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Adultery अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play)
#54
गेस्ट हाउस में पहली रात


खाने की मेज़ पर करीम ने बड़े सलीके से गर्मागर्म रोटियाँ और मुर्ग का सालन परोसा। खाने की खुशबू पूरे कमरे में महक रही थी। राज और अनीता, जो सफर की वजह से काफी भूखे थे, खाना चखते ही दंग रह गए।


राज: (रोटी का एक निवाला तोड़ते हुए और सालन में डुबोते हुए) "वाह! करीम बाबा, क्या ज़ायका है! मैंने दिल्ली के बड़े-बड़े होटलों और ढाबों की खाक छानी है, पर खुदा कसम ऐसा स्वाद कहीं नहीं मिला।"


अनीता ने अपनी रेशमी काली साटन नाइटी की पतली स्ट्रैप को बड़ी फुर्सत से अपने गोरे कंधे पर ऊपर सरकाया। इस हरकत से उसकी लाल ब्रा का किनारा और उसकी गोरी त्वचा का उभार करीम की जलती हुई आँखों के सामने कौंध गया।


अनीता: (एक मादक मुस्कान के साथ) "सच में राज, खाना वाकई बहुत लज़ीज़ है। करीम बाबा, आपने तो कमाल ही कर दिया। आपकी उंगलियों में तो जैसे कोई जादू है।"


राज: (अनीता की तरफ देखते हुए मज़ाक में) "अनीता, तुम भी करीम बाबा से कुकिंग के कुछ टिप्स क्यों नहीं सीख लेतीं? वैसे भी यहाँ तुम्हारे पास काफी वक्त होगा, तो कम से कम रसोई का काम ही ठीक से सीख जाओगी।"


अनीता ने शरारत से करीम की तरफ देखा, जो पास ही हाथ बाँधकर खड़ा था।


अनीता: "क्यों नहीं? करीम बाबा, क्या आप मुझे सिखाएंगे? मतलब, रसोई में आपके साथ वक्त बिताकर मुझे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।"


करीम: "अनीता बेटी, ये तो हमारा नसीब है। आप जब चाहो रसोई में आ जाना, हम आपको ऐसे-ऐसे गुर सिखाएंगे और ऐसी-ऐसी चीज़ों का स्वाद चखाएंगे कि आप अपनी पूरी ज़िंदगी याद रखेंगी कि किसी मर्द के पल्ले पड़ी थीं।"


राज को उनकी बातों में छिपे उस कामुक तनाव और दोहरे अर्थ का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था। वह तो बस अपने अच्छे खाने का मज़ा ले रहा था।


जैसे ही खाना खत्म हुआ, अनीता उठी और करीम के पास से गुज़रते हुए अपने सुडौल गाँड को उसके मजबूत और काले हाथ के करीब से रगड़ते हुए ले गई। करीम  का जिस्म झनझना उठा।

________________________________________

रात का सन्नाटा बंगले की ऊँची छतों के बीच भारी हो रहा था। राज, जो लंबी ड्राइविंग की वजह से पूरी तरह चूर हो चुका था, बिस्तर पर पड़ते ही गहरी नींद की आगोश में चला गया। उसकी धीमी खर्राटों की आवाज़ बेडरूम में गूँज रही थी। तभी अनीता की आँख खुली। उसका गला सूख रहा था।


उसने जग खाली देखा और एक गहरी साँस लेकर बिस्तर से उठी। उसने अपनी नाइटी के ऊपर वही पतला सा रोब डाल लिया, जिसके नीचे से उसके गहरे लाल अंडरगारमेंट्स साफ़ झलक रहे थे।


वह रसोई की ओर बढ़ी। उसे हल्की सी रोशनी और बर्तनों की खनक सुनाई दी। करीम अभी भी जाग रहा था। अनीता रसोई की चौखट पर आकर खड़ी हो गई। पीली रोशनी में उसकी गोरी त्वचा और उस पतली नाइटी के नीचे मचलते उसके सेक्सी कर्व्स चमक रहे थे। करीम जैसे ही मुड़ा, उसकी नज़र अनीता पर पड़ी।


करीम के हाथ में रखा बर्तन जैसे छूटते-छूटते बचा। इस आधी रात में, सामने खड़ी इस जवान और कम कपड़ों वाली अनीता को देखकर उसके अंदर की हवस उफान मारने लगी थी।


करीम: (भर्राई और धीमी आवाज़ में) "अनीता बेटी... आप? इस वक्त? साहब तो सो गए होंगे... आपको यहाँ कुछ चाहिए था क्या?"


अनीता: (अपनी नाइटी के गले को हल्का सा ढीला करते हुए) "प्यास लगी थी करीम बाबा... गला बहुत सूख रहा है।"


करीम: (मन ही मन, बेकाबू होते हुए) "उह्ह... साला ई काली नाइटी तो बस नाम की है, ईके नीचे तुम्हारी उ लाल ब्रा में कसे हुए ई गोरे पहाड़ और नीचे का उ सारा चिकना बदन तो ऐसे साफ़ दिख रहा है जैसे आईना। 'बिटिया' बोल के तुमने हमारे मुंह पे ताला तो लगा दिया मालकिन, पर साला नीचे जो ई लंड पत्थर जैसा सख्त होकर लुंगी फाड़ने को तैयार है, ई तो अभी 'बेटीचोद' बनने को उतावला हो रहा है। तुम ठहरीं ऊँची जात की * मेमसाहब, जिन्हें छूना तो दूर, हम जैसे नीच लोग देख भी नहीं सकते... पर तुम्हारा ई रसीला बदन देख के तो किसी का भी पानी छूट जाए।"


अनीता ने करीम की उन जलती हुई आँखों में सीधे झाँका, जो निर्लज्जता से उसकी सुडौल जाँघों के उभार और गहरी नाभि पर टिकी थीं।


अनीता: (बेहद शांत और मादक स्वर में) "करीम बाबा... प्यास लगी थी। कमरे का जग खाली था, तो सोचा कि खुद ही नीचे जाकर पानी ले लूँ।"


करीम: (एक लंबी साँस लेते हुए) "अनीता बिटिया, काहे खुद को तकलीफ दी? बस एक बार पुकार लेतीं, तो ई खादिम पानी लेकर आपके कमरे की चौखट पर हाज़िर हो जाता।"


करीम पानी का गिलास भरने के लिए आगे बढ़ा और जब वह वापस आया, तो वह जानबूझकर अनीता के काफी करीब खड़ा हो गया। गिलास पकड़ते वक्त अनीता की उंगलियाँ करीम के खुरदरे हाथों से छुईं।


पानी पीते वक्त अनीता ने अपनी सुराही जैसी गर्दन पीछे झुकाई, जिससे उसकी नाइटी का गला और गहरा हो गया।


करीम: (दबी हुई आवाज़ में) "अनीता बेटी... अगर आप बुरा न मानें, तो क्या हम आपसे एक बात कह सकते हैं? पर आपको वादा करना होगा कि आप बुरा नहीं मानेंगी।"


अनीता ने अपनी पतली कमर पर दोनों हाथ रखे, जिससे साटन की नाइटी उसके भारी गाँड पर और भी कस गई।


अनीता: (मुस्कान के साथ) "बोलिए करीम बाबा, भला मैं आपकी बात का बुरा क्यों मानूँगी? आखिर आप घर के बड़े हैं, और अब तो मेरे उस्ताद भी बनने वाले हैं।"


करीम: (मन ही मन) "साली मेमसाहब! उस्ताद बनाने की बात कर रही है... मन तो कर रहा है कि इसी वक्त तुझे सिखा दूँ कि असली उस्ताद रसोई में नहीं, बिस्तर पर कैसे सिखाते हैं। ई जो तेरी कमर और कूल्हे हमारी आँखों के सामने मटक रहे हैं, जी करता है कि इन्हें पकड़कर वहीं मरोड़ दूँ।"


करीम एक कदम और करीब आया, उसकी नज़रें अनीता के वक्षों के मचलते उभारों पर गड़ी थीं।


करीम: (भारी आवाज़ में) "अनीता बिटिया... हमने अपनी पूरी उमर इसी बंगले की दीवारों के बीच काट दी, पर खुदा गवाह है, हमने अपनी इन आँखों से आज तक आप जैसी सुंदर मूरत नहीं देखी। आप तो बिल्कुल किसी हीरोइन जैसी लगती हैं... बल्कि उनसे भी ज़्यादा कयामत।"


अनीता: (मादक लहजे में खिलखिलाते हुए) "करीम बाबा! आप भी ना... सच में क्या-क्या बोलते रहते हैं। आपको सच में मैं किसी फिल्मी हीरोइन जैसी लगती हूँ? सच कहिये बाबा, आप मज़ाक बहुत अच्छा कर लेते हैं... कहाँ वो हीरोइनें और कहाँ मैं, एक मामूली सी घरेलू औरत।"


उसकी हँसी के साथ ही उसकी सिल्क की नाइटी के नीचे उसके भारी वक्ष और चौड़े कूल्हे लयबद्ध होकर थिरकने लगे। करीम की नज़रें उसके जिस्म की उस थरथराहट पर जम गईं।


करीम: (और करीब आते हुए) "मज़ाक नहीं कर रहे हैं मालकिन। खुदा की कसम, हमने एक साउथ की फिल्म देखी थी, उसकी हीरोइन बिल्कुल आपकी जैसी लगती है। बस नाम याद नहीं आ रहा है उसका... कसम से कयामत ढा रही थी वो भी आपकी तरह।"


अनीता को अपनी तारीफ सुनकर एक अजीब सा नशा महसूस होने लगा। उसने अपनी नाइटी के पल्लू को उँगलियों में लपेटते हुए कुछ नाम गिनाए।


अनीता: (हँसते हुए) "अच्छा... साउथ की हीरोइन? कौन? नयनतारा? सामंथा? या तमन्ना भाटिया? या काजल अग्रवाल?"


जैसे ही अनीता ने 'काजल अग्रवाल' का नाम लिया, करीम ने तुरंत उसे बीच में ही रोक दिया। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई।


करीम: (उत्तेजना में फुसफुसाते हुए) "हाँ! वही... काजल अग्रवाल! बिल्कुल वैसी ही आँखें, वैसा ही गोरा रंग और वैसा ही सुडौल बदन। जब वो चलती है तो बिजलियाँ गिराती है, और आप... आप तो उससे भी चार कदम आगे हैं।"


अनीता यह सुनकर पागलों की तरह हँसने लगी।


अनीता: (ज़ोर-ज़ोर से हँसते हुए) "हाहाहा! करीम बाबा... काजल अग्रवाल? सच में? आप तो बड़े शौकीन निकले! हाहाहा... कहाँ वो और कहाँ मैं!"


अनीता की इस बेपरवाह हँसी के साथ उसके भारी वक्ष ऊपर-नीचे उछल रहे थे। नाइटी का पतला कपड़ा उन उभारों की हर हरकत को साफ़ दिखा रहा था। करीम मंत्रमुग्ध होकर उन हिलते हुए वक्षों को देख रहा था, जैसे कोई भूखा शेर अपने शिकार को देख रहा हो।


करीम: (मन ही मन उत्तेजित होकर) "अरे बिटिया... तुम तो साला साक्षात अप्सरा हो जिसे देख के ही नीचे लंड में ऐसी मरोड़ उठ रही है कि लुंगी संभालना मुश्किल हो रहा है। मन तो कर रहा है कि ई साटन के चिथड़े को चीर के तुम्हारे ई मखमली गोश्त को जी भर के चूँम लूँ। ई सफ़ेद मक्खन जैसी कमर और ये गाँड... मन करता है कि यहीं दबोच के तुम्हें अपनी हवस का स्वाद चखा दूँ।"


वह अभी भी काजल अग्रवाल वाली बात पर मंद-मंद मुस्कुरा रही थी।


करीम ने धीरे से अपना विशाल काला हाथ अनीता की चिकनी कमर की तरफ बढ़ाया। उसकी उंगलियाँ साटन के उस कीमती रेशम को सहलाने लगीं।


करीम (भारी आवाज़ में फुसफुसाते हुए): "अनीता बिटिया... ई कपड़ा कितना मुलायम है। हमने तो अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी ऐसा रेशम हाथ में भी नहीं पकड़ा। आपको याद है? उस फिल्म में वो काजल अग्रवाल भी बिल्कुल ऐसी ही नाइटी पहनकर अपने महल में टहल रही थी... पर सच कहें तो उस पर ये कपड़ा उतना नहीं फब रहा था जितना आपकी इस गोरी काया पर खिल रहा है।"


अनीता का शरीर सिहर उठा। उसने करीम की आँखों में देखा, जहाँ हवस और तारीफ का एक खतरनाक मेल था।


अनीता (हल्की सी सिसकी के साथ): "करीम बाबा... उह्ह... आप... आप बहुत ज़्यादा बोल रहे हैं। साटन है तो मुलायम ही होगा न... इसमें कौन सी बड़ी बात है? और... और काजल अग्रवाल से मेरा क्या मुकाबला... आह!"


करीम ने अपनी उंगलियों का दबाव और बढ़ा दिया। उसने अपनी झिझक पूरी तरह छोड़ दी और अपना पूरा चौड़ा, सख्त काला हाथ अनीता की उस चिकनी, रेशमी और गोरी कमर पर मजबूती से जमा दिया।उसकी सख्त हथेली का स्पर्श जैसे ही अनीता की मखमली त्वचा (कपड़े के पार से) को महसूस हुआ, करीम के हलक से एक गहरी आह निकली।


करीम (कांपती आवाज़ में): "उफ़्फ़... ई तो मखमल से भी ज़्यादा नरम है। वो काजल अग्रवाल तो सिर्फ परदे पर दिखती है, पर आप तो साक्षात हमारे सामने खड़ी हैं। बिटिया... ई साटन आपकी त्वचा पर ऐसे फिसल रहा है जैसे पानी पर तेल फिसलता है।"


अनीता ने अपनी आँखें मूंद लीं। करीम का हाथ अब धीरे-धीरे उसकी कमर से ऊपर की ओर सरकने लगा था, साटन के कपड़े को उसकी त्वचा पर रगड़ते हुए।


करीम: "या अल्लाह! क्या नज़ाकत है... अनीता बेटी, आप तो जैसे मोम की बनी हो। ऐसा लगता है थोड़ा ज़ोर लगाया तो यहीं पिघल जाओगी। बस देख रहे थे कि शहर की औरतों की त्वचा इतनी मखमली कैसे होती है।"


अनीता ने अपनी पलकें झुकाकर करीम के उस विशाल काले हाथ को देखा, जो उसकी दूध जैसी सफेद कमर पर जमा हुआ था। यह एक ऐसा विरोधाभास था जिसे देखकर अनीता के अंदर एक अजीब सी लहर दौड़ गई। वह एक ऊंचे और अमीर खानदान की बहू थी, जिसके बदन पर हज़ारों की सिल्क और साटन सजती थी, और दूसरी तरफ यह करीम था—महज़ एक मामूली नौकर, जिसकी त्वचा का रंग काला  था।


अनीता (मन ही मन): "कितना अजीब है न... कहाँ मैं और कहाँ ये नौकर। पर इसकी ये 6'2" की कद-काठी और इसकी हिम्मत... उफ़!"


अनीता को दिल्ली के वे दिन याद आए जब वह भीड़भाड़ वाले बाज़ारों या मेट्रो में चलती थी। वहां भी कई मर्द उसे गलत तरीके से छूने की कोशिश करते थे, पर वे डरपोक थे। वे छूते थे और नज़रे चुराकर भाग जाते थे। उनमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि अनीता की आँखों में आँखें डालकर उसे अपनी हवस का अहसास करा सकें। लेकिन करीम... करीम तो अलग ही मिट्टी का बना था। वह उसे छू भी रहा था और साथ ही 'काजल अग्रवाल' और 'फिल्मी कहानियों' के बहाने सीधे उसकी आँखों में देख रहा था। उसका यह आत्मविश्वास ही था जिसने अनीता को अंदर तक झकझोर दिया था।



अनीता ने एक नशीली मुस्कान के साथ अपनी कमर को एक हल्का सा झटका दिया। इस मटकती हुई हरकत की वजह से करीम की भारी हथेली उसकी कमर से नीचे फिसलकर उसकी सुडौल जाँघों और भारी गाँड के ऊपरी हिस्से से ज़ोर से रगड़ खा गई।


अनीता: (आधी आँखें मूँदकर एक हल्की सिसकारी लेते हुए) "आह्ह... करीम बाबा, शहर में हम अपनी त्वचा का बहुत ख्याल रखते हैं। पर अब बहुत रात हो गई है, मुझे जाना चाहिए।"


करीम की उंगलियां अनीता की गोरी और रेशमी कमर पर और भी गहराई से धंस गईं। उसने झुककर अनीता के कान के पास अपनी भारी साँसें छोड़ीं।


करीम: "थोड़ी देर बाद चली जाना बेटी... अभी इतनी जल्दी क्या है? आपसे बात करके दिल को बहुत सुकून मिल रहा है। इस खाली गेस्ट हाउस में ऐसी रौनक हमने पहले कभी नहीं देखी।"


करीम के दिमाग में गन्दगी और हवस का सैलाब उमड़ रहा था।


करीम: (मन ही मन, बेकाबू होते हुए) "अनीता बेटी... साला, अभी कैसे जाने दें? अभी तो हाथ इस रेशमी कमर पे लगा है, अभी तो इस भारी गाँड और इन गोरे मम्मों को मसलना बाकी है। उह्ह... तुम्हारी ये मीठी बातें और ये बदन देख के तो हमरा लंड साला लोहे जैसा सख्त हो गया है। मन तो कर रहा है कि तुम्हें यहीं रोक लूँ और सारी रात तुम्हारी इस गोरी देह का स्वाद लूँ। साला, इतना गरम माल हाथ लगा है, अब इसे इतनी आसानी से नहीं छोड़ेंगे।"


अनीता ने अपनी गर्दन तिरछी की, जिससे नाइटी का स्ट्रैप नीचे सरक गया और उसकी लाल ब्रा का किनारा साफ नजर आने लगा।


अनीता: (शरारत से देखते हुए) "करीम बाबा, आप तो बड़े वो निकले... बातों-बातों में मुझे यहीं रोकना चाहते हैं?"


करीम: "अरे नहीं बेटी, बस ये बूढ़ा दिल आपकी खूबसूरती का कायल हो गया है। मन करता है बस आपको ऐसे ही निहारता रहूँ। वैसे भी मालकिन, आप तो उस काजल अग्रवाल को भी मात दे रही हो।"


अनीता के अंदर की औरत अब पूरी तरह जाग चुकी थी। उसे इस बात में एक अजीब सा नशा मिल रहा था कि एक 6'2" का गठीला मर्द, जो उसका नौकर है, उसे एक सुपरस्टार से कंपेयर कर रहा है। उसने अपनी नाइटी के पल्लू को अपनी उंगली पर लपेटा और एक कातिलाना मुस्कान के साथ करीम की आँखों में देखा।


अनीता (चुनौती भरे लहजे में): "अच्छा बाबा... बहुत तारीफें हो गईं। अब ज़रा तसल्ली से बताओ तो सही कि मैं उस काजल अग्रवाल जैसी कहाँ से लगती हूँ? क्या सच में मेरी आँखें और मेरा ये बदन वैसा ही है, या आप बस बातें बना रहे हैं?"


करीम के लिए तो जैसे यह कुबेर का खजाना खुलने जैसा था। उसने एक कुटिल मुस्कान दी और फुर्ती से अपनी पजामे  की जेब से एक पुराना, स्क्रीन से चटका हुआ मोबाइल निकाला। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने तुरंत गूगल पर टाइप किया—'साड़ी में सेक्सी काजल अग्रवाल'।


कुछ ही पलों में स्क्रीन पर काजल अग्रवाल की एक बेहद कामुक तस्वीर उभरी, जिसमें उसने एक पारदर्शी साड़ी पहनी थी और उसका पेट और कमर पूरी तरह बेपर्दा थे। करीम अनीता के बिल्कुल करीब आ गया, इतना करीब कि उसकी पसीने और बीड़ी की गंध अनीता की महंगी परफ्यूम के साथ घुलने लगी।


करीम (मोबाइल की स्क्रीन अनीता की आँखों के सामने लाते हुए): "ये देखिये बिटिया... ज़रा गौर से देखिये। ई काजल अग्रवाल की आँखें देखिये... कैसी हिरनी जैसी बड़ी और नशीली हैं। अब आप अपनी आँखें आईने में देखिये... बिल्कुल वही गहराई, वही मदहोशी।"


उसने मोबाइल को थोड़ा नीचे किया और काजल अग्रवाल के चेहरे के निखार को अनीता के गालों से जोड़ने लगा।


करीम: "और ई चेहरा... बिल्कुल वैसा ही नूर। अरे मालकिन, आपकी ई रेशम जैसी तवचा... उफ़! देख के ही मन घबराने लगता है। काजल अग्रवाल की तवचा  भी आपके आगे कम है।"


करीम की उंगलियाँ अब अनीता की गर्दन की सुराहीदार ढलान पर रेंगने लगीं।


करीम (अनीता की गर्दन को निहारते हुए): "अपनी इस गर्दन को तो देखिये मालकिन... बिल्कुल सुराही जैसी बनावट है। काजल अग्रवाल जब अपनी गर्दन घुमाती है तो लोग दीवाने हो जाते हैं, पर आपकी इस तवचा की जो सफेदी है, वो तो इस अंधेरे में भी दूध की तरह साफ चमक रही है। सच कहें मालकिन, आपकी इस चमक के आगे तो वो हीरोइन भी फीकी है।"

करीम : "पर .. असली जादू तो यहाँ है।" उसने स्क्रीन को नीचे स्क्रॉल किया जहाँ काजल की पतली कमर और गहरा नाभि (navel) क्षेत्र दिख रहा था।


करीम: "ई देखिये इसकी कमर की ढलान... और अब ज़रा अपनी इस कमर को देखिये जिसे हमने अभी थाम रखा है। कसम खुदा की, काजल की कमर तो शायद कड़क होगी, पर आपकी इस साटन के नीचे जो जिस्म है... उफ़! ये तो बिल्कुल मक्खन जैसा नरम है। ये जो घुमाव आपकी गाँड की तरफ जा रहा है, वैसा तो उस काजल का भी नहीं होगा। आप तो साक्षात जादू हैं मालकिन।"


अनीता की साँसें अब बेकाबू हो रही थीं। करीम रुकने वाला नहीं था।


बात करते-करते करीम का हाथ अब कमर से और नीचे सरक गया, और उसकी हथेली अब अनीता के सुडौल गाँड के ऊपरी उभार को सहलाने लगी।


करीम: (मन ही मन) "अनीता बेटी... साला हाथ लगाते ही ऐसा लग रहा है जैसे किसी मलाई के गोले पे हाथ रख दिया हो। तुम्हारी ये सुडौल और सेक्सी गाँड... उफ़! साला मन कर रहा है कि बस इसे छूता ही रहूँ। हमरा लंड साला पजामे को फाड़ के बाहर आने को बेताब है।"


अनीता: (एक धीमी आह भरते हुए) "करीम बाबा, आप तो बहुत पारखी नज़र रखते हैं। मुझे तो लगा था आप बहुत सीधे-सादे हैं।"


करीम ने अपनी हथेली अनीता की उस सुडौल गाँड पर टिकाए रखी और दूसरा हाथ उसके कंधे पर रख दिया। उसने अनीता को थोड़ा और करीब खींचा।


करीम ने मोबाइल मेज़ पर पटका और अनीता की बाहों को पकड़कर उसे झटके से अपने सामने लाकर खड़ा कर दिया।


करीम: "ई देखिये! लोग कहते हैं काजल अग्रवाल बहुत लंबी है, पर हमने सुना है वो तो 5 फुट 4-5 इंच की ही है। आप तो उससे भी लंबी और शानदार हैं बिटिया। ई कयामत जैसा बदन... जब आप खड़ी होती हैं तो लगता है कोई मीनार खड़ी है।"


करीम की नज़रें अब नीचे की ओर उतरीं, जहाँ साटन की नाइटी अनीता की पतली कमर पर चिपकी हुई थी।


करीम: "और ई कमर... ई जो मोड़ है... । ई जो लचक है, यही तो मर्द को दीवाना बनाती है।"


करीम अब पूरी तरह बेकाबू हो चुका था। उसकी नज़रें अब अनीता की छाती पर जमी थीं, जो साटन के नीचे बेताबी से ऊपर-नीचे हो रही थी।


करीम (हाँफते हुए): "और ई आपके सुडौल-भारी चूचे... ई तो काजल अग्रवाल के पास भी नहीं होंगे। इतने बड़े और सख्त... उफ़!"


'चूचे' शब्द सुनते ही अनीता के कानों में जैसे गरम तेल पड़ गया। उसकी रूह कांप उठी। उसे मज़ा तो आ रहा था, पर एक नौकर के मुँह से ऐसे गंदे और देहाती शब्द सुनकर उसकी मालकिन वाली गरिमा को चोट पहुँची।


अनीता ने झटके से पीछे हटते हुए साटन के पल्लू को अपने सीने पर कस लिया। उसका चेहरा गुस्से और शर्म से लाल हो गया था।


अनीता (कांपती आवाज़ में): "करीम बाबा! बस... बहुत हुआ! ये क्या बदतमीजी है? आप... आप इतने गलत और घटिया शब्दों का इस्तेमाल मत करो। खबरदार जो आगे से ऐसे शब्द कहे।"


करीम के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान उभरी। वह समझ गया था कि उसने सही जगह चोट की है और मालकिन के अंदर की औरत उस देहाती शब्द से सिहर उठी है। वह एक कदम और करीब आया और झुककर अनीता के कान के पास अपनी गरम साँसें छोड़ते हुए फुसफुसाया।


करीम (धीमे स्वर में): "गलती हो गई अनीता बेटी... हम तो गंवारी आदमी हैं, हमें आप जैसे पढ़े-लिखे लोगों वाले सलीकेदार लफ्ज़ नहीं आते। पर ई बताइए बिटिया... लफ्ज़ भले ही गंदे लग रहे हों, पर क्या हमने आपकी ई खूबसूरती के बारे में कुछ झूठ कहा? "


करीम ने अपनी आँखों में एक शरारती चमक लाते हुए अनीता के चेहरे को गौर से देखा। उसे पता था कि अनीता अब उसके शब्दों के जाल में पूरी तरह उलझ चुकी है।


करीम (धीमी आवाज़ में): "हम तो अनपढ़ ठहरे मालकिन, जो बाप-दादा से सुना वही बोल दिया। पर आप तो बड़े शहर की पढ़ी-लिखी मेमसाहब हैं। ज़रा हमें भी तो सिखाइये कि आप जैसे लोग इन... इन सुंदर चीज़ों को अंग्रेजी में क्या कहते हैं?"


अनीता का दिमाग इस वक्त उत्तेजना और मदहोशी के उस मोड़ पर था जहाँ सोचने-समझने की शक्ति कम हो जाती है। उसने बिना सोचे-समझे, एक गहरी साँस भरते हुए जवाब दिया।

अनीता (मदहोश आवाज़ में): "इन्हें... इन्हें अंग्रेजी में 'Breasts' कहते हैं करीम... या फिर 'Boobs'..."


जैसे ही ये शब्द अनीता की जुबान से निकले, उसे अपनी गलती का अहसास हुआ, पर अब बहुत देर हो चुकी थी। करीम के चेहरे पर एक विजेता जैसी मुस्कान फैल गई।


करीम (शब्दों का स्वाद लेते हुए): "बू-ब्स... उफ़! बोलने में तो बड़ा सलीकेदार लगता है मालकिन! एकदम मलाई जैसा चिकना शब्द है।"


करीम (अपना सीना फुलाते हुए और अनीता की ओर झुककर धीमी आवाज़ में): "अनीता बेटी, बहुत-बहुत सुक्रिया तुम्हारा ये नया सबक सिखाने के लिए। आज से हम इहे शब्द इस्तेमाल करेंगे। ई 'चूचे' बोलने में तो साला ऐसा लगता है जैसे कोई देहाती गाली दे रहे हों, पर ई 'बू-ब्स'... ई तो एकदम रईसों वाली बात हो गई।"


करीम (गर्दन खुजलाते हुए और शरारती नज़रों से घूरते हुए): "अरे, हम भी क्या पागल हैं... तू आपे चूचे... आई मीन सॉरी मालकिन, ई बार माफ़ कर दो, मुँह से निकल गया। मतलब, ई 'बू-ब्स' तो काजल अग्रवाल से भी ज़्यादा ज़ोरदार चीज़ हैं। सच कह रहे हैं, ऐसी गोलाई और ऐसी चमक तो हमने सिनेमा के परदे पर भी ना देखी कभी।"


उसकी आँखें, जो अब तक चेहरे पर टिकी थीं, धीरे-धीरे नीचे की ओर सरकने लगीं। जैसे ही उसकी नज़रें उस ढीले रोब  के खुले गले और उसके भीतर कैद उनके उभरे हुए वक्षों  पर टिकीं, करीम के चेहरे से शर्म का आखिरी कतरा भी गायब हो गया। वह अब बिना किसी लोक-लाज के, पूरी बेशर्मी से उन्हें घूरने लगा। उस मखमली कपड़े की सिलवटों के बीच से जो गोलाई और जो गहरी घाटी  नज़र आ रही थी, उसे देखकर उसकी साँसें भारी और गर्म होने लगीं।


करीम का मुँह धीरे से खुल गया और उसकी जीभ के किनारे प्यासे कुत्ते की तरह उसके सूखे होठों पर बाहर निकल आए। उसकी राल लगभग टपकने को थी और उसकी आँखों में एक जंगली चमक आ गई थी।


अनीता को लगा कि अब माहौल बहुत गर्म हो चुका है।


अनीता (एक मादक मुस्कान के साथ धीरे से अलग होते हुए): "अच्छा करीम बाबा... अब मुझे जाना चाहिए। राज जाग गए तो मुश्किल हो जाएगी। बाकी बातें अब कल होंगी।"


करीम: (भर्राई आवाज़ में) "जी... जी अनीता बेटी। आप जाइए, आराम कीजिये। कल तो बहुत वक्त है हमारे पास।"


अनीता अपनी साटन नाइटी लहराती हुई रसोई से बाहर निकल गई। करीम उसे पीछे से देखता रहा, जहाँ उसकी सुडौल गाँड का मचलना उसकी आँखों में छप गया था।


अनीता तेज़ी से पलटी। जैसे-जैसे वह कमरे की ओर बढ़ रही थी, उसका पूरा बदन पसीने से तर-बतर था और चेहरा शर्म और उत्तेजना की लाली से दहक रहा था।


अनीता (मन ही मन सोचते हुए): "हे भगवान, यह मैं क्या कर रही हूँ? करीम तो हद से ज़्यादा बेबाक होता जा रहा है। सिर्फ एक दिन में उसने इतनी हिम्मत जुटा ली... काजल अग्रवाल से तुलना करने के बहाने उसने मेरे चेहरे और गर्दन को सहलाया, फिर धीरे से मेरी कमर और... और मेरी गांड को भी हाथ लगा दिया।"


वह अपने कमरे के दरवाज़े के पास रुककर लंबी सांसें लेने लगी। उसकी कल्पना में अभी भी करीम के खुरदरे और सख्त हाथों का वह स्पर्श ताज़ा था।


अनीता (सोच जारी रखते हुए): "अगर मैंने उसे थोड़ा भी और मौका दिया होता, तो वह पक्का मेरे 'चूचों' को भी दबोच लेता। उसकी आँखों की वह भूख... वह तो मुझे कच्चा चबा जाना चाहता है। यह अब महज़ एक बेगुनाह हंसी-मज़ाक नहीं रह गया है। यह खेल अब बहुत खतरनाक मोड़ ले रहा है।"


उसे डर भी लग रहा था और एक अजीब सी दबी हुई गुदगुदी भी महसूस हो रही थी। अनीता बिस्तर पर जाकर लेट गई, यह जानते हुए कि करीम अब पूरी रात उसकी हवस की आग में जलेगा।
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RE: अनीता सिंह -- किरदार निभाना (Role Play) - by Deepak.kapoor - 01-01-2026, 04:45 PM



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