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Adultery हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)
#26
भाग ~ ०७




इधर मैं सब कुछ जानने की उत्सुकता में मरा जा रहा था और उधर मंजू काकी कुछ सोचने लगीं थी। उनके चेहरे पर शर्म और झिझक साफ दिख रही थी। मैं नादान तो था पर इतना समझ सकता था कि एक औरत जो मुझे अपने बेटे की तरह मानती रही है उसको पूरी निर्लज्जता से वो बातें बताने में शर्म और झिझक लगना स्वाभाविक है।

कोई और वक्त होता तो मैं खुद उनसे इस मामले में कुछ पूछने की हिम्मत तो क्या ऐसा सोचने का भी न सोचता। मगर कहीं न कहीं मैं ये अच्छी तरह समझ रहा था कि उनकी कमजोरी मेरे हाथ में है और वो वही करने को मजबूर रहेंगी जो इस वक्त मैं चाहूंगा।

"अब चुप बैठी क्या सोच रही हो काकी।" मेरे सब्र का बांध जब टूट गया तो मैं थोड़ा खीझ कर बोला─"जल्दी बताओ न। मुझे जल्द से जल्द सब कुछ जानना है।"

मंजू काकी ने अजीब भाव से मेरी तरफ देखा। पता नहीं क्या चल रहा था उनके मन में।

"उस दिन जो कुछ हमारे बीच हुआ था।" काकी ने गहरी सांस ले कर बताना शुरू कर दिया─"उससे ये बात साफ हो गई थी कि अब हम सिर्फ घर वालों या गांव समाज की नजरों में जेठ और भय‌ऊ रह गए हैं जबकि असल में हम एक दूसरे के प्रेम में पड़े या एक दूसरे के आकर्षण में पड़े इंसान बन चुके हैं। उस दिन के बाद से जेठ जी के प्रति मेरे सोचने का नजरिया बदल गया था। अब मैं उनके बारे में जेठ जी के रिश्ते से नहीं बल्कि अपने दीवाने और प्रेमी के नए बन चुके रिश्ते से सोचने लगी थी। हमारे बीच ऐसा बहुत कुछ हो चुका था जो एक जेठ और भय‌ऊ के रिश्ते में होना बहुत बड़ा अपराध या पाप माना जाता है मगर ये सिर्फ हम दोनों ही जानते थे और ये भी कि ऐसा हमने अपनी मूक सहमति से ही किया था। अब ये रिश्ता भी खुशी से स्वीकार कर लिया था।"

"फिर???"

"उस दिन के बाद कुछ दिन तो ऐसे ही गुजर गए।" मंजू काकी ने कहा─"जेठ जी किसी न किसी बहाने मेरे घर आ तो जाते थे लेकिन मेरी बेटियों के रहने से कोई ऐसा मौका नहीं मिल रहा था जिससे हम एक दूसरे से वैसी बातें कर सकें जो दो प्रेमियों के बीच होती हैं या ऐसे सम्बन्ध में बंधे दो व्यक्तियों के बीच होती हैं। इधर इतने दिनों में मेरे अंदर ऐसा बदलाव आ गया था कि अब हर पल बस जेठ जी के ही बारे में सोचती रहती थी। उनसे मिलने या उन्हें देखने की इच्छा होती रहती थी और जब ऐसा नहीं होता तो मन में बहुत बेचैनी होती। कुछ भी अच्छा न लगता। जब कुछ दिनों तक हमें बात करने का वैसा मौका न मिला तो सहसा एक दिन मेरे मन में सवाल उभरा कि क्या जेठ जी का भी मेरे जैसे हाल होगा। क्या वो भी मेरी तरह मिलने के लिए बेकरार और बेचैन होंगे। अगर ऐसा है तो फिर वो कोई ऐसा मौका क्यों नहीं तलाशते जिसमें हम थोड़ा खुल कर और थोड़ी बेफिक्री से एक दूसरे से मिल सकें और साथ ही कुछ प्यार की मीठी बातें कर सकें। अचानक ही ये सब सोचने के चलते मेरे मन में ये खयाल आने लगे कि कहीं जेठ जी मेरे साथ छल तो नहीं कर रहे। मतलब कि उन्हें जो करना था वो कर चुके हैं तो अब वो मुझसे मिलना ही न चाहते हों। हालांकि ऐसा कुछ भी नहीं था मगर मेरा मन तरह तरह की बातें सोचने लगा था। इसकी वजह यही थी कि एक हफ्ता गुजर गया था और जेठ जी से मेरी कोई बात न हो सकी थी।"

"फिर कैसे तुम दोनों को मौका मिला था बात करने का।" मैंने उत्सुकता से पूछा।

"उसके कुछ समय बाद अचानक एक दिन नाहरपुर से मेरा भाई मंगल यहां आया।" काकी ने बताया─"वो मेरी दोनों बेटियों को लेने आया था। काफी समय से मेरे मायके वालों ने सुनीता और रानी को नहीं देखा था तो मां ने उसे भेजा था यहां। खैर रात रुकने के बाद दूसरे दिन वो अपनी दोनों भांजियों को ले गया। अब घर में मैं और तुम्हारे काका ही रह गए थे। तुम्हारे काका तो खेत चले गए थे पर मैं घर में थी....अकेली। पता नहीं जेठ जी को कैसे पता चल गया था कि मेरी दोनों बेटियों को मेरा भाई ले गया है। वो ये भी जानते थे कि उनका मझला भाई दोपहर तक खेतों में ही रहेगा। दोपहर में खाना खाने आएगा और थोड़ा आराम करने के बाद फिर खेत चला जाएगा।"

"अच्छा समझ गया।" मैं बोल पड़ा─"सुनीता और रानी के जाने से तुम दोनों को मिलने के लिए मौका मिल गया था।"

"हां सही कहा।" काकी ने कहा─"जैसा कि मैंने तुम्हें बताया तुम्हारे बापू को ये पता चल गया था। इस लिए उन्होंने भी इस मौके को नहीं गंवाया। गंवाते भी कैसे...मेरे जैसी हालत तो उनकी भी हो चुकी थी। हालांकि उनके बारे में अब मैं यही सोच बैठती थी कि शायद उन्होंने मेरे साथ छल किया है इसी लिए मिलने का मौका नहीं तलाश कर रहे हैं। खैर वो तब आए जब दोपहर को थोड़ा आराम करने के बाद तुम्हारे काका वापस खेत चले गए थे। अब वो शाम से पहले नहीं आने वाले थे। यानि शाम तक मैं अपने घर में अकेली ही रहने वाली थी और ये बात तुम्हारे बापू भली भांति जानते थे इसी लिए तो वो ऐसे वक्त पर घर आए थे। मगर इस बात का भी खयाल रखा था कि कोई उन्हें मेरे घर में घुसते हुए देख न ले।"

काकी के मुख से बापू के घर आने की बात सुन कर एकाएक मेरी धड़कनें ये सोच कर बढ़ चलीं थी कि अब इसके आगे काकी वही बताएंगी जिसे जानने और सुनने के लिए मैं अब तक बहुत ज्यादा उत्सुक और बेचैन हो उठा था।

"उस वक्त घर में मैं अकेली थी और झूठे बर्तन धोने के बाद कमरे में बाल सवार रही थी।" उधर काकी आगे बता रहीं थी─"मुझे तो पता ही नहीं था और न ही अंदेशा था कि उस वक्त कोई चुपके से आ जाएगा। तुम्हारे बापू इतना अच्छा मौका देख कर अलग ही रंग में आ गए थे।"

"म...मतलब....कैसे रंग में आ गए थे वो।"

"बता रही हूं...सब जान जाओगे।" काकी जाने क्या सोच कर अजीब भाव से मुस्कुरा उठीं─"मैं तो हर बात से बेखबर अपने कमरे में बाल सवार रही थी। इधर तुम्हारे बापू एकदम चुपके से मेरे कमरे की तरफ बिना कोई आवाज किए आ गए थे। फिर बिना कोई आहट किए कमरे में भी घुस आए। उस वक्त मैं उनकी तरफ पीठ किए खड़ी थी और सामने दीवार में लगी कील पर शीशा टांग रही थी। जैसे ही वो मेरे पीछे एकदम मेरे करीब आए वैसे ही शीशे में उनका चेहरा मुझे दिख गया मगर इससे पहले कि मैं कुछ सोच पाती या कर पाती उन्होंने पीछे से झट मुझे पकड़ कर दबोच लिया।"

"क...क्या सच में????" मेरी आँखें फैल गईं।

"हां राजू।" काकी ने कहा─"मेरे मुख से तो डर और घबराहट के मारे चीख ही निकल जाने वाली थी पर मैंने जल्दी से अपनी चीख को ऐन समय पर रोक लिया था। उधर जेठ जी पीछे से पूरा मुझे खुद से सटाए मेरे बाएं कान के पास अपना चेहरा ला कर बोले...कैसी है मेरी प्यारी मंजू....तुझे इस तरह अपनी बाहों में लेने के लिए कब से तड़प रहा था मैं। उनके इतना कहते ही मैं एकदम से पिघलती चली गई। इसके पहले तक उनके प्रति जो थोड़ी बहुत नाराजगी पैदा हुई थी वो उनकी बात सुनते ही दूर हो गई। अब उनकी बात सुन कर अंदर खुशी उभर आई थी। उधर वो अब भी मुझे वैसे ही पकड़े हुए थे और पीछे से मेरे कान और मेरे गाल को छूते तो मेरा पूरा बदन सिहर उठता। दिल की धड़कनें तो पहले ही बढ़ गईं थी। घबराहट भी हो रही थी लेकिन न उनसे छूटने की कोशिश कर रही थी और न ही उन्हें कह रही कि मुझे छोड़ दो।"

"फिर???"

"ये...ये क्या कर रहे हैं आप।" काकी ने आगे बताना शुरू किया─"आखिर कुछ तो मुझे बोलना ही था। मेरे पेट पर जमे उनके हाथ धीरे धीरे ऊपर मेरी छातियों की तरफ सरक रहे थे जिससे मेरी धड़कनें और सांसें और तेज हो गईं थी। पूरा बदन थरथरा रहा था लेकिन अंदर बेचैनी हो रही थी। मैंने उनसे कहा....दरवाजा खुला है...अगर किसी ने देख लिया तो मुसीबत हो जाएगी। मैंने ये कहा जरूर लेकिन मेरे ऐसा बोलने का मतलब वो बखूबी समझ गए थे। वो समझ गए थे कि मुझे उनके उस तरह पकड़ने से कोई एतराज नहीं है बल्कि दरवाजा खुला है कि बात कह कर मैं उन्हें यही जता रही हूं कि जो मन मरे कीजिए लेकिन ये भी खयाल कीजिए कि दरवाजा खुला है। मतलब मैं साफ साफ उनसे कह रही थी कि दरवाजा तो बंद कर दीजिए....फिर जो मन करे कीजिए मेरे साथ।"

"तो क्या फिर बापू ने ये समझ कर कमरे का दरवाजा बंद कर दिया था।" मैंने अपनी बढ़ चली धडकनों के साथ पूछा।

"बाहर का दरवाजा तो वो पहले ही बंद कर आए थे।" मंजू काकी ने बताया─"इस लिए उन्हें किसी के आ जाने का डर ही नहीं था। तभी तो बोले....चिंता मत कर मेरी प्यारी मंजू...मैं बाहर का दरवाजा बंद कर के आया हूं इस लिए न तो कोई यहां आ पाएगा और न ही कुछ देख पाएगा। मैं उनकी ये बात सुन कर अंदर ही अंदर ये सोच के सिहर गई कि जेठ जी शायद पहले से ही सब कुछ सोच कर आए हैं। तभी तो बाहर का दरवाजा बंद कर के मेरे कमरे में आए थे और एकदम से मुझे पकड़ लिया था। तभी वो बोले....कब से तुझे प्यार करने के लिए तड़प रहा था मेरी प्यारी रानी। मन तो बहुत करता था कि बिना किसी की परवाह किए तेरे पास चला जाऊं और फिर अपनी प्यारी और सुंदर मंजू को कस के ऐसे ही पकड़ लूं और....और फिर। इतना कह कर वो एकदम चुप हो गए थे। मेरे मन में ये जानने की उत्सुकता जाग उठी थी कि और फिर क्या....मतलब आगे वो क्या कहना चाहते थे। जी तो किया कि पूछ लूं उनसे मगर शर्म और झिझक के कारण पूछने की हिम्मत न हुई...पर शायद वो समझ गए थे। तभी तो बोले...और फिर तेरा ये ब्लाउज उतार कर तेरी सुंदर और मुलायम छातियों को अपने हाथ में लेकर सहलाऊं...इन्हें दबाऊं...और मुंह में भर कर जी भर के चूसूं।"

"क...क्या सच में ऐसा कहा था बापू ने।" मैं मारे हैरत के पूछ बैठा।

"हां राजू ऐसा ही कहा था उन्होंने।" काकी ने कहा─"उनकी ये बातें सुन कर मैं शर्म से लाल हो गई थी। पहले से ही बढ़ी हुई मेरी धड़कनें और सांसें और भी तेज हो गईं थी। मन में तरह तरह के खयाल उभरने लगे थे और मेरा बदन....मेरा बदन तो अजीब से सुखद एहसास में डूबने लगा था।"

"तो क्या तुमने बापू से कुछ नहीं कहा था।"

"शर्म और झिझक से नहीं कह पा रही थी राजू।" काकी ने कहा─"मगर भला कब तक खुद को कुछ करने या बोलने से रोके रहती। जब तुम्हारे बापू वो सब कहने के बाद एकाएक अपने दोनों हाथों को ऊपर कर मेरी छातियों को ही पकड़ लिया तो बुरी तरह कसमसा उठी मैं। मुंह से आह के साथ साथ सिसकी निकल गई। बदन में उत्तेजना भर गई। उसी उत्तेजना में बोल पड़ी थी मैं....शश्श्श्श् ये क्या कर रहे हैं आप..ऐसा मत कीजिए न...मुझे बहुत शर्म आ रही है। मेरी ये बात सुन कर वो बोले....अब मुझसे कैसी शर्म मेरी रानी। मैं तो पहले ही तेरी ये छातियां देख चुका हूं और सिर्फ देख ही नहीं चुका हूं बल्कि इन्हें प्यार भी कर चुका हूं। इतना कह कर एकदम से उन्होंने मेरी दोनों छातियों को मसल दिया जिससे मेरे मुंह से आह निकल गई।"

मंजू काकी की कहानी में अब बातें खुल कर होने लगीं थी इस लिए एक तरफ जहां मेरी धड़कनें बढ़ चलीं थी वहीं दूसरी तरफ मेरे अंदर अजीब सा रोमांच भी होने लगा था। मैं अब उस तरह की बातें सुनने को उत्सुक हो उठा था जिस तरह की बातें मेरा दोस्त बबलू बताया करता था।

"बापू के ऐसा करने पर....मतलब कि जब उन्होंने तुम्हारी छातियों को मसल दिया तब क्या तुमने उन्हें कुछ नहीं कहा था।" मैंने हिम्मत कर के पूछा।

"मैं भला क्यों कहती राजू।" काकी ने हल्के से शर्मा कर कहा─"अगर कहना ही होता तो पहले ही कह कर उन्हें ये सब करने से रोक देती। अब उन्हें रोकने या कोई विरोध करने का समय नहीं रहा था राजू....जैसे वो पूरी तरह मन बना बैठे थे कि अब उन्हें मेरे साथ यही सब करना है वैसे ही मैं भी तो मन बना बैठी थी। बेशक उस वक्त मैं या वो इसे प्रेम ही कहते लेकिन हम दोनों ही जानते थे कि ये सिर्फ प्रेम नहीं था बल्कि उसके साथ साथ कुछ और भी था। हां राजू....प्रेम के अलावा ये वही था जिसे दुनिया वासना या हवस कहती है। आज के समय में सच्चा प्रेम या निहस्वार्थ प्रेम कोई नहीं करता। आज के समय में लोगों की सोच और नजरिया उतना साफ एवं पवित्र नहीं रहा जैसे सौ साल पहले के लोगों में होता था। आज का इंसान सिर्फ अपना मतलब निकालने से मतलब रखता है। किसी से प्रेम भी करता है तो सिर्फ उस चीज के लिए जिसके लिए ये सारी दुनिया पागल हुई पड़ी है..यानी लंड और चूत के लिए।"

काकी के मुख से यूं खुल्लम खुल्ला लंड और चूत सुन कर मैं आश्चर्यचकित रह गया था। हैरत से मुंह फाड़ कर देखने लगा उन्हें। एक ही पल में मेरे अंदर बड़ी तेज हलचल मच गई थी। काकी भी समझ गईं थी कि उनके ऐसा बोलने पर मैं क्या सोचने लगा हूं या मेरी क्या हालत हो गई है। शर्म तो उन्हें भी आई थी ऐसा बोलने पर लेकिन शायद उन्होंने सोच लिया था कि सब कुछ खुल कर ही मुझे बताएंगी।

"हैरान मत हो राजू।" तभी काकी ने मुझसे कहा─"तुमने ही कहा था न कि सब कुछ खुल कर बताऊं इस लिए बता रही हूं।"

"फि...फिर आगे क्या हुआ काकी।" मैं उनकी बात सुन कर थोड़ा असहज तो हुआ लेकिन फिर पूछा।

"उस वक्त मैंने भले ही तुम्हारे बापू को वो सब न करने को कहा था लेकिन हम दोनों ही जानते थे कि हकीकत में न मेरा ऐसा मतलब था और न ही उन्हें रुक जाना था।" काकी ने कहा─"तभी तो मेरे मना करने पर भी वो नहीं रुके। बल्कि और भी जोरों से मेरी छातियां मसलने लगे थे। उनके ऐसा करने पर मैं कसमसा तो रही थी लेकिन अब मेरे अंदर अजीब सा मजा आने लगा था। पूरा बदन एक मीठे एहसास से सराबोर होने लगा था। मुझे पता ही न चला कब मेरा एक हाथ पीछे उनके सिर पर पहुंच गया जो उनके बालों को सहलाने के साथ साथ जोश और मदहोशी के चलते खींचने लगा था। तुम्हारे बापू पक्के खिलाड़ी थे। मेरे ऐसा करने पर तुरंत समझ गए थे कि मेरे अंदर हवस का नशा छाने लगा है। इस लिए अब वो मेरी छातियां मसलने के साथ साथ पीछे से मेरी गर्दन, कान और गालों को भी चूमने लगे थे। उनके ऐसा करते ही मैं बावरी होने लगी। एक अजीब सा नशा मुझे बेचैन करने लगा। मेरी आँखें मदहोशी में बंद हो गईं। तभी वो बोले....मेरी प्यारी मंजू...जितनी तू सुंदर है उतना ही सुंदर तेरा ये बदन है। मन करता है तेरे पूरे बदन को चूमूं और मलाई की तरह चाटूं। उनकी ये बात सुनते ही मैं और भी ज्यादा सिहर उठी। वो लगातार मेरी छातियां भी मसले जा रहे थे...मुझे चूमते भी जा रहे थे और बीच बीच में ये सब बोलते भी जा रहे थे जिससे अब मैं बुरी तरह नशे में छटपटाने लगी थी। मेरी सांसें और धड़कनें हद से ज्यादा बढ़ गईं थी। खुशी और नशे का खुमार प्रतिपल बढ़ता जा रहा था। मेरा जी करने लगा था कि सारी शर्म छोड़ कर मैं जेठ जी की तरफ घूम जाऊं और फिर मैं भी उन्हें वैसे ही चूमने चाटने लगूं जैसे वो कर रहे थे।"

"तो क्या सच में तुमने ऐसा ही किया था।" मैंने उत्सुकता से पूछा।

"क्या करती राजू...मैं अब अपने होश में ही नहीं रह गई थी।" काकी ने बताया─"जब मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ तो मैं बिजली की सी रफ्तार से घूम गई थी जेठ जी की तरफ। फिर इससे पहले कि वो कुछ सोच समझ पाते मैं पूरी बेशर्म हो के टूट पड़ी थी उन पर। मुझे उनके जैसा करना तो नहीं आ रहा था लेकिन उत्तेजना और खुमारी में जो मेरा मन करता वहीं करती जा रही थी।"

"क्या क्या कर रही थी तुम।" मैंने धड़कते दिल से पूछा।

"सबसे पहले तो मैंने तुम्हारे बापू के होठों को ही चूमना शुरू किया था।" काकी ने कहा─"मुझे नहीं पता कि ये कैसे कर लिया था मैंने। बस कर बैठी थी....तुम्हारे बापू तो हड़बड़ा ही गए थे मेरे ऐसा करने पर। शायद उन्हें इतना जल्दी मुझसे ऐसी उम्मीद नहीं थी। इधर मैं उनके होठों को कभी चूमती तो कभी उन्हीं के जैसे चाटने लगती। फिर उनके गालों को चूमने लगी। मेरे दोनों हाथ कभी उनका चेहरा थाम लेते तो कभी उनके बदन में फिसलने लगते। जेठ जी को समझते देर न लगी थी कि अब मेरे अंदर आग सी लग गई है। वो मुस्कुराए और फिर बोले....ओह मंजू...मेरी प्यारी रानी...मेरी सुंदर रानी तेरा भी वही हाल हो गया है न जो मेरा हो चुका है। इस लिए इससे पहले कि इतने अच्छे मौके पर कोई आ कर बाधा पैदा कर दे हमें अपने प्यार को जल्द से जल्द आगे बढ़ाना चाहिए।"

"म...मतलब????" 

"क्या राजू....इतना भी नहीं समझे।" काकी ने थोड़ी हैरानी जाहिर की─"उनका मतलब वही करने से था जिसे लोग चु...चुदाई कहते हैं।"

"क...क्या?????? मतलब सच में???" मैं उछल ही पड़ा ये जान कर।

"और नहीं तो क्या।" काकी शर्म से मुस्कुराई─"उस वक्त क्योंकि मेरे अंदर खुमारी छा गई थी और ऊपर से उत्तेजित भी हो चुकी थी इस लिए उनकी बात सुनते ही मैं कुछ भी करने को तैयार हो गई थी। अगर मेरी हालत सामान्य होती तो शायद ऐसा करने का इतना जल्दी साहस नहीं कर पाती मैं। उधर जेठ जी भी ये बात समझते थे। वो जानते थे कि अभी लोहा पूरी तरह गर्म है इस लिए बिना देर किए चोट कर देना चाहिए वरना अगर लोहे की गर्माहट कम हो गई तो शायद मैं उन्हें आगे बढ़ने से रोक दूंगी। तभी तो उन्होंने कोई देर नहीं की थी। झट से मुझे अलग किया और जल्दी जल्दी मेरी धोती खोलने लगे और बोले....मुझे अपनी प्यारी मंजू का सुंदर बदन देखना है। फिर उसे अच्छे से प्यार करना है। तू देखना मेरी रानी....तेरा ये आशिक तुझे वो खुशी देगा....वो मजा देगा जिसके बारे में तूने कभी कल्पना भी नहीं की होगी।"

"क्या तुम ये कह रही हो कि बापू तुम्हारी धोती खोल कर तुम्हें नंगा करने लगे थे।" मैंने अपनी शंका का समाधान करने की गरज में पूछा।

"हां राजू...वो मुझे नंगा ही कर रहे थे।" काकी ने मेरी शंका का समाधान करते हुए कहा─"और मैं इतना उत्तेजित थी कि उन्हें रोक भी नहीं रही थी बल्कि ये चाहती थी कि वो जो भी कर रहे हैं वो झटपट करें। खैर जल्दी ही उन्होंने मेरी धोती खोल कर वहीं खाट पर फेंक दी। अब मेरे बदन में सिर्फ साया और ब्लाउज था। उस उत्तेजना में भी मुझे अपनी इ्उस हालत पर शर्म आई लेकिन मैंने जरा भी खुद को छुपाने की कोशिश नहीं की बल्कि उसी हालत में उनके सामने खड़ी थी। उधर वो आँखें फाड़े मेरा बदन और ब्लाउज में कैद मेरी छातियों को घूरने लगे थे। ब्लाउज में कसी मेरी छातियां एकदम सीधा उन्हें ही निशाना बनाए हुए थीं और वो जैसे सच में घायल हो के खड़े थे।"

"फिर????"

"अचानक जैसे उन्हें होश आया।" काकी ने आगे बताया─"तो झट आगे बढ़ कर मुझे अपने सीने से छुपकाया...मेरी पीठ को सहलाया और सहलाते हुए नीचे मेरे नितंबों तक पहुंच गए। उनके ऐसा करते ही मैं बुरी तरह गनगना गई। पूरा बदन थरथरा गया। सांसें अटक गईं। बेचैनी बढ़ गई। उधर उन्होंने इतना करने के बाद मुझे खुद से अलग किया और फिर ब्लाउज के ऊपर से ही मेरी छातियों को पकड़ कर पहले मसला फिर एक छाती के निप्पल को मुंह में भर लिया। उफ्फ राजू....सच कहती हूं उनके ऐसा करते ही मेरी आह निकल गई...उत्तेजना में सिसक उठी मैं। पूरे बदन में सनसनी फैल गई। मैंने झट से उनके सिर को थाम लिया और अपनी छाती पर दबाने लगी। वो ब्लाउज के ऊपर से ही मेरे निप्पल को मुंह में भरे बच्चों की तरह चूसे जा रहे थे और मैं पागल हुई जा रही थी। तभी वो निप्पल मुंह से निकाल कर बोले....मंजू...मेरी रानी कितना सुंदर तेरा ये दूध है। मन करता है छोटा बच्चा बन के सारा दिन ऐसे ही पीता रहूं। काश तेरी छातियों से दूध भी निकलता तो और भी आनंद आता। कहने के साथ ही उन्होंने मेरी दूसरी छाती के निप्पल को मुंह में भर लिया और उसे भी चूसना शुरू कर दिया। मेरी हालत खराब होने लगी थी। पूरा बदन मजे की तरंगें में अब उड़ने लगा था। मुझे अब जमीन पर खड़े रहना मुश्किल होने लगा था। उधर वो मेरी छाती को चूसने में लगे हुए थे और दूसरी को मसले जा रहे थे। इधर मेरी उत्तेजना बढ़ती ही जा रही थी। मैं अपनी टांगें आपस में मसलने लगी थी क्योंकि टांगों के बीच मौजूद मेरी चू....चूत में बड़े ज़ोर की खुजली होने लगी थी।"

"ऐ...ऐसा क्यों काकी।" मुझे सच में समझ न आया कि काकी की चूत में खुजली क्यों होने लगी थी।

"क्योंकि....क्योंकि मेरी वो...मतलब मेरी चू..चूत पानी छोड़ने लगी थी राजू।"काकी ने शर्म से झिझकते हुए कहा─"मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मेरा मूत किसी भी समय छूट जाएगा। तभी अचानक जेठ जी ने मेरे निप्पल को मुंह से निकाला और जल्दी जल्दी मेरे ब्लाउज के बटन खोलने लगे। सारे बटन जब खुल गए तो उन्होंने झट से मेरा ब्लाउज निकाल दिया। ब्लाउज के निकलते ही मेरी छातियां उनके सामने पूरी नंगी हो गईं। मुझे बड़ी शर्म आई और इस बार मैं उनकी नजरों से अपनी छातियों को छुपाने से खुद को रोक न सकी। मैंने अपने दोनों हाथों को कैंची की शक्ल दे कर सीने पर रख लिया जिससे मेरी छातियों का काफी हिस्सा छुप गया...बाकी तो नंगा ही रहा। उधर मेरे ऐसा करते ही जेठ जी मुस्कुराए और फिर बोले....अपनी इन सुंदर छातियों को मुझसे न छुपा मेरी प्यारी मंजू। मुझे देखने दे जी भर के। इन्हें देख कर मुझे पागल हो जाने दे।"

"बापू सच में बड़ी अजीब अजीब बातें करते थे।" मैं हैरानी में बोल पड़ा।

"हां सही कहा तुमने।" काकी ने हल्के से हंस कर कहा─"पर उनकी वो बातें मेरे दिल में उतर जाती थीं। लाज तो आती थी लेकिन उनकी मीठी बातें सुन कर मैं खुश भी हो जाती थी। उनकी तारीफ सुन कर जितनी खुशी होती उतना ही ये सोच कर खुद पर गर्व भी होता कि मैं और मेरी चीजें ऐसी हैं जिन्हें देख कर जेठ जी दिल खोल कर तारीफ कर रहे हैं....शायद ही ऐसा किसी औरत को नसीब होता होगा। हालांकि गायत्री जीजी का खयाल आता तो फिर यही सोचती कि जेठ जी उनकी भी तो ऐसे ही तारीफें करते होंगे। आखिर जीजी भी तो सुंदर हैं।"

मां के बारे में काकी से ऐसा सुन कर मुझे अच्छा तो लगा मगर साथ ही थोड़ा अजीब भी लगा। एक पल के लिए मां के बारे में जाने क्या क्या सोच गया मैं।

"फिर आगे क्या हुआ।" मैंने मां से ध्यान हटा कर काकी से पूछा─"क्या फिर तुमने बापू के कहने पर अपनी छातियों से हाथ हटा लिए थे।"

"हां...भला कब तक उन्हें ऐसे छुपाए रखती।" काकी ने कहा─"वो तो लाज की वजह से छुपाए थी जबकि मन तो यही कर रहा था कि जेठ जी जो चाहते हैं वही हो। जब मैंने थोड़ी देर में अपने हाथ हटाए तो उन्होंने एकदम से लपक कर मेरी उन दोनों छातियों को थाम लिया। उनका स्पर्श होते ही पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गई। फिर से मदहोशी का नशा छाने लगा। उधर वो मेरी छातियों को कभी सहलाते तो कभी जोर से मसल दे रहे थे। फिर आगे बढ़े और फिर से एक एक कर के निप्पल चूसने लगे। मैं फिर से मजे में उड़ने लगी। मजे में फिर से मैंने उनके सिर को पकड़ लिया और छातियों पर दबाने लगी। पलक झपकते ही मेरी हालत फिर से खराब हो गई। अचानक मेरे मुंह से निकला....उफ्फ जेठ जी...ऐसा मजा पहले कभी नहीं महसूस किया था मैंने। मुझे ऐसे ही मजा दीजिए....मेरी छातियों को ऐसे ही चूसिए...आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् चूसते चूसते मेरा दूध खींच लीजिए। मदहोशी में कही गईं मेरी ये बातें सुन कर जेठ जी और जोरों से मेरी छातियां मसल मसल कर निप्पल चूसने लगे। मैं बुरी तरह मचलने लगी। टांगों के बीच की खुजली और भी बढ़ गई। मुझसे बर्दाश्त करना मुश्किल होने लगा। तभी जेठ जी बोले....रानी तेरे दूध बहुत मीठे हैं...मन तो नहीं भर रहा लेकिन क्या करूं समय का भी खयाल करना है। अगर कोई आ गया तो ये सारा मजा किरकिरा हो जाएगा। कहने के साथ ही उन्होंने अपना एक हाथ नीचे सरकाया और झट साया के ऊपर से मेरी चू....चूत पर रख दिया। मैं बुरी तरह कांप गई। टांगों को सख्ती से भींच लिया जिससे उनका वो हाथ वहीं फंस गया। उनके हाथ की उंगलियां मेरी चू..चूत के मुहाने पर दस्तक दे रहीं थी। तभी उन्होंने अपनी दो उंगलियों को हरकत दी और मेरी चूत को सहलाने लगे। उनके ऐसा करते ही मैं तड़प उठी। मुंह से सिसकी निकल गई। सांसें अटक गईं। उधर वो मेरी चूत को सहलाते रहे। मैं ज्यादा देर खुद को खड़े न रख पाई और वहीं खड़े खड़े ही मुझे झटके लगने लगे। मैं झटके खा खा के झड़ने लगी थी। उस वक्त मुझे कोई होश नहीं था....बस ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मैं आनंद की अनंत ऊंचाइयों में पहुंच कर ठहर गई हूं और इसके साथ ही जैसे हर चीज अपनी जगह पर ठहर गई हो...एकदम सन्नाटा सा छा गया हो।"

"फि...फिर????" काकी की बातें सुन मैं खुद भी कहीं अटक सा गया था और जैसे ही होश आया तो मारे उत्सुकता के पूछा।

"फिर क्या....मैं तो उस वक्त बस बेहाल ही हो गई थी राजू।" काकी ने गहरी सांस ले कर कहा─"सारा नशा पानी बन कर मेरी टांगों के बीच से निकल गया था। मुझे तो पता भी नहीं था कि मैं अब भी जमीन पर खड़ी थी या जेठ जी ने मुझे खाट पर लेटा दिया था। जब हालत कुछ ठीक हुई तो पता चला मैं खाट पर पड़ी हूं और जेठ जी मेरे दोनों तरफ खाट पर हाथ टिकाए मेरे ऊपर थे और मुझे ही देखे जा रहे थे। जैसे ही मैंने आँखें खोल कर उन्हें अपने ऊपर से खुद को यूं देखते पाया तो एकदम शर्म से दोहरी हो गई मैं। नशा और जोश ठंडा हुआ तो अपनी हालत का अच्छे से एहसास हुआ था तभी तो उस हालत में खुद को और जेठ जी को देख बुरी तरह लजा आई थी मुझे। मैं ज्यादा देर तक जेठ जी से नजर न मिलाए रख सकी थी बल्कि शर्म से मुस्कुरा कर मैंने अपना चेहरा दूसरी तरफ फेर लिया था। ये देख जेठ जी मुस्कुरा उठे फिर बोले....क्या हुआ मेरी रानी। इतना क्यों शर्मा रही है। उनकी बात सुन कर मैं और भी बुरी तरह लजा गई। कुछ कहते न बना....बोलने की हिम्मत ही न हुई थी और वो...मुस्कुराए जा रहे थे। फिर बोले....मेरी प्यारी मंजू कितनी मतलबी है तू। उनकी ये बात सुन मैंने झट से उनकी तरफ हैरानी से देखा। मैं समझने की कोशिश करने लगी थी कि आखिर मैं किस बात पर मतलबी बन गई हूं। मेरी इस उलझन को उन्होंने ही दूर किया। बोले...अरे मेरी भोली रानी...मेरे कहने का मतलब ये है कि तूने तो मजा ले लिया और अब शांत भी हो गई है मगर तेरे इस दीवाने का क्या....तेरा ये आशिक तो अभी भी अधर में ही लटका हुआ है। उसे भी तो आनंद की चरम सीमा तक पहुंचा दे मेरी रानी।"


जारी है................
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हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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RE: हवस और नादानियां ~ (आप-बीती) - by Rajan Raghuwanshi - 08-01-2026, 03:23 PM



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