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Adultery हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)
#14
भाग ~ ०३




मंजू काकी उसी खेत में कटाई कर रहीं थी जिस खेत में मैं कटे हुए गेहूं की पुल्लियां बना रहा था। असल में उस वक्त खेत में अभी भी गेहूं की थोड़ी सी कटाई बाकी थी। इसके पहले शायद वो इसी खेत की कटाई कर रही थी तभी तो वो मां और संगीता काकी के साथ नहीं गई थी।

काकी मुझसे थोड़ा दूर थी लेकिन गेहूं के गट्ठे इकट्ठा करने के लिए मैं खेतों पर कई तरफ जा रहा था। इससे बार बार मेरी नजर कटाई कर रही काकी पर पड़ जाती थी। मैं हर बार सोचता कि जा कर काकी से पूछूं लेकिन हर बार मेरी हिम्मत जवाब दे जाती थी। मैं मन मसोस कर दुबारा अपना काम करने लग जाता था।

मैंने करीब सारे कटे हुए गेहूं की पुल्लियां बना डाली थी। अब सिर्फ वही बची थी जिसे काकी काट काट कर अपने पास ही रखती जा रही थी। मतलब अब अगर मुझे उन कटे हुए गेहूं की भी पुल्लियां बनाना है तो इसके लिए मुझे काकी के करीब जाना पड़ता।

काकी के करीब जाने की हिम्मत तो नहीं हो रही थी लेकिन अगर मैं न जाता और उन कटे हुए गेहुंओं की पुल्लियां न बनाता तो श्यामू काका या दशरथ काका मुझसे पूछते कि मैंने खेत के इस तरफ कटे पड़े गेहूं के गट्ठों की पुल्लियां क्यों नहीं बनाई।

आखिर हिम्मत जुटा कर मैं काकी की तरफ चल पड़ा। उधर काकी मेरी तरफ पीठ किए बैठी गेहूं काटने में लगी हुईं थी। मैं अपनी बढ़ी हुई धड़कनों काबू करने का प्रयास करते हुए उस तरफ बढ़ चला। मेरे अंदर एक बार फिर से हलचल शुरू हो गई थी और वही सब दिमाग में चलने लगा था।

काकी को जैसे ही मेरे आने की आहट महसूस हुई उन्होंने पलट कर मेरी तरफ देखा। हम दोनों की नजरें एकदम से मिल गईं। मैं तो जल्दी ही उनसे नजरें हटा कर पास ही पड़े गेहूं के गट्ठे को उठाने में लग गया जबकि वो एकटक मेरी ही तरफ देखे जा रहीं थी।

मैं उस छोटे से गट्ठे को उठा कर दूसरे छोटे गट्ठे में रखने लगा। मैं काकी को देखना नहीं चाहता था मगर जब मैं एक और गट्ठे को उठाने के लिए आगे बढ़ा तो न चाहते हुए भी मेरी नजर काकी पर पड़ गई। इस बार भी मैंने झट से नजर हटा ली और उस दूसरे गट्ठे को उठाने लगा।

ऐसा कभी नहीं होता था कि मैं इस तरह काकी से डरूं और उनसे नजरें न मिला सकूं। बल्कि अक्सर ये होता था कि मैं सबसे बेझिझक हंसता बोलता रहता था। दोनों काकी भी मुझसे खूब हंसती बोलती थीं। मगर आज जो घटना हुई थी और जो कुछ मैंने आंखों से देखा था उसकी वजह से मेरी उनसे नज़र मिलाने की या बात करने की हिम्मत नहीं हो रही थी और न ही काकी की।

मैंने सभी छोटे गट्ठों को एक में रखने के बाद उसे उठाया और उस तरफ चल पड़ा जिधर मैंने जमीन पर बाकी का गट्ठा इकट्ठा कर के रखा था। उस गट्ठे में बाकी के गट्ठे रख कर मैं उसे बांधने लगा। जब वो बंध गया तो मैं फिर से काकी की तरफ चल पड़ा क्योंकि उनकी तरफ अभी भी गेहूं के कटे हुए छोटे छोटे गट्ठे पड़े हुए थे।

"र...राजू।"

तभी काकी की आवाज मेरे कानों में पड़ी तो मैंने चौंक कर उनकी तरफ देखा। पहले तो मुझे यकीन ही न आया कि उन्होंने मुझे पुकारा है लेकिन जब उन्हें अपनी तरफ ही देखता पाया और इशारे से मुझे बुलाता पाया तो यकीन करना ही पड़ा।

काकी ने इधर उधर देखने के बाद फिर से मुझे इशारे से अपने पास बुलाया। मेरी हालत एकदम से अजीब सी हो गई। मन में अजीब अजीब से खयाल आने लगे। मैं सोच में पड़ गया कि काकी मुझे क्यों अपने पास बुला रहीं है। क्या इस लिए कि वो भी बापू की तरह मुझे उस सबके लिए समझाना चाहती हैं और उन्हीं की तरह मुझे किसी चीज का प्रलोभन देना चाहती हैं।

"इधर आओ न राजू।"

जब मैं अपनी जगह पर सोचता खड़ा ही रहा तो काकी ने बेबस हो कर फिर से मुझे बुलाया। अब मेरे पास कोई रास्ता नहीं था। वैसे चाहता तो मैं भी था कि उनसे उस सबके बारे में पूछूं मगर हिम्मत नहीं हो रही थी। आखिर वो मेरी काकी थी। मुझसे उमर में बड़ी थी। मैं तो उन जैसों के लिए अभी बच्चा ही था।

खैर बड़ी झिझक के साथ मैं उनकी तरफ धीमे कदमों से चल पड़ा। मन में कई तरह के खयाल आ रहे थे। धड़कनें बढ़ चलीं थी। गर्मी से पसीना पसीना हो गया था वो अलग। जल्दी ही मैं उनके करीब पहुंच गया और फिर उन्हें सवालिया निगाहों से देखने लगा। हालांकि मैं ज्यादा देर तक उनसे नजरें नहीं मिला सका इस लिए जमीन की तरफ देखने लगा था।

उधर काकी खुद भी शायद घबराई हुईं थी। बाकी दिनों के जैसे उनके चेहरे पर चमक नहीं थी। कुछ देर तक वो खामोशी से मुझे देखती रहीं। शायद समझने की कोशिश कर रहीं थी कि इस वक्त मेरे अंदर क्या चल रहा होगा या मैं क्या सोच रहा होऊंगा उनके बारे में।

"राजू....क्...क्या तुमने उस समय सच में सब कुछ देख लिया था।"

काकी ने मुझसे ये पूछा तो मैंने सिर उठा कर उनकी तरफ देखा। मेरी धड़कनें अब और भी ज्यादा बढ़ चलीं थी। मेरे अंदर अजीब सी गुड़मुड़ होने लगी थी।

"ब..बताओ न राजू। क्या सच में तुमने देख लिया था।"

काकी को शायद जानने की जल्दी थी इस लिए फिर से पूछ बैठीं थी मुझसे।

"तु...तुम किस बारे में पू...पूछ रही हो काकी।" मैंने झिझकते हुए पूछा।

"तुम अच्छे से जानते हो कि मैं किस बारे में पूछ रही हूं।"

काकी जबरन मुझसे नजरें मिला कर बात कर रहीं थी। उनके चेहरे पर डर के भाव दिख रहे थे। इधर मैं चुप्पी साध कर उन्हें ही देखे जा रहा था। इस बार मैं बराबर उनसे नजरें मिलाए रखा था। शायद मेरे अंदर का डर या घबराहट अब थोड़ी कम होने लगी थी।

"तुम बहुत गंदी हो काकी। मुझे तुमसे कोई बात नहीं करना।"

अचानक मेरे मुंह से ये निकल गया जबकि मैं ऐसा बोलना नहीं चाहता था बल्कि मैं तो उनसे सब कुछ जानना ही चाहता था।

"मु...मुझे माफ कर दो राजू।" मेरी बात सुनते ही एकदम से काकी का गला भर आया। आवाज लड़खड़ा गई─"मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई है। भगवान के लिए किसी को कुछ मत बताना नहीं तो मैं किसी को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहूंगी।"

अचानक से उनको इस तरह गिड़गिड़ाते देख मेरे अंदर का बचा हुआ डर छू मंतर हो गया। मैं ये सोच कर शेर बन गया कि ये तो खुद ही मुझसे डरी हुई हैं और अब मुझसे मिन्नतें भी कर रही हैं। ये सोचते ही मेरे अंदर का डर दूर हो गया था और अब मैं बेझिझक उनसे वो पूछने का मन बना बैठा था जो बहुत देर से पूछना चाह रहा था मगर पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

"क्यों काकी।" मैं अब पूरे आत्म विश्वास से उनको देखते हुए बोला─"तुमने मेरे बापू के साथ मिल कर ऐसा गंदा काम क्यों किया और अब कह रही हो कि मैं किसी को कुछ न बताऊं।"

"राजू मैं तुम्हारे पांव पड़ती हूं। भगवान के लिए किसी को कुछ मत बताना।"

कहने के बाद काकी एकदम से रोने ही लगीं। उनकी आंखों से आंसू बह चले। मुझे उनका रोना अच्छा तो नहीं लगा मगर अचानक ही मेरे मन में विचार आया कि अगर मैं इसी तरह सख्ती दिखाऊं तो शायद वो मेरे हर सवाल का जवाब देने के लिए मजबूर हो जाएंगी।

"मैं तो अब सबको बताऊंगा काकी।" मैंने झट से कहा─"और सबसे पहले ये बात दशरथ काका को बताऊंगा। उनको बताऊंगा कि कैसे तुम उनको धोखा दे कर मेरे बापू के साथ मुंह काला कर रही थी।"

"न...नहीं नहीं।" काकी बुरी तरह घबरा गईं─"नहीं राजू....भगवान के लिए मुझ पर दया करो। काका को कुछ मत बताना। अगर तुमने ऐसा किया तो वो मुझे जान से मार देंगे। क्या तुम चाहते हो कि मैं मर जाऊं।"

"तो क्यों ऐसा गंदा काम किया तुमने।"

"गलती हो गई राजू। माफ कर दो मुझे और भगवान के लिए उस बारे में किसी को कुछ मत बताना। मैं तुमसे वादा करती हूं कि अब से कभी ऐसा नहीं करूंगी।"

काकी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा। इधर उनको गिड़गिड़ाता देख मुझे अब अचानक से एक अलग ही तरह का एहसास होने लगा था। मैं सोचने लगा कि अब तो मैं काकी से खुल कर इस बारे में बात कर सकता हूं। उधर काकी इस लिए कुछ नहीं कह पाएंगी क्योंकि इस वक्त वो अपराध बोध से डरी हुई हैं। और तो और मेरे रहमो करम पर भी हैं।

"वैसे कब से तुम बापू के साथ ये काम कर रही हो।"

"वो...वो बस आज ही गलती से ऐसा हुआ है राजू। माफ कर दो न मुझे।"

"झूठ बोल रही हो तुम।" मैंने नाराजगी दिखाई─"मैं इतना भी भोला नहीं हूं जो ये न समझ सकूं कि इस तरह का नाजायज संबंध कोई अचानक से और एक ही दिन में बना लेगा।"

मेरी ये बात सुनते ही काकी हैरानी से मेरी तरफ देखने लगीं। शायद वो सच में अभी तक यही समझ रहीं थी कि मैं बहुत भोला और नादान हूं। दुनियादारी की कोई समझ नहीं है मुझे और तो और इस तरह के कामों का तो कोई ज्ञान ही नहीं है मुझे। मतलब कि पूरी तरह बच्चा ही समझ रखा है सबने मुझे।

"क्या मैं गलत कह रहा हूं काकी।" उन्हें चुप देख मैंने पूछा।

"न...नहीं तुम सच कह रहे हो।" काकी ने शर्म और झिझक से सिर झुका कर कहा─"वो....वो बात ये है कि ये सब एक महीना पहले शुरू हुआ था।"

"अच्छा....मतलब एक महीने से तुम और बापू ये गंदा काम कर रहे हो।" मैंने हैरानी से कहा─"क्या तुम लोगों को एक बार भी नहीं लगा कि ये कितना गलत काम है। अरे जब मैं जानता हूं कि ये गलत है तो तुम दोनों कैसे नहीं जानते होगे।"

"बस भूल हो गई राजू।" काकी की आंखों से फिर आंसू बह चले─"इस वक्त माफ कर दो। अब से कभी ऐसा नहीं करूंगी....वादा करती हूं।"

"नहीं...मैं ऐसे माफ नहीं करूंगा।" मैंने कहा─"मुझे बताओ कि तुमने और बापू ने ये सब कैसे शुरू किया था। मैं जानना चाहता हूं कि ऐसा क्या हो गया था जिसकी वजह से तुम दोनों ने आपस में इतना बड़ा पाप करने का मन बना लिया था।"

"नहीं राजू...ये मत पूछो...मैं तुम्हें ये नहीं बता पाऊंगी।" काकी बेबस हो कर बोली─"तुम मेरे बेटे जैसे हो। मैं कैसे तुम्हें ऐसी बातें बता सकती हूं। नहीं नहीं राजू....भगवान के लिए इस बारे में कुछ मत पूछो और न ही तुम जानो क्योंकि तुम्हें ऐसी बातें नहीं जाननी चाहिए।"

"ठीक है न बताओ।" मैंने कहा─"पर मैं दशरथ काका को सब बताऊंगा...जा रहा हूं मैं।"

"नहीं नहीं...राजू रुक जाओ।" मंजू काकी बुरी तरह डर गई─"भगवान के लिए रुक जाओ और मुझ पर दया करो। तुम तो मेरे बहुत अच्छे बेटे हो। अपनी काकी पर कुछ तो तरस खाओ।"

"जब तक तुम मुझे सब कुछ बताओगी नहीं तब तक मैं कोई तरस नहीं खाऊंगा।" मैंने जैसे अपना फैसला सुनाया─"और हां मां को भी बताऊंगा कि आज बापू और तुम क्या कर रहे थे।"

मेरी ये बात सुन कर काकी और भी ज्यादा डर गईं। चेहरा ऐसे निचुड़ गया जैसे लकवा मार गया हो। काटो तो खून नहीं जैसी हालत हो गई थी उनकी।

काकी अच्छे से समझ चुकी थीं कि अब उनके पास दूसरा कोई रास्ता नहीं बचा है। मतलब कि अब उन्हें सब कुछ बताना ही पड़ेगा मुझे। वो ये भी जानती थीं कि मैं सबका लाडला और दुलारा हूं जिसकी वजह से मैं सबसे बेझिझक कुछ भी बोल दिया करता हूं। भले ही परिवार वाले इस सबको मेरा भोलापन या नादानी समझते हैं लेकिन ये तो सच ही है कि मैं किसी से भी कुछ भी बोल दिया करता हूं।

"तो क्या अब मैं जाऊं।" उनको एकदम चुप देख मैंने कहा─"ठीक है...अगर तुम कुछ नहीं बताओगी तो मजबूरन मुझे सबको तुम्हारा और बापू का ये सच बताना ही पड़ेगा।"

"नहीं नहीं रुक जाओ राजू।" काकी ने एकदम से होश में आ कर कहा─"ठीक है तुम सब कुछ जानना ही चाहते हो तो मैं बता देती हूं तुम्हें मगर तुम भी वादा करो कि इस बारे में कभी किसी को कुछ नहीं बताओगे।"

"हां ठीक है।" उनसे सच जानने के लिए मैंने झूठ मूठ का वादा कर लिया─"अब मुझे सब कुछ सच सच बताओ।"

काकी अब बेबस हो चुकी थीं। ऐसी बातें मुझे बताने में शर्म लगना जायज था मगर जब यही एक रास्ता रह जाए तो कोई क्या करे। खैर उन्होंने बेबस हो कर एक गहरी सांस ली और मुझे अपने पास ही बैठ जाने का इशारा किया तो मैं उनके पास बैठ गया।

मेरी अपनी धड़कनें अब ये सोच कर तेज हो गईं थी कि जाने काकी अब क्या बताने वाली हैं। आज से पहले हमारे बीच ऐसी बातें करने की न तो उन्होंने कल्पना की थी और न ही मैंने....मगर जैसा कि मैं पहले ही बता चुक हूं कि किस्मत और नियति जब कोई खेल शुरू करती है तो वो ऐसे ही हालात बनाती है जिसमें फंस कर इंसान वही करने को मजबूर हो जाता है जो सिर्फ और सिर्फ नियति चाहती है।

#######

"ये सब एक महीना पहले शुरू हुआ था।" मंजू काकी ने बताना शुरू किया─"हर रोज की तरह उस दिन भी मैं घर के पीछे कुएं में नहा रही थी। उस वक्त घर में कोई नहीं था। तुम्हारे काका खेतों में थे और तुम्हारी दोनों बहनें बाहर कहीं खेलने गई हुई थीं। उस दिन मुझे थोड़ी देर हो गई थी क्योंकि ढेर सारे कपड़े धोए थे मैंने तो नहाने में देर हो गई थी। तुम्हारे काका के घर आने से पहले मुझे खाना भी बनाना था। कपड़े धोने के बाद मैं फटाफट नहाने लगी थी। उस वक्त मेरे बदन में धोती नहीं थी बल्कि सिर्फ साया और ब्लाउज ही था। कुछ देर बाद मैंने ब्लाउज भी उतार दिया और साया को ऊपर सीने तक चढ़ा लिया जिससे मेरी छातियां ढंक गईं थी। इस तरह से नहाना रोज का ही था। खैर नहाने के बाद मैं सिर्फ उसी गीले साए को बदन में लपेटे हुए घर के अंदर जाती थी और अंदर कमरे में सूखे कपड़े पहनती थी।"
 
मैं सांसें रोके काकी की बातें सुन रहा था। मेरे अंदर अब तक सब कुछ जानने की उत्सुकता कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थी।

"मुझे नहीं पता था कि उस दिन तुम्हारे बापू मेरे घर आ गए थे।" काकी ने आगे बताना शुरू किया─"पता नहीं वो कब घर के अंदर आ गए थे। मुझे तो तब पता चला जब नहाने के बाद मैं अपने बदन में सिर्फ गीला साया लपेटे घर के अंदर की तरफ आने लगी थी। जैसे ही मैं दरवाजे की तरफ बढ़ी तो अचानक से मेरी नजर उन पर पड़ गई थी। वो वहीं पर खड़े थे और जाने कब से मुझे नहाते हुए देख रहे थे। उन्हें इस तरह वहां खड़े देख मेरे तो होश ही उड़ गए थे। तुम तो जानते हो कि उनसे मेरा जेठ और भय‌ऊ का रिश्ता है। मैं कभी भी उनके सामने सिर से धोती का घूंघट नहीं हटाती और न ही हम एक दूसरे को छूते हैं। सदियों से हमारे धर्म में और हमारे गांव समाज में यही नियम कानून था। खैर उस दिन उन्हें इस तरह दरवाजे के पास खड़े देख मेरे होश उड़ गए थे। काटो तो खून नहीं जैसी हालत हो गई थी मेरी। मैं ये सोच के हैरान भी हुई थी कि वो मुझे इस तरह नहाते हुए कैसे देख सकते थे। अगर उन्हें पता चल गया था कि घर में कोई नहीं है और मैं घर के पीछे कुएं में नहा रही हूं तो उन्हें इस तरफ आना ही नहीं चाहिए था। खैर बात अगर सिर्फ इतनी ही होती तो शायद इसे नजरअंदाज भी कर दिया जाता मगर आगे जो कुछ हुआ उसकी कल्पना कम से कम मैंने सपने में भी नहीं की थी। उन्हें इस तरह खड़े देख मैं जल्दी ही होश में आई और फिर ये सोच कर तेजी से वहां से भागने लगी कि उनसे अपने नंगेपन को जल्द से जल्द छुपा लूं। मगर मैं अपनी इस कोशिश में कामयाब न हो सकी थी। क्योंकि आगे कुछ ही कदमों की दूरी पर मैं पत्थरों के पास पड़ी एक रस्सी पर पैर उलझ जाने से गिर पड़ी थी। मैं एकदम धड़ाम से गिरी थी तो चोट भी लग गई। ठोस पत्थर से घुटना टकराया तो मेरे मुंह से चीख निकल गई। फिर भी मैंने जल्दी से उठने की कोशिश की। मन में यही था कि जल्दी से अंदर भाग जाऊं ताकि अपना नंगापन उनसे छुपा लूं। जब ये सोच कर मैं जल्दी से उठ कर जाने को हुई तो घुटने में तेज दर्द उठा और मैं खड़ी न रह सकी बल्कि बेबस हो कर फिर से वहीं लुढ़क गई। इस सबकी वजह से बदन में लिपटा वो गीला साया भी मेरे सीने से सरक गया था जिससे मेरी छातियां जेठ जी के सामने एकदम से पूरी उजागर हो गईं थी। दर्द के मारे मुझे इस बात का खयाल ही नहीं रहा था। खयाल तो तब आया जब अचानक से जेठ जी भाग कर मेरे करीब आ गए थे।"

"तू ठीक तो है न।" मुझे पीड़ा में देख उन्होंने झट से कहा था─"सम्हाल कर चलना चाहिए था तुझे।"

अपने इतने करीब जेठ जी को आ गया देख मैं बुरी तरह घबरा गई थी और ये देख कर तो मेरे होश ही उड़ गए कि मेरा सब कुछ उनके सामने बेपर्दा हो गया है। मेरी छातियां उनके सामने पूरी नंगी हो गई हैं। मैंने हड़बड़ा कर जल्दी से गीले साए को ऊपर खींचना चाहा मगर वो कमबख्त ऊपर ही नहीं सरका। मेरे जमीन पर गिरे होने से और गीला होने की वजह से वो ऊपर सरक ही न सका था। उस हालत में मैं एकदम बेबस ही हो गई थी। बड़ी मुश्किल से दर्द को सह कर मैंने उठने की कोशिश की। गीले साए को ऊपर खींच कर जेठ जी की नजरों से अपनी नंगी छातियों को छुपाया और फिर वहां से जाने के लिए कदम बढ़ाया ही था कि फिर से घुटने में तेज दर्द हुआ। दर्द ऐसा था कि मुझसे आगे चला ही न गया। अपनी इस हालत और बेबसी पर मुझे एकदम रोना ही आ गया था। न मुझसे चला जा रहा था और न ही मुझे जेठ जी के सामने अपने नंगेपन को छिपाने का कोई रास्ता दिख रहा था।"

"फिर क्या हुआ।" मैंने उत्सुकता से पूछा।

"वही जिसकी मैंने सपने में भी उम्मीद नहीं की थी।" मंजू काकी ने बताया─"जब मैं हर तरह से बेबस हो गई तो तुम्हारे बापू ने कहा कि इस वक्त मैं भूल जाऊं कि वो मेरे सामने हैं। वैसे भी इस वक्त यहां पर कोई नहीं है इस लिए किसी को कुछ पता भी नहीं चलेगा। उन्होंने कहा कि इस वक्त यही एक रास्ता है कि वो मुझे सहारा दे कर घर के अंदर ले जाएं और फिर मेरे कपड़ों से मेरे नंगेपन को छुपा दें। मैं भी समझ चुकी थी कि अब यही मेरे पास एक रास्ता है खुद को इस हाल से बचाने का। मैं खुद कुछ नहीं कर सकती थी इस लिए मैंने बेबस हो कर उन्हें मूक सहमति दे दी। मेरी सहमति और इजाजत मिलते ही वो आगे बढ़े और फिर एकदम से मुझे उठा कर अपनी बाहों में ही ले लिया। उनके इस तरह छूने से मैं बुरी तरह कांप गई थी मगर कर भी क्या सकती थी।"

इधर मैं ये सोच कर अजीब सा महसूस करने लगा कि बापू ने काकी को अपनी बाहों में ले लिया था। उस वक्त काकी सिर्फ गीले साए में थी। एक तरह से वो नंगी ही थीं। इस एहसास ने मेरे पूरे जिस्म में झुरझुरी दौड़ा दी।

"फिर आगे क्या हुआ।" मैंने बड़ी उत्सुकता से पूछा।

"मैं पूरी गीली थी उस वक्त और जमीन पर गिर जाने से मेरे बदन में और साए में धूल लग गई थी।" काकी ने बताना शुरू किया─"मुझे ऐसी हालत में देख जेठ जी ने पूछा कि क्या मैं फिर से नहाना चाहती हूं तो मैंने झट से इंकार कर दिया। मैं तो बस यही चाहती थी कि जल्द से जल्द मैं इस स्थिति से छुटकारा पाऊं मगर ऐसा हो नहीं रहा था। तुम्हारे बापू मुझको अपनी बाहों में लिए वहीं खड़े रह गए थे।"

"ऐसा क्यों।" 

"मुझे उस हालत में देख कर उनके मन में शायद गलत विचार आने लगे थे।" काकी ने कहा─"वो एकटक मेरे गीले बदन को निहारे जा रहे थे और इधर मेरी हालत और भी बिगड़ती जा रही थी। मैंने हिम्मत कर के उनसे कहा कि वो खड़े क्यों हैं अब। तब उन्होंने जैसे मदहोशी में कहा कि मुझे इस हालत में देख कर वो सब कुछ भूल गए हैं। फिर एकदम से वो मेरी तारीफें करने लगे। कहने लगे कि मैं बहुत सुंदर हूं और मेरा बदन तो और भी ज्यादा सुंदर है। उनकी तारीफों से मुझे बड़ी शर्म आई थी। मन कर रहा था कि उनकी बाहों से निकल कर भाग जाऊं मगर मेरे बस में उस वक्त कुछ भी तो नहीं था। इस लिए उनसे यही कहा कि वो जल्दी से मुझे घर के अंदर पहुंचा दें। अगर कोई घर में आ गया और उसने हमें इस हालत में देख लिया तो पक्का गलत समझ लेगा। आखिर मेरे आग्रह पर वो मुझे ले कर चल पड़े। डर और घबराहट से मैं कांप रही थी। मेरे दोनों हाथ उनकी गर्दन में लिपटे हुए थे ताकि उनकी बाहों से नीचे गिरने का मुझे डर न लगे। वो मुझे लिए धीरे धीरे चल रहे थे और एकटक मुझे ही देखे जा रहे थे। मैं उनसे नजरें नहीं मिला पा रही थी जबकि उनकी नजरें मेरे पूरे गीले बदन पर घूम रहीं थी। अचानक वो बोले....काश तू मेरी बीवी होती मंजू तो कितना खुशनसीब कहलाता मैं। मुझे ये सोच के गर्व होता कि तेरे जैसी सुंदर औरत मेरी बीवी है।"

"क्या????? मतलब सच में उन्होंने ऐसा कहा था।" मैंने आश्चर्य से आँखें फाड़ कर पूछा।

"हां राजू उन्होंने यही कहा था।" मंजू काकी ने कहा─"उनकी ये बातें सुन कर मैं बुरी तरह शर्मा गई थी। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि वो मेरे बारे में ऐसा सोच सकते हैं और मुझसे ऐसा बोल भी सकते हैं। तभी वो फिर बोले.... अगर तू मेरी बीवी होती तो मैं तुझे रात दिन बस प्यार ही करता रहता मंजू। तुझे अपनी रानी बना के रखता। तेरी हर मांग पूरी करता। कभी भी तुझे किसी चीज के लिए मना न करता और न ही कभी तुझे उदास होने देता। मैं हैरान थी कि ये वो क्या बोले जा रहे हैं। अपने छोटे भाई की बीवी के बारे में वो ऐसा कैसे बोल सकते हैं। क्या उन्हें ये भी खयाल नहीं रहा कि उनसे मेरा रिश्ता क्या है। क्या उन्हें बिल्कुल भी एहसास नहीं है कि उनका ऐसा सोचना भी गलत और पाप है। मुझे समझ न आया कि अब मैं इस स्थिति में क्या बोलूं। डर और घबराहट बढ़ती ही जा रही थी मेरी।"

"फिर....फिर आगे क्या हुआ।"

"कुछ देर वो चुप रहे मगर फिर बोले....मैं जानता हूं मंजू कि मुझे ये सब तुझसे नहीं कहना चाहिए क्योंकि ये गलत है।" काकी ने बताया─"पर...पर क्या करूं मैं। तू इतनी सुंदर है कि मैं सही गलत सब भूल गया हूं। भगवान के लिए तू भी भूल जा कि क्या सही है और क्या गलत।"

"अ...आप ये कैसी अनर्गल बातें कर रहे हैं जेठ जी।" मैं हैरान परेशान हो कर बोल पड़ी थी─"क्या आपको बिल्कुल भी शर्म नहीं आ रही मुझसे ऐसा बोलने में।"

"तेरी सुंदरता देख कर सब कुछ भूल गया हूं मंजू।" वो मेरी बात को जैसे अनसुना कर के बोले─"तुझे देख कर बावरा हो गया हूं मैं। तेरे प्रति मेरे दिल में प्रेम का अंकुर फूट रहा है। मेरा जी कर रहा है कि तुझे कस के अपने सीने से लगा लूं और फिर जी भर के तुझे प्यार करूं। तेरी ये सुंदरता मेरी सुध बुध खोए दे रही है मंजू। तू सच में बहुत सुंदर है रे....बता क्या करूं। जेठ जी की बातें सुन कर मैं आश्चर्य से आँखें फाड़े देखने लगी थी उन्हें। वैसे वो गलत नहीं कह रहे थे। मतलब वो सच में बावरे नजर आ रहे थे। मैं चकित थी कि ऐसा कैसे हो सकता है। क्या वो हवस के कारण मुझसे ऐसा बोल रहे थे या सच में उनके दिल ने मेरे प्रति प्रेम पैदा हो गया था।"

"फिर....फिर आगे क्या हुआ काकी।"

मंजू काकी की बातें सुन मैं भी चकित था। अब तो मेरे अंदर और भी ज्यादा उनकी कहानी जानने की उत्सुकता बढ़ गई थी।

"फिर क्या....उनकी ऐसी बातों से अब अचानक मेरा अपना दिल भी तेज तेज धड़कने लगा था।" काकी ने कहा─"मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि जेठ जी इतनी रंगीन बातें करते होंगे। जाहिर है वो गायत्री जीजी(मेरी मां का नाम गायत्री है) से भी ऐसी ही रंगीन बातें करते होंगे। तुम्हारे काका ने तो कभी मुझसे ऐसी रंगीन और मीठी बातें नहीं की थी। लगता था जैसे उन्हें ऐसी मीठी बातें करना आता ही नहीं है। पूरे के पूरे गवार ही हैं वो। खैर जेठ जी की बातें अब मुझे अच्छी लगने लगीं थी। हैरान तो थी और शर्म भी आ रही थी लेकिन जाने क्यों अब उनकी ऐसी बातें भाने लगी थी मुझे। ऐसा शायद इस लिए क्योंकि तुम्हारे काका ने कभी मुझसे ऐसी बातें नहीं की थीं और न ही मेरी तारीफ में दो मीठे शब्द कहे थे। मगर जब जेठ जी ने मेरी तारीफ में इतना कुछ कह डाला और ये भी कह दिया कि उनके दिल में मेरे लिए प्रेम का अंकुर फूट रहा है तो मेरा अपना दिल तेजी से धड़कने लगा था। मेरे अंदर अजीब मगर मीठा सा एहसास जागने लगा था। अपनी तारीफें सुन कर मेरे अंदर खुशी के भाव पैदा होने लगे थे। मुझे अच्छा लगने लगा था कि जेठ जी की नजरों में मेरी कितनी ज्यादा अहमियत है।"

"फिर...आगे क्या हुआ।"

मैं अब जल्द से जल्द सब कुछ जान लेना चाहता था।

"उनकी ऐसी बातों पर जब मैंने कोई विरोध नहीं जताया तो उनकी हिम्मत बढ़ गई।" काकी ने आगे बताया─"उन्होंने आगे कहा कि मेरा बदन गायत्री जीजी से भी ज्यादा साफ और गोरा है। यहां तक कि संगीता से भी ज्यादा सुंदर हूं मैं। उनकी इन बातों से पिघलने लगी थी मैं। मेरा मन करने लगा था कि वो ऐसे ही मेरी तारीफें करते रहें और ये वक्त यहीं पर रुक जाए। मतलब वो वैसे ही मुझे अपनी बाहों में लिए रहें। बड़ा अजीब चमत्कार हो गया था। इसके पहले जहां मैं ये चाहती थी कि वो जल्द से जल्द मुझे घर के अंदर पहुंचा दें ताकि मैं अपने नंगेपन को उनकी नजरों से छुपा लूं और कहां अब ये चाहत मेरे अंदर पैदा हो गई थी कि वो इसी तरह मुझे अपनी बाहों में लिए मेरी तारीफें करते रहें। पहले मैं उनसे कह रही थी कि उन्हें सही गलत का एहसास क्यों नहीं है और अब मैं खुद ही उस सबको सही मान बैठी थी जो वास्तव में गलत ही था। अब मुझे पहले जैसी शर्म नहीं आ रही थी। शायद इतनी देर तक उस हालत में रहने से और इतनी सारी बातें हो जाने से मेरे अंदर की शर्म और झिझक थोड़ा कम हो गई थी।"

मंजू काकी अभी आगे भी बताने वाली थीं कि तभी सामने से दशरथ काका इस तरफ ही आते दिखे जिससे वो चुप हो गईं। काका को इस तरफ आते देख मैं भी मायूस हो गया।

"तुम्हारे काका आ रहे हैं राजू।" काकी ने धीरे से कहा─"मैं बाद में तुम्हें बाकी बातें बताऊंगी। बस तुम ये ध्यान रखना कि उस बारे में किसी के सामने तुम्हारे मुख से कुछ न निकले।"

"ठीक है मैं किसी से कुछ नहीं कहूंगा।" मैंने भी धीरे से चेतावनी दी─"मगर तुम भी याद रखना कि तुम मुझे सब कुछ बताओगी।"

"मैं तुम्हें सब कुछ बता दूंगी।" काकी ने झट से कहा─"यकीन करो मेरा....मैं कुछ नहीं छिपाऊंगी तुमसे।"

"ठीक है फिर....मैं शाम को घर आऊंगा।"

मेरी ये बात सुनते ही काकी ने हां में सिर हिलाया। तभी काका आ गए।

"क्या हुआ करेजा।" आते ही उन्होंने मुझसे कहा─"पुल्लियां बांधते बांधते थक गया क्या जो अपनी काकी के पास बैठे आराम कर रहा है।"

"थक तक जाएंगे ही।" काकी ने झट से कहा─"आज से पहले हमारे राजू ने पुल्लियां बांधने का काम ही कहां किया था।"

"हां ये तो तूने सही कहा।" काका बोले─"मगर मैं खुश हूं कि मेरे करेजा ने इस वाले खेत का सारा काम निपटा दिया है। श्यामू ने बताया था मुझे कि वो इसे पुल्ली बांधना सिखा के आया है।"

"हां श्यामू काका ने बांधना सिखाया था मुझे।" मैंने खड़े हो कर कहा।

"वैसे वो तो यही बोल रहा था कि तू दो चार पुल्लियां बांधेगा और फिर जब थक जाएगा तो भाग जाएगा।" काका ने मुस्कुराते हुए कहा─"मगर तूने तो सारे खेत का काम ही निपटा दिया है....बहुत बढ़िया।"

"अभी इस तरफ थोड़ा बाकी है काका।" मैंने काकी वाले हिस्से की तरफ इशारा कर के बताया─"इस तरफ का गेहूं काकी काट देंगी तो इधर का भी इकट्ठा कर के पुल्लियां बांध दूंगा।"

"नहीं नहीं आज के लिए इतना काफी है करेजा।" काका ने कहा─"तू अब कुछ नहीं करेगा नहीं तो बीमार हो जाएगा। वैसे भी गर्मी बहुत है।"

मैंने सिर हिलाया और फिर मकान की तरफ चल दिया। जबकि काका वहीं काकी के साथ बाकी का गेहूं काटने लगे।


जारी है.............
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हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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RE: आप-बीती ~ Truth is Dark - by Rajan Raghuwanshi - 03-01-2026, 07:54 AM



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