिन सहेलियों की बातें उसके मन में घर कर गईं। "नौकरी... बाहर निकलना... राहुल से मिलना।
" शाम हो गई, सहेलियां चली गईं। आयशा ने इरफ़ान के लिए डिनर तैयार किया, लेकिन मन में नौकरी का खयाल घूम रहा था। गिल्ट कम हुआ, लेकिन उत्सुकता बढ़ गई। अब वो सोच रही थी, "शायद नौकरी करके ज़िंदगी बदल जाए।"


![[+]](https://xossipy.com/themes/sharepoint/collapse_collapsed.png)