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Adultery हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)
#39
भाग ~ ११





जैसे ही घर पहुंचा तो देखा बापू बाहर मवेशियों को चारा भूसा डाल रहे थे। उन्हें देखते ही मुझे खेत के कमरे वाली उनकी करतूत याद आ गई और मेरी धड़कनें थोड़ा तेज हो गईं। मैं उनका सामना नहीं करना चाहता था इस लिए तेजी से घर के अंदर की तरफ बढ़ा मगर उन्होंने मुझे देख लिया।

"अरे राजू कहां था रात को।" उन्होंने मुझे आवाज दे कर पूछा।

"वो...वो मझले काका के घर में था।" मैंने थोड़ा झिझक के साथ बताया─"काका सुनीता और रानी के लेने नाहरपुर जा रहे थे तो बोले रात काकी के पास ही रुकूं।"

"अच्छा ठीक है।" बापू ने कहा─"एक काम कर तू नाश्ता कर ले और अनीता के साथ खेतों पर चला जा। आज गेहूं की गहाई करनी है।"

"ठीक है।" मैंने कहा और अंदर चला गया।

अंदर मां रसोई में नाश्ता बना रही थी। मुझे देखते ही बोली दांत साफ कर के नाश्ता कर ले तो मैंने उन्हें बताया कि अभी संडास जा रहा हूं मैं। 

करीब आधा घंटे में मैं सुबह वाले सारे काम से फुर्सत हुआ और नाश्ता करने के लिए चौके में आ के बैठ गया। अनीता रसोई में थाली रखे नाश्ता लगा रही थी। थोड़ी ही देर में वो थाली ले के आई और मेरे बगल से बैठ गई।

"दूर बैठ मुझसे।" मैंने उसको घूरा─"और ये क्या मेरी थाली कहां है।"

"अरे उसके साथ ही खा ले बेटा।" मां ने कहा─"बहन ही तो है तेरी।"

"बहन नहीं छिपकली है ये।" मैंने झट कहा─"कल बोल रही थी मुझसे कि बात मत करना। इस लिए मुझे नहीं खाना इसके साथ।"

"क्यों रे...तू ऐसा बोल रही थी मेरे राजा बेटा को।" मां ने अनीता को घूरा।

अनीता ये सोच कर हड़बड़ा गई कि कहीं मैं मां को ये न बता दूं कि अंदर कमरे में हमारे बीच क्या हुआ था और कैसी बातें हुईं थी।

"अरे वो तो मैं ऐसे ही बोल रही थी मां।" फिर उसने जल्दी से कहा─"तू तो जानती है कि हम दोनों का ये रोज का है।"

"हां ठीक है अब ज्यादा बातें न कर।" मां ने उसे घूरते हुए ही कहा─"और जल्दी से खा के राजू के साथ खेतों पर जा।"

इधर मेरा मूड बिगड़ा हुआ था। अनीता के साथ नाश्ता करने की इच्छा नहीं थी मेरी मगर मां के कहने पर मैं मन मार कर उसके साथ ही नाश्ता करने लगा।

"मुंह क्यों बना रहा है।" अनीता ने धीमे से कहा─"मेरा भी तेरे साथ खाने का मन नहीं है....गंदा कहीं का।"

"देख ले मां ये गंदा बोल रही है मुझे।" मैंने झट उसकी शिकायत मां से कर दी।

"नहीं मां झूठ बोल रहा है ये।" अनीता हड़बड़ा कर बोली─"मैं तो चुपचाप नाश्ता कर रही हूं।"

"मुझे बहरी न समझ।" मां ने गुस्से से देखा अनीता को─"मुझे भी सुनाई दिया कि तूने क्या बोला है उसे।"

अनीता कुछ बोल न सकी। सिर झुकाए चुपचाप नाश्ता करने लगी। इधर मां से उसको डांट पड़वा कर मैं खुश हो गया।

तभी बापू आ गए। उन्हें देख मेरी धड़कनें अनायास ही बढ़ गईं। कल से पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि घर के अंदर मैं किसी से डरा होऊं और चुप रहा होऊं। मगर कल जो कुछ देखा था और जो कुछ बापू ने बोला था उसके बाद से मुझमें ये बदलाव आ गया था। जाने क्यों बापू को देखते ही मेरी धड़कनें बढ़ जाती थीं और मैं कुछ बोलने की हिम्मत नहीं कर पाता था।

"दशरथ तो देर से ही आएगा।" उधर बापू मां से बोले─"उसकी वजह से मझली(मंजू काकी) भी देर से ही आएगी। तो तू ऐसा करना छोटी(संगीता काकी) और तू कटाई करना...मैं पुल्लियां बांधूंगा और श्यामू इन दोनों के साथ रह कर गेहूं की गहाई करवा लेगा।"

"हां यही ठीक रहेगा।" मां ने कहा─"और हां आमों की भी तकाई करनी होगी। वो बगल वाली शकुंतला बता रही थी कि दोपहर में जब वहां कोई नहीं होता तो गांव के कुछ लड़के अमिया पीटने जाते हैं।"

"हां मुझे भी कई लोगों ने ये बताया है।" बापू ने हमारे बगल से ही एक बोरी बिछा कर बैठते हुए कहा─"मैं सोच रहा हूं कि जब तक कटाई और गहाई नहीं हो जाती तब तक आमों को बच्चे लोग ताक लेंगे।"

"ताक तो लेंगे।" मां ने थाली में बापू के लिए नाश्ता सजाते हुए कहा─"मगर लूक लगने से अगर ये बीमार पड़ गए तो मुसीबत हो जाएगी।"

"हां जानता हूं।" बापू ने कहा─"मगर मजबूरी है क्या करें...कटाई गहाई छोड़ कर हम आम तो नहीं ताक सकते न। कुछ दिनों तक तो इन्हें ही आमों की तकाई करनी होगी। दशरथ की बेटियां भी इन दोनों के साथ में रहेंगी तो बारी बारी से ताक लिया करेंगे ये लोग।"

"ठीक है...जैसा तुम्हें ठीक लगे।" मां ने कहा और आ कर बापू के सामने थाली रख दी।

थोड़ी देर में मेरा और अनीता का नाश्ता हो गया तो अनीता जूठी थाली ले कर आंगन में नर्दे के पास रखने चली गई और मैं उठ कर आंगन में रखी एक खाट पर बैठ गया। असल में मैं बापू के पास नहीं बैठे रहना चाहता था।

"अरे राजू...जा के देख श्यामू बैलों को ले कर गया कि नहीं।" बापू ने ऊंचे स्वर में मुझसे कहा।

मैं खाट से उठ कर श्यामू काका के घर की तरफ दौड़ पड़ा। कुछ ही देर में मैं श्यामू काका के घर पहुंच गया। 

"अरे करेजा...सही वक्त पर आया है तू।" श्यामू काका चौके के पास बैठे बोले─"आ बैठ मेरे पास...तू भी नाश्ता कर ले।"

"नहीं काका...मैंने अभी अभी नाश्ता किया है।" मैंने कहा─"वो बापू ने मुझे ये देखने के लिए भेजा है कि तुम बैलों को ले कर खेत गए हो कि नहीं।"

"हां वो मैं नाश्ता कर के निकलने ही वाला हूं।" श्यामू काका ने बताया─"वैसे आज तुझे गहाई करवानी है। बड़े भैया ने तुझे ये बताया कि नहीं।"

"हां बताया उन्होंने।" मैंने कहा─"लेकिन जब दशरथ काका आ जाएंगे तो हमें आमों की रखवाली करनी होगी।"

"हां वो भी जरूरी है करेजा।" काका ने कहा─"गांव के कुछ लड़के अमिया झोरने पहुंच जाते हैं दोपहर में। अगर रखवाली नहीं होगी तो पेड़ों में कुछ नहीं बचेगा बबुआ।"

तभी संगीता काकी थाली ले कर आईं और काका के सामने रख दी।

"अरे एक और थाली लगा के ले आ।" काका ने काकी से कहा─"राजू भी खाएगा मेरे साथ में।"

"न काका मैं नहीं खाऊंगा।" मैंने पेट पकड़ते हुए कहा─"मेरा पेट भरा हुआ है।"

"अरे तो क्या हुआ करेजा।" श्यामू काका ने कहा─"एक दो रोटी और खा ले मेरे साथ। तेरी उमर में मैं पेट भरा होने के बाद भी भौजी के हाथ की बनी चार रोटियां खा जाता था।"

"पर मैं नहीं खा पाऊंगा काका।" मैंने हाथ खड़े कर दिए─"तुम्हारे जैसी क्षमता नहीं है मुझमें।"

"क्षमता बनानी पड़ती है राजू।" काकी एक दूसरी थाली में नाश्ता लाते हुए बोलीं─"तुम्हारे काका अपनी भौजी के हाथ का बना खा लेते थे तो तुम अपनी इस काकी के हाथ का बना खा लो।"

मैं मना करता ही रह गया मगर न काका माने न काकी। मेरे सामने थाली में दो रोटी, टमाटर की चटनी और आम का अचार रख दिया था काकी ने। मैंने असहाय भाव से काका काकी दोनों को देखा।

"अरे खा ले करेजा।" काका ने मुस्कुराते हुए कहा─"तेरी काकी ने इतना प्यार दुलार से कहा है तो खा ले।"

मैंने काकी की तरफ देखा। वो सच में बड़े प्यार से मुझे देखते हुए मुस्कुरा रहीं थी। मैं भी जबरन मुस्कुराया और फिर धीरे धीरे खाने लगा।

ऐसी ही बातों के साथ थोड़ी देर में मेरा और काका का नाश्ता हो गया। मैंने मुश्किल से उन दो रोटियों को खाया था मगर काका ने कई बार रोटियां ली और पेट भर के खाया था।

"तू मेरे साथ ही चलेगा या अपने बापू के साथ आएगा।" काका ने बरामदे में रखी खाट पर बैठे पान सुपाड़ी खाते हुए मुझसे पूछा।

"चलने को तो मैं तुम्हारे साथ ही चल दूंगा काका।" मैंने कहा─"पर क्या पता बापू को मुझसे कुछ और भी कहना हो और...और हां अनिता भी है। उसको भी तो मेरे साथ ही खेतों पर जाना है।"

"तो फिर तू जा घर।" काका ने कहा─"मैं पान सुपाड़ी खा लूं फिर बैलों को ले के निकलता हूं....बड़े भैया पूछें तो बता देना कि मैं बैलों को ले कर चला गया हूं।"

मैंने सिर हिलाया और दौड़ पड़ा अपने घर की तरफ। घर आ कर मैंने बापू को बताया कि काका बैलों को ले कर जा रहे हैं।

बापू ने मुझे अनीता को साथ ले कर जाने को कहा और बरामदे में जा कर अपनी थैली से पान सुपाड़ी खाने बैठ गए। 

मैं अनीता को ले कर घर से खेतों के लिए निकल पड़ा। एकाएक मुझे खयाल आया कि मंजू काकी अभी भी घर में अकेली हैं तो क्या बापू इसे सुनहरा मौका समझ कर उनके घर जाएंगे। वैसे तो मैंने दोनों को खेतों पर रंगे हाथों पकड़ लिया था तो संभव है कि दोनों ही डर के कारण ऐसा न करें मगर क्या पता....बापू इसके बावजूद काकी के घर पहुंच ही जाएं। मैंने सोचा क्या मुझे ये देखना चाहिए। फिर खयाल आया कि अगर बापू ने देख लिया और वो गुस्सा हो गए तो????

"अब तुझे क्या हुआ।" तभी अनीता ने मेरा ध्यान भंग किया─"इतना चुप हो के क्या सोच रहा है।"

"क..कुछ भी तो नहीं।" मैं ऐसे चौंक पड़ा जैसे मेरी चोरी पकड़ी गई हो। फिर सम्हल कर बोला─"और अगर कुछ सोच भी रहा हूं तो तुझे उससे क्या...अपने काम से काम रख...छिपकली कहीं की।"

अनीता ने गुस्से से मुझे घूरा।

"मैं छिपकली हूं तो तू क्या है।" फिर उसने पलटवार किया─"तू न बहुत गंदा है....एक नंबर का कमीना है....कुत्ता है।" 

"ज्यादा बोलेगी तो एक लगा दूँगा कान में।" मैंने एकदम से तैश में आ कर कहा─"और बता तो मैं किस बात पर कमीना और कुत्ता हो गया....हां बता मुझे।"

अनीता फौरन कुछ बोल न सकी। थोड़ा सकपका गई थी वो या उसे समझ ही न आया था कि क्या जवाब दे...मगर वो मुझसे हार मानने वालों में से नहीं थी।

"तू कमीना है तो है...कुत्ता है तो है बस।" अनीता ने नजरें चुराते हुए कहा।

पता नहीं क्यों मुझे उसकी बात सुन कर हंसी आ गई। मुझे हंसते देख उसने चौंक कर मेरी तरफ देखा। फिर बुरा सा मुंह बना लिया।

"हंस क्यों रहा है।" वो बोली─"क्या मेरे कुत्ता कमीना बोलने से तुझे मजा आया है जो ऐसे हंस रहा है।"

"नहीं...मुझे इस बात पर हंसी आई कि तुझे कोई जवाब नहीं सूझा।" मैंने कहा─"और तू असल बात बता नहीं सकी।"

"कौन सी असल बात।" अनीता ने आँखें सिकोड़ कर मुझे देखा।

"तू जानती है।"

"मैं कुछ नहीं जानती...झूठ मत बोल।"

"नहीं तू...अच्छे से जानती है।"

"मैंने कहा न मैं नहीं जानती।" अनीता ने खिसिया कर कहा─"कुछ भी बकता है...गंदा कहीं का।"

"अच्छा तो बता...किस बात पर गंदा हूं मैं।" मैंने सड़क पर रुक कर उससे पूछा।

अनीता को भी मजबूरन रुक जाना पड़ा। मेरे पूछने पर वो फिर से कुछ पलों तक कुछ न बोली। उसके चेहरे पर बेबसी साफ दिखाई दी मुझे।

"क्या हुआ...बता न।" मैंने मुस्कुरा कर कहा─"अगर तुझमें हिम्मत है तो बता किस बात पर गंदा हूं मैं।"

"मेरी हिम्मत न देख।" उसने आँखें फैला कर कहा─"तेरे से ज्यादा हिम्मत है मुझमें।"

"हां तो बता न फिर।" मैंने उसे उकसाया─"मैं भी तो देखूं सच में मुझसे ज्यादा तेरे में हिम्मत है या झूठ मूठ का दम भर रही है।"

"बकवास न कर।" वो फिर से खिसियाई।

"बस निकल गई हवा।" मैंने उसकी खिल्ली उड़ाई─"सुन...गरजने वाले बरसते नहीं और बरसने वाले गरजते नहीं तेरी तरह....समझी छिपकली।"

अनीता अब बुरी तरह किलस गई थी। मैंने उसे ताव दे दिया था और वो ताव खा भी गई थी इस लिए उसका चेहरा तमतमा गया था।

"तू समझता क्या है खुद को।" फिर वो मेरे कंधे पर मार कर बोली─"तेरे से एक आना कम नहीं हूं मैं समझा।"

"फिर से गरज रही है।" मैंने फिर उसकी खिल्ली उड़ाई─"तू बस फालतू में गरजती ही रह बाकी तेरे में कोई दम नहीं है।"

"तुझमें बड़ा दम है न तो दिखा।" उसने मुझे घूरा।

"मेरे में तो बहुत दम है...तू जो बोलेगी वो दिखा सकता हूं मैं।" मैंने सीना चौड़ा कर के कहा─"लेकिन तेरे में दम नहीं है इस लिए जो मैं कर सकता हूं वो तू नहीं कर सकती। बस बक बक ही कर सकती है तू....हां।"

"ज्यादा उड़ मत।" अनीता फिर खिसिया गई─"तू भी बक बक ही कर रहा है। तुझमें भी इतना दम नहीं है कि जो मैं बोलूं वो तू कर के दिखा दे।"

"लगा शर्त।" मैंने अपनी हथेली उसके सामने की─"तू शर्त लगा फिर देख मैं क्या करता हूं।"

"हां तो लगा ले शर्त।" अनीता भी तैश में थी─"अगर सच में तुझमें दम है तो तू वही करेगा जो मैं बोलूंगी....वरना यही मानूंगी तू बस डींगे मारता है।"

"हां ठीक है।" मैंने कहा─"अब शर्त सुन..जो तू बोलेगी अगर मैंने वो कर के दिखा दिया तो फिर तू भी वो करेगी जो मैं बोलूंगा। मंजूर है तो बोल...नहीं तो अभी के अभी मान ले कि तेरे में कोई दम नहीं है।"

"हां मंजूर है मुझे।" अनीता ने ताव में आ कर बिना सोचे समझे शर्त मंजूर कर ली।

"ऐसे नहीं।" मैंने कुछ सोचते हुए कहा─"मां की कसम खा के बोल।"

"मां की कसम क्यों।" अनीता ने आँखें सिकोड़ी।

"मुझे तुझ पर भरोसा नहीं है।" मैंने कहा─"क्या पता बाद में तू शर्त पूरी करने से मुकर जाए....इस लिए मां की कसम खा के बोल कि तुझे ये शर्त मंजूर है।"

"मुझे भी तुझ पर भरोसा नहीं है।" अनीता ने कहा─"तू भी मां की कसम खा के बोल कि मैं जो करने को कहूंगी तू वो कर के दिखाएगा।"

"हां ठीक है।" मैंने झट कहा─"मैं मां की कसम खा के बोलता हूं कि तू जो बोलेगी वो कर के दिखाऊंगा। चल अब तू भी मां की कसम खा के यही बात बोल।"

जवाब में अनीता ने भी ताव में मां की कसम खा ली। इधर मैं अंदर ही अंदर बड़ा खुश हुआ उसके इस तरह कसम खा लेने से। उधर अनीता भी इस बात से खुश दिखी कि मैंने मां की कसम खा ली है इस लिए अब मैं वही करूंगा जो वो बोलेगी। जाहिर है उसके मन में मुझसे बदला लेने का ही कोई न कोई खयाल होगा। मैं जानता था वो कुछ ऐसा करने को बोलेगी जो उसकी समझ में मैं कर ही नहीं सकता।

"चल अब बता क्या करना है मुझे।" मैंने कहा।

"सोचने दे मुझे।" अनीता ने अपने सिर को हल्के से खुजाते हुए कहा।

"अब क्या चार दिन लगाएगी सोचने में।" मैंने उसके सिर पर हल्के से चपत लगाई।

"कुत्ता...सोचने दे न मुझे।" उसने खिसिया कर आँखें दिखाई मुझे।

मैं चुप हो गया। हम दोनों खेतों की तरफ जा रहे थे। खेत दिखने लगे थे। इधर मैं भी सोचने में लग गया था कि आखिर अनीता मुझे क्या करने को कहेगी। शर्त जीतने के बाद का तो मैंने अभी से सोच लिया था कि उससे क्या करवाऊंगा।

थोड़ी ही देर में हम खेतों पर पहुंच गए। अभी से धूप में तपन महसूस हो रही थी जबकि अभी तो सुबह का ही समय था। खेतों पर बने मकान के पास जैसे ही हम पहुंचे तो अनायास ही मुझे कल की वो घटना याद आ गई जो मकान के उस छोटे से कमरे में घटी थी। कमरे में मेरे बापू मंजू काकी को खाट पर झुकाए पीछे से उन्हें चोदने में लगे हुए थे। पलक झपकते ही मेरे बदन में एक रोमांचक झुरझुरी दौड़ गई।

"मैंने सोच लिया।" तभी अनीता थोड़ा ऊंची आवाज में बोल पड़ी तो मैंने चौंक कर उसको देखा।

"अच्छा...तो फिर बता क्या करना है मुझे।"

"अगर तुझमें हिम्मत है तो फूला कुम्हार के खेत वाली बावड़ी में घुस के दिखा।" अनीता ने बाएं तरफ फूला कुम्हार के खेतों की तरफ इशारा कर के कहा।

फूला कुम्हार के खेत हमारे खेतों से थोड़ा दूर थे मगर यहां मसला दूर का नहीं था बल्कि कुछ और था। असल में पूरा गांव जानता है कि फूला के खेत की बावड़ी के अंदर एक खोह(सुरंग) है जो अंदर ही अंदर पता नहीं कहां तक चली गई है। कई बार उसमें से ऐसे खतरनाक जीव जंतु दिखे हैं जो इंसानों की जान के लिए खतरा हैं। हालांकि बावड़ी थोड़ी गहरी है इस लिए वो जीव ऊपर जमीन पर नहीं आ पाते मगर जब बरसात में बावड़ी के पानी का स्तर ऊपर आ जाता है तो खतरा बहुत ज्यादा होता है। कई लोगों ने सरपंच से इस बारे में शिकायत की थी कि फूला कुम्हार को अपने खेत की उस बावड़ी को मिट्टी डाल कर भाठ देना चाहिए मगर वो ऐसा करने से साफ मना कर देता है। उसका यही कहना होता है कि आज तक उसकी बावड़ी की वजह से किसी को कोई नुकसान नहीं हुआ है तो वो क्यों उसे भाठे। दूसरे जब उसे कभी कोई खतरा नहीं हुआ तो बाकी के लोग क्यों ऐसा बोलते हैं। बात भी सही थी कि आज तक कभी किसी की जान का नुकसान नहीं हुआ था और न ही किसी के साथ कोई हादसा हुआ था। बस एक डर था लोगों में कि क्या पता कभी ऐसा हो ही जाए।

गांव का कोई भी व्यक्ति उस बावड़ी के पास नहीं जाता था। हर कोई अपने बच्चों को भी यही सलाह देता था कि भूल कर भी फूला के खेतों पर न जाए और अगर जाएं भी तो उस बावड़ी के पास न जाएं।

फूला के खेत की वो बावड़ी बहुत पुरानी थी। किसी को नहीं पता कि उसे किसने बनवाया था। गांव के बूढ़े बुजुर्ग यही कहते हैं कि वो खुद भी छोटे से उसे ऐसी ही देखते आए हैं। उनके बुजुर्गों का कहना था कि पुराने समय में वो बावड़ी राजा रजवाड़ों ने बनवाई थी। बावड़ी में बनी खोह(सुरंग) के द्वारा राजा के गुप्तचर आया जाया करते थे। तब से वो ऐसी ही थी। अब क्योंकि राजा रजवाड़े रहे नहीं और न ही उनके गुप्तचर तो बावड़ी सदियों से ऐसे ही सूनी पड़ी रही थी। फूला कुम्हार के दादा परदादा ने अपने समय में उसे ऐसे ही रहने दिया था क्योंकि उसमें पानी हमेशा रहता था जो पीने के काम आता था।

खैर अनीता ने मुझे उसी बावड़ी में घुसने को कहा तो एक बार के लिए तो मेरी सांसें हलक में ही फंस गईं। भय की तीव्र लहर पूरे बदन में दौड़ गई थी।

"पागल है क्या।" मैं भय से बोल पड़ा─"उस खतरनाक बावड़ी में आज तक जब कोई अन्दर नहीं घुसा तो भला मैं कैसे घुस सकता हूं। नहीं नहीं...तू कुछ और करने को बोल मुझे।"

"क्यों...निकल गई हवा।" अनीता मुस्कुरा उठी─"अभी तो बड़ा सीना चौड़ा कर के बोल रहा था कि मेरे कहने पर कुछ भी कर सकता है तो अब कर के दिखा।"

"यार तुझे भी पता है कि बावड़ी में घुसना कितना खतरनाक है।" मैंने कहा─"मां बापू को पता चला तो जान ले लेंगे और....और तू भी तो सोच कि अगर सच में मेरे साथ कुछ हो गया तो क्या होगा। घर वाले तो रो रो के पागल ही हो जाएंगे। और...क्या तू भी ये चाहती है कि मेरे साथ कुछ बुरा हो जाए।"

"न...नहीं नहीं।" अनीता झट बोली─"मैं ऐसा नहीं चाहती।"

"तो फिर कोई दूसरा काम करने को बोल।" मैंने कहा─"जिसमें मेरी जान वान जाने का खतरा न हो।"

अनीता सोचने लगी। मैंने भी राहत की सांस ली। अभी वो सोच ही रही थी कि तभी श्यामू काका बैलों के साथ आते दिखाई दिए।

"ले छोटे काका आ गए।" मैंने कहा─"अब कैसे हम अपनी शर्त पूरी कर सकेंगे।"

"तू हार मान ले तो पूरी हो जाएगी शर्त।" अनीता ने चिढ़ाते हुए कहा।

"न...मैं ऐसे हार नहीं मानूंगा।" मैंने दृढ़ता से कहा─"शर्त तो अब लग चुकी है हमारे बीच। इस लिए जब तक सच में हम में से किसी एक की हार नहीं होगी तब तक ये खेल खत्म नहीं होगा। एक काम कर तू तब तक सोच ले कि मुझसे क्या करवाएगी। गहाई से जब हम फुर्सत हो जाएंगे तब ये खेल फिर से शुरू करेंगे...क्या बोलती है।"

"हां ठीक है।" अनीता न कहा─"मुझे मंजूर है। बस तू मत मुकर जाना।"

"अरे तू अपनी सोच...छिपकली।" मैंने उसे चिढ़ाया तो उसका मुंह बन गया।

"बड़े भैया नहीं आए क्या अभी।" श्यामू काका ने आते ही पूछा।

"आते ही होगे।" मैंने बताया।

"एक काम करते हैं।" श्यामू काका ने कहा─"जब तक बड़े भैया आते हैं तब तक हम इन बैलों से गहाई शुरू कर देते हैं।"

मैंने सहमति में सिर हिलाया तो काका बैलों को ले कर खलिहान की तरफ चल पड़े। उनके पीछे मैं और अनीता भी चल पड़े।

कुछ ही देर में हम खलिहान में थे। काका ने गेहूं की ढेर सारी पुल्लियां साफ सुथरे खलिहान में गोलाकार में फैला दी। फिर जुएं में दोनों बैलों को पिरोया। दोनों बैलों के मुंह में जालीदार डोरी का मुस्का लगा दिया ताकि बैल गेहूं न खा सकें। 

"चल करेजा।" सब व्यवस्थित करने के बाद काका ने मुझसे कहा─"बैलों को हांकना शुरू कर।"

मैं हाथ में एक डंडा ले कर बैलों के पीछे पीछे उन्हें हांकते हुए चलने लगा। दोनों बैल जुएं में नधे हुए थे इस लिए मेरे हांकते ही गोलाकार परिधि पर चलते हुए घूमने लगे। उनके चलने से नीचे जमीन पर फैली हुई गेहूं की पुल्लियां कुचली जाने लगीं।

"तू खड़ी क्या देख रही है।" मैंने चुपचाप खड़ी अनीता को घुड़की दी─"चल तू भी मेरे साथ बैलों को हांक।"

"अरे उसे खड़ी रहने दे करेजा।" श्यामू काका ने कहा─"अभी बड़े भैया आएंगे तो वो भी दो बैलों को ऐसे ही जुएं में नध देंगे...फिर तेरी तरह ये भी उन्हें हांकना शुरू कर देगी।"

"अरे तो क्या तब तक ये महारानी की तरह खड़ी रहेगी काका।" मैंने बुरा सा मुंह बनाया।

"अरे तो क्या हो गया करेजा।" श्यामू काका बोले─"तेरी छोटी बहन है...थोड़ी देर सुस्ता लेने दे। कुछ देर में तो वैसे ही बेचारी बैलों के पीछे चक्कर लगाएगी।"

"इसको मेरी खुशी नहीं देखी जाती छोटे काका।" अनीता ने कहा─"ये कहने को मेरा बड़ा भाई है लेकिन इसके अंदर मेरे लिए न कोई दया है न कोई प्यार।"

"ऐसी बात नहीं है बिटिया।" श्यामू काका ने एक बड़े लट्ठ से बाहर की तरफ फैल जा रहे गेहूं को वापस बैलों के नीचे खिसकाते हुए कहा─"उसके अंदर तेरे लिए दया स्नेह प्यार सब है....बस वो तुझे दिखाता नहीं है कभी।"

"ऐसा बोल कर तुम मेरा मन बहल रहे हो छोटे काका।" अनीता ने मेरी तरफ देख कर बुरा सा मुंह बनाया─"जबकि सच यही है कि इसके अंदर सच में अपनी छोटी बहन के लिए कोई दया कोई प्यार नहीं है। अगर होता तो ये हर वक्त मुझसे झगड़ा न करता और न ही मुझे तंग करता।"

"तू अभी छोटी है बिटिया।" श्यामू काका ने जैसे उसे समझाया─"इस लिए तू सच को महसूस नहीं कर सकती। हर भाई बहन के बीच इसी तरह झगड़ा होता है। वो दोनों इसी तरह एक दूसरे को तंग करते हैं....क्योंकि यही उनके प्यार करने का तरीका होता है। इंसान अपनी उमर के हिसाब से ही अपनी भावनाओं को जाहिर करता है। छोटी उमर में प्यार और स्नेह जैसी भावनाओं से वो अंजान होते हैं इस लिए अपनी भावनाओं को झगड़े के रूप में व्यक्त करते हैं। फिर जब बड़े हो जाते हैं और उन्हें समझ आती है तब ये झगड़ा एकदम से बंद हो जाता है...उसके बदले वही प्यार और स्नेह खुल कर बाहर आ जाता है जिससे छोटी उमर में वो अंजान होते थे। छोटी उमर में किए झगड़े जब याद आते हैं तो खुद पर ये सोच कर हंसी आती है कि कितने नादान हुआ करते थे हम जो एक दूसरे से हर वक्त लड़ते थे और हर वक्त एक दूसरे को तंग करते थे। जबकि वो भी एक तरह का स्नेह ही होता है मगर नासमझ होने के कारण हम समझ नहीं पाते।"

"मतलब...तुम ये कह रहे हो काका कि अभी जो हम एक दूसरे से झगड़ा करते हैं उसमें भी हमारा एक दूसरे के लिए प्यार ही होता है।" मैंने चकित हो कर काका से पूछा।

"हां करेजा।" काक ने कहा─"ये एक तरह का भाई बहन के बीच प्यार ही होता है। लड़ाई झगड़ा दो तरह का होता है। एक वो जो तुम दोनों करते हो और एक वो जो दुश्मन लोग करते हैं। दोनों झगड़ों में बहुत फर्क होता है। तुम दोनों के झगड़े की एक सीमा होती है, उसमें गुस्से का अंश बस नाम के लिए होता है जबकि दुश्मन के झगड़े में कोई सीमा नहीं होती और न ही उसके गुस्से के अंश में। इसी लिए वो एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं। एक दूसरे की जान तक ले लेते हैं। अब तू खुद सोच कि क्या तेरा और तेरी बहन का झगड़ा इस तरह का है।"

"न..नहीं काका।" मैंने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा─"हम दोनों को एक दूसरे पर गुस्सा तो आता है लेकिन वो गुस्सा ऐसा नहीं होता है कि हम एक दूसरे का दुश्मनों की तरह कत्ल ही कर दें।"

"हां छोटे काका।" अनीता भी बोल पड़ी─"राजू सही कह रहा है। मुझे भी इसके ऊपर ऐसा गुस्सा कभी नहीं आता।"

"तो अब समझ जाओ कि तुम दोनों के बीच में जो झगड़ा होता है वो असल में भाई बहन के बीच का प्यार ही होता है।" काका ने कहा─"भले ही वो लड़ाई झगड़ा लगता है मगर असल में वो सिर्फ प्यार और स्नेह ही होता है।"

"क्या तुम सच कह रहे हो छोटे काका।" अनीता को जैसे भरोसा न हुआ।

"अरे बिटिया मैं भला तुझसे झूठ क्यों बोलूंगा।" श्यामू काका ने उसके पास जा कर उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा─"तुझे पता है जब मैं और नीलू(छोटी और इकलौती बुआ) छोटे थे तब ऐसे ही झगड़ा करते रहते थे। वो मुझसे छोटी थी तो मैं हर वक्त उसे तंग करता था और वो मुझसे परेशान हो कर कभी चीखती, कभी रोने लगती तो कभी खिसिया कर मेरे बाल नोचने लग जाती थी। जब वो मेरे बाल नोचने लगती तो मैं उसे दो थप्पड़ लगा देता। फिर वो रोते हुए बड़े भैया से शिकायत कर देती जिससे बड़े भैया मुझे खूब डांटते।"

"क्या सच में।" अनीता की आँखें हैरत से फैल गईं थी।

"हां बिटिया।" श्यामू काका मुस्कुराए─"जैसे तुम दोनों का झगड़ना रोज का काम है वैसे ही मेरा और नीलू का झगड़ा करना रोज का काम था। ऐसा नहीं था कि वो बेचारी कोई गलती करती थी या आगे से मुझसे झगड़ा करती थी...बल्कि वो तो मैं ही होता था जो आगे से उसे छेड़ देता था और फिर हमारा झगड़ा शुरू।"

"मतलब आप जान बूझ के बुआ को तंग करते थे।" अनीता मुस्कुराई।

"असल में मुझसे खुद रहा नहीं जाता था।" श्यामू काका ने कहा─"मतलब कि जब तक मैं उससे झगड़ा नहीं करता था तब तक मुझे ऐसा लगता था जैसे आज किसी बात की कमी है। मुझे खाली खाली सा लगता था। कुछ अच्छा ही नहीं लगता था। फिर मैं नीलू को परेशान करता या उसे छेड़ता तो जब वो मुझसे झगड़ा करने लगती तब एहसास होता कि हां अब मजा आ रहा है।"

"फिर तो तुम बहुत गंदे थे छोटे काका।" अनीता ने कहा─"बेचारी बुआ को कितना तंग करते थे तुम।"

"पर यही हमारे बीच का असल प्यार था बिटिया।" श्यामू काका ने कहा─"प्यार दुलार के कई रूप होते हैं। आज भले ही तुझे ऐसा लगता है लेकिन जब तू बड़ी हो जाएगी और तेरा ब्याह हो जाएगा तब तुझे समझ आएगा कि ये वास्तव में क्या था। अब जब तेरी नीलू बुआ आएगी तो उससे पूछना कि जो हम करते थे वो क्या था।"

"अब तो मैं पूछूंगी ही बुआ से।" अनीता ने मुस्कुरा कर कहा।

"अरे देख बड़े भैया भी आ गए।" श्यामू काका ने बापू की तरफ देख कर कहा─"तू भी तैयार हो जा अब। थोड़ी ही देर में तुझे भी दूसरे पाले में बैलों को हांकना होगा।"



जारी है............
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हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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RE: हवस और नादानियां ~ (आप-बीती) - by Rajan Raghuwanshi - 14-01-2026, 08:16 AM



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