04-01-2026, 11:52 AM
(This post was last modified: 07-01-2026, 02:39 PM by Deepak.kapoor. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
अनीता (विषय बदलते हुए और संजीदगी का नाटक करते हुए): "अच्छा, अब ये सब छोड़ो। ये बताओ कि आज हमारी कुकिंग क्लास कहाँ से शुरू होगी? क्या सिखाने वाले हो आज?"
करीम: "बेटी, सबसे पहले तो आपको मसालों की पहचान होनी चाहिए। मसालों की खुशबू और उनकी तासीर को समझना बहुत ज़रूरी है।"
करीम ने एक डब्बा उठाया और उसमें से थोड़ी सी इलायची और दालचीनी निकाली। उसने अपनी बड़ी हथेली पर मसाले रखे और अनीता के चेहरे के करीब ले गया।
करीम: (अपनी हथेली अनीता के होंठों के करीब ले जाते हुए) "ज़रा इसकी महक लीजिये बेटी... देखिये इसमें कितनी गहराई है, जैसे किसी प्यासे की प्यास बुझाने का दम रखती हो।"
अनीता करीम की हथेली के पास झुकती है। जैसे ही वह महक लेने के लिए झुकती है, उसका गहरा गला पूरी तरह खुल जाता है। करीम की 6'2" की ऊँचाई से उसे अनीता के तने हुए वक्ष और उनके बीच की गहरी घाटी साफ़ दिखाई देती है, जो हर साँस के साथ ऊपर-नीचे हो रही थी।
अनीता: (आँखें मूँदकर) "उम्मम... वाकई, बहुत अच्छी खुशबू है।"
करीम: (फुसफुसाते हुए) "खुशबू तो वाकई लाजवाब है बेटी... पर जितनी मसालों में है, उतनी ही उनके हाथों में भी होनी चाहिए जो इन्हें पकाते हैं।"
करीम ने जानबूझकर अपनी हथेली को थोड़ा और ऊपर उठाया। उसकी सख्त उँगलियाँ धीरे से अनीता के कोमल और रसीले होंठों को छू गईं। अनीता के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई।
करीम: (अपनी उँगली को अनीता के निचले होंठ पर धीरे से रगड़ते हुए) "स्वाद तो तब आता है बेटी, जब मसाला सही जगह पर और सही तरीके से लगाया जाए। क्या आपको महसूस हो रहा है?"
अनीता ने नज़रें उठाईं और करीम की आँखों में झाँका।
अनीता: "करीम बाबा, आपकी उंगलियों में तो पहले से ही वो जादू है। क्यों न आप ही मुझे सिखाएं कि इन्हें पीसना कैसे है?"
करीम: "ज़रूर बेटी... आइये, हम आपको बताते हैं कि सिल-बट्टे पर मसाला कैसे पीसा जाता है। मशीनों के स्वाद में वो बात कहाँ, जो हाथों की मेहनत में है।"
करीम ने सिल-बट्टे की ओर इशारा किया। अनीता धीरे से झुकी और बट्टे को पकड़ने के लिए आगे बढ़ी। शिफॉन की साड़ी उसके बदन पर इतनी ढीली थी कि झुकते ही उसका पल्लू कंधे से लगभग सरक गया, जिससे उसकी गोरी कमर और पेट का हिस्सा पूरी तरह बेपर्दा होकर करीम की आँखों के सामने आ गया।
करीम अनीता के ठीक पीछे खड़ा हो
करीम: "बेटी, बट्टे को ऐसे नहीं पकड़ते... अगर पकड़ सही न हो, तो मसाला ठीक से नहीं पिसता।"
करीम ने अपनी बड़ी हथेलियाँ अनीता के कोमल हाथों के ऊपर रख दीं। अनीता के गोरे हाथों पर करीम के काले हाथ एक अजीब सा कंट्रास्ट पैदा कर रहे थे। करीम की हथेलियों की गर्मी अनीता के रोम-रोम में उतरने लगी।
अनीता: (धीमी और भर्राई आवाज़ में) "तो... तो फिर कैसे पकड़ना चाहिए उस्ताद जी?"
करीम: "ऐसे..."
करीम ने अपनी उंगलियों को अनीता की उंगलियों के बीच फँसा लिया और उसे मज़बूत पकड़ सिखाई। वह अनीता के इतना करीब था कि उसका चौड़ा सीना अनीता की पीठ को हल्का-हल्का छू रहा था। करीम ने झुककर अपना चेहरा अनीता के कान के पास किया। उसकी गर्म साँसें अनीता की गर्दन पर थीं।
करीम: (कान में फुसफुसाते हुए) "अब धीरे-धीरे ज़ोर लगाइये बेटी... आगे और पीछे... लय के साथ।"
करीम ने अनीता की कमर को सहारा देने के लिए अपना दूसरा हाथ उसकी नंगी और चिकनी कमर पर रख दिया। उसकी बड़ी उंगलियाँ अनीता की नाभि के पास के कोमल मांस में धँसने लगीं।
अनीता: "आह्ह... करीम बाबा... आप... आप तो बहुत ज़ोर लगा रहे हैं।"
अनीता जैसे ही रसोई के स्लैब पर झुकी और बट्टे को सिल पर रखकर आगे-पीछे घुमाना शुरू किया, उसके शरीर का पिछला हिस्सा स्वाभाविक रूप से बाहर की ओर उभर आया। उसकी बैंगनी साड़ी के नीचे से उसके भारी कूल्हे पीछे की ओर मुड़े और अनजाने में (या शायद जानबूझकर) पीछे खड़े करीम की लुंगी के नीचे दबे उस सख्त होते लंड से रगड़ खाने लगे।
करीम की साँसें अचानक भारी हो गईं। उसके भीतर हवस का सैलाब उमड़ पड़ा और उसने अपनी पकड़ अनीता की कमर पर थोड़ी और मज़बूत कर दी।
अनीता (मन ही मन, धड़कते दिल के साथ): "ओह! ये... ये क्या है? पीछे कुछ बहुत सख्त और गर्म महसूस हो रहा है।"
अनीता ने जैसे ही बट्टे को दोबारा घुमाया, उसके कूल्हों का दबाव करीम के उभार पर और बढ़ा। उसे साफ़ महसूस हुआ कि करीम की लुंगी के नीचे कुछ बहुत ही लंबा और मोटा पत्थर की तरह सख्त हो चुका है।
अनीता (कांपते हुए विचारों में): "इतनी लंबाई... और इतनी मोटाई? क्या ये सच में इतना बड़ा है या मेरा मन ही मेरे साथ खेल खेल रहा है?"
अनीता का चेहरा शर्म और एक अनजानी उत्तेजना से पूरी तरह लाल हो गया। उसके गाल दहकने लगे थे और आँखों में एक धुंधलापन सा छाने लगा। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि एक नौकर का शरीर उसे इस कदर बेचैन कर सकता है। वह चाहकर भी खुद को पीछे नहीं हटा पा रही थी, जैसे उस 'सख्त' एहसास ने उसे सम्मोहित कर लिया हो।
करीम (अनीता के कान के बिल्कुल पास फुसफुसाते हुए): "(मालकिन, धीरे-धीरे मसलो...जितना दबाव दोगी, उतना ही रस निकलेगा।"
करीम ने देखा कि अनीता के बदन में एक सिहरन दौड़ गई है और उसके कान की लौ लाल हो चुकी है। वह समझ गया कि मेमसाहब को उसके "लौड़ा" की गर्मी महसूस हो गई है। उसने इस मौके को हाथ से जाने नहीं दिया और अपनी लंबी काया को अनीता के पीठ के साथ पूरी तरह सटा दिया।
अब वे दोनों साथ में उस बट्टे को आगे-पीछे कर रहे थे। हर बार जब बट्टा आगे जाता, अनीता का पिछला हिस्सा करीम के उस 10 इंच के सख्त लंड पर और भी ज़ोर से दबता।
अनीता (मन ही मन, बेसुध होते हुए): "हे भगवान, ये तो... ये तो सच में बहुत बड़ा है। इसकी मोटाई मेरी साड़ी के परतों को चीर कर मुझे छू रही है। क्या सच में ये पूरा मेरे अंदर...?"
अनीता के पैर काँपने लगे थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह पीछे हट जाए या उस मर्दाना अहसास में खुद को सौंप दे। करीम की खुशबू और उसके शरीर की तपिश अनीता को पागल कर रही थी।
अनीता: (साँसें तेज़ होते हुए) "करीम बाबा... मसाला तो बहुत बारीक पिस गया है... उम्मम... पर रसोई में गर्मी बहुत बढ़ गई है, है ना?"
करीम: "हाँ बेटी... गर्मी तो बहुत है। पर असली स्वाद तो तभी आता है जब पसीना और मेहनत एक साथ मिल जाएं।"
अनीता ने हल्का सा सिर घुमाकर पीछे देखा। करीम की आँखें उसके स्तनों के ऊपरी उभार पर जमी हुई थीं, जहाँ से पसीने की एक नन्हीं बूंद फिसलकर उसकी छाती की गहराई में जा रही थी। अनीता ने एक गहरी साँस ली जिससे उसके वक्ष और भी उभर कर करीम की नज़रों के सामने आ गए।
करीम की सोच:
"अनीता बेटी... साला, ये जो पसीना तुम्हारी छाती की घाटी में उतर रहा है, मन कर रहा है कि उसे अपनी ज़ुबान से चाट लूँ। ये गोरा गोश्त... कसम खुदा की, राज साहब की तो चांदी है।"
पूरे 10 मिनट तक वह 'कुकिंग क्लास' चलती रही। हर बार जब अनीता झुकती, करीम का हाथ उसकी कमर से होता हुआ उसके गाँड के ऊपरी हिस्से को हल्का सा छू जाता। उसे पता था कि करीम उसे एक बेटी की तरह नहीं, बल्कि एक भूखे जानवर की तरह देख रहा है, और उसे अपनी खूबसूरती का यह असर बहुत पसंद आ रहा था।
अंत में जब मसाला पिस गया, तो अनीता सीधी खड़ी हुई। करीम का हाथ उसकी कमर पर था। अनीता ने पीछे मुड़कर करीम की आँखों में सीधे देखा। उसकी साड़ी का पल्लू अब पूरी तरह उसके कंधे से गिर चुका था, जिससे उसके स्तन बैंगनी ब्लाउज में पूरी तरह नुमाया हो रहे थे।
"शुक्रिया करीम बाबा... आज तो मैंने बहुत कुछ सीख लिया," अनीता ने कहा।
करीम ने धीरे से अपना हाथ हटाया। उसने जवाब दिया, "अभी तो शुरुआत है बेटी... अभी तो बहुत कुछ सीखना बाकी है। बस आप ऐसे ही आती रहिएगा, हम आपको हर वो स्वाद चखाएंगे जो आपने आज तक नहीं चखा।"
अनीता मुस्कान के साथ रसोई से बाहर निकल गई, जबकि करीम वहीं खड़ा अपनी लुंगी के नीचे मचली उस बेताबी को शांत करने की कोशिश करने लगा।
दोपहर का वक्त था। अनीता ड्राइंग रूम के आलीशान मखमली सोफे पर लेटी हुई थी। उसने अपनी बैंगनी साड़ी को थोड़ा ढीला कर लिया था और उसके लंबे, गोरे पैर सोफे के किनारे से लटक रहे थे। तभी उसके फोन की घंटी बजी—राज का कॉल था।
"हेलो, कैसी हो जान?" राज की आवाज़ में दफ्तर की थकान और अपनी पत्नी के लिए फिक्र साफ़ झलक रही थी।
अनीता ने अंगड़ाई लेते हुए जवाब दिया, "मैं ठीक हूँ राज। बस अभी लंच किया है और थोड़ी सुस्ती आ रही है। तुम कैसे हो? काम कैसा चल रहा है?"
"काम तो वही रोज़ का सिरदर्द है, पर तुम्हारी याद बहुत आ रही है। लंच में क्या खाया? करीम बाबा ने कुछ अच्छा बनाया था?" राज ने सहज भाव से पूछा।
अनीता ने अपनी नज़रों को रसोई की तरफ घुमाया, जहाँ करीम हाथ में तौलिया लिए खड़ा उसे ही निहार रहा था। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "हाँ राज, करीम बाबा ने मुर्ग का सालन बहुत ही लाजवाब बनाया था। और जानते हो, आज उन्होंने मुझे मसाला पीसना भी सिखाया। वो सच में बहुत गुणी हैं।"
"देखा! मैंने कहा था न कि वो बहुत अनुभवी हैं। उनसे जितना हो सके सीख लो, फिर जब हम वापस दिल्ली जाएंगे तो तुम मुझे अपने हाथ का खाना खिलाना," राज ने खुश होते हुए कहा। दोनों के बीच करीब दस मिनट तक सामान्य बातचीत हुई—शाम के प्लान, घर की बातें और राज का काम।
लेकिन उस पूरी बातचीत के दौरान, करीम वहीं खड़ा अनीता के लंबे और गोरे बदन को नज़रों से पी रहा था। राज की आवाज़ फोन से हल्की-हल्की बाहर आ रही थी, जिसे सुनकर करीम के मन में बेहद गंदे विचार उमड़ रहे थे:
"अनीता बेटी... साहब को क्या पता कि तुम यहाँ रसोई में हमरी देह से सट के क्या सीख रही हो। उह्ह... साला साहब तो दफ्तर में फाइलें देख रहे हैं और हम यहाँ तुम्हारी उ नंगी पीठ और गहरी नाभि देख के अपनी हवस की फाइल खोल रहे हैं। साहब बोल रहे हैं कि हमसे सीख लो... साला, अगर उन्हें पता चल जाए कि हम तुम्हें क्या-क्या चखाना चाहते हैं, तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक जाए।"
फोन रखने के बाद अनीता ने एक लंबी सांस ली और करीम की तरफ देखा। "साहब आपकी बहुत तारीफ कर रहे थे करीम बाबा।"
करीम ने अपनी गर्दन झुकाई, पर उसकी आँखें अभी भी अनीता की सुडौल जाँघों पर टिकी थीं। "हुज़ूर का बड़प्पन है बेटी... हम तो बस आपकी सेवा में हाज़िर हैं।"
राज से बात करने के बाद अनीता के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान तैर गई और सोफे से उठकर अपने बेडरूम की ओर चल दी। दोपहर की भारी खामोशी और हल्की गर्मी की वजह से उसे नींद घेर रही थी। उसने कमरे के भारी परदे गिरा दिए, जिससे बाहर की चिलचिलाती धूप रुक गई और कमरे में एक धुंधला सा सुकून फैल गया।
अनीता ने अपनी साड़ी के पल्लू को उतारकर बेड की रेलिंग पर डाल दिया और सिर्फ अपने ब्लाउज और पेटीकोट में मखमली गद्दे पर लेट गई। पंखे की धीमी हवा उसके गोरे और सुडौल बदन को छू रही थी, जिससे उसे राहत महसूस हुई। कुछ ही मिनटों में वह गहरी और सुकून भरी दोपहर की नींद की आगोश में चली गई।
उधर, करीम बाहर बगीचे में काम कर रहा था। अनीता के जाने के बाद वह बंगले के रखरखाव में जुट गया था। दोपहर की कड़क धूप में भी वह बिना कमीज के सिर्फ अपनी पुरानी लुंगी पहने झाड़ियों की छंटाई कर रहा था। उसका विशाल और काला शरीर पसीने से तर-बतर होकर धूप में चमक रहा था। उसके चौड़े कंधों और मजबूत बाहों की नसें काम करते वक्त साफ़ उभर रही थीं।
करीम भले ही बाहर था। वह जानता था कि मेमसाहब अंदर आराम कर रही हैं। उसने कुदाल उठाई और मिट्टी खोदना शुरू किया, लेकिन उसके दिमाग में वही तस्वीरें घूम रही थीं जो उसने सुबह रसोई में देखी थीं—अनीता की वह नंगी पीठ, साड़ी से झांकती गहरी नाभि और वे भारी स्तन जो झुकते वक्त उसके ब्लाउज से बाहर आने को बेताब थे।
बगीचे में काम करते हुए करीम का शरीर धूप और मेहनत से तप रहा था। वह बार-बार रुककर अपनी आँखों से पसीना पोंछता और उस बंद खिड़की को देखता। उसे पता था कि अंदर वह लंबी और गोरी मल्लिका बेसुध सोई होगी।
करीब एक घंटे बाद, करीम ने काम रोका और पानी पीने के लिए बंगले के पिछले हिस्से की ओर बढ़ा। उसने सोचा कि क्यों न खिड़की के पास लगे पौधों में पानी डालने के बहाने एक बार अंदर झाँक कर देखा जाए कि 'बेटी' सो रही है या जाग गई है।
करीम ने अपना पसीने से तर-बतर तौलिया कंधे पर डाला और पानी का पाइप हाथ में लेकर धीरे-धीरे बेडरूम वाली दीवार की तरफ बढ़ा। उसका असली मकसद पौधों को पानी देना नहीं, बल्कि उस खिड़की के अंदर छिपे हुए खजाने की एक झलक पाना था।
वह खिड़की के ठीक पास पहुँचा और पाइप से पानी की बौछार मिट्टी पर करने लगा, ताकि किसी को शक न हो। लेकिन उसकी नज़रें लगातार भारी परदों के बीच उस हल्की सी दरार को ढूँढ रही थीं। किस्मत ने उसका साथ दिया; परदे एक कोने से थोड़े मुड़े हुए थे।
करीम ने अपनी गर्दन थोड़ी तिरछी की और एक आँख उस दरार पर टिका दी। अंदर का नज़ारा देख कर उसके हलक में जैसे थूक सूख गया।
अनीता बिस्तर पर पूरी तरह बेसुध सो रही थी। कमरे की धुंधली रोशनी में उसका गोरा बदन कुंदन की तरह चमक रहा था। उसने गर्मी की वजह से अपनी बैंगनी साड़ी पूरी तरह उतार कर एक तरफ फेंक दी थी। वह अब सिर्फ अपने गहरे बैंगनी ब्लाउज और सफ़ेद पेटीकोट में थी।उसकी लंबी देह मखमली चादर पर फैली थी।
सोते वक्त उसका हाथ सिर के ऊपर था, जिसकी वजह से उसका ब्लाउज ऊपर की ओर खिंच गया था और उसके सुडौल और गोल स्तन नीचे से आधे बाहर छलक रहे थे। पेटीकोट भी उसकी जाँघों तक चढ़ गया था, जिससे उसके लंबे, चिकने और गोरे पैर करीम की नज़रों के ठीक सामने थे। उसकी गहरी नाभि उस धुंधली रोशनी में दिख रही थी।
करीम का साँस लेना मुश्किल हो गया। उसकी लुंगी के नीचे की हलचल अब बेकाबू हो रही थी। उसने देखा कि कैसे अनीता की छाती उसकी गहरी साँसों के साथ ऊपर-नीचे हो रही है, जिससे उसके स्तनों का उभार बार-बार ब्लाउज की सीमा को चुनौती दे रहा था।
करीम वहीं जम सा गया। उसे न धूप की परवाह थी, न इस बात की कि कोई उसे देख सकता है। वह बस उस 'बेटी' के बदन का रस अपनी आँखों से पीना चाहता था, जो अंदर बेखबर अपनी जवानी का जलवा बिखेरे सो रही थी।
तभी, अनीता ने नींद में करवट ली। उसका मुख अब खिड़की की तरफ ही था। करवट लेने की वजह उसके स्तन ब्लाउज के अंदर और भी ज़्यादा दबकर ऊपर की ओर उभर आए।
करीम का हाथ कांपने लगा और पाइप से गिरता पानी पौधों की जगह खिड़की के शीशे पर लगा। उसकी आवाज़ (छप-छप) सुनकर अनीता की पलकें हल्की सी हिलीं।
खिड़की के शीशे पर पानी की बौछार गिरने की आवाज़ से जैसे ही अनीता की पलकें झपकीं, करीम के हाथ-पांव फूल गए। उसने झटके से पाइप का रुख मोड़ा और अपनी भारी देह को दीवार के साये में सिकोड़ते हुए खिड़की से दूर हट गया।
वह तेज़ी से बगीचे के दूसरे कोने की तरफ चला गया और हाँफते हुए मिट्टी खोदने का नाटक करने लगा। कुछ देर बाद जब कोई हलचल नहीं हुई, तो उसने राहत की साँस ली।
दोपहर का बाकी वक्त भारी सन्नाटे में बीता। अनीता अपनी गहरी नींद पूरी कर उठी, नहाई और फिर से एक ताज़ा साड़ी पहनकर ड्राइंग रूम में टीवी देखने लगी।
करीम भी बाहर के काम निपटाकर अपनी कोठरी में चला गया, जहाँ वह बार-बार अपनी आँखें मूंदकर उसी नज़ारे को याद कर रहा था—वे आधे छलकते हुए स्तन और वह सफेद पेटीकोट में लिपटी हुई सुडौल गांड।
शाम के करीब 7:०० बजे, बंगले के गेट पर राज की गाड़ी का हॉर्न गूँजा। राज दफ्तर से थका-हारा लेकिन अपनी खूबसूरत पत्नी से मिलने की बेताबी में वापस लौटा था। करीम फौरन बाहर निकला और साहब का बैग थाम लिया।
"कैसे हो करीम बाबा? घर का सब काम ठीक से हुआ?" राज ने मुस्कुराते हुए पूछा।
करीम ने अपनी गर्दन झुकाई और अपनी दबी हुई आवाज़ में बोला, "जी हुज़ूर, सब दुआ है आपकी। अनीता बेटी ने तो आज रसोई में हाथ भी बँटाया।"
राज हँसते हुए अंदर गया, जहाँ अनीता उसका इंतज़ार कर रही थी। राज ने उसे गले लगाया और सोफे पर बैठते हुए बोला, "वाह! क्या खुशबू है। करीम बाबा, आज फिर कुछ खास बनाया है क्या?"
अनीता राज के पास बैठ गई और उसकी बांहों में समाते हुए बोली, "हाँ राज, आज इन्होंने मेरे कहने पर खास बिरयानी बनाई है। मैंने भी मसालों में इनकी मदद की थी।"
करीम पास ही खड़ा यह सब सुन रहा था। उसे पता था कि उस 'मदद' के दौरान उसने अनीता की चिकनी कमर पर जो हाथ रखा था, उसकी तपिश अभी भी कहीं न कहीं ज़िंदा थी। उसने मेज़ पर पानी रखते हुए अनीता की तरफ देखा, जो राज के साथ बेहद खुश दिख रही थी।
रात के खाने की मेज़ पर माहौल सुकून भरा था। राज अपनी बिरयानी का लुत्फ़ उठा रहा था और बीच-बीच में अनीता से दफ्तर की बातें कर रहा था। करीम पास ही खड़ा था, जग से गिलास में पानी भरते हुए उसकी हरकतें बहुत सलीके वाली थीं, लेकिन उसकी नज़रें साफ़ तौर पर दगा दे रही थीं।
राज ने एक निवाला तोड़ा और कुछ कहने के लिए अपनी नज़रें उठाईं, तभी उसने देखा कि करीम का ध्यान पानी भरने पर कम और अनीता पर ज़्यादा था। राज की नज़रें करीम के चेहरे पर टिक गईं। करीम को अंदाज़ा नहीं था कि उसे देखा जा रहा है।
उसकी आँखें अनीता के नीले ब्लाउज के गहरे गले और उसके उभरे हुए स्तनों को ऐसे स्कैन कर रही थीं जैसे वह उन्हें अपनी नज़रों से उतार लेना चाहता हो। जब अनीता झुककर सलाद की प्लेट राज की तरफ खिसकाती, तो करीम की पुतलियाँ और भी फैल जातीं और वह अपनी सांसें रोक लेता।
राज एक पल के लिए ठिठक गया। उसने महसूस किया कि करीम की निगाहों में एक मर्द की भूखी हवस थी। वह अनीता की चिकनी और गोरी कमर को उस जगह से देख रहा था जहाँ से उसकी साड़ी थोड़ी ढीली होकर लटक रही थी।
राज ने गौर किया कि जब अनीता ने हँसते हुए अपना सिर पीछे झुकाया, तो करीम की नज़रें उसकी गर्दन से फिसलकर सीधे उसके वक्षों की गहराई में जा गिरीं। करीम के चेहरे पर एक अजीब सा खिंचाव था, जैसे वह खुद पर काबू पाने की जद्दोजहद कर रहा हो।
राज ने अपना गला साफ़ किया, जिससे करीम अचानक चौंक गया और उसने तुरंत अपनी नज़रें झुकाकर मेज़ पर रखे जग को पकड़ लिया।
"करीम बाबा, पानी खत्म हो गया है," राज ने बहुत ही शांत लेकिन पैनी आवाज़ में कहा।
करीम थोड़ा सकपका गया। "जी... जी हुज़ूर, अभी लाता हूँ," उसने दबी आवाज़ में कहा और तेज़ी से रसोई की तरफ मुड़ गया। जाते वक्त उसकी चाल में एक अजीब सी हड़बड़ाहट थी।
अनीता को इस खामोश तनाव का अंदाज़ा नहीं हुआ। वह अपनी धुन में राज से पूछ रही थी, "क्या हुआ राज? तुम अचानक चुप क्यों हो गए? खाना अच्छा नहीं लगा क्या?"
राज ने अनीता की सुंदर और बेखबर आँखों में देखा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे। क्या वह अपनी पत्नी को बताए कि जिस बूढ़े नौकर पर वे भरोसा कर रहे हैं, वह उसे अपनी आँखों से निर्वस्त्र कर रहा है? या फिर वह इसे अपना वहम मानकर टाल दे?
उसने अनीता का हाथ थाम लिया और धीरे से कहा, "नहीं जान, खाना बहुत अच्छा है। बस थोड़ा थक गया हूँ। चलो, जल्दी खत्म करते हैं, फिर आराम करेंगे।"
लेकिन राज के दिमाग में वह नज़ारा छप गया था। उसने देख लिया था कि कैसे करीम की उंगलियाँ कांप रही थीं जब वह अनीता के करीब खड़ा था। उसे अब उस 6'2" के विशालकाय नौकर की मौजूदगी में एक अनजाना सा खतरा महसूस होने लगा था।
करीम: "बेटी, सबसे पहले तो आपको मसालों की पहचान होनी चाहिए। मसालों की खुशबू और उनकी तासीर को समझना बहुत ज़रूरी है।"
करीम ने एक डब्बा उठाया और उसमें से थोड़ी सी इलायची और दालचीनी निकाली। उसने अपनी बड़ी हथेली पर मसाले रखे और अनीता के चेहरे के करीब ले गया।
करीम: (अपनी हथेली अनीता के होंठों के करीब ले जाते हुए) "ज़रा इसकी महक लीजिये बेटी... देखिये इसमें कितनी गहराई है, जैसे किसी प्यासे की प्यास बुझाने का दम रखती हो।"
अनीता करीम की हथेली के पास झुकती है। जैसे ही वह महक लेने के लिए झुकती है, उसका गहरा गला पूरी तरह खुल जाता है। करीम की 6'2" की ऊँचाई से उसे अनीता के तने हुए वक्ष और उनके बीच की गहरी घाटी साफ़ दिखाई देती है, जो हर साँस के साथ ऊपर-नीचे हो रही थी।
अनीता: (आँखें मूँदकर) "उम्मम... वाकई, बहुत अच्छी खुशबू है।"
करीम: (फुसफुसाते हुए) "खुशबू तो वाकई लाजवाब है बेटी... पर जितनी मसालों में है, उतनी ही उनके हाथों में भी होनी चाहिए जो इन्हें पकाते हैं।"
करीम ने जानबूझकर अपनी हथेली को थोड़ा और ऊपर उठाया। उसकी सख्त उँगलियाँ धीरे से अनीता के कोमल और रसीले होंठों को छू गईं। अनीता के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई।
करीम: (अपनी उँगली को अनीता के निचले होंठ पर धीरे से रगड़ते हुए) "स्वाद तो तब आता है बेटी, जब मसाला सही जगह पर और सही तरीके से लगाया जाए। क्या आपको महसूस हो रहा है?"
अनीता ने नज़रें उठाईं और करीम की आँखों में झाँका।
अनीता: "करीम बाबा, आपकी उंगलियों में तो पहले से ही वो जादू है। क्यों न आप ही मुझे सिखाएं कि इन्हें पीसना कैसे है?"
करीम: "ज़रूर बेटी... आइये, हम आपको बताते हैं कि सिल-बट्टे पर मसाला कैसे पीसा जाता है। मशीनों के स्वाद में वो बात कहाँ, जो हाथों की मेहनत में है।"
करीम ने सिल-बट्टे की ओर इशारा किया। अनीता धीरे से झुकी और बट्टे को पकड़ने के लिए आगे बढ़ी। शिफॉन की साड़ी उसके बदन पर इतनी ढीली थी कि झुकते ही उसका पल्लू कंधे से लगभग सरक गया, जिससे उसकी गोरी कमर और पेट का हिस्सा पूरी तरह बेपर्दा होकर करीम की आँखों के सामने आ गया।
करीम अनीता के ठीक पीछे खड़ा हो
करीम: "बेटी, बट्टे को ऐसे नहीं पकड़ते... अगर पकड़ सही न हो, तो मसाला ठीक से नहीं पिसता।"
करीम ने अपनी बड़ी हथेलियाँ अनीता के कोमल हाथों के ऊपर रख दीं। अनीता के गोरे हाथों पर करीम के काले हाथ एक अजीब सा कंट्रास्ट पैदा कर रहे थे। करीम की हथेलियों की गर्मी अनीता के रोम-रोम में उतरने लगी।
अनीता: (धीमी और भर्राई आवाज़ में) "तो... तो फिर कैसे पकड़ना चाहिए उस्ताद जी?"
करीम: "ऐसे..."
करीम ने अपनी उंगलियों को अनीता की उंगलियों के बीच फँसा लिया और उसे मज़बूत पकड़ सिखाई। वह अनीता के इतना करीब था कि उसका चौड़ा सीना अनीता की पीठ को हल्का-हल्का छू रहा था। करीम ने झुककर अपना चेहरा अनीता के कान के पास किया। उसकी गर्म साँसें अनीता की गर्दन पर थीं।
करीम: (कान में फुसफुसाते हुए) "अब धीरे-धीरे ज़ोर लगाइये बेटी... आगे और पीछे... लय के साथ।"
करीम ने अनीता की कमर को सहारा देने के लिए अपना दूसरा हाथ उसकी नंगी और चिकनी कमर पर रख दिया। उसकी बड़ी उंगलियाँ अनीता की नाभि के पास के कोमल मांस में धँसने लगीं।
अनीता: "आह्ह... करीम बाबा... आप... आप तो बहुत ज़ोर लगा रहे हैं।"
अनीता जैसे ही रसोई के स्लैब पर झुकी और बट्टे को सिल पर रखकर आगे-पीछे घुमाना शुरू किया, उसके शरीर का पिछला हिस्सा स्वाभाविक रूप से बाहर की ओर उभर आया। उसकी बैंगनी साड़ी के नीचे से उसके भारी कूल्हे पीछे की ओर मुड़े और अनजाने में (या शायद जानबूझकर) पीछे खड़े करीम की लुंगी के नीचे दबे उस सख्त होते लंड से रगड़ खाने लगे।
करीम की साँसें अचानक भारी हो गईं। उसके भीतर हवस का सैलाब उमड़ पड़ा और उसने अपनी पकड़ अनीता की कमर पर थोड़ी और मज़बूत कर दी।
अनीता (मन ही मन, धड़कते दिल के साथ): "ओह! ये... ये क्या है? पीछे कुछ बहुत सख्त और गर्म महसूस हो रहा है।"
अनीता ने जैसे ही बट्टे को दोबारा घुमाया, उसके कूल्हों का दबाव करीम के उभार पर और बढ़ा। उसे साफ़ महसूस हुआ कि करीम की लुंगी के नीचे कुछ बहुत ही लंबा और मोटा पत्थर की तरह सख्त हो चुका है।
अनीता (कांपते हुए विचारों में): "इतनी लंबाई... और इतनी मोटाई? क्या ये सच में इतना बड़ा है या मेरा मन ही मेरे साथ खेल खेल रहा है?"
अनीता का चेहरा शर्म और एक अनजानी उत्तेजना से पूरी तरह लाल हो गया। उसके गाल दहकने लगे थे और आँखों में एक धुंधलापन सा छाने लगा। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि एक नौकर का शरीर उसे इस कदर बेचैन कर सकता है। वह चाहकर भी खुद को पीछे नहीं हटा पा रही थी, जैसे उस 'सख्त' एहसास ने उसे सम्मोहित कर लिया हो।
करीम (अनीता के कान के बिल्कुल पास फुसफुसाते हुए): "(मालकिन, धीरे-धीरे मसलो...जितना दबाव दोगी, उतना ही रस निकलेगा।"
करीम ने देखा कि अनीता के बदन में एक सिहरन दौड़ गई है और उसके कान की लौ लाल हो चुकी है। वह समझ गया कि मेमसाहब को उसके "लौड़ा" की गर्मी महसूस हो गई है। उसने इस मौके को हाथ से जाने नहीं दिया और अपनी लंबी काया को अनीता के पीठ के साथ पूरी तरह सटा दिया।
अब वे दोनों साथ में उस बट्टे को आगे-पीछे कर रहे थे। हर बार जब बट्टा आगे जाता, अनीता का पिछला हिस्सा करीम के उस 10 इंच के सख्त लंड पर और भी ज़ोर से दबता।
अनीता (मन ही मन, बेसुध होते हुए): "हे भगवान, ये तो... ये तो सच में बहुत बड़ा है। इसकी मोटाई मेरी साड़ी के परतों को चीर कर मुझे छू रही है। क्या सच में ये पूरा मेरे अंदर...?"
अनीता के पैर काँपने लगे थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह पीछे हट जाए या उस मर्दाना अहसास में खुद को सौंप दे। करीम की खुशबू और उसके शरीर की तपिश अनीता को पागल कर रही थी।
अनीता: (साँसें तेज़ होते हुए) "करीम बाबा... मसाला तो बहुत बारीक पिस गया है... उम्मम... पर रसोई में गर्मी बहुत बढ़ गई है, है ना?"
करीम: "हाँ बेटी... गर्मी तो बहुत है। पर असली स्वाद तो तभी आता है जब पसीना और मेहनत एक साथ मिल जाएं।"
अनीता ने हल्का सा सिर घुमाकर पीछे देखा। करीम की आँखें उसके स्तनों के ऊपरी उभार पर जमी हुई थीं, जहाँ से पसीने की एक नन्हीं बूंद फिसलकर उसकी छाती की गहराई में जा रही थी। अनीता ने एक गहरी साँस ली जिससे उसके वक्ष और भी उभर कर करीम की नज़रों के सामने आ गए।
करीम की सोच:
"अनीता बेटी... साला, ये जो पसीना तुम्हारी छाती की घाटी में उतर रहा है, मन कर रहा है कि उसे अपनी ज़ुबान से चाट लूँ। ये गोरा गोश्त... कसम खुदा की, राज साहब की तो चांदी है।"
पूरे 10 मिनट तक वह 'कुकिंग क्लास' चलती रही। हर बार जब अनीता झुकती, करीम का हाथ उसकी कमर से होता हुआ उसके गाँड के ऊपरी हिस्से को हल्का सा छू जाता। उसे पता था कि करीम उसे एक बेटी की तरह नहीं, बल्कि एक भूखे जानवर की तरह देख रहा है, और उसे अपनी खूबसूरती का यह असर बहुत पसंद आ रहा था।
अंत में जब मसाला पिस गया, तो अनीता सीधी खड़ी हुई। करीम का हाथ उसकी कमर पर था। अनीता ने पीछे मुड़कर करीम की आँखों में सीधे देखा। उसकी साड़ी का पल्लू अब पूरी तरह उसके कंधे से गिर चुका था, जिससे उसके स्तन बैंगनी ब्लाउज में पूरी तरह नुमाया हो रहे थे।
"शुक्रिया करीम बाबा... आज तो मैंने बहुत कुछ सीख लिया," अनीता ने कहा।
करीम ने धीरे से अपना हाथ हटाया। उसने जवाब दिया, "अभी तो शुरुआत है बेटी... अभी तो बहुत कुछ सीखना बाकी है। बस आप ऐसे ही आती रहिएगा, हम आपको हर वो स्वाद चखाएंगे जो आपने आज तक नहीं चखा।"
अनीता मुस्कान के साथ रसोई से बाहर निकल गई, जबकि करीम वहीं खड़ा अपनी लुंगी के नीचे मचली उस बेताबी को शांत करने की कोशिश करने लगा।
दोपहर का वक्त था। अनीता ड्राइंग रूम के आलीशान मखमली सोफे पर लेटी हुई थी। उसने अपनी बैंगनी साड़ी को थोड़ा ढीला कर लिया था और उसके लंबे, गोरे पैर सोफे के किनारे से लटक रहे थे। तभी उसके फोन की घंटी बजी—राज का कॉल था।
"हेलो, कैसी हो जान?" राज की आवाज़ में दफ्तर की थकान और अपनी पत्नी के लिए फिक्र साफ़ झलक रही थी।
अनीता ने अंगड़ाई लेते हुए जवाब दिया, "मैं ठीक हूँ राज। बस अभी लंच किया है और थोड़ी सुस्ती आ रही है। तुम कैसे हो? काम कैसा चल रहा है?"
"काम तो वही रोज़ का सिरदर्द है, पर तुम्हारी याद बहुत आ रही है। लंच में क्या खाया? करीम बाबा ने कुछ अच्छा बनाया था?" राज ने सहज भाव से पूछा।
अनीता ने अपनी नज़रों को रसोई की तरफ घुमाया, जहाँ करीम हाथ में तौलिया लिए खड़ा उसे ही निहार रहा था। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "हाँ राज, करीम बाबा ने मुर्ग का सालन बहुत ही लाजवाब बनाया था। और जानते हो, आज उन्होंने मुझे मसाला पीसना भी सिखाया। वो सच में बहुत गुणी हैं।"
"देखा! मैंने कहा था न कि वो बहुत अनुभवी हैं। उनसे जितना हो सके सीख लो, फिर जब हम वापस दिल्ली जाएंगे तो तुम मुझे अपने हाथ का खाना खिलाना," राज ने खुश होते हुए कहा। दोनों के बीच करीब दस मिनट तक सामान्य बातचीत हुई—शाम के प्लान, घर की बातें और राज का काम।
लेकिन उस पूरी बातचीत के दौरान, करीम वहीं खड़ा अनीता के लंबे और गोरे बदन को नज़रों से पी रहा था। राज की आवाज़ फोन से हल्की-हल्की बाहर आ रही थी, जिसे सुनकर करीम के मन में बेहद गंदे विचार उमड़ रहे थे:
"अनीता बेटी... साहब को क्या पता कि तुम यहाँ रसोई में हमरी देह से सट के क्या सीख रही हो। उह्ह... साला साहब तो दफ्तर में फाइलें देख रहे हैं और हम यहाँ तुम्हारी उ नंगी पीठ और गहरी नाभि देख के अपनी हवस की फाइल खोल रहे हैं। साहब बोल रहे हैं कि हमसे सीख लो... साला, अगर उन्हें पता चल जाए कि हम तुम्हें क्या-क्या चखाना चाहते हैं, तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक जाए।"
फोन रखने के बाद अनीता ने एक लंबी सांस ली और करीम की तरफ देखा। "साहब आपकी बहुत तारीफ कर रहे थे करीम बाबा।"
करीम ने अपनी गर्दन झुकाई, पर उसकी आँखें अभी भी अनीता की सुडौल जाँघों पर टिकी थीं। "हुज़ूर का बड़प्पन है बेटी... हम तो बस आपकी सेवा में हाज़िर हैं।"
राज से बात करने के बाद अनीता के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान तैर गई और सोफे से उठकर अपने बेडरूम की ओर चल दी। दोपहर की भारी खामोशी और हल्की गर्मी की वजह से उसे नींद घेर रही थी। उसने कमरे के भारी परदे गिरा दिए, जिससे बाहर की चिलचिलाती धूप रुक गई और कमरे में एक धुंधला सा सुकून फैल गया।
अनीता ने अपनी साड़ी के पल्लू को उतारकर बेड की रेलिंग पर डाल दिया और सिर्फ अपने ब्लाउज और पेटीकोट में मखमली गद्दे पर लेट गई। पंखे की धीमी हवा उसके गोरे और सुडौल बदन को छू रही थी, जिससे उसे राहत महसूस हुई। कुछ ही मिनटों में वह गहरी और सुकून भरी दोपहर की नींद की आगोश में चली गई।
उधर, करीम बाहर बगीचे में काम कर रहा था। अनीता के जाने के बाद वह बंगले के रखरखाव में जुट गया था। दोपहर की कड़क धूप में भी वह बिना कमीज के सिर्फ अपनी पुरानी लुंगी पहने झाड़ियों की छंटाई कर रहा था। उसका विशाल और काला शरीर पसीने से तर-बतर होकर धूप में चमक रहा था। उसके चौड़े कंधों और मजबूत बाहों की नसें काम करते वक्त साफ़ उभर रही थीं।
करीम भले ही बाहर था। वह जानता था कि मेमसाहब अंदर आराम कर रही हैं। उसने कुदाल उठाई और मिट्टी खोदना शुरू किया, लेकिन उसके दिमाग में वही तस्वीरें घूम रही थीं जो उसने सुबह रसोई में देखी थीं—अनीता की वह नंगी पीठ, साड़ी से झांकती गहरी नाभि और वे भारी स्तन जो झुकते वक्त उसके ब्लाउज से बाहर आने को बेताब थे।
बगीचे में काम करते हुए करीम का शरीर धूप और मेहनत से तप रहा था। वह बार-बार रुककर अपनी आँखों से पसीना पोंछता और उस बंद खिड़की को देखता। उसे पता था कि अंदर वह लंबी और गोरी मल्लिका बेसुध सोई होगी।
करीब एक घंटे बाद, करीम ने काम रोका और पानी पीने के लिए बंगले के पिछले हिस्से की ओर बढ़ा। उसने सोचा कि क्यों न खिड़की के पास लगे पौधों में पानी डालने के बहाने एक बार अंदर झाँक कर देखा जाए कि 'बेटी' सो रही है या जाग गई है।
करीम ने अपना पसीने से तर-बतर तौलिया कंधे पर डाला और पानी का पाइप हाथ में लेकर धीरे-धीरे बेडरूम वाली दीवार की तरफ बढ़ा। उसका असली मकसद पौधों को पानी देना नहीं, बल्कि उस खिड़की के अंदर छिपे हुए खजाने की एक झलक पाना था।
वह खिड़की के ठीक पास पहुँचा और पाइप से पानी की बौछार मिट्टी पर करने लगा, ताकि किसी को शक न हो। लेकिन उसकी नज़रें लगातार भारी परदों के बीच उस हल्की सी दरार को ढूँढ रही थीं। किस्मत ने उसका साथ दिया; परदे एक कोने से थोड़े मुड़े हुए थे।
करीम ने अपनी गर्दन थोड़ी तिरछी की और एक आँख उस दरार पर टिका दी। अंदर का नज़ारा देख कर उसके हलक में जैसे थूक सूख गया।
अनीता बिस्तर पर पूरी तरह बेसुध सो रही थी। कमरे की धुंधली रोशनी में उसका गोरा बदन कुंदन की तरह चमक रहा था। उसने गर्मी की वजह से अपनी बैंगनी साड़ी पूरी तरह उतार कर एक तरफ फेंक दी थी। वह अब सिर्फ अपने गहरे बैंगनी ब्लाउज और सफ़ेद पेटीकोट में थी।उसकी लंबी देह मखमली चादर पर फैली थी।
सोते वक्त उसका हाथ सिर के ऊपर था, जिसकी वजह से उसका ब्लाउज ऊपर की ओर खिंच गया था और उसके सुडौल और गोल स्तन नीचे से आधे बाहर छलक रहे थे। पेटीकोट भी उसकी जाँघों तक चढ़ गया था, जिससे उसके लंबे, चिकने और गोरे पैर करीम की नज़रों के ठीक सामने थे। उसकी गहरी नाभि उस धुंधली रोशनी में दिख रही थी।
करीम का साँस लेना मुश्किल हो गया। उसकी लुंगी के नीचे की हलचल अब बेकाबू हो रही थी। उसने देखा कि कैसे अनीता की छाती उसकी गहरी साँसों के साथ ऊपर-नीचे हो रही है, जिससे उसके स्तनों का उभार बार-बार ब्लाउज की सीमा को चुनौती दे रहा था।
करीम वहीं जम सा गया। उसे न धूप की परवाह थी, न इस बात की कि कोई उसे देख सकता है। वह बस उस 'बेटी' के बदन का रस अपनी आँखों से पीना चाहता था, जो अंदर बेखबर अपनी जवानी का जलवा बिखेरे सो रही थी।
तभी, अनीता ने नींद में करवट ली। उसका मुख अब खिड़की की तरफ ही था। करवट लेने की वजह उसके स्तन ब्लाउज के अंदर और भी ज़्यादा दबकर ऊपर की ओर उभर आए।
करीम का हाथ कांपने लगा और पाइप से गिरता पानी पौधों की जगह खिड़की के शीशे पर लगा। उसकी आवाज़ (छप-छप) सुनकर अनीता की पलकें हल्की सी हिलीं।
खिड़की के शीशे पर पानी की बौछार गिरने की आवाज़ से जैसे ही अनीता की पलकें झपकीं, करीम के हाथ-पांव फूल गए। उसने झटके से पाइप का रुख मोड़ा और अपनी भारी देह को दीवार के साये में सिकोड़ते हुए खिड़की से दूर हट गया।
वह तेज़ी से बगीचे के दूसरे कोने की तरफ चला गया और हाँफते हुए मिट्टी खोदने का नाटक करने लगा। कुछ देर बाद जब कोई हलचल नहीं हुई, तो उसने राहत की साँस ली।
दोपहर का बाकी वक्त भारी सन्नाटे में बीता। अनीता अपनी गहरी नींद पूरी कर उठी, नहाई और फिर से एक ताज़ा साड़ी पहनकर ड्राइंग रूम में टीवी देखने लगी।
करीम भी बाहर के काम निपटाकर अपनी कोठरी में चला गया, जहाँ वह बार-बार अपनी आँखें मूंदकर उसी नज़ारे को याद कर रहा था—वे आधे छलकते हुए स्तन और वह सफेद पेटीकोट में लिपटी हुई सुडौल गांड।
शाम के करीब 7:०० बजे, बंगले के गेट पर राज की गाड़ी का हॉर्न गूँजा। राज दफ्तर से थका-हारा लेकिन अपनी खूबसूरत पत्नी से मिलने की बेताबी में वापस लौटा था। करीम फौरन बाहर निकला और साहब का बैग थाम लिया।
"कैसे हो करीम बाबा? घर का सब काम ठीक से हुआ?" राज ने मुस्कुराते हुए पूछा।
करीम ने अपनी गर्दन झुकाई और अपनी दबी हुई आवाज़ में बोला, "जी हुज़ूर, सब दुआ है आपकी। अनीता बेटी ने तो आज रसोई में हाथ भी बँटाया।"
राज हँसते हुए अंदर गया, जहाँ अनीता उसका इंतज़ार कर रही थी। राज ने उसे गले लगाया और सोफे पर बैठते हुए बोला, "वाह! क्या खुशबू है। करीम बाबा, आज फिर कुछ खास बनाया है क्या?"
अनीता राज के पास बैठ गई और उसकी बांहों में समाते हुए बोली, "हाँ राज, आज इन्होंने मेरे कहने पर खास बिरयानी बनाई है। मैंने भी मसालों में इनकी मदद की थी।"
करीम पास ही खड़ा यह सब सुन रहा था। उसे पता था कि उस 'मदद' के दौरान उसने अनीता की चिकनी कमर पर जो हाथ रखा था, उसकी तपिश अभी भी कहीं न कहीं ज़िंदा थी। उसने मेज़ पर पानी रखते हुए अनीता की तरफ देखा, जो राज के साथ बेहद खुश दिख रही थी।
रात के खाने की मेज़ पर माहौल सुकून भरा था। राज अपनी बिरयानी का लुत्फ़ उठा रहा था और बीच-बीच में अनीता से दफ्तर की बातें कर रहा था। करीम पास ही खड़ा था, जग से गिलास में पानी भरते हुए उसकी हरकतें बहुत सलीके वाली थीं, लेकिन उसकी नज़रें साफ़ तौर पर दगा दे रही थीं।
राज ने एक निवाला तोड़ा और कुछ कहने के लिए अपनी नज़रें उठाईं, तभी उसने देखा कि करीम का ध्यान पानी भरने पर कम और अनीता पर ज़्यादा था। राज की नज़रें करीम के चेहरे पर टिक गईं। करीम को अंदाज़ा नहीं था कि उसे देखा जा रहा है।
उसकी आँखें अनीता के नीले ब्लाउज के गहरे गले और उसके उभरे हुए स्तनों को ऐसे स्कैन कर रही थीं जैसे वह उन्हें अपनी नज़रों से उतार लेना चाहता हो। जब अनीता झुककर सलाद की प्लेट राज की तरफ खिसकाती, तो करीम की पुतलियाँ और भी फैल जातीं और वह अपनी सांसें रोक लेता।
राज एक पल के लिए ठिठक गया। उसने महसूस किया कि करीम की निगाहों में एक मर्द की भूखी हवस थी। वह अनीता की चिकनी और गोरी कमर को उस जगह से देख रहा था जहाँ से उसकी साड़ी थोड़ी ढीली होकर लटक रही थी।
राज ने गौर किया कि जब अनीता ने हँसते हुए अपना सिर पीछे झुकाया, तो करीम की नज़रें उसकी गर्दन से फिसलकर सीधे उसके वक्षों की गहराई में जा गिरीं। करीम के चेहरे पर एक अजीब सा खिंचाव था, जैसे वह खुद पर काबू पाने की जद्दोजहद कर रहा हो।
राज ने अपना गला साफ़ किया, जिससे करीम अचानक चौंक गया और उसने तुरंत अपनी नज़रें झुकाकर मेज़ पर रखे जग को पकड़ लिया।
"करीम बाबा, पानी खत्म हो गया है," राज ने बहुत ही शांत लेकिन पैनी आवाज़ में कहा।
करीम थोड़ा सकपका गया। "जी... जी हुज़ूर, अभी लाता हूँ," उसने दबी आवाज़ में कहा और तेज़ी से रसोई की तरफ मुड़ गया। जाते वक्त उसकी चाल में एक अजीब सी हड़बड़ाहट थी।
अनीता को इस खामोश तनाव का अंदाज़ा नहीं हुआ। वह अपनी धुन में राज से पूछ रही थी, "क्या हुआ राज? तुम अचानक चुप क्यों हो गए? खाना अच्छा नहीं लगा क्या?"
राज ने अनीता की सुंदर और बेखबर आँखों में देखा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे। क्या वह अपनी पत्नी को बताए कि जिस बूढ़े नौकर पर वे भरोसा कर रहे हैं, वह उसे अपनी आँखों से निर्वस्त्र कर रहा है? या फिर वह इसे अपना वहम मानकर टाल दे?
उसने अनीता का हाथ थाम लिया और धीरे से कहा, "नहीं जान, खाना बहुत अच्छा है। बस थोड़ा थक गया हूँ। चलो, जल्दी खत्म करते हैं, फिर आराम करेंगे।"
लेकिन राज के दिमाग में वह नज़ारा छप गया था। उसने देख लिया था कि कैसे करीम की उंगलियाँ कांप रही थीं जब वह अनीता के करीब खड़ा था। उसे अब उस 6'2" के विशालकाय नौकर की मौजूदगी में एक अनजाना सा खतरा महसूस होने लगा था।
Deepak Kapoor
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