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Adultery हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)
#22
भाग ~ ०५




"हां काका ये तो बढ़िया है।" मैंने कहा─"तो अभी जा रहे हो क्या तुम।"


"हां...बस इन मवेशियों को चारा भूसा दे दूं फिर निकलता हूं।"

काका की बात सुन कर मैं मन ही मन ये सोच कर खुश हो गया कि अब मैं रात में काकी से सब कुछ जान लूंगा। इसके साथ ही खुशी खुशी मैं ये भी सोचने लगा कि काकी से मुझे और क्या क्या जानने को मिल सकता है। जाने क्यों मैं अजीब अजीब सी कल्पनाएं करने लगा।

गतांग से आगे...........



दशरथ काका को दो बेटियां थी। बड़ी बेटी उमर में मेरी बहन अनीता से एक साल छोटी थी और उनकी दूसरी बेटी करीब ढाई साल छोटी थी। काका काकी को कोई बेटा नहीं था। काकी का दो बार पेट खराब हुआ था जिससे उनको बहुत तकलीफ हुई थी। शहर के डॉक्टर ने सलाह दी थी कि कुछ साल तक वो बच्चे पैदा करने का न सोचें। इस बात को अब कई साल हो गए थे मगर अब काकी को बच्चा ही नहीं हो रहा था। पता नहीं क्या गड़बड़ी थी जिससे उनको बच्चा नहीं हो रहा था। वैसे मुझे इस बारे में ज्यादा पता नहीं था....बाकी घर वालों को शायद सच पता हो।

खैर दशरथ काका मवेशियों को चारा भूसा डाल कर मेरे सामने ही घर से चले गए थे। मंजू काकी को उन्होंने मेरे सामने ही बताया था कि मैं आज रात उनके साथ घर में रहूंगा इस लिए उन्हें फिक्र करने की जरूरत नहीं है।

वैसे तो फिक्र करने जैसी कोई बात ही नहीं थी क्योंकि बगल से ही श्यामू काका का घर था तो वो भी देखरेख कर सकते थे। मगर ये भी था कि वो अपने घर के अंदर ही रहते और रात सो जाने के बाद कहां किसी को कुछ खयाल रहता है। शायद यही सोच कर मझले काका ने मुझे अपने घर पर सोने के लिए कहा था।

काका के जाने के बाद मैं काकी के साथ ही घर के अंदर आ गया था। जब से काकी और बापू के संबंधों का मुझे पता चला था तब से काकी के प्रति मेरा नजरिया और मेरे खयाल बदल गए थे। पहले उनसे सामना होने पर झिझक होती थी लेकिन अब ऐसा नहीं था।

"तुमने किसी को उस बारे में बताया तो नहीं न।" अन्दर आते ही काकी ने सबसे पहले यही पूछा मुझसे।

"मैंने किसी को नहीं बताया काकी।" मैंने कहा─"इतना मुझे भी पता है कि ऐसी बातें किसी को बताना अच्छा नहीं होता।"

"सही कहा तुमने।" काकी बोलीं─"ऐसी बातें कभी भूल कर भी किसी को नहीं बताना चाहिए वरना बहुत बड़ा अनर्थ हो जाता है। इंसान की बदनामी होती है और माथे पर कलंक लग जाता है। गांव समाज के लोग ऐसे इंसान का जीना हराम कर देते हैं।"

"अगर ये इतना भयानक है तो तुमने और बापू ने क्यों किया था ऐसा।" मैंने कहा─"ऐसा करने से पहले इस सबके बारे में क्यों नहीं सोचा था काकी।"

"बस ये समझ लो राजू कि हमारी मति मारी गई थी।" काकी ने सिर झुका कर कहा─"उस वक्त बस यही लग रहा था कि हम जो कर रहे हैं सही कर रहे हैं।"

"तो बताओ काकी।" मैंने उत्सुक हो कर पूछा─"फिर आगे क्या हुआ था बापू और तुम्हारे बीच।"

"अभी नहीं राजू।" काकी ने गहरी सांस ली─"अभी तुम्हें वापस अपने घर जाना पड़ेगा। ऐसे में वो कहानी फिर से बीच में रुक जाएगी। तुम एक काम करो....घर जाओ और जीजी को ये बता कर आओ कि आज रात तुम मेरे घर में ही सोओगे। जीजी पूछें तो उन्हें बता देना कि तुम्हारे काका नाहरपुर तुम्हारी छोटी बहनों को लेने गए हैं।

"ठीक है काकी।"

"और हां...खाना मत खाना।" मैं जैसे ही जाने के लिए पलटा तो पीछे से काकी ने कहा─"वापस आ कर मेरे साथ ही खाना खाना।"

मैंने हां में सिर हिलाया और झट से अपने घर की तरफ निकल गया। इस बार मेरी रफ्तार तेज हो गई थी क्योंकि वापस आ कर काकी से सब कुछ जानने की जल्दी थी।

घर पहुंच कर मैंने मां को सब कुछ बताया। जब उसने मुझे जाने की इजाजत दे दी तो मैं बड़ी तेजी से वापस काकी के घर की तरफ लगभग दौड़ ही पड़ा।

रात का अंधेरा फैलने लगा था। वैसे तो गर्मियों में गांव के सब लोग घर के बाहर खाली पड़ी जमीन पर या फिर घर के अंदर आंगन में खाट बिछा कर सोते थे। लेकिन आज क्योंकि काका नहीं थे और काकी मुझे अपना जो किस्सा बताने वाली थीं वो आंगन में होने की वजह से किसी के कानों तक न पहुंच जाए इस लिए खाट को अंदर बरोठ में बिछा दिया था हमने।

खैर सबसे पहले हमने खाना खाया। फिर काकी ने बर्तन धोए ताकि सुबह वो जल्दी से नाश्ता बना खा कर खेतों में कटाई करने जा सकें। सारा काम निपटा कर वो बरोठ में बिछी अपनी खाट पर आ कर बैठ गईं। 

बरोठ में गर्मी लग रही थी इस लिए मैंने अपनी कमीज उतार कर खाट के सिरहाने रख दिया था। मैं कमर से ऊपर पूरा नंगा था जबकि नीचे छोटा सा पेंट पहने था। उधर काकी को भी गर्मी लग रही थी मगर वो मेरी तरह ऊपर से नंगी हो सकती थीं। अपनी गर्मी को दूर करने के लिए उन्होंने बांस का एक पंखा ले लिया था जिसको धौंक कर वो अपने ऊपर हवा कर रहीं थी।

"आज कुछ ज्यादा ही गर्मी है न।" काकी ने धोती के पल्लू से अपने चेहरे का पसीना पोंछते हुए कहा─"मैं तो पसीने में पूरा भीग ही गई।"

"तुम अपनी धोती उतार दो काकी।" मैंने कहा─"बदन में थोड़ा हवा लगेगी तो इतनी गर्मी नहीं लगेगी।"

"मेरा तो मन करता है कि धोती ब्लाउज सब उतार कर फेंक दूं।" 

काकी ने शायद गर्मी से परेशान हो कर कहा मगर उनके ऐसा कहने पर मैं चौंक पड़ा।

"ये क्या कह रही हो काकी।" मैंने हैरान हो कर कहा─"क्या मेरी तरह तुम भी ऊपर से नंगी हो जाओगी।"

"तुम न होते तो हो भी जाती।" काकी इस बार जाने क्या सोच कर मुस्कुराईं─"पर तुम हो तो ऐसा नहीं कर सकती।"

"क..क्यों भला।" 

मैंने भोलापन दिखा कर कहा। ये अलग बात है कि एकाएक ही मेरी धड़कनें तेज हो गईं थी।

"क्योंकि तुम अब बड़े हो गए हो।" काकी गहरी नजरों से मुझे देख बोलीं─"मुझे उस हालत में देख कर अगर तुम्हारे मन में गलत विचार आ गया तो.....तो क्या करूंगी मैं।"

"ये...ये क्या कह रही हो तुम।" मैं एकदम से चौंक पड़ा।

"ज्यादा भोले न बनो राजू।" काकी फिर से मुस्कुराईं─"मुझे पता है कि तुम इतने भी भोले नहीं हो।"

"अच्छा ये छोड़ो।" मैं पहले तो सकपकाया फिर बात बदल कर बोला─"और आगे का किस्सा बताओ। मैं सब कुछ जानना चाहता हूं और हां कुछ मत छुपाना मुझसे....हां।"

काकी ने बड़े गौर से देखा मुझे। थोड़ी देर तक पता नहीं क्या सोचती रहीं। फिर एक गहरी सांस ली।

#######

"तुम्हारे बापू समझ गए थे कि उनके द्वारा इस तरह तारीफें करने से मुझे अब अच्छा लगने लगा था।" मंजू काकी ने आगे का किस्सा सुनाना शुरू किया─"इस लिए उनकी हिम्मत और बढ़ गई थी। अब वो और भी ज्यादा मुझे लुभाने लगे थे।"

"कि...किस तरह लुभाने लगे थे वो।"

"पहले तो वो मेरी तारीफें ही कर रहे थे।" काकी ने बताया─"लेकिन अब कहने लगे थे कि मेरी नाक में इस छोटे से फूल की जगह अगर एक सोने की नथ होती तो मेरी सुंदरता में चार चांद लग जाते।"

"क...क्या सच में।" मेरी आँखें फैलीं।

"हां....उनकी ये बात सुन कर मैं और भी पिघल गई।" काकी ने आगे बताया─"झट से मेरे मन में खयाल उभरा कि क्या सच में ऐसा हो सकता है। तभी वो बोले....मंजू मैं कल ही तेरी इस सुंदरता को बढ़ाऊंगा।"

"म..मतलब....कैसे।" मैं चकरा गया।

"मेरे मन में भी यही सवाल उभरा था।" मंजू काकी ने कहा─"लेकिन मेरे बिना पूछे ही उन्होंने बताया कि वो कल सुनार के यहां से मेरे लिए एक सोने की नथ खरीद कर लाएंगे। मेरे लिए ये बहुत बड़ी बात हो गई थी। आज तक तुम्हारे काका ने ऐसा कुछ ला कर नहीं दिया था। मेरे बहुत झगड़ने पर एक बार वो छोटा सा फूल ले कर आए थे जिसे इस वक्त मैं पहन रखी हूं।"

मैंने देखा काकी अपनी नाक में सचमुच एक फूल पहने हुए थीं जो सोने का ही लग रहा था।

"औरत अगर सम्हलना न चाहे और वो दिमाग से न सोचे तो समझो ऐसे ही पिघल जाती है वो।" काकी ने आगे कहा─"तुम्हारे बापू मुझे पिघलाना ही तो चाहते थे और मैं सचमुच पिघलती जा रही थी। मुझे चुप देख और कोई विरोध न करता देख उनकी हिम्मत और बढ़ गई। वो समझ चुके थे कि अब अगर वो मेरे साथ कुछ उल्टा सीधा भी करने लगेंगे तो शायद मैं विरोध नहीं करूंगी।"

"तो क्या सच में तुमने उनका विरोध नहीं किया था।" मैंने पूछा।

"कैसे करती और क्यों करती राजू।" काकी ने कहा─"वो पूरी कुशलता से एक औरत की सुंदरता का बखान कर रहे थे। मुझे रानी की तरह रखने को बोल रहे थे। मेरे लिए सब कुछ करने की बात कह रहे थे तो भला ऐसे में कैसे उनका विरोध करती मैं। हां तुम ये कह सकते हो कि ऐसा एक सच्चे चरित्र वाली औरत कभी न करती। बल्कि वो ये करती कि उसी वक्त उस गैर मर्द को खरी खोटी सुनाती और अपने घर से चले जाने को कह देती। अगर इतने पर भी वो गैर मर्द मनमानी ही करता तो अपनी लाज बचाने के लिए वो शोर मचा देती.....मगर मैं ऐसी औरत नहीं थी शायद। तभी तो ऐसा कुछ भी नहीं किया था मैंने। मतलब मैं उस वक्त उनकी प्रेम भरी बातों में आ गई थी। उनकी रंगीन बातों के जाल में फंसती जा रही थी। इससे भी ज्यादा ये कि मैं अपने अंदर ऐसी चाहत करने लगी थी कि काश ऐसा सच में ही हो जाए।"

मैं भौचक्का सा देख रहा था काकी को। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि ऐसा सच में हो चुका है।

"मंजू....मेरी प्यारी मंजू कुछ बोल न मुझसे।" उधर काकी आगे का किस्सा सुना रहीं थी─"जेठ जी ने जब इतने प्यार से मुझे पुकारा तो मैं स्वप्नलोक से बाहर आई और उन्हें देखने लगी। उनकी आंखों में मुझे अपने लिए प्रेम ही प्रेम दिख रहा था। पहले मैं उनसे नजरें नहीं मिला पा रही थी लेकिन अब एकटक उनकी आंखों में ही देखे जा रही थी। अपने अंदर मुझे अजीब सा मीठा एहसास हो रहा था। तभी अचानक वो हुआ जिसकी उस वक्त मैंने कल्पना तक नहीं की थी।"

"क...क्या....क्या हुआ था।" 

मारे उत्सुकता के मैं पूछ बैठा। दिल की धड़कनें एकदम से तेज हो गईं।

"उन्होंने एकदम से अपना चेहरा आगे बढ़ाया और फिर मेरे गाल को चूम लिया।" मंजू काकी ने बताया─"उनके ऐसा करते ही मैं बुरी तरह कांप गई। आश्चर्य और अवाक सी हो कर उन्हें देखती रह गई। कुछ बोल ही न सकी मैं...जबकि उन्होंने कहा...तू इतनी प्यारी और सुंदर है कि मैं तुझे चूमने से खुद को रोक ही नहीं पाया मेरी प्यारी मंजू। तूने इसका बुरा तो नहीं माना न।"

"क्या सच में तुम्हें बुरा नहीं लगा था काकी।" 

मैंने हैरत से आँखें फाड़े मंजू काकी से पूछा।

"बस अजीब लगा था राजू।" काकी ने कहा─"उनसे मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी इस लिए बहुत अजीब लगा था मगर हां....बुरा नहीं लगा था। क्योंकि चूमने के बाद जो बात उन्होंने कही थी वो सीधा मेरे दिल में उतर गई थी। एक बार फिर से ये सोच कर मेरे अंदर मीठा एहसास होने लगा था कि कितनी खुशनसीब हूं मैं कि मेरे अपने ही जेठ मुझ पर लट्टू हो चुके हैं। मतलब मुझमें इतनी बड़ी बात है कि वो खुद को रोक ही नहीं पा रहे हैं। अचानक इस खयाल ने मुझे थोड़ा मायूस कर दिया कि काश तुम्हारे काका भी ऐसे होते। काश वो भी दिल में उतर जाने वाली ऐसी मीठी बातें करते और मेरी तारीफें करते। ये सब सोच कर बुरा तो लगा मगर क्या कर सकती थी। शायद यही मेरे नसीब में था। मगर उस वक्त जो खुशनसीबी की बरसात हो रही थी उसमें अब मैं भीग जाना चाहती थी। मेरा मन कर रहा था कि मैं खुद को अब जेठ जी के हवाले कर दूं।"

"तो क्या सच में ऐसा कर दिया तुमने।"

"शायद कर ही देती...अगर उसी समय घर में किसी के आ जाने का आभास न हुआ होता।" काकी ने बताया─"थोड़ी मायूसी तो हुई थी लेकिन ये अच्छा ही हुआ था क्योंकि खुले आसमान के नीचे जिस हालत में मैं जेठ जी की बाहों में थी उस हालत में अगर कोई देख लेता तो बहुत बड़ी आफत हो जाती। खैर मेरी छोटी बिटिया रानी आ गई थी इस लिए जल्दी ही हम दोनों सम्हल गए। जेठ जी ने जल्दी से मुझे कमरे में पहुंचाया और फिर जमीन पर आहिस्ता से खड़ा कर दिया। रानी बाहर आंगन में खेलने लगी थी। इधर मेरी हालत फिर से खराब और अजीब हो गई थी क्योंकि मेरा गीला साया फिर से मेरी छातियों से फिसल गया था और मेरी दोनों छातियां जेठ जी के सामने उजागर हो गईं थी। शर्म तो बहुत आई लेकिन अब क्या कर सकती थी। मैंने जल्दी से साए को ऊपर खींच कर अपनी नंगी छातियों को उनसे छुपाना चाहा मगर तभी जेठ जी ने मेरा हाथ पकड़ लिया।"

"क...क्या????? मतलब...मतलब ऐसा क्यों किया बापू ने।"

मैं एकदम से झटका खा कर पूछ बैठा काकी से।

"मैं भी ऐसे ही झटका खा गई थी।" काकी ने कहा─"मैंने जब हड़बड़ा कर उन्हें देखा तो वो बोले.....क्यों इतनी खूबसूरत चीज को मुझसे छुपा रही है मंजू। कुछ देर देख लेने दे न मुझे। इन खूबसूरत पर्वत शिखरों को अपनी आंखों में बसा लेने दे न।"

"क्या...बापू ने सच में ऐसा कहा।" मैंने चकित हो कर पूछा।

"हां राजू ऐसा ही कहा था उन्होंने।" काकी ने कहा─"मेरे दिमाग ने तो काम ही करना बंद कर दिया था। सपने में भी नहीं सोचा था कि जेठ जी ऐसे मिजाज के होंगे। ऐसी रंगीन और मीठी बातें करते होंगे।"

"फिर तुमने क्या किया।"

"मुझे कुछ करने का मौका ही कहां मिल रहा था राजू।" मंजू काकी ने बताया─"अभी तो में उनकी उसी बात पर खुद को सामान्य बनाने में लगी थी कि अगले ही पल उन्होंने एक और गजब कर दिया।"

"क...क्या.....ऐसा क्या कर दिया था बापू ने।"

मेरी धड़कनें एकाएक तेज तेज चलने लगीं थी। मन ही मन हैरान था कि मेरे बापू ये क्या क्या कर रहे थे काकी के साथ।

"इससे पहले कि मैं कुछ सोच समझ पाती।" उधर काकी ने आगे बताया─"तुम्हारे बापू तेजी से आगे बढ़े। फिर एकदम से मेरी दोनों छातियों को उन्होंने अपने दोनों हाथों में थाम लिया और फिर बारी बारी से मेरे दोनों निप्पल को मुंह में भर कर चूस लिया। उसके बाद झट से पीछे हो गए।"

"क..क्या????? म...मतलब...ये क्या कह रही हो तुम।"

काकी की बात सुनते ही मैं बुरी तरह उछल पड़ा था। मारे आश्चर्य के मेरा मुंह खुला का खुला रह गया था। अगर यही बात किसी और ने मुझे बताई होती तो मैं किसी कीमत पर भरोसा न करता मगर ये बात काकी खुद बता रहीं थी इस लिए भरोसा करना मजबूरी बन गई थी। मैं सोचने लगा कि काकी अपने बारे में भला इतना बड़ा झूठ क्यों बोलेंगी। मेरी नजरों में वो खुद को इस तरह क्यों गिराएंगी।

"हां राजू यही सच है।" तभी मंजू काकी ने कहा─"उस वक्त जब तुम्हारे बापू ने ये गजब किया था तो डर के मारे मेरी चीख ही निकल गई थी। बड़ी मुश्किल से मुंह में हथेली रख कर अपनी चीख को दबाया था। फिर जल्दी से साया को ऊपर खींच कर अपनी नंगी छातियों को छुपा लिया था। मुझे जेठ जी से ऐसे दुस्साहस की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि दो ही पलों में उन्होंने कितना बड़ा गजब कर दिया है मेरे साथ। भय से थरथर कांपे जा रही थी मैं।"

"मुझे भी यकीन नहीं हो रहा काकी।" मैं बोल पड़ा─"सच में बापू ने गजब ही कर दिया था। अच्छा फिर आगे क्या हुआ।"

"इस सबके बाद उस दिन फिर कुछ और नहीं हुआ।" काकी ने गहरी साँस ले कर कहा─"मेरी छोटी बेटी रानी आंगन में ही खेल रही थी और बड़ी बेटी सुनीता भी किसी भी वक्त आ सकती थी। इस लिए जेठ जी ने फिर और कुछ नहीं किया था और चले गए थे मगर जाते जाते ये जरूर कह गए थे कि वो कल मेरे लिए सोने की नथ ले कर आएंगे। मैं कोई जवाब देने की हालत में ही नहीं थी इस लिए चुप ही रही। खैर उनके जाने के बाद मैंने राहत की सांस ली। किसी तरह कपड़े पहने और घर के काम में लग गई। घुटने का दर्द थोड़ा कम हो गया था इस लिए ज्यादा परेशानी नहीं हो रही थी मगर सारा दिन मेरे दिलों दिमाग में वही सब चलता रहा था। मैं कितना भी कोशिश करती उस सबको भुलाने की मगर हर बार वही सब याद आता। कभी कभी ये भी सोचने लगती कि क्या मुझे इस बारे में तुम्हारे काका को बता देना चाहिए। फिर सोचती कि नहीं....मुझे उनको कुछ नहीं बताना चाहिए वरना नाहक में उनका अपने बड़े भाई के साथ क्लेश हो जाएगा। दूसरी बात ये भी थी कि कहीं न कहीं मेरे मन में ये भी था कि....एक बार देखना चाहिए कि जेठ जी सच में क्या वैसा करते हैं जो मुझसे कह कर गए हैं। ये भी तो हो सकता है कि उन्होंने उस वक्त वैसा मौका देख कर मुझसे वो सब झूठ ही कहा हो।"

"तो क्या फिर तुमको पता चला इस बात का।"

"हां दूसरे ही दिन जेठ जी घर पर आ गए थे।" मेरी उम्मीद के विपरीत काकी ने बताया─"मुझे तो भरोसा ही नहीं हो रहा था कि वो सच में आ गए हैं।"

"जब वो आए थे तब उस वक्त क्या मझले काका घर पर नहीं थे।"

"वो खेतों पर थे।" काकी ने कहा─"असल में जेठ जी ने वक्त ही ऐसा चुना था घर पर आने का। उन्हें पता था कि उनके मझले भाई दोपहर से पहले घर नहीं लौटेंगे। संजोग से उस वक्त मेरी दोनों बेटियां भी घर पर नहीं थी। वो दोनों पड़ोस में रहने वाली सरला के साथ नदी में नहाने चली गईं थी। सिर्फ मैं ही थी घर पर। उस वक्त मैं रसोई में खाना बना रही थी। जब मैंने तुम्हारे बापू को देखा तो एकदम से घबरा गई थी। ये सोच कर दिल की धड़कनें बढ़ गईं थी कि जाने आज वो क्या बोलने वाले हैं और जाने क्या करने वाले हैं।"

"क्या वो कुछ गलत करने के इरादे से आए थे।" मैंने धड़कते दिल से पूछा।

"लगा तो मुझे भी यही था।" मंजू काकी ने बताया─"इसी लिए तो उन्हें देख के घबरा गई थी मैं। उस वक्त घर में कोई नहीं था तो ये भी लग रहा था कि कहीं कोई आ न जाए और गलत सोच ले। खैर मैंने डरते हुए धीमे से पूछा कि आप क्यों आए हैं जबकि घर में कोई नहीं है। जवाब में उन्होंने अपने कुर्ते के जेब से एक डिब्बी निकाली और मेरे पास आ कर कहा...मैं अपना वादा पूरा करने आया हूं मेरी प्यारी मंजू। देख ले मैं तेरे लिए सोने की नथ ले कर आया हूं।

"क्या सच में?????" मैं आश्चर्य से बोला।

"हां राजू।" काकी ने कहा─"मुझे भी बड़ा आश्चर्य हुआ था और ये सोच कर झटका भी लगा था कि सच में उन्होंने वो किया था जो पिछले दिन बोल कर गए थे। अचानक मेरे मन में खयाल उभरा कि....इसका मतलब वो मुझसे प्रेम का झूठा दिखावा नहीं कर रहे थे। मतलब उन्होंने मुझसे जो जो कहा था वो सब दिल से ही कहा था। मेरे प्रति प्रेम होने की वजह से कहा था। सच कहती हूं राजू...उस वक्त जब मुझे ये एहसास हुआ तो एकदम से मैं अंदर ही अंदर खुशी से झूम उठी थी। एक बार भी ये नहीं सोचा कि ये जो हो रहा है वो सही नहीं है। बल्कि यही लगने लगा था कि जिस तरह जेठ जी ने मुझे अपने प्रेम का सबूत दे दिया है वैसे ही अब मुझे भी उनको जताना चाहिए कि मेरे मन में भी उनके लिए कुछ है।"

"क्या सच में तुम्हारे मन में ऐसा कुछ था काकी।" मैंने हैरानी से मंजू काकी की तरफ देख कर पूछा।

"हां राजू।" उन्होंने कहा─"तुम ही सोचो कि अगर ऐसा न होता तो क्या मैं उस सबको इस तरह बिना कोई विरोध किए कबूल करती चली जाती। मतलब कुछ तो था ही न मेरे मन में। तभी तो मैं जेठ जी के किसी भी बर्ताव पर गुस्सा नहीं हो रही थी। तभी तो मैं उस सबके बारे में तुम्हारे बापू से कुछ कह नहीं रही थी।"

"हां सही कह रही हो तुम।" मैंने सहमति में सिर हिलाया─"तो फिर तुमने आगे क्या किया था।"

"जब जेठ जी ने डिब्बी में बंद सोने की नथ मुझे दी तो मैंने उसे धीरे से उठा लिया।" काकी ने बताया─"उस वक्त मैं उनके सामने घूंघट किए हुए थी इस लिए मैं बेझिझक खुशी से मुस्कुराए जा रही थी और वो मेरा खुशी से मुस्कुराना नहीं देख सकते थे। मैंने उसी खुशी से डिब्बी को खोला तो उसके अंदर सच में एक बहुत ही सुंदर सोने की नथ मौजूद थी। उसे देख मेरे बदन का रोम रोम सिहर उठा था। तभी जेठ जी बोले...एक बार इस नथ को अपनी नाक में पहन कर मुझे दिखा मंजू। मैं देखना चाहता हूं कि इस नथ को पहनने के बाद मेरी मंजू कितनी प्यारी और कितना सुंदर दिखती है। उनकी ये बात सुन कर फिर से मेरा रोम रोम सिहर उठा। ये सोच कर धड़कनें बढ़ गईं कि कैसे मैं उनकी इस चाहत को पूरा कर पाऊंगी। वैसे तो मेरा मन यही करना चाह रहा था मगर एक झिझक थी जिसकी वजह से ऐसा करने की हिम्मत नहीं हो रही थी।"

"तो क्या फिर तुमने उस नथ को सच में नहीं पहना था।"

"ऐसा कर ही नहीं सकती थी मैं।" काकी ने लंबी सांस खींच कर कहा─"मैं भला उस इंसान का कैसे दिल तोड़ देती जिसने मुझे ये एहसास कराया था कि मेरी कितनी अहमियत है....मैं कितनी सुंदर हूं। और तो और किस कदर मैं उनके दिलो दिमाग में छा गई हूं। उन्होंने सच्चे दिल से अपना वादा निभाते हुए नथ ला कर दी थी तो कैसे मैं उसे पहनने से इंकार कर देती। वैसे भी वो नथ कोई मामूली नथ नहीं थी। बल्कि सोने की नथ थी जिसे मेरे जेठ जी अपने प्रेम की निशानी के रूप में मेरे लिए लाए थे।"

"मतलब तुमने उस नथ को पहना था।" जाने क्यों मुझे उनकी इस बात से मायूसी हुई।

"हां उसे तो पहनना ही था राजू।" मंजू काकी बोलीं─"उस वक्त मेरा दिल और मेरा जमीर यही चाहता था कि मैं अपने जेठ जी की खुशी के लिए वो नथ पहन लूं और फिर उन्हें दिखाऊं। मैंने उसी वक्त खाना बनाना छोड़ा और रसोई से निकल कर कमरे की तरफ चल पड़ी। पहले तो लगा था कि पीछे पीछे कहीं जेठ जी भी न चले आएं मगर वो बाहर ही खड़े रहे थे। इधर कमरे में आ कर मैंने नाक से अपने इस फूल को निकाला और फिर तुम्हारे बापू की लाई उस नथ को पहन लिया। उसके बाद जब मैंने शीशे में खुद को देखा तो उस नथ को पहने मैं अलग ही दिख रही थी। सच में वो नथ उस छोटे फूल से कहीं ज्यादा सुंदर और अनोखी लग रही थी। शीशे में खुद को देखते हुए मैं सोचने लगी कि अब कैसे घूंघट हटा कर मैं नथ पहने खुद को जेठ जी को दिखाऊंगी। मुझे अब बहुत ज्यादा शर्म आने लगी थी। तभी बाहर से जेठ जी की आवाज आई। वो पूछ रहे थे कि क्या मैंने नथ पहन लिया है और अगर पहन लिया है तो अब जल्दी से बाहर आ कर उन्हें दिखाऊं।"

"काफी मस्त कहानी है काकी।" मैं न चाहते हुए भी बोल पड़ा─"फिर आगे क्या हुआ। क्या फिर तुमने कमरे से बाहर निकल कर बापू को नथ दिखाया।"

"बाहर जाने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी राजू।" मंजू काकी ने कहा─"दिल की धड़कनें बढ़ी हुई थीं। अन्दर से जी घबरा रहा था। मन में तरह तरह के विचार आ रहे थे। ये भी डर लग रहा था कि कहीं कोई आ न जाए। जब मैं काफी देर तक कमरे से बाहर न निकली तो जेठ जी मानो बेचैन हो उठे थे। एक बार फिर से उन्होंने आवाज दी मुझे मगर जब मैं फिर भी बाहर न निकली तो शायद वो ये समझे कि मैं ही उन्हें अंदर आने का इस तरह से इशारा कर रही हूं।"

"क..क्या??? मतलब...क्या फिर वो कमरे में ही आ गए थे।" मैंने हैरानी से पूछा।

"हां राजू।" काकी ने कहा─"जब वो एकदम से कमरे में ही आ गए तो मैं बुरी तरह घबरा गई। डर के मारे होश उड़ गए थे मेरे। मुझे सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि वो इस तरह कमरे में ही आ धमकेंगे। मेरी अजीब सी हालत देख वो बोले....माफ करना...जब तू बाहर नहीं निकली तो मुझे लगा शायद तू मुझे ही उस तरह अंदर बुलाने का इशारा कर रही है। तू कुछ बोल भी तो नहीं रही थी। कमरे का दरवाजा खुला हुआ था इस लिए अंदर सब कुछ साफ दिख रहा था। मैंने घबरा कर जल्दी से घूंघट कर लिया था इस लिए वो मेरा चेहरा नहीं देख सकते थे। एकाएक मुझे ये खयाल आया कि ये कैसी अजीब स्थिति हो गई है। मतलब कि मैं अपने कमरे में घूंघट किए खड़ी थी और वो कमरे में आ कर अब इस बात का इंतजार कर रहे थे कि कब मैं अपना घूंघट हटा कर उन्हें चेहरा दिखाऊं। ये बिल्कुल वैसा ही था जैसे ब्याह के बाद पहली रात को नई नवेली दुल्हन कमरे में खाट पर घूंघट किए बैठी अपने मरद के आने का इंतज़ार कर रही होती है। इस खयाल के आते ही मेरा पूरा बदन थरथरा गया। मैंने सोचा कहीं ऐसा ही तो नहीं हो जाएगा मेरे साथ क्योंकि उस वक्त कुछ ऐसी ही परिस्थितियां बन गई थी।"

"फिर???"

"अब ऐसे तो न तरसा मेरी प्यारी मंजू।" काकी ने आगे बताना शुरू किया─"अचानक जेठ जी की ये बात सुन कर मैं अंदर तक कांप गई लेकिन जिस मनमोहक अंदाज में उन्होंने ऐसा कहा था उसे सुन कर मेरा रोम रोम खुशी से नाच उठा था। मन किया कि झट से घूंघट हटा कर अपने उस दीवाने को चेहरा दिखा दूं मगर शर्म और झिझक के कारण ऐसा नहीं कर पाई थी मैं। तभी मुझे महसूस हुआ कि वो मेरी तरफ धीरे धीरे बढ़ने लगे हैं। ये देख मैं फिर से घबरा उठी और मेरी धड़कनें तेज हो गईं। मन में खयाल उभरा कि अब क्या करूं। कैसे इस विकट स्थिति से खुद को बचाऊं। उधर वो एकदम मेरे पास आ गए। फिर अचानक से बोले....तू बहुत जालिम है मेरी प्यारी मंजू। क्यों अपने इस दीवाने को इतना तरसा रही है। क्यों अपने इस आशिक को तू अपना ये चांद जैसा चेहरा नहीं दिखा रही है। तू बोल तो इसके लिए तेरे आगे हाथ जोड़ लूं और तुझसे भीख मांगू। इतना कहते ही सच में उन्होंने अपने हाथ जोड़ लिए। मैं हैरान परेशान और भौचक्की सी देख रह गई उन्हें। फिर एकदम से हड़बड़ाहट में मेरे मुंह से निकल गया....ये ये क्या कर रहे हैं जेठ जी। मेरे आगे हाथ जोड़ कर मुझे शर्मिंदा मत कीजिए।"

"फिर???" मैं भौचक्का सा हो कर पूछ बैठा।

"फिर क्या...मैंने इतना कहा और फिर हिम्मत जुटा कर झट से अपना घूंघट ऊपर कर लिया।" काकी ने कहा─"अपने उस दीवाने को अब और ज्यादा तरसाने की हिम्मत नहीं थी मुझमें। कितनी मासूमियत से और कितनी आस लगाए वो मेरा चेहरा देखने के लिए खड़े थे और मैं उन्हें मायूस कर दूं? नहीं राजू....इतनी पत्थर दिल नहीं बन सकती थी मैं। खैर जैसे ही मैंने अपना घूंघट ऊपर किया तो मेरा चेहरा उनकी आंखों के सामने उजागर हो गया। वो बिना पलकें झपकाए एकटक देखने लगे लगे थे मुझे और मैं मारे शर्म के जैसे जमीन पर गड़ जाने वाली थी। लेकिन किसी तरह उनसे नजरें मिलाए रही। मैं चाहती थी कि वो अच्छी तरह से मेरा चेहरा देख लें। तभी अचानक वो आगे बढ़े और झपट कर मुझे अपने सीने से लगा लिया।"

"क्या????" मतलब क्या सच में उन्होंने ऐसा किया।" मैं हैरान रह गया।

"हां राजू उन्होंने ऐसा ही किया था।" काकी ने कहा─"और मैं हक्की बक्की रह गई थी। डर के मारे मेरी चीख निकलते निकलते रह गई थी। उधर मुझे सीने से छुपकाए वो बोले....उफ्फ मंजू...तू सच में बहुत सुंदर है। बहुत नाजुक है। जी करता है इसी तरह सीने से लगा कर तुझे अपने अंदर समा लूं। तुझे देख कर अब मैं खुद को सम्हाल नहीं पा रहा मेरी रानी। मन कर रहा है कि जी भर के तुझे प्यार करूं। जेठ जी जाने क्या क्या बोले जा रहे थे और मैं उनके सीने से लगी झटके खा रही थी। उनकी बातें मेरे हृदय की गहराईयों में उतरती जा रहीं थी। मन में बस यही खयाल था कि आज तक इस तरह का प्यार तो तुम्हारे काका ने भी नहीं किया है मुझे। क्या उन्हें एक पल के लिए भी खयाल नहीं आया होगा कि मैं इसी तरह का प्यार पाने के लायक हूं। एक औरत को अपने मरद से प्यार ही तो चाहिए होता है। वो चाहती है कि उसका मरद जेठ जी की तरह ही उसकी तारीफें करे और उसको अहमियत दे। भले ही बाद में अपनी हवस मिटाने लिए वो उसकी टांगों के बीच जोर जोर से धक्के लगाता रहे।"



जारी है.............
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हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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RE: आप-बीती ~ Truth is Dark - by Rajan Raghuwanshi - 05-01-2026, 07:23 PM



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