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Adultery अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play)
#79
कुकिंग लेसन
 
समय: सुबह के 7:00 बजे।

 
राज अपनी घड़ी बाँधते हुए गहरी नींद में सोई अनीता की ओर मुड़ता है।

 
राज: (धीमी आवाज़ में) "अनीता... सुनो, मैं निकल रहा हूँ। ऑफिस में आज एक ज़रूरी मीटिंग है।"

 
अनीता: (नींद में बुदबुदाते हुए) "हम्म... इतनी जल्दी? ठीक है, अपना ख्याल रखना।"

 
राज कमरे से बाहर आता है। सीढ़ियों से उतरते ही डाइनिंग टेबल पर करीम उसे नाश्ता परोसते हुए मिलता है।

 
करीम: "साहब, आपका नाश्ता तैयार है। जूस अभी निकालूँ या आप सीधा कॉफी लेंगे?"

 
राज: "नहीं करीम, बस ये सैंडविच काफी है। मुझे देरी हो रही है। और सुनो..."

 
करीम: "जी साहब?"

 
राज: (घड़ी देखते हुए) "देखो करीम, मेमसाहब अभी ऊपर गहरी नींद में सो रही हैं। उन्हें अभी बिल्कुल भी परेशान मत करना। जब वो अपनी मर्ज़ी से जागें और खुद नीचे आएँ, तभी उनके लिए ताज़ा नाश्ता तैयार करना।"

 
करीम: (सिर झुकाकर, दबी आवाज़ में) "जी साहब, समझ गया। मेमसाहब के नीचे आने पर ही नाश्ता परोसा जाएगा।"

 
राज: "ठीक है। ध्यान रखना।"

 
करीम: (अपनी नज़रें नीचे झुकाते हुए) "जी, बिल्कुल साहब। जैसा आप कहें।"

 
राज मुख्य दरवाजे से बाहर निकल जाता है। करीम खड़ा होकर राज की गाड़ी को गेट से बाहर जाते हुए देखता रहता है। जैसे ही सन्नाटा छाता है, करीम के चेहरे के भाव बदलने लगते हैं।

 
करीम: (खुद से फुसफुसाते हुए) "साहब चले गए... अब बस मैं और इस सूने बंगले में जवान मेमसाहब..."

 
करीम की नज़रें धीरे-धीरे ऊपर की मंज़िल के बंद कमरे की ओर उठती हैं।

 
राज के जाते ही करीम के भीतर की उत्तेजना और भी बढ़ गई। उसने तेज़ी से अपने क्वार्टर का रुख किया ताकि वह अनीता के सामने आने से पहले खुद को संवार सके।

 
करीम अपने क्वार्टर के आईने के सामने खड़ा होकर जोश में खुद से बातें कर रहा है। वह अपना टूथब्रश उठाता है और उसे ज़ोर-ज़ोर से रगड़ने लगता है।

 
करीम (तेज़ी से दाँत रगड़ते हुए): "साला, सारा खेल तो बातचीत का होता है। अगर मुँह से बीड़ी या खाने की गंदी बदबू आई, तो मेमसाहब बात करना तो दूर, पास फटकने भी नहीं देंगी। आज दाँतों को ऐसा चमकाएंगे कि बात करते वक्त उनकी नज़र न हटे।"

 
कुल्ला करके वह अपने दाँतों की सफेदी जाँचता है और संतुष्ट होकर सिर हिलाता है।

 
करीम: "अब ठीक है... एकदम चकाचक। साँसों में ताज़गी रहेगी, तभी तो मेमसाहब के करीब जाकर कुछ बोल पाएंगे। बिना सफाई के तो वो सीधे दुत्कार देंगी।"

 
 
करीम (बाल्टी में पानी भरते हुए और खुद से बुदबुदाते हुए): "आज मौका भी है और दस्तूर भी। राज साहब तो गए, अब पूरे बंगले में बस हम हैं और मेमसाहब। आज उन्हें दिखाना होगा कि ई करीम सिर्फ झाड़ू-पोछा करने वाला नौकर नहीं है।"

 
वह मग से अपने शरीर पर पानी डालता है और साबुन रगड़ने लगता है।

 
करीम (रगड़-रगड़ कर नहाने के बाद इत्र की शीशी खोलते हुए): "इंटरनेट पर उन कहानियों में तो लिखा रहता है कि मेमसाहब को मर्दों के पसीने की बदबू पसंद आती है... पर धत! हम ई सब बकवास पर यकीन नहीं करते। साला, कोई भी औरत गंदी बदबू के पास काहे आएगी? साफ़-सुथरे रहेंगे तभी तो पास बैठने देंगी।"

 
करीम (अपनी लुंगी के नीचे उभार को महसूस करते हुए और एक कुटिल मुस्कान के साथ): "बेशक, हमारे पास ई जो 10 इंच का लंबा और मोटा लौड़ा कुदरत ने दिया है, ई तो किसी भी मेमसाहब को अपना गुलाम बना ले। जब ई बाहर निकलेगा तो उनकी आँखें फटी की फटी रह जाएँगी। पर ई तो बाद की बात है... अभी तो मेमसाहब को फुसलाना है, उन्हें अपनी बातों के जाल में फँसाना है।"

 
करीम (अपनी सबसे अच्छी कमीज़ पहनकर आईने में खुद को देखते हुए): "भगवान ने बस तीन ही चीज़ें तो दमदार दी हैं हमें—एक ई ऊँचा-पूरा कद, दूसरी ई मीठी ज़बान, और तीसरा ई लुंगी के अंदर छिपा हमारा 10 इंच का लंबा और मोटा लौड़ा।"

 
करीम (एक कुटिल मुस्कान के साथ नीचे की ओर इशारा करते हुए): "बेशक, ई जो लौड़ा दिया है कुदरत ने, ई तो अच्छे-अच्छों की चीखें निकलवा दे। पर ई तो आखिर में काम आएगा, जब मेमसाहब पूरी तरह काबू में होंगी। अभी तो उन्हें फुसलाना है।"

 
करीम (बालों पर हाथ फेरते हुए): "आज तो ई मीठी ज़बान से उनकी रेशमी तवचा की ऐसी तारीफ करेंगे कि वो खुद-ब-खुद पिघल जाएँगी। रात जो 'बू-ब्स' वाला सबक शुरू किया था, आज उसे पूरा परवान चढ़ाना ही होगा।"

 


 
 
सुबह के 9:00 बजे। अनीता अपने बेडरूम के बड़े आईने के सामने खड़ी है। उसने बैंगनी रंग की पारदर्शी साड़ी पहनी है, जो उसकी गोरी कमर और गहरी नाभि को पूरी तरह नुमाया कर रही है। वह अपनी उँगलियों से ब्लाउज की डोरी ठीक करती है।

 
अनीता साड़ी के पल्लू को थोड़ा और सरकाती है ताकि उसके उभार और स्पष्ट दिखें। वह अपने स्तनों को धीरे से सहलाती है और पिछली रात की एक बात याद कर मुस्कुराने लगती है।

 
अनीता: (आईने में खुद को निहारते हुए) "आज तो इस बैंगनी रंग में गजब ढा रही हूँ... वैसे कल रात करीम क्या बक रहा था? कह रहा था कि मेमसाहब के  चूचे तो काजल अग्रवाल से भी ज़्यादा ज़बरदस्त और बड़े हैं।"

 
वह थोड़े गर्व के साथ अपने उभारों को हाथों से ऊपर की ओर थोड़ा उभारती है।

 
अनीता: (हल्की हंसी के साथ) "क्या ज़बान है उसकी... काजल अग्रवाल से तुलना? पर देखा जाए तो वह गलत भी नहीं था,सच में उस हीरोइन से भी बड़े और मादक लग रहे हैं। शायद इसीलिए करीम की नीयत डोल रही है। चलो, देखते हैं आज वह इन्हें देखकर अपनी आँखें कहाँ टिकाता है।"

 
अनीता एक गहरी साँस भरती है जिससे उसका सीना और तन जाता है, और फिर वह मस्तानी चाल से कमरे से बाहर निकलती है।

 
करीम डाइनिंग एरिया में खड़ा अनीता के नीचे आने का इंतज़ार कर रहा था। जैसे ही उसने सीढ़ियों पर सरसराहट सुनी, उसका दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। अनीता को देखते ही उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

 
करीम: (मन ही मन, लार टपकाते हुए) "अरे बाप रे! आज तो मेमसाहब ने कत्ल करने की ही ठानी है। ई बैंगनी साड़ी है या कोई जाल... साला इनका पेट तो एकदम नंगा दिख रहा है, और वो गहरी नाभि... कसम से जान ले लेगी।"

 
वह अपनी नज़रें अनीता के उभारों पर टिका देता है जो टाइट ब्लाउज में पूरी तरह उभर कर आ रहे थे।

 
करीम: (बुदबुदाते हुए) "और ई चूचे... ई तो ब्लाउज के भीतर ऐसे तनकर खड़े हैं जैसे साला हमें ललकार रहे हों। जैसे खुद ही बोल रहे हों— 'ए करीम, देख का रहे हो? हिम्मत है तो आ के पकड़ काहे नहीं लेते!' सच में, आज तो काजल अग्रवाल भी इनके सामने कुछ नहीं है। ई चीज़ ही कुछ और है, आज तो ई साला ब्लाउज फटने को तैयार है।"

 
अनीता करीम की जलती हुई नज़रों को महसूस करती है और अपनी चाल और भी मस्तानी कर देती है।

 
अनीता रसोई की दहलीज पर खड़ी होकर अपनी बैंगनी साड़ी के पल्लू को कंधे से थोड़ा और नीचे सरका देती है। करीम की फटी आँखें उसके उभरे हुए वक्षों और नंगी गोरी पीठ पर जम जाती हैं।

 
अनीता: (मदहोश करने वाली आवाज़ में) "सुबह बखैर, करीम बाबा... साहब चले गए क्या?"

 
करीम: (अपनी सूखी ज़ुबान होंठों पर फेरते हुए) "जी अनीता बेटी... हुज़ूर तो 7 बजे ही निकल गए। हम तो बस तब से आपका ही इंतज़ार कर रहे थे। आइये, पहले नाश्ता करेंगे या सीधा कुकिंग टिप्स शुरू करें?"

 
अनीता: (रसोई के स्लैब पर अपनी गोरी कमर टिकाते हुए) "नहीं करीम बाबा... पहले पेट की आग बुझाते हैं। अच्छी कड़क चाय और नाश्ता लाओ, उसके बाद आराम से आपसे वो खास 'टिप्स' लूँगी।"

 
अनीता डाइनिंग टेबल पर जाकर बैठ जाती है। करीम परांठे लेकर आता है और 6'2" की अपनी ऊँचाई का फायदा उठाते हुए ठीक उसके पीछे खड़ा हो जाता है।

करीम: (मन ही मन, अनीता की गहरी और नंगी पीठ को ताकते हुए) "उफ़... ई गोरी और चिकनी पीठ। साला मन कर रहा है कि अपने इन हाथों से इस मखमली चमड़ी को बुरी तरह मसल दूँ। साला राज साहब क्या किस्मत लेकर पैदा हुए हैं।"

 
करीम परांठा रखने के लिए जैसे ही अनीता के बगल से झुकता है, उसे ब्लाउज से बाहर झाँकती उसकी गहरी घाटी और तने हुए वक्ष साफ़ नज़र आते हैं।

 
करीम: (बुदबुदाते हुए) "अनीता बेटी... आपके ये सफ़ेद और सुडौल मम्मे तो साला हमें पागल बना रहे हैं। मन तो कर रहा है कि ई परांठा-वराठा छोड़ के तुम्हारे इन रसीले अंगूरों को ही मुँह में भर लूँ और जी भर के चूसूँ। ई 'बेटी' जब हमरी बाँहों में तड़पेगी, तब आएगा असली मज़ा।"
 

नाश्ता खत्म करके अनीता हाथ धोने के लिए सिंक की ओर झुकती है। झुकते ही उसकी साड़ी उसकी सुडौल और गोल गांड पर चिपक जाती है, जिससे उसका उभार और भी कयामत ढाने लगता है।

 
करीम: (पीछे खड़ा होकर अपनी लुंगी में मच रही हलचल को महसूस करते हुए) "हाय रब्बा! ई गांड है या कोई कयामत। झुकने से तो ई और भी उभर के बाहर आ गई है। साला, लुंगी फाड़ के बाहर आने को बेताब है हमरा लौड़ा।"

 
अनीता: (हाथ पोंछते हुए पलटी और करीम की जलती नज़रों को देखकर मुस्कुराई) "करीम बाबा... हाथ तो धो लिए। अब चलें रसोई के अंदर? वो कुकिंग टिप्स सीखने के लिए मैं बहुत बेताब हूँ।"

 
करीम: (भारी आवाज़ में) "जी बेटी... बिल्कुल। हम तो खुद आपके हुक्म के गुलाम हैं। आइये अंदर..."

 
अनीता रसोई की तंग जगह में करीम के इतने करीब आ जाती है कि उसके उभरे हुए वक्ष करीम के चौड़े सीने को छूने-छूने को होते हैं। इत्र और जवान बदन की मिली-जुली महक से करीम का सिर चकराने लगता है।

अनीता: (करीम की आँखों में शरारत से झाँकते हुए) "अरे वाह करीम जी! क्या बात है... आज तो आप बड़े चमक रहे हैं? साफ़-सुथरे दाँत, चेहरे पर ये नूर... सुबह-सुबह इतना सज-धज कर किसके इंतज़ार में खड़े हैं?"

 
अनीता करीम के करीब अपनी नाक ले जाती है और एक गहरी साँस भरती है, जिससे उसके चूचे ब्लाउज में और भी तन जाते हैं।

 
अनीता: "और ये खुशबू... उफ़! इत्र लगाया है क्या? आज तो आपके कपड़े भी बड़े सलीकेदार लग रहे हैं। कहीं आज छुट्टी लेकर किसी 'खास' से मिलने जाने का इरादा तो नहीं?"

 
करीम: (अपनी आवाज़ को भारी और मर्दाना बनाते हुए) "मालकिन, हम बाहर काहे जायेंगे? जब साक्षात अप्सरा जैसी मूरत घर में ही हो, तो बाहर आँखें भटकाने का क्या फायदा?"

 
करीम की नज़रें अनीता के चेहरे से फिसलकर उसकी उस गहरी नाभि और नंगी कमर पर जम जाती हैं जो बैंगनी साड़ी के नीचे से बार-बार झाँक रही थी।

 
करीम: "बस मन किया कि आज थोड़ा साफ़-सुथरे ढंग से आपके सामने आयें। आपकी दूध जैसी सफेद त्वचा की चमक के आगे हम थोड़े मैले लग रहे थे ना, इसलिए सोचा थोड़ा नहा-धो कर आपके 'काबिल' बन जायें।"

 
करीम: (अनीता की कमर की ओर हाथ बढ़ाते हुए, पर बिना छुए) "और अनीता बेटी, सच कहें तो आज आप इस बैंगनी रंग में कयामत ढा रही हैं। ई रंग आपकी गोरी देह पर ऐसा खिल रहा है जैसे काले बादलों के बीच बिजली कौंध रही हो। इस साड़ी के नीचे से जो आपकी कमर की लचक दिख रही है... उफ़! आज तो आपने इस बूढ़े को पागल करने की कसम खा ली है।"

 
अनीता: (खिलखिलाकर हँसते हुए) "लो! करीम बाबा, आप फिर से शुरू हो गए? आपकी ये तारीफें कभी खत्म नहीं होतीं क्या? सुबह-सुबह ही अपनी मीठी बातों का पिटारा खोल दिया।"

अनीता: (मन ही मन) "ये बुड्ढा भी ना... बातें तो ऐसी करता है जैसे कोई मंझा हुआ आशिक हो। मेरी जवानी और इस बैंगनी साड़ी का इसे मुझसे ज़्यादा होश है। देख कैसे रहा है... जैसे अभी कच्चा चबा जाएगा।"
Deepak Kapoor
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RE: अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play) - by Deepak.kapoor - 04-01-2026, 11:44 AM



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