12-01-2026, 08:56 AM
भाग ~ ०८
"बापू किस चरम सीमा में पहुंचा देने को बोल रहे थे तुमसे।" मुझे समझ न आया तो मैंने काकी से पूछा।
मेरे पूछने पर काकी जाने क्या सोच कर हंस पड़ी। उनके यूं हंस पड़ने से मैं ये सोच कर मायूस सा हो गया कि कितना नादान और नासमझ हूं मैं जो उनकी कुछ बातें अच्छे से समझ ही नहीं पाता हूं। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे काकी के सामने मेरी इज्जत उतर गई हो।
"क्या तुम सच में इतने भोले और नादान हो जो चरम सीमा जैसी बात नहीं समझते।" काकी ने अपलक मेरी तरफ देखते हुए कहा─"या फिर तुम समझ तो गए हो मगर मेरे मुख से खुल्लम खुल्ला सुनना चाहते हो। बताओ यही बात है न।"
"न...नहीं नहीं काकी।" मैं झट बोला─"मैं सच में नहीं समझ पाया हूं। तभी तो तुमसे पूछ बैठा हूं।"
"ठीक है...तो फिर सुनो।" काकी ने एक गहरी सांस ली─"चरम सीमा उसे कहते हैं जिसमें इंसान मजे में इतना ज्यादा डूब जाता है कि फिर उसे किसी भी बात का होश ही नहीं रह जाता। कोई भी चीज जब हद से ज्यादा हो जाती है तो इंसान उसे अति हो जाना कहता है या फिर चरम सीमा के बाहर कह देता है। हर चीज को सोचने का अपना अपना नजरिया होता है....अपनी अपनी सोच होती है लेकिन कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिन्हें एक खास नाम दे कर उसके एहसास हो बयां किया जाता है। खुशी, आनंद और दुख दर्द ऐसी ही चीजें हैं जो अगर हद से ज्यादा महसूस हों तो हम यही कहते हैं कि ये अपनी चरम सीमा तक या उससे भी ऊपर पहुंच गई है। तुम्हारे बापू की दो उंगलियां उस वक्त मेरे द्वारा अपनी टांगों को भींच लेने से मेरी चू..चूत में फंसी रह गईं थी और वो मेरी चूत को सहलाने के साथ साथ कुरेदने भी लगे थे। इससे मैं पूरा मदहोश हो गई थी। मुझे इतना आनंद आने लगा था कि मैं उसके मजे से सातवें आसमान में उड़ने लगी थी और फिर उस स्थिति में जब मैं और मेरे अंदर के जज्बात मेरे काबू से बाहर हो गए तो उस मजे में बेकाबू हुए जज्बात पानी बन कर मेरी उस योनि के रास्ते बाहर निकल गए थे। ये वो स्थिति होती है जिसमें इंसान अत्यधिक आनंद में डूब जाता है और वो उस आनंद को काबू नहीं रख पाता।"
"हम्म्म्म समझ गया।" मैंने काकी की बात गौर से सुनने के बाद सिर हिलाया─"खैर फिर आगे क्या हुआ। मतलब कि बापू ने जब तुम्हें वैसा कहा था तब तुमने क्या किया था।"
"मैं तो लाज और शर्म की वजह से कुछ करने की हालत में ही नहीं थी राजू।" काकी ने बताना शुरू किया─"इस लिए जब जेठ जी के कहने का मतलब मुझे समझ आया तो मैंने बुरी तरह शर्मा कर बस इतना ही कहा कि आपको जो करना है कीजिए।"
"क्या सच में???"
"हां और क्या।" काकी ने थोड़ा लजा कर कहा─"मैं ये तो कह नहीं सकती थी कि मुझे कुछ नहीं करना है या उन्हें कुछ करने नहीं देना है या वो मेरे घर से ही चले जाएं। ऐसा बोलने का मतलब था उनकी कही बात का सच हो जाना। मतलब कि जो उन्होंने मुझे मतलबी होने वाली बात कही थी उसका सच हो जाना। बात भी सही थी...इससे तो यही साबित होता न कि जब तक मुझे मजा आ रहा था तब तक मैंने उन्हें किसी बात के लिए नहीं रोका और जब मैं मजे और आनंद को पा चुकी तो अब शरीफ बन कर उन्हें कुछ भी करने से मना कर रही हूं....इतना ही नहीं उन्हें अपने घर से भी जाने को कह रही हूं।"
"हां ये तो सही कहा तुमने।" मैंने भी समझ कर सिर हिलाया─"तो फिर जब तुमने बापू से कहा कि आपको जो करना है कीजिए तो फिर बापू ने क्या कुछ किया था।"
"वो तो उन्हें करना ही था राजू।" मंजू काकी ने कहा─"इतना आगे बढ़ने के बाद ऐसा कौन मरद होगा जो औरत की ऐसी बात मान कर बिना कुछ किए ही चला जाएगा। दुनिया में इतना शरीफ मरद अब कोई नहीं रहा राजू। किसी भूखे के सामने अगर अच्छे पकवान से भरी थाली रखी हो तो क्या वो बिना कुछ खाए भूखा ही उठ कर चला जाएगा....नहीं न। वैसा ही हाल जेठ जी का था। उस वक्त अगर मैं मना भी करती तब भी वो नहीं रुकते। खैर यहां तो मैंने ऐसा कह कर कुछ भी करने की एक तरह से छूट ही दे दी थी।"
"इसका मतलब बापू ने फिर तुम्हारे साथ कुछ किया था...है न।"
"हां।"
"क्या किया था बापू ने।"
"वही जो सारी दुनिया के मर्द करते हैं।" काकी के चेहरे पर शर्म की लाली उभर आई─"मतलब कि...चु...चुदाई।"
"क..क्या????" मेरी आँखें फैलीं─"क्या तुम सच कह रही हो।"
"भला मैं तुमसे झूठ क्यों बोलूंगी।" काकी ने कहा─"जब इतना कुछ सच बताया है तो ये भी सच ही है। तुम खुद सोचो कि अगर ये सच न होता तो क्या आज मैं और तुम्हारे बापू खेत वाले उस कमरे में वो सब कर रहे होते।"
"हां ये भी सही कहा तुमने।" मैंने कहा─"खैर मुझे ये वाला किस्सा भी खुल कर पूरा बताओ।"
"राजू कुछ तो शर्म करो।" काकी ने आँखें फैला कर कहा─"तुम्हारी काकी हूं मैं। थोड़ी तो लिहाज और मर्यादा रहने दो हमारे बीच।"
"मैं ये सब नहीं जानता।" मैंने भोलापन दिखा कर जिद की─"जब तुमने इतना कुछ खुल कर बताया है तो इसके आगे का भी मुझे बताओ।"
मेरी बात सुन कर काकी कुछ पलों तक मुझे अजीब तरह से देखती रहीं। उनके चेहरे पर शर्म और झिझक झलक रही थी। इधर मेरी धड़कनें बढ़ चलीं थी। तभी काकी ने मुझसे नजर हटाई और दूसरी जगह नजर टिका कर ऐसे बताने लगीं जैसे उस जगह पर उन्हें वही सब दिखने लगा हो जो बापू ने उनके साथ किया था।
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"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्।" मंजू के मुख से मजे में डूबी सिसकी निकल गई।
त्रिभुवन उसकी बड़ी बड़ी छातियों को दोनों हाथों से पकड़े कभी मसल देता तो कभी झुक कर एक निप्पल को मुंह में भर लेता। खाट पर पड़ी मंजू बुरी तरह मचल उठती थी।
"मंजू...मेरी रानी।" त्रिभुवन ने मुंह से निप्पल को जोर से खींचा और फिर छोड़ कर कहा─"आज तेरा सारा दूध निचोड़ लूंगा। तेरी इन सुंदर और गोरी चूचियों को दबा दबा के लाल कर दूंगा।।"
"शश्श्श्श् ऐ....ऐसी बातें न करिए न।" मंजू शर्म से दोहरी हो कर बोली─"मुझे बहुत शर्म आ रही है।"
"अब किस बात की शर्म मेरी रानी।" त्रिभुवन ने उचक कर उसके होठों को चूम कर कहा─"अब हमारे बीच शर्म नहीं रहनी चाहिए। अब तो बस हर शर्म लिहाज को दूर कर के बस प्यार ही करना चाहिए। बोल मेरी रानी करेगी न प्यार। भई...मैं तो अपनी सुंदर रानी को दबा के प्यार करूंगा।"
कहने के साथ ही त्रिभुवन झुका और फिर से मंजू की छातियों को मसल मसल कर निप्पल को चूसने लगा। मंजू फिर से मचलने लगी। कमरे में कभी उसकी आहें गूंज उठतीं तो कभी मादक सिसकियां। उसकी टांगों के बीच फिर से हरारत होने लगी थी। उसकी चूत फिर से रिसने लगी थी जिससे उसे खुजली होने लगी थी।
इधर त्रिभुवन निप्पल को छोड़ नीचे सरका। मंजू का गेहुंए रंग का सपाट पेट देख उसके मुंह में जैसे पानी आ गया। पेट के बीच में गहरी नाभी को देख तो उससे रहा ही न गया। झट से झुक कर वो पेट और नाभि को चूमने चाटने लगा। मंजू और भी ज्यादा मचलने लगी।
"शश्श्श्श् जे...जेठ जी गुदगुदी हो रही है।" मंजू मजे में सिसक उठी।
"गुदगुदी हो रही है या मजा आ रहा है मेरी रानी को।" त्रिभुवन ने सिर उठा कर पूछा।
"ह...हां हां मजा ही आ रहा है जेठ जी।" मंजू मजे में आँखें बंद किए सिसक के बोली।
"चिंता मत कर मेरी मंजू।" त्रिभुवन बोला─"आज तुझे ऐसा मजा आएगा जिसका तूने कभी सोचा तक नहीं होगा।"
इतना कहते ही त्रिभुवन फिर झुका और फिर से मंजू का पेट और नाभी को चूमना चाटना शुरू कर दिया। नाभी के बस थोड़ा ही नीचे साया था जिसकी डोरी उसके चेहरे के बिल्कुल पास ही थी। उसने एक हाथ से साया की वो डोरी पकड़ी और झटके से खींच दी जिससे गांठ खुल गई। मंजू को जैसे ही इसका पता चला वो थोड़ी हड़बड़ा सी गई।
"जे...जेठ जी क्या कर रहे हैं।" मंजू ने झट से आँखें खोल कर त्रिभुवन को देखा।
"अपनी प्यारी मंजू की सुंदरता को उजागर कर रहा हूं रानी।" त्रिभुवन ने कहा─"इसके अंदर सबसे अनमोल चीज छुपी हुई है। उसी को तो देखना है मुझे और फिर उसे प्यार भी करना है।"
मंजू समझ गई कि त्रिभुवन उसकी चूत की बात कर रहा है। इस लिए वो बुरी तरह शर्मा गई। चेहरे पर लाज के साथ साथ एकाएक घबराहट उभर आई। उसने न में सिर हिला कर त्रिभुवन से कहा कि नहीं...ऐसा मत कीजिए मगर त्रिभुवन भला अब कहां मानने वाला था। उसने दूसरी गांठ को भी खोला और साया को नीचे खींचने लगा मगर वो ज्यादा नीचे न सरक सका क्योंकि मंजू लेटी हुई थी और उसके पिछवाड़े में वो दबा हुआ था। त्रिभुवन चाहता तो साया को बिना उतारे ही नीचे से ऊपर उठा कर मंजू की बुर को उजागर कर देता मगर उसका मन यही था कि मंजू के बदन पर कोई कपड़ा ही न रहे।
"अपनी कमर को थोड़ा सा उठा मेरी रानी।" फिर उसने कहा─"ताकि मैं तेरा ये साया नीचे सरका कर इसे तेरे बदन से अलग कर सकूं।"
"न...नहीं न।" मंजू शर्म से बोली─"उसे मत निकालिए न।"
"मैं तो निकालूंगा रानी।" त्रिभुवन ने जैसे जिद की─"मैं अपनी प्यारी मंजू को पूरी तरह नंगा देखना चाहता हूं।"
मंजू बेबस सी हो गई। वो समझ चुकी थी कि उसके मना करने का अब कोई फायदा नहीं है। उसे ये भी खयाल आया कि ऐसी हालत में अगर कोई आ गया तो बड़ा भारी अनर्थ हो जाएगा। मतलब जो कुछ करना है उन दोनों को जल्दी ही करना होगा। ये सोच कर मंजू ने अपनी कमर को थोड़ा सा उठा लिया जिससे त्रिभुवन ने झट से उसका साया नीचे खींच दिया। साया हटते ही मंजू की चूत एकदम उजागर हो गई। चूत के चारों तरफ घने काले बाल(झांठें)थे।
मंजू को जैसे ही एहसास हुआ कि अब उसकी चूत पूरी नंगी हो चुकी है तो उसने हड़बड़ा हर जल्दी से उसे अपने दोनों हाथों से छुपा लिया। उसकी धड़कनें रुक सी गईं थी। उसे इतनी लाज आई कि उसने दोनों हाथों से अपनी चूत को छुपाए कस के आँखें बंद कर ली। ये देख त्रिभुवन मुस्कुराया ही नहीं बल्कि हंस भी पड़ा।
"क्या हुआ मेरी रानी।" उसने कहा─"मेरी छोटी रानी से अपने हाथ हटा न। देखने तो दे कि ये भी तेरी तरह सुंदर है या नहीं।"
"उफ्फ जेठ जी...ऐसी बातें न कीजिए न।" मंजू हद से ज्यादा लजा गई।
त्रिभुवन मुस्कुरा उठा। वो ये भी समझ गया था कि मंजू लाज के कारण अपने हाथ नहीं हटाएगी इस लिए उसने खुद आगे हाथ बढ़ा कर उसके हाथों को चूत से हटाने के लिए थोड़ा सा जोर लगाया। इधर मंजू ने भी झट से जोर लगा कर अपने हाथ को चूत पर दबाया।
"ये क्या कर रही है रानी।" त्रिभुवन उसका हाथ हटाने की कोशिश करते हुए बोला─"अपनी इस छोटी रानी के दर्शन तो करने दे।"
"न..नहीं नहीं जेठ ऐसा मत कीजिए न।" मंजू बुरी तरह लजा रही थी। उसने अभी भी अपनी आंखों को कस के बंद किया हुआ था।
त्रिभुवन ने इस बार ताकत का स्तेमाल किया और कुछ ही पलों में मंजू के हाथों को उसकी चूत से हटा दिया। मंजू बुरी तरह छटपटा के रह गई।
"ये क्या मेरी प्यारी मंजू।" त्रिभुवन उसकी चूत के आसपास उगे काले जंगल को देख बोला─"तूने तो अपनी छोटी रानी को घनघोर जंगल में छुपा रखा है।"
मंजू का शर्म से बुरा हाल हो गया। उसने फिर से अपनी चूत को छुपाने के लिए हाथ बढ़ाया लेकिन त्रिभुवन पहले से तैयार था इस लिए उसने उसके हाथों को पकड़ लिया।
"भगवान के लिए जेठ जी ऐसे मत देखिए न।" मंजू लजा कर बोली─"और ऐसी बातें भी न कीजिए। मुझे सच में बहुत शर्म आ रही है।"
"अच्छा ठीक है नहीं करूंगा बातें।" त्रिभुवन ने भी वक्त की नजाकत को समझा─"पर मैं अपनी छोटी रानी को तो प्यार करूंगा ही।"
इतना कह त्रिभुवन एकदम से झुका और मंजू की गदराई हुई जांघ को चूम लिया। उसके ऐसा करते ही मंजू मचल उठी और उसके मुख से सिसकी निकल गई। इधर त्रिभुवन चूमते हुए उसकी चूत के किनारे पर आ गया।
मंजू ये सोच के घबरा उठी कि क्या वो उसकी चूत को भी चूमने वाला है। उसने तो ऐसा होने की कभी कल्पना ही नहीं की थी। उसका पति ये सब सपने में भी नहीं सोचता था। उसने तो मंजू के होठों पर भी कभी आज तक चुम्बन नहीं लिया था।
"शश्श्श्श् उफ्फ जे..जेठ जी ये क्या कर रहे हैं आप।" अपनी चूत के पास जैसे ही उसने त्रिभुवन के होठों को महसूस किया तो बोल पड़ी─"भगवान के लिए वहां मुंह मत रखिए। वो बहुत गंदी जगह है।"
"मेरी प्यारी मंजू का कुछ भी गंदा नहीं है।" त्रिभुवन ने सिर उठा कर उसकी तरफ देखते हुए कहा─"फिर चाहे वो मेरी रानी की चूत हो या गान्ड।"
चूत गान्ड सुनते ही मंजू का एक बार फिर से शर्म से बुरा हाल हो गया। इधर त्रिभुवन इतना बोलने के बाद फिर से झुक कर उसकी चूत के आस पास चूमने लगा। मंजू बुरी तरह छटपटाने लगी। एक बार फिर से उसके अंदर बेचैनी बढ़ने लगी थी। वासना का नशा फिर से मजे का रूप ले कर उसे हवाओ में उड़ाने लगा था।
तभी मंजू उछल पड़ी क्योंकि अचानक ही उसने अपनी चूत पर त्रिभुवन की हथेली महसूस की। त्रिभुवन उसकी चूत को सहलाने लगा था। फिर सहसा चूत के आसपास उगे बालों को उंगलियों से हटाया जिससे मंजू की चूत का गुलाबी हिस्सा नजर आने लगा।
"शश्श्श्श्...ये क्या कर रहे हैं आप।" मंजू मचलते हुए सिसकी─"वहां हाथ मत लगाइए...वो गंदी जगह है।"
"पर मुझे तो ये बड़ी प्यारी जगह नजर आ रही है मेरी रानी।" त्रिभुवन जैसे नशे में बोला─"कितनी सुंदर है तेरी चूत और देख कितना गीली हो गई है।"
मंजू ये सुन कर शर्म से और भी पानी पानी हो गई। उसने झट अपनी टांगों को सिकोड़ कर चूत को छुपाना चाहा मगर त्रिभुवन ने उसे ऐसा नहीं करने दिया। उसने दोनों हाथों से उसकी जांघों को थाम लिया था। मंजू बेबस सी हो गई। तभी त्रिभुवन ने उसकी चूत में उंगली घुसेड़ दी जिससे मंजू उछल पड़ी।
"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्।" वो मजे के तरंग में सिसक उठी। एक ही पल में उसका पूरा बदन मजे और उत्तेजना में कांप उठा।
उधर त्रिभुवन उसकी चूत में उंगली डाले अंदर बाहर करने लगा। मंजू और भी ज्यादा मजे और उत्तेजना में मचलने लगी। आँखें बंद किए वो अपना सिर कभी इधर तरफ करती तो कभी दूसरी तरफ।
इधर त्रिभुवन का हाल भी कुछ ठीक नहीं था। बड़ी देर से उसने खुद को रोके हुए था। लुंगी के अंदर कच्छे में उसका हथियार पूरा अकड़ गया था और मंजू की गुलाबी चूत में समा जाने के लिए मानो त्रिभुवन को मजबूर किए जा रहा था।
"अब बर्दाश्त नहीं हो रहा मेरी रानी।" फिर उसने उंगली करते हुए मंजू से कहा─"मेरा हथियार तेरी इस चूत में जाने के लिए बेकरार हो उठा है। तू बता...क्या मैं अपना लंड डाल दूं तेरी चूत में।"
उसकी बात सुनते ही मंजू बुरी तरह लजा गई। उससे कुछ बोला न गया। हालांकि उसकी जो हालत थी उसके चलते अब वो भी यही चाहती थी कि त्रिभुवन जल्दी से उसे चोदना शुरू कर दे और ऐसा चोदे कि उसकी चीखें निकलने लगें।
"बोल न मेरी प्यारी मंजू।" उसे चुप देख त्रिभुवन बोला─"देख जब तक तू मुझसे कहेगी नहीं कि चूत में लंड डाल दो तब तक मैं नहीं डालूंगा।"
मंजू ये सुन कर शरमाई तो बहुत लेकिन सहसा उसके चेहरे पर बेचैनी के साथ बेबसी भी झलक उठी।
"अ...आपका जो मन करे की...कीजिए।" फिर उसने किसी तरह धीमे से कहा। उसकी आँखें अब भी बंद थीं।
"एक बार बोल दे न मेरी रानी।" त्रिभुवन ऊपर की तरफ खिसक कर उसके चेहरे के पास आ गया। फिर झुक कर उसने मंजू के कांपते होठों को चूम लिया। मंजू को पता ही नहीं था कि वो नीचे से ऊपर आ गया है इस लिए जैसे ही उसे अपने होठों पर त्रिभुवन के होंठ महसूस हुए तो वो एकदम से चौंक पड़ी थी। न चाहते हुए भी उसने आँखें खोल कर त्रिभुवन की तरफ देखा। उफ्फ उसकी आंखों में वासना के लाल डोरे झलक रहे थे। ऐसा लगा जैसे कितना नशे में है वो।
"क्यों इतना तड़पा रही है अपने इस दीवाने को मेरी रानी।" त्रिभुवन उसकी आंखों में देखते हुए बोला─"अपने मुख से खुल कर एक बार बोल न कि मेरी चूत में अपना लंड डाल दीजिए।"
"ऐ...ऐसी बातें मत कीजिए न।" मंजू ने शर्म से चेहरा दूसरी तरफ फेर कर कहा─"आपको को करना है कीजिए....पर जल्दी कीजिए।"
त्रिभुवन ये सुन कर मुस्कुरा उठा। वो अच्छी तरह समझता था कि मंजू इस वक्त बहुत ज्यादा शर्मा रही है। एक तो वो रिश्ते में उसका जेठ लगता था...दूसरे उसने ये सब कभी सपने में भी नहीं सोचा था और न ही कभी अपने पति से बोला था। इस लिए उसका यूं शर्माना स्वाभाविक था। यही बहुत बड़ी बात थी कि वो अपने जेठ के साथ इतना कुछ करती चली आई थी।
त्रिभुवन ने झुक कर उसके गाल को चूमा फिर बोला─"बस एक बार अपने मुख से बोल दे रानी। फिर मैं सच में जल्दी से वही करने लगूंगा जो हम दोनों चाहते हैं।"
मंजू समझ चुकी थी कि जब तक वो बोलेगी नहीं तब तक उसे इसी हालत में रह कर तड़पते रहना पड़ेगा। इस लिए उसने आँखें बंद कर के हिम्मत जुटाई और बोली─"अ..आप बहुत गंदे हैं। कितना बेबस कर रहे हैं मुझे। मैंने आज तक कभी अपने मरद से ऐसे नहीं बोला है।"
"पर मैं तो तेरा प्रेमी हूं मेरी प्यारी मंजू।" त्रिभुवन ने मुस्कुराते हुए कहा─"जो तूने अपने मरद से कभी नहीं कहा वो अपने इस दीवाने से कह दे न। मैं चाहता हूं कि हमारे बीच किसी भी चीज का न पर्दा रहे और न ही कोई शर्म। असली मजा तभी आता है मेरी रानी जब हर चीज बेशर्म हो के खुल कर बोली और की जाए। तू एक बार बोल तो मेरी रानी....फिर देखना कितना मजा आएगा तुझे।"
"ठी...ठीक है।" मंजू ने कहा─"जेठ जी मुझे अब ज्यादा न तड़पाइए...मेरी चू...चूत में अपना लं...लंड डाल कर मुझे चोदिए न।"
इतना कह कर मंजू ने शर्मा कर दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपा लिया। उसकी नंगी छातियां उसकी तेज चलती सांसों से ऊपर नीचे होने लगीं थी। उधर त्रिभुवन उसकी बात सुनते ही खुश हो गया। उसे मंजू के मुख से ऐसी बात सुन कर एक अलग ही तरह का नशा चढ़ गया था।
अब उसने देर नहीं की। झट से उठा और फटाफट अपने कपड़े उतारे लगा। कमीज और लुंगी को उसने एक तरफ फेंक दिया और फिर कच्छे का नाड़ा खोल कर निकाल दिया। उसका काला लंड उछल कर बाहर आ गया था। उसने आँखें बंद किए लेटी मंजू की तरफ देखा और फिर चुपके से उसके करीब गया। अगले ही पल उसने मंजू का एक हाथ पकड़ा और उसे अपने लंड पर रख दिया। मंजू को जैसे ही किसी गर्म और ठोस चीज पर अपना हाथ महसूस हुआ तो उसने झट से आँखें खोल कर उस तरफ देखा।
त्रिभुवन को एकदम नंगा देख उसकी आँखें फैल गईं और फिर जैसे ही उसकी नजर अपने हाथ पर पड़ी तो ये देख कर उसे झटका लगा कि त्रिभुवन ने उसके हाथ को अपने लंड पर रखा हुआ है। उसने हड़बड़ा कर अपना हाथ उसके लंड से हटाना चाहा मगर त्रिभुवन ने उसे ऐसा नहीं करने दिया।
"मेरी रानी....एक बार इसे अपने हाथ से सहला दे।" फिर वो बोला─"देख तेरी गुलाबी चूत को देख कर ये कैसे खड़ा हो गया है। इसे अच्छे से सहला कर बता कैसा है ये।"
मंजू ने फिर से हाथ हटाने के लिए जोर लगाया मगर त्रिभुवन ने उसके हाथ को मजबूती से पकड़े रखा। उधर मंजू का शर्म से बुरा हाल हो चुका था। बेबस हो कर बोली─"क...क्या कर रहे हैं आप। छोड़ दीजिए न...बहुत शर्म आ रही है मुझे।"
"मेरी रानी...मैंने बताया न कि ऐसे वक्त पर अगर खुल कर सब कुछ करेगी और बोलेगी तो तुझे बहुत मजा आएगा। इस लिए शर्मा मत और खुल कर इसे अच्छे से पकड़ ले।"
मंजू चाहती तो थी लेकिन शर्म और झिझक के कारण वो ऐसा कर नहीं पा रही थी। एकाएक उसने अपनी आँखें बंद की और दो तीन बार गहरी गहरी सांसें ली। फिर आँखें खोल कर उसने त्रिभुवन के लंड की तरफ देखा। अगले ही पल वो एकदम से उठ कर बैठ गई।
त्रिभुवन उसे उठ कर बैठते देख थोड़ा चौंका लेकिन बोला कुछ नहीं। उधर मंजू ने बैठने के बाद खुद ही उसके लंड को पकड़ लिया और हल्के हल्के सहलाने लगी।
"उफ्फ मेरी रानी।" त्रिभुवन के अंदर मजे की लहर दौड़ गई─"तेरे कोमल हाथ कितना अच्छा महसूस करा रहे हैं मुझे। हां ऐसे ही मेरी रानी....थोड़ा और जोर से पकड़ कर सहला इसे।"
मंजू की नजरें लंड पर जमी थीं। वो सोचने लगी कि इतना बड़ा लंड तो उसके मरद का भी नहीं है।
"ये....ये कितना बड़ा है आपका।" फिर उसने कहा।
"क्या बड़ा है मेरी रानी।"
"आपका ये लं...लंड।"
"पसंद आया न तुझे।"
"ह...हां।"
"तो इसको एक बार चूम न।"
"क...क्या????" मंजू शर्म और हैरत से चौंक पड़ी─"छी...ये क्या कह रहे हैं आप। भला कोई इसे चूमता है क्या।"
"तुझे अभी पता ही नहीं है मेरी प्यारी मंजू कि दुनियां में लोग क्या क्या करने लगे हैं।" त्रिभुवन ने कहा─"आज कल मर्द औरत की चूत चाटता है और औरत मर्द का लंड मुंह में ले कर चूसती है।"
"छी ये क्या बोल रहे हैं आप।" मंजू चकित सी बोली─"न..नहीं नहीं...मैं नहीं मानती कि लोग ऐसा करते होगे...और अगर करते भी हैं तो क्या। मैं तो ऐसा गंदा काम नहीं करूंगी और न ही आपको करने दूंगी।"
"ठीक है मेरी रानी।" त्रिभुवन ने इसके लिए मंजू को मजबूर करना ठीक नहीं समझा─"मैं तुझे किसी बात के लिए मजबूर नहीं करूंगा।"
मंजू कुछ देर तक उसके लंड को सहलाती रही। त्रिभुवन का लंड अब पूरी तरह अकड़ चुका था। मंजू को यकीन नहीं हो रहा था कि किसी आदमी का हथियार इतना बड़ा हो सकता है।
जब त्रिभुवन से बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया तो उसने मंजू को रोका और सीधा लेट जाने का इशारा किया। मंजू तो कब से यही चाह रही थी कि त्रिभुवन जल्द से जल्द उसकी चुदाई करना शुरू कर दे।
मंजू के लेटते ही त्रिभुवन उसके ऊपर आया और झुक कर उसकी छातियों को मसलने लगा और निप्पल को मुंह में भर चूसने खींचने लगा। मंजू एक ही पल में गनगना उठी। पूरे बदन में मजे की लहर दौड़ उठी थी उसके। उसने त्रिभुवन के सिर को थाम कर अपनी छातियों पर दबाना शुरू कर दिया था।
"तेरे ये दूध सच में बहुत मीठे हैं मेरी रानी।" त्रिभुवन ने सिर उठा कर मंजू से कहा─"मन करता है बस ऐसे ही मसलते हुए चूसता रहूं मगर अब बर्दाश्त नहीं हो रहा।"
कहने के साथ ही वो नीचे सरका। उसका फनफनाया हुआ लंड मंजू के पेट से टकराते हुए सीधा उसकी चूत के पास पहुंच गया। मंजू को जैसे ही महसूस हुआ कि त्रिभुवन का लंड उसकी चूत के पास पहुंच गया है तो सिसक उठी।
"अब डाल दीजिए न।" उससे बर्दाश्त न हुआ तो मजबूरन बोल पड़ी─"कब से तड़पा रहे हैं मुझे। अब चोदिए न मुझे।"
मंजू के मुख से इस बार बेझिझक खुल्लम खुल्ला ये सुन कर त्रिभुवन मुस्कुरा उठा। उसने झट उसकी टांगों को फैलाया और एक हाथ से अपने लंड को पकड़ कर मंजू की चूत में घुसाने लगा।
"ले मेरी रानी।" फिर वो बोला─"अब नहीं तड़पाऊंगा तुझे। अब तो तुझे कस कस के चोदूंगा।"
"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्।" अपनी चूत के अंदर त्रिभुवन का लंड महसूस होते ही मंजू मजे में सिसक उठी।
उधर त्रिभुवन ने अपने लंड का टोपा उसकी चूत में घुसाया और फिर दोनों हाथों को खाट पर इधर उधर जमाने के बाद एकदम से जोर का धक्का मार दिया।
"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् म..र गई।" मंजू दर्द और मजे से आह भर कर सिसक उठी─"धीरे से डालिए न।"
त्रिभुवन से अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था इस लिए उसने उसकी बात को अनसुना कर दिया और फिर से तेज धक्का दिया जिससे इस बार उसका पूरा लंड मंजू की चूत को चीरते हुए अंदर तक समा गया।
"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्।" मंजू की इस बार दर्द से हल्की चीख निकल गई।
"बस मेरी रानी।" पूरा लंड घुसेड़ कर त्रिभुवन बोला─"पूरा अंदर जा चुका है। अब तुझे दर्द नहीं बल्कि मजा आएगा।"
कहने के साथ ही त्रिभुवन जोर जोर से अपनी कमर को आगे पीछे करके लगा। पलक झपकते ही कमरे में मंजू की आहें और सिसकियां गूंजने लगीं। त्रिभुवन के धक्के लगाने से उसी बड़ी बड़ी चूचियां उछल पड़ती थीं। जिन्हें देख त्रिभुवन ने झुक कर उसकी चूची का एक निप्पल मुंह में भर लिया। एक तरफ से वो धक्के मार रहा था और दूसरी तरफ से वो उसका निप्पल चूसता जा रहा था। इस दोहरे हमले से मंजू का मजा दोगुना हो गया और वो मस्ती में आ कर और जोरों से आहें भरने लगी।
"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् कितना मजा आ रहा है जेठ जी।" फिर वो मजे में आँखें बंद किए बोली─"आज से पहले ऐसा मजा कभी नहीं आया मुझे। आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् आपका लंड तो मेरी बच्चादानी तक पहुंच रहा है। हाए ऐसा लगता है जैसे कोई गरम गरम सलिया मेरी नाजुक सी चूत में घुस गया है। उफ्फ आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्....ऐ...ऐसे ही जोर जोर से चोदिए मुझे।"
मंजू जो अब तक शर्मा रही थी वो अब मजे और मस्ती में पूरा बेशर्म हो गई थी।
"हां मेरी रानी।" त्रिभुवन उसकी बातें सुन कर और जोर से धक्के मारते हुए बोला─"ले मेरी प्यारी मंजू...आज मैं तुझे ऐसा मजा दूंगा जिससे तू तृप्त हो जाएगी रानी। उफ्फ तेरी चूत तो काफी कसी हुई है रे। क्या दशरथ तुझे चोदता नहीं है।"
"शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह् किसी...किसी दिन ही वो मुझे चो...चोदते हैं जे...जेठ जी।" मंजू मस्ती में बोली─"ले...शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह्...लेकिन उनका आपकी तरह इतना बड़ा नहीं है इस लिए आपको मेरी चू..चूत कसी हुई लग रही है। आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् हाय कितना मस्त चोदते हैं आप...शश्श्श्श् कितना मजा आ रहा है मुझे।"
"अब से तुझे ऐसे ही मजा आएगा मेरी रानी।" त्रिभुवन ने थोड़ा आगे हो कर उसके होठ चूम लिए─"अब से मैं तुझे ऐसे ही हुमच हुमच के चोदूंगा। बोल मुझसे चुदवाएगी न मंजू।"
"ह...हां म...मैं ऐसे ही आपसे चुदवाऊंगी जेठ जी।" मंजू मजे के आनंद में डूबी बोली─"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् रो...रोज ऐसे ही चुदवाऊंगी आपसे। आप मुझे ऐसे ही शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह् ऐसे ही चोद कर मजा देना।"
"हां मेरी रानी।" धक्के लगाने से त्रिभुवन की सांसें अब फूल गईं थी─"मैं तुझे रोज ऐसे ही मजा दूंगा। आज से तू मेरी है....आज से तेरी ये चूत मेरी है...है न मेरी रानी।"
"ह...हां जे...जेठ जी।" मंजू ने मजे में फौरन जवाब दिया─"अब से शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह् अब से मेरी ये चूत आपकी है। उफ्फ शश्श्श्श् अब से आप ऐसे ही मेरी चूत में अंदर तक अपना लंड घुसेड़ कर मुझे चोदना।"
एकाएक ही मंजू बुरी तरह मचलने लगी। त्रिभुवन अब और भी तेज तेज धक्के लगाने लगा था। मंजू मजे के सातवें आसमान में थी। उसने त्रिभुवन की पीठ पर अपने दोनों हाथों से पकड़ बनाई और मजे में उसे अपनी तरफ खींचने लगी। त्रिभुवन को अपनी पीठ पर उसके नाखून गढ़ते महसूस हुए। उसे हल्का दर्द तो हुआ मगर उसने परवाह नहीं की। वो मजे में पागल होने लगा था। उसके बदन का लहू बड़ी तेजी से दौड़ते हुए उसके अंडकोष की तरफ आ रहा था।
यही हाल मंजू का भी था। मजे में पता नहीं क्या क्या बोलने लगी थी वो। उसकी आहें और सिसकियां पूरे कमरे में गुंज रहीं थी। शुक्र था कि घर के बाहर का दरवाजा बंद था वरना अगर कोई आ जाता तो जरूर उसके कानों में मंजू की आहें भरने और सिसकियां भरने की आवाजें पड़ जातीं।
"अ..और जोर से चोदिए जेठ जी।" मंजू मस्ती में पगलाई बोली─"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् हां ऐसे ही...हाय मैं हवाओं में उड़ रही हूं। ऐसा लगता है मेरी नसों में दौड़ता खून मेरी चूत की तरफ भागता हुआ आ रहा है।"
"मेरा भी यही हाल है रानी।" तेज तेज धक्के मारते हुए त्रिभुवन बोला─"मेरे झड़ने का समय आ गया है। क्या मैं तेरी चूत में झड़ जाऊं।"
"न...नहीं नहीं शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह्।" मंजू सिसकते हुए बोली─"बाहर ही झड़िएगा जेठ जी....आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् लगता है मैं भी झड़ने वाली हूं। शश्श्श्श् जोर जोर से चोदो मुझे। हाय फाड़ दो मेरी चूत को। हाय मेरी अम्मा....बहुत मजा आ रहा है.... शश्श्श्श् जेठ जी....मैं झड़ने वाली हूं....संभालिए मुझे।"
कहने के साथ ही मंजू एकदम से अकड़ गई। उसने दोनों टांगों की कैंची बना कर त्रिभुवन को इतना जोर से जकड़ लिया कि त्रिभुवन चाह कर भी तेज तेज अपनी कमर न हिला सका। उधर मंजू कस के आँखें बंद किए और त्रिभुवन को जकड़े झटके खाने लगी। जाने कितने ही झटके लगे उसे और फिर वो एकदम से शांत पड़ गई। उसकी पकड़ ढीली पड़ी तो त्रिभुवन ने पूरा जोर लगा कर धक्के मारने शुरू कर दिए। वो खुद भी झड़ने वाला था इस लिए मजे में पागल हो कर बेतहाशा जोर लगा के धक्के मारे जा रहा था।
"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् मंजू....मेरी रानी मैं आ रहा हूं।"
मजे की चरम सीमा में पहुंचने से पहले ही त्रिभुवन ने झटके से लंड को मंजू की चूत से बाहर खींचा और फिर जोर जोर से मुट्ठ मारते हुए अपने लंड का पानी मंजू के पेट और नाभी पर गिराता चला गया। पहले की दो तीन पिचकारियां इतनी तेज थीं कि वो उछल कर मंजू के सीने और चेहरे तक पहुंच गईं थी। मंजू को इसका होश ही नहीं था। क्योंकि वो अभी भी आँखें बंद किए चरमसुख के एहसास में डूबी थी। इधर झड़ने के बाद त्रिभुवन असहाय सा हो कर मंजू के बगल में ही खाट पर पसर गया।
जारी है............
"बापू किस चरम सीमा में पहुंचा देने को बोल रहे थे तुमसे।" मुझे समझ न आया तो मैंने काकी से पूछा।
मेरे पूछने पर काकी जाने क्या सोच कर हंस पड़ी। उनके यूं हंस पड़ने से मैं ये सोच कर मायूस सा हो गया कि कितना नादान और नासमझ हूं मैं जो उनकी कुछ बातें अच्छे से समझ ही नहीं पाता हूं। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे काकी के सामने मेरी इज्जत उतर गई हो।
"क्या तुम सच में इतने भोले और नादान हो जो चरम सीमा जैसी बात नहीं समझते।" काकी ने अपलक मेरी तरफ देखते हुए कहा─"या फिर तुम समझ तो गए हो मगर मेरे मुख से खुल्लम खुल्ला सुनना चाहते हो। बताओ यही बात है न।"
"न...नहीं नहीं काकी।" मैं झट बोला─"मैं सच में नहीं समझ पाया हूं। तभी तो तुमसे पूछ बैठा हूं।"
"ठीक है...तो फिर सुनो।" काकी ने एक गहरी सांस ली─"चरम सीमा उसे कहते हैं जिसमें इंसान मजे में इतना ज्यादा डूब जाता है कि फिर उसे किसी भी बात का होश ही नहीं रह जाता। कोई भी चीज जब हद से ज्यादा हो जाती है तो इंसान उसे अति हो जाना कहता है या फिर चरम सीमा के बाहर कह देता है। हर चीज को सोचने का अपना अपना नजरिया होता है....अपनी अपनी सोच होती है लेकिन कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिन्हें एक खास नाम दे कर उसके एहसास हो बयां किया जाता है। खुशी, आनंद और दुख दर्द ऐसी ही चीजें हैं जो अगर हद से ज्यादा महसूस हों तो हम यही कहते हैं कि ये अपनी चरम सीमा तक या उससे भी ऊपर पहुंच गई है। तुम्हारे बापू की दो उंगलियां उस वक्त मेरे द्वारा अपनी टांगों को भींच लेने से मेरी चू..चूत में फंसी रह गईं थी और वो मेरी चूत को सहलाने के साथ साथ कुरेदने भी लगे थे। इससे मैं पूरा मदहोश हो गई थी। मुझे इतना आनंद आने लगा था कि मैं उसके मजे से सातवें आसमान में उड़ने लगी थी और फिर उस स्थिति में जब मैं और मेरे अंदर के जज्बात मेरे काबू से बाहर हो गए तो उस मजे में बेकाबू हुए जज्बात पानी बन कर मेरी उस योनि के रास्ते बाहर निकल गए थे। ये वो स्थिति होती है जिसमें इंसान अत्यधिक आनंद में डूब जाता है और वो उस आनंद को काबू नहीं रख पाता।"
"हम्म्म्म समझ गया।" मैंने काकी की बात गौर से सुनने के बाद सिर हिलाया─"खैर फिर आगे क्या हुआ। मतलब कि बापू ने जब तुम्हें वैसा कहा था तब तुमने क्या किया था।"
"मैं तो लाज और शर्म की वजह से कुछ करने की हालत में ही नहीं थी राजू।" काकी ने बताना शुरू किया─"इस लिए जब जेठ जी के कहने का मतलब मुझे समझ आया तो मैंने बुरी तरह शर्मा कर बस इतना ही कहा कि आपको जो करना है कीजिए।"
"क्या सच में???"
"हां और क्या।" काकी ने थोड़ा लजा कर कहा─"मैं ये तो कह नहीं सकती थी कि मुझे कुछ नहीं करना है या उन्हें कुछ करने नहीं देना है या वो मेरे घर से ही चले जाएं। ऐसा बोलने का मतलब था उनकी कही बात का सच हो जाना। मतलब कि जो उन्होंने मुझे मतलबी होने वाली बात कही थी उसका सच हो जाना। बात भी सही थी...इससे तो यही साबित होता न कि जब तक मुझे मजा आ रहा था तब तक मैंने उन्हें किसी बात के लिए नहीं रोका और जब मैं मजे और आनंद को पा चुकी तो अब शरीफ बन कर उन्हें कुछ भी करने से मना कर रही हूं....इतना ही नहीं उन्हें अपने घर से भी जाने को कह रही हूं।"
"हां ये तो सही कहा तुमने।" मैंने भी समझ कर सिर हिलाया─"तो फिर जब तुमने बापू से कहा कि आपको जो करना है कीजिए तो फिर बापू ने क्या कुछ किया था।"
"वो तो उन्हें करना ही था राजू।" मंजू काकी ने कहा─"इतना आगे बढ़ने के बाद ऐसा कौन मरद होगा जो औरत की ऐसी बात मान कर बिना कुछ किए ही चला जाएगा। दुनिया में इतना शरीफ मरद अब कोई नहीं रहा राजू। किसी भूखे के सामने अगर अच्छे पकवान से भरी थाली रखी हो तो क्या वो बिना कुछ खाए भूखा ही उठ कर चला जाएगा....नहीं न। वैसा ही हाल जेठ जी का था। उस वक्त अगर मैं मना भी करती तब भी वो नहीं रुकते। खैर यहां तो मैंने ऐसा कह कर कुछ भी करने की एक तरह से छूट ही दे दी थी।"
"इसका मतलब बापू ने फिर तुम्हारे साथ कुछ किया था...है न।"
"हां।"
"क्या किया था बापू ने।"
"वही जो सारी दुनिया के मर्द करते हैं।" काकी के चेहरे पर शर्म की लाली उभर आई─"मतलब कि...चु...चुदाई।"
"क..क्या????" मेरी आँखें फैलीं─"क्या तुम सच कह रही हो।"
"भला मैं तुमसे झूठ क्यों बोलूंगी।" काकी ने कहा─"जब इतना कुछ सच बताया है तो ये भी सच ही है। तुम खुद सोचो कि अगर ये सच न होता तो क्या आज मैं और तुम्हारे बापू खेत वाले उस कमरे में वो सब कर रहे होते।"
"हां ये भी सही कहा तुमने।" मैंने कहा─"खैर मुझे ये वाला किस्सा भी खुल कर पूरा बताओ।"
"राजू कुछ तो शर्म करो।" काकी ने आँखें फैला कर कहा─"तुम्हारी काकी हूं मैं। थोड़ी तो लिहाज और मर्यादा रहने दो हमारे बीच।"
"मैं ये सब नहीं जानता।" मैंने भोलापन दिखा कर जिद की─"जब तुमने इतना कुछ खुल कर बताया है तो इसके आगे का भी मुझे बताओ।"
मेरी बात सुन कर काकी कुछ पलों तक मुझे अजीब तरह से देखती रहीं। उनके चेहरे पर शर्म और झिझक झलक रही थी। इधर मेरी धड़कनें बढ़ चलीं थी। तभी काकी ने मुझसे नजर हटाई और दूसरी जगह नजर टिका कर ऐसे बताने लगीं जैसे उस जगह पर उन्हें वही सब दिखने लगा हो जो बापू ने उनके साथ किया था।
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"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्।" मंजू के मुख से मजे में डूबी सिसकी निकल गई।
त्रिभुवन उसकी बड़ी बड़ी छातियों को दोनों हाथों से पकड़े कभी मसल देता तो कभी झुक कर एक निप्पल को मुंह में भर लेता। खाट पर पड़ी मंजू बुरी तरह मचल उठती थी।
"मंजू...मेरी रानी।" त्रिभुवन ने मुंह से निप्पल को जोर से खींचा और फिर छोड़ कर कहा─"आज तेरा सारा दूध निचोड़ लूंगा। तेरी इन सुंदर और गोरी चूचियों को दबा दबा के लाल कर दूंगा।।"
"शश्श्श्श् ऐ....ऐसी बातें न करिए न।" मंजू शर्म से दोहरी हो कर बोली─"मुझे बहुत शर्म आ रही है।"
"अब किस बात की शर्म मेरी रानी।" त्रिभुवन ने उचक कर उसके होठों को चूम कर कहा─"अब हमारे बीच शर्म नहीं रहनी चाहिए। अब तो बस हर शर्म लिहाज को दूर कर के बस प्यार ही करना चाहिए। बोल मेरी रानी करेगी न प्यार। भई...मैं तो अपनी सुंदर रानी को दबा के प्यार करूंगा।"
कहने के साथ ही त्रिभुवन झुका और फिर से मंजू की छातियों को मसल मसल कर निप्पल को चूसने लगा। मंजू फिर से मचलने लगी। कमरे में कभी उसकी आहें गूंज उठतीं तो कभी मादक सिसकियां। उसकी टांगों के बीच फिर से हरारत होने लगी थी। उसकी चूत फिर से रिसने लगी थी जिससे उसे खुजली होने लगी थी।
इधर त्रिभुवन निप्पल को छोड़ नीचे सरका। मंजू का गेहुंए रंग का सपाट पेट देख उसके मुंह में जैसे पानी आ गया। पेट के बीच में गहरी नाभी को देख तो उससे रहा ही न गया। झट से झुक कर वो पेट और नाभि को चूमने चाटने लगा। मंजू और भी ज्यादा मचलने लगी।
"शश्श्श्श् जे...जेठ जी गुदगुदी हो रही है।" मंजू मजे में सिसक उठी।
"गुदगुदी हो रही है या मजा आ रहा है मेरी रानी को।" त्रिभुवन ने सिर उठा कर पूछा।
"ह...हां हां मजा ही आ रहा है जेठ जी।" मंजू मजे में आँखें बंद किए सिसक के बोली।
"चिंता मत कर मेरी मंजू।" त्रिभुवन बोला─"आज तुझे ऐसा मजा आएगा जिसका तूने कभी सोचा तक नहीं होगा।"
इतना कहते ही त्रिभुवन फिर झुका और फिर से मंजू का पेट और नाभी को चूमना चाटना शुरू कर दिया। नाभी के बस थोड़ा ही नीचे साया था जिसकी डोरी उसके चेहरे के बिल्कुल पास ही थी। उसने एक हाथ से साया की वो डोरी पकड़ी और झटके से खींच दी जिससे गांठ खुल गई। मंजू को जैसे ही इसका पता चला वो थोड़ी हड़बड़ा सी गई।
"जे...जेठ जी क्या कर रहे हैं।" मंजू ने झट से आँखें खोल कर त्रिभुवन को देखा।
"अपनी प्यारी मंजू की सुंदरता को उजागर कर रहा हूं रानी।" त्रिभुवन ने कहा─"इसके अंदर सबसे अनमोल चीज छुपी हुई है। उसी को तो देखना है मुझे और फिर उसे प्यार भी करना है।"
मंजू समझ गई कि त्रिभुवन उसकी चूत की बात कर रहा है। इस लिए वो बुरी तरह शर्मा गई। चेहरे पर लाज के साथ साथ एकाएक घबराहट उभर आई। उसने न में सिर हिला कर त्रिभुवन से कहा कि नहीं...ऐसा मत कीजिए मगर त्रिभुवन भला अब कहां मानने वाला था। उसने दूसरी गांठ को भी खोला और साया को नीचे खींचने लगा मगर वो ज्यादा नीचे न सरक सका क्योंकि मंजू लेटी हुई थी और उसके पिछवाड़े में वो दबा हुआ था। त्रिभुवन चाहता तो साया को बिना उतारे ही नीचे से ऊपर उठा कर मंजू की बुर को उजागर कर देता मगर उसका मन यही था कि मंजू के बदन पर कोई कपड़ा ही न रहे।
"अपनी कमर को थोड़ा सा उठा मेरी रानी।" फिर उसने कहा─"ताकि मैं तेरा ये साया नीचे सरका कर इसे तेरे बदन से अलग कर सकूं।"
"न...नहीं न।" मंजू शर्म से बोली─"उसे मत निकालिए न।"
"मैं तो निकालूंगा रानी।" त्रिभुवन ने जैसे जिद की─"मैं अपनी प्यारी मंजू को पूरी तरह नंगा देखना चाहता हूं।"
मंजू बेबस सी हो गई। वो समझ चुकी थी कि उसके मना करने का अब कोई फायदा नहीं है। उसे ये भी खयाल आया कि ऐसी हालत में अगर कोई आ गया तो बड़ा भारी अनर्थ हो जाएगा। मतलब जो कुछ करना है उन दोनों को जल्दी ही करना होगा। ये सोच कर मंजू ने अपनी कमर को थोड़ा सा उठा लिया जिससे त्रिभुवन ने झट से उसका साया नीचे खींच दिया। साया हटते ही मंजू की चूत एकदम उजागर हो गई। चूत के चारों तरफ घने काले बाल(झांठें)थे।
मंजू को जैसे ही एहसास हुआ कि अब उसकी चूत पूरी नंगी हो चुकी है तो उसने हड़बड़ा हर जल्दी से उसे अपने दोनों हाथों से छुपा लिया। उसकी धड़कनें रुक सी गईं थी। उसे इतनी लाज आई कि उसने दोनों हाथों से अपनी चूत को छुपाए कस के आँखें बंद कर ली। ये देख त्रिभुवन मुस्कुराया ही नहीं बल्कि हंस भी पड़ा।
"क्या हुआ मेरी रानी।" उसने कहा─"मेरी छोटी रानी से अपने हाथ हटा न। देखने तो दे कि ये भी तेरी तरह सुंदर है या नहीं।"
"उफ्फ जेठ जी...ऐसी बातें न कीजिए न।" मंजू हद से ज्यादा लजा गई।
त्रिभुवन मुस्कुरा उठा। वो ये भी समझ गया था कि मंजू लाज के कारण अपने हाथ नहीं हटाएगी इस लिए उसने खुद आगे हाथ बढ़ा कर उसके हाथों को चूत से हटाने के लिए थोड़ा सा जोर लगाया। इधर मंजू ने भी झट से जोर लगा कर अपने हाथ को चूत पर दबाया।
"ये क्या कर रही है रानी।" त्रिभुवन उसका हाथ हटाने की कोशिश करते हुए बोला─"अपनी इस छोटी रानी के दर्शन तो करने दे।"
"न..नहीं नहीं जेठ ऐसा मत कीजिए न।" मंजू बुरी तरह लजा रही थी। उसने अभी भी अपनी आंखों को कस के बंद किया हुआ था।
त्रिभुवन ने इस बार ताकत का स्तेमाल किया और कुछ ही पलों में मंजू के हाथों को उसकी चूत से हटा दिया। मंजू बुरी तरह छटपटा के रह गई।
"ये क्या मेरी प्यारी मंजू।" त्रिभुवन उसकी चूत के आसपास उगे काले जंगल को देख बोला─"तूने तो अपनी छोटी रानी को घनघोर जंगल में छुपा रखा है।"
मंजू का शर्म से बुरा हाल हो गया। उसने फिर से अपनी चूत को छुपाने के लिए हाथ बढ़ाया लेकिन त्रिभुवन पहले से तैयार था इस लिए उसने उसके हाथों को पकड़ लिया।
"भगवान के लिए जेठ जी ऐसे मत देखिए न।" मंजू लजा कर बोली─"और ऐसी बातें भी न कीजिए। मुझे सच में बहुत शर्म आ रही है।"
"अच्छा ठीक है नहीं करूंगा बातें।" त्रिभुवन ने भी वक्त की नजाकत को समझा─"पर मैं अपनी छोटी रानी को तो प्यार करूंगा ही।"
इतना कह त्रिभुवन एकदम से झुका और मंजू की गदराई हुई जांघ को चूम लिया। उसके ऐसा करते ही मंजू मचल उठी और उसके मुख से सिसकी निकल गई। इधर त्रिभुवन चूमते हुए उसकी चूत के किनारे पर आ गया।
मंजू ये सोच के घबरा उठी कि क्या वो उसकी चूत को भी चूमने वाला है। उसने तो ऐसा होने की कभी कल्पना ही नहीं की थी। उसका पति ये सब सपने में भी नहीं सोचता था। उसने तो मंजू के होठों पर भी कभी आज तक चुम्बन नहीं लिया था।
"शश्श्श्श् उफ्फ जे..जेठ जी ये क्या कर रहे हैं आप।" अपनी चूत के पास जैसे ही उसने त्रिभुवन के होठों को महसूस किया तो बोल पड़ी─"भगवान के लिए वहां मुंह मत रखिए। वो बहुत गंदी जगह है।"
"मेरी प्यारी मंजू का कुछ भी गंदा नहीं है।" त्रिभुवन ने सिर उठा कर उसकी तरफ देखते हुए कहा─"फिर चाहे वो मेरी रानी की चूत हो या गान्ड।"
चूत गान्ड सुनते ही मंजू का एक बार फिर से शर्म से बुरा हाल हो गया। इधर त्रिभुवन इतना बोलने के बाद फिर से झुक कर उसकी चूत के आस पास चूमने लगा। मंजू बुरी तरह छटपटाने लगी। एक बार फिर से उसके अंदर बेचैनी बढ़ने लगी थी। वासना का नशा फिर से मजे का रूप ले कर उसे हवाओ में उड़ाने लगा था।
तभी मंजू उछल पड़ी क्योंकि अचानक ही उसने अपनी चूत पर त्रिभुवन की हथेली महसूस की। त्रिभुवन उसकी चूत को सहलाने लगा था। फिर सहसा चूत के आसपास उगे बालों को उंगलियों से हटाया जिससे मंजू की चूत का गुलाबी हिस्सा नजर आने लगा।
"शश्श्श्श्...ये क्या कर रहे हैं आप।" मंजू मचलते हुए सिसकी─"वहां हाथ मत लगाइए...वो गंदी जगह है।"
"पर मुझे तो ये बड़ी प्यारी जगह नजर आ रही है मेरी रानी।" त्रिभुवन जैसे नशे में बोला─"कितनी सुंदर है तेरी चूत और देख कितना गीली हो गई है।"
मंजू ये सुन कर शर्म से और भी पानी पानी हो गई। उसने झट अपनी टांगों को सिकोड़ कर चूत को छुपाना चाहा मगर त्रिभुवन ने उसे ऐसा नहीं करने दिया। उसने दोनों हाथों से उसकी जांघों को थाम लिया था। मंजू बेबस सी हो गई। तभी त्रिभुवन ने उसकी चूत में उंगली घुसेड़ दी जिससे मंजू उछल पड़ी।
"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्।" वो मजे के तरंग में सिसक उठी। एक ही पल में उसका पूरा बदन मजे और उत्तेजना में कांप उठा।
उधर त्रिभुवन उसकी चूत में उंगली डाले अंदर बाहर करने लगा। मंजू और भी ज्यादा मजे और उत्तेजना में मचलने लगी। आँखें बंद किए वो अपना सिर कभी इधर तरफ करती तो कभी दूसरी तरफ।
इधर त्रिभुवन का हाल भी कुछ ठीक नहीं था। बड़ी देर से उसने खुद को रोके हुए था। लुंगी के अंदर कच्छे में उसका हथियार पूरा अकड़ गया था और मंजू की गुलाबी चूत में समा जाने के लिए मानो त्रिभुवन को मजबूर किए जा रहा था।
"अब बर्दाश्त नहीं हो रहा मेरी रानी।" फिर उसने उंगली करते हुए मंजू से कहा─"मेरा हथियार तेरी इस चूत में जाने के लिए बेकरार हो उठा है। तू बता...क्या मैं अपना लंड डाल दूं तेरी चूत में।"
उसकी बात सुनते ही मंजू बुरी तरह लजा गई। उससे कुछ बोला न गया। हालांकि उसकी जो हालत थी उसके चलते अब वो भी यही चाहती थी कि त्रिभुवन जल्दी से उसे चोदना शुरू कर दे और ऐसा चोदे कि उसकी चीखें निकलने लगें।
"बोल न मेरी प्यारी मंजू।" उसे चुप देख त्रिभुवन बोला─"देख जब तक तू मुझसे कहेगी नहीं कि चूत में लंड डाल दो तब तक मैं नहीं डालूंगा।"
मंजू ये सुन कर शरमाई तो बहुत लेकिन सहसा उसके चेहरे पर बेचैनी के साथ बेबसी भी झलक उठी।
"अ...आपका जो मन करे की...कीजिए।" फिर उसने किसी तरह धीमे से कहा। उसकी आँखें अब भी बंद थीं।
"एक बार बोल दे न मेरी रानी।" त्रिभुवन ऊपर की तरफ खिसक कर उसके चेहरे के पास आ गया। फिर झुक कर उसने मंजू के कांपते होठों को चूम लिया। मंजू को पता ही नहीं था कि वो नीचे से ऊपर आ गया है इस लिए जैसे ही उसे अपने होठों पर त्रिभुवन के होंठ महसूस हुए तो वो एकदम से चौंक पड़ी थी। न चाहते हुए भी उसने आँखें खोल कर त्रिभुवन की तरफ देखा। उफ्फ उसकी आंखों में वासना के लाल डोरे झलक रहे थे। ऐसा लगा जैसे कितना नशे में है वो।
"क्यों इतना तड़पा रही है अपने इस दीवाने को मेरी रानी।" त्रिभुवन उसकी आंखों में देखते हुए बोला─"अपने मुख से खुल कर एक बार बोल न कि मेरी चूत में अपना लंड डाल दीजिए।"
"ऐ...ऐसी बातें मत कीजिए न।" मंजू ने शर्म से चेहरा दूसरी तरफ फेर कर कहा─"आपको को करना है कीजिए....पर जल्दी कीजिए।"
त्रिभुवन ये सुन कर मुस्कुरा उठा। वो अच्छी तरह समझता था कि मंजू इस वक्त बहुत ज्यादा शर्मा रही है। एक तो वो रिश्ते में उसका जेठ लगता था...दूसरे उसने ये सब कभी सपने में भी नहीं सोचा था और न ही कभी अपने पति से बोला था। इस लिए उसका यूं शर्माना स्वाभाविक था। यही बहुत बड़ी बात थी कि वो अपने जेठ के साथ इतना कुछ करती चली आई थी।
त्रिभुवन ने झुक कर उसके गाल को चूमा फिर बोला─"बस एक बार अपने मुख से बोल दे रानी। फिर मैं सच में जल्दी से वही करने लगूंगा जो हम दोनों चाहते हैं।"
मंजू समझ चुकी थी कि जब तक वो बोलेगी नहीं तब तक उसे इसी हालत में रह कर तड़पते रहना पड़ेगा। इस लिए उसने आँखें बंद कर के हिम्मत जुटाई और बोली─"अ..आप बहुत गंदे हैं। कितना बेबस कर रहे हैं मुझे। मैंने आज तक कभी अपने मरद से ऐसे नहीं बोला है।"
"पर मैं तो तेरा प्रेमी हूं मेरी प्यारी मंजू।" त्रिभुवन ने मुस्कुराते हुए कहा─"जो तूने अपने मरद से कभी नहीं कहा वो अपने इस दीवाने से कह दे न। मैं चाहता हूं कि हमारे बीच किसी भी चीज का न पर्दा रहे और न ही कोई शर्म। असली मजा तभी आता है मेरी रानी जब हर चीज बेशर्म हो के खुल कर बोली और की जाए। तू एक बार बोल तो मेरी रानी....फिर देखना कितना मजा आएगा तुझे।"
"ठी...ठीक है।" मंजू ने कहा─"जेठ जी मुझे अब ज्यादा न तड़पाइए...मेरी चू...चूत में अपना लं...लंड डाल कर मुझे चोदिए न।"
इतना कह कर मंजू ने शर्मा कर दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपा लिया। उसकी नंगी छातियां उसकी तेज चलती सांसों से ऊपर नीचे होने लगीं थी। उधर त्रिभुवन उसकी बात सुनते ही खुश हो गया। उसे मंजू के मुख से ऐसी बात सुन कर एक अलग ही तरह का नशा चढ़ गया था।
अब उसने देर नहीं की। झट से उठा और फटाफट अपने कपड़े उतारे लगा। कमीज और लुंगी को उसने एक तरफ फेंक दिया और फिर कच्छे का नाड़ा खोल कर निकाल दिया। उसका काला लंड उछल कर बाहर आ गया था। उसने आँखें बंद किए लेटी मंजू की तरफ देखा और फिर चुपके से उसके करीब गया। अगले ही पल उसने मंजू का एक हाथ पकड़ा और उसे अपने लंड पर रख दिया। मंजू को जैसे ही किसी गर्म और ठोस चीज पर अपना हाथ महसूस हुआ तो उसने झट से आँखें खोल कर उस तरफ देखा।
त्रिभुवन को एकदम नंगा देख उसकी आँखें फैल गईं और फिर जैसे ही उसकी नजर अपने हाथ पर पड़ी तो ये देख कर उसे झटका लगा कि त्रिभुवन ने उसके हाथ को अपने लंड पर रखा हुआ है। उसने हड़बड़ा कर अपना हाथ उसके लंड से हटाना चाहा मगर त्रिभुवन ने उसे ऐसा नहीं करने दिया।
"मेरी रानी....एक बार इसे अपने हाथ से सहला दे।" फिर वो बोला─"देख तेरी गुलाबी चूत को देख कर ये कैसे खड़ा हो गया है। इसे अच्छे से सहला कर बता कैसा है ये।"
मंजू ने फिर से हाथ हटाने के लिए जोर लगाया मगर त्रिभुवन ने उसके हाथ को मजबूती से पकड़े रखा। उधर मंजू का शर्म से बुरा हाल हो चुका था। बेबस हो कर बोली─"क...क्या कर रहे हैं आप। छोड़ दीजिए न...बहुत शर्म आ रही है मुझे।"
"मेरी रानी...मैंने बताया न कि ऐसे वक्त पर अगर खुल कर सब कुछ करेगी और बोलेगी तो तुझे बहुत मजा आएगा। इस लिए शर्मा मत और खुल कर इसे अच्छे से पकड़ ले।"
मंजू चाहती तो थी लेकिन शर्म और झिझक के कारण वो ऐसा कर नहीं पा रही थी। एकाएक उसने अपनी आँखें बंद की और दो तीन बार गहरी गहरी सांसें ली। फिर आँखें खोल कर उसने त्रिभुवन के लंड की तरफ देखा। अगले ही पल वो एकदम से उठ कर बैठ गई।
त्रिभुवन उसे उठ कर बैठते देख थोड़ा चौंका लेकिन बोला कुछ नहीं। उधर मंजू ने बैठने के बाद खुद ही उसके लंड को पकड़ लिया और हल्के हल्के सहलाने लगी।
"उफ्फ मेरी रानी।" त्रिभुवन के अंदर मजे की लहर दौड़ गई─"तेरे कोमल हाथ कितना अच्छा महसूस करा रहे हैं मुझे। हां ऐसे ही मेरी रानी....थोड़ा और जोर से पकड़ कर सहला इसे।"
मंजू की नजरें लंड पर जमी थीं। वो सोचने लगी कि इतना बड़ा लंड तो उसके मरद का भी नहीं है।
"ये....ये कितना बड़ा है आपका।" फिर उसने कहा।
"क्या बड़ा है मेरी रानी।"
"आपका ये लं...लंड।"
"पसंद आया न तुझे।"
"ह...हां।"
"तो इसको एक बार चूम न।"
"क...क्या????" मंजू शर्म और हैरत से चौंक पड़ी─"छी...ये क्या कह रहे हैं आप। भला कोई इसे चूमता है क्या।"
"तुझे अभी पता ही नहीं है मेरी प्यारी मंजू कि दुनियां में लोग क्या क्या करने लगे हैं।" त्रिभुवन ने कहा─"आज कल मर्द औरत की चूत चाटता है और औरत मर्द का लंड मुंह में ले कर चूसती है।"
"छी ये क्या बोल रहे हैं आप।" मंजू चकित सी बोली─"न..नहीं नहीं...मैं नहीं मानती कि लोग ऐसा करते होगे...और अगर करते भी हैं तो क्या। मैं तो ऐसा गंदा काम नहीं करूंगी और न ही आपको करने दूंगी।"
"ठीक है मेरी रानी।" त्रिभुवन ने इसके लिए मंजू को मजबूर करना ठीक नहीं समझा─"मैं तुझे किसी बात के लिए मजबूर नहीं करूंगा।"
मंजू कुछ देर तक उसके लंड को सहलाती रही। त्रिभुवन का लंड अब पूरी तरह अकड़ चुका था। मंजू को यकीन नहीं हो रहा था कि किसी आदमी का हथियार इतना बड़ा हो सकता है।
जब त्रिभुवन से बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया तो उसने मंजू को रोका और सीधा लेट जाने का इशारा किया। मंजू तो कब से यही चाह रही थी कि त्रिभुवन जल्द से जल्द उसकी चुदाई करना शुरू कर दे।
मंजू के लेटते ही त्रिभुवन उसके ऊपर आया और झुक कर उसकी छातियों को मसलने लगा और निप्पल को मुंह में भर चूसने खींचने लगा। मंजू एक ही पल में गनगना उठी। पूरे बदन में मजे की लहर दौड़ उठी थी उसके। उसने त्रिभुवन के सिर को थाम कर अपनी छातियों पर दबाना शुरू कर दिया था।
"तेरे ये दूध सच में बहुत मीठे हैं मेरी रानी।" त्रिभुवन ने सिर उठा कर मंजू से कहा─"मन करता है बस ऐसे ही मसलते हुए चूसता रहूं मगर अब बर्दाश्त नहीं हो रहा।"
कहने के साथ ही वो नीचे सरका। उसका फनफनाया हुआ लंड मंजू के पेट से टकराते हुए सीधा उसकी चूत के पास पहुंच गया। मंजू को जैसे ही महसूस हुआ कि त्रिभुवन का लंड उसकी चूत के पास पहुंच गया है तो सिसक उठी।
"अब डाल दीजिए न।" उससे बर्दाश्त न हुआ तो मजबूरन बोल पड़ी─"कब से तड़पा रहे हैं मुझे। अब चोदिए न मुझे।"
मंजू के मुख से इस बार बेझिझक खुल्लम खुल्ला ये सुन कर त्रिभुवन मुस्कुरा उठा। उसने झट उसकी टांगों को फैलाया और एक हाथ से अपने लंड को पकड़ कर मंजू की चूत में घुसाने लगा।
"ले मेरी रानी।" फिर वो बोला─"अब नहीं तड़पाऊंगा तुझे। अब तो तुझे कस कस के चोदूंगा।"
"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्।" अपनी चूत के अंदर त्रिभुवन का लंड महसूस होते ही मंजू मजे में सिसक उठी।
उधर त्रिभुवन ने अपने लंड का टोपा उसकी चूत में घुसाया और फिर दोनों हाथों को खाट पर इधर उधर जमाने के बाद एकदम से जोर का धक्का मार दिया।
"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् म..र गई।" मंजू दर्द और मजे से आह भर कर सिसक उठी─"धीरे से डालिए न।"
त्रिभुवन से अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था इस लिए उसने उसकी बात को अनसुना कर दिया और फिर से तेज धक्का दिया जिससे इस बार उसका पूरा लंड मंजू की चूत को चीरते हुए अंदर तक समा गया।
"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्।" मंजू की इस बार दर्द से हल्की चीख निकल गई।
"बस मेरी रानी।" पूरा लंड घुसेड़ कर त्रिभुवन बोला─"पूरा अंदर जा चुका है। अब तुझे दर्द नहीं बल्कि मजा आएगा।"
कहने के साथ ही त्रिभुवन जोर जोर से अपनी कमर को आगे पीछे करके लगा। पलक झपकते ही कमरे में मंजू की आहें और सिसकियां गूंजने लगीं। त्रिभुवन के धक्के लगाने से उसी बड़ी बड़ी चूचियां उछल पड़ती थीं। जिन्हें देख त्रिभुवन ने झुक कर उसकी चूची का एक निप्पल मुंह में भर लिया। एक तरफ से वो धक्के मार रहा था और दूसरी तरफ से वो उसका निप्पल चूसता जा रहा था। इस दोहरे हमले से मंजू का मजा दोगुना हो गया और वो मस्ती में आ कर और जोरों से आहें भरने लगी।
"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् कितना मजा आ रहा है जेठ जी।" फिर वो मजे में आँखें बंद किए बोली─"आज से पहले ऐसा मजा कभी नहीं आया मुझे। आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् आपका लंड तो मेरी बच्चादानी तक पहुंच रहा है। हाए ऐसा लगता है जैसे कोई गरम गरम सलिया मेरी नाजुक सी चूत में घुस गया है। उफ्फ आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्....ऐ...ऐसे ही जोर जोर से चोदिए मुझे।"
मंजू जो अब तक शर्मा रही थी वो अब मजे और मस्ती में पूरा बेशर्म हो गई थी।
"हां मेरी रानी।" त्रिभुवन उसकी बातें सुन कर और जोर से धक्के मारते हुए बोला─"ले मेरी प्यारी मंजू...आज मैं तुझे ऐसा मजा दूंगा जिससे तू तृप्त हो जाएगी रानी। उफ्फ तेरी चूत तो काफी कसी हुई है रे। क्या दशरथ तुझे चोदता नहीं है।"
"शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह् किसी...किसी दिन ही वो मुझे चो...चोदते हैं जे...जेठ जी।" मंजू मस्ती में बोली─"ले...शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह्...लेकिन उनका आपकी तरह इतना बड़ा नहीं है इस लिए आपको मेरी चू..चूत कसी हुई लग रही है। आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् हाय कितना मस्त चोदते हैं आप...शश्श्श्श् कितना मजा आ रहा है मुझे।"
"अब से तुझे ऐसे ही मजा आएगा मेरी रानी।" त्रिभुवन ने थोड़ा आगे हो कर उसके होठ चूम लिए─"अब से मैं तुझे ऐसे ही हुमच हुमच के चोदूंगा। बोल मुझसे चुदवाएगी न मंजू।"
"ह...हां म...मैं ऐसे ही आपसे चुदवाऊंगी जेठ जी।" मंजू मजे के आनंद में डूबी बोली─"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् रो...रोज ऐसे ही चुदवाऊंगी आपसे। आप मुझे ऐसे ही शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह् ऐसे ही चोद कर मजा देना।"
"हां मेरी रानी।" धक्के लगाने से त्रिभुवन की सांसें अब फूल गईं थी─"मैं तुझे रोज ऐसे ही मजा दूंगा। आज से तू मेरी है....आज से तेरी ये चूत मेरी है...है न मेरी रानी।"
"ह...हां जे...जेठ जी।" मंजू ने मजे में फौरन जवाब दिया─"अब से शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह् अब से मेरी ये चूत आपकी है। उफ्फ शश्श्श्श् अब से आप ऐसे ही मेरी चूत में अंदर तक अपना लंड घुसेड़ कर मुझे चोदना।"
एकाएक ही मंजू बुरी तरह मचलने लगी। त्रिभुवन अब और भी तेज तेज धक्के लगाने लगा था। मंजू मजे के सातवें आसमान में थी। उसने त्रिभुवन की पीठ पर अपने दोनों हाथों से पकड़ बनाई और मजे में उसे अपनी तरफ खींचने लगी। त्रिभुवन को अपनी पीठ पर उसके नाखून गढ़ते महसूस हुए। उसे हल्का दर्द तो हुआ मगर उसने परवाह नहीं की। वो मजे में पागल होने लगा था। उसके बदन का लहू बड़ी तेजी से दौड़ते हुए उसके अंडकोष की तरफ आ रहा था।
यही हाल मंजू का भी था। मजे में पता नहीं क्या क्या बोलने लगी थी वो। उसकी आहें और सिसकियां पूरे कमरे में गुंज रहीं थी। शुक्र था कि घर के बाहर का दरवाजा बंद था वरना अगर कोई आ जाता तो जरूर उसके कानों में मंजू की आहें भरने और सिसकियां भरने की आवाजें पड़ जातीं।
"अ..और जोर से चोदिए जेठ जी।" मंजू मस्ती में पगलाई बोली─"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् हां ऐसे ही...हाय मैं हवाओं में उड़ रही हूं। ऐसा लगता है मेरी नसों में दौड़ता खून मेरी चूत की तरफ भागता हुआ आ रहा है।"
"मेरा भी यही हाल है रानी।" तेज तेज धक्के मारते हुए त्रिभुवन बोला─"मेरे झड़ने का समय आ गया है। क्या मैं तेरी चूत में झड़ जाऊं।"
"न...नहीं नहीं शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह्।" मंजू सिसकते हुए बोली─"बाहर ही झड़िएगा जेठ जी....आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् लगता है मैं भी झड़ने वाली हूं। शश्श्श्श् जोर जोर से चोदो मुझे। हाय फाड़ दो मेरी चूत को। हाय मेरी अम्मा....बहुत मजा आ रहा है.... शश्श्श्श् जेठ जी....मैं झड़ने वाली हूं....संभालिए मुझे।"
कहने के साथ ही मंजू एकदम से अकड़ गई। उसने दोनों टांगों की कैंची बना कर त्रिभुवन को इतना जोर से जकड़ लिया कि त्रिभुवन चाह कर भी तेज तेज अपनी कमर न हिला सका। उधर मंजू कस के आँखें बंद किए और त्रिभुवन को जकड़े झटके खाने लगी। जाने कितने ही झटके लगे उसे और फिर वो एकदम से शांत पड़ गई। उसकी पकड़ ढीली पड़ी तो त्रिभुवन ने पूरा जोर लगा कर धक्के मारने शुरू कर दिए। वो खुद भी झड़ने वाला था इस लिए मजे में पागल हो कर बेतहाशा जोर लगा के धक्के मारे जा रहा था।
"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् मंजू....मेरी रानी मैं आ रहा हूं।"
मजे की चरम सीमा में पहुंचने से पहले ही त्रिभुवन ने झटके से लंड को मंजू की चूत से बाहर खींचा और फिर जोर जोर से मुट्ठ मारते हुए अपने लंड का पानी मंजू के पेट और नाभी पर गिराता चला गया। पहले की दो तीन पिचकारियां इतनी तेज थीं कि वो उछल कर मंजू के सीने और चेहरे तक पहुंच गईं थी। मंजू को इसका होश ही नहीं था। क्योंकि वो अभी भी आँखें बंद किए चरमसुख के एहसास में डूबी थी। इधर झड़ने के बाद त्रिभुवन असहाय सा हो कर मंजू के बगल में ही खाट पर पसर गया।
जारी है............


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