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Adultery हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)
#29
भाग ~ ०९




मंजू काकी जब ये सब बता कर चुप हो गई तो मैं एक झटके से वर्तमान में आ गया। मैं उनकी मदमस्त चुदाई की कहानी में ऐसे डूब गया था जैसे बापू और काकी को वो सब करते हुए मैं वहीं कमरे में खड़ा अपनी आंखों से देख रहा था।

मंजू काकी की इस कहानी से मैं खुद बहुत उत्तेजित हो गया था और जाने कब से मैं अपने खड़े लंड को भींचे जा रहा था। मुझे अपने लंड के अगले भाग में चिपचिपा सा महसूस हो रहा था जिससे मुझे बड़ा अजीब भी लग रहा था।

"ये...ये तुम क्या कर रहे हो राजू।" तभी मंजू काकी ने जब ये पूछा तो मैं एकदम से चौंक पड़ा।

मुझे ध्यान ही नहीं रह गया था कि काकी बिल्कुल मेरे सामने ही अपनी खाट पर बैठी हैं और मुझे यूं अपना लंड भींचते देख सकती हैं। मैंने हड़बड़ा कर झट से अपना हाथ अपने लंड से हटा लिया। पलक झपकते ही मुझे ये सोच के शर्म आई कि मैं काकी के सामने ये क्या कर रहा था और तो और मुझे ये ध्यान क्यों नहीं रह गया था कि काकी के सामने मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। शायद काकी के मुख से उनकी और बापू की चुदाई का किस्सा सुनने में और उसके मजे में मैं इतना डूब गया था कि अंजाने में ही मुझसे ये सब होता चला गया था।

इधर जब मैंने झट से हाथ हटा लिया तो काकी जाने क्या सोच के मुस्कुरा उठीं मगर जल्दी ही उन्होंने अपनी मुस्कान छुपा ली और फिर हैरानी जाहिर करते हुए बोलीं─"तुम तो सच में बड़े हो गए हो राजू। तभी तो मेरे मुख से ऐसी कहानी सुन कर तुम अपनी नुन्नी को इस तरह भींच रहे हो।"

मुझसे शर्म के मारे कुछ बोल न गया। यहां तक कि सिर उठा कर उनकी तरफ देखने की भी हिम्मत न पड़ी। मुझे बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि इस कहानी में आगे कहीं मुझसे ऐसा हो जाएगा और फिर मुझे काकी के सामने शर्मिंदा होना पड़ जाएगा।

"आए हाए देखो तो अब कैसे शर्मा रहे हैं।" उधर काकी ने एकदम से मुझे छेड़ते हुए कहा─"अपनी काकी और बापू की चु...चुदाई वाली कहानी सुन कर लगता है हमारे राजू की नुन्नी खड़ी हो गई है...है न राजू।"

काकी की बात सुन कर मैं और भी ज्यादा शर्मा गया। दिलो दिमाग में बड़ी तेज हलचल मच गई थी। समझ न आया कि अब क्या करूं। 

"अच्छा मुझे भी तो दिखाओ कि मेरी कहानी सुन कर तुम्हारी नुन्नी कैसे खड़ी हुई है।" तभी मंजू काकी अपनी खाट से उठ कर मेरे करीब आ कर बोलीं।

मैं तो हड़बड़ा ही गया उन्हें इस तरह अपने करीब आया देख के। शर्म घबराहट और आश्चर्य से मैं उन्हें देखने लगा। मुझे सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि काकी ऐसा भी बोल सकती हैं और ऐसा कर भी सकती हैं।

"न..नहीं नहीं।" मैं बुरी तरह हड़बड़ाया और घबराया हुआ बोल पड़ा─"ये...ये क्या कर रही हो तुम...नहीं दूर जाओ मुझसे।"

मेरी इस हालत पर काकी खिलखिला कर हंस पड़ीं। हंसते हुए वो मेरी खाट पर बैठ गईं और फिर बोलीं─"अरे दिखाओ न राजू। मैं तुम्हारी नुन्नी को खा थोड़े न जाऊंगी।"

"प..पागल हो क्या।" मैं एकदम से उनसे दूर सरकते हुए बोला─"तुमको शर्म नहीं आती ऐसा बोलते हुए।"

"आए हाए इतना कुछ देखने और सुनने के बाद तुम शर्माने की बात करते हो।" मंजू काकी ने आँखें फैला कर कहा─"तुम तो सच में बड़े चालू हो गए हो राजू। मतलब जब तक तुम्हें सब कुछ जानना था तब तक तुम्हें शर्म जैसे शब्द से कोई मतलब नहीं था और अब जब मैं तुम्हें सिर्फ अपनी नुन्नी दिखाने को बोल रही हूं तो तुम्हें शर्म का खयाल आ गया। वाह राजू...तुम्हारा तो जवाब ही नहीं कोई।"

काकी की बातें सुन कर मैं बेजुबान सा हो गया। सच ही तो कहा था उन्होंने। अगर मुझे सच में शर्म का इतना ही खयाल था तो उनसे मुझे ये सब पूछना और जानना ही नहीं चाहिए था। तभी माना जाता कि मैं पहले की तरह भोला और नादान हूं और मुझे शर्म तथा मर्यादा का भी खयाल है।

"वो...वो मैं कैसे....दिखा सकता हूं।" फिर मैं अटकते हुए उनसे बोला─"मुझे शर्म आ रही है।"

"मुझे भी तो खुल कर सब कुछ बताने में शर्म ही आ रही थी राजू।" काकी ने कहा─"मगर फिर भी तुमने जिद की थी कि तुम्हें सब कुछ खुल कर ही बताऊं। तो अब तुम्हें भी मेरे कहने पर अपनी नुन्नी दिखानी पड़ेगी।"

"प...पर तुम क्यों देखना चाहती हो।" मैं सच में सोच में पड़ गया था इस लिए पूछा।

"वैसे तो मैं देखने की बात न कहती।" काकी ने कहा─"मगर अब हमारे बीच बहुत कुछ बदल गया है। कल तक मैं यही समझती थी कि तुम बहुत भोले और नादान हो लेकिन जब तुमने मुझसे उस बारे में सब कुछ जानने की जिद की...इतना ही नहीं सब कुछ खुल कर बताने को मुझे मजबूर किया तो मैं ये सोचने पर मजबूर हो गई कि क्या सच में तुम इतने भोले हो जो ऐसी जिद कर रहे हो। मतलब कि अगर सच में भोले होते तो इस तरह जानने की जिद न करते और न ही मेरे सब कुछ बताने पर बीच बीच में मुझसे सवाल करते। इतने में ही मैं समझ गई कि तुम अब पहले वाले राजू नहीं रहे बल्कि बड़े हो गए हो। इतने बड़े कि तुम औरत और मरद के बीच बनने वाले ऐसे संबंधों पर ध्यान दे रहे हो और तुम्हारा एक एक बात पूछना ये साबित करता है कि तुम्हें चुदाई के बारे में भी सब पता है।"

मंजू काकी ने तो ये सब कह कर मानो मुझे बेनकाब ही कर दिया। मुझसे कुछ बोला न गया। ऐसा लगा जैसे मेरी चोरी पकड़ी गई हो और अब मैं उनके सामने गुनाहगार बन के बैठा हूं।

"हो सकता है कि तुम्हारे अंदर अब भी थोड़ा बहुत भोलापन बाकी हो लेकिन ये तो पक्की बात है कि तुम पहले जितने भोले नहीं रहे।" काकी ने आगे कहा─"इस लिए अब मैं देखना चाहती हूं कि जो बातें सुन कर तुम अपनी नुन्नी को मसल रहे थे उसमें कितना बदलाव आ गया है...चलो अब दिखाओ मुझे।"

मेरी धड़कनें काफी तेज चल रहीं थी। अंदर हलचल मची हुई थी। शर्म ऊपर से आ रही थी....समझ नहीं आ रहा था कि ऐसी स्थिति से खुद को कैसे बचाऊं। उधर काकी मेरी तरफ देखते हुए इस इंतजार में बैठी थीं कि मैं उन्हें अपनी नुन्नी दिखाऊं।"

"अब दिखाओ भी...इतना क्या सोच रहे हो राजू।" काकी ने कहा─"मैंने कहा न कि मैं उसे खा नहीं जाऊंगी।"

"और....और किसी को बताओगी भी नहीं।" मैंने कुछ सोच कर झट से कहा─"वादा करो कि किसी को नहीं बताओगी कि तुमने मेरी नु...नुन्नी देखी है।"

"ठीक है किसी को नहीं बताऊंगी।" काकी ने मुस्कुरा कर कहा─"चलो अब जल्दी से दिखाओ।"

मैं मजबूर हो चुका था। मैं ये भी समझ गया था कि अगर मैंने ऐसा नहीं किया तो वो उसी तरह मुझे धमकी दे सकती हैं जैसे मैं उन्हें दे रहा था। खैर अब क्या हो सकता था...गलती तो मुझसे हो ही गई थी जो ये ध्यान नहीं रखा था कि उनके सामने अपने लंड को न मसलूं। 

मैंने शर्माते हुए अपने छोटे से पैंट के उस हिस्से से अपना हाथ हटा लिया। अब तक मेरा लंड शांत हो गया था इस लिए पहले जैसा उसमें उभार नहीं रह गया था।

"ऐसे नहीं राजू।" तभी काकी ने कहा─"पूरा पैंट और कच्छा उतार कर दिखाओ।"

"क..क्या????" मैं उछल पड़ा।

"हां और क्या।" काकी ने कहा─"ऐसे थोड़े न दिखेगा कुछ। चलो पैंट और कच्छा उतारो अब।"

मैं बेबस सा हो कर उठ कर खड़ा हुआ और फिर धीरे धीरे पैंट को खोलने लगा। शर्म और घबराहट से बुरा हाल था मेरा। बड़े अजीब अजीब खयाल आ रहे थे मुझे।

पैंट का बटन खोल कर मैंने उसे नीचे सरका दिया। उसके बाद कच्छे का नाड़ा खोलने लगा। थोड़ी ही देर में मैंने कच्छे को भी शर्माते हुए नीचे सरका दिया। जैसे ही कच्छा कमर से सरक कर नीचे जांघों के नीचे घुटनों के पास आया तो मेरा शांत पड़ा लंड उनके सामने उजागर हो गया। काकी की तरफ देखने की मेरी हिम्मत न हुई क्योंकि अब और ज्यादा शर्म महसूस होने लगी थी मुझे।

उधर जैसे ही मेरे लंड पर काकी की नजर पड़ी तो उनकी आँखें चौड़ी हो गईं। चेहरे पर आश्चर्य उभर आया और मुंह अविश्वास से खुल गया। 

"र...राजू ये...ये क्या है।" फिर वो मारे आश्चर्य के बोलीं तो मैं ये सोच कर थोड़ा घबराया कि क्या हो गया अब। झट से उनकी तरफ देखा तो उन्हें हैरत से मेरे लंड को देखते पाया।

"हाय दय्या ये...ये तो नुन्नी नहीं है।" उधर काकी ने कहा─"ये...ये तो....ये तो पूरा लं...लंड है राजू। हे भगवान भरोसा नहीं हो रहा मुझे। मैं तो...मैं तो तुम्हें बच्चा समझ रही थी राजू। पर...पर तुम तो सच में बहुत बड़े हो गए हो। हाय दय्या...तुम्हारा तो ये इतना बड़ा है जितना तुम्हारे काका का भी नहीं है।"

काकी अविश्वास से जाने क्या क्या बोले जा रहीं थी और मैं अपने कच्छे को पकड़े चुपचाप खड़ा उन्हें देखे जा रहा था। शर्म तो अभी भी आ रही थी मुझे लेकिन काकी का हाल देख और उनकी बातें सुन कर एकाएक मुझे ये एहसास होने लगा कि मेरा लंड देख काकी चकित हैं। 

अचानक वो सरक कर मेरे बिल्कुल करीब आ गईं तो मैं थोड़ा हड़बड़ाया और अभी कच्छे को ऊपर ही करने वाला था कि तभी काकी ने कहा─"क...क्या म..मैं इसे हाथ लगा कर देखूं राजू।"

"क...क्यों???" मैं घबरा कर बोला─"हाथ क्यों लगाओगी तुम।"

"बस देखने के लिए राजू।" काकी अभी भी हैरान थी─"इसे हाथ से छू कर यकीन करना चाहती हूं कि ये नुन्नी ही है या सच में लं...लंड बन गया है।"

ये सुन कर मुझे अजीब तो लगा मगर मैंने उन्हें ऐसा करने से इंकार नहीं किया। एकदम से मुझे एहसास हुआ था कि अब काकी से डरने या घबराने की जरूरत नहीं है मुझे। क्योंकि अगर ऐसी बात होती तो काकी मेरा लंड देखते ही नाराज होती या फिर गुस्सा करतीं। जबकि यहां तो वो मेरा लंड देख के हैरान हैं और अब उसे छू कर अपनी तसल्ली करना चाहती हैं। 

जब मैं चुपचाप खड़ा ही रहा तो काकी को लगा शायद मैंने उन्हें अपना लंड छूने की अनुमति दे दी है। अगले ही पल उन्होंने हाथ बढ़ाया। उनकी नजरें अपलक मेरे लंड पर ही टिकी हुईं थी। इधर मेरी धड़कनें बढ़ी हुईं थी। मन में अनेकों प्रकार के खयाल उभर रहे थे। तभी काकी ने अपने कांपते हाथ से मेरे लंड को आहिस्ता से छुआ तो मेरा पूरा बदन कांप गया। 

मेरा लंड शांत था और नीचे झूल रहा था लेकिन जैसे ही काकी के हाथ का स्पर्श हुआ तो जैसे उसमें जान आने लगी। उधर उसको अपलक देखते हुए काकी ने आहिस्ता से उसे पकड़ लिया।

"शश्श्श्श् क...काकी।" मेरे मुंह से सिसकी निकल गई। पूरे बदन में झुरझुरी दौड़ गई।

मेरी सिसकी सुन कर काकी ने झट से मेरी तरफ देखा। उन्हें समझने में देर न लगी कि उनके इस तरह पकड़ लेने से मेरे अंदर मजे की लहर दौड़ गई है इसी लिए मैं सिसक उठा हूं।

"र...राजू...ये...ये तो सच में लं..लंड बन गया है।" फिर उन्होंने धीरे से काका─"मुझे यकीन नहीं हो रहा कि इस उमर में तुम्हारा ये इतना बड़ा हो सकता है।"

मैं कुछ न बोला। वो अब भी मेरे लंड को पकड़े हुए थीं और मेरे पूरे बदन में झुरझुरी हो रही थी। उनके कोमल हाथों का स्पर्श ऐसा था कि उसकी वजह से मेरे बदन में सनसनी सी होने लगी थी। इतना ही नहीं इससे मेरे लंड में भी हरकत होने लगी थी। उसमें जान आने लगी थी। उनकी नसें उभरने लगीं थी। तभी मंजू काकी ने लंड पर जमी अपनी हथेली को धीरे से पीछे...मतलब उसकी जड़ की तरफ खींचा जिससे लंड के आगे वाले हिस्से की चमड़ी पीछे की तरफ खिंचने लगी। अगले कुछ ही पलों में जब चमड़ी और ज्यादा खिंच गई तो लंड का गुलाबी टोपा आधे से ज्यादा दिखने लगा। 

"शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह्।" न चाहते हुए भी मजे के एहसास से मेरी सिसकी फिर से निकल गई। मेरा पूरा बदन सिहर उठा। पहले हल्की हल्की झुरझुरी हो रही थी मगर अब तेज तेज होने लगी। 

उधर काकी विस्मय से देखते हुए मेरे लंड की चमड़ी को आहिस्ता आहिस्ता आगे पीछे करने लगीं थी। पहली बार मेरे अलावा किसी ने मेरे लंड को छुआ था और सिर्फ छुआ ही नहीं था बल्कि आहिस्ता आहिस्ता मुट्ठ भी मारे जा रहीं थी। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा भी वक्त आएगा। ऐसा लग रहा था जैसे मैं कोई सपना देख रहा हूं जिसमें मेरी अपनी सगी काकी मेरे लंड को इस तरह सहलाए जा रही है। 

एकाएक ही मेरे बदन में होने वाली सनसनी में इजाफा हो गया। मजे से मेरी आँखें बंद होने लगीं और उधर मेरा लंड तेजी से अपना आकार बढ़ाने लगा। देखते ही देखते वो अपने पूरे आकार में आ गया।

काकी आश्चर्य से आँखें फाड़े उसके आकार को देख रहीं थी। वो मुट्ठ लगाना भूल गईं थी और मैं मजे की अलग ही दुनिया में उड़ रहा था। मन कर रहा था कि काकी ऐसे ही मेरा मुट्ठ लगाती रहें मगर जब अचानक से उनका मुट्ठ मारना रुक गया तो मैंने आँखें खोल कर उनकी तरफ देखा। वो चकित सी मेरे लंड को देखे जा रहीं थी।

"रु...रुक क्यों गई काकी।" मैं मजे के एहसास में जैसे शर्म भूल गया─"वैसे ही करो न। बड़ा मजा आ रहा है मुझे।"

मेरी बात सुनते ही काकी होश में आईं और थोड़ा हड़बड़ा सी गईं। चौंक कर मेरी तरफ देखा। मेरी हालत देखते ही समझ गईं कि जो मैंने कहा है वो एकदम सच कहा है। मुझसे नजर हटा कर उन्होंने झट से अपने उस हाथ को देखा जिसमें अभी भी उन्होंने मेरा लंड पकड़ा हुआ था। ये देखते ही उन्होंने हड़बड़ा कर अपना हाथ खींच लिया। एकाएक ही उनके चेहरे पर हैरानी के साथ शर्म के भाव उभर आए। शायद उन्हें एहसास हो गया था कि अंजाने में वो मेरी मुट्ठी करने लगीं थी।

"क...क्या हुआ काकी।" मैं भोलेपन में बोल पड़ा─"अपना हाथ क्यों हटा लिया तुमने। फिर से वैसा ही करो न।"

"न..नहीं नहीं...राजू...ये अच्छी बात नहीं है।" उन्होंने कहा─"और...और हां तुम अब इसे कच्छे में डाल लो और पैंट पहन लो।"

कहने के साथ ही वो पीछे हट गईं। चेहरे पर उभरे ढेर सारे पसीने को उन्होंने अपनी धोती के आंचल से पोंछा और फिर मेरी खाट से उठ कर अपनी खाट पर जा कर बैठ गईं। अचानक ही अजीब सा बर्ताव करने लगीं थी वो। मैं हैरान परेशान हो के उन्हें ही देख रहा था। समझ न आया कि एकदम से उन्हें क्या हो गया है।

"काकी क्या हो गया।" मैं पूछा─"फिर से वैसा ही करो न।"

"र...राजू चुप हो जाओ।" काकी ने अजीब लहजे में कहा─"वैसा करना गंदी बात होती है। तुम जल्दी से अपना पैंट पहन लो और सो जाओ। रात बहुत हो गई है।"

"पर मुझे तो अच्छा लग रहा था काकी।" मैंने भोलापन दिखाते हुए कहा─"फिर से करो न।"

"न..नहीं राजू।" काकी ने बेचैन और परेशान हो कर कहा─"मन जाओ बेटा...ये गंदी बात होती है।"

"अगर ये गंदी बात होती है तो फिर क्यों मेरे बापू के साथ तुम ये गंदा काम कर रही थी।" मैंने थोड़ा नाराज हो कर कहा─"तब क्या तुम्हें ये अच्छा लग रहा था....हां...बताओ।"

काकी से कुछ कहते न बना। उन्हें भी एहसास था कि मैंने जो बोला है वो उनके लिए एक कड़वा सच है। किसी चीज को अपने लिए सही और दूसरे के लिए गलत नहीं कह सकती थीं वो।

"देखो राजू।" फिर उन्होंने कहा─"मैं मानती हूं कि मैंने और तुम्हारे बापू ने जो किया वो गलत था और इसी लिए तुमसे भी कह रही हूं कि ये गंदी बात है। समझने की कोशिश करो...तुम अभी छोटे हो।"

"बहुत गंदी हो तुम।" मैंने नाराज हो कर अपने कच्छे को पहनते हुए कहा─"मैं कल ही काका को बताऊंगा कि तुम और बापू क्या कर रहे थे। बापू के बारे में भी मां से बताऊंगा। सबको बताऊंगा कि तुम दोनों कितने गंदे हो।"

मेरी ये बात सुनते ही काकी बुरी तरह घबरा गईं। डर के मारे चेहरा फक्क पड़ गया उनका। 

"न..नहीं नहीं राजू....भगवान के लिए किसी को कुछ मत बताना।" फिर वो डर कर बोलीं।

"नहीं...अब मैं तुम्हारी कोई बात नहीं मानूंगा।" मैंने पैंट का बटन लगाते हुए कहा─"सबको बताऊंगा कि तुम खेत वाले कमरे में मेरे बापू से चु...चुदवा रही थी।"

मंजू काकी का पलक झपकते ही डर के मारे बुरा हाल हो गया। एक ही पल में घर परिवार और गांव समाज में बदनाम हो जाने का डर सताने लगा उन्हें। ये भी कि उनकी काली करतूत का पता चलते ही दशरथ काका उन्हें धक्के मार कर घर से निकाल देंगे। 

"और हां....ये भी बताऊंगा कि तुम मुझे अपने घर में अकेला पा कर मेरी नुन्नी को हिला रही थी।" मैंने उनके डर में और ज्यादा इजाफा किया।

"न...नहीं नहीं राजू...भगवान के लिए दया करो मुझ पर।" काकी झट से उठ कर मेरे पास आ गईं─"तुम तो बहुत अच्छे लड़के हो...ऐसी बातें किसी से नहीं बताओगे...कह दो राजू किसी को नहीं बताओगे।"

"तुम मुझे अब बहलाने की कोशिश न करो...सब समझता हूं मैं।" मैंने कहा।

मंजू काकी बुरी तरह परेशान और चिंतित हो उठी थीं। उनको अच्छी तरह पता था कि मैं सबको बता भी सकता हूं क्योंकि मैं ऐसा ही हूं। जब काकी समझ गईं कि अब मैं मानने वाला नहीं हूं तो उन्होंने मजबूरी में फैसला ले लिया।

"अच्छा सुनो....अगर मैं वैसा ही करूंगी तब नहीं बताओगे न।" फिर उन्होंने मुझसे पूछा।

"वै...वैसा...मतलब???" मुझे जैसे समझ न आया तो पूछा।

"मतलब अगर मैं वैसे ही तुम्हारी नुन्नी सहलाऊँ तो तुम मेरे और अपने बापू के बारे में वो वाली बात किसी को नहीं बताओगे न।" काकी ने धीमे से कहा।

"पर तुमने तो कहा था कि मेरी वो नुन्नी नहीं रही।" मैंने भोलापन दिखाते हुए कहा─"बल्कि लं...लंड बन गई है।"

"हां वही....मेरा वही मतलब था राजू।" काकी ने थोड़ा शर्मा कर कहा─"अगर मैं फिर से तुम्हारा लं....लंड सहलाऊं तो किसी को कुछ नहीं बताओगे न।"

"हां...फिर नहीं बताऊंगा।" मैंने थोड़ा सोचने का नाटक कर के कहा।

"सच कह रहे हो न।" काकी ने बड़े ध्यान से मेरी तरफ देखा।

"हां..एकदम सच्ची कह रहा हूं।" मैंने जोर दे कर कहा─"किसी को कुछ नहीं बताऊंगा।"

मंजू काकी अपलक मुझे देखते हुए जाने क्या सोचने लगीं। मैं भी धड़कते दिल से उन्हें ही देख रहा था। पूरा भोला बने रहने का नाटक कर रहा था मैं। असल में मुझे भी एहसास हो चुका था कि मेरे भोला बने रहने पर ही मेरे परिवार वाले मेरी हर बात मान लेते हैं।

"पर मैं कैसे मान लूं कि तुम सच में किसी को कुछ नहीं बताओगे।" तभी काकी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा।

"फिर कैसे मानोगी।" 

"जीजी की कसम खाओगे तो मान लूंगी कि तुम किसी को नहीं बताओगे।" काकी ने अपनी समझ में ब्रह्मास्त्र चलाया।

इधर मैं सोच में पड़ गया कि कसम खाऊं या नहीं। मैं ये भी सोचने लगा कि मेरे कसम खाने के बाद काकी अपनी बात से मुकर भी सकती है। मतलब वो बाद में कह देगी कि अब वो मेरा लंड नहीं सहलाएगी और मैं इस लिए अब उनका काला सच किसी को नहीं बता सकता क्योंकि मैंने अपनी मां की कसम खा ली है। मतलब...मतलब एक तरह से ये उनकी जीत हो जाएगी और मेरी हार। इतना ही नहीं इससे एक तरह से वो मुझे बेवकूफ भी बना देंगी।

"फिर तुम भी सुनीता और रानी की कसम खाओ।" मैंने सोचने के बाद कहा।

"म...मैं...पर किस लिए।" काकी को समझ न आया।

"वो इस लिए कि मेरे कसम खा लेने के बाद तुम मुकर न जाओ।" मैंने कहा─"तुम मुझे मूर्ख नहीं बना सकती काकी। इतना मुझे भी पता है कि बाद में तुम मेरा लंड नहीं सहलाओगी...हां। इस लिए मैं अकेले मां की कसम नहीं खाऊंगा। पहले तुम सुनीता और रानी की कसम खा के कहो कि तुम मेरा लंड वैसे ही सहलाओगी जैसे अभी थोड़े देर पहले सहला रही थी। जब तुम कसम खा के ऐसा बोलोगी तब मैं भी मां की कसम खा लूंगा...हां।"

मंजू काकी ये सुन कर आश्चर्य से देखने लगीं मुझे। उन्हें यकीन न हुआ कि मैं इतनी गहरी बात सोच सकता हूं और इसके लिए उन्हें उनकी ही बेटियों की कसम खाने को बोल सकता हूं।

"तु...तुम तो सच में बहुत होशियार और चालू हो गए हो राजू।" फिर उन्होंने चकित हो कर कहा─"पर मेरे मन में तो ऐसा कुछ था ही नहीं।"

"मैं कैसे मान लूं।" मैंने झट कहा─"तुमने भी ऐसा ही बोला था मुझे। मतलब तुमको मुझ पर भरोसा नहीं था तभी मां की कसम खाने को कहा..तो अब मुझे भी तुम पर भरोसा नहीं है इस लिए सुनीता और रानी की कसम खाओ...तभी मानूंगा...हां।"

मंजू काकी समझ गईं कि अब वो मुझे सच में बेवकूफ नहीं बना सकती हैं। अब मैं पहले वाला राजू नहीं रहा जो ऐसी चालाकियां करना नहीं जानता था। काकी को ये भी एहसास हुआ कि वो फंस चुकी हैं। मतलब अगर वो चाहती हैं कि मैं उनकी काली करतूत के बारे में किसी को न बताऊं तो उन्हें इस वक्त मेरा लंड सहलाना ही पड़ेगा।

"ठीक है...मैं सुनीता और रानी की कसम खाती हूं कि जब तुम जीजी की कसम खा लोगे तो।" काकी ने कहा─"तो मैं तुम्हारे लं....लंड को वैसे ही सहलाऊंगी।"

मैं ये सुन के खुश हो गया। इतना ही नहीं कच्छे के अंदर बंद मेरा लंड भी खुश हो गया। 

"हम्म्म्म तो अब मैं भी मां की कसम खाता हूं कि तुम्हारे और बापू के बारे में किसी को कुछ नहीं बताऊंगा।" मैंने कहा─"चलो अब आओ और मेरे इसको सहलाओ।"

शर्म तो मुझे आई लेकिन जो मजा मैं महसूस कर चुका था उस मजे को फिर से पाने के लिए मैं बेशर्म बन जाने को तैयार था। उधर काकी मेरी बात सुन कर बेबस भाव से उठीं और आहिस्ता से मेरी खाट पर आ कर बैठ गईं।


जारी है...............
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हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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RE: हवस और नादानियां ~ (आप-बीती) - by Rajan Raghuwanshi - 12-01-2026, 08:58 AM



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