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Adultery हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)
#25
भाग ~ ०६




मंजू काकी की बातें सुन कर मैं खुद भी झटके खा रहा था। भरोसा नहीं हो रहा था कि मेरे बापू ने ये सब कहा होगा और ये सब किया होगा मगर काकी के अनुसार यही हकीकत थी तो भरोसा करना ही था। इस सबके बाद मेरे मन में जाने कितने ही प्रकार के खयाल उभरने लगे थे जो मुझे अब बेचैन किए जा रहे थे।

"तुम्हें पता है राजू फिर आगे क्या हुआ।" तभी काकी ने ये कह कर मेरा ध्यान खींचा─"तुम्हारे बापू ने मुझे खुद से अलग किया और अपने दोनों हाथों से मेरा चेहरा थाम कर बिना किसी झिझक के और बिना कुछ सोचे अपने होठ मेरे होठों पर रख दिया।"

"क..क्या???? ये क्या कह रही हो काकी।" मैंने आश्चर्य से आँखें फाड़ कर कहा।

"हां राजू यही सच है।" काकी ने बताना शुरू किया─"इतना ही नहीं उसके बाद वो मेरे होठों को इस तरह चूमने चाटने लगे जैसे मेले में बिकने वाली ठंडी मलाई को खरीद कर छोटे छोटे बच्चे चाटा करते हैं। पहले तो मैं उनके ऐसा करने पर बुरी तरह हड़बड़ा गई थी और घबरा भी गई थी लेकिन फिर मैंने बिना कोई विरोध किए उन्हें ऐसा करने दिया। यकीन मानो राजू....मैंने उस वक्त उन्हें बिल्कुल भी नहीं रोका। इस लिए नहीं कि ये गलत था या पाप था बल्कि इस लिए कि वो जो कर रहे थे मेरे लिए एकदम नया था। उससे मुझे एक अलग ही तरह का आनंद मिल रहा था। उधर होठों के बाद वो एक एक कर के मेरे पूरे चेहरे को चूमने लगे थे। मुझे बहुत ज्यादा गुदगुदी हो रही थी मगर उनके ऐसा करने से असीम आनंद भी आ रहा था। मेरा पूरा बदन उस आनंद में सराबोर होता जा रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे मैं उस अलौकिक आनंद में डूबती जा रही हूं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। मैं इस तरह के आनंद से पूरी तरह अंजान थी। मन कर रहा था कि वो बिना रुके ऐसे ही मुझे चूमते रहें। मैं सातवें आसमान में उड़ने लगी थी। मेरे समूचे बदन में एक अलग ही गर्मी बढ़ती जा रही थी।"

"फिर????"

"किसी न किसी बहाने उस सबको रुकना था तो रुक गया।" काकी ने गहरी सांस ले कर कहा─"जैसे मैं उनके चूमने चाटने से आनंद में डूबती जा रही थी वैसे ही जेठ जी भी डूबते जा रहे थे। न उन्हें किसी बात का होश रह गया था और न ही मुझे मगर तभी कुछ ऐसा हुआ जिससे मैं एक झटके में होश में आ गई और उन्हें रोक दिया।"

"ऐ...ऐसा क्या हो गया था।" मुझे समझ न आया तो मैंने काकी से पूछा।

"वो जो कर रहे थे उसमें वो होश खो बैठे थे।" मंजू काकी ने बताया─"तभी तो जोश में होश खो कर उन्होंने अचानक ही अपना एक हाथ मेरी छाती पर रख दिया और फिर उसे पकड़ कर जोर से दबा दिया था। उनके ऐसा करते ही मुझे जबरदस्त झटका लगा था। मैं एकदम होश में आ गई थी। होश में आते ही मैंने झट से उनका वो हाथ अपनी छाती से अलग कर दिया था। मेरे ऐसा करते ही वो भी होश में आ गए थे और फिर उन्हें फौरन ही एहसास हुआ कि अंजाने में उनसे ये कुछ ज्यादा ही हो गया है। उन्होंने इसके लिए झट से मुझसे माफी मांगी। इधर होश में आते ही अब मैं शर्म से गड़ी जा रही थी। यकीन ही नहीं हो रहा था कि ये सब क्या हो गया है। एकाएक मुझे खयाल आया कि घर में इस वक्त हम दोनों के सिवा कोई नहीं है। सब जानते हैं कि तुम्हारे बापू रिश्ते में मेरे जेठ लगते हैं। ऐसे में इस तरह उनका कमरे में मेरे साथ होना किसी के भी मन में गलत विचार ही पैदा करता। यही सब सोच कर अब मुझे बहुत ज्यादा घबराहट होने लगी थी। अचानक से ही मुझे पूरे गांव समाज के सामने बदनाम हो जाने का डर सताने लगा। मैंने हिम्मत जुटा कर जेठ जी से जाने को कहा। अब तक वो भी पूरी तरह होश में आ चुके थे इस लिए उन्हें भी एहसास हो चुका था कि अब उनका इस तरह यहां रहना ठीक नहीं है। इस लिए वो वहां से चल पड़े। दरवाजे के पास पहुंच कर अचानक वो रुक गए। फिर पलट कर मेरे पास आए और बोले...मेरी प्यारी मंजू...मेरी प्यारी रानी...मेरे वैसा करने से तुझे बुरा तो नहीं लगा न। अगर लगा हो तो माफ कर दे अपने इस दीवाने को। उनकी ये बात सुन कर मेरी धड़कनें तेज हो गईं। मन तो किया कि झट से लिपट जाऊं उनसे मगर जानती थी कि ऐसा करना अब सही नहीं है। कोई भी आ सकता था। इस लिए मैंने कहा कि मुझे उनकी किसी बात से बुरा नहीं लगा है। इस वक्त उन्हें जाने के लिए इस लिए कह रही हूं क्योंकि यही सही होगा। अगर कोई आ गया और किसी को शक हो गया तो आफत हो जाएगी। मेरी बात सुन कर उन्होंने सहमति में सिर हिलाया और फिर मेरा गाल चूम कर चले गए। उनके जाने के बाद मैंने राहत की सांस तो ली मगर काफी देर तक खड़ी उस सबके बारे में सोचती रही जो अब तक मेरे और उनके बीच हुआ था। मुझे पूरा एहसास था कि ये सब गलत है लेकिन उनके प्यार में जो अलौकिक आनंद मिला था उसके बारे में सोच कर ही अब मुझे अजीब सी खुशी महसूस होने लगी थी। खैर मुझे याद आया कि मुझे खाना भी बनाना है अभी। तुम्हारे काका के आने का समय भी हो रहा था। ये सोच कर मैंने जल्दी से नथ निकाल कर उसे वापस डिब्बी में डाला और उसे संदूक में छुपा दिया। उसके बाद मैं फिर से नाक में इसी फूल को पहन कर कमरे से बाहर निकल आई। रसोई के पास पहुंची ही थी कि जेठ जी को वहां खड़ा देख चौंक पड़ी। मुझे हैरानी हुई कि वो अब तक यहीं थे।"

"ऐ...ऐसा क्यों।"

"मुझसे अभी कुछ कहना था उन्हें।" काकी ने बताया─"जब मैं उनके पास पहुंची तो वो फिर से वही बोले जो कमरे में बोले थे....तुझे सच में मेरे वैसा करने पर बुरा नहीं लगा न मेरी रानी। शायद वो पूरी तसल्ली कर लेना चाहते थे। इधर उनकी बात सुन कर मुझे शर्म तो बहुत आई मगर जवाब देना मजबूरी थी। इस लिए धीमे से न में सिर हिला कर कहा....मुझे कोई बुरा नहीं लगा जेठ जी लेकिन हम दोनों ही जानते हैं कि ये सब गलत है। अगर किसी को पता चल गया तो बहुत बड़ा अनर्थ हो जाएगा। मेरी ये बात सुन कर उन्होंने कहा....हां जानता हूं मेरी प्यारी मंजू...जानता हूं कि ये दुनिया वालों की नजर में गलत है मगर हमारी नजर में तो बिल्कुल नहीं है।"

"क..क्या??? मतलब वो ऐसा कैसे बोल सकते थे।" मैंने हैरत से आँखें फाड़ कर पूछा।

"मैं भी ऐसे ही हैरान हुई थी राजू।" काकी ने बताया─"मुझे हैरान देख उन्होंने कहा कोई चीज या कोई बात तब गलत होती है जब उसमें कोई जोर जबरदस्ती करता है...सामने वाले की रजामंदी से नहीं करता। जबकि अगर कोई चीज दो लोगों की सहमति से होती है तो वो सही होती है क्योंकि इससे वो दोनों एक दूसरे का अहित नहीं कर रहे होते बल्कि आपसी सहमति से जो करते हैं उससे उन्हें खुशी मिल रही होती है। जेठ जी की ये बातें सुन कर मैं हैरान तो हुई लेकिन सोच में भी पड़ गई थी। तभी उन्होंने पूछा...अब तू बता मेरी रानी...मेरी प्यारी मंजू कि क्या तुझे मेरा प्रेम कबूल है। अजीब कशमकश में पड़ गई थी मैं लेकिन ये भी एहसास था कि पहले मेरे मन में उनके लिए भले ही सिर्फ कुछ ही था लेकिन अब शायद उस कुछ से ज्यादा हो चुका है। मुझे याद आया कि कैसे अभी थोड़ी देर पहले उन्होंने मुझे प्यार किया था। मतलब कि इस तरह से जैसे की मैं कभी कल्पना ही नहीं कर सकती थी। मेरे लिए वो सब नया था लेकिन उसकी वजह से मेरी आत्मा तक असीम आनंद में डूब गई थी। तुम्हारे काका ने तो ऐसा कभी सपने में भी नहीं किया था। प्यार करना तो जानते ही नहीं थे वो। उन्हें तो बस इतना ही पता है कि औरत का धोती साया कमर तक उठा दो और फिर उसकी टांगों के बीच अपना खूंटा डाल कर धक्के लगाना शुरू कर दो। धक्के लगाते हुए भले ही वो जल्दी ही शांत पड़ जाएं मगर इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा।"

इतना बोल कर मंजू काकी सांस लेने के लिए रुकीं तो इस बार मैं कुछ न बोला। असल में उन्होंने आखिरी बात ही ऐसे विषय पर की थी कि मैं झिझक के मारे कुछ बोल ही न सका था और न ही पूछ सका था।

"इस लिए जब तुम्हारे बापू ने मुझसे वो सब पूछा तो मैंने थोड़ा सोचने के बाद बेझिझक उनका प्रेम कबूल कर लिया।" उधर मंजू काकी ने खुद ही आगे का किस्सा बताना शुरू कर दिया─"मुझे भी यही लगा कि जब दो लोग किसी बात के लिए सहमत होते हैं तो सचमुच वो गलत नहीं होता। हां दुनिया की नजर में जरूर ये गलत ही होता है। खैर इसके लिए जेठ जी ने कहा कि हमारे पास अब यही एक रास्ता है कि हम अपने इस प्रेम को दुनिया वालों की नजरों से छुपा कर रखें। उनकी ये बात सुन कर उस वक्त मेरे अंदर बड़ी अजीब सी हलचल मच गई थी। मन में तरह तरह के खयाल आने लगे थे मगर जाने क्यों अब मैं यही करना चाह रही थी। तभी तो जेठ जी की हर बात से सहमत हो गई थी। तभी तो उस वक्त डर और घबराहट होने के बाद भी एक खुशी महसूस हो रही थी। बस यही हसरत थी कि जेठ जी के साथ प्रेम का ये सफर आगे बढ़े और फिर गहरा ही होता चला जाए। खैर उस वक्त वो घर में ज्यादा देर रुक नहीं सकते थे इस लिए जाते जाते बोले....मेरी प्यारी मंजू अब तू किसी बात की फिक्र न करना। अब से तेरी हर खुशी का खयाल मैं रखूंगा। हम दोनों को जब भी मौका मिलेगा हम एक दूसरे को जी भर के प्यार करेंगे। मेरी रानी....मेरी प्यारी मंजू तू भी ऐसा करेगी न....बता मुझे। मैं तो उनकी बातें सुन कर ही मंत्रमुग्ध हो गई थी। धड़कनें तेज तेज चलने लगीं थी। दिलो दिमाग में बड़ी तेज हलचल शुरू हो गई थी। मैंने जल्दी से खुद को सम्हाला और झट से हां में सिर हिला कर उन्हें बताया कि हां मैं भी ऐसा करूंगी। बस यही थी हमारी कहानी।"

"क...क्या???? म...मतलब बस इतना ही।" 

मैं एकदम से झटका खा गया। मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि काकी इतना बस बता कर किस्सा खत्म कर देंगी। मैं तो अभी ये उम्मीद किए बैठा था कि वो बापू के साथ अपनी चुदाई का किस्सा भी बताएंगी। मगर काकी ने किस्सा खत्म कर के मुझे बहुत ज्यादा मायूस कर दिया था।

"क्यों...क्या तुम्हें कुछ और भी जानना है मुझसे।" काकी ने सवालिया नजरों से मुझे देखा।

"ह..हां....मतलब ये कि...तुम और ब...बापू ने वो काम कब और कैसे शुरू किया था जो आज खेत के उस कमरे में कर रहे थे।" मैंने झिझकते हुए उनसे अपनी मंशा जाहिर की और पूछा।

"तुम्हारे हिसाब से क्या कर रहे थे हम।" काकी ने उल्टा सवाल कर दिया।

मुझसे कुछ बोला न गया। कहना तो मैं चाहता था कि तुम और बापू वहां चुदाई कर रहे थे लेकिन इस तरह खुल कर कहने की हिम्मत नहीं हो रही थी।

"क्या हुआ....बताओ न...हम क्या कर रहे थे उस कमरे में।"

"तुम जानती हो काकी कि मैं क्या पूछ रहा हूं और तुम दोनों क्या कर रहे थे।" मैंने सिर झुका कर धीमे से कहा।

"मैं तो बहुत कुछ जानती हूं राजू।" काकी ने कहा─"पर जानना तो तुम्हें है न इस लिए खुल कर पूछो कि किस बारे में जानना चाहते हो।"

मैं एकदम से चौंक कर काकी को देखने लगा। एकाएक वो अजीब तरह का बर्ताव करने लगीं थी। उनके होठों पर हल्की मुस्कान थी। मैं सोच में पड़ गया कि अब ये क्या है।

"ठीक है....अगर तुम्हें नहीं जानना है तो अब आराम से सो जाओ।" तभी काकी बोलीं─"मुझे भी अब नींद आ रही है। गेहूं की कटाई कर के बहुत थक गई हूं आज।"

कहने के बाद काकी सच में ही खाट पर लेट गईं। इधर मैं अंदर ही अंदर ये सोच कर हड़बड़ा उठा कि अब मैं आगे का किस्सा कैसे जान सकूंगा। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मेरे पूछने पर काकी अचानक से उल्टा सवाल क्यों करने लगीं थी। अरे जैसे अब तक सब कुछ बताती आई थीं वैसे ही आगे का भी तो बता सकती हैं। फिर अचानक से ये क्या हो गया है उन्हें।

"ज्यादा मत सोचो बच्चू।" काकी ने मुस्कुरा कर कहा─"चुपचाप सो जाओ।"

"ये...ये गलत बात है काकी।" मैंने एकदम से नाराज होने का नाटक किया─"तुमने वादा किया था कि सब कुछ बताओगी। फिर बता क्यों नहीं रही हो।"

"अरे तो मैं कहां अपना वादा तोड़ रही हूं राजू।" काकी ने कहा─"मैं तो सब कुछ बताने को तैयार हूं। तुम खुद ही नहीं पूछ रहे तो मैं क्या करूं।"

"पूछ तो रहा हूं मैं।"

"क्या पूछ रहे हो।" काकी बोलीं─"मुझे तो समझ ही नहीं आया कि तुम मुझसे आखिर अब क्या जानना चाहते हो। जरा खुल कर सही से पूछो तो मुझे समझ आए और फिर मैं तुम्हें बताऊं।"

मैं समझ गया कि काकी अब मेरी टांग खींचने में लग गई हैं। जबकि उन्हें भी अच्छे से पता है कि मैं उनसे क्या जानना चाहता हूं मगर अब वो नाटक करने लगी हैं। इस बात से गुस्सा तो बहुत आया उन पर मगर कर भी क्या सकता था। बस मन मसोस कर रह गया।

थोड़ी देर चुपचाप नाराज हो के खाट पर पड़ा रहा। मन ही मन काकी को बुरा भला भी कह रहा था। ये भी सोच रहा था कि काकी से सब कुछ जान के ही रहूंगा चाहे कुछ भी हो जाए।

अचानक मन में आया कि क्या सच में मैं खुल कर उनसे पूछूं। मतलब कि खुल कर चुदाई जैसे शब्द बोलूं। इससे ज्यादा से ज्यादा यही होगा कि काकी गुस्सा हो जाएंगी। बाकी गलती तो उन्होंने और बापू ने ही की है। मतलब अपराधी तो वो दोनों ही हैं। गलत काम तो उन दोनों ने ही किया है तो इसके लिए वही दोनों झुकेंगे....हां।

"अरे अभी सोए नहीं क्या तुम।" तभी मंजू काकी ने ये कह कर जैसे मुझे फिर छेड़ा। 

"मैं इतना जल्दी सोने वाला नहीं हूं।" मैंने एक झटके में उठ कर कहा─"तुमको बताना ही पड़ेगा कि तुम और बापू आज खेत वाले कमरे में जो कर रहे थे वो कैसे शुरू हुआ था।"

"मुझे समझ नहीं आ रहा कि तुम किस बारे में बोल रहे हो।" काकी ने मुस्कुरा कर कहा─"थोड़ा खुल कर बताओ राजू। मैं अनपढ़ गवार औरत हूं। मुझे इस तरह कोई बात समझ नहीं आती है।"

मेरा मन किया कि मैं अपने बाल नोचने लगूं। पता नहीं क्यों अंजान बन रहीं थी वो। मैंने सोचा कहीं ऐसा तो नहीं कि वो सच में चाहती हैं कि मैं खुल कर चुदाई जैसे शब्द बोलूं। हां शायद यही बात है...तभी तो वो बार बार खुल कर पूछने को कह रही हैं।

ये सोचते ही मैंने फैसला कर लिया कि अब मैं ऐसा ही करूंगा। मतलब कि अब मैं ऐसे ही खुल कर पूछूंगा उनसे। अगले ही पल मैंने अपने अंदर हिम्मत जुटानी शुरू कर दी।

"ठीक है फिर...अब मैं खुल कर तुमसे पूछता हूं।" मैंने हिम्मत जुटा कर एक लंबी सांस ली─"तो सुनो...आज खेत वाले कमरे में तुम और बापू जो कर रहे थे उसे चु..चुदा...चुदाई बोलते हैं....हां चु...चुदाई। तो अब बताओ कि तुम्हारे और बापू के बीच ये चुदाई वाला काम कब और कैसे शुरू हुआ था।"

"र..राऽऽऽऽजू....ये कैसी गंदी बात बोल रहे हो तुम।" काकी एक झटके में उठ कर बैठ गईं और मुंह फाड़ कर बोलीं─"हाय राम कितने बेशर्म हो तुम। अपनी काकी से इतना गंदा कैसे बोल सकते हो तुम।"

"अब तुम नाटक न करो काकी।" मैं अंदर ही अंदर थोड़ा घबराया तो जरूर मगर फिर हिम्मत कर के बोला─"तुम खुद ही मुझसे खुल कर पूछने को कह रही थी तो मैंने खुल कर पूछ लिया तुमसे। अब तुम ये नाटक बंद करो और खुल कर बताओ जो मैंने पूछा है...हां।"

"आए हाए...हमारे राजू को सब कुछ खुल कर जानना है।" मंजू काकी ने रंग बदल कर  फिर से मुझे छेड़ा─"वैसे मानना पड़ेगा...हमारे राजू सच में अब बड़े हो गए हैं। इतने बड़े कि अब इस तरह गंदे शब्द बोलने लगे हैं। हमारे राजू को ऐसे गंदे शब्दों का मतलब भी पता है...है न राजू।"

मैं बुरी तरह शर्मा गया। दिल की धड़कनें तो पहले से ही बढ़ी हुईं थी और...और अंदर हलचल मची हुई थी। मुझे उम्मीद नहीं थी कि मेरे वैसा बोलने पर काकी मुझे इस तरह छेड़ने लगेंगी। एकाएक ही अजीब सी हालत हो गई थी मेरी।

तभी काकी खिलखिला कर हंस पड़ीं। मैंने चौंक कर उनको देखा। मुझे बिल्कुल भी समझ न आया कि वो अचानक हंस क्यों पड़ी हैं। जब सच में मुझे कुछ न सूझा तो मैंने मुंह बना लिया और दूसरी तरफ को चेहरा कर लिया। मेरे ऐसा करते ही काकी और भी जोरों से हंसने लगीं। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे एकदम से मेरा मजाक बन गया है। ये सोचते ही मैं चिढ़ गया और मेरा दिमाग खराब होने लगा।

"इस तरह क्यों हंस रही हो।" मैं बुरी तरह चिढ़ कर बोला─"और मुझे गुस्सा न दिलाओ। नहीं तो सुबह सबको बता दूंगा कि तुम और बापू आज खेत वाले कमरे में क्या कर रहे थे।"

मेरी ये बात सुनते ही काकी का हंसना एकदम से बंद हो गया। मुझे गुस्से में देख थोड़ा घबरा भी गईं वो। सबको बता देने की बात सुन कर एकदम से उन्हें एहसास हुआ कि मैं सचमुच ऐसा कर सकता हूं। क्योंकि मैं अपने भोलेपन और नादानी में अक्सर यही करता आया था। 

मैं बड़ी से बड़ी बात सबके सामने बेझिझक बोल देता था। उस वक्त मुझे जरा भी एहसास या ज्ञान नहीं होता था कि मैं सबके सामने क्या बोल बैठा हूं। घर के लोग कुछ पल के लिए अवाक रह जाते थे लेकिन फिर ये मेरी नादानी और नासमझी समझ कर नजरअंदाज कर देते थे। ऐसा बहुत ही कम होता था कि मेरे ऐसा बोल देने पर घर वाले मुझे डांट दें या मुझे ऐसा नहीं बोलना चाहिए जैसी बात समझाएं। शायद यही वजह थी कि जब किसी ने सख्ती से लगाम नहीं लगाई तो मैं इतना लापरवाह और दुस्साहसी हो गया था। खैर इस वक्त मेरी ऐसी धमकी सुन कर काकी का हंसना बंद हो गया था और वो एकाएक गंभीर हो उठीं थी।

"माफ कर दो राजू।" फिर उन्होंने धीरे से कहा─"मैं तो बस छेड़ रही थी तुम्हें। तुम तो मेरे सबसे अच्छे बच्चे हो...और अच्छे बच्चे इस तरह गुस्सा नहीं होते।"

"पर मुझे अच्छा नहीं लगा।" मेरा अभी भी मुंह बना हुआ था।

"अब माफ भी कर दो न राजू।" काकी ने इस बार प्यार से कहा─"और हां तुम वो सब जानना चाहते हो न तो चलो सब कुछ बताती हूं तुम्हें।"

"सब कुछ खुल कर बताओगी।" मैंने झट से उन्हें याद दिलाया─"जैसे मैंने खुल कर तुमसे पूछा था उसी तरह तुम भी खुल कर सब कुछ बताओगी मुझे....हां।"

"ठीक है...जैसे तुम चाहते हो वैसे ही बताती हूं" काकी ने कहा।

मैं अंदर ही अंदर ये सोच के खुश हो गया कि काकी मुझसे डर गईं हैं और मेरे डर से अब सब कुछ खुल कर बताने वाली हैं। अगले ही पल मेरे मन में तरह तरह के खयाल आने शुरू हो गए थे।



जारी है............
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हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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RE: हवस और नादानियां ~ (आप-बीती) - by Rajan Raghuwanshi - 08-01-2026, 02:46 PM



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