04-01-2026, 03:35 PM
भाग ~ ०४
उसके बाद फिर ऐसा मौका ही न मिला था कि काकी से आगे का किस्सा जान सकूं। ऐसे ही बाकी का दिन गुजर गया। दिन डूबने से पहले ही मां और दोनों काकी घर चली गईं। क्योंकि अब उन्हें घर के काम भी करने थे और फिर रात का खाना भी बनाना था।
आम तौर पर मैं खेतों पर ज्यादा रुकता नहीं था बल्कि बबलू के साथ ही इधर उधर घूमता रहता था मगर आज मैं सारा दिन खेतों पर ही रह गया था। आज की घटना से मेरे मन में कहीं और जाने का खयाल ही नहीं आया था।
मकान के अंदर उस छोटे से कमरे में रखी खाट पर लेटा मैं उसी सबके बारे में सोचता रहा था। बार बार मन में खयाल आता कि यही वो कमरा था और यही वो खाट थी जिसके पाट को दोनों हाथों से पकड़े मंजू काकी झुकी हुईं थी और बापू पीछे से अपनी कमर जोर जोर से आगे पीछे करते हुए उनको चोद रहे थे।
हां वो चोद ही तो रहे थे उस वक्त। इतना तो अब मैं जानता ही था कि ऐसे काम को क्या कहा जाता है। ये अलग बात है कि आज से पहले मैंने कभी किसी को इस हालत में नहीं देखा था। बबलू से ही जाना था कि औरत मर्द या लड़का लड़की के इस काम को चोदना कहते हैं। ये भी जाना था कि उन्हें इस काम में बहुत मजा आता है। सारी दुनिया लंड और चूत के लिए पागल है।
मैं सोच रहा था कि काकी और बापू के बीच ये रिश्ता अगर ऐसे शुरू हुआ था तो आगे फिर क्या क्या हुआ होगा उनके बीच। क्या काकी मुझे सब कुछ खुल कर बताएंगी या कुछ बातें छुपा लेंगी मुझसे। मुझे लगा हां काकी ऐसा ही करेंगी। भला वो मुझसे सारी बातें खुल्लम खुल्ला कैसे बता सकती हैं। मतलब कि हमारे बीच के रिश्ते में जो एक मर्यादा है उसका खयाल जरूर रखेंगी वो और अगर नहीं भी रखेंगी तो शर्म झिझक की वजह से खुल कर नहीं बताएंगी।
इस खयाल ने मुझे थोड़ा मायूस सा कर दिया। मैं चाहता था कि काकी मुझे वैसे ही खुल कर बताएं जैसे बबलू मुझे ऐसी गंदी बातें खुल्लम खुल्ला बताया करता है। जब वो सब कुछ खुल्लम खुल्ला बताया करता है तो मुझे उसकी बातों से बड़ा मजा आया करता है। मेरे पूरे बदन में अजीब सी झुरझुरी होने लगती है। मन में मीठी मीठी गुदगुदी होती है। मेरे छोटे से पेंट के अंदर कैद मेरी छोटी सी लुल्ली एकदम से खड़ी हो कर पूरा लंड बन जाती है।
अचानक मैंने महसूस किया कि ये सब सोचते सोचते मेरी लुल्ली खड़ी हो गई है। मतलब कि खड़ी हो कर लंड बन गई है। मैंने एक नज़र दरवाजे की तरफ देखा। किसी को वहां न देख मैंने झट से अपना हाथ लंड पर रख दिया।
सच में वो खड़ा हो गया था। मेरे हाथ रखते ही उसमें सनसनाहट हुई जिससे मेरे अंदर मजे तरंग दौड़ उठी। अगले ही पल मैं जोर जोर से उसे भींचने लगा। मैं जितना उसे भींचता उतना ही मेरे पूरे बदन में रोमांच की लहर दौड़ती और मुझे मजा आता।
बबलू से जब ऐसी बातें सुनता था तो उसकी नजर बचा कर यही करता था मैं। कई बार उसने ऐसा करते हुए मुझे देख भी लिया था। शुरुआत में तो उसने मुझे छेड़ा था और मजाक में गाली दे कर बोला भी था कि मादरचोद ये क्या कर रहा है। जब वो जान गया था कि मैं बस इतना ही करता हूं तो उसने बताया कि जब ऐसी बातों को सुन कर या सोच कर किसी का लंड खड़ा हो जाता है तो ज्यादातर लोग मुठ्ठ मार कर उसे शांत कर लेते हैं। जिनके पास लड़की या औरत का जुगाड़ होता है वो उन्हें चोद कर अपने लंड की गर्मी निकाल लेते हैं।
बबलू के साथ रह कर मैं ये सब जान चुका था मगर हम दोनों ही ऐसे थे कि किसी लड़की या औरत के साथ कभी चुदाई करने का नहीं सोचा था। उसने अपने बारे में तो मुझसे यही बताया था....बाकी अगर उसने सच छुपाया रहा हो तो नहीं पता मुझे।
खैर कुछ देर तक मैं खाट पर लेटा अपने लंड को ऐसे ही भींचता रहा। फिर जब वो कुछ ज्यादा ही कड़क हो गया और मुझे दर्द होने लगा तो मैंने भींचना बंद कर दिया उसे।
मैंने आज तक मुट्ठ नहीं मारी थी। वैसे ये जानने को बेताब था कि मुट्ठ मारने से कैसे गर्मी निकलती है मगर कभी ये देखने के लिए खुद करने का नहीं सोचा था। असल में ये भी मेरे भोलेपन का ही नतीजा था क्योंकि ज्यादातर मैं ऐसी बातों को भुला देता था और फिर से खेल कूद में लग जाता था।
मगर आज ऐसा करने का मन कर रहा था। मैंने एक बार फिर से दरवाजे की तरफ देखा। मुझे पता था कि ये ऐसे काम होते हैं जिन्हें सबसे छुपा कर किया जाता है। अगर घर के किसी व्यक्ति ने ऐसा करते देख लिया तो बहुत पिटाई होगी।
मैं झट खाट से उतरा और कमरे से बाहर निकल कर अच्छे से आसपास का जायजा लिया। सब कुछ ठीक देख कर मैं वापस कमरे में आ गया। छोटे से पेंट में अभी भी लंड खड़ा होने से उभार बना हुआ था।
मैंने जल्दी से पेंट का बटन खोला और उसे कमर से नीचे सरका दिया। पेंट के सरकते ही कच्छे में कैद लंड का उभार कुछ ज्यादा ही दिखने लगा। मैंने धड़कते दिल से कच्चे का नाड़ा खोलना शुरू कर दिया। जल्दी ही नाड़ा खुल गया तो मैंने कच्छे को भी कमर से नीचे सरका दिया।
अगले ही पल मेरा टनटनाया हुआ लंड उछल कर बाहर आ गया। आज से पहले भी मैंने उसे न जाने कितनी बार ऐसे खड़े देखा था मगर इस वक्त मुझे ऐसा लगा कि वो बाकी दिनों से ज्यादा बड़ा दिख रहा है। लंड के आसपास बाल उगे हुए थे जिन्हें बबलू झांठ बोला करता है।
पता नहीं क्यों मेरे अंदर एकाएक घबराहट पैदा हो गई थी। शायद इस लिए क्योंकि कहीं न कहीं मुझे इस बात का भी एहसास हो रहा था कि जो मैं कर रहा हूं वो गलत है। अगर किसी ने देख लिया तो पक्का पिटाई होगी मेरी। इतना ही नहीं जो घर परिवार वाले अब तक मुझे भोला और नादान समझ रहे हैं वो ये देखते ही समझ जाएंगे कि मैं अब भोला नहीं रहा बल्कि मर्द बन गया हूं। एक ऐसा मर्द जो अब लंड के खड़ा हो जाने पर किसी लड़की या औरत को चोदने का सोचने लगा हूं।
अभी मैं ये सोचते हुए लंड को देखे ही जा रहा था कि तभी बाहर से दशरथ काका ने मुझे पुकारा। उनकी आवाज सुनते ही मैं बुरी तरह डर गया। घबरा कर जल्दी से लंड को कच्छे में डाला और जल्दी जल्दी कच्छे का नाड़ा बांधने लगा।
सब कुछ ठीक कर के मैं जल्दी ही बाहर निकला। मकान के बाहर श्यामू काका और दशरथ काका नीम के पेड़ के पास मौजूद थे। दशरथ काका पेड़ के पास ही रखी पानी की बाल्टी में हाथ मुंह धो रहे थे।
"अरे घर नहीं जाना क्या तुझे।" मुझे देखते ही श्यामू काका ने कहा─"देख जरा दिन ढलने लगा है।"
"आज बेचारे ने बहुत काम किया है श्यामू।" दशरथ काका अपनी लुंगी में हाथ पोंछते हुए बोले─"नहीं तो ये दिन भर अपने दोस्तों के साथ खेलने में ही व्यस्त रहता है।"
"अच्छी बात है न भैया कि हमारे राजू ने आज इतना सारा काम किया है।" श्यामू काका ने कहा─"अब से ये रोजाना अपने काका लोगों का काम में हाथ बंटाएगा जिससे हमें भी थोड़ी राहत मिलेगी।"
"ये तो तूने सही कहा।" दशरथ काका बोले─"हमारा राजू अब बड़ा हो गया है और समझदार भी। अब से ये रोजाना हमारा हाथ बंटाएगा....क्यों करेजा हमारा हाथ बंटाएगा न।"
"हां काका मैं अब रोज यहां काम करूंगा।"
मैंने उत्साह और जोश में कहा। मुझे इस बात की भी खुशी हो रही थी कि बाल बाल बच गया था मैं जो अंदर कमरे में लंड को मुठियाने नहीं लगा था। अगर पकड़ा जाता तो ये दोनों काका मेरी बहुत पिटाई करते। उनके सामने मेरी इज्जत उतर जाती वो अलग।
उसके बाद मैं उनके साथ ही घर की तरफ चल पड़ा। कुछ देर बाद वो अपने अपने घरों की तरफ मुड़ गए और मैं अपने घर की तरफ जाने लगा।
जब अकेला हुआ तो खयाल आया कि घर में बापू से सामना हो जाएगा। पता नहीं बापू क्या बोलेंगे मुझसे। उनके सामने कैसे मैं सहज रह पाऊंगा।
फिर याद आया कि मैंने मंजू काकी से शाम को घर आने को कहा था ताकि उनसे आगे का वो किस्सा जान सकूं जो वो खेत में बता रहीं थी।
घर पहुंचा तो देखा मां बर्तन धो रही थी और मेरी छोटी बहन अनीता आंगन में झाड़ू लगा रही थी। जबकि बापू मुझे कहीं नजर न आए।
"अरे आ गया मेरा राजा बेटा।" मुझे देखते ही मां बोली─"आज बहुत थक गया होगा न तू। भूख भी खूब लगी होगी न तुझे।"
ऐसी थी मेरी मां। बहुत प्यार करती थी मुझे। वैसे तो सभी मुझसे प्यार करते थे मगर मां तो मां ही थी। उसका प्यार दुलार सबसे ज्यादा था। इतना वो मेरी छोटी बहन अनीता को दुलार नहीं करती थी जितना मुझे करती थी।
मैं आगे बढ़ कर पीछे से उससे लिपट गया जिससे मां का बर्तन धोना रुक गया। वो गर्दन घुमा कर मुस्कुराते हुए मुझे देखने लगी।
"अरे बर्तन धो लेने दे मुझे फिर लिपट लेना।" फिर उसने कहा─"और हां जा के नहा ले। पसीने के कारण तुझसे गंध आ रही है।"
"गंध तो आएगी ही मां।" पीछे से अनीता ऊंची आवाज में बोल पड़ी─"तुम्हारा राजा बेटा आज नहाया जो नहीं है।"
अनीता की बात सुन कर मैं हड़बड़ा गया। उधर मां ने भी मुझे हैरानी से देखा। उन्हें तो यही पता था कि मैं बापू को घर खाना खाने जाने को बोल कर बबलू के साथ नदी में नहाने चला गया होऊंगा।
"ये क्या बोल रही है तू।" मां ने उसी हैरानी में अनीता से पूछा─"और तुझे कैसे पता कि ये नहाया नहीं है आज।"
"कुछ देर पहले इसका दोस्त बबलू आया था यहां।" अनीता ने बताया─"उस समय तू यहां नहीं थी। मुझसे इसकी तबियत के बारे में पूछ रहा था वो। ये भी बताया कि तबियत ठीक न होने के कारण आज ये उसके साथ नदी में नहीं नहाया।"
अनीता ने तो मेरी पोल ही खोल दी थी। मेरी हालत बड़ी अजीब हो गई थी। मन में एकदम से ये डर बैठ गया कि अब मां से क्या बोलूंगा। मैं जल्दी जल्दी बहाना सोचने लगा।
"इसकी तबियत के बारे में क्यों पूछ रहा था वो।" उधर मां ने चौंक कर मेरी तरफ देखा─"क्या तेरी तबियत बिगड़ गई थी।"
"न...नहीं तो।" मैं बुरी तरह बौखला गया─"वो तो...वो तो मैंने उससे ये कहा था कि आज गर्मी बहुत ज्यादा लग रही है मुझे। उसे लगा मेरी तबियत ठीक नहीं है।"
"हां पर तू नहाया क्यों नहीं आज।" मां हैरान भी थी और चिंतित भी─"सच सच बता तू ठीक तो है न।"
"मैं ठीक हूं मां।" मैंने फटाफट बहाना बनाया─"और नहाया इस लिए नहीं कि मुझे खेतों पर काम करना था। नहा के काम करता तो फिर से पसीना पसीना हो जाता और फिर से नहाना पड़ता। तो मैंने सोचा कि इससे अच्छा मैं शाम को ही नहा लूंगा ताकि फिर मुझे गर्मी न लगे और मैं एकदम ताजा महसूस करूं। अभी मैं नहाने ही जाने वाला था।"
"अच्छा ठीक है...जा नहा ले फिर।" मां ने सामान्य हो कर कहा─"मैं भी जल्दी से बर्तन धो के तेरे लिए फटाफट खाना बना देती हूं।"
मैंने राहत की सांस ली और उनसे अलग हो कर खड़ा हो गया। फिर मेरी नजर अनीता पर पड़ी। वो मेरी तरफ देखते हुए जीभ निकाल कर मुझे चिढ़ाने लगी। एक तो उसने मेरी पोल खोल दी थी और अब ऐसे चिढ़ा रही थी। मुझे गुस्सा आ गया उस पर।
"रुक छिपकली तू।" मैं तेजी से उसकी तरफ लपका─"अभी बताता हूं तुझे। बहुत जीभ निकाल कर चिढ़ाती है न मुझे....रुक अब तू।"
"मां बचा ले मुझे।" अनीता चिल्लाते हुए झाड़ू वहीं छोड़ कर भागी।
हम दोनों भाई बहन का ये रोजाना का काम था इस लिए मां को उसके चिल्लाने से कोई फर्क नहीं पड़ा। इधर वो मुझसे बचने के लिए पूरे आंगन में दौड़ लगा रही थी।
अनीता उमर में बस एक ही साल छोटी थी मुझसे लेकिन वो भी जवान हो चुकी थी। जवानी की झलक साफ दिख रही थी उसमें लेकिन मेरी तरह वो भी भोली और नादान थी। हम दोनों झगड़ते ही रहते थे।
जब उसे समझ आ गया कि वो आंगन में मुझसे नहीं बच पाएगी तो अन्दर कमरे की तरफ दौड़ पड़ी। मैं भी उसके पीछे दौड़ा।
कमरे में पहुंच कर उसने जल्दी से दरवाजा बंद करना चाहा मगर मैंने झट से दरवाजे पर अपने दोनों हाथ जमा दिए। फिर जोर लगाते हुए पूरा दरवाजा अंदर की तरफ ढकेल दिया। वो दरवाजा छोड़ कर पीछे की तरफ भाग चली।
मैं भी अंदर घुस कर उसके पीछे लपका। कमरे में जल्दी ही मैंने पकड़ लिया उसे। वो जोर जोर से चिल्लाने लगी और हंसने भी लगी। मैंने उसे पीछे से पकड़ लिया था इस लिए वो मुझसे छूटने की कोशिश करने लगी थी।
छूटने की कोशिश में वो बुरी तरह छटपटा रही थी और मैं उसे और भी मजबूती से कस के पकड़ने में लगा था। इस चक्कर में जाने कितनी ही बार मेरे हाथ उसके सीने के उभारों पर पड़े। मुझे अपने हाथों में उसकी छाती के कोमल उभार महसूस हुए मगर मैंने हमेशा की तरह इस पर ध्यान नहीं दिया।
हमारी छीना छपटी ऐसे ही चालू थी और फिर हम दोनों पास ही रखी खाट पर फिसल कर गिर गए। मैं पीठ के बल नीचे था और वो मेरे ऊपर पीठ के बल। मैं अभी भी उसे दोनों हाथों से पकड़े हुए था। मेरे दोनों हाथ उसके पेट पर थे। वो मुझसे छूटने के लिए कभी उछलती तो कभी मेरे हाथों को अपने हाथों का जोर लगा कर हटाने की कोशिश करती। कमरे में उसकी हंसी और उसकी चिल्लाहट गूंज रही थी।
"छोड़ दे कमीने कुत्ते।" जब वो खुद को छुड़ा न पाई तो चिल्लाते हुए गाली देने लगी─"छोड़ दे नहीं तो हाथ में काट लूंगी फिर रोने लगेगा तू।"
"काट के दिखा भला।" मैंने उसे और जोर से पकड़ कर कहा─"बहुत जीभ दिखा के चिढ़ा रही थी न। अब छूट के दिखा मुझसे।"
"कुत्ते कमीने सच में काट लूंगी मैं...छोड़ दे कहती हूं।" अनीता छूटने के लिए पूरा जोर लगा रही थी।
"नहीं अब तू काट।" मैंने भी जैसे उसे ताव दिया─"मैं भी देखूं कैसे तू आज मुझसे छूट पाती है।"
"मैं सच में काट लूंगी।" उसने गर्दन घुमा कर मेरी तरफ देखा।
एक तो वैसे ही बहुत गर्मी थी। दूसरे इस छीना छपटी में हम दोनों ही पसीने में नहा गए थे। जब उसने पलट कर मेरी तरफ तो उसके चेहरे पर पसीना साफ चमक रहा था। छीना छपटी की वजह से उसका चेहरा सुर्ख पड़ गया था। सांसें फूल गईं थी। बुरी तरह हांफ रही थी वो। हांफ मैं भी रहा था लेकिन उसे छोड़ नहीं रहा था।
तभी उसने अचानक से जोर लगा कर मेरा एक हाथ हटा लिया जिससे मैंने जल्दी से उसे पकड़ने के लिए फिर से जोर लगाया तो एकदम से मेरा वो हाथ फिसल कर ऊपर उसकी छाती पर आ गया और अंजाने में उसकी छाती का उभार मेरी हथेली में कैद हो गया।
मुझे गुदगुदा सा महसूस हुआ और फिर एकदम से मुझे एहसास हुआ कि उसका दूध मेरे हाथ में आ गया है। मुझे झटका लगा। आज से पहले मैंने कभी ऐसी चीजों पर ध्यान नहीं दिया था मगर जाने क्यों इस वक्त मेरे मन में ऐसा खयाल आ गया था।
उधर जैसे ही अनीता को इस बात का एहसास हुआ तो वो बुरी तरह उछल पड़ी। झट से उसने मेरे हाथ को अपनी छाती से हटाने के लिए अपना हाथ मेरे हाथ में जमाया।
"कमीने क्या कर रहा है।" वो एकदम से चीखी─"अपना हाथ हटा यहां से।"
"पहले माफी मांग।"
आम तौर पर अगर मुझे इसका एहसास हो जाता तो मैं बिना कोई शर्त रखे झट से अपना हाथ हटा लेता मगर जाने क्यों इस वक्त मैं जान बूझ कर अपना हाथ उसकी छाती पर वैसे ही जमाए रखा। वो जितना जोर लगा कर मेरा हाथ हटाने की कोशिश करती मैं उतना ही जोर लगा कर उसकी उस छाती को अपनी हथेली से दबाए जा रहा था। इस चक्कर में मैं ये भी साफ साफ महसूस कर रहा था कि उसकी छाती कितनी मुलायम हैं और दबाने से कितना अच्छा लग रहा है।
अचानक मुझे बबलू की बात याद आ गई। वो अक्सर बताया करता था कि जवान लड़की के दूध औरतों के दूध से थोड़ा सख्त होते हैं। दबाने से मुलायम ही लगते हैं और मजा भी बहुत आता है।
मैं ये सोचे जा रहा था और उधर अनीता पूरा जोर लगा कर मेरा हाथ अपनी छाती से हटाने की कोशिश कर रही थी। अचानक उसने जोर लगाना बंद कर दिया और गर्दन घुमा कर मेरी तरफ देखने लगी।
"राजू शर्म कर ले थोड़ी।" फिर उसने गंभीर हो कर कहा─"क्या कोई भाई अपनी बहन की छाती पर ऐसे हाथ रखता है।"
"क्...क्या कहा????"
पता तो मुझे पहले से था लेकिन पहले की तरह भोला और अंजान बना हुआ था। मगर जब अनीता ने गंभीर हो कर ऐसा कहा तो एकदम से चौंक पड़ने का नाटक किया और झट से अपना हाथ उसकी छाती से हटा लिया। इतना ही नहीं उसे पूरी तरह अपनी पकड़ से आजाद भी कर दिया।
मुझसे छूटते ही अनीता झट से मेरे ऊपर से उठी और नीचे जमीन पर खड़ी हो गई। उसकी सांसें अभी भी तेज चल रहीं थी जिससे उसकी छातियां ऊपर नीचे हो रहीं थी। चेहरा लाल पड़ गया था। जैसे ही वो मेरे ऊपर से हटी तो मैं भी उठ कर खड़ा हो गया था।
"व..वो वो मुझे पता ही नहीं चला कब मेरा हाथ तेरे दूध में चला गया।" फिर मैंने भोलापन दिखाते हुए उससे कहा।
"धत्त...कमीने क्या बोल रहा है ये।" अनीता दूध शब्द सुनते ही बुरी तरह शर्मा गई और आँखें फाड़ कर बोली─"तुझे शर्म नहीं आती क्या। अपनी बहन से कोई ऐसे बात करता है।"
"मुझे क्या पता कोई कैसे बोलता है।" मैंने अपना भोलापन दिखाना जारी रखा─"वैसे भी क्या गलत कहा मैंने। तेरे दूध में ही तो मेरा हाथ रखा हुआ था न।"
अनीता की आँखें और ज्यादा फैल गईं। शायद उसे यकीन नहीं हो रहा था कि मैं इतना ज्यादा भोला और नासमझ हूं। अब उसे क्या पता कि आज जिस सनसनीखेज घटना से मैं रूबरू हुआ था उसकी वजह से मैं कैसे एक झटके में बहुत ज्यादा समझदार और शायद चालाक भी बन गया था।
वैसे तो मुझे अंदर से यही महसूस हो रहा था कि मुझे अपनी बहन से ऐसे बात नहीं करना चाहिए। क्योंकि भाई बहन के रिश्ते में ये गलत है मगर जाने क्यों मुझे ऐसे में मजा आ रहा था। इसी मजे की वजह से मैं अपनी ही बहन से ऐसा बर्ताव भी कर रहा था।
"वैसे तेरा दूध बड़ा हो गया है न अनीता।" मैंने भोला और नासमझ होने का दिखावा कर उसके सीने की तरफ देखते हुए कहा─"लेकिन मां जितने बड़े नहीं हैं तेरे दूध।"
"चुप कर जा कुत्ते।" अनीता बुरी तरह चौंक कर और हैरान हो के बोली─"ये कैसी गंदी बात कर रहा है तू। रुक अभी मां को बताती हूं कि तू मुझसे क्या बोल रहा है।"
"हां जा बता दे।" मैंने हाथ को झटक के कहा─"जब मैं कुछ गलत बोल ही नहीं रहा हूं तो क्यों डरूंगा मां से। मां जब तेरे दूध देखेगी तो उसको भी यही लगेगा कि मैंने सच कहा है.....हां।"
अनीता आश्चर्य से मुंह फाड़े देखती रह गई मुझे। वो समझ नहीं पा रही थी कि आज मुझे क्या हो गया है। वैसे तो सबकी तरह वो भी जानती थी कि मैं ऐसा ही हूं मगर उसे ये उम्मीद नहीं थी कि मैं उससे उसी के नाजुक अंग के बारे में ऐसे खुल्लम खुल्ला बोल दूंगा।
"बस चुप कर जा गंदे इंसान।" अनीता मुझे घूर कर बोली─"मुझसे अब बात मत करना कमीना कहीं का....जा रही हूं मैं।"
"हां तो नहीं करूंगा।" मैंने भी चिढ़ कर कहा─"तू कहीं की कोई महारानी नहीं है जो तुझसे बात करने के लिए दौड़ा दौड़ा तेरे पास आऊंगा....छिपकली कहीं की।"
अनीता पैर पटकते हुए कमरे से चली गई। उसके जाने के बाद मैं सोचने लगा कि आज सच में मुझे क्या हो गया है। मतलब कि आज से पहले मैंने कभी अपनी बहन से ऐसे बात नहीं की थी। हम झगड़ा करते थे। वो मुझे इसी तरह कुत्ता कमीना कहती थी। मेरे हाथ पहले भी जाने अंजाने उसकी छातियों के उभारों पर चले जाते थे लेकिन तब न मैंने कभी इस बारे में इस तरह सोचा और कहा था और न ही उसने कभी कुछ कहा था। आज भी शायद वो कुछ न कहती अगर मैंने जोर लगा कर अपने हाथ से उसकी छाती को इतना दबाया न होता।
कुछ तो था जो पहले से बदल चुका था। खैर मैंने इस सबको दिमाग से निकाला और नहाने चला गया। मुझे मंजू काकी के घर भी जाना था ताकि उनसे आगे का किस्सा जान सकूं।
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नहा धो कर और दूसरे साफ कपड़े पहन कर जब मैं घर से जाने लगा तो मां ने पूछा कहां जा रहा है। मैंने बताया कि मझले काका के घर जा रहा हूं। थोड़ी देर में आ जाऊंगा।
दोनों काका के घर गांव में ही थे लेकिन थोड़ा किनारे पर बने हुए थे। मैं कुछ ही देर में दशरथ काका के घर पहुंच गया। काका घर के बाहर मवेशियों को चारा भूसा डाल रहे थे। वो नहाए हुए तो लग रहे थे मगर नए कपड़े पहन रखे थे। मैं सोचने लगा कि इस वक्त वो नए कपड़े पहन कर कहां जाने वाले हैं।
"अरे राजू अच्छा हुआ तू आ गया।" मुझे देखते ही वो बोले─"वो मुझे इसी समय कहीं जाना है। आज वापस नहीं आ पाऊंगा इस लिए कल ही आऊंगा। तू ऐसा कर आज रात अपनी काकी के पास ही रहना और यहीं खा पी कर सो जाना।"
काका की बात सुन कर जाने क्यों मुझे बड़ी खुशी हुई। मतलब कि अब मैं बड़े आराम से काकी के पास रह कर उनसे उस किस्से के बारे में सब कुछ जान लूंगा। मगर मैं ये भी सोचने लगा कि काका इस वक्त कहां जाने की बात कर रहे हैं।
"पर तुम जा कहां रहे हो काका।" मैंने पूछा।
"वो मैं तेरी काकी के मायके नाहरपुर जा रहा हूं करेजा।" काका ने बताया─"वैसे तो मैं कल दिन में ही जाता लेकिन गांव का वो जो दीनानाथ है न...वो अपनी फटफटी से ससुराल जा रहा है। नाहरपुर के आगे ही नेवारी में उसकी ससुराल है। जब उसने मुझे ये बताया तो मैंने कहा भाई मुझे भी ले चल। रात का रात ससुराल में रुकूंगा और सुबह की लारी(बस) से तेरी दोनों छोटी बहनों को ले कर आ जाऊंगा। काम का भी नुकसान नहीं होगा। सही है न।"
"हां काका ये तो बढ़िया है।" मैंने कहा─"तो अभी जा रहे हो क्या तुम।"
"हां...बस इन मवेशियों को चारा भूसा दे दूं फिर निकलता हूं।"
काका की बात सुन कर मैं मन ही मन ये सोच कर खुश हो गया कि अब मैं रात में काकी से सब कुछ जान लूंगा। इसके साथ ही खुशी खुशी मैं ये भी सोचने लगा कि काकी से मुझे और क्या क्या जानने को मिल सकता है। जाने क्यों मैं अजीब अजीब सी कल्पनाएं करने लगा।
जारी है............
उसके बाद फिर ऐसा मौका ही न मिला था कि काकी से आगे का किस्सा जान सकूं। ऐसे ही बाकी का दिन गुजर गया। दिन डूबने से पहले ही मां और दोनों काकी घर चली गईं। क्योंकि अब उन्हें घर के काम भी करने थे और फिर रात का खाना भी बनाना था।
आम तौर पर मैं खेतों पर ज्यादा रुकता नहीं था बल्कि बबलू के साथ ही इधर उधर घूमता रहता था मगर आज मैं सारा दिन खेतों पर ही रह गया था। आज की घटना से मेरे मन में कहीं और जाने का खयाल ही नहीं आया था।
मकान के अंदर उस छोटे से कमरे में रखी खाट पर लेटा मैं उसी सबके बारे में सोचता रहा था। बार बार मन में खयाल आता कि यही वो कमरा था और यही वो खाट थी जिसके पाट को दोनों हाथों से पकड़े मंजू काकी झुकी हुईं थी और बापू पीछे से अपनी कमर जोर जोर से आगे पीछे करते हुए उनको चोद रहे थे।
हां वो चोद ही तो रहे थे उस वक्त। इतना तो अब मैं जानता ही था कि ऐसे काम को क्या कहा जाता है। ये अलग बात है कि आज से पहले मैंने कभी किसी को इस हालत में नहीं देखा था। बबलू से ही जाना था कि औरत मर्द या लड़का लड़की के इस काम को चोदना कहते हैं। ये भी जाना था कि उन्हें इस काम में बहुत मजा आता है। सारी दुनिया लंड और चूत के लिए पागल है।
मैं सोच रहा था कि काकी और बापू के बीच ये रिश्ता अगर ऐसे शुरू हुआ था तो आगे फिर क्या क्या हुआ होगा उनके बीच। क्या काकी मुझे सब कुछ खुल कर बताएंगी या कुछ बातें छुपा लेंगी मुझसे। मुझे लगा हां काकी ऐसा ही करेंगी। भला वो मुझसे सारी बातें खुल्लम खुल्ला कैसे बता सकती हैं। मतलब कि हमारे बीच के रिश्ते में जो एक मर्यादा है उसका खयाल जरूर रखेंगी वो और अगर नहीं भी रखेंगी तो शर्म झिझक की वजह से खुल कर नहीं बताएंगी।
इस खयाल ने मुझे थोड़ा मायूस सा कर दिया। मैं चाहता था कि काकी मुझे वैसे ही खुल कर बताएं जैसे बबलू मुझे ऐसी गंदी बातें खुल्लम खुल्ला बताया करता है। जब वो सब कुछ खुल्लम खुल्ला बताया करता है तो मुझे उसकी बातों से बड़ा मजा आया करता है। मेरे पूरे बदन में अजीब सी झुरझुरी होने लगती है। मन में मीठी मीठी गुदगुदी होती है। मेरे छोटे से पेंट के अंदर कैद मेरी छोटी सी लुल्ली एकदम से खड़ी हो कर पूरा लंड बन जाती है।
अचानक मैंने महसूस किया कि ये सब सोचते सोचते मेरी लुल्ली खड़ी हो गई है। मतलब कि खड़ी हो कर लंड बन गई है। मैंने एक नज़र दरवाजे की तरफ देखा। किसी को वहां न देख मैंने झट से अपना हाथ लंड पर रख दिया।
सच में वो खड़ा हो गया था। मेरे हाथ रखते ही उसमें सनसनाहट हुई जिससे मेरे अंदर मजे तरंग दौड़ उठी। अगले ही पल मैं जोर जोर से उसे भींचने लगा। मैं जितना उसे भींचता उतना ही मेरे पूरे बदन में रोमांच की लहर दौड़ती और मुझे मजा आता।
बबलू से जब ऐसी बातें सुनता था तो उसकी नजर बचा कर यही करता था मैं। कई बार उसने ऐसा करते हुए मुझे देख भी लिया था। शुरुआत में तो उसने मुझे छेड़ा था और मजाक में गाली दे कर बोला भी था कि मादरचोद ये क्या कर रहा है। जब वो जान गया था कि मैं बस इतना ही करता हूं तो उसने बताया कि जब ऐसी बातों को सुन कर या सोच कर किसी का लंड खड़ा हो जाता है तो ज्यादातर लोग मुठ्ठ मार कर उसे शांत कर लेते हैं। जिनके पास लड़की या औरत का जुगाड़ होता है वो उन्हें चोद कर अपने लंड की गर्मी निकाल लेते हैं।
बबलू के साथ रह कर मैं ये सब जान चुका था मगर हम दोनों ही ऐसे थे कि किसी लड़की या औरत के साथ कभी चुदाई करने का नहीं सोचा था। उसने अपने बारे में तो मुझसे यही बताया था....बाकी अगर उसने सच छुपाया रहा हो तो नहीं पता मुझे।
खैर कुछ देर तक मैं खाट पर लेटा अपने लंड को ऐसे ही भींचता रहा। फिर जब वो कुछ ज्यादा ही कड़क हो गया और मुझे दर्द होने लगा तो मैंने भींचना बंद कर दिया उसे।
मैंने आज तक मुट्ठ नहीं मारी थी। वैसे ये जानने को बेताब था कि मुट्ठ मारने से कैसे गर्मी निकलती है मगर कभी ये देखने के लिए खुद करने का नहीं सोचा था। असल में ये भी मेरे भोलेपन का ही नतीजा था क्योंकि ज्यादातर मैं ऐसी बातों को भुला देता था और फिर से खेल कूद में लग जाता था।
मगर आज ऐसा करने का मन कर रहा था। मैंने एक बार फिर से दरवाजे की तरफ देखा। मुझे पता था कि ये ऐसे काम होते हैं जिन्हें सबसे छुपा कर किया जाता है। अगर घर के किसी व्यक्ति ने ऐसा करते देख लिया तो बहुत पिटाई होगी।
मैं झट खाट से उतरा और कमरे से बाहर निकल कर अच्छे से आसपास का जायजा लिया। सब कुछ ठीक देख कर मैं वापस कमरे में आ गया। छोटे से पेंट में अभी भी लंड खड़ा होने से उभार बना हुआ था।
मैंने जल्दी से पेंट का बटन खोला और उसे कमर से नीचे सरका दिया। पेंट के सरकते ही कच्छे में कैद लंड का उभार कुछ ज्यादा ही दिखने लगा। मैंने धड़कते दिल से कच्चे का नाड़ा खोलना शुरू कर दिया। जल्दी ही नाड़ा खुल गया तो मैंने कच्छे को भी कमर से नीचे सरका दिया।
अगले ही पल मेरा टनटनाया हुआ लंड उछल कर बाहर आ गया। आज से पहले भी मैंने उसे न जाने कितनी बार ऐसे खड़े देखा था मगर इस वक्त मुझे ऐसा लगा कि वो बाकी दिनों से ज्यादा बड़ा दिख रहा है। लंड के आसपास बाल उगे हुए थे जिन्हें बबलू झांठ बोला करता है।
पता नहीं क्यों मेरे अंदर एकाएक घबराहट पैदा हो गई थी। शायद इस लिए क्योंकि कहीं न कहीं मुझे इस बात का भी एहसास हो रहा था कि जो मैं कर रहा हूं वो गलत है। अगर किसी ने देख लिया तो पक्का पिटाई होगी मेरी। इतना ही नहीं जो घर परिवार वाले अब तक मुझे भोला और नादान समझ रहे हैं वो ये देखते ही समझ जाएंगे कि मैं अब भोला नहीं रहा बल्कि मर्द बन गया हूं। एक ऐसा मर्द जो अब लंड के खड़ा हो जाने पर किसी लड़की या औरत को चोदने का सोचने लगा हूं।
अभी मैं ये सोचते हुए लंड को देखे ही जा रहा था कि तभी बाहर से दशरथ काका ने मुझे पुकारा। उनकी आवाज सुनते ही मैं बुरी तरह डर गया। घबरा कर जल्दी से लंड को कच्छे में डाला और जल्दी जल्दी कच्छे का नाड़ा बांधने लगा।
सब कुछ ठीक कर के मैं जल्दी ही बाहर निकला। मकान के बाहर श्यामू काका और दशरथ काका नीम के पेड़ के पास मौजूद थे। दशरथ काका पेड़ के पास ही रखी पानी की बाल्टी में हाथ मुंह धो रहे थे।
"अरे घर नहीं जाना क्या तुझे।" मुझे देखते ही श्यामू काका ने कहा─"देख जरा दिन ढलने लगा है।"
"आज बेचारे ने बहुत काम किया है श्यामू।" दशरथ काका अपनी लुंगी में हाथ पोंछते हुए बोले─"नहीं तो ये दिन भर अपने दोस्तों के साथ खेलने में ही व्यस्त रहता है।"
"अच्छी बात है न भैया कि हमारे राजू ने आज इतना सारा काम किया है।" श्यामू काका ने कहा─"अब से ये रोजाना अपने काका लोगों का काम में हाथ बंटाएगा जिससे हमें भी थोड़ी राहत मिलेगी।"
"ये तो तूने सही कहा।" दशरथ काका बोले─"हमारा राजू अब बड़ा हो गया है और समझदार भी। अब से ये रोजाना हमारा हाथ बंटाएगा....क्यों करेजा हमारा हाथ बंटाएगा न।"
"हां काका मैं अब रोज यहां काम करूंगा।"
मैंने उत्साह और जोश में कहा। मुझे इस बात की भी खुशी हो रही थी कि बाल बाल बच गया था मैं जो अंदर कमरे में लंड को मुठियाने नहीं लगा था। अगर पकड़ा जाता तो ये दोनों काका मेरी बहुत पिटाई करते। उनके सामने मेरी इज्जत उतर जाती वो अलग।
उसके बाद मैं उनके साथ ही घर की तरफ चल पड़ा। कुछ देर बाद वो अपने अपने घरों की तरफ मुड़ गए और मैं अपने घर की तरफ जाने लगा।
जब अकेला हुआ तो खयाल आया कि घर में बापू से सामना हो जाएगा। पता नहीं बापू क्या बोलेंगे मुझसे। उनके सामने कैसे मैं सहज रह पाऊंगा।
फिर याद आया कि मैंने मंजू काकी से शाम को घर आने को कहा था ताकि उनसे आगे का वो किस्सा जान सकूं जो वो खेत में बता रहीं थी।
घर पहुंचा तो देखा मां बर्तन धो रही थी और मेरी छोटी बहन अनीता आंगन में झाड़ू लगा रही थी। जबकि बापू मुझे कहीं नजर न आए।
"अरे आ गया मेरा राजा बेटा।" मुझे देखते ही मां बोली─"आज बहुत थक गया होगा न तू। भूख भी खूब लगी होगी न तुझे।"
ऐसी थी मेरी मां। बहुत प्यार करती थी मुझे। वैसे तो सभी मुझसे प्यार करते थे मगर मां तो मां ही थी। उसका प्यार दुलार सबसे ज्यादा था। इतना वो मेरी छोटी बहन अनीता को दुलार नहीं करती थी जितना मुझे करती थी।
मैं आगे बढ़ कर पीछे से उससे लिपट गया जिससे मां का बर्तन धोना रुक गया। वो गर्दन घुमा कर मुस्कुराते हुए मुझे देखने लगी।
"अरे बर्तन धो लेने दे मुझे फिर लिपट लेना।" फिर उसने कहा─"और हां जा के नहा ले। पसीने के कारण तुझसे गंध आ रही है।"
"गंध तो आएगी ही मां।" पीछे से अनीता ऊंची आवाज में बोल पड़ी─"तुम्हारा राजा बेटा आज नहाया जो नहीं है।"
अनीता की बात सुन कर मैं हड़बड़ा गया। उधर मां ने भी मुझे हैरानी से देखा। उन्हें तो यही पता था कि मैं बापू को घर खाना खाने जाने को बोल कर बबलू के साथ नदी में नहाने चला गया होऊंगा।
"ये क्या बोल रही है तू।" मां ने उसी हैरानी में अनीता से पूछा─"और तुझे कैसे पता कि ये नहाया नहीं है आज।"
"कुछ देर पहले इसका दोस्त बबलू आया था यहां।" अनीता ने बताया─"उस समय तू यहां नहीं थी। मुझसे इसकी तबियत के बारे में पूछ रहा था वो। ये भी बताया कि तबियत ठीक न होने के कारण आज ये उसके साथ नदी में नहीं नहाया।"
अनीता ने तो मेरी पोल ही खोल दी थी। मेरी हालत बड़ी अजीब हो गई थी। मन में एकदम से ये डर बैठ गया कि अब मां से क्या बोलूंगा। मैं जल्दी जल्दी बहाना सोचने लगा।
"इसकी तबियत के बारे में क्यों पूछ रहा था वो।" उधर मां ने चौंक कर मेरी तरफ देखा─"क्या तेरी तबियत बिगड़ गई थी।"
"न...नहीं तो।" मैं बुरी तरह बौखला गया─"वो तो...वो तो मैंने उससे ये कहा था कि आज गर्मी बहुत ज्यादा लग रही है मुझे। उसे लगा मेरी तबियत ठीक नहीं है।"
"हां पर तू नहाया क्यों नहीं आज।" मां हैरान भी थी और चिंतित भी─"सच सच बता तू ठीक तो है न।"
"मैं ठीक हूं मां।" मैंने फटाफट बहाना बनाया─"और नहाया इस लिए नहीं कि मुझे खेतों पर काम करना था। नहा के काम करता तो फिर से पसीना पसीना हो जाता और फिर से नहाना पड़ता। तो मैंने सोचा कि इससे अच्छा मैं शाम को ही नहा लूंगा ताकि फिर मुझे गर्मी न लगे और मैं एकदम ताजा महसूस करूं। अभी मैं नहाने ही जाने वाला था।"
"अच्छा ठीक है...जा नहा ले फिर।" मां ने सामान्य हो कर कहा─"मैं भी जल्दी से बर्तन धो के तेरे लिए फटाफट खाना बना देती हूं।"
मैंने राहत की सांस ली और उनसे अलग हो कर खड़ा हो गया। फिर मेरी नजर अनीता पर पड़ी। वो मेरी तरफ देखते हुए जीभ निकाल कर मुझे चिढ़ाने लगी। एक तो उसने मेरी पोल खोल दी थी और अब ऐसे चिढ़ा रही थी। मुझे गुस्सा आ गया उस पर।
"रुक छिपकली तू।" मैं तेजी से उसकी तरफ लपका─"अभी बताता हूं तुझे। बहुत जीभ निकाल कर चिढ़ाती है न मुझे....रुक अब तू।"
"मां बचा ले मुझे।" अनीता चिल्लाते हुए झाड़ू वहीं छोड़ कर भागी।
हम दोनों भाई बहन का ये रोजाना का काम था इस लिए मां को उसके चिल्लाने से कोई फर्क नहीं पड़ा। इधर वो मुझसे बचने के लिए पूरे आंगन में दौड़ लगा रही थी।
अनीता उमर में बस एक ही साल छोटी थी मुझसे लेकिन वो भी जवान हो चुकी थी। जवानी की झलक साफ दिख रही थी उसमें लेकिन मेरी तरह वो भी भोली और नादान थी। हम दोनों झगड़ते ही रहते थे।
जब उसे समझ आ गया कि वो आंगन में मुझसे नहीं बच पाएगी तो अन्दर कमरे की तरफ दौड़ पड़ी। मैं भी उसके पीछे दौड़ा।
कमरे में पहुंच कर उसने जल्दी से दरवाजा बंद करना चाहा मगर मैंने झट से दरवाजे पर अपने दोनों हाथ जमा दिए। फिर जोर लगाते हुए पूरा दरवाजा अंदर की तरफ ढकेल दिया। वो दरवाजा छोड़ कर पीछे की तरफ भाग चली।
मैं भी अंदर घुस कर उसके पीछे लपका। कमरे में जल्दी ही मैंने पकड़ लिया उसे। वो जोर जोर से चिल्लाने लगी और हंसने भी लगी। मैंने उसे पीछे से पकड़ लिया था इस लिए वो मुझसे छूटने की कोशिश करने लगी थी।
छूटने की कोशिश में वो बुरी तरह छटपटा रही थी और मैं उसे और भी मजबूती से कस के पकड़ने में लगा था। इस चक्कर में जाने कितनी ही बार मेरे हाथ उसके सीने के उभारों पर पड़े। मुझे अपने हाथों में उसकी छाती के कोमल उभार महसूस हुए मगर मैंने हमेशा की तरह इस पर ध्यान नहीं दिया।
हमारी छीना छपटी ऐसे ही चालू थी और फिर हम दोनों पास ही रखी खाट पर फिसल कर गिर गए। मैं पीठ के बल नीचे था और वो मेरे ऊपर पीठ के बल। मैं अभी भी उसे दोनों हाथों से पकड़े हुए था। मेरे दोनों हाथ उसके पेट पर थे। वो मुझसे छूटने के लिए कभी उछलती तो कभी मेरे हाथों को अपने हाथों का जोर लगा कर हटाने की कोशिश करती। कमरे में उसकी हंसी और उसकी चिल्लाहट गूंज रही थी।
"छोड़ दे कमीने कुत्ते।" जब वो खुद को छुड़ा न पाई तो चिल्लाते हुए गाली देने लगी─"छोड़ दे नहीं तो हाथ में काट लूंगी फिर रोने लगेगा तू।"
"काट के दिखा भला।" मैंने उसे और जोर से पकड़ कर कहा─"बहुत जीभ दिखा के चिढ़ा रही थी न। अब छूट के दिखा मुझसे।"
"कुत्ते कमीने सच में काट लूंगी मैं...छोड़ दे कहती हूं।" अनीता छूटने के लिए पूरा जोर लगा रही थी।
"नहीं अब तू काट।" मैंने भी जैसे उसे ताव दिया─"मैं भी देखूं कैसे तू आज मुझसे छूट पाती है।"
"मैं सच में काट लूंगी।" उसने गर्दन घुमा कर मेरी तरफ देखा।
एक तो वैसे ही बहुत गर्मी थी। दूसरे इस छीना छपटी में हम दोनों ही पसीने में नहा गए थे। जब उसने पलट कर मेरी तरफ तो उसके चेहरे पर पसीना साफ चमक रहा था। छीना छपटी की वजह से उसका चेहरा सुर्ख पड़ गया था। सांसें फूल गईं थी। बुरी तरह हांफ रही थी वो। हांफ मैं भी रहा था लेकिन उसे छोड़ नहीं रहा था।
तभी उसने अचानक से जोर लगा कर मेरा एक हाथ हटा लिया जिससे मैंने जल्दी से उसे पकड़ने के लिए फिर से जोर लगाया तो एकदम से मेरा वो हाथ फिसल कर ऊपर उसकी छाती पर आ गया और अंजाने में उसकी छाती का उभार मेरी हथेली में कैद हो गया।
मुझे गुदगुदा सा महसूस हुआ और फिर एकदम से मुझे एहसास हुआ कि उसका दूध मेरे हाथ में आ गया है। मुझे झटका लगा। आज से पहले मैंने कभी ऐसी चीजों पर ध्यान नहीं दिया था मगर जाने क्यों इस वक्त मेरे मन में ऐसा खयाल आ गया था।
उधर जैसे ही अनीता को इस बात का एहसास हुआ तो वो बुरी तरह उछल पड़ी। झट से उसने मेरे हाथ को अपनी छाती से हटाने के लिए अपना हाथ मेरे हाथ में जमाया।
"कमीने क्या कर रहा है।" वो एकदम से चीखी─"अपना हाथ हटा यहां से।"
"पहले माफी मांग।"
आम तौर पर अगर मुझे इसका एहसास हो जाता तो मैं बिना कोई शर्त रखे झट से अपना हाथ हटा लेता मगर जाने क्यों इस वक्त मैं जान बूझ कर अपना हाथ उसकी छाती पर वैसे ही जमाए रखा। वो जितना जोर लगा कर मेरा हाथ हटाने की कोशिश करती मैं उतना ही जोर लगा कर उसकी उस छाती को अपनी हथेली से दबाए जा रहा था। इस चक्कर में मैं ये भी साफ साफ महसूस कर रहा था कि उसकी छाती कितनी मुलायम हैं और दबाने से कितना अच्छा लग रहा है।
अचानक मुझे बबलू की बात याद आ गई। वो अक्सर बताया करता था कि जवान लड़की के दूध औरतों के दूध से थोड़ा सख्त होते हैं। दबाने से मुलायम ही लगते हैं और मजा भी बहुत आता है।
मैं ये सोचे जा रहा था और उधर अनीता पूरा जोर लगा कर मेरा हाथ अपनी छाती से हटाने की कोशिश कर रही थी। अचानक उसने जोर लगाना बंद कर दिया और गर्दन घुमा कर मेरी तरफ देखने लगी।
"राजू शर्म कर ले थोड़ी।" फिर उसने गंभीर हो कर कहा─"क्या कोई भाई अपनी बहन की छाती पर ऐसे हाथ रखता है।"
"क्...क्या कहा????"
पता तो मुझे पहले से था लेकिन पहले की तरह भोला और अंजान बना हुआ था। मगर जब अनीता ने गंभीर हो कर ऐसा कहा तो एकदम से चौंक पड़ने का नाटक किया और झट से अपना हाथ उसकी छाती से हटा लिया। इतना ही नहीं उसे पूरी तरह अपनी पकड़ से आजाद भी कर दिया।
मुझसे छूटते ही अनीता झट से मेरे ऊपर से उठी और नीचे जमीन पर खड़ी हो गई। उसकी सांसें अभी भी तेज चल रहीं थी जिससे उसकी छातियां ऊपर नीचे हो रहीं थी। चेहरा लाल पड़ गया था। जैसे ही वो मेरे ऊपर से हटी तो मैं भी उठ कर खड़ा हो गया था।
"व..वो वो मुझे पता ही नहीं चला कब मेरा हाथ तेरे दूध में चला गया।" फिर मैंने भोलापन दिखाते हुए उससे कहा।
"धत्त...कमीने क्या बोल रहा है ये।" अनीता दूध शब्द सुनते ही बुरी तरह शर्मा गई और आँखें फाड़ कर बोली─"तुझे शर्म नहीं आती क्या। अपनी बहन से कोई ऐसे बात करता है।"
"मुझे क्या पता कोई कैसे बोलता है।" मैंने अपना भोलापन दिखाना जारी रखा─"वैसे भी क्या गलत कहा मैंने। तेरे दूध में ही तो मेरा हाथ रखा हुआ था न।"
अनीता की आँखें और ज्यादा फैल गईं। शायद उसे यकीन नहीं हो रहा था कि मैं इतना ज्यादा भोला और नासमझ हूं। अब उसे क्या पता कि आज जिस सनसनीखेज घटना से मैं रूबरू हुआ था उसकी वजह से मैं कैसे एक झटके में बहुत ज्यादा समझदार और शायद चालाक भी बन गया था।
वैसे तो मुझे अंदर से यही महसूस हो रहा था कि मुझे अपनी बहन से ऐसे बात नहीं करना चाहिए। क्योंकि भाई बहन के रिश्ते में ये गलत है मगर जाने क्यों मुझे ऐसे में मजा आ रहा था। इसी मजे की वजह से मैं अपनी ही बहन से ऐसा बर्ताव भी कर रहा था।
"वैसे तेरा दूध बड़ा हो गया है न अनीता।" मैंने भोला और नासमझ होने का दिखावा कर उसके सीने की तरफ देखते हुए कहा─"लेकिन मां जितने बड़े नहीं हैं तेरे दूध।"
"चुप कर जा कुत्ते।" अनीता बुरी तरह चौंक कर और हैरान हो के बोली─"ये कैसी गंदी बात कर रहा है तू। रुक अभी मां को बताती हूं कि तू मुझसे क्या बोल रहा है।"
"हां जा बता दे।" मैंने हाथ को झटक के कहा─"जब मैं कुछ गलत बोल ही नहीं रहा हूं तो क्यों डरूंगा मां से। मां जब तेरे दूध देखेगी तो उसको भी यही लगेगा कि मैंने सच कहा है.....हां।"
अनीता आश्चर्य से मुंह फाड़े देखती रह गई मुझे। वो समझ नहीं पा रही थी कि आज मुझे क्या हो गया है। वैसे तो सबकी तरह वो भी जानती थी कि मैं ऐसा ही हूं मगर उसे ये उम्मीद नहीं थी कि मैं उससे उसी के नाजुक अंग के बारे में ऐसे खुल्लम खुल्ला बोल दूंगा।
"बस चुप कर जा गंदे इंसान।" अनीता मुझे घूर कर बोली─"मुझसे अब बात मत करना कमीना कहीं का....जा रही हूं मैं।"
"हां तो नहीं करूंगा।" मैंने भी चिढ़ कर कहा─"तू कहीं की कोई महारानी नहीं है जो तुझसे बात करने के लिए दौड़ा दौड़ा तेरे पास आऊंगा....छिपकली कहीं की।"
अनीता पैर पटकते हुए कमरे से चली गई। उसके जाने के बाद मैं सोचने लगा कि आज सच में मुझे क्या हो गया है। मतलब कि आज से पहले मैंने कभी अपनी बहन से ऐसे बात नहीं की थी। हम झगड़ा करते थे। वो मुझे इसी तरह कुत्ता कमीना कहती थी। मेरे हाथ पहले भी जाने अंजाने उसकी छातियों के उभारों पर चले जाते थे लेकिन तब न मैंने कभी इस बारे में इस तरह सोचा और कहा था और न ही उसने कभी कुछ कहा था। आज भी शायद वो कुछ न कहती अगर मैंने जोर लगा कर अपने हाथ से उसकी छाती को इतना दबाया न होता।
कुछ तो था जो पहले से बदल चुका था। खैर मैंने इस सबको दिमाग से निकाला और नहाने चला गया। मुझे मंजू काकी के घर भी जाना था ताकि उनसे आगे का किस्सा जान सकूं।
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नहा धो कर और दूसरे साफ कपड़े पहन कर जब मैं घर से जाने लगा तो मां ने पूछा कहां जा रहा है। मैंने बताया कि मझले काका के घर जा रहा हूं। थोड़ी देर में आ जाऊंगा।
दोनों काका के घर गांव में ही थे लेकिन थोड़ा किनारे पर बने हुए थे। मैं कुछ ही देर में दशरथ काका के घर पहुंच गया। काका घर के बाहर मवेशियों को चारा भूसा डाल रहे थे। वो नहाए हुए तो लग रहे थे मगर नए कपड़े पहन रखे थे। मैं सोचने लगा कि इस वक्त वो नए कपड़े पहन कर कहां जाने वाले हैं।
"अरे राजू अच्छा हुआ तू आ गया।" मुझे देखते ही वो बोले─"वो मुझे इसी समय कहीं जाना है। आज वापस नहीं आ पाऊंगा इस लिए कल ही आऊंगा। तू ऐसा कर आज रात अपनी काकी के पास ही रहना और यहीं खा पी कर सो जाना।"
काका की बात सुन कर जाने क्यों मुझे बड़ी खुशी हुई। मतलब कि अब मैं बड़े आराम से काकी के पास रह कर उनसे उस किस्से के बारे में सब कुछ जान लूंगा। मगर मैं ये भी सोचने लगा कि काका इस वक्त कहां जाने की बात कर रहे हैं।
"पर तुम जा कहां रहे हो काका।" मैंने पूछा।
"वो मैं तेरी काकी के मायके नाहरपुर जा रहा हूं करेजा।" काका ने बताया─"वैसे तो मैं कल दिन में ही जाता लेकिन गांव का वो जो दीनानाथ है न...वो अपनी फटफटी से ससुराल जा रहा है। नाहरपुर के आगे ही नेवारी में उसकी ससुराल है। जब उसने मुझे ये बताया तो मैंने कहा भाई मुझे भी ले चल। रात का रात ससुराल में रुकूंगा और सुबह की लारी(बस) से तेरी दोनों छोटी बहनों को ले कर आ जाऊंगा। काम का भी नुकसान नहीं होगा। सही है न।"
"हां काका ये तो बढ़िया है।" मैंने कहा─"तो अभी जा रहे हो क्या तुम।"
"हां...बस इन मवेशियों को चारा भूसा दे दूं फिर निकलता हूं।"
काका की बात सुन कर मैं मन ही मन ये सोच कर खुश हो गया कि अब मैं रात में काकी से सब कुछ जान लूंगा। इसके साथ ही खुशी खुशी मैं ये भी सोचने लगा कि काकी से मुझे और क्या क्या जानने को मिल सकता है। जाने क्यों मैं अजीब अजीब सी कल्पनाएं करने लगा।
जारी है............


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