03-01-2026, 02:42 PM
"मुझे नामर्द कहती है। ये ले!", थोड़ी देर मे लंड खड़ा हो गया और उसने उसे मलिका की चूत मे पेल दिया और ज़ोरदार धक्के मारने लगा। उसने अपने दाँत उसकी बड़ी, गोल धइले मे गढ़ा दिए। मलिका को और क्या चाहिए था!
मलिका पागलों की तरह हँसने लगी और अपनी टांगे उसकी कमर पे लपेट दी और नीचे से अपनी कमर हिलाने लगी और फिर जब्बार के कंधे पे इतनी ज़ोर से काटा की उसके खून निकल आया।
यहाँ से आगे....................
मेनका अपने मायके से वापस राजपुरा आ गयी थी।सवेरे उठ कर वो नीचे रसोई मे खानसमे से बात करने पहुचि।
"नमस्कार, कुँवरनी जी।"
"नमस्कार, खानसमा साहेब। आज का मेनू डिसाइड कर ले।"
"कुँवरनी जी, नाश्ते का हुक्म तो राजासाहेब ने कल रात आपके वापस आने के पहले ही दे दिया था। आप दिन के बाकी खाने का मेनू के बारे में हमे हुक्म कर दें।"
मेनका ने बाकी मेनू डिसाइड कर के जब नाश्ते का मेनू देखा तो उसे प्लीजेंट सरप्राइज़ हुआ। उसके ससुर ने केवल उसकी पसंद की चीज़ें बनाने का हुक्म दिया था। तभी उसके दिमाग़ मे एक ख़याल आया।
"खानसमा साहब, हमे पिताजी की पसंद-नापसंद के बारे मे दिटेइल से बताएँ और साथ-साथ ये भी कि मेडिकल रीज़न्स की वजह से तो उन्हे कोई परहेज़ तो नही करना पड़ता!"
थोड़ी देर बाद मेनू रिवाइज़ किया गया। मैत्री पटेल रचित[b]।[/b]
नाश्ते के बाद दोनो बाप-बेटे ऑफीस चले गये और मेनका महल का सारा सिस्टम समझने लगी। हर काम के लिए नौकर-नौकरानी थे। उन्हे पता भी था कि उन्हे क्या करना है। शाम तक मेनका ने पूरा सिस्टम समझ लिया और पूरे स्टाफ को कुछ नयी बातें भी समझा दी।
रात के खाने पे राजासाहब खुशी से उछल पड़े। केवल उनके पसंद की चीज़ें थी टेबल पर।
"खानसमा साहब, आज आप हम पर इतने मेहेरबान कैसे हो गये, भाई?"
"महाराज। ये सब हमने कुँवरनीसाहिबा के कहने पे बनाया है।"
"दुल्हन, आपको हुमारी पसंद के बारे मे कैसे पता चला?"
"जैसे आपको हुमारी पसंद के बारे मे पता चला।", मेनका ने जवाब दिया और दोनो हंस पड़े।
शाम के 7 बजे थे, अंधेरा गहरा रहा था जब राजपुरा से निकल कर वो ग्रे कलर की लेन्द्कृज़ ने 5 मिनट के बाद हाइवे छोड़ दिया ओर एक पतली सड़क पे चलने लगी और एक5 मिनट बाद कुछ झोपड़ियों के पास पहुच कर रुक गयी। ड्राइवरसाइड का शीशा 4 इंच नीचे हुआ और एक 50 का नोट बाहर निकला जिसे उस आदिवासी ने लपक के पकड़ लिया जो गाड़ी देख कर भागता हुआ आया था। बदले मे उसने एक छोटी बॉटल गाड़ी के अंदर दे दी।
उसके बाद वो ग्रे कलर की, गहरे काले शीशों वाली लेन्द्कृज़र वापस लौटने लगी। हाइवे से थोड़ा पहले कार रुक गयी। अंदर बैठे विश्वजीत ने बॉटल खोल के अपने मुँह से लगा ली। सस्ती शराब जब हलक से नीचे उतरी तो उसे जलन महसूस हुई पर इसी जलन मे उसे सुकून मिलता था।
राजा यशवीर का बेटा, भावी राजा, अखुट दौलत का मलिक जो चाहे, दुनिया की महँगी से महँगी शराब पी सकता था आदिवासियों द्वारा घर मे बनाई हुई 50 रुपये की शराब मे चैन पाता था। वाकाई इंसान भगवान की सबसे अजीबो-ग़रीब ईजाद है।
विश्वा को वो दिन याद आया जब वो अपने बड़े भाई के साथ घूमते हुए यहा आया था और उन्होने इन आदिवासियों से जंगली खरगोश पकड़ना सीखा था। अपने गुज़रे हुए भाई की याद आते ही उसकी आँखो मे पानी आ गया। मैत्री पटेल की रचना[b]।[/b]
"क्यू चले गये तुम भाई? क्यू? तुम गये और मैं यहा अकेला रह गया इन झंझटों के बीच मे। तुम जानते थे मुझे ये बिज़नेस और राजाओं की तरह रहना कितना नापसंद था। फिर भी मुझे छोड़ कर चले गये।", विश्वा बुदबुडाया और एक घूँट और भरी।
"मर्यादा,शान..डिग्निटी! बस यही रह गया है मेरी लाइफ मे। चलो तो ख्याल रहे कि हम किस ख़ानदान के हैं, बात करो तो ध्यान रहे कि हुमारी मर्यादा क्या है...यहा तक की शादी भी करो तो...हुन्ह।"
विश्वा हमेशा सोचता था कि यूधवीर राजा बनेगा और वो आराम से जैसे मर्ज़ी विदेश मे रह सकता था। शादी मे तो उसे विश्वास ही नही था। उसका मानना था कि जब तक जी करे साथ रहो और जिस दिन डिफरेन्सस हो अलग हो जाओ। शादी तो बस मर्द-औरत के ऐसे सिंपल रिश्ते को कॉंप्लिकेट करती थी।
उसने बॉटल ख़तम करके बाहर फेंकी की तभी एक लंबा, गोरा छोटे बालों वाला क्लीन शेवन इंसान उसके पास पहुचा, "सलाम,साब।"
उस अजनबी को देखते ही विश्वा के हाथ अपने कोट मे रखे पिस्टल पर चले गये।
"सलाम,साब। मेरा नाम विकी है। मुझे लगता है कि मेरे पास आपके काम की चीज़ है।"
"दफ़ा हो जाओ।", कहकर विश्वा गाड़ी गियर मे डालने लगा।
"साहब, बस एक बार मेरा सामान देख लीजिए। कसम से मैं आपका दुश्मन नही बस एक छोटा सा व्यापारी हू जिसे लगता है कि उसके माल के असल कदरदान आप ही है।"
विश्वा ने बिना कुछ बोले गाड़ी रोकी पर बंद नही की और उसका एक हाथ कोट के अंदर ही रहा।
विकी ने अपनी जेब से दो छोटे पॅकेट्स निकाले जिसमे एक मे सफेद पाउडर था और दूसरे मे छोटे-छोटे टॅब्लेट्स।
विश्वा समझ गया कि विकी एक ड्रग डीलर था और ये सिकैने और एकस्टसी थे।
"मैं ये सब नही लेता।"
"साहब, ना तो मैं पोलीस का आदमी हू ना तो आपको फँसाने की कोशिश कर रहा हूँ। आपके जैसे मैं भी इन लोगों से महुआ लेने आता हूँ। आज आपको देखा तो मेरे अंदर का बिज़नेसमॅन कहने लगा कि इतने मालदार आदमी को 50 रुपये की शराब क्यू चाहिए! इसीलिए ना कि वो कोई नया नशा चाहता है।"
विश्वा ने विकी की आँखों मे घूर के देखा। सच कह रहा था वो। वो नशे मे सुकून ही तो तलाश रहा था। मैत्री पटेल द्वारा रूपांतरित[b]।[/b]
"..मैं यही नाथुपुरा का रहनेवाला हूँ। शहर मे मेरी मोबाइल शॉप है। थोड़ी एक्सट्रा इनकम के लिए ये धंधा करता हू। भरोसे का आदमी हू साहब। माल भी असली देता हूँ। एक बार ट्राइ करो साहब।"
"कीमत क्या है?"
विकी के चेहरे पर मुस्कान फैल गयी।
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आगे लिख रही हूँ कही जाइएगा नहीं...............
मलिका पागलों की तरह हँसने लगी और अपनी टांगे उसकी कमर पे लपेट दी और नीचे से अपनी कमर हिलाने लगी और फिर जब्बार के कंधे पे इतनी ज़ोर से काटा की उसके खून निकल आया।
यहाँ से आगे....................
मेनका अपने मायके से वापस राजपुरा आ गयी थी।सवेरे उठ कर वो नीचे रसोई मे खानसमे से बात करने पहुचि।
"नमस्कार, कुँवरनी जी।"
"नमस्कार, खानसमा साहेब। आज का मेनू डिसाइड कर ले।"
"कुँवरनी जी, नाश्ते का हुक्म तो राजासाहेब ने कल रात आपके वापस आने के पहले ही दे दिया था। आप दिन के बाकी खाने का मेनू के बारे में हमे हुक्म कर दें।"
मेनका ने बाकी मेनू डिसाइड कर के जब नाश्ते का मेनू देखा तो उसे प्लीजेंट सरप्राइज़ हुआ। उसके ससुर ने केवल उसकी पसंद की चीज़ें बनाने का हुक्म दिया था। तभी उसके दिमाग़ मे एक ख़याल आया।
"खानसमा साहब, हमे पिताजी की पसंद-नापसंद के बारे मे दिटेइल से बताएँ और साथ-साथ ये भी कि मेडिकल रीज़न्स की वजह से तो उन्हे कोई परहेज़ तो नही करना पड़ता!"
थोड़ी देर बाद मेनू रिवाइज़ किया गया। मैत्री पटेल रचित[b]।[/b]
नाश्ते के बाद दोनो बाप-बेटे ऑफीस चले गये और मेनका महल का सारा सिस्टम समझने लगी। हर काम के लिए नौकर-नौकरानी थे। उन्हे पता भी था कि उन्हे क्या करना है। शाम तक मेनका ने पूरा सिस्टम समझ लिया और पूरे स्टाफ को कुछ नयी बातें भी समझा दी।
रात के खाने पे राजासाहब खुशी से उछल पड़े। केवल उनके पसंद की चीज़ें थी टेबल पर।
"खानसमा साहब, आज आप हम पर इतने मेहेरबान कैसे हो गये, भाई?"
"महाराज। ये सब हमने कुँवरनीसाहिबा के कहने पे बनाया है।"
"दुल्हन, आपको हुमारी पसंद के बारे मे कैसे पता चला?"
"जैसे आपको हुमारी पसंद के बारे मे पता चला।", मेनका ने जवाब दिया और दोनो हंस पड़े।
शाम के 7 बजे थे, अंधेरा गहरा रहा था जब राजपुरा से निकल कर वो ग्रे कलर की लेन्द्कृज़ ने 5 मिनट के बाद हाइवे छोड़ दिया ओर एक पतली सड़क पे चलने लगी और एक5 मिनट बाद कुछ झोपड़ियों के पास पहुच कर रुक गयी। ड्राइवरसाइड का शीशा 4 इंच नीचे हुआ और एक 50 का नोट बाहर निकला जिसे उस आदिवासी ने लपक के पकड़ लिया जो गाड़ी देख कर भागता हुआ आया था। बदले मे उसने एक छोटी बॉटल गाड़ी के अंदर दे दी।
उसके बाद वो ग्रे कलर की, गहरे काले शीशों वाली लेन्द्कृज़र वापस लौटने लगी। हाइवे से थोड़ा पहले कार रुक गयी। अंदर बैठे विश्वजीत ने बॉटल खोल के अपने मुँह से लगा ली। सस्ती शराब जब हलक से नीचे उतरी तो उसे जलन महसूस हुई पर इसी जलन मे उसे सुकून मिलता था।
राजा यशवीर का बेटा, भावी राजा, अखुट दौलत का मलिक जो चाहे, दुनिया की महँगी से महँगी शराब पी सकता था आदिवासियों द्वारा घर मे बनाई हुई 50 रुपये की शराब मे चैन पाता था। वाकाई इंसान भगवान की सबसे अजीबो-ग़रीब ईजाद है।
विश्वा को वो दिन याद आया जब वो अपने बड़े भाई के साथ घूमते हुए यहा आया था और उन्होने इन आदिवासियों से जंगली खरगोश पकड़ना सीखा था। अपने गुज़रे हुए भाई की याद आते ही उसकी आँखो मे पानी आ गया। मैत्री पटेल की रचना[b]।[/b]
"क्यू चले गये तुम भाई? क्यू? तुम गये और मैं यहा अकेला रह गया इन झंझटों के बीच मे। तुम जानते थे मुझे ये बिज़नेस और राजाओं की तरह रहना कितना नापसंद था। फिर भी मुझे छोड़ कर चले गये।", विश्वा बुदबुडाया और एक घूँट और भरी।
"मर्यादा,शान..डिग्निटी! बस यही रह गया है मेरी लाइफ मे। चलो तो ख्याल रहे कि हम किस ख़ानदान के हैं, बात करो तो ध्यान रहे कि हुमारी मर्यादा क्या है...यहा तक की शादी भी करो तो...हुन्ह।"
विश्वा हमेशा सोचता था कि यूधवीर राजा बनेगा और वो आराम से जैसे मर्ज़ी विदेश मे रह सकता था। शादी मे तो उसे विश्वास ही नही था। उसका मानना था कि जब तक जी करे साथ रहो और जिस दिन डिफरेन्सस हो अलग हो जाओ। शादी तो बस मर्द-औरत के ऐसे सिंपल रिश्ते को कॉंप्लिकेट करती थी।
उसने बॉटल ख़तम करके बाहर फेंकी की तभी एक लंबा, गोरा छोटे बालों वाला क्लीन शेवन इंसान उसके पास पहुचा, "सलाम,साब।"
उस अजनबी को देखते ही विश्वा के हाथ अपने कोट मे रखे पिस्टल पर चले गये।
"सलाम,साब। मेरा नाम विकी है। मुझे लगता है कि मेरे पास आपके काम की चीज़ है।"
"दफ़ा हो जाओ।", कहकर विश्वा गाड़ी गियर मे डालने लगा।
"साहब, बस एक बार मेरा सामान देख लीजिए। कसम से मैं आपका दुश्मन नही बस एक छोटा सा व्यापारी हू जिसे लगता है कि उसके माल के असल कदरदान आप ही है।"
विश्वा ने बिना कुछ बोले गाड़ी रोकी पर बंद नही की और उसका एक हाथ कोट के अंदर ही रहा।
विकी ने अपनी जेब से दो छोटे पॅकेट्स निकाले जिसमे एक मे सफेद पाउडर था और दूसरे मे छोटे-छोटे टॅब्लेट्स।
विश्वा समझ गया कि विकी एक ड्रग डीलर था और ये सिकैने और एकस्टसी थे।
"मैं ये सब नही लेता।"
"साहब, ना तो मैं पोलीस का आदमी हू ना तो आपको फँसाने की कोशिश कर रहा हूँ। आपके जैसे मैं भी इन लोगों से महुआ लेने आता हूँ। आज आपको देखा तो मेरे अंदर का बिज़नेसमॅन कहने लगा कि इतने मालदार आदमी को 50 रुपये की शराब क्यू चाहिए! इसीलिए ना कि वो कोई नया नशा चाहता है।"
विश्वा ने विकी की आँखों मे घूर के देखा। सच कह रहा था वो। वो नशे मे सुकून ही तो तलाश रहा था। मैत्री पटेल द्वारा रूपांतरित[b]।[/b]
"..मैं यही नाथुपुरा का रहनेवाला हूँ। शहर मे मेरी मोबाइल शॉप है। थोड़ी एक्सट्रा इनकम के लिए ये धंधा करता हू। भरोसे का आदमी हू साहब। माल भी असली देता हूँ। एक बार ट्राइ करो साहब।"
"कीमत क्या है?"
विकी के चेहरे पर मुस्कान फैल गयी।
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आगे लिख रही हूँ कही जाइएगा नहीं...............


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