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Adultery लफ़्ज़ों से कहाँ बयां हो पाता है हाले दिल...
#39
क्या हुआ..तू ऐसा कांप क्यों रहा है। तू तो ऐसा कांप रह रहा है जैसे तूने सांप का बिल देख लिया हो...सरिता के मुँह से ये सुन राजू झेंप गया और कुछ नहीं बोला. वैसे सच सच बोल तुझे पसंद आयी या नहीं …वैसे ये सच में सांप का बिल है.... तेरे काले लम्बे और मोटे सांप के लिए बिल. जानता है तू जब से मैंने तुझे रिशा को ठोकते हुए देखा है… तब से तेरी मर्दानगी मेरे ज़हन से निकल ही नहीं रही। सरिता की आँखें सीधे पजामे में तंबू बना रहे लंड की ओर झाँक रही [b]थी[/b]

धीरे से वो राजू के कान के पास आकर बोली —

“इतना सख़्त और तगड़ा नज़ारा मैंने कभी नहीं देखा… ये किसी और औरत के लिए नहीं, सिर्फ़ मेरे लिए बना है।”इतना कह कर उसने राजू का लंड पजामे के ऊपर से ही पकड़ कर मसल दिया. राजू के मुँह से आह .. निकल गई

राजू का मजबूत जिस्म और पजामे के ऊपर बने लंड के उभार देख कर सरिता का जिस्म सुलगने लगा ..उसके होंठ काँप रहे थे, हाथ धीरे-धीरे राजू के सीने से नीचे तक सरक रहे थे। वो खुद पर क़ाबू नहीं रख पा रही थी।

“ तेरे जैसे मर्द को छूने का ख्वाब मैंने बहुत बार देखा है… आज वो ख्वाब पूरा करना है।” इतना कह सरिता की उँगलियाँ राजू की कमर के पास टिक गईं, मानो वहीं से उसकी साँसें बंध गई हों। उसने जल्दी से राजू के पजामे का नाडा खोल नीचे खिसका दिया. राजू अब केवल अंडरवियर में था और लंड का उभार अब पहले से भयानक लग रहा था। ऐसा लग रहा था मानो लंड अंडरवियर फाड़
कर बाहर निकल आएगा
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RE: लफ़्ज़ों से कहाँ बयां हो पाता है हाले दिल... - by nitya.bansal3 - 10-01-2026, 04:36 PM



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