07-01-2026, 11:42 AM
खुशबू और असलम शावर से बाहर निकले,
लेकिन उनकी त्वचा पर वो गर्माहट अभी भी बाकी थी
पानी की बूंदें सूख रही थीं,
हवा में साबुन की मीठी लैवेंडर महक मिश्रित होकर एक कामुक बादल बना रही थी।
असलम ने सफ़ेद टॉवल कमर पर लपेटा, उसकी चौड़ी छाती पर पानी की लकीरें धीरे-धीरे वाष्पित हो रही थीं,
और उसके मसल्स की हर लाइन में वो मर्दाना ताकत झलक रही थी जो खुशबू को बार-बार खींचती थी।
मन ही मन वो सोच रहा था,
‘ये दू लड़की… मेरे कंट्रोल में… शादी के तीन महीने बाद पहली बार किसी रियल मर्द के साथ…
मैंने इसे हलाल कर दिया… अमित बेचारा… सोचता होगा हम सो गए… लेकिन ये वासना… ये पावर… स्लिम मर्द होने का ये अहंकार…
उफ्फ… कितना मजा है…’
उसकी आँखों में वो संतुष्टि थी, लेकिन साथ ही भूख भी—जैसे शाम अभी बाकी हो।
खुशबू ने अंदर काली लेस वाली ब्रा पहन ली
वो इतनी पतली थी कि उसके निप्पल्स की हल्की-हल्की शेप साफ़ महसूस हो रही थी,
और ऊपर सफ़ेद टॉवल लपेटा
टॉवल का नरम कपड़ा उसकी गोरी त्वचा पर चिपक रहा था,
घुटनों तक आता हुआ,
लेकिन हर कदम पर हल्का-सा सरकने का खतरा। उसके बाल गीले और बिखरे हुए थे,
चेहरे पर वो पोस्ट-ऑर्गास्मिक ग्लो गुलाबी गाल, आँखें थकी लेकिन चमकदार।
मन ही मन वो सोच रही थी,
‘असलम का ये बॉडी… ये टच… कितना अलग है अमित से…
अमित तो बस देखता है,
हिलाता है…
लेकिन असलम… वो मुझे जीतता है…
और अमित को नीचा दिखाने का मजा… उफ्फ… नीचे वो नौकरों के साथ बैठा होगा…
मैं रानी हूँ, वो नौकर… ये अपमान… मुझे और वाइल्ड बना रहा है…’
उसकी मनोदशा एक मिश्रण थी—संतुष्टि की, लेकिन साथ ही शैतानी की, जैसे वो अमित के दर्द में ही अपनी खुशी ढूँढ रही हो।
असलम ने खुशबू को गले लगाया, उसके गीले बालों को सहलाया
“जान… शावर तो कमाल था… लेकिन अब… रेस्ट…”
लेकिन खुशबू की नज़र कमरे की खिड़की से नीचे पर गई
बीच पर अमित जय और बाकी नौकरों के साथ बैठा था,
हँस-मज़ाक कर रहा था।
खुशबू को ये देखकर एक शैतानी लहर दौड़ गई
‘बेचारा… निचले तबके के लोगों के साथ घुल-मिल गया… जैसे खुद भी उनका हिस्सा हो… अमित… तू मेरा पति है, लेकिन देख… मैं तुझे नीचा दिखाने का एक भी मौका नहीं छोड़ूँगी…’
वो इतनी शातिर थी कि अमित को नीचा दिखाने का ये मौका हाथ से न जाने देना चाहती थी। वो असलम के कान में फुसफुसाई,
“असलम जी… अमित नीचे उन नौकरों के साथ बैठा है… बातें कर रहा है… चलो, उसे बुलाते हैं… जूस मंगवाते हैं… और फिर फोटोज… उसे याद दिला दूँ कि वो हमारा सर्वेंट है…”
असलम ने मुस्कुराकर सिर हिलाया,
“हाँ जान… बुला लो… बेचारे को थोड़ा काम मिलेगा… और हमें मजा…”
वो दोनों कमरे में घूमे, लेकिन खुशबू ने फोन उठाया,
जय का नंबर डायल किया
वो नौकर जो सबसे ज़्यादा अमित के करीब था।
“हैलो जय भाई… ऊपर आ जाओ ना… थोड़ा काम है… जल्दी…”
उसकी आवाज़ में वो मीठी कमांड थी, जैसे कोई रानी अपने नौकर को बुला रही हो।
जय तुरंत आ गया
उसके चेहरे पर उत्सुकता थी, लेकिन जैसे ही दरवाज़ा खुला,
वो खुशबू को टॉवल में देखकर रुक गया।
कमरा अभी भी भाप से भरा था, हवा गर्म और नम, बेडशीट उलझी हुई। असलम सोफे पर लेटा था, टॉवल में, मुस्कुराता हुआ।
खुशबू ने जय को अंदर आने दिया, दरवाज़ा बंद किया,
और बड़े नखरे और नाटक से शुरू हो गई।
वो मिरर के सामने खड़ी हो गई, टॉवल को हल्का-सा ढीला किया
जैसे अनजाने में—और बोली,
“अरे जय भाई… ये टॉवल… कितना टाइट हो गया… शावर के बाद… उफ्फ… थोड़ा ढीला करूँ… लेकिन ये ब्रा-पैंटी… गीली हो गई हैं… निकालनी पड़ेगी…”
वो जानबूझकर धीरे-धीरे टॉवल को ऊपर उठाई
जय की आँखें फैल गईं, वो थोड़ा-सा झलक पा गया खुशबू की गोरी जाँघों का,
ब्रा की काली लेस का किनारा।
खुशबू ने नाटक करते हुए टॉवल को और ढीला किया, अंदर हाथ डाला, और ब्रा का हुक खोल दिया
क्लिक की हल्की आवाज़ गूँजी।
“ओह्ह… ये ब्रा… कितनी चिपक गई… निकालती हूँ…”
वो बोली, और ब्रा को बाहर निकाल ली
लेकिन टॉवल से ढककर, जय को बस एक सेकंड का झलक मिला उसके निप्पल्स का, गोरी छाती का।
फिर पैंटी—वो टॉवल के नीचे से खींची, धीरे-धीरे, जैसे नखरे दिखा रही हो
“ये पैंटी… गीली… उफ्फ… निकालो तो…”
![[Image: In-Shot-20260106-190200491.gif]](https://i.ibb.co/FbvnvbZx/In-Shot-20260106-190200491.gif)
जय का मुंह सूख गया, वो घूरता रह गया, मन ही मन सोच रहा था,
‘मैडम… कितनी बोल्ड… साहब के सामने… ब्रा-पैंटी निकाल रही… मैं तो बस देख रहा हूँ… काश छू पाता…’
असलम सब समझ गया था
खुशबू का ये नाटक अमित को नीचा दिखाने का था।
वो हँसकर बोला,
पति की तरह बर्ताव करते हुए,
“जान… क्या कर रही हो… जय भाई के सामने… लेकिन ठीक है… निकाल लो… मैं हूँ ना… वैसे भी अब तो जए घर का ही आदमी है…”
वो उठा, खुशबू के पास आया,
उसके कंधे पर हाथ रखा,
जैसे कोई पति अपनी बीवी को सहारा दे रहा हो।
असलम ने खुशबू की कमर सहलाई, टॉवल को हल्का-सा सँभाला,
जैसे वो उसका हक जता रहा हो।
जय शर्म से लाल हो गया, लेकिन घूरता रहा।
खुशबू ने उतरी हुई ब्रा और पैंटी
गीली, चिपचिपी
जय के हाथ में थमा दी
“
जय भाई… ये ले जाओ… अमित को बोलना… अच्छे से धोकर साफ कर दे… वो तो जानता है ना… हमारी चीजें कैसे हैंडल करनी हैं…”
वो बोली, हँसते हुए, जैसे ये नॉर्मल बात हो।
जय ने ब्रा-पैंटी लीं—उनकी गर्माहट, नमी महसूस हो रही थी
और हकलाते हुए बोला,
“ह… हाँ मैडम… मैं… बोल दूँगा…”
असलम ने हँसकर कहा,
“हाँ भाई… अमित अच्छा काम करेगा… वो हमारा फेवरेट है…”
खुशबू ने फिर बोली,
“अब जाओ जय भाई… थैंक यू… दरवाज़ा बंद करते हुए जाओ…”
जय बाहर निकला, लेकिन खुशबु janti थी कि नीचे जाकर ये सीन अमित को बताएगा
‘मैडम ने ब्रा-पैंटी निकाली…
साहब के सामने…
और अमित को धोने को दिया…’
अमित को ये सुनकर जलन होगी, कन्फ्यूजन बढ़ेगा—‘खुशबू ने मेरे सामने क्यों नहीं किया? और जय को…?’
खुशबू ने दरवाज़ा बंद होते ही असलम की तरफ़ मुड़ी, हँसकर बोली,
“देखा असलम जी… अमित को नीचा दिखाने का ये मौका… कितना मज़ेदार था… जय नीचे जाकर बताएगा… अमित जल जाएगा…”
असलम ने उसे गले लगा लिया, “हाँ जान… तू तो क्वीन है… अब आ… असली मस्ती शुरू करते हैं…”
जय नीचे सर्वेंट क्वार्टर में पहुँचा, उसके हाथ में खुशबू की गीली ब्रा-पैंटी लिपटी हुई थी
काली लेस वाली,
अभी भी पानी की बूंदें टपक रही थीं,
और हवा में वो हल्की-हल्की कामुक महक फैला रही थी।
मैं चेयर पर बैठा था, जय के साथी नौकरों की बातें सुन रहा था, लेकिन मन कहीं और था
बीच पर असलम और खुशबू की वो मस्ती, फोटोज, वो चिपकाव…
सब घूम रहा था।
जय ने मेरे पास आकर बैठ गया, उसके चेहरे पर वो शैतानी मुस्कान थी,
जैसे वो कोई बड़ा राज़ लेकर आया हो।
“भाई अमित… ऊपर क्या सीन था रे… तू तो कल्पना भी न करे… मैडम और साहब… उफ्फ… शावर से ताज़ा निकले थे… साथ नहाकर… भाप भरी हवा… साबुन की महक… और मैडम… टॉवल में लिपटी… लेकिन वो नखरे… वो नाटक…”
मैंने हल्के से पूछा,
“क्या हुआ ऊपर?
जय भाई… बोल ना…”
लेकिन अंदर से दिल धक-धक कर रहा था
शक की एक लहर उठी, लेकिन साथ ही एक अजीब रोमांच भी, जैसे मैं जानना चाहता था, लेकिन डर भी लग रहा था।
जय ने मिर्च-मसाला डालकर, अश्लील शब्दों से शुरू किया—जैसे वो जानता हो कि ये सुनकर मैं जलूँगा, लेकिन एक्साइट भी हो जाऊँगा।
जय (आँखें चमकाते हुए, आवाज़ दबाकर लेकिन उत्साह से):
“भाई… ऊपर पहुँचा तो सीन देखा… मैडम टॉवल में लिपटी, साहब भी टॉवल में… दोनों शावर से ताज़ा… भाप भरी हवा… साबुन की वो मीठी महक… जैसे अभी-अभी चुदाई का राउंड खत्म हुआ हो… मैडम मिरर के सामने खड़ी…
‘अरे जय भाई… ये टॉवल टाइट हो गया… शावर के बाद…’
बोली, और नखरे करने लगी…
टॉवल को हल्का-सा ढीला किया… भाई… झलक मिल गई… वो गोरी जाँघें…
काली ब्रा का किनारा…
उफ्फ… साहब सोफे पर लेटे थे, मुस्कुरा रहे थे…
‘जान… क्या कर रही हो जय भाई के सामने…’ बोले, लेकिन हाथ मैडम की कमर पर… जैसे पति अपनी बीवी को सहारा दे रहा हो…”
मैंने साँस रोकी,
शक की एक चुभन हुई
‘शावर से ताज़ा… साथ नहाकर? क्या… क्या सच में?’
लेकिन रोमांच भी था,
जैसे कल्पना में वो दृश्य घूमने लगा—खुशबू का नंगा बॉडी,
असलम के साथ…
नीचे लंड में हलचल हुई।
“फिर… फिर क्या हुआ?” मैंने हकलाते हुए पूछा।
जय (हँसकर, और मिर्च डालते हुए):
“फिर मैडम ने नाटक किया…
‘ये ब्रा… गीली हो गई… निकालनी पड़ेगी…’ बोली, और टॉवल के अंदर हाथ डाला… क्लिक… हुक खुला… भाई… एक सेकंड का झलक… वो गोरी छाती… निप्पल्स सख्त…
साहब बोले
, ‘जान… जय भाई देख रहा है… लेकिन ठीक है… निकाल लो…’
फिर पैंटी… ‘ये भी चिपक गई…’ टॉवल के नीचे से खींची… धीरे-धीरे… भाई… वो गांड… थोड़ा-सा दिखा… गीली, चमकती… मैं तो बस घूरता रह गया… साहब हँसे,
‘जय भाई… मैडम की हर चीज़ मेरी है…’
और मैडम ने उतरी हुई ब्रा-पैंटी मुझे थमा दी…
‘अमित को बोलना… अच्छे से धोकर साफ कर दे…’ बोली… गीली… चिपचिपी… साहब की महक… मैडम की… उफ्फ… तू कल्पना कर भाई… तेरी mam shaheb साहब के साथ शावर ले रही थी… नंगी… चिपककर… और अब ये गंदगी तू धोएगा…”
ये सुनकर मेरे दिल में शक की एक तीर-सी चुभ गई
‘साथ शावर?
नंगी?
ब्रा-पैंटी…
जय को दिखाई?
और मुझे धोने को?’
बुरा लग रहा था, जैसे कोई चाकू सीने में घुसा हो
मेरी प्यारी पत्नी… असलम के साथ बाथरूम में… नंगी…
छूते हुए…
लेकिन साथ ही रोमांच था, एक अजीब-सी उत्तेजना
कल्पना में वो दृश्य घूमने लगा,
खुशबू का नंगा बॉडी,
असलम का तगड़ा लंड,
पानी की धारें…
नीचे लंड टाइट हो गया।
जलन की आग लग गई
कैसे… कैसे वो असलम के साथ नहा सकती है?
वो मेरी बीवी है…’
लेकिन रोमांस का वो ट्विस्टेड रूप भी था—अपमान में ही मजा…
जैसे मैं खुद ही ये सब चाहता हूँ।
मैंने जय से ब्रा-पैंटी ली—गीली, गर्म, खुशबू की महक…
असलम की भी…
उँगलियों में चिपक रही थी।
“ध… धन्यवाद जय भाई…” मैंने हकलाया, लेकिन हाथ काँप रहे थे।
जय चला गया, और मैं अकेले में कमरे की तरफ़ चला गया
सर्वेंट क्वार्टर में। दरवाज़ा बंद किया, लाइट डिम की, और बेड पर लेट गया।
ब्रा-पैंटी हाथ में थी—मैंने उसे सूंघा,
खुशबू की परफ्यूम महक,
साबुन की,
और कुछ और… गीली नमी…
मन में सारे दृश्य घूमने लगे।
बीच पर असलम का हाथ खुशबू की कमर पर…
बिकिनी गीली होकर चिपकी हुई…
उसकी छाती उछल रही…
असलम की मर्दानगी,
तगड़ा बॉडी…
खुशबू की केमिस्ट्री उसके साथ—हँसी
, चिपकाव…
‘वो दोनों… कितने परफेक्ट… मैं तो बस फोटोग्राफर…’
शक गहरा हो गया, लेकिन रोमांच चरम पर—मैंने अपना छोटा-सा लंड निकाला, हिलाने लगा।
हर क्लिक पर कल्पना:
खुशबू असलम की गोद में…
‘असलम जी… जोर से…’
ब्रा-पैंटी को सहलाते हुए
, उसकी नमी महसूस करते हुए…
मैं झड़ गया—
दो-तीन बूंदें,
लेकिन संतुष्टि नहीं,
बस और भूख। ‘
खुशबू… तुम मेरी हो… लेकिन…’
मन में कन्फ्यूजन घूम रहा था—
जलन, रोमांस, अपमान… सब मिक्स।
‘नहीं… ये गलत सोच रहा हूँ…
खुशबू बेचारी अपशकुन से डर रही है…
लेकिन… कन्फर्म कर लूँ…’
मन में कन्फ्यूजन था
जलन की आग,
रोमांस का वो बीमार रूप,
और डर कि कहीं खुशबू नाराज़ न हो जाए।
आखिरकार,
मैं उठा, कैमरा साइड में रखा,
और ऊपर सूट की तरफ़ चला गया
शक दूर करने के लिए कंसल्ट करने का फैसला ले चुका था।
सूट का दरवाज़ा नॉक किया। अंदर से खुशबू की आवाज़ आई,
“आओ…”
मैं अंदर गया। कमरा एक राजमहल जैसा लग रहा था
एसी की ठंडी हवा, सॉफ्ट लाइट्स, बेड पर सिल्क की चादरें बिछी हुईं, हवा में परफ्यूम की हल्की-हल्की महक। खुशबू नॉर्मल लेकिन कंफर्टेबल कपड़ों में थी
एक लूज व्हाइट टी-शर्ट, जो उसके कर्व्स को हल्का-सा हाइलाइट कर रही थी, और नीचे शॉर्ट्स, जो उसकी जाँघें एक्सपोज कर रहे थे
। वो सोफे पर लेटी हुई थी,
असलम उसके बगल में, जैसे कोई राजा-रानी आराम कर रहे हों
असलम का हाथ उसके कंधे पर, खुशबू का सिर उसके सीने पर।
असलम टीवी पर कुछ देख रहा था, लेकिन खुशबू ने मुझे देखते ही मुस्कुरा दिया
उसे अपेक्षा थी ही कि अमित शक लेकर ऊपर आएगा।
वो इतनी शातिर थी कि मेरी हर हरकत पढ़ लेती थी।
“अमित… आ गए तुम… क्या बात है? बैठो ना…”
वो बोली, लेकिन इस बार असलम को बाहर नहीं भेजा
man of the house दिखाने के लिए।
‘असलम मेरा शौहर है… अगर पति होने के नाते अमित से बात करनी है, तो असलम को परेशान करके बाहर नहीं भेजूँगी… ये दिखाना है कि असलम ही बॉस है…’
मन ही मन सोच रही थी।
मैं नर्वस हो गया
डरते हुए, हाथ-पैर ठंडे पड़ गए।
कमरे में वो राजसी माहौल… असलम का प्रेजेंस… जैसे वो असली मालिक हो।
मैंने हकलाते हुए कहा,
“खु… खुशबू जी… मैं… बस… थोड़ी बात…”
मेरा दिल धक-धक कर रहा था, होंठ काँप रहे थे।
मन में घूम रहा थ
‘कैसे पूछूँ? गुस्सा हो जाएगी… लेकिन शक तो दूर करना है…’
मैंने गहरी साँस ली,
लेकिन शब्द रुक-रुक जाते थे।
“अरे यार… खुशबू जी… अभी जय मुझे नीचे मिला… वो बता रहा था… कि आप और असलम जी… एक साथ… शावर में…”
शब्द मेरे मुंह से निकलते हुए जैसे काँटे लग रहे थे—होंठ काँप रहे थे,
गला सूखा हुआ।
‘कैसे बोल रहा हूँ अपनी ही पत्नी से… असलम के साथ नहाना… ये तो… लेकिन पूछना तो पड़ रहा है…’
नर्वसनेस इतनी कि हाथ पसीने से भीग गए, आँखें नीचे झुक गईं।
खुशबू ने तुरंत मेरी हालत समझ ली
उसे अपेक्षा थी ही। वो असलम की तरफ़ मुड़ी, हल्के से सिर हिलाया—
“असलम जी… थोड़ी देर… आप यही बैठिए यह अमित को मुझे कुछ काम है मैं उसको निपटाकर आती हूं"
लेकिन बाहर नहीं भेजा। फिर उठी, मेरे हाथ पकड़े, और शांत, ममता भरी आवाज़ में बोली
, “चलो जान… बाहर बालकनी में चलते हैं… वहाँ बात करते हैं… असलम जी… आप आराम करो…”
वो मुझे कमरे की बड़ी बालकनी में ले गई
उसकी आँखें इतनी शांत, इतनी समझदार लग रही थीं, जैसे वो मेरी आत्मा तक झाँक रही हो।
उसके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि एक ममता भरी मुस्कान—जैसे कोई माँ अपने बच्चे की हर गलती को माफ़ कर दे।
वो मेरे हाथ को और कसकर दबाई, और बहुत नरम, प्यार भरी आवाज़ में बोली,
“अरे अमित… तुम्हारी ये आँखें… कितनी उदास, कितनी थकी हुई लग रही हैं… मैं तो बस देखकर ही जान गई कि क्या तूफान चल रहा है तेरे दिल में… लेकिन जान… शांत हो जाओ… साँस लो… मैं हूँ ना तेरे साथ… हमेशा की तरह… मैं तेरी खुशी के लिए ही तो ये सब कर रही हूँ…
तेरी लंबी उम्र के लिए… हमारी शादी के लिए…
बोल… क्या परेशानी है?
जय ने क्या बकवास सुनाई? मैं सब बता दूँगी… तुझे चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं… तू मेरा प्यारा है… मेरा सबसे करीबी…”
उसकी आवाज़ इतनी मीठी थी,
जैसे शहद की तरह मेरे दिल के घाव पर लग रही हो—शुगर-कोटिंग इतनी परफेक्ट कि मेरा गुस्सा पिघलने लगा,
लेकिन शक अभी भी कोंच रहा था। उसके स्पर्श में वो गर्माहट थी, जो मुझे बचपन की याद दिला रही थी—जब माँ सांत्वना देती थी।
मैंने गहरी साँस ली, लेकिन होंठ काँप रहे थे, गला सूखा हुआ।
‘कैसे पूछूँ… ये तो मेरी पत्नी है… लेकिन शक तो है…’ मन में डर था—गुस्सा हो गई तो? लेकिन शब्द निकल ही गए, नर्वस होकर, डरते हुए, मूड ऑफ न हो जाए इसका ध्यान रखते हुए।
“खुशबू जी… मैं… बस… परेशान हूँ… जय बोला… आप और असलम जी…
एक साथ शावर में…
नहा रहे थे…
ये… ये कैसे?
मैं तो जानता हूँ अपशकुन का डर… लेकिन… बाथरूम में… साथ?
मुझे… बुरा लग रहा है…
सीने में जलन-सी हो रही है…
लेकिन मैं गुस्सा नहीं हूँ… बस…
समझना चाहता हूँ… कृपया… बताओ ना…”
शब्द मेरे मुंह से निकलते हुए जैसे आग के गोले लग रहे थे—
होंठ काँप रहे थे, आँखें नीचे झुक गईं, हाथ पसीने से भीग गए। मन में एक तूफान था—डर कि कहीं खुशबू रो न पड़े, या गुस्सा होकर चली न जाए;
साथ ही वो शक,
जो सीने को चीर रहा था।
‘अगर सच है तो… मेरी शादी… सब बर्बाद… लेकिन अगर नहीं, तो मैं क्यों इतना जल रहा हूँ?’
खुशबू ने पहले तो मेरी आँखों में गहराई से देखा—उसकी आँखें नम हो गईं, जैसे वो मेरे दर्द को महसूस कर रही हो।
फिर धीरे से सिर हिलाया, और बहुत शांत, समझदार लहजे में बोली,
“ओह जान… तो जय ने ये बताया? हाँ… उसने सही कहा है…
मैं और असलम जी शावर से बाहर निकले थे… साथ नहाकर…
लेकिन अमित…
तुम जरा सोचो ना…
जब नीचे बीच पर जब हम पानी में मस्ती कर रहे थे…
लहरों में नहा रहे थे…
पब्लिक के बीच…
सबके सामने…
वो सही था या गलत?
मैं तो तुम्हारे लिए ही कर रही थी…
ताकि सबको लगे हम पति-पत्नी हैं…
अपशकुन न हो… और तुम?
तुम्हें तो मजा आया था ना?
वो फोटोज…
तुम खुद ही ऐसी पोज़ बनवा रहे थे…
असलम जी के साथ मेरी…
वो भी सही था या गलत?
अगर बीच पर पब्लिक में नहाना सही था
, तो शावर में साथ नहाना…
वो भी सफाई का बहाना…
वो गलत क्यों?
जान… मैं तो बस तुम्हारी खुशी के लिए झूठ बोल रही हूँ…
तेरी लंबी उम्र के लिए…
हमारी शादी बचाने के लिए…
और तू…
हर बार ये शक…
हर बार ये सवाल…
मुझे कितना दुख होता है…
जैसे तू मुझे विश्वास ही न करे…”
उसके शब्दों में वो शुगर-कोटिंग थी—मीठी, लेकिन तर्कपूर्ण,
जैसे वो मुझे दोषी ठहरा रही हो बिना चिल्लाए। बीच पर नहाना…
फोटोज… हाँ…
वो सही कह रही है… ‘
मैं ही छोटा सोच रहा हूँ… मेरी गलती है…
’ मन में गिल्ट उठा,
शक हल्का सा कम हुआ,
आँखें नम हो गईं।
“सॉरी… सॉरी खुशबू जी… मैं… बस…”
खुशबू ने थोड़ा गुस्से का टोन लिया
नहीं चिल्लाकर,
लेकिन आँखों में वो चमक आ गई,
जैसे वो मुझे हल्का-सा दर्द दे रही हो,
लेकिन प्यार से।
“अरे अमित… मुझे तो ये समझ में नहीं आता… तुम्हारे छोटे से दिमाग में ये बात क्यों घुस नहीं रही?
हर बार ये क्यों भूल जाते हो कि मैं और असलम जी यहाँ पति-पत्नी हैं?
दिखावे में…
लेकिन जाहिर-सी बात है,
थोड़ा-बहुत तो उसके हिसाब से बर्ताव करेंगे ही ना
! बीच पर पब्लिक में नहाना सही था,
फोटोज खिंचवाना सही था…
तो शावर में साथ नहाना…
वो भी बस नहाने के लिए…
वो गलत क्यों?
अगर असलम जी मेरे ‘पति’ हैं, तो बाथरूम शेयर करना…
वो भी सफाई का बहाना…
इतना बड़ा मुद्दा क्यों बना देते हो?
मैं तो तुम्हारी खुशी के लिए झूठ बोल रही हूँ…
अपशकुन से बच रही हूँ…
और तुम?
हर बार शक… हर बार ये सवाल…
मुझे कितना दुख होता है जान…
जैसे तू मुझे विश्वास ही न करे…
तेरी आँखों में ये देखकर मेरा दिल टूट जाता है… तू मेरा पति है…
मैं तेरी बीवी…
लेकिन ये दिखावा…
ये झूठ… सब तेरे लिए ही तो…”
उसके गुस्से में वो दर्द थ
आँखें नम, आवाज़ काँपती हुई—जैसे वो सच में रोने वाली हो।
मुझे लगा जैसे मैंने उसे चोट पहुँचा दी है
। ‘हाँ… हर बार भूल जाता हूँ… वो पति-पत्नी हैं दिखावे में… मेरी गलती है… मैं ही छोटा सोच रहा हूँ…’
शक और कम हुआ, गिल्ट जगह ले रहा था,
सीने में एक भारीपन आ गया—
जैसे मैंने अपनी ही बीवी को दुख दिया हो।
आँखें नम हो गईं
, “खुशबू जी… सॉरी… मैं… मैं बेवकूफ़ हूँ… तुम सही कह रही हो…”
खुशबू ने तुरंत टोन बदला, फिर से मीठा कर दिया
मेरे हाथ सहलाते हुए, आँखों में वो ममता लौट आई।
“अरे जान… दुखि मत हो… कोई बात नहीं… लेकिन और एक बात…
जय ने तुझे ये नहीं बताया कि जब मैं बाहर निकली थी, तब मैं ब्रा-पैंटी पहन थी ना?
तो मैं पूरी नंगी तो नहीं नहाई होगी असलम जी के साथ… ब्रा पैंटी तो मैंने पहनी ही हुई थी ना यार
बस… साथ शावर लिया…
सफाई का बहाना…
ताकि रिसोर्ट वाले शक न करें।
और असलम जी?
वो मेरे साथ इतनी फोटोज खिंचवा रहे थे…
बीच में पानी में एंजॉय कर रहे थे…
लहरों में मस्ती…
तो क्या मैं उनके साथ शावर शेयर नहीं कर सकती?
इतनी भी समझ नहीं आती तुम्हें?
वो मेरे ‘पति’ हैं… तो थोड़ा-बहुत तो होना ही चाहिए ना…
सब तुम्हारी खुशी के लिए…
हमारी शादी बचाने के लिए…
तू तो मेरा सबसे प्यारा है… मेरा सहारा… मैं बिना तेरे के कुछ नहीं…”
अब से तू अपना रोल अच्छे से निभाना…
बिना शक, बिना सवाल…
मैं और असलम जी पति-पत्नी हैं—
दिखावे में… तो हम वैसा ही बर्ताव करेंगे…
और तू…
हमारा फोटोग्राफर…
हमारा हेल्पर…
हमारा… वो जो भी कहें
, वैसा करेगा…
बिना एक शब्द के…
समझा?
ये हमारी शादी के लिए… तेरी खुशी के लिए… वरना…
सब बर्बाद हो जाएगा…
तुम बस अपना काम कर ना … नीचे रह कर … हम ऊपर… ....तुम हमारी सर्विस कर…
बिना सोचे…
ये तेरा रोल है अब… "
लेकिन उनकी त्वचा पर वो गर्माहट अभी भी बाकी थी
पानी की बूंदें सूख रही थीं,
हवा में साबुन की मीठी लैवेंडर महक मिश्रित होकर एक कामुक बादल बना रही थी।
असलम ने सफ़ेद टॉवल कमर पर लपेटा, उसकी चौड़ी छाती पर पानी की लकीरें धीरे-धीरे वाष्पित हो रही थीं,
और उसके मसल्स की हर लाइन में वो मर्दाना ताकत झलक रही थी जो खुशबू को बार-बार खींचती थी।
मन ही मन वो सोच रहा था,
‘ये दू लड़की… मेरे कंट्रोल में… शादी के तीन महीने बाद पहली बार किसी रियल मर्द के साथ…
मैंने इसे हलाल कर दिया… अमित बेचारा… सोचता होगा हम सो गए… लेकिन ये वासना… ये पावर… स्लिम मर्द होने का ये अहंकार…
उफ्फ… कितना मजा है…’
उसकी आँखों में वो संतुष्टि थी, लेकिन साथ ही भूख भी—जैसे शाम अभी बाकी हो।
खुशबू ने अंदर काली लेस वाली ब्रा पहन ली
वो इतनी पतली थी कि उसके निप्पल्स की हल्की-हल्की शेप साफ़ महसूस हो रही थी,
और ऊपर सफ़ेद टॉवल लपेटा
टॉवल का नरम कपड़ा उसकी गोरी त्वचा पर चिपक रहा था,
घुटनों तक आता हुआ,
लेकिन हर कदम पर हल्का-सा सरकने का खतरा। उसके बाल गीले और बिखरे हुए थे,
चेहरे पर वो पोस्ट-ऑर्गास्मिक ग्लो गुलाबी गाल, आँखें थकी लेकिन चमकदार।
मन ही मन वो सोच रही थी,
‘असलम का ये बॉडी… ये टच… कितना अलग है अमित से…
अमित तो बस देखता है,
हिलाता है…
लेकिन असलम… वो मुझे जीतता है…
और अमित को नीचा दिखाने का मजा… उफ्फ… नीचे वो नौकरों के साथ बैठा होगा…
मैं रानी हूँ, वो नौकर… ये अपमान… मुझे और वाइल्ड बना रहा है…’
उसकी मनोदशा एक मिश्रण थी—संतुष्टि की, लेकिन साथ ही शैतानी की, जैसे वो अमित के दर्द में ही अपनी खुशी ढूँढ रही हो।
असलम ने खुशबू को गले लगाया, उसके गीले बालों को सहलाया
“जान… शावर तो कमाल था… लेकिन अब… रेस्ट…”
लेकिन खुशबू की नज़र कमरे की खिड़की से नीचे पर गई
बीच पर अमित जय और बाकी नौकरों के साथ बैठा था,
हँस-मज़ाक कर रहा था।
खुशबू को ये देखकर एक शैतानी लहर दौड़ गई
‘बेचारा… निचले तबके के लोगों के साथ घुल-मिल गया… जैसे खुद भी उनका हिस्सा हो… अमित… तू मेरा पति है, लेकिन देख… मैं तुझे नीचा दिखाने का एक भी मौका नहीं छोड़ूँगी…’
वो इतनी शातिर थी कि अमित को नीचा दिखाने का ये मौका हाथ से न जाने देना चाहती थी। वो असलम के कान में फुसफुसाई,
“असलम जी… अमित नीचे उन नौकरों के साथ बैठा है… बातें कर रहा है… चलो, उसे बुलाते हैं… जूस मंगवाते हैं… और फिर फोटोज… उसे याद दिला दूँ कि वो हमारा सर्वेंट है…”
असलम ने मुस्कुराकर सिर हिलाया,
“हाँ जान… बुला लो… बेचारे को थोड़ा काम मिलेगा… और हमें मजा…”
वो दोनों कमरे में घूमे, लेकिन खुशबू ने फोन उठाया,
जय का नंबर डायल किया
वो नौकर जो सबसे ज़्यादा अमित के करीब था।
“हैलो जय भाई… ऊपर आ जाओ ना… थोड़ा काम है… जल्दी…”
उसकी आवाज़ में वो मीठी कमांड थी, जैसे कोई रानी अपने नौकर को बुला रही हो।
जय तुरंत आ गया
उसके चेहरे पर उत्सुकता थी, लेकिन जैसे ही दरवाज़ा खुला,
वो खुशबू को टॉवल में देखकर रुक गया।
कमरा अभी भी भाप से भरा था, हवा गर्म और नम, बेडशीट उलझी हुई। असलम सोफे पर लेटा था, टॉवल में, मुस्कुराता हुआ।
खुशबू ने जय को अंदर आने दिया, दरवाज़ा बंद किया,
और बड़े नखरे और नाटक से शुरू हो गई।
वो मिरर के सामने खड़ी हो गई, टॉवल को हल्का-सा ढीला किया
जैसे अनजाने में—और बोली,
“अरे जय भाई… ये टॉवल… कितना टाइट हो गया… शावर के बाद… उफ्फ… थोड़ा ढीला करूँ… लेकिन ये ब्रा-पैंटी… गीली हो गई हैं… निकालनी पड़ेगी…”
वो जानबूझकर धीरे-धीरे टॉवल को ऊपर उठाई
जय की आँखें फैल गईं, वो थोड़ा-सा झलक पा गया खुशबू की गोरी जाँघों का,
ब्रा की काली लेस का किनारा।
खुशबू ने नाटक करते हुए टॉवल को और ढीला किया, अंदर हाथ डाला, और ब्रा का हुक खोल दिया
क्लिक की हल्की आवाज़ गूँजी।
“ओह्ह… ये ब्रा… कितनी चिपक गई… निकालती हूँ…”
वो बोली, और ब्रा को बाहर निकाल ली
लेकिन टॉवल से ढककर, जय को बस एक सेकंड का झलक मिला उसके निप्पल्स का, गोरी छाती का।
फिर पैंटी—वो टॉवल के नीचे से खींची, धीरे-धीरे, जैसे नखरे दिखा रही हो
“ये पैंटी… गीली… उफ्फ… निकालो तो…”
![[Image: In-Shot-20260106-190200491.gif]](https://i.ibb.co/FbvnvbZx/In-Shot-20260106-190200491.gif)
जय का मुंह सूख गया, वो घूरता रह गया, मन ही मन सोच रहा था,
‘मैडम… कितनी बोल्ड… साहब के सामने… ब्रा-पैंटी निकाल रही… मैं तो बस देख रहा हूँ… काश छू पाता…’
असलम सब समझ गया था
खुशबू का ये नाटक अमित को नीचा दिखाने का था।
वो हँसकर बोला,
पति की तरह बर्ताव करते हुए,
“जान… क्या कर रही हो… जय भाई के सामने… लेकिन ठीक है… निकाल लो… मैं हूँ ना… वैसे भी अब तो जए घर का ही आदमी है…”
वो उठा, खुशबू के पास आया,
उसके कंधे पर हाथ रखा,
जैसे कोई पति अपनी बीवी को सहारा दे रहा हो।
असलम ने खुशबू की कमर सहलाई, टॉवल को हल्का-सा सँभाला,
जैसे वो उसका हक जता रहा हो।
जय शर्म से लाल हो गया, लेकिन घूरता रहा।
खुशबू ने उतरी हुई ब्रा और पैंटी
गीली, चिपचिपी
जय के हाथ में थमा दी
“
जय भाई… ये ले जाओ… अमित को बोलना… अच्छे से धोकर साफ कर दे… वो तो जानता है ना… हमारी चीजें कैसे हैंडल करनी हैं…”
वो बोली, हँसते हुए, जैसे ये नॉर्मल बात हो।
जय ने ब्रा-पैंटी लीं—उनकी गर्माहट, नमी महसूस हो रही थी
और हकलाते हुए बोला,
“ह… हाँ मैडम… मैं… बोल दूँगा…”
असलम ने हँसकर कहा,
“हाँ भाई… अमित अच्छा काम करेगा… वो हमारा फेवरेट है…”
खुशबू ने फिर बोली,
“अब जाओ जय भाई… थैंक यू… दरवाज़ा बंद करते हुए जाओ…”
जय बाहर निकला, लेकिन खुशबु janti थी कि नीचे जाकर ये सीन अमित को बताएगा
‘मैडम ने ब्रा-पैंटी निकाली…
साहब के सामने…
और अमित को धोने को दिया…’
अमित को ये सुनकर जलन होगी, कन्फ्यूजन बढ़ेगा—‘खुशबू ने मेरे सामने क्यों नहीं किया? और जय को…?’
खुशबू ने दरवाज़ा बंद होते ही असलम की तरफ़ मुड़ी, हँसकर बोली,
“देखा असलम जी… अमित को नीचा दिखाने का ये मौका… कितना मज़ेदार था… जय नीचे जाकर बताएगा… अमित जल जाएगा…”
असलम ने उसे गले लगा लिया, “हाँ जान… तू तो क्वीन है… अब आ… असली मस्ती शुरू करते हैं…”
जय नीचे सर्वेंट क्वार्टर में पहुँचा, उसके हाथ में खुशबू की गीली ब्रा-पैंटी लिपटी हुई थी
काली लेस वाली,
अभी भी पानी की बूंदें टपक रही थीं,
और हवा में वो हल्की-हल्की कामुक महक फैला रही थी।
मैं चेयर पर बैठा था, जय के साथी नौकरों की बातें सुन रहा था, लेकिन मन कहीं और था
बीच पर असलम और खुशबू की वो मस्ती, फोटोज, वो चिपकाव…
सब घूम रहा था।
जय ने मेरे पास आकर बैठ गया, उसके चेहरे पर वो शैतानी मुस्कान थी,
जैसे वो कोई बड़ा राज़ लेकर आया हो।
“भाई अमित… ऊपर क्या सीन था रे… तू तो कल्पना भी न करे… मैडम और साहब… उफ्फ… शावर से ताज़ा निकले थे… साथ नहाकर… भाप भरी हवा… साबुन की महक… और मैडम… टॉवल में लिपटी… लेकिन वो नखरे… वो नाटक…”
मैंने हल्के से पूछा,
“क्या हुआ ऊपर?
जय भाई… बोल ना…”
लेकिन अंदर से दिल धक-धक कर रहा था
शक की एक लहर उठी, लेकिन साथ ही एक अजीब रोमांच भी, जैसे मैं जानना चाहता था, लेकिन डर भी लग रहा था।
जय ने मिर्च-मसाला डालकर, अश्लील शब्दों से शुरू किया—जैसे वो जानता हो कि ये सुनकर मैं जलूँगा, लेकिन एक्साइट भी हो जाऊँगा।
जय (आँखें चमकाते हुए, आवाज़ दबाकर लेकिन उत्साह से):
“भाई… ऊपर पहुँचा तो सीन देखा… मैडम टॉवल में लिपटी, साहब भी टॉवल में… दोनों शावर से ताज़ा… भाप भरी हवा… साबुन की वो मीठी महक… जैसे अभी-अभी चुदाई का राउंड खत्म हुआ हो… मैडम मिरर के सामने खड़ी…
‘अरे जय भाई… ये टॉवल टाइट हो गया… शावर के बाद…’
बोली, और नखरे करने लगी…
टॉवल को हल्का-सा ढीला किया… भाई… झलक मिल गई… वो गोरी जाँघें…
काली ब्रा का किनारा…
उफ्फ… साहब सोफे पर लेटे थे, मुस्कुरा रहे थे…
‘जान… क्या कर रही हो जय भाई के सामने…’ बोले, लेकिन हाथ मैडम की कमर पर… जैसे पति अपनी बीवी को सहारा दे रहा हो…”
मैंने साँस रोकी,
शक की एक चुभन हुई
‘शावर से ताज़ा… साथ नहाकर? क्या… क्या सच में?’
लेकिन रोमांच भी था,
जैसे कल्पना में वो दृश्य घूमने लगा—खुशबू का नंगा बॉडी,
असलम के साथ…
नीचे लंड में हलचल हुई।
“फिर… फिर क्या हुआ?” मैंने हकलाते हुए पूछा।
जय (हँसकर, और मिर्च डालते हुए):
“फिर मैडम ने नाटक किया…
‘ये ब्रा… गीली हो गई… निकालनी पड़ेगी…’ बोली, और टॉवल के अंदर हाथ डाला… क्लिक… हुक खुला… भाई… एक सेकंड का झलक… वो गोरी छाती… निप्पल्स सख्त…
साहब बोले
, ‘जान… जय भाई देख रहा है… लेकिन ठीक है… निकाल लो…’
फिर पैंटी… ‘ये भी चिपक गई…’ टॉवल के नीचे से खींची… धीरे-धीरे… भाई… वो गांड… थोड़ा-सा दिखा… गीली, चमकती… मैं तो बस घूरता रह गया… साहब हँसे,
‘जय भाई… मैडम की हर चीज़ मेरी है…’
और मैडम ने उतरी हुई ब्रा-पैंटी मुझे थमा दी…
‘अमित को बोलना… अच्छे से धोकर साफ कर दे…’ बोली… गीली… चिपचिपी… साहब की महक… मैडम की… उफ्फ… तू कल्पना कर भाई… तेरी mam shaheb साहब के साथ शावर ले रही थी… नंगी… चिपककर… और अब ये गंदगी तू धोएगा…”
ये सुनकर मेरे दिल में शक की एक तीर-सी चुभ गई
‘साथ शावर?
नंगी?
ब्रा-पैंटी…
जय को दिखाई?
और मुझे धोने को?’
बुरा लग रहा था, जैसे कोई चाकू सीने में घुसा हो
मेरी प्यारी पत्नी… असलम के साथ बाथरूम में… नंगी…
छूते हुए…
लेकिन साथ ही रोमांच था, एक अजीब-सी उत्तेजना
कल्पना में वो दृश्य घूमने लगा,
खुशबू का नंगा बॉडी,
असलम का तगड़ा लंड,
पानी की धारें…
नीचे लंड टाइट हो गया।
जलन की आग लग गई
कैसे… कैसे वो असलम के साथ नहा सकती है?
वो मेरी बीवी है…’
लेकिन रोमांस का वो ट्विस्टेड रूप भी था—अपमान में ही मजा…
जैसे मैं खुद ही ये सब चाहता हूँ।
मैंने जय से ब्रा-पैंटी ली—गीली, गर्म, खुशबू की महक…
असलम की भी…
उँगलियों में चिपक रही थी।
“ध… धन्यवाद जय भाई…” मैंने हकलाया, लेकिन हाथ काँप रहे थे।
जय चला गया, और मैं अकेले में कमरे की तरफ़ चला गया
सर्वेंट क्वार्टर में। दरवाज़ा बंद किया, लाइट डिम की, और बेड पर लेट गया।
ब्रा-पैंटी हाथ में थी—मैंने उसे सूंघा,
खुशबू की परफ्यूम महक,
साबुन की,
और कुछ और… गीली नमी…
मन में सारे दृश्य घूमने लगे।
बीच पर असलम का हाथ खुशबू की कमर पर…
बिकिनी गीली होकर चिपकी हुई…
उसकी छाती उछल रही…
असलम की मर्दानगी,
तगड़ा बॉडी…
खुशबू की केमिस्ट्री उसके साथ—हँसी
, चिपकाव…
‘वो दोनों… कितने परफेक्ट… मैं तो बस फोटोग्राफर…’
शक गहरा हो गया, लेकिन रोमांच चरम पर—मैंने अपना छोटा-सा लंड निकाला, हिलाने लगा।
हर क्लिक पर कल्पना:
खुशबू असलम की गोद में…
‘असलम जी… जोर से…’
ब्रा-पैंटी को सहलाते हुए
, उसकी नमी महसूस करते हुए…
मैं झड़ गया—
दो-तीन बूंदें,
लेकिन संतुष्टि नहीं,
बस और भूख। ‘
खुशबू… तुम मेरी हो… लेकिन…’
मन में कन्फ्यूजन घूम रहा था—
जलन, रोमांस, अपमान… सब मिक्स।
‘नहीं… ये गलत सोच रहा हूँ…
खुशबू बेचारी अपशकुन से डर रही है…
लेकिन… कन्फर्म कर लूँ…’
मन में कन्फ्यूजन था
जलन की आग,
रोमांस का वो बीमार रूप,
और डर कि कहीं खुशबू नाराज़ न हो जाए।
आखिरकार,
मैं उठा, कैमरा साइड में रखा,
और ऊपर सूट की तरफ़ चला गया
शक दूर करने के लिए कंसल्ट करने का फैसला ले चुका था।
सूट का दरवाज़ा नॉक किया। अंदर से खुशबू की आवाज़ आई,
“आओ…”
मैं अंदर गया। कमरा एक राजमहल जैसा लग रहा था
एसी की ठंडी हवा, सॉफ्ट लाइट्स, बेड पर सिल्क की चादरें बिछी हुईं, हवा में परफ्यूम की हल्की-हल्की महक। खुशबू नॉर्मल लेकिन कंफर्टेबल कपड़ों में थी
एक लूज व्हाइट टी-शर्ट, जो उसके कर्व्स को हल्का-सा हाइलाइट कर रही थी, और नीचे शॉर्ट्स, जो उसकी जाँघें एक्सपोज कर रहे थे
। वो सोफे पर लेटी हुई थी,
असलम उसके बगल में, जैसे कोई राजा-रानी आराम कर रहे हों
असलम का हाथ उसके कंधे पर, खुशबू का सिर उसके सीने पर।
असलम टीवी पर कुछ देख रहा था, लेकिन खुशबू ने मुझे देखते ही मुस्कुरा दिया
उसे अपेक्षा थी ही कि अमित शक लेकर ऊपर आएगा।
वो इतनी शातिर थी कि मेरी हर हरकत पढ़ लेती थी।
“अमित… आ गए तुम… क्या बात है? बैठो ना…”
वो बोली, लेकिन इस बार असलम को बाहर नहीं भेजा
man of the house दिखाने के लिए।
‘असलम मेरा शौहर है… अगर पति होने के नाते अमित से बात करनी है, तो असलम को परेशान करके बाहर नहीं भेजूँगी… ये दिखाना है कि असलम ही बॉस है…’
मन ही मन सोच रही थी।
मैं नर्वस हो गया
डरते हुए, हाथ-पैर ठंडे पड़ गए।
कमरे में वो राजसी माहौल… असलम का प्रेजेंस… जैसे वो असली मालिक हो।
मैंने हकलाते हुए कहा,
“खु… खुशबू जी… मैं… बस… थोड़ी बात…”
मेरा दिल धक-धक कर रहा था, होंठ काँप रहे थे।
मन में घूम रहा थ
‘कैसे पूछूँ? गुस्सा हो जाएगी… लेकिन शक तो दूर करना है…’
मैंने गहरी साँस ली,
लेकिन शब्द रुक-रुक जाते थे।
“अरे यार… खुशबू जी… अभी जय मुझे नीचे मिला… वो बता रहा था… कि आप और असलम जी… एक साथ… शावर में…”
शब्द मेरे मुंह से निकलते हुए जैसे काँटे लग रहे थे—होंठ काँप रहे थे,
गला सूखा हुआ।
‘कैसे बोल रहा हूँ अपनी ही पत्नी से… असलम के साथ नहाना… ये तो… लेकिन पूछना तो पड़ रहा है…’
नर्वसनेस इतनी कि हाथ पसीने से भीग गए, आँखें नीचे झुक गईं।
खुशबू ने तुरंत मेरी हालत समझ ली
उसे अपेक्षा थी ही। वो असलम की तरफ़ मुड़ी, हल्के से सिर हिलाया—
“असलम जी… थोड़ी देर… आप यही बैठिए यह अमित को मुझे कुछ काम है मैं उसको निपटाकर आती हूं"
लेकिन बाहर नहीं भेजा। फिर उठी, मेरे हाथ पकड़े, और शांत, ममता भरी आवाज़ में बोली
, “चलो जान… बाहर बालकनी में चलते हैं… वहाँ बात करते हैं… असलम जी… आप आराम करो…”
वो मुझे कमरे की बड़ी बालकनी में ले गई
उसकी आँखें इतनी शांत, इतनी समझदार लग रही थीं, जैसे वो मेरी आत्मा तक झाँक रही हो।
उसके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि एक ममता भरी मुस्कान—जैसे कोई माँ अपने बच्चे की हर गलती को माफ़ कर दे।
वो मेरे हाथ को और कसकर दबाई, और बहुत नरम, प्यार भरी आवाज़ में बोली,
“अरे अमित… तुम्हारी ये आँखें… कितनी उदास, कितनी थकी हुई लग रही हैं… मैं तो बस देखकर ही जान गई कि क्या तूफान चल रहा है तेरे दिल में… लेकिन जान… शांत हो जाओ… साँस लो… मैं हूँ ना तेरे साथ… हमेशा की तरह… मैं तेरी खुशी के लिए ही तो ये सब कर रही हूँ…
तेरी लंबी उम्र के लिए… हमारी शादी के लिए…
बोल… क्या परेशानी है?
जय ने क्या बकवास सुनाई? मैं सब बता दूँगी… तुझे चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं… तू मेरा प्यारा है… मेरा सबसे करीबी…”
उसकी आवाज़ इतनी मीठी थी,
जैसे शहद की तरह मेरे दिल के घाव पर लग रही हो—शुगर-कोटिंग इतनी परफेक्ट कि मेरा गुस्सा पिघलने लगा,
लेकिन शक अभी भी कोंच रहा था। उसके स्पर्श में वो गर्माहट थी, जो मुझे बचपन की याद दिला रही थी—जब माँ सांत्वना देती थी।
मैंने गहरी साँस ली, लेकिन होंठ काँप रहे थे, गला सूखा हुआ।
‘कैसे पूछूँ… ये तो मेरी पत्नी है… लेकिन शक तो है…’ मन में डर था—गुस्सा हो गई तो? लेकिन शब्द निकल ही गए, नर्वस होकर, डरते हुए, मूड ऑफ न हो जाए इसका ध्यान रखते हुए।
“खुशबू जी… मैं… बस… परेशान हूँ… जय बोला… आप और असलम जी…
एक साथ शावर में…
नहा रहे थे…
ये… ये कैसे?
मैं तो जानता हूँ अपशकुन का डर… लेकिन… बाथरूम में… साथ?
मुझे… बुरा लग रहा है…
सीने में जलन-सी हो रही है…
लेकिन मैं गुस्सा नहीं हूँ… बस…
समझना चाहता हूँ… कृपया… बताओ ना…”
शब्द मेरे मुंह से निकलते हुए जैसे आग के गोले लग रहे थे—
होंठ काँप रहे थे, आँखें नीचे झुक गईं, हाथ पसीने से भीग गए। मन में एक तूफान था—डर कि कहीं खुशबू रो न पड़े, या गुस्सा होकर चली न जाए;
साथ ही वो शक,
जो सीने को चीर रहा था।
‘अगर सच है तो… मेरी शादी… सब बर्बाद… लेकिन अगर नहीं, तो मैं क्यों इतना जल रहा हूँ?’
खुशबू ने पहले तो मेरी आँखों में गहराई से देखा—उसकी आँखें नम हो गईं, जैसे वो मेरे दर्द को महसूस कर रही हो।
फिर धीरे से सिर हिलाया, और बहुत शांत, समझदार लहजे में बोली,
“ओह जान… तो जय ने ये बताया? हाँ… उसने सही कहा है…
मैं और असलम जी शावर से बाहर निकले थे… साथ नहाकर…
लेकिन अमित…
तुम जरा सोचो ना…
जब नीचे बीच पर जब हम पानी में मस्ती कर रहे थे…
लहरों में नहा रहे थे…
पब्लिक के बीच…
सबके सामने…
वो सही था या गलत?
मैं तो तुम्हारे लिए ही कर रही थी…
ताकि सबको लगे हम पति-पत्नी हैं…
अपशकुन न हो… और तुम?
तुम्हें तो मजा आया था ना?
वो फोटोज…
तुम खुद ही ऐसी पोज़ बनवा रहे थे…
असलम जी के साथ मेरी…
वो भी सही था या गलत?
अगर बीच पर पब्लिक में नहाना सही था
, तो शावर में साथ नहाना…
वो भी सफाई का बहाना…
वो गलत क्यों?
जान… मैं तो बस तुम्हारी खुशी के लिए झूठ बोल रही हूँ…
तेरी लंबी उम्र के लिए…
हमारी शादी बचाने के लिए…
और तू…
हर बार ये शक…
हर बार ये सवाल…
मुझे कितना दुख होता है…
जैसे तू मुझे विश्वास ही न करे…”
उसके शब्दों में वो शुगर-कोटिंग थी—मीठी, लेकिन तर्कपूर्ण,
जैसे वो मुझे दोषी ठहरा रही हो बिना चिल्लाए। बीच पर नहाना…
फोटोज… हाँ…
वो सही कह रही है… ‘
मैं ही छोटा सोच रहा हूँ… मेरी गलती है…
’ मन में गिल्ट उठा,
शक हल्का सा कम हुआ,
आँखें नम हो गईं।
“सॉरी… सॉरी खुशबू जी… मैं… बस…”
खुशबू ने थोड़ा गुस्से का टोन लिया
नहीं चिल्लाकर,
लेकिन आँखों में वो चमक आ गई,
जैसे वो मुझे हल्का-सा दर्द दे रही हो,
लेकिन प्यार से।
“अरे अमित… मुझे तो ये समझ में नहीं आता… तुम्हारे छोटे से दिमाग में ये बात क्यों घुस नहीं रही?
हर बार ये क्यों भूल जाते हो कि मैं और असलम जी यहाँ पति-पत्नी हैं?
दिखावे में…
लेकिन जाहिर-सी बात है,
थोड़ा-बहुत तो उसके हिसाब से बर्ताव करेंगे ही ना
! बीच पर पब्लिक में नहाना सही था,
फोटोज खिंचवाना सही था…
तो शावर में साथ नहाना…
वो भी बस नहाने के लिए…
वो गलत क्यों?
अगर असलम जी मेरे ‘पति’ हैं, तो बाथरूम शेयर करना…
वो भी सफाई का बहाना…
इतना बड़ा मुद्दा क्यों बना देते हो?
मैं तो तुम्हारी खुशी के लिए झूठ बोल रही हूँ…
अपशकुन से बच रही हूँ…
और तुम?
हर बार शक… हर बार ये सवाल…
मुझे कितना दुख होता है जान…
जैसे तू मुझे विश्वास ही न करे…
तेरी आँखों में ये देखकर मेरा दिल टूट जाता है… तू मेरा पति है…
मैं तेरी बीवी…
लेकिन ये दिखावा…
ये झूठ… सब तेरे लिए ही तो…”
उसके गुस्से में वो दर्द थ
आँखें नम, आवाज़ काँपती हुई—जैसे वो सच में रोने वाली हो।
मुझे लगा जैसे मैंने उसे चोट पहुँचा दी है
। ‘हाँ… हर बार भूल जाता हूँ… वो पति-पत्नी हैं दिखावे में… मेरी गलती है… मैं ही छोटा सोच रहा हूँ…’
शक और कम हुआ, गिल्ट जगह ले रहा था,
सीने में एक भारीपन आ गया—
जैसे मैंने अपनी ही बीवी को दुख दिया हो।
आँखें नम हो गईं
, “खुशबू जी… सॉरी… मैं… मैं बेवकूफ़ हूँ… तुम सही कह रही हो…”
खुशबू ने तुरंत टोन बदला, फिर से मीठा कर दिया
मेरे हाथ सहलाते हुए, आँखों में वो ममता लौट आई।
“अरे जान… दुखि मत हो… कोई बात नहीं… लेकिन और एक बात…
जय ने तुझे ये नहीं बताया कि जब मैं बाहर निकली थी, तब मैं ब्रा-पैंटी पहन थी ना?
तो मैं पूरी नंगी तो नहीं नहाई होगी असलम जी के साथ… ब्रा पैंटी तो मैंने पहनी ही हुई थी ना यार
बस… साथ शावर लिया…
सफाई का बहाना…
ताकि रिसोर्ट वाले शक न करें।
और असलम जी?
वो मेरे साथ इतनी फोटोज खिंचवा रहे थे…
बीच में पानी में एंजॉय कर रहे थे…
लहरों में मस्ती…
तो क्या मैं उनके साथ शावर शेयर नहीं कर सकती?
इतनी भी समझ नहीं आती तुम्हें?
वो मेरे ‘पति’ हैं… तो थोड़ा-बहुत तो होना ही चाहिए ना…
सब तुम्हारी खुशी के लिए…
हमारी शादी बचाने के लिए…
तू तो मेरा सबसे प्यारा है… मेरा सहारा… मैं बिना तेरे के कुछ नहीं…”
अब से तू अपना रोल अच्छे से निभाना…
बिना शक, बिना सवाल…
मैं और असलम जी पति-पत्नी हैं—
दिखावे में… तो हम वैसा ही बर्ताव करेंगे…
और तू…
हमारा फोटोग्राफर…
हमारा हेल्पर…
हमारा… वो जो भी कहें
, वैसा करेगा…
बिना एक शब्द के…
समझा?
ये हमारी शादी के लिए… तेरी खुशी के लिए… वरना…
सब बर्बाद हो जाएगा…
तुम बस अपना काम कर ना … नीचे रह कर … हम ऊपर… ....तुम हमारी सर्विस कर…
बिना सोचे…
ये तेरा रोल है अब… "


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