31-12-2025, 08:01 AM
भाग ~ ०२
किसी तरह मैं बबलू के घर पहुंचा। बबलू मुझे देखते ही पूछने लगा कि मैंने आने में इतना देर क्यों लगा दी? अब भला मैं उसे कैसे बताता और कैसे समझाता कि देर से आने की वजह क्या थी? बापू ने मां की कसम खिला दी थी इस लिए उसे कुछ नहीं बता सकता था। बापू ने और तो सब समझा दिया था लेकिन ये नहीं कहा था कि इस बात के बाद किसी के सामने खुद को सामान्य बनाए रखना और न ही खुद मुझे इस बात का खयाल आ रहा था। तभी तो मैं बबलू के पास होते हुए भी उसी सब के बारे में सोचे जा रहा था। मैं चाह कर भी उस मंजर को भुला नहीं पा रहा था।
"क्या हुआ तुझे?" मुझे अजीब तरह से कहीं खोया देख बबलू पूछ पड़ा─"बता क्यों नहीं रहा कि इतनी देर कैसे हुई तुझे आने में?"
"वो...वो मैं बापू को बुलाने के लिए खेत चला गया था।" मैंने हड़बड़ा कर जल्दी से बताया─"इस लिए आने में देर हो गई। तू ये छोड़ और चल जल्दी से। बहुत गर्मी लग रही है मुझे। नदी के ठंडे पानी में आज कल से भी ज्यादा नहाऊंगा।"
"हां हां चल।"
मैं और बबलू नदी तरफ तेजी से चल पड़े। बबलू थोड़ा बातूनी किस्म का था इस लिए पूरे रास्ते वो ही बेमतलब की बातें करता रहा जबकि मैं एक बार फिर से उसी सबके बारे में सोचने में गुम हो गया था।
मेरे मन में अब सवाल उभरने लगे थे। मैं अब खुद से ही सवाल कर रहा था कि मेरे बापू अपने ही मझले भाई की बीवी के साथ इस तरह का गलत काम कैसे कर सकते हैं? और तो और मझली काकी खुद अपने मर्द के रहते इस तरह का काम मेरे बापू के साथ करने का कैसे सोच सकती हैं? क्या उन दोनों को एक दूसरे के साथ ऐसा करना गलत नहीं लगता?
मैं और बबलू कभी कभार इस तरह की बातें कर लिया करते थे। बबलू का मेरे अलावा एक और दोस्त था जो बबलू को अक्सर इस तरह की बातें मिर्च मसाला लगा कर बताया करता था। फिर बबलू मुझसे वो सब बताया करता। शुरू शुरू में मुझे ऐसी बातें सुनने में अजीब लगा करता था और शर्म भी आया करती थी मगर फिर धीरे धीरे ऐसी बातों में मुझे रुचि होने लगी। जब बबलू अपने उस दोस्त की बातों को उसी के जैसे मिर्च मसाला लगा के मुझे बताता तो मेरे अंदर अजीब सी गुदगुदी होने लगती। एक अजीब सा मीठा एहसास होने लगता। पूरे जिस्म में मजे की तरंगें उठने लगतीं। बबलू की नज़रों से बचा कर मैं अक्सर अपने जिस्म के उस नाजुक अंग को भींच देता जिस अंग से हम मर्द पेशाब किया करते हैं। भींच उस लिए देता था क्योंकि वो मेरे छोटे से पेंट में खड़ा हो जाता था। शुरू शुरू में मुझे उसके खड़े हो जाने पर भी हैरानी होती थी लेकिन फिर समझ में आने लगा कि ऐसी ही बातों से तो उसका ताल्लुक है।
खैर मैं यही सोच रहा था कि आखिर बापू और काकी ऐसा कैसे कर सकते हैं? मतलब जो चीज ऐसे रिश्तों में गलत है उसे वो कैसे कर सकते हैं? मैंने इस बारे में बहुत सोचा मगर कुछ समझ न आया कि ऐसा उन दोनों ने क्यों किया होगा? अचानक मुझे खयाल आया कि ऐसा उन्होंने आज से पहले भी किया होगा। हां बिल्कुल, क्योंकि ऐसी चीजें एक दिन में नहीं हुआ करती हैं। मतलब दो लोग पहले ऐसी चीजों के लिए मेल मिलाप का तरीका अपनाते हैं। आपस में बात चीत होती है। एक दूसरे की रजामंदी होती है। तभी जा कर आपस में ऐसे संबंध बनते हैं। थोड़ा समय तो पक्का लगता है लेकिन ये भी सच है कि जब एक बार संबंध बन जाते हैं तो दुबारा बनने में समय नहीं लगता। बस मौके की जरूरत होती है।
इसका मतलब बापू और काकी काफी पहले से ऐसा ताल मेल बनाए हुए हैं और ऐसे सम्बन्ध के लिए सहमत हो रखे हैं। इस निष्कर्ष ने मुझे अंदर तक अजीब से एहसास में सराबोर कर दिया।
"तुझे कुछ सुनाई भी दे रहा है या बहरा हो गया है?"
अचानक बबलू की तेज आवाज मेरे कानो में पड़ी तो मैं उछल पड़ा। हम दोनों नदी के पास पहुंच चुके थे और वो मुझे ही घूरे जा रहा था।
"आज कुछ हुआ है क्या तेरे साथ?" उसने मुझे इस बार बड़े गौर से देखा─"कब से देख रहा हूं तुझे। तू साले मेरी किसी बात का जवाब ही नहीं दे रहा। अरे जवाब की तो बात दूर तू तो मेरी किसी बात पर हां हूं भी नहीं कर रहा। चल बता क्या बात हो गई है?"
मैं उसकी बात सुन बुरी तरह घबरा गया। घबरा इस लिए गया क्योंकि मेरे अंदर एक ऐसा राज कैद था जो अगर किसी को पता चल जाए तो आफत आ जाए और बबलू ने जिस तरह से बात की थी उससे मुझे ये लगा कि कहीं उसे मेरे मन की वो बात पता तो नहीं चल गई?
"क..कुछ नहीं कुछ नहीं हुआ है।" मैं बौखलाते हुए बोला─"बस आज थोड़ी तबियत ठीक नहीं लग रही।"
"गांड़ तोड़ दूंगा तेरी झूठ बोलेगा तो।" बबलू ने आँखें दिखाई─"चल अब साफ साफ बता क्या छुपा रहा है मुझसे?"
मैं आश्चर्य से आँखें फाड़ कर देखने लगा उसे। मेरी धड़कनें ये सोच कर तेज तेज चलने लगीं कि क्या सच में उसे मेरे अंदर छुपे उस राज के बारे में पता चल गया है। अंजान इस लिए बन रहा है क्योंकि वो मेरे मुख से सब सुनना चाहता है।
अगले कुछ ही पलों में मेरी हालत अजीब सी हो गई। कानों में बापू के कहे शब्द गूंजने लगे और अंत में दी हुई उनकी कसम किसी पटाखे की तरह आवाज करते हुए फूटने लगी।
"म..मेरा यकीन कर यार।" मैने बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हाला─"सच में आज मेरी तबियत थोड़ा खराब है। मेरा तो आज इस नदी में नहाने का भी मन नहीं था। चला इस लिए आया हूं क्योंकि तू गुस्सा हो जाता।"
बबलू एक बार फिर गौर से देखने लगा मुझे। उसके इस तरह देखने से मेरी धड़कनें और भी तेज हो चलीं और साथ ही घबराहट में भी इजाफा हो गया। मैने मन ही मन ये कह कर भगवान को याद किया कि बचा ले आज मुझे इस बबलू से।
"वैसे जैसे तेरी हालत दिख रही है उससे मुझे भी लगने लगा है कि तेरी तबियत ठीक नहीं है।" बबलू बोला─"अच्छा ठीक है फिर। तू मत नहा। बस यहीं पर बैठ। मैं जल्दी से दो चार डुबकी लगा लेता हूं। उसके बाद मैं तुझे ले कर तेरे घर चलूंगा। काकी को बताऊंगा कि तेरी तबियत ठीक नहीं है इस लिए सरोजा ताई से कोई दवा ले आएं।"
बबलू की इस बात से मैं फिर से घबरा उठा। असल में मैं नहीं चाहता था कि बबलू मेरी तबियत की बात मां को बताए। क्योंकि इस तरह में कई सवालों के जवाब मुझे देने पड़ेंगे जो मेरे लिए बिल्कुल भी आसान नहीं होने थे।
"अरे नहीं नहीं दवा की कोई जरूरत नहीं है।" मैंने झट से बोला─"बस थोड़ी गर्मी हो गई है। घर जा के आराम करूंगा तो ठीक हो जाऊंगा।"
"अच्छा ठीक है।" बबलू ने कहा─"तू रुक मैं डुबकी मार के आता हूं।"
बबलू ने फटाफट कपड़े उतारे और कूद पड़ा बहती नदी में। सच तो ये था कि उससे कहीं ज्यादा मेरी इच्छा थी कूद पड़ने की मगर अब मैं ऐसा न करने के लिए मजबूर हो चुका था। तबियत का बहाना बनाने के बाद मैं नदी में नहीं कूद सकता था वरना बबलू फिर ऐसे सवाल करने लगता जिनका जवाब मैं दे नहीं पाता। अब मैं सिर्फ यही चाहता था कि कितना जल्दी बबलू नदी से बाहर आए और फिर हम दोनों अपने अपने घर जाएं।
आखिर कुछ देर बाद वो नदी से बाहर आया। एक साफे से उसने अपने गीले बदन को पोंछा। फिर कपड़े पहनने लगा। थोड़ी देर में हम दोनों चल पड़े।
######
घर में बापू से सामना हो जाता इस लिए मैं सीधा खेतों की तरफ ही आ गया था। मन में अभी भी वही सब याद आ जाता था। आंखों के सामने वही दृश्य चमक उठता था। बापू का कमर के नीचे पूरा नंगा जिस्म। उनके नंगे पोंद (नितंब)। काकी की नंगी टांगें और भरी भरी जांघें। कमरे में उस वक्त हल्के से गूंज उठी उनकी वो मादक सिसकी।
मैं बहुत कोशिश कर रहा था उस सबको भुलाने की मगर भुला नहीं पा रहा था। आज से पहले मैंने अपने घर परिवार की किसी भी औरत या लड़की को न तो बेपर्दा देखा था और न ही कभी उनके बारे में गलत सोचा था मगर आज के इस हादसे ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया था।
बार बार मैं अपने जहन से उस सबको झटक दे रहा था मगर अगले ही पल वो फिर से मेरे मस्तिष्क में तरोताजा हो उठती थी। सच कहूं तो अब परेशान होने लगा था मैं। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि कहां जाऊं और कैसे अपने दिमाग से इस सबको निकालूं?
घर के बाहर ही नीम का एक पेड़ था जिसकी छांव तले मैं बैठा हुआ था। इस वक्त खेतों पर मेरे अलावा कोई नहीं था। इसके बावजूद अंदर उस कमरे में जाने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी जिस कमरे में कुछ समय पहले बापू और मझली काकी अवैध संबंध बनाने में लगे हुए थे।
मैं सोचने लगता कि क्या मझले काका को इस बात का पता होगा? जवाब में मुझे यही लगता था कि उन्हें कुछ भी पता नहीं होगा। दुनिया में भला ऐसा कौन मर्द होगा जो अपनी बीवी के अपने ही बड़े भाई के साथ अवैध संबंध को बर्दाश्त कर लेगा। मतलब साफ है मझले काका को इसका पता नहीं था। तो इसका मतलब यही हुआ कि एक तरफ मेरे बापू परिवार के साथ धोखा कर रहे थे और दूसरी तरफ काकी अपने ही मरद के साथ छल कर रही थी।
एक तरह से देखा जाए तो हमारे पूरे परिवार के मुखिया मेरे बापू ही थे। भले ही घर बार अलग अलग थे। जाहिर है मुखिया के रूप में मेरे बापू ऐसा तो कभी नहीं चाह सकते थे कि परिवार में कोई भी किसी के साथ इस तरह का नाजायज संबंध बनाए। अब जबकि मुखिया ही बाकी सबसे छुपा कर या बाकी लोगों की नज़रों में धूल झोंक कर ऐसा अनैतिक सम्बन्ध बनाए हुए है तो उसके बारे में क्या सोचा जाए?
इंसान जब सोचना शुरू कर देता है तो उसकी कल्पनाएं जाने कहां कहां परवाज करने लगती हैं। इस वक्त यही हो रहा था मेरे साथ। मैं कल्पना कर रहा था कि क्या मझली काकी के अलावा मेरे बापू का ऐसा नाजायज संबंध छोटी काकी से भी होगा? हालांकि छोटे काका का ब्याह हुए अभी कुछ साल ही हुए थे लेकिन ऐसी परिस्थिति में अब मैं कुछ भी सोच सकता था।
मैं छोटी काकी के बारे में सोचने लगा। काका का ब्याह मेरे सामने ही हुआ था। मतलब छोटी काकी मेरे सामने ही दुल्हन बन कर आई थी। उसके बाद से अब तक मैंने उनके बर्ताव में कभी ऐसा महसूस नहीं किया था जिससे ये कहा जा सके कि वो मझली काकी के जैसी सोच रखने वाली औरत है। हालांकि आज से पहले तक ऐसा मैं मझली काकी के बारे में भी समझता था मगर जो कुछ मैंने आज देखा था उससे उनके बारे में मेरी सोच अब बदल चुकी थी। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि बापू और मझली काकी के द्वारा मुझे इतना बड़ा झटका लगेगा।
मैं समझ नहीं पा रहा था कि इस सबके बाद मुझे अब क्या करना चाहिए? मेरे मन में अब ये जानने की जिज्ञासा होने लगी थी कि बापू और काकी ने आपस में ऐसा संबंध कैसे बना लिया होगा? आखिर दोनों के बीच ऐसी क्या स्थितियां बनी होंगी जिससे दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए? एक और सवाल मेरे मन में अचानक उभर रहा था और वो ये था कि क्या बापू की तरह मेरे दोनों काका भी ऐसी सोच वाले होंगे? वैसे तो मैंने उन दोनों में से किसी को भी कभी किसी के साथ ऐसी स्थिति में होने की कल्पना ही नहीं की थी मगर आज की इस घटना के बाद मेरी कल्पनाएं जाने कहां कहां परवाज करने लगी थीं।
मैंने सोच लिया कि अब इस बारे में मैं खोजबीन करूंगा। मतलब कि अब मैं चोरी छुपे सब पर नजर रखूंगा और ये जानने की कोशिश करूंगा कि इस परिवार में मेरे बापू और काकी के अलावा और कौन है जो ऐसा अवैध संबंध परिवार में किसी से रखे हुए है? हालांकि ये जरूरी नहीं था कि बाकी किसी ने ऐसे सम्बन्ध बनाए ही हों लेकिन मैं अब यही सोच बैठा था इस लिए अपनी उत्सुकता और जिज्ञासा को शांत करने के लिए मुझे ये खोजबीन करनी ही थी।
######
"अरे करेजा तू अकेले यहां क्या कर रहा है?"
छोटे काका की आवाज सुन मैं चौंक पड़ा।
"इस पेड़ के नीचे ठंडी ठंडी हवा लग रही थी काका तो बैठ गया यहां पर।" मैंने बताया।
"बड़े भैया और मझले भैया अभी आए नहीं क्या खा के?"
"आए होते तो क्या वो दोनों यहां दिखते नहीं काका?" मैंने शरारत से कहा तो छोटे काका हंस पड़े।
"अब तू बड़ा हो गया है करेजा।" काका ने मेरे सिर पर हाथ फेरा─"इस लिए अब ये शरारतें करना बंद कर दे और अपने काका लोगों के साथ थोड़ी बहुत काम किया कर। हमें भी थोड़ी राहत मिल जाएगी।"
"ठीक है बताओ क्या काम करूं मैं?"
"हंसिया से गेहूं काटते तो बनेगा नहीं तुझसे।" काका ने कहा─"तो तू एक काम कर कटे हुए गेहूं के छोटे छोटे दो चार गट्ठों को एक में रख कर उसकी पुल्लियां बांधता जा। ये तो तू कर ही लेगा। है न करेजा?"
"तुम एक बार कर के बता दो काका।" मैं उठ कर खड़ा हो गया─"फिर मैं भी वैसा ही करने लगूंगा।"
"ऐसा क्या?" काका ने हैरानी और खुशी के साथ कहा─"चल फिर अभी कर के बताता हूं तुझे।"
थोड़ी ही देर में मैं छोटे काका के साथ उस खेत में आ गया जिसमें कटाई लगी थी। पूरे खेत में कटे हुए गेहूं के छोटे छोटे गट्ठे पड़े हुए थे।
"देख ये वाला गट्ठा मैंने पानी में फुलाने को रखा था।" काका ने कहीं से गेंहू का एक ऐसा गट्ठा ला कर दिखाया जिसमें से पानी रिस रिस के जमीन पर गिर रहा था─"अब तू पूछेगा कि पानी में क्यों तो वो इस लिए क्योंकि इससे गेहूं के पेड़ एकदम मुलायम हो जाते हैं और मोड़ने या गांठ बांधने पर टूटते नहीं हैं।"
"हां ये तो जानता हूं मैं काका।"
"तो अब अच्छे से देख कि कैसे मैं इन छोटे छोटे गट्ठों को इकट्ठा कर के थोड़े बड़े आकार में एक गट्ठा बना कर भीगे हुए बंधना से बांधता हूं।"
काका ने पहले भीगे हुए गट्ठे में से गेहूं के आठ दस पेड़ निकाले और फिर चार पांच की संख्या में अलग कर दोनों को जोड़ा और फिर उसे खेत की जमीन पर सीधे आकार में रख दिया। उसके बाद वो कटे हुए गेहूं के छोटे छोटे गट्ठों को उठा कर उसमें रखने लगे।
"इसमें कम से कम छोटे छोटे ये सात या आठ गट्ठे रखना है।" छोटे काका ने गट्ठे रखने के बाद नीचे सीधे आकार में रखे भीगे हुए बंधना के दोनों सिरों को दोनों हाथ से मिलाते हुए कहा─"उसके बाद फिर इस तरह से इस पूरे गट्ठे को अच्छे से बांध देना है। बस इस तरह से ये पुल्ली बन कर तैयार हो जाती है। समझ गया न?"
"ये तो बहुत आसान काम है काका।"
"अगर तुझे आसान लगता है।" काका ने मुस्कुरा कर कहा─"तो जैसे मैंने इसे बनाया है इसी तरह तू पूरे कटे हुए गेहूं की पुल्ली बना डाल।"
मैंने हां कहा और लग गया काम पर। मैंने भी पहले भीगे हुए गेहूं के गट्ठे से आठ दस पेड़ निकाले। फिर चार पांच की संख्या में उन्हें अलग कर के दोनों के छोरों को बांधा। ऐसा करने से दोनों छोर जुड़ जाते थे जिससे एक लम्बे आकार में बंधना बन के तैयार हो जाता था। उसके बाद मैंने छोटे छोटे गट्ठों को उठा कर उस बंधना के ऊपर वैसे ही सलीके से रखा जैसे काका ने रखा था। जब वो एक पुल्ली के बराबर हो गया तो मैंने नीचे पड़े उस भीगे बंधना से उसे बांध दिया। उसकी गांठ काका के जैसे साफ तो नहीं लगी लेकिन पुल्ली बना डाली मैंने।
"देखो काका, बना दिया न मैंने।" मैंने सीना चौड़ा कर के काका की तरफ देखा।
"बहुत बढ़िया करेजा।" काका ने खुशी से मेरा गाल सहलाया─"मुझे खुशी हुई कि तू मेरे बताने पर एक ही बार में पुल्ली बनाना और उसे बांधना सीख गया। अब इसी तरह तू जितनी बांध सकता है बांध डाल। बाकी तो हम बांध ही लेंगे।"
"ठीक है काका।" मैंने कहा और काम पर लग गया।
काका मुस्कुराते हुए दूसरे खेत की तरफ चले गए। मेरे लिए ये काम नया था इस लिए इसे मैं पूरे जोश के साथ करने लगा था। जल्दी ही मैं पसीने में नहा गया तो मैंने कमीज उतार कर एक तरफ रख दी और फिर से काम पर लग गया।
इसका नतीजा ये हुआ कि मैं उस बात को बिल्कुल ही भूल गया जिस बात को काका के आने से पहले तक सोच सोच के मैं परेशान हो चुका था। अब मेरे मन में सिर्फ ये था कि मुझे इस वाले खेत की सारी पुल्लियां बांध कर काम खत्म कर देना है। मगर शायद ऐसा होना अभी मुमकिन नहीं था क्योंकि....तभी मैं किसी औरत की आवाज सुन कर एकदम चौंक पड़ा।
पलट कर पीछे देखा तो मेरी नजर मझली काकी पर पड़ी। उनके साथ छोटी काकी और मां भी थी। मैंने मां की ही आवाज सुनी थी।
"अरे वाह आज तो मेरा राज दुलारा बहुत ज्यादा काम कर रहा है।" मां ने मुझ पर ममता बरसा कर कहा─"मुझे पता था जब मेरा राजा बेटा खेतों पर काम करना शुरू करेगा तो अपने दोनों काकाओं को भी पीछे कर देगा।"
"हां तुम सच कह रही हो जीजी।" छोटी काकी ने मुस्कुरा कर कहा─"हमारे राजू सचमुच अपने काका लोगों को पीछे कर देंगे।"
मां और छोटी काकी के बाद मेरी नजर फिर से मझली काकी पर पड़ीं। जैसे ही उनसे मेरी नजरें मिलीं वो हड़बड़ा सी गई और झट से नजरें हटा कर परे देखने लगीं। उन्हें देखते ही मेरे दिलों दिमाग में एकदम से हलचल शुरू हो गई थी। जिस सबको अब तक मैं भूला हुआ था वो फिर से मेरे जहन में उभर आया था। एक बार फिर से आंखों के सामने वही दृश्य चमकने लगा था।
"मेरे बेटे के काम पर नजर मत लगा देना छोटी।" मां ने छोटी काकी पर झूठा गुस्सा दिखाया─"और अब चल यहां से। अभी बहुत काटना बाकी है।"
मां छोटी काकी को ले कर दूसरे खेतों की तरफ चल दी जबकि मझली काकी पत्थर की मूरत बनी अपनी जगह पर खड़ी रहीं। कुछ पलों तक तो मैं भी खड़ा ही रहा मगर फिर पलट कर अपने काम पर लग गया। मेरे अंदर अभी भी हलचल मची हुई थी। धड़कनें काफी तेज चल रहीं थी। मन तो कर रहा था कि काकी को यहां अकेला देख जा कर उनसे पूछूं कि उस समय वो मेरे बापू के साथ क्या कर रहीं थी लेकिन ये पूछने की हिम्मत न हुई।
जारी है........
किसी तरह मैं बबलू के घर पहुंचा। बबलू मुझे देखते ही पूछने लगा कि मैंने आने में इतना देर क्यों लगा दी? अब भला मैं उसे कैसे बताता और कैसे समझाता कि देर से आने की वजह क्या थी? बापू ने मां की कसम खिला दी थी इस लिए उसे कुछ नहीं बता सकता था। बापू ने और तो सब समझा दिया था लेकिन ये नहीं कहा था कि इस बात के बाद किसी के सामने खुद को सामान्य बनाए रखना और न ही खुद मुझे इस बात का खयाल आ रहा था। तभी तो मैं बबलू के पास होते हुए भी उसी सब के बारे में सोचे जा रहा था। मैं चाह कर भी उस मंजर को भुला नहीं पा रहा था।
"क्या हुआ तुझे?" मुझे अजीब तरह से कहीं खोया देख बबलू पूछ पड़ा─"बता क्यों नहीं रहा कि इतनी देर कैसे हुई तुझे आने में?"
"वो...वो मैं बापू को बुलाने के लिए खेत चला गया था।" मैंने हड़बड़ा कर जल्दी से बताया─"इस लिए आने में देर हो गई। तू ये छोड़ और चल जल्दी से। बहुत गर्मी लग रही है मुझे। नदी के ठंडे पानी में आज कल से भी ज्यादा नहाऊंगा।"
"हां हां चल।"
मैं और बबलू नदी तरफ तेजी से चल पड़े। बबलू थोड़ा बातूनी किस्म का था इस लिए पूरे रास्ते वो ही बेमतलब की बातें करता रहा जबकि मैं एक बार फिर से उसी सबके बारे में सोचने में गुम हो गया था।
मेरे मन में अब सवाल उभरने लगे थे। मैं अब खुद से ही सवाल कर रहा था कि मेरे बापू अपने ही मझले भाई की बीवी के साथ इस तरह का गलत काम कैसे कर सकते हैं? और तो और मझली काकी खुद अपने मर्द के रहते इस तरह का काम मेरे बापू के साथ करने का कैसे सोच सकती हैं? क्या उन दोनों को एक दूसरे के साथ ऐसा करना गलत नहीं लगता?
मैं और बबलू कभी कभार इस तरह की बातें कर लिया करते थे। बबलू का मेरे अलावा एक और दोस्त था जो बबलू को अक्सर इस तरह की बातें मिर्च मसाला लगा कर बताया करता था। फिर बबलू मुझसे वो सब बताया करता। शुरू शुरू में मुझे ऐसी बातें सुनने में अजीब लगा करता था और शर्म भी आया करती थी मगर फिर धीरे धीरे ऐसी बातों में मुझे रुचि होने लगी। जब बबलू अपने उस दोस्त की बातों को उसी के जैसे मिर्च मसाला लगा के मुझे बताता तो मेरे अंदर अजीब सी गुदगुदी होने लगती। एक अजीब सा मीठा एहसास होने लगता। पूरे जिस्म में मजे की तरंगें उठने लगतीं। बबलू की नज़रों से बचा कर मैं अक्सर अपने जिस्म के उस नाजुक अंग को भींच देता जिस अंग से हम मर्द पेशाब किया करते हैं। भींच उस लिए देता था क्योंकि वो मेरे छोटे से पेंट में खड़ा हो जाता था। शुरू शुरू में मुझे उसके खड़े हो जाने पर भी हैरानी होती थी लेकिन फिर समझ में आने लगा कि ऐसी ही बातों से तो उसका ताल्लुक है।
खैर मैं यही सोच रहा था कि आखिर बापू और काकी ऐसा कैसे कर सकते हैं? मतलब जो चीज ऐसे रिश्तों में गलत है उसे वो कैसे कर सकते हैं? मैंने इस बारे में बहुत सोचा मगर कुछ समझ न आया कि ऐसा उन दोनों ने क्यों किया होगा? अचानक मुझे खयाल आया कि ऐसा उन्होंने आज से पहले भी किया होगा। हां बिल्कुल, क्योंकि ऐसी चीजें एक दिन में नहीं हुआ करती हैं। मतलब दो लोग पहले ऐसी चीजों के लिए मेल मिलाप का तरीका अपनाते हैं। आपस में बात चीत होती है। एक दूसरे की रजामंदी होती है। तभी जा कर आपस में ऐसे संबंध बनते हैं। थोड़ा समय तो पक्का लगता है लेकिन ये भी सच है कि जब एक बार संबंध बन जाते हैं तो दुबारा बनने में समय नहीं लगता। बस मौके की जरूरत होती है।
इसका मतलब बापू और काकी काफी पहले से ऐसा ताल मेल बनाए हुए हैं और ऐसे सम्बन्ध के लिए सहमत हो रखे हैं। इस निष्कर्ष ने मुझे अंदर तक अजीब से एहसास में सराबोर कर दिया।
"तुझे कुछ सुनाई भी दे रहा है या बहरा हो गया है?"
अचानक बबलू की तेज आवाज मेरे कानो में पड़ी तो मैं उछल पड़ा। हम दोनों नदी के पास पहुंच चुके थे और वो मुझे ही घूरे जा रहा था।
"आज कुछ हुआ है क्या तेरे साथ?" उसने मुझे इस बार बड़े गौर से देखा─"कब से देख रहा हूं तुझे। तू साले मेरी किसी बात का जवाब ही नहीं दे रहा। अरे जवाब की तो बात दूर तू तो मेरी किसी बात पर हां हूं भी नहीं कर रहा। चल बता क्या बात हो गई है?"
मैं उसकी बात सुन बुरी तरह घबरा गया। घबरा इस लिए गया क्योंकि मेरे अंदर एक ऐसा राज कैद था जो अगर किसी को पता चल जाए तो आफत आ जाए और बबलू ने जिस तरह से बात की थी उससे मुझे ये लगा कि कहीं उसे मेरे मन की वो बात पता तो नहीं चल गई?
"क..कुछ नहीं कुछ नहीं हुआ है।" मैं बौखलाते हुए बोला─"बस आज थोड़ी तबियत ठीक नहीं लग रही।"
"गांड़ तोड़ दूंगा तेरी झूठ बोलेगा तो।" बबलू ने आँखें दिखाई─"चल अब साफ साफ बता क्या छुपा रहा है मुझसे?"
मैं आश्चर्य से आँखें फाड़ कर देखने लगा उसे। मेरी धड़कनें ये सोच कर तेज तेज चलने लगीं कि क्या सच में उसे मेरे अंदर छुपे उस राज के बारे में पता चल गया है। अंजान इस लिए बन रहा है क्योंकि वो मेरे मुख से सब सुनना चाहता है।
अगले कुछ ही पलों में मेरी हालत अजीब सी हो गई। कानों में बापू के कहे शब्द गूंजने लगे और अंत में दी हुई उनकी कसम किसी पटाखे की तरह आवाज करते हुए फूटने लगी।
"म..मेरा यकीन कर यार।" मैने बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हाला─"सच में आज मेरी तबियत थोड़ा खराब है। मेरा तो आज इस नदी में नहाने का भी मन नहीं था। चला इस लिए आया हूं क्योंकि तू गुस्सा हो जाता।"
बबलू एक बार फिर गौर से देखने लगा मुझे। उसके इस तरह देखने से मेरी धड़कनें और भी तेज हो चलीं और साथ ही घबराहट में भी इजाफा हो गया। मैने मन ही मन ये कह कर भगवान को याद किया कि बचा ले आज मुझे इस बबलू से।
"वैसे जैसे तेरी हालत दिख रही है उससे मुझे भी लगने लगा है कि तेरी तबियत ठीक नहीं है।" बबलू बोला─"अच्छा ठीक है फिर। तू मत नहा। बस यहीं पर बैठ। मैं जल्दी से दो चार डुबकी लगा लेता हूं। उसके बाद मैं तुझे ले कर तेरे घर चलूंगा। काकी को बताऊंगा कि तेरी तबियत ठीक नहीं है इस लिए सरोजा ताई से कोई दवा ले आएं।"
बबलू की इस बात से मैं फिर से घबरा उठा। असल में मैं नहीं चाहता था कि बबलू मेरी तबियत की बात मां को बताए। क्योंकि इस तरह में कई सवालों के जवाब मुझे देने पड़ेंगे जो मेरे लिए बिल्कुल भी आसान नहीं होने थे।
"अरे नहीं नहीं दवा की कोई जरूरत नहीं है।" मैंने झट से बोला─"बस थोड़ी गर्मी हो गई है। घर जा के आराम करूंगा तो ठीक हो जाऊंगा।"
"अच्छा ठीक है।" बबलू ने कहा─"तू रुक मैं डुबकी मार के आता हूं।"
बबलू ने फटाफट कपड़े उतारे और कूद पड़ा बहती नदी में। सच तो ये था कि उससे कहीं ज्यादा मेरी इच्छा थी कूद पड़ने की मगर अब मैं ऐसा न करने के लिए मजबूर हो चुका था। तबियत का बहाना बनाने के बाद मैं नदी में नहीं कूद सकता था वरना बबलू फिर ऐसे सवाल करने लगता जिनका जवाब मैं दे नहीं पाता। अब मैं सिर्फ यही चाहता था कि कितना जल्दी बबलू नदी से बाहर आए और फिर हम दोनों अपने अपने घर जाएं।
आखिर कुछ देर बाद वो नदी से बाहर आया। एक साफे से उसने अपने गीले बदन को पोंछा। फिर कपड़े पहनने लगा। थोड़ी देर में हम दोनों चल पड़े।
######
घर में बापू से सामना हो जाता इस लिए मैं सीधा खेतों की तरफ ही आ गया था। मन में अभी भी वही सब याद आ जाता था। आंखों के सामने वही दृश्य चमक उठता था। बापू का कमर के नीचे पूरा नंगा जिस्म। उनके नंगे पोंद (नितंब)। काकी की नंगी टांगें और भरी भरी जांघें। कमरे में उस वक्त हल्के से गूंज उठी उनकी वो मादक सिसकी।
मैं बहुत कोशिश कर रहा था उस सबको भुलाने की मगर भुला नहीं पा रहा था। आज से पहले मैंने अपने घर परिवार की किसी भी औरत या लड़की को न तो बेपर्दा देखा था और न ही कभी उनके बारे में गलत सोचा था मगर आज के इस हादसे ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया था।
बार बार मैं अपने जहन से उस सबको झटक दे रहा था मगर अगले ही पल वो फिर से मेरे मस्तिष्क में तरोताजा हो उठती थी। सच कहूं तो अब परेशान होने लगा था मैं। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि कहां जाऊं और कैसे अपने दिमाग से इस सबको निकालूं?
घर के बाहर ही नीम का एक पेड़ था जिसकी छांव तले मैं बैठा हुआ था। इस वक्त खेतों पर मेरे अलावा कोई नहीं था। इसके बावजूद अंदर उस कमरे में जाने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी जिस कमरे में कुछ समय पहले बापू और मझली काकी अवैध संबंध बनाने में लगे हुए थे।
मैं सोचने लगता कि क्या मझले काका को इस बात का पता होगा? जवाब में मुझे यही लगता था कि उन्हें कुछ भी पता नहीं होगा। दुनिया में भला ऐसा कौन मर्द होगा जो अपनी बीवी के अपने ही बड़े भाई के साथ अवैध संबंध को बर्दाश्त कर लेगा। मतलब साफ है मझले काका को इसका पता नहीं था। तो इसका मतलब यही हुआ कि एक तरफ मेरे बापू परिवार के साथ धोखा कर रहे थे और दूसरी तरफ काकी अपने ही मरद के साथ छल कर रही थी।
एक तरह से देखा जाए तो हमारे पूरे परिवार के मुखिया मेरे बापू ही थे। भले ही घर बार अलग अलग थे। जाहिर है मुखिया के रूप में मेरे बापू ऐसा तो कभी नहीं चाह सकते थे कि परिवार में कोई भी किसी के साथ इस तरह का नाजायज संबंध बनाए। अब जबकि मुखिया ही बाकी सबसे छुपा कर या बाकी लोगों की नज़रों में धूल झोंक कर ऐसा अनैतिक सम्बन्ध बनाए हुए है तो उसके बारे में क्या सोचा जाए?
इंसान जब सोचना शुरू कर देता है तो उसकी कल्पनाएं जाने कहां कहां परवाज करने लगती हैं। इस वक्त यही हो रहा था मेरे साथ। मैं कल्पना कर रहा था कि क्या मझली काकी के अलावा मेरे बापू का ऐसा नाजायज संबंध छोटी काकी से भी होगा? हालांकि छोटे काका का ब्याह हुए अभी कुछ साल ही हुए थे लेकिन ऐसी परिस्थिति में अब मैं कुछ भी सोच सकता था।
मैं छोटी काकी के बारे में सोचने लगा। काका का ब्याह मेरे सामने ही हुआ था। मतलब छोटी काकी मेरे सामने ही दुल्हन बन कर आई थी। उसके बाद से अब तक मैंने उनके बर्ताव में कभी ऐसा महसूस नहीं किया था जिससे ये कहा जा सके कि वो मझली काकी के जैसी सोच रखने वाली औरत है। हालांकि आज से पहले तक ऐसा मैं मझली काकी के बारे में भी समझता था मगर जो कुछ मैंने आज देखा था उससे उनके बारे में मेरी सोच अब बदल चुकी थी। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि बापू और मझली काकी के द्वारा मुझे इतना बड़ा झटका लगेगा।
मैं समझ नहीं पा रहा था कि इस सबके बाद मुझे अब क्या करना चाहिए? मेरे मन में अब ये जानने की जिज्ञासा होने लगी थी कि बापू और काकी ने आपस में ऐसा संबंध कैसे बना लिया होगा? आखिर दोनों के बीच ऐसी क्या स्थितियां बनी होंगी जिससे दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए? एक और सवाल मेरे मन में अचानक उभर रहा था और वो ये था कि क्या बापू की तरह मेरे दोनों काका भी ऐसी सोच वाले होंगे? वैसे तो मैंने उन दोनों में से किसी को भी कभी किसी के साथ ऐसी स्थिति में होने की कल्पना ही नहीं की थी मगर आज की इस घटना के बाद मेरी कल्पनाएं जाने कहां कहां परवाज करने लगी थीं।
मैंने सोच लिया कि अब इस बारे में मैं खोजबीन करूंगा। मतलब कि अब मैं चोरी छुपे सब पर नजर रखूंगा और ये जानने की कोशिश करूंगा कि इस परिवार में मेरे बापू और काकी के अलावा और कौन है जो ऐसा अवैध संबंध परिवार में किसी से रखे हुए है? हालांकि ये जरूरी नहीं था कि बाकी किसी ने ऐसे सम्बन्ध बनाए ही हों लेकिन मैं अब यही सोच बैठा था इस लिए अपनी उत्सुकता और जिज्ञासा को शांत करने के लिए मुझे ये खोजबीन करनी ही थी।
######
"अरे करेजा तू अकेले यहां क्या कर रहा है?"
छोटे काका की आवाज सुन मैं चौंक पड़ा।
"इस पेड़ के नीचे ठंडी ठंडी हवा लग रही थी काका तो बैठ गया यहां पर।" मैंने बताया।
"बड़े भैया और मझले भैया अभी आए नहीं क्या खा के?"
"आए होते तो क्या वो दोनों यहां दिखते नहीं काका?" मैंने शरारत से कहा तो छोटे काका हंस पड़े।
"अब तू बड़ा हो गया है करेजा।" काका ने मेरे सिर पर हाथ फेरा─"इस लिए अब ये शरारतें करना बंद कर दे और अपने काका लोगों के साथ थोड़ी बहुत काम किया कर। हमें भी थोड़ी राहत मिल जाएगी।"
"ठीक है बताओ क्या काम करूं मैं?"
"हंसिया से गेहूं काटते तो बनेगा नहीं तुझसे।" काका ने कहा─"तो तू एक काम कर कटे हुए गेहूं के छोटे छोटे दो चार गट्ठों को एक में रख कर उसकी पुल्लियां बांधता जा। ये तो तू कर ही लेगा। है न करेजा?"
"तुम एक बार कर के बता दो काका।" मैं उठ कर खड़ा हो गया─"फिर मैं भी वैसा ही करने लगूंगा।"
"ऐसा क्या?" काका ने हैरानी और खुशी के साथ कहा─"चल फिर अभी कर के बताता हूं तुझे।"
थोड़ी ही देर में मैं छोटे काका के साथ उस खेत में आ गया जिसमें कटाई लगी थी। पूरे खेत में कटे हुए गेहूं के छोटे छोटे गट्ठे पड़े हुए थे।
"देख ये वाला गट्ठा मैंने पानी में फुलाने को रखा था।" काका ने कहीं से गेंहू का एक ऐसा गट्ठा ला कर दिखाया जिसमें से पानी रिस रिस के जमीन पर गिर रहा था─"अब तू पूछेगा कि पानी में क्यों तो वो इस लिए क्योंकि इससे गेहूं के पेड़ एकदम मुलायम हो जाते हैं और मोड़ने या गांठ बांधने पर टूटते नहीं हैं।"
"हां ये तो जानता हूं मैं काका।"
"तो अब अच्छे से देख कि कैसे मैं इन छोटे छोटे गट्ठों को इकट्ठा कर के थोड़े बड़े आकार में एक गट्ठा बना कर भीगे हुए बंधना से बांधता हूं।"
काका ने पहले भीगे हुए गट्ठे में से गेहूं के आठ दस पेड़ निकाले और फिर चार पांच की संख्या में अलग कर दोनों को जोड़ा और फिर उसे खेत की जमीन पर सीधे आकार में रख दिया। उसके बाद वो कटे हुए गेहूं के छोटे छोटे गट्ठों को उठा कर उसमें रखने लगे।
"इसमें कम से कम छोटे छोटे ये सात या आठ गट्ठे रखना है।" छोटे काका ने गट्ठे रखने के बाद नीचे सीधे आकार में रखे भीगे हुए बंधना के दोनों सिरों को दोनों हाथ से मिलाते हुए कहा─"उसके बाद फिर इस तरह से इस पूरे गट्ठे को अच्छे से बांध देना है। बस इस तरह से ये पुल्ली बन कर तैयार हो जाती है। समझ गया न?"
"ये तो बहुत आसान काम है काका।"
"अगर तुझे आसान लगता है।" काका ने मुस्कुरा कर कहा─"तो जैसे मैंने इसे बनाया है इसी तरह तू पूरे कटे हुए गेहूं की पुल्ली बना डाल।"
मैंने हां कहा और लग गया काम पर। मैंने भी पहले भीगे हुए गेहूं के गट्ठे से आठ दस पेड़ निकाले। फिर चार पांच की संख्या में उन्हें अलग कर के दोनों के छोरों को बांधा। ऐसा करने से दोनों छोर जुड़ जाते थे जिससे एक लम्बे आकार में बंधना बन के तैयार हो जाता था। उसके बाद मैंने छोटे छोटे गट्ठों को उठा कर उस बंधना के ऊपर वैसे ही सलीके से रखा जैसे काका ने रखा था। जब वो एक पुल्ली के बराबर हो गया तो मैंने नीचे पड़े उस भीगे बंधना से उसे बांध दिया। उसकी गांठ काका के जैसे साफ तो नहीं लगी लेकिन पुल्ली बना डाली मैंने।
"देखो काका, बना दिया न मैंने।" मैंने सीना चौड़ा कर के काका की तरफ देखा।
"बहुत बढ़िया करेजा।" काका ने खुशी से मेरा गाल सहलाया─"मुझे खुशी हुई कि तू मेरे बताने पर एक ही बार में पुल्ली बनाना और उसे बांधना सीख गया। अब इसी तरह तू जितनी बांध सकता है बांध डाल। बाकी तो हम बांध ही लेंगे।"
"ठीक है काका।" मैंने कहा और काम पर लग गया।
काका मुस्कुराते हुए दूसरे खेत की तरफ चले गए। मेरे लिए ये काम नया था इस लिए इसे मैं पूरे जोश के साथ करने लगा था। जल्दी ही मैं पसीने में नहा गया तो मैंने कमीज उतार कर एक तरफ रख दी और फिर से काम पर लग गया।
इसका नतीजा ये हुआ कि मैं उस बात को बिल्कुल ही भूल गया जिस बात को काका के आने से पहले तक सोच सोच के मैं परेशान हो चुका था। अब मेरे मन में सिर्फ ये था कि मुझे इस वाले खेत की सारी पुल्लियां बांध कर काम खत्म कर देना है। मगर शायद ऐसा होना अभी मुमकिन नहीं था क्योंकि....तभी मैं किसी औरत की आवाज सुन कर एकदम चौंक पड़ा।
पलट कर पीछे देखा तो मेरी नजर मझली काकी पर पड़ी। उनके साथ छोटी काकी और मां भी थी। मैंने मां की ही आवाज सुनी थी।
"अरे वाह आज तो मेरा राज दुलारा बहुत ज्यादा काम कर रहा है।" मां ने मुझ पर ममता बरसा कर कहा─"मुझे पता था जब मेरा राजा बेटा खेतों पर काम करना शुरू करेगा तो अपने दोनों काकाओं को भी पीछे कर देगा।"
"हां तुम सच कह रही हो जीजी।" छोटी काकी ने मुस्कुरा कर कहा─"हमारे राजू सचमुच अपने काका लोगों को पीछे कर देंगे।"
मां और छोटी काकी के बाद मेरी नजर फिर से मझली काकी पर पड़ीं। जैसे ही उनसे मेरी नजरें मिलीं वो हड़बड़ा सी गई और झट से नजरें हटा कर परे देखने लगीं। उन्हें देखते ही मेरे दिलों दिमाग में एकदम से हलचल शुरू हो गई थी। जिस सबको अब तक मैं भूला हुआ था वो फिर से मेरे जहन में उभर आया था। एक बार फिर से आंखों के सामने वही दृश्य चमकने लगा था।
"मेरे बेटे के काम पर नजर मत लगा देना छोटी।" मां ने छोटी काकी पर झूठा गुस्सा दिखाया─"और अब चल यहां से। अभी बहुत काटना बाकी है।"
मां छोटी काकी को ले कर दूसरे खेतों की तरफ चल दी जबकि मझली काकी पत्थर की मूरत बनी अपनी जगह पर खड़ी रहीं। कुछ पलों तक तो मैं भी खड़ा ही रहा मगर फिर पलट कर अपने काम पर लग गया। मेरे अंदर अभी भी हलचल मची हुई थी। धड़कनें काफी तेज चल रहीं थी। मन तो कर रहा था कि काकी को यहां अकेला देख जा कर उनसे पूछूं कि उस समय वो मेरे बापू के साथ क्या कर रहीं थी लेकिन ये पूछने की हिम्मत न हुई।
जारी है........
It's Rajan


![[+]](https://xossipy.com/themes/sharepoint/collapse_collapsed.png)