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Misc. Erotica सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance
#2
आनंदमय घोषणा

सरताज सिंह हमेशा से अपनी नौकरी और पारिवारिक जीवन में संतुलन बनाए रखने की कोशिश करते थे, लेकिन उनकी जिम्मेदारियों की हकीकत इसे लगातार मुश्किल बना रही थी। हर प्रमोशन के साथ, उन पर नई जिम्मेदारियाँ आ जाती थीं जो उनका पूरा ध्यान खींच लेती थीं।


अक्सर, सरताज को अचानक ही घर से निकलना पड़ता था। पिछली रात भी, वह एक अंडर कवर ऑपरेशन से लौटे थे, जिसने उन्हें लगभग दस दिनों तक अपने परिवार से दूर रखा था।


सरताज: (मीरा के करीब जाते हुए, उसकी थकी हुई पर खूबसूरत आँखों में देखते हुए) "मैं जानता हूँ क्या सोच रही होगी तुम, मीरा। दस दिन... और एक शब्द भी नहीं। मैं खुद को आईने में देखता हूँ तो एक नाकाम पति नज़र आता है।"


मीरा: (अपने तकिए का सहारा छोड़कर सीधी बैठते हुए, उसकी आवाज़ में शिकायत और राहत का मिश्रण था) "इंतज़ार करना मेरी आदत बन गई है, सरताज। पर क्या तुम्हें अंदाज़ा भी है कि सन्नाटा कितना शोर मचाता है? जब तुम वो दरवाज़ा बाहर से बंद करते हो, तो लगता है जैसे इस घर की सारी रौनक, सारा सुकून भी अपनी जेब में रख कर ले गए हो।"


सरताज: (धीमे कदमों से उसके पास जाकर बैठते हुए, उसके कंधे पर हाथ रखते हैं) "ड्यूटी बहुत सख्त होती हैं, मीरा। मैं चाहकर भी तुम्हें नहीं बता सकता था कि मैं कहाँ हूँ। हर पल, हर साये में मुझे तुम्हारी और ज्योति की सुरक्षा की फिक्र सताती रही। मेरी वर्दी मेरा फर्ज है, पर तुम... तुम मेरी रूह हो।"


मीरा उनके काम की प्रकृति को समझती थी, लेकिन इससे उनकी गैरमौजूदगी का दर्द कम नहीं होता था। जब सरताज दूर होते थे, तो वह अपनी बेटी ज्योति में खुशी ढूंढ लेती थी।


मीरा: (उनके हाथ पर अपना हाथ रखते हुए, माथे की शिकन थोड़ी कम होती है) "फर्ज और मोहब्बत की इस जंग में पिसा तो घर ही जाता है न? ज्योति कल रात रोते-रोते सोई थी। वह पूछ रही थी कि क्या पापा फिर से किसी 'बड़े राक्षस' को पकड़ने गए हैं?"


सरताज: ( मीरा को अपनी बाँहों के घेरे में लेते हुए) "हाँ, मैं गया था। और शायद कल फिर जाना पड़े। पर इस वक्त, इस अँधेरे कमरे में, मैं सिर्फ तुम्हारा सरताज हूँ। तुम मेरी सबसे बड़ी ताकत हो मीरा, और सच कहूँ तो, मेरी सबसे बड़ी कमजोरी भी।"


मीरा: (उनके सीने पर सिर टिकाते हुए, धीमी आवाज़ में) "बस लौट आया करो। हार कर नहीं, थक कर ही सही... पर मेरे पास लौट आया करो।"


सरताज को पता था कि उनकी गैरमौजूदगी से परिवार पर कितना दबाव पड़ता है, इसलिए जब भी वह घर पर होते, तो खोए हुए समय की भरपाई करने की पूरी कोशिश करते। लौटते ही वह अपना काम एक तरफ रख देते और पूरी तरह से मीरा और ज्योति की दुनिया में खो जाते।


सरताज: (ज्योति को गोद में उठाकर हँसते हुए) "अब पापा आ गए हैं! अब कोई काम नहीं! अगले कुछ दिन सिर्फ हमारी छोटी सरदारनी के लिए हैं, और मेरी रानी के लिए।"


सुबह की सुनहरी धूप बाथरूम के छोटे रोशनदान से छनकर आ रही थी जब मीरा वहाँ खड़ी थी। उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था, और वह अपने हाथ में प्रेगनेंसी स्ट्रिप को घूर रही थी।


जैसे ही दूसरी गुलाबी लकीर उभरी, उसके सूखे होठों पर एक शरारती और असीम संतोष भरी मुस्कान खिल उठी। उसने उस स्ट्रिप को बड़ी नाजुकता से अपने सीने से लगा लिया, जैसे वह कोई कीमती गहना हो।


वह दबे पांव लिविंग रूम की ओर बढ़ी। सरताज अपनी वर्दी की शर्ट के बटन बंद कर रहे थे और साथ ही चाय का घूँट भर रहे थे। उनका पूरा ध्यान अपने काम पर था, लेकिन मीरा के चेहरे का नूर आज कुछ अलग ही गवाही दे रहा था।


मीरा: (सरताज के पास जाकर, बिना कुछ कहे धीरे से उनका हाथ थाम लिया)

सरताज: (हैरानी से मीरा की ओर देखते हुए, चाय का कप मेज पर रख दिया) "अरे? क्या बात है मीरा? आज इतनी खामोशी क्यों? सब खैरियत तो है न? तुम कुछ परेशान लग रही हो।"


मीरा: (मुस्कुराते हुए, उनकी आँखों में गहराई से देखते हुए सरताज का हाथ अपने पेट पर रख दिया—ठीक नाभि के नीचे, जहाँ एक नन्हा जीवन आकार ले रहा था) "परेशान नहीं हूँ सरताज... बस आज लफ्ज़ साथ नहीं दे रहे।"


सरताज: (माथे पर हल्की उलझन के साथ, मीरा के चेहरे को पढ़ते हुए) "तुम अचानक इतनी शांत क्यों हो गई? और ये क्या पकड़ा है हाथ में?"


मीरा ने धीरे से वह स्ट्रिप सरताज की हथेलियों पर रख दी।


सरताज: (मासूमियत से स्ट्रिप को पलटते हुए, उसे गौर से देखते हुए) "यह... यह क्या है मीरा? कोई दवाई है? क्या तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है? मुझे बताओ, डॉक्टर के पास चलें?"


मीरा: (खिलखिलाकर हँस पड़ी, उसकी हँसी में खुशी की नमी थी) "अरे मेरे भोले सरदार जी! यह कोई दवाई नहीं है, यह हमारी खुशियों की चाबी है। जरा ध्यान से देखिये... इसमें दो गुलाबी लकीरें हैं।"


सरताज की नज़रें उस स्ट्रिप पर जम गईं। अगले ही पल, जैसे बिजली कौंधी हो, उनके दिमाग में बात साफ़ हुई। उनकी आँखें चौड़ी हो गईं और चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान आई जो उन्होंने आज तक महसूस नहीं की थी।


सरताज: (हड़बड़ी में कुर्सी से उठते हुए, उनकी आवाज़ उत्साह और हैरानी से कांप रही थी) "मीरा... स-सच में? क्या इसका मतलब वही है जो मैं समझ रहा हूँ? हमारे घर बच्चा आने वाला है? ? तुम माँ बनने वाली हो?"


मीरा: (सिर्फ सिर हिला पाई, उसकी आँखों से खुशी के आंसू बह निकले)

सरताज: (उसे कसकर अपनी बाँहों के घेरे में भरते हुए) "ओह मीरा! यह... यह तो चमत्कार है। मैं दुनिया का सबसे खुशकिस्मत इंसान हूँ। तुमने मुझे मुकम्मल कर दिया।"


मीरा ने सिर हिलाया, उसकी आँखें खुशी और आंसुओं से चमक रही थीं। वह कुछ बोल नहीं पाई।


सरताज: (मीरा के माथे को चूमते हुए, धीरे से फुसफुसाया) "मेरा प्यार... मेरा सबसे बड़ा तोहफ़ा। मैं दुनिया का सबसे खुशहाल आदमी हूँ!"


हाथों में हाथ डाले, दोनों घर के उस कोने में गए जहाँ गुरु गोबिंद सिंह जी की तस्वीर के सामने जोत जल रही थी। घर का माहौल अचानक किसी गुरुद्वारे जैसा पवित्र हो गया था।


सरताज: (दोनों ने श्रद्धा से माथा टेका और एक स्वर में फुसफुसाए)

एक स्वर में, उनके होंठों से शुकराने का पाठ निकला:

"ਲਖ ਖੁਸੀਆ ਪਾਤਿਸਾਹੀਆ ਜੇ ਸਤਿਗੁਰੁ ਨਦਰਿ ਕਰੇਇ ॥"
(अर्थ: यदि सच्चे गुरु अपनी कृपा-दृष्टि डालें, तो लाखों बादशाहियों की खुशियाँ प्राप्त होती हैं।)

"Hundreds of thousands of princely pleasures are enjoyed if the True Guru bestows His Glance of Grace."


मीरा: (हाथ जोड़कर) "वाहेगुरु, बस इस नन्ही जान की रक्षा करना। इसे नेक इंसान बनाना।"


डॉक्टर से गर्भावस्था की पुष्टि होने के बाद, मीरा और सरताज ने यह ख़ुशख़बरी अपने प्रियजनों के साथ साझा करने का फैसला किया। उन्होंने सभी को लिविंग रूम में इकट्ठा किया।


डॉक्टर की क्लीनिक से लौटते समय सरताज और मीरा के चेहरों पर सुकून था। शाम को जब सूरज ढल रहा था, लिविंग रूम में पूरे परिवार को इकट्ठा किया गया। सरताज ने अपनी गोद में बैठी नन्ही ज्योति के गाल को चूमा।

सरताज: (उत्साह से भरी आवाज़ में) "सुनो भाई सब लोग! आज एक बहुत बड़ी खुशखबरी है। ज्योति बेटा, अब तुम्हारी सारी शरारतें साझा करने के लिए कोई आने वाला है। तुम बहुत जल्द एक बड़ी बहन बनने वाली हो!"


ज्योति: (हैरानी और खुशी से अपनी छोटी हथेलियाँ बजाते हुए) "सच्ची पापा? क्या छोटा बेबी मेरे गुड़ियों के साथ खेलेगा? मैं उसे अपनी सारी चॉकलेट्स दूँगी!"


रिया, उसके पिता और  माता भी यह ख़बर सुनकर बेहद रोमांचित हुए। घर जल्द ही हँसी, गले मिलने और मीरा के गर्भ में पल रहे नए जीवन के लिए आशीर्वाद भरे शब्दों से भर गया। हालाँकि बच्चे का लिंग एक रहस्य बना रहा ।


इसके बाद, वे अपने वफ़ादार घरेलू सहायक और ड्राइवर चंदन की ओर मुड़े। सरताज ने गर्मजोशी से घोषणा की, "चंदन भईया, हमारे परिवार में एक और सदस्य आने वाला है।" चंदन का चेहरा एक चौड़ी मुस्कान के साथ खिल उठा, और उसने दिल से उन्हें बधाई दी।

लिविंग रूम की उन खुशियों से दूर, बाहर अँधेरे में एक दूसरी ही खिचड़ी पक रही थी। शंकर का भाई 'शेर' पिछले कई महीनों से चंदन का भरोसा जीतने में कामयाब रहा था।

समय के साथ, उसने चंदन से दोस्ती कर ली थी, जो शेर को अपने जैसा ही एक ईमानदार गृहस्थ और ड्राइवर मानता था। शेर ने ख़ुद को भरोसेमंद और मेहनती दिखाया, और धीरे-धीरे चंदन का विश्वास जीत लिया।

उन्हें ज़रा भी नहीं पता था कि शेर के इरादे नेक नहीं थे। उसकी नज़र परिवार पर थी, और हर गुज़रते दिन के साथ वह उनके क़रीब आ रहा था, जबकि वह अपनी सच्ची मंशाओं को दोस्ती और ईमानदारी के मुखौटे के पीछे छिपा रहा था।

चंदन चाय का प्याला थामे शेर के पास आया, उसका चेहरा मालिक की खुशी से चमक रहा था।

चंदन: (खुश होकर, देहाती लहजे में) "अरे शेर भाई! आज तो गजबे हो गया। हमरा छोटा मालिक आने वाला है! मेमसाब पेट से हैं, अब घर में फिर से किलकारी गूंजेगी।"

शेर: (एक बनावटी मुस्कान के साथ, आँखों में नफरत छिपाते हुए) "अरे वाह रे चंदन भईया! ई तो बहुतै नीक खबर सुनाए हो तुम। सरताज साब तो एकदम किस्मत वाले निकले।"

चंदन: (मुस्कुराते हुए) "हाँ भाई! साब बहुत नेक दिल हैं। हम तो सोचे हैं कि बिटिया के जैसे छोटे मालिक को भी हमही घुमायेंगे अपनी गाड़ी में।"

शेर: (अंदर ही अंदर कड़वाहट लिए हुए, धीरे से) "जरूर... जरूर।

शेर सही समय का इंतज़ार कर रहा था, और मीरा, सरताज और उनके आस-पास के लोगों के जीवन में सावधानी से अपना रास्ता बना रहा था। उसकी योजना में अगला क़दम एक सोची-समझी और निर्दयी चाल थी।

एक सावधानीपूर्वक रची गई "दुर्घटना" के जरिए, शेर ने एक ऐसी घटना करवाई जिसमें चंदन के पैर टूट गए, जिससे यह सुनिश्चित हो गया कि भरोसेमंद घरेलू सहायक एक लंबी अवधि के लिए काम से बाहर रहेगा।

जैसे ही उन्हें ख़बर मिली, मीरा और सरताज तुरंत अस्पताल पहुँचे। चंदन एक प्राइवेट रूम में थका हुआ लेटा था।

मीरा: (आवाज़ में नरमी और चिंता) "अरे चंदन जी! यह क्या हो गया? आपको ध्यान रखना चाहिए था!"

मीरा ने धीरे से बिस्तर के किनारे बैठकर, चंदन का हाथ अपने हाथों में लिया।

मीरा: "आप जल्दी ठीक हो जाइए, हम सब आपके लिए दुआ कर रहे हैं। आपके बिना घर बिल्कुल सूना लगेगा।"

चंदन ने कमज़ोरी में मुसकुराने की कोशिश की। "भाभी जी... आप फिक्र न करें। बस... मुझे आप दोनों की बहुत फिक्र है।"

सरताज, जो कमरे में थोड़ा अलग खड़ा था, अब पास आया।

सरताज: (थोड़ा तनाव में) "चंदन, तुम्हारी फिक्र हमें है। अब तुम जल्दी ठीक होने पर ध्यान दो। लेकिन... सच कहूँ तो मैं बहुत मुश्किल में हूँ।"

चंदन ने सवालिया निगाहों से सरताज को देखा।

सरताज: "घर की ज़िम्मेदारियाँ अचानक बहुत बढ़ गई हैं। ख़ासकर मीरा की हालत में... गर्भवती है वो, पूरा आराम चाहिए। और मेरी ड्यूटी का दबाव तुम जानते ही हो, लगातार बढ़ रहा है। अब तुम्हारे बिना हम घर का सारा काम कैसे सँभालेंगे?"

मीरा: (सरताज की तरफ़ देखते हुए) "सरताज! अभी ये आराम कर रहे हैं। आप ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं?"

चंदन अस्पताल के बिस्तर पर थका-हारा लेटा हुआ था। उसके चेहरे पर थकान और कमज़ोरी साफ़ झलक रही थी। सरताज कुर्सी खींचकर उसके क़रीब बैठा।

सरताज: "चंदन, तुम्हें आराम की सख्त ज़रूरत है, लेकिन मेरा मन परेशान है। मैंने देखा है कि तुम कैसे घर को संभालते हो। अब जब तक तुम पूरी तरह ठीक नहीं हो जाते, हमें पीछे से कोई संभालने वाला चाहिए।"

चंदन ने धीरे से करवट बदली, उसकी आवाज़ कमज़ोर थी।

चंदन: "साहब... सब ठीक हो जाएगा। बस... आप घर के काम की फिक्र मत कीजिए।"

सरताज ने थोड़ा आगे झुककर अपनी बात रखी।

सरताज: "मैं किसी अनजान को नहीं रख सकता। तुम अपने किसी जान-पहचान वाले को जानते हो, जिस पर हम आँख मूँद कर भरोसा कर सकें? बस कुछ हफ़्तों के लिए, जब तक तुम घर न लौट आओ।"

चंदन की आँखें चमक उठीं, जैसे उसे एकदम सही नाम याद आया हो।

चंदन: "सरताज साहब, एक नाम है—शेर। वह मेरा पुराना दोस्त है, लगभग भाई जैसा। मैं उसके चरित्र की गारंटी देता हूँ। वह मेहनती है, उसका हाथ काम में बहुत साफ़ है, और उससे ज़्यादा भरोसेमंद आदमी आपको नहीं मिलेगा।"

सरताज के माथे पर आया शिकन थोड़ा ढीला पड़ा।

चंदन: "हाँ, साहब।मेरा विश्वास कीजिए। अगर वह आपके घर में है, तो आप निश्चिंत रह सकते हैं।"

सरताज ने अपने होंठ भींची। सिक्युरिटी अफ़सर होने के नाते, उसका पहला सहज-ज्ञान था कि वह हर नए चेहरे की सख्त जाँच करें, सख्त बैकग्राउंड वेरिफिकेशन  करें। लेकिन यह चंदन था—उसका सबसे भरोसेमंद आदमी—जो अपने बिस्तर से उठकर ज़मानत दे रहा था।

सरताज: (थोड़ा रुककर) "ठीक है।  अस्थायी तौर पर वह काम संभालेगा। तुम बस जल्दी ठीक होकर वापस आ जाओ।"

चंदन ने आभार से सिर हिलाया। उसने राहत की साँस ली कि उसने अपने दोस्त के काम आ गया, यह जाने बिना कि उसका यह "भरोसा" सरताज और मीरा के जीवन में कैसा घातक तूफ़ान लाने वाला था।

शेर का उनके घर में प्रवेश सुचारु और आसान रहा, जैसा कि उसने उम्मीद की थी। एक ईमानदार और विश्वसनीय सहायक के भेष में, अब उसकी सीधी पहुँच परिवार और घर तक थी।

जाल बिछाया जा चुका था, और शेर अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार था, सही समय का इंतज़ार करते हुए, जबकि परिवार उनके बीच पल रहे तूफ़ान से अनजान था।
Deepak Kapoor
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RE: सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance - by Deepak.kapoor - 13-01-2026, 02:12 PM



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