09-01-2026, 04:16 AM
मास्टर बेडरूम
राज और अनीता का मास्टर बेडरूम, रात के 10:30 बजे
कमरे में मद्धम पीली रोशनी है। अनीता ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी है, उसने अभी-अभी अपनी साड़ी उतारी है। वह सिर्फ अपनी नीले रंग की लेसी ब्रा और मैचिंग पैंटी में है। करीम के साथ सुबह की 'कुकिंग क्लास' ने उसके बदन में एक अजीब सी आग भर दी है। वह चाहती है कि राज उसे उसी हवस से देखे जैसे करीम देख रहा था।
अनीता: (आईने में खुद को निहारते हुए, फिर पीछे मुड़कर अपनी नंगी पीठ राज की ओर करती है) "राज... ज़रा सुनिए ना। काम बाद में कर लीजिएगा, ये ब्रा का हुक... बहुत तंग कर रहा है। ज़रा इसे खोल देंगे?"
राज अपनी नज़रें लैपटॉप से हटाता है। उसके सामने उसकी पत्नी की गोरी, मलाईदार पीठ और उस पर कसी हुई नीली स्ट्रैप है। वह उठकर उसके पास आता है।
राज: (अनीता की मखमली पीठ को स्पर्श करते हुए) "इतनी अनमोल चीज़... इतनी सुंदरता..."
राज जैसे ही हुक खोलता है, ब्रा ढीली हो जाती है। वह पीछे से झुककर अनीता की गर्म गर्दन पर अपनी ज़ुबान फेरता है और अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाकर उसके तने हुए वक्षों को अपनी गिरफ्त में ले लेता है।
अनीता: (आह भरते हुए, राज के हाथों के दबाव का मज़ा लेते हुए) "उह्ह... राज! आज बड़े फॉर्म में लग रहे हैं आप।"
राज: (अनीता के कानों के पास फुसफुसाते हुए) "अनीता... तुम कयामत लगती हो। लेकिन सुनो, तुम्हें थोड़ा और ध्यान रखना चाहिए। हम इस नए घर में हैं और इस नौकर करीम के बारे में हम ज़्यादा कुछ नहीं जानते। सच कहूँ तो, मुझे उसकी नजरों का बिल्कुल भरोसा नहीं है।"
अनीता: (मदहोशी में आँखें मूँदते हुए, करीम के साथ बिताए सुबह के पलों को याद करके और उत्तेजित होते हुए) "ध्यान? किस बात का राज? और करीम... वह तो बेचारा मुझे 'बेटी' कहकर बुलाता है।"
राज: (अनीता के निप्पल को चुटकी में लेकर ज़ोर से मसलते हुए) "अनीता, तुम नादान हो। मैं एक मर्द हूँ और मैं देख सकता हूँ कि उसकी गंदी नज़रें तुम्हारे बदन को कैसे टटोलती हैं। कभी वह तुम्हारे इन उभरे हुए स्तनों को घूरता है, तो कभी तुम्हारे सपाट पेट और सुडौल गांड पर उसकी नजर टिकी होती है।"
अनीता: (सिसकते हुए और उत्तेजना भरी हँसी के साथ) "आह... राज! धीरे... ऐसा लगता है कि उस बेचारे नौकर से ज़्यादा गंदा और ठरकी दिमाग तो तुम्हारा है। क्या तुम जल रहे हो?"
राज: (उसकी गर्दन पर काटते हुए) "मैं जल नहीं रहा, मैं बस ये बता रहा हूँ कि तुम क्या चीज़ हो। उस बुड्ढे की हिम्मत तो देखो, तुम्हें उस नज़र से देखने की!"
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दरवाजे के बाहर करीम हाथ में पानी का जग लिए खड़ा है। दरवाज़ा हल्का सा खुला है और राज की हर बात उसे साफ़ सुनाई दे रही है। उसकी सांसें भारी हो गई हैं और लुंगी के नीचे उसका 'अकड़न' चरम पर है।
करीम: (मन ही मन, गुस्से और हवस के मिले-जुले भाव के साथ) "अच्छा... तो साहब को पता चल गया है कि हम मेमसाहब को किस नज़र से देखते हैं। 'ठरकी' बोल रहे हैं हमको? ।"
अंदर अनीता की एक ज़ोरदार सिसकी सुनाई देती है।
करीम: (जग को कसकर पकड़ते हुए) "सिसक लो बेटी... अभी साहब के हाथों का मज़ा ले लो। पर राज साहब ने सही कहा है, ई चीज़ अनमोल है... और इस काले करीम के हाथ ई अनमोल खज़ाना एक न एक दिन ज़रूर आएगा।"
राज: (अनीता के कान के पास अपनी गर्म और भारी साँसें छोड़ते हुए) "अनीता... सच बताना, अगर मेरे इन हाथों की जगह उस काले करीम के सख्त हाथ होते... तो तुम्हें कैसा महसूस होता? क्या तुम्हें बुरा लगता?"
राज की आवाज़ में छुपी उस जलन और हिंसक अधिकार को अनीता ने तुरंत ताड़ लिया। वह समझ गई कि राज के भीतर का पुरुष इस वक्त असुरक्षा और उत्तेजना के बीच झूल रहा है।
अनीता ने अपनी आँखें आधी बंद कर लीं और एक गहरी, मादक मुस्कान के साथ उस रोल-प्ले का हिस्सा बन गई, जिससे राज का पागलपन और बढ़ जाए।
अनीता: (मदहोशी में पीछे मुड़कर राज की आँखों में देखते हुए) "आह्ह... राज! अगर करीम के हाथ होते ना... तो मैं उससे साफ़-साफ़ कहती—करीम, मसल दे इन्हें! ये अब तुम्हारे ही हैं... निचोड़ दे अपनी उन काली हथेलियों में, बिल्कुल बेरहमी से। अपनी मर्दानगी की छाप छोड़ दे इन पर!"
अनीता की यह बेबाक और गंदी बात सुनते ही राज का जोश और पागलपन बढ़ गया। उसने ठीक वही किया जो अनीता ने कहा था—उसने उसके सुडौल और गोरे स्तनों को और भी बेरहमी से निचोड़ना शुरू कर दिया।
राज: (जोश में पागल होते हुए) "तो तुम्हें एक नौकर के हाथों कुचला जाना इतना पसंद आएगा? लो... फिर इसे भी करीम का ही हाथ समझो!"
रज ने अनीता के स्तनों को किसी बॉल की तरह भींचना शुरू किया। उसका सख्त लंड पीछे से अनीता की सुडौल गांड की दरार में पूरी तरह सट गया था।
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दरवाजे के बाहर (करीम का नज़रिया):
करीम दरवाजे की बारीक दरार से अपनी आँख सटाए हुए है। पसीने की बूंदें उसके चेहरे से टपक रही हैं।
करीम: (हाँफते हुए, फुसफुसाकर) "अरे बाप रे! ई का देख रहे हैं हम... साहब तो मेमसाब को कच्चा चबा जाएंगे का? उई माँ, मेमसाब की ऊ गोरी पीठ और नीली चड्डी... देख के हमरा तो कलेजा मुँह को आ रहा है। ई तो कतई आग है!"
तभी अंदर से अनीता की ऐसी आवाज़ आती है कि करीम के बदन में बिजली दौड़ जाती है।
अनीता: (आँखें बंद करके सिसकते हुए) "ओह्ह... करीम! ऐसा मत करो करीम... उह्ह... धीरे... मेरे पति राज हमें इस हालत में देख लेंगे तो अनर्थ हो जाएगा... रुक जाओ करीम... आह्ह! तुम बहुत जंगली हो रहे हो!"
अनीता जानबूझकर राज के स्पर्श पर करीम का नाम ले रही थी। वह राज को उकसा रही थी, पर बाहर खड़ा करीम यह सुनकर पसीने-पसीने हो गया। उसकी लुंगी के नीचे उसका लंड पत्थर की तरह सख्त था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अंदर यह क्या गंदा खेल चल रहा है, लेकिन उस आवाज़ और उस नज़ारे ने उसके पूरे जिस्म में आग लगा दी थी।
करीम: (मन ही मन, उत्तेजित होकर) "अनीता बेटी... साला, तुम तो हमरा नाम ले-ले के साहब के नीचे तड़प रही हो। साहब को लग रहा है कि वो तुम्हें मज़ा दे रहे हैं, पर तुम्हारे मन में तो हमरा काला जिस्म बसा है। मन कर रहा है अभी दरवाज़ा तोड़ के अंदर घुस जाऊँ और साहब के सामने ही तुम्हारी ई पैंटी चीर डालूँ।"
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अंदर बेडरूम में:
अनीता के मुँह से करीम का नाम सुनकर राज की उत्तेजना अपनी तमाम हदें पार कर गई। उसे यह 'रोल-प्ले' और अनीता की यह शरारत किसी नशे की तरह उकसा रही थी।
राज: (अनीता की गर्दन पर अपने दाँत गड़ाते हुए) "अच्छा... तो यह काला करीम तुम्हें इस तरह मसल रहा है? और तुम्हें डर लग रहा है कि तुम्हारा पति राज देख लेगा? तो लो... उस पति के सामने ही इस जंगली करीम से और मज़ा लो!"
राज की उँगलियाँ अब अनीता के निप्पलों को कुचलने लगीं।
अनीता: (दर्द भरी सिसकी लेते हुए) "ओह्ह... करीम! ऐसा मत करो करीम... देखो तो, मसल-मसल कर तुमने मेरे इन चूचों को कितना लाल कर दिया है! अपनी इन सख्त उँगलियों से इन्हें बिल्कुल जख्मी कर दोगे क्या? आह्ह... मैं राज को क्या जवाब दूँगी कि ये कल तक इतने नरम थे और अब इतने लाल और सूजे हुए क्यों हैं? वो देखते ही समझ जाएंगे कि किसी ने इन्हें बेरहमी से निचोड़ा है... उह्ह करीम, तुम सच में बहुत बड़े जंगली जानवर हो!"
करीम: (बाहर खुद को सँभालते हुए, अपनी लुंगी के नीचे उठते तूफान को दबाते हुए) "पुकार लो बेटी... आज रात तो साहब तुम्हारी प्यास बुझा देंगे, पर कल जब वो दफ्तर जाएंगे... तब ये काला करीम तुम्हें बताएगा कि असली 'मसलना' किसे कहते हैं। कल हम तुम्हारे इन सफ़ेद मम्मों का वो हाल करेंगे कि तुम राज का नाम भूल जाओगी।"
राज: (अनीता की मखमली गर्दन पर अपने दांत गड़ाते हुए और उसकी कमर को जोर से खींचते हुए) "अच्छा... तो यह काला करीम तुम्हें इस तरह मसल रहा है? और तुम्हें डर लग रहा है कि तुम्हारा पति राज तुम्हें इस हाल में देख लेगा?"
राज की उंगलियाँ अनीता के निप्पलों को और भी बेरहमी से कुचलने लगीं और उसका लंड पीछे से उसकी सुडौल गांड पर रगड़ खाने लगा।
अनीता: (मदहोशी में झूमते हुए और अपनी पीठ राज के सीने पर रगड़ते हुए) "ओह्ह... करीम... उह्ह करीम... बस करो... अगर राज आ गया तो हम दोनों बर्बाद हो जाएंगे... आह्ह करीम!"
बाहर खड़ा करीम, जो दरवाज़े की दरार से यह सब देख और सुन रहा था, पूरी तरह अपनी सुध-बुध खो चुका था। अनीता की पुकार उसके कानों में किसी जादुई मंत्र की तरह गूँज रही थी। उसका विशाल शरीर पसीने से तर-बतर हो चुका था और उसकी लुंगी के नीचे उसका लंड किसी लोहे की छड़ की तरह अकड़ गया था।
राज ने अचानक अनीता के कंधे पकड़े और उसे घुमाकर अपनी ओर कर लिया। अब अनीता का नंगा बदन और वे उभरे हुए सुडौल वक्ष राज और दरार से झाँक रहे करीम, दोनों की नज़रों के सामने थे।
राज ने अनीता की कलाइयों को दबोचकर जैसे ही उन्हें सिर के ऊपर ले जाकर बिस्तर से सटाया, अनीता का पूरा जिस्म एक कमान की तरह तन गया। उसके सुडौल, गोरे वक्ष अब पूरी तरह राज की नज़रों के निशाने पर थे। कमरे की मद्धम रोशनी में वे किसी संगमरमर की तराशी हुई मूरत की तरह चमक रहे थे।
राज की सांसें अचानक थम गईं। उसकी आँखों में वही भूखी, प्यासी और नंगी हवस थी जो बाहर खड़े करीम की आँखों में अक्सर छिपी रहती थी। वह अपलक उन थिरकते हुए उरोजों को देख रहा था।
राज: (कई सेकंड तक खामोश, उसकी नज़रें अनीता के तने हुए वक्षों पर जमी हुई। फिर एक लंबी, भारी आवाज़ में) "उफ़्फ़... अनीता... ई का देख रहे हैं हम? ई तो कयामत है..."
राज की आवाज़ अब बदल चुकी थी। उसमें अब शहर का सलीका नहीं, बल्कि एक देहाती और गंदी ललक आ गई थी। उसने एक हाथ धीरे से आगे बढ़ाया और अपनी उंगलियों के पोरों से अनीता के पत्थर जैसे सख्त निप्पल को बहुत धीरे से छुआ।
राज: (एक अजीब सी शरारत और हवस भरी आवाज़ में) "अनीता बेटी... साला, हमरा तो जी ही निकल गया ई देख के। तुम इतनी सुंदर हो, हमका अंदाजा नहीं था। ई गोरे-गोरे पहाड़... और उन पर ई लाल अंगारे जैसे दाने... आह्ह! देख के ही मन कर रहा है कि अपनी सारी मर्यादा छोड़ के बस यहीं डूब जाएँ।"
अनीता: (राज के मुँह से 'अनीता बेटी' और वह लहज़ा सुनकर जैसे बिजली की तरह तड़प उठी। उसकी आँखों में नशा और बढ़ गया) "आह्ह... करीम! तुम... तुम मुझे 'बेटी' बोल रहे हो और देख ऐसे रहे हो जैसे अभी मुझे कच्चा चबा जाओगे? शर्म नहीं आती तुम्हें अपनी मालकिन को इस हाल में देखते हुए? देखो मत करीम... उह्ह...!"
राज: (अपना चेहरा अनीता के वक्षों के करीब ले जाते हुए, उन पर अपनी गर्म भाप छोड़ते हुए) "शर्म? शर्म तो रईसों का गहना है अनीता बेटी... हम तो ठहरे जंगली। और जब सामने इतना रसीला माल हो, तो कौन सा मर्द अपनी नज़रें हटा पाएगा? "
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बाहर करीम की हालत:
दरार के उस पार से करीम को भी अब वो नज़ारा साफ़ दिख रहा था जिसका उसने बस सपना देखा था।
अनीता के वे स्तन चिकने और मखमली थे। उनके शिखर पर मौजूद लाल निप्पल उत्तेजना के मारे पूरी तरह तन गए थे और सख़्त हो चुके थे। वे इतने कोमल और सुडौल थे कि जैसे खुद दोनों मर्दों को चुनौती दे रहे हों कि उन्हें जी भर कर देखा जाए।
करीम की आँखें उन लाल निप्पलों पर जम सी गईं। वह अपनी साँस लेना भी भूल गया था। अंदर राज अपनी उंगलियाँ उन लाल सिरों के पास ले जा रहा था, और बाहर करीम की मुट्ठियाँ इस जलन में भिंच गई थीं कि काश वो हाथ उसके होते।
राज ने अब अपने दोनों हाथों में अनीता की पूरी तरह नंगी छातियों को भर लिया। उसने उन्हें बहुत धीरे से दबाया और अपने अंगूठों से उसके पत्थर की तरह सख्त हो चुके निप्पलों को सहलाना शुरू किया।
अनीता के मुँह से निकली आहें अब करीम के कानों में गूँज रही थीं। करीम का गला सूख गया था; उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसे अपनी मालकिन का ऐसा मदहोश कर देने वाला रूप इतनी नज़दीकी से देखने को मिलेगा।
करीम: (दरवाजे के बाहर, पसीने में नहाया हुआ) "अरे बाप रे! ई का देख रहे हैं हम... ई तो असली जन्नत है। मेमसाब के ऊ चूचे... साला इतने गोल और चिकने कि देख के ही जी ललचा जाए। और ऊ सुर्ख लाल निप्पल... कसम से जान ले लेंगे।"
राज ने अनीता की सुडौल और नंगी छातियों को दोनों हाथों से थामकर थोड़ा ऊपर उठाया, जैसे वह उनकी गोलाई और वज़न का अंदाज़ा ले रहा हो।
राज: (आवाज़ को जानबूझकर देहाती लहजे में बदलते हुए) "मालकिन, आज तो बहुत देर हो गई है... पर ई मन है कि मानत ही नहीं। आज तो हमार जी चाहत है कि आपके इन गोरे कलशों से जी भर के दूध पी लेई... एकदम तृप्त हो जाई!"
राज का यह अंदाज़ अनीता को और भी ज्यादा पागल कर गया। उसने अपनी कमर लचकाई और अपने वक्ष राज के मुँह के करीब कर दिए।
अनीता: (गर्दन पीछे झुकाते हुए, मदहोशी में) "बड़े ढीठ हो गए हो करीम! मालकिन का दूध पीने की हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी? जानते नहीं अगर राज साहब को पता चला, तो वो तुम्हारा क्या हाल करेंगे? वो तुम्हें ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे... मसल देंगे तुम्हें!"
राज ने बिना कोई जवाब दिए अपना मुँह नीचे झुकाया और अनीता के एक बड़े और सख्त निप्पल को पूरा अपने मुँह में भर लिया। वह उसे किसी भूखे बच्चे की तरह ज़ोर-ज़ोर से चूसने लगा।
अनीता: (सिसकते हुए और राज के बालों को मुट्ठी में भींचते हुए) "आह्ह... करीम! उह्ह... तुम तो बहुत भूखे निकले। देखो तो कैसे एक जानवर की तरह मालकिन को चूस रहे हो... आह, मसल दे करीम, दूसरी वाली को भी ज़ोर से मसल! अपनी इन काली उँगलियों में दबा दे इसे!"
राज का दूसरा हाथ दूसरी छाती को बेरहमी से भींच रहा था, जिससे गोरा मांस उसकी उँगलियों के बीच से बाहर छलक रहा था।
करीम: (बाहर अपनी लुंगी को मुट्ठी में भींचते हुए और तेज़-तेज़ हाँफते हुए) "अरे मोर मैया! साहब तो बिल्कुल हमरी तरह बोल रहे हैं... 'मालकिन का दूध पीना है'। और मेमसाब? ऊ तो साला हमें और उकसा रही हैं। हमार नाम ले-लेकर अपने बदन को साहब के मुँह में ठूँस रही हैं।"
करीम: (कांपते स्वर में, खुद के सख्त अंग को सहलाते हुए) "जे नज़ारा देख के तो हमरा रोम-रोम फटने को तैयार है। मेमसाब, कसम से अगर हम भीतर होते, तो सचमुच का दूध निकाल लेते आज! इन सफ़ेद मम्मों को चूस-चूस के लाल कर देते।"
करीम का विशाल शरीर उत्तेजना के मारे कांप रहा था। उसने अपनी लुंगी के ऊपर से ही अपने सख्त लंड को हाथ से सहलाना शुरू कर दिया।
करीम की नज़रें उस दरार से अनीता के हिलते हुए गोरे स्तनों पर जमी थीं, जो राज के मुँह और हाथों की बेरहमी के बीच अपनी जवानी की नुमाइश कर रहे थे। करीम को ऐसा लग रहा था जैसे राज नहीं, बल्कि वह खुद अनीता के उन स्तनों का रस पी रहा हो।
अनीता की सिसकियाँ और राज का उसे 'करीम' कहकर पुकारना, उस बूढ़े नौकर की रगों में हवस का लावा बहा रहा था। वह बस कल्पना कर रहा था कि काश वह दरवाज़ा खुला होता और वह राज को धक्का देकर खुद उन लाल निप्पलों को अपनी ज़ुबान से सहला पाता।
Deepak Kapoor
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