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Adultery हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)
#38
भाग ~ १०





"अच्छा राजू मैं ये कर तो रही हूं लेकिन तुम इसके बारे में भूल कर भी किसी को मत बताना।" खाट पर मेरे पास बैठते ही काकी ने कहा─"इतना तो तुम भी जानते हो कि अगर इस बारे में किसी को पता चला तो कितना बड़ा अनर्थ हो जाएगा। मैं तो बदनाम होऊंगी ही तुम भी हो जाओगे। इतना ही नहीं इसके लिए अगर तुम्हारे काका मुझे मारेंगे या घर से निकाल देंगे तो तुम्हारे साथ भी कम बुरा नहीं होगा...तुम समझ रहे हो न।"

"हां काकी...ये मैं समझता हूं।" मैंने सहमति से सिर हिला कर कहा─"तुम चिंता मत करो मैं किसी को नहीं बताऊंगा। अब तुम जल्दी से मेरे इसको सहलाओ न।"

"ठीक है...पर अपना पैंट और कच्छा तो नीचे करो।" काकी ने कहा।

मैंने झट से अपना पैंट और कच्छा उतारना शुरू कर दिया। थोड़ी ही देर में मैं उनके सामने नीचे से नंगा हो गया। मेरा लंड एक बार फिर से उनकी आंखों के सामने उजागर हो गया। इतनी देर में वो फिर से शांत पड़ गया था। ये सोच कर ही मेरी धड़कनें तेज हो गईं थी कि अब काकी फिर से मेरा लंड मुठियाएंगी। ये सोचते ही मेरे पूरे बदन में रोमांच की लहर दौड़ गई।

नंगा होने के बाद मैं थोड़ा शर्माते हुए काकी को देखने लगा। उधर मंजू काकी मेरे शांत पड़े लंड को अजीब भाव से देख रहीं थी। उनके अंदर भी इस वक्त हलचल मच गई रही होगी। सहसा उन्होंने मेरी तरफ देखा। हम दोनों की नजरें मिलीं। फिर वो खिसक कर मेरे बिल्कुल करीब आ गईं। मेरी धड़कनें और ज्यादा तेज हो गईं।

"र...राजू इस बारे में किसी को बताना मत।" फिर उन्होंने धीरे से अपना हाथ मेरे लंड की तरफ बढ़ते हुए कहा।

"नहीं बताऊंगा काकी।" मैंने झट कहा─"किसी को भी नहीं बताऊंगा।"

अगले ही पल काकी ने मेरा लंड पकड़ लिया। उनके हाथ का कोमल स्पर्श होते ही मेरे पूरे बदन में सिहरन दौड़ गई और मेरे लंड के साथ साथ मेरे अंडकोशों में भी सनसनाहट होने लगी।

उधर काकी अपलक मेरे लंड को देखते हुए धीरे धीरे उसे सहलाने लगीं। हम दोनों ही गर्मी से नहाए हुए थे मगर पसीना पोछने की सुध किसी को नहीं थी। थोड़ी ही देर में मेरा लंड उनके सहलाने से अपने पूरे आकार में आ गया। उसका आकार ऐसा था कि वो काकी की मुट्ठी में पूरा फिक्स हो गया था। ये देख काकी के चेहरे पर विस्मय के भाव थे। आंखों में हैरानी उभर आई थी।

"शश्श्श्श् काकी...कितना अच्छा लग रहा है मुझे।" मैं मजे में बोला─"पहले जैसे इसको आगे पीछे करो न।"

ये सुनते ही काकी लंड को मुट्ठी में लिए आगे पीछे करने लगी जिससे मेरा मजा दोगुना हो गया। मजे में मेरी आँखें झपकने लगीं।

"शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह् हां काकी ऐसे ही।" मैं सिसियाते हुए बोला─"थोड़ा जल्दी जल्दी आगे पीछे करो न।"

काकी वैसा ही करने लगीं। मेरा मजा और भी ज्यादा बढ़ गया। मैं मजे की वजह से हवाओं में उड़ने लगा। मेरा पूरा बदन एक अद्भुत एहसास से कांपने लगा।

उधर काकी की भी सांसें तेज हो गईं थी। उनके अंदर भी बड़ी तेज हलचल मच गई थी। जल्दी जल्दी मुट्ठ लगाने की वजह से ब्लाउज में कैद उनकी चूचियां हिल रहीं थी।

"क...क्या बापू का भी तुमने ऐसे ही हिलाया था काकी शश्श्श्श्।" मेरे मन में अचानक ये खयाल आया तो मैंने मजे में पूछा उनसे।

"न...नहीं।" काकी ने साफ झूठ बोला जबकि वो खुद बता चुकी थीं।

"पर आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् तुमने तो अपनी कहानी में मुझे बताया था।" मैंने आँखें खोल कर उनकी तरफ देखा─"तुमने बताया था कि बापू ने खुद तुम्हारा हाथ अपने लं..लंड पर रखा था और फिर तुमसे कहा था कि इसे प्यार करो...सहलाओ।"

"ह..हां वो...मैंने बस उनका उसे पकड़ा ही था और थोड़ा सा सहलाया था।" काकी ने झिझकते हुए कहा─"पर इस तरह नहीं हिलाया था जैसे तुम्हारा हिला रही हूं।"

"अच्छा काकी एक बात बताओ।" मैंने पूछा─"क्या मेरा ये लं..लंड बापू के लंड जैसा है।"

"चुप करो राजू।" काकी ने शर्मा कर कहा─"ऐसी बातें न करो न।"

"क...क्यों काकी।"

"बस न करो।" काकी ने कहा─"अच्छा नहीं लग रहा।"

"पर बापू के साथ तो तुम्हें सब अच्छा लग रहा था न।" मैंने भोलापन दिखाते हुए कहा─"तो अभी अच्छा क्यों नहीं लग रहा।"

"क्योंकि...क्योंकि तुम बच्चे हो राजू।" काकी को जैसे जवाब न सूझा था मगर अब बहाना बनाते हुए बोलीं─"तुम अभी इस सबके लिए छोटे हो जबकि तुम्हारे बापू बड़े हैं।"

"अच्छा...पर तुमने तो कुछ देर पहले ये कहा था कि मेरा लंड दशरथ काका से बड़ा है।" मैंने कहा─"मतलब...मैं उमर में भले ही काका से छोटा हूं लेकिन मेरा लंड तो उनसे बड़ा ही हुआ न। इसका मतलब....इसका मतलब जो काम काका और बापू कर सकते हैं वो मैं भी कर सकता हूं....क्योंकि..क्योंकि मेरा लंड बड़ा है...है न।"

मेरी ये बात सुन कर काकी हैरानी से मेरी तरफ देखने लगीं। शायद उन्हें भरोसा नहीं हुआ था कि मैं इतना कुछ सोच सकता हूं।

"बताओ न काकी।" तभी मैंने फिर पूछा─"मैं वो काम कर सकता हूं न।"

काकी को समझ न आया कि अब क्या बोलें। मेरी बातों ने उन्हें इतना हैरान और सोचने पर मजबूर कर दिया कि इस चक्कर में वो मेरे लंड को मुट्ठ लगाना ही भूल गईं।

"रुको मत काकी।" तभी मैंने उन्हें याद दिलाया─"इसे हिलाती रहो न। मुझे बहुत मजा आ रहा है।"

ये सुनते ही काकी थोड़ हड़बड़ाईं और झट से मुट्ठ लगाने लगीं। उनके चेहरे पर बड़े अजीब से भाव थे। जैसे कुछ सोच रही हों।

"क्या सोचने लगी काकी।" मैंने कहा─"बताओ न...मैं वो काम...मतलब मैं चु..चुदाई कर सकता हूं न।"

"उफ्फ राजू...मत करो न ऐसी गंदी बातें।" काकी बुरी तरह हैरान परेशान हो कर बोल पड़ीं।

"क्यों काकी...जब इस वक्त तुम और मैं ये गंदा काम कर सकते हैं।" मैंने कहा─"तो गंदी बातें क्यों नहीं कर सकते।"

काकी एक बार फिर लाजवाब हो गईं। उनके चेहरे की परेशानी और ज्यादा बढ़ गई। मुझे उनको इस तरह परेशान देख मजा आने लगा था। मैं ये सोच के भी खुश हो रहा था कि इस वक्त काकी को मैं अपनी बातों से लाजवाब कर दे रहा था।

उधर काकी धीरे धीरे मुट्ठ लगा रहीं थी और मेरे पूरे बदन में सनसनी दौड़ रही थी। मेरा लन्ड एकदम सख्त हो चुका था और अब उसमें ऐसी अदभुत सनसनी होने लगी थी जिसकी वजह से मैं हवा में उड़ता हुआ महसूस कर रहा था।

"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् कितना मजा आ रहा है काकी।" मैं मजे के तरंग में बोला─"थोड़ा और जोर से हिलाओ न।"

काकी ने मुट्ठ लगाने की रफ्तार थोड़ा सा तेज कर दी। उनकी चूचियां फिर से हिलने लगीं। मेरी नजरें उन्हीं पर जमी थीं। एकाएक मेरे मन में खयाल आया कि मेरे बापू इन्हीं छातियों को जोर जोर से दबा चुके हैं...इन्हें मसल चुके हैं...इन्हें मुंह में भर के चूस चुके हैं। ये सब खयाल आते ही मैं सोचने लगा क्या मैं भी ऐसा कर सकता हूं। क्या काकी मुझे भी ऐसा करने देंगी।

"शश्श्श्श् काकी...वो...वो तुम्हारे दूध कितना हिल रहे हैं देखो।" 

ये सुनते ही काकी ने चौंक कर पहले मुझे देखा और फिर झट से अपनी छातियों को। छातियों पर से धोती का पल्लू पहले ही गिरा हुआ था इस लिए उन्हें अपनी छातियां साफ हिलती हुई दिखीं। अगले ही पल शर्म से लाल हो गईं वो।

"कितने गंदे हो तुम राजू।" फिर वो शर्म और झिझक से जबरन मुस्कुरा कर बोलीं─"और कितने चालू भी हो। अपनी काकी से ऐसी बातें करने में तुम्हें बिल्कुल भी शर्म नहीं आ रही।"

"अच्छा मुझे शर्म नहीं आ रही तो मैं गंदा हो गया।" मैंने कहा─"और तुम जो मेरे बापू के साथ की हो वो गंदा नहीं है।"

काकी सकपका गईं। कुछ बोलते न बना उनसे। सच ही कहा है किसी ने कि दूसरों को बोलना बड़ा आसान होता है लेकिन जब खुद पर बात आती है तो इंसान ऐसे ही निरुत्तर हो जाता है और शर्मसार भी हो जाता है।

"अब क्यों चुप हो गई काकी।" मैंने कहा─"अगर ऐसी बात करने से मैं गंदा हूं तो तुम और बापू भी तो गंदे ही हो।"

"अच्छा छोड़ो इस बात को।" मजबूरन काकी ने बात बदली─"मैं अब कुछ नहीं बोलूंगी तुम्हें...पर..पर तुम भी ऐसी बातें अब मत करो मुझसे।"

"क्यों...मैं तो करूंगा।" मैंने स्पष्ट कहा─"जब तुम और बापू एक दूसरे से ऐसी बातें कर सकते हो तो मैं क्यों नहीं। और...और मैंने तो तुम्हें नहीं रोका कि तुम मुझसे ऐसी बातें न करो। तुम भी करो मुझसे गंदी बात...हां।"

मंजू काकी समझ चुकीं थी कि इस बारे में मुझे कुछ समझाना बेकार है। एक तो उनकी नजर में और उनकी समझ में मैं भोला और नादान हूं दूसरे सबका लाडला होने के कारण थोड़ा जिद्दी भी हूं इस लिए वही करूंगा जो मेरा मन करेगा।

"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् काकी कुछ हो रहा है मुझे।" 

एकाएक मुझे ऐसा लगने लगा जैसे मेरा मूत निकलने वाला है। पूरे बदन में बड़ी तेज झुनझुनी होने लगी थी। ऐस लग रहा था जैसे मेरे अंदर समाई कोई चीज बदन के हर हिस्से से खिंचते हुए मेरे अंडकोशों की तरफ बढ़ी तेजी से भागती हुई आ रही है।

काकी ने जब ये सुना तो वो समझ गईं कि मैं झड़ने वाला हूं इस लिए उन्होंने मुट्ठ लगाने की रफ्तार और तेज कर दी। मैं खड़े खड़े मजे में बुरी तरह सिसकने लगा। मजे की इंतिहां में मेरी आँखें बंद हो गईं। मेरे पांव कांपने लगे और फिर अचानक मुझे ऐसा लगा जैसे मैं मजे की अनंत ऊंचाइयों में पहुंच गया हूं। हर चीज मेरे काबू से बाहर हो गई और मैं झटके खाते हुए झड़ने लगा।

मेरे लंड से निकलती पिचकारियां मंजू काकी के सिर...चेहरे और सीने को भिगोती जा रहीं थी। सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि काकी को सम्हलने तक का मौका न मिला। आखिर में वीर्य का कुछ हिस्सा उनकी हथेली में भी लग गया।

"छी छी राजू...ये क्या कर दिया तुमने।" काकी ने हड़बड़ा कर मेरा लंड छोड़ा और एक झटके में मुझसे दूर होते हुए खाट से नीचे ही उतर गईं। इधर उनकी बात सुन कर भी मैं कुछ न बोला। मैं कुछ बोलने की हालत में ही नहीं था। आखिरी पलों में मैंने ऐसा महसूस किया था जैसे मेरे अंदर से मेरी जान ही निकल गई हो। मैं ज्यादा देर तक खड़े न रह सका...और घुटनों के बल गिर कर दोनों हाथों से खाट को थाम लिया। मेरी आँखें बंद थीं....सांसें उखड़ी हुईं थी। अंदर अभी भी वही मजे का एहसास था जिसमें मैं डूबा हुआ था।

उधर काकी बुरा सा मुंह बनाए अपनी धोती से मेरे वीर्य को अपने बदन के हर उस हिस्से से पोंछती जा रहीं थी जहां जहां वो जा के गिरा था। 

थोड़ी देर बाद जब मुझमें एक नई जान आई तो मैं सबसे पहले खाट पर अच्छे से बैठा और फिर आँखें खोल कर काकी की तरफ देखा। वो अभी भी अपनी धोती के पल्लू से मेरा वीर्य पोछे जा रहीं थी। इस वक्त वो अपने सीने पर गिरे मेरे वीर्य को पोंछ रहीं थी। ये देख मैं हैरान हो गया। मुझे समझ न आया कि ये सब क्या है। तभी सहसा उनकी नजर मुझ पर पड़ी। मुझे अपनी तरफ देखता देख वो दो कदम मेरी तरफ बढ़ीं।

"देखो...क्या किया है तुमने।" फिर वो अपने सीने पर गिरे मेरे वीर्य को दिखाते हुए बोलीं─"पूरा गंदा कर दिया है मुझे। छी...उल्टी सी आने लगी है मुझे। अब रात में मुझे नहाने जाना पड़ेगा...वरना सो नहीं पाऊंगी।"

"माफ कर दो काकी।" मैं एकदम अपराध भावना से बोल पड़ा─"मुझे नहीं पता ये कैसे हो गया...मगर..मगर ये है क्या काकी।"

मेरी ये बात सुन कर काकी ने आश्चर्य से मेरी तरफ देखा।

"हाय दय्या...कितने भोले बन रहे हैं।" काकी ने कहा─"इन्हें पता ही नहीं है कि जो उन्होंने मेरे बदन में गिराया है वो है क्या...क्या कहने।"

"म...मैं सच में नहीं जानता काकी कि ये क्या है।" मैं वाकई अंजान था और अब जानने को उत्सुक था─"बताओ न क्या है ये।"

काकी मुझे ऐसे देखने लगीं जैसे मैं कोई अजूबा हूं। कुछ देर तक वो बड़े ध्यान से मुझे देखती रहीं। शायद समझने की कोशिश कर रहीं थी कि मैं सच बोल रहा हूं या झूठ।

"कुछ नहीं है...सो जाओ चुपचाप।" फिर उन्होंने थोड़ा नाराज लहजे में कहा─"और हां मैं नहाने जा रही हूं। जब मैं लौट कर आऊं तो मुझे तुम गहरी नींद में सोते हुए दिखना....अगर नहीं दिखे तो खैर नहीं तुम्हारी..बताए देती हूं।"

इतना कह कर काकी झट वहां से चल दीं। मैं हक्का बक्का सा खाट पर बैठा रह गया। समझ में नहीं आया कि अचानक से ये क्या हो गया है। एकाएक मुझे अपने नंगेपन का एहसास हुआ तो मैं झट उठ कर अपना कच्छा और पैंट पहनने लगा। उधर काकी घर के पिछले हिस्से में मौजूद कुएं की तरफ चली जा रहीं थी।

########

मैं मंजू काकी की नाराजगी और गुस्सा देख के थोड़ा डर गया था इस लिए जब वो नहाने के लिए कुएं पर चली गईं थी तो मैं चुपचाप खाट पर लेट गया था। कुछ देर तक तो मैं उस सब के बारे में ही सोचता रहा था मगर फिर जाने कब मेरी आंख लग गई थी। मुझे नहीं पता कब काकी नहा के वापस आईं और कब वो भी सो गईं। 

खैर सुबह हुई तो मैंने देखा काकी की खाट मेरे बगल से गायब थी। मैं समझ गया कि वो पहले ही जाग चुकीं होंगी और खाट को वापस दूसरी जगह रख दिया है।

मैंने काकी की खोज में इधर उधर देखा तो वो मुझे आंगन में झाड़ू लगाती हुई नजर आईं। उन्हें देखते ही मेरे मन में रात का सारा किस्सा उभर आया। मेरे पूरे बदन में झुरझुरी दौड़ गई। मुझे याद आया कि कैसे रात काकी ने मेरे लंड की मुट्ठ लगाई थी और फिर कैसे उनका सीना गंदा हो गया था। हालांकि मैं अब भी ये नहीं जान सका था कि उनका सीना गंदा कैसे हुआ था जिसे वो अपने धोती के पल्लू से साफ कर रहीं थी। खैर मन में ये जानने की जिज्ञासा तो हुई लेकिन काकी से पूछने की हिम्मत न हुई।

मैं झट खाट से उठा। मुझे बहुत जोर का पेशाब लगा हुआ था जिसके कारण कच्छे के अंदर मेरा लंड पूरा खड़ा हुआ था। पैंट के ऊपर से उसका उभार साफ दिख रहा था। 

मैं जैसे ही खाट से उठा तो खाट ने आवाज पैदा की जो काकी के कानों तक पहुंच गई। काकी ने पलट कर मेरी तरफ देखा। मैंने भी उन्हें देखा। नजरें मिलीं तो मैंने झट से उनसे नजरें हटा ली और घर के पीछे तरफ मूतने के लिए चल पड़ा। मैंने कनखियों से उनकी तरफ देखा...वो मेरे पैंट में बने उभार को देखे जा रहीं थी। इससे मुझे शर्म आई इस लिए मैं दौड़ते हुए सीधा कुएं की तरफ भाग चला।

कुछ देर में हाथ मुंह धो कर मैं वापस आया और खाट के सिरहाने रखी अपनी कमीज को पहनने लगा। उधर काकी झाड़ू लगा चुकीं थी और अब गोबर से चौके की लिपाई कर रहीं थी। मुझे कमीज पहनता देख वो समझ गईं कि अब मैं अपने घर जाने वाला हूं।

"राजू...इधर आओ जरा।" 

उन्होंने चौका लीपते हुए ही मुझे बुलाया तो एकदम से मेरी धड़कनें बढ़ चलीं। मैं सोचने लगा क्या अब भी वो नाराज हैं। मैं धीरे धीरे चल कर उनके पास पहुंचा। मुझे अपने पास आया देख उन्होंने लीपना बंद किया और फिर मेरी तरफ देखते हुए पूछा─"घर जा रहे हो क्या।"

"ह..हां।"

"अच्छा सुनो।" फिर उन्होंने थोड़ा धीमे स्वर में कहा─"कल रात वाली बात किसी को मत बताना..ठीक है न।"

"ठीक है...मैं किसी को नहीं बताऊंगा।"

"इस बात को याद रखना कि तुमने जीजी की कसम खाई है।" काकी ने जैसे चेतावनी देते हुए कहा─"इस लिए अगर तुमने किसी को उस बारे में कुछ भी बताया तो जीजी मर जाएंगी। क्या तुम चाहते हो कि ऐसा हो।"

"न..नहीं नहीं।" मैं झट बोल पड़ा─"मैं किसी को कुछ नहीं बताऊंगा। मेरी मां को कभी कुछ नहीं होगा...हां।"

"बहुत बढ़िया।" काकी के चेहरे पर राहत के भाव उभरे─"मुझे पता है कि तुम बहुत होशियार हो और जीजी को बहुत चाहते हो।"

"काकी...क्या तुम नाराज हो मुझसे।" मैंने कुछ सोच कर पूछा।

"नहीं तो...मैं भला तुमसे क्यों नाराज होऊंगी।" काकी ने बड़े स्नेह से कहा।

"अच्छा तो फिर रात में क्यों नाराज हो गई थी मुझसे।" मैंने अपनी जिज्ञासा के कारण पूछा─"और...और ऐसा मैंने क्या कर दिया था जिससे तुम नाराज तो हुई ही बाद में नहाने भी चली गई थी।"

मेरी बात सुन कर काकी जाने क्यों थोड़ा मुस्कुराई फिर बोलीं─"हां रात में मैं तुमसे नाराज हो गई थी।"

"क्यों।"

"तुमने काम ही ऐसा कर दिया था।"

"क्या कर दिया था मैंने।"

"क्या तुम्हें नहीं पता।"

"मुझे पता होता तो तुमसे क्यों पूछता।"

काकी फिर थोड़ा मुस्कुराई और कुछ सोचने लगीं। इधर मेरी जिज्ञासा चरम पर पहुंच गई।

"बताओ न काकी...क्या कर दिया था मैंने जो तुम मुझसे नाराज हो गई थी।"

"तुमने मेरे ऊपर अपना वी...वीर्य गिरा दिया था राजू।" काकी ने थोड़ा झिझकते हुए बताया─"और वो भी बहुत सारा...इसी लिए तुमसे नाराज हुई थी मैं।"

"वीर्य????" मैंने आँखें सिकोड़ कर पूछा─"ये वीर्य क्या होता है काकी।"

मेरे इस सवाल पर काकी इस बार हंस ही पड़ीं। शायद उन्हें मेरे भोलेपन पर हंसी आ गई थी। उनके इस तरह हंसने पर मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे एक बार फिर से मैं मूर्ख बन गया हूं।

"तुम ऐसे क्यों हंस रही हो।" मैंने बुरा सा मुंह बना कर कहा।

"क्या तुम सच में नहीं जानते कि वी...वीर्य क्या होता है।" काकी ने अपनी हंसी रोक कर मुझसे पूछा।

"अगर जानता क्यों पूछता तुमसे।" मैंने पहले जैसे ही बुरा सा मुंह बना के कहा─"मैंने तो ये नाम आज पहली बार सुना है तुमसे।"

मंजू काकी को ये सुन कर हैरानी हुई। शायद ये सोच कर उन्हें हैरानी हुई थी कि इस उमर में ज्यादातर लड़कों को इस बात का पता हो जाता है फिर मुझे कैसे पता नहीं है। दूसरी बात...जब मुझे चुदाई के बारे में पता है तो फिर वीर्य के बारे में पता क्यों नहीं है।

"बड़ी हैरानी की बात है राजू कि तुम्हें चु..चुदाई के बारे में तो पता है।" फिर उन्होंने कहा─"लेकिन वीर्य के बारे में तुम्हें कोई जानकारी नहीं है। ऐसा कैसे हो सकता है।"

"अब नहीं पता तो नहीं पता।" मैंने सिर झुका कर कहा─"इसमें मेरी क्या गलती है। तुम्हें पता है तो बताती क्यों नहीं मुझे।"

"अच्छा ठीक है बताती हूं।" काकी ने मुस्कुराते हुए कहा─"वीर्य एक ऐसी चीज होती है जिससे औरत को बच्चे पैदा होते हैं।"

"क..क्या???? ये क्या कह रही हो तुम।" मैं बुरी तरह चौंक पड़ा। मुझे सच में ये नहीं पता था।

"हां राजू।" काकी ने कहा─"औरत और मरद दोनों के अंदर वीर्य बनता है। फिर जब औरत मरद आपस में चु..चुदाई करते हैं और मरद का वीर्य औरत की चूत के अंदर चला जाता है तो उससे औरत पेट से हो जाती है।"

"क्या सच में ऐसा होता है काकी।" मैं अभी भी चकित था।

"हां राजू।" काकी ने बताया─"जब औरत और मरद का वीर्य उचित समय पर आपस में मिल जाता है तो औरत पेट से हो जाती है। मर्द के वीर्य को बीज भी कहते हैं। एक तरह से मर्द अपना ये बीज औरत के अंदर डाल देता है...मतलब बो देता है जिससे उस बीज में से ठीक वैसे ही बच्चे की उत्पत्ति होती है जैसे खेतों में गेहूं का बीज बोने से गेहूं के पौधे की उत्पत्ति होती है और फिर गेहूं पैदा होता है।"

"ये...ये तो...ये तो सच में बड़ी हैरानी की बात है काकी।" मैंने चकित हो कर कहा─"मुझे तो इस बारे में कुछ पता ही नहीं था। मुझे तो एक बार मां ने बस यही बताया था कि ऊपर से भगवान जी अपना एक दूत भेजते हैं जो चुपके से औरत के पेट में छोटा सा बच्चा डाल के चला जाता है। फिर नौ महीने बाद वो बच्चा पेट से निकल आता है।"

काकी मेरी ये बात सुन कर मुस्कुरा उठीं। 

"तो क्या मां ने मुझे गलत बताया था काकी।" मैंने पूछा─"मैं अभी जा के मां से पूछूंगा कि मुझे इस बारे में झूठ क्यों बताया था उसने।"

"अरे अरे...राजू ऐसा मत करना।" काकी मेरी बात सुन कर बुरी तरह हड़बड़ा गईं─"इस बारे में जीजी से कोई बात मत पूछना।"

"क्यों।" 

"देखो बात ये है कि जब हमारे बच्चे उम्र में बहुत छोटे होते हैं तब हम माएं अपने बच्चों का मन बहलाने के लिए ऐसे ही झूठ बता दिया करती हैं।" काकी ने कहा─"कोई भी मां इस बारे में सच नहीं बताती क्योंकि कम उम्र में बच्चों के मन में ऐसी बातें नहीं डाली जाती। दूसरी बात ये ऐसा विषय होता है जिसके बारे में एक मां अपने बेटे को नहीं बता सकती....क्योंकि ये मर्यादा के विरुद्ध होता है और साथ ही इसे अच्छा भी नहीं माना जाता। इस लिए तुम भूल कर भी जीजी से इस बारे में कुछ मत कहना और न ही कुछ पूछना।"

"ठीक है नहीं पूछूंगा।" मैंने कहा─"अच्छा काकी ये बताओ जब शुरू में बच्चे को इस बारे में कुछ नहीं पता होता तो फिर कैसे वो बड़ा हो के बच्चा पैदा कर लेता है। उसे कैसे पता होता है कि बच्चे कैसे पैदा करते हैं।"

"बच्चा जब बड़ा हो जाता है तो इस बात का ज्ञान उसे खुद ही हो जाता है।" काकी ने बताया─"या फिर गांव समाज के लोगों द्वारा उसे पता चल जाता है...या फिर उसे अपने यार दोस्तों से पता चल जाता है। ऐसा कभी नहीं होता कि बच्चा बड़ा हो जाए और वो ऐसी बातों से अंजान रहे। तुम्हें भले ही अभी तक वीर्य के बारे में और बच्चा पैदा करने के बारे में नहीं पता था लेकिन ये तो तुम्हें पता चल ही चुका है कि चुदाई क्या होती है...है न।"

"ह...हां।" मैंने धीमे से कहा।

"क्या मैं जान सकती हूं कि तुम्हें ये कैसे पता चला।" 

काकी के ऐसा पूछते ही मैं हड़बड़ा गया। धड़कनें तेज हो गईं और मैं थोड़ा घबरा भी गया।

"अरे घबराओ मत राजू। मैं किसी से कुछ नहीं बताऊंगी।" काकी मेरे अंदर की हालत को समझ कर बोलीं─"मुझे पता है कि हर लड़का या लड़की को कभी न कभी कहीं न कहीं से ये बातें पता चल ही जाती हैं। अभी मैंने तुमसे यही तो कहा था कि गांव समाज के लोगों द्वारा या अपने दोस्त यारों से पता चल जाता है। मतलब तुम्हें भी ये बात अपने किसी दोस्त से ही पता चली होगी...है न।"

मैंने हां में धीरे से फिर हिला दिया। 

"किस दोस्त ने ये सब बताया है तुम्हें।" काकी ने पूछा।

"वो...वो ब..बबलू ने।"

"हम्म्म्म मुझे लग ही रहा था कि उसी ने तुम्हें ये सब बताया होगा।" काकी ने कहा─"तो क्या उसने तुम्हें ये नहीं बताया था कि वीर्य क्या होता है और बच्चे कैसे पैदा होते हैं।"

"नहीं...और मैंने ज्यादा उससे कुछ पूछा भी नहीं।" मैंने भोलापन दिखा कर कहा─"वो खुद ही कभी कभी ये बताया करता है।"

"अच्छा।" काकी के चेहरे पर हैरानी के भाव उभर आए─"किस तरह....मतलब किसके बारे में ये सब बताया करता है वो।"

"वो...वो उसका एक दोस्त है।" मैंने झिझकते हुए कहा─"वही उसको ऐसी बातें बताया करता है। फिर बबलू मुझे बताता है।"

"तो क्या तुम्हें ऐसी बातें सुन कर अच्छा लगा करता है।" 

"प..पहले नहीं अच्छा लगता था।" मैंने भोलापन दिखाना जारी रखा─"मतलब अजीब लगता था मुझे। फिर धीरे धीरे मुझे भी अच्छा लगने लगा।"

"फिर??" 

"फिर कुछ नहीं।" मैंने काकी की तरफ देखा।

"कुछ नहीं???? ये क्या बात हुई।" काकी को हैरानी हुई─"उसकी ये बातें सुन कर क्या तुम्हारे मन में कभी ये खयाल नहीं आया कि अगर सुनने में तुम्हें अच्छा लगता है तो ऐसा करने में और भी तो अच्छा लगेगा।"

"ऐसा कुछ नहीं है।" मैंने कहा─"मैं ज्यादा नहीं सोचता था इसके बारे में। मुझे तो सबसे ज्यादा खेलना ही अच्छा लगता है तो इस लिए थोड़ी देर में उसकी बातें भूल जाता था।"

काकी को मेरी ये बात सच लगी क्योंकि मेरे घर परिवार के सभी लोग मेरे भोलेपन और मेरी नादानियों से परिचित हैं। 

"अच्छा ठीक है...छोड़ो इस बात को।" काकी ने कहा─"और हां ये बहुत अच्छी बात है कि तुमने अब से पहले कभी ऐसी चीजों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया लेकिन अब भी ध्यान मत दो। अभी तुम छोटे हो...समझ रहे हो न।"

"हम्म्म्म अब मैं जाऊं।" मैंने काकी से कहा─"मुझे संडास लगी है।"

"हां ठीक है जाओ तुम।" काकी ने कहा─"और हां उस सबके बारे में किसी को बताना मत।"

"हां नहीं बताऊंगा काकी।" 

मैं बाहर की तरफ जाते हुए बोला और निकल गया उनके घर से। मन में काकी की बताई हुई बातें ही चल रहीं थी।



जारी है............
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हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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RE: हवस और नादानियां ~ (आप-बीती) - by Rajan Raghuwanshi - 14-01-2026, 08:14 AM



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