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Adultery आप-बीती ~ Truth is Dark
#2
भाग ~ ०१



इंसान की किस्मत कब बदल जाए कोई तसव्वुर भी नहीं कर सकता। कभी कभी इंसान किस्मत के बदलने का बेसब्री से इंतजार करता है तो कभी चाहता है कि अभी जैसा चल रहा है वैसा ही चलता रहे। लेकिन ऐसा होता नहीं है क्योंकि सब कुछ इंसान के चाहने से नहीं होता। 

ऊपर बैठा विधाता एक ऐसा खिलाड़ी है जिसके सामने हर खिलाड़ी धराशाई हो जाता है। उसके पास इतनी ताकत है कि वो जब चाहे जिस पल चाहे इंसान की तकदीर बदल दे। उसके बाद इंसान एक बार फिर से वही करने लग जाता है जो वो हमेशा से उसके इशारे पर करता आया है।

मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरे साथ एक दिन किस्मत का खेल इस तरह से शुरू होगा और फिर मेरे अंदर इस तरह बदलाव होना शुरू हो जाएगा। मैं तो ऐसा था जो अपनी छोटी छोटी खुशियों में ही मगन रहता था। जैसे अपनी उम्र के लड़कों के साथ खेल कूद करना। नदी में जा कर जी भर के डुबकी लगाना और तैरना तो कभी मित्रों के साथ चोरी चोरी सरपंच के बाग में घुस कर आम चुरा कर खाना। 

दुनियादारी से कोई मतलब नहीं था और न ही दुनियादारी की ज्यादा समझ थी। ऐसा नहीं था कि मैं कोई नासमझ बच्चा था लेकिन जवानी की दहलीज पर पहुंच कर भी मैं थोड़ा भोला और नादान था। मां बापू का लाडला था लेकिन बचपन से ही ऐसे संस्कार मिले थे कि मैं न तो कभी गलत रास्ते पर गया और न ही उनके लाड़ प्यार की वजह से बिगड़ा। 

मेरे हिसाब से मेरे जीवन का अभी तक का सफर अच्छा ही गुजर रहा था। ख़ैर जैसा कि मैंने बताया कि किस्मत कब बदल जाए कोई तसव्वुर भी नहीं कर सकता। किस्मत जब किसी इंसान के जीवन में दखल देती है तो सब कुछ बदलने लगता है। शुरू शुरू में हमें अजीब तो लगता है लेकिन मजबूरी या फिर उत्सुकता के चलते हम चीजों पर रुचि लेने लगते हैं और जब उससे हमें अच्छा महसूस होता है तो बार बार उस चीज पर रुचि लेने लगते हैं। क्योंकि उसमें हमें एक अलग ही मजे का आभास होता है। 

ऐसा भी होता है कि शुरू शुरू में सब अजीब लगता है और इस बात का भी एहसास होता है कि ये गलत है मगर क्योंकि वो चीज हमारे लिए एकदम नई होती है और उससे हमें एक अलग ही मजे का एहसास हो रहा होता है इस लिए हम उस खयाल को दिमाग से झटक देते हैं जो हमें ये एहसास करवाता है कि ये गलत है।

ऐसा नहीं है कि जो चीज गलत होती है उसे किस्मत ही सही ठहराती है, बल्कि किस्मत या फिर ये कहें कि हमारा जमीर गलत चीज होने का आभास कराता है मगर क्योंकि हमें उस नई चीज में इतनी रुचि और इतना मजा आने लगता है कि हम उस गलत को पहले नजरअंदाज करते हैं और फिर हम खुद ही धीरे धीरे ये फैसला कर लेते हैं कि सब सही है।

खैर, मेरा ये मामला भी ऐसा ही था जिसे मैं गुजरते वक्त के साथ सही ठहराता चला गया था। कुछ तो भोलापन और नादानी के कारण और कुछ उस नई चीज से मिलने वाले एक अनोखे मजे के कारण। 

मैंने तसव्वुर भी नहीं किया था कि वो दिन मेरे जीवन का ऐसा दिन बनने वाला था जिससे मेरे सोचने समझने का तरीका ही बदल जाएगा। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक झटके में कायनात की हर शय अलग ही लगने लगेगी।

तो चलिए दोस्तो मैं आप सबको अपने उस अतीत की तरफ ले चलता हूं जहां से इस कहानी का आगाज हुआ था।

************

"अरे अब कहां जा रहा है तू?"

मैं खाना खा के जैसे ही चौके से बाहर जाने लगा तो मां ने झट पूछा।

"खेत जा रहा हूं मां।" मैंने बताया।

"सच में?" मां ने बेयकीनी से मेरी तरफ देखा।

"हां मां।" मैं थोड़ा हड़बड़ाया─"तुमने ही तो कहा था कि खा के सीधा खेत जाऊं और बापू को खाना खाने के लिए भेज दूं।"

"अरे वाह मेरा राज दुलारा तो बड़ा आज्ञाकारी है।" मां ने आँखें नचा कर कहा तो मैं मुस्कुरा उठा। उधर मां ने कहा─"ठीक है जा। जल्दी भेज देना बापू को। वैसे भी आज देर हो गई है।"

मैंने मुस्कुराते हुए दौड़ लगा दी खेतों की तरफ। खेत ज्यादा दूर नहीं थे बल्कि गांव के पीछे तरफ ही थे। घर से वहां तक पहुंचने में मुश्किल से दस मिनट लगता था और अगर मैं दौड़ते हुए जाऊं तो उससे भी कम समय लगता था। आम तौर पर मैं दौड़ते हुए ही जाता था क्योंकि अपने दोस्त बबलू के साथ मुझे खेलने भी जाना होता था।

उस दिन भी मैं खेतों की तरफ दौड़ते हुए ही जा रहा था। मन में बस यही था कि बापू को बोलूंगा कि मां ने खाना खाने के लिए बुलाया है। फिर झट वहीं से बबलू के घर की तरफ दौड़ लगा दूंगा।

हम गांव के साधारण लोग थे। ज्यादा धन संपत्ति नहीं थी। हमारा गुजारा खेतों में उपजे अन्न से ही होता था लेकिन इसके बावजूद हम अपने इस छोटे से संसार में खुश थे। 

हमारी बिरादरी के लोगों से हमारी स्थिति थोड़ा अच्छी थी क्योंकि जमीनें उनसे थोड़ा सा ज्यादा थी। यूं तो बापू और उनके दो भाइयों का कुछ समय पहले ही बंटवारा हो चुका था लेकिन खेती बाड़ी अभी भी एक में ही थी। यानि जमीनों का बंटवारा अभी तक नहीं हुआ था। 

तीनों भाइयों का प्रेम और तालमेल थोड़ा अच्छा था इस लिए बिना किसी लड़ाई झगड़े या मनमुटाव के सब अच्छा ही चलता आया था। अपने दोनों भाइयों में मेरे बापू सबसे बड़े थे इस लिए सभी फैसले वही करते थे लेकिन अंतिम फैसला वही होता था जिसमें बाकी दो भाइयों की भी सहमति हो।

जैसा कि मैंने बताया बंटवारा पहले ही हो चुका था यानि घर अलग अलग थे तीनों भाइयों के। पुराने घर के अलावा गांव के अंदर ही हमारी थोड़ी जमीन पड़ी हुई थी जिसे बापू ने अपने दोनों भाइयों को दे दी थी। दोनों काकाओं ने उस जमीन पर अपना अपना घर बनवा लिया था। इसके अलावा खेतों पर भी हमारा एक छोटा सा घर बना हुआ था। उसमें एक तरफ मवेशी रहते थे और एक तरफ भूसा रखा होता था। इसके साथ ही एक कमरा था जिसमें जरूरी सामान के साथ आराम करने के लिए एक खाट रखी होती थी। 

हमारे खेतों के पास से ही एक नदी गई हुई थी जो आगे गांव के सरपंच के खेतों से होते हुए दूसरे गांव तरफ निकल गई थी। मैं और बबलू इसी नदी में डुबकियां लगाते थे और गर्मियों में जी भर के नहाते थे। सरपंच के खेतों तरफ नदी के दोनों तरफ पक्का पाट बना हुआ था जिसमें गांव के ज्यादातर लोग नहाते थे।

उस दिन मां के कहने पर मैं दौड़ते हुए खेतों की तरफ जा रहा था। बचपन से ही दौड़ने में मेरी रफ्तार तेज थी इस लिए कुछ ही मिनटों में मैं खेतों पर पहुंच गया। गर्मी अब जोरों की होने लगी थी और मैं दौड़ते हुए ही आया था। इस लिए पसीने में तरबतर हो चुका था मगर मुझे परवाह नहीं थी। क्योंकि बबलू के साथ नदी में नहाना जो था मुझे।

खेतों पर पहुंच कर मैं हांफते हुए बापू को इधर उधर देखने लगा लेकिन वो मुझे कहीं न दिखे। गेहूं की पकी हुई फसल आधे से ज्यादा कट गई थी और बाकी काटने के लिए खड़ी थी। 

कुछ दूरी पर मझले काका एक खेत में गेहूं काटते दिखे। वो अकेले ही काट रहे थे। काकी शायद जा चुकी थीं क्योंकि दोपहर का खाना भी उन्हें बनाना होता था। छोटे काका भी नजर नहीं आए और न ही छोटी काकी।

किस्मत जब कोई नया खेल शुरू करती है तो सबसे पहले इसी तरह वक्त और हालात पैदा करती है जिसे देख कर इंसान उस वक्त थोड़ा मतिभ्रम का शिकार होता है जिसे बाद में हम बहाने के रूप में अलग अलग बातें जाहिर कर देते हैं।

उस वक्त मैं मझले काका को आवाज लगा कर उनसे बापू के बारे में पूछ सकता था लेकिन उस समय मेरे मन में ऐसा खयाल इस लिए भी नहीं आया था क्योंकि मुझे अपने दोस्त बबलू के घर जाने की जल्दी थी और दूसरे मुझे ये भी पता था कि बापू अगर खेतों पर नहीं हैं तो जरूर खेतों पर बने उस छोटे से घर में आराम कर रहे होंगे।

बेशक सब कुछ ऊपर वाले की मर्ज़ी से होता है लेकिन कभी कभी इंसान खुद भी नासमझी कर जाता है। मैंने उस वक्त बापू के बारे में मझले काका से नहीं पूछा। अगर पूछने के लिए आवाज लगाया होता तो शायद ये कहानी ऐसी बन ही नहीं सकती थी। मेरी किस्मत तो एक दिन जरूर बदलती पर उसकी इबारत ऐसी न लिखी जाती।

मैं जब समझ गया कि बापू कमरे में खाट पर आराम कर रहे होंगे तो झट उस तरफ तेजी से चल पड़ा। यहां भी ऐसा हो सकता था कि मैं घर के अंदर घुसने से पहले बापू को आवाज लगा देता मगर उस वक्त मैंने ये भी नहीं किया था। 

अक्सर मैं आवाजें लगा देता था, इस लिए नहीं कि मुझे उनसे या किसी से भी किसी गलत स्थिति की उम्मीद होती थी या ऐसी जानकारी होती थी बल्कि ऐसा इस लिए कि मैं भोला और नादान होता था। दूसरे सबका लाडला था तो बेझिझक कहीं भी कुछ भी बोल पड़ता था मगर उस दिन क्योंकि सब बदल जाना था इस लिए नियति ने जैसे मुझे खामोश कर दिया था।

मेरे मन में बस यही था कि जल्द से जल्द मैं बापू को खाना खाने जाने के लिए बोल दूं और फिर दौड़ते हुए बबलू के घर पहुंच जाऊं मगर क्या पता था कि अगले कुछ ही पलों में कुछ ऐसा हो जाएगा जिसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था।

जल्दबाजी के चक्कर में मैं जल्दी ही घर के अंदर दाखिल हुआ। अन्दर बाएं तरफ वाले हिस्से में भूसा रखा था और दाएं तरफ एक छोटा सा कमरा था।

उस वक्त कमरे का दरवाजा आपस में भिड़ा हुआ था। मैं उसी जल्दबाजी में आगे बढ़ा और दरवाजे को एक झटके में अंदर की तरफ ढकेल दिया। अगले ही पल आंखों के सामने खाट पर जो नजारा दिखा उससे मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं।

######

खाट के पास जमीन पर बापू खड़े थे। नीचे से वो पूरा नंगे थे। उनकी लुंगी जमीन पर ही एक तरफ पड़ी थी। उनके आगे मझली काकी थी और वो अपने सामने खाट पर झुकी हुई थी। उनकी पूरी धोती कमर के पास इकट्ठा थी जिसे अपने दोनों हाथों से उनकी ही कमर में दबाए मेरे बापू जोर जोर से अपनी कमर को आगे पीछे कर रहे थे। मझली काकी की नंगी टांगें और जांघें थोड़ी थोड़ी दिख रहीं थी।

अब इतना भी भोला और नादान नहीं था मैं कि उन दोनों को इस हालत में देख कर कुछ समझता ही नहीं। जवानी की दहलीज पर पहुंच चुका था मैं इस लिए मर्द और औरत के बीच होने वाले ऐसे संबंधों और ऐसे क्रिया कलापों से परिचित हो चुका था मैं। ये अलग बात है कि खुद कभी ऐसा करने का मन में खयाल नहीं आता था। 

बापू और मझली काकी को ऐसी हालत में देख मैं आँखें फाड़े भौचक्का सा देखता रह गया था उन्हें। जबकि उधर जैसे ही भड़ाक से दरवाजा खुला था तो वो दोनों बुरी तरह उछल पड़े थे। डर और घबराहट के मारे एक ही पल में दोनों का बुरा हाल हो गया था।

बापू ने जल्दी ही खुद को सम्हाला था और झट जमीन पर पड़ी अपनी लुंगी को उठा कर लपेट लिया था। उधर काकी का भय से कहीं ज्यादा शर्म से बुरा हाल हुआ जा रहा था। बापू को पीछे धकेल कर उन्होंने बिजली की सी तेजी से अपनी धोती और साए को नीचे गिरा कर ठीक कर लिया था। फिर भी जब ऐसे हाल में खड़े रहना उनके लिए मुश्किल हो गया तो बड़ी तेजी से मेरी तरफ आईं और एक नजर मुझे देखने के बाद उसी तेजी से बाहर निकल गईं।

"र..राजू तू...तू यहां कैसे?" 

काकी के जाते ही बापू ने हकलाते हुए मुझसे पूछा। वो बड़ी मुश्किल से मुझसे नजरें मिला पा रहे थे।

इधर बापू की आवाज सुनते ही जैसे मैं अजनबी दुनिया से वापस लौटा। मैंने हड़बड़ाहट में ये सोच कर जल्दी जल्दी इधर उधर देखा कि अभी जो कुछ मैंने देखा क्या वो सच था या मेरी आंखों का धोखा?

"वो...वो बापू।" बापू के पूछने पर मैंने किसी तरह खुद को संभालते हुए जवाब दिया─"मां ने तुम्हें खाना खाने के लिए बुलाया है।"

"अच्छा हां हां।" बापू अपनी बौखलाहट पर काबू पाने की कोशिश करते बोले─"ठीक है तू जा। मैं आता हूं थोड़ी देर में।"

कोई और वक्त होता तो बापू के इतना कहते ही मैं खुशी खुशी वहां से दौड़ते हुए निकल जाता मगर जो कुछ अभी मैंने देखा था उसकी वजह से मैं अंदर ही अंदर बहुत अजीब सा महसूस करने लगा था। मैं अब भूल चुका था कि मुझे अपने दोस्त बबलू के पास जाना है।

"अ अच्छा सुन।" मैं अभी वहां से जाने ही लगा था कि तभी पीछे से बापू ने मुझे आवाज दी─"उ..उसके बारे में किसी को कुछ मत बताना, समझ गया न?"

"क..किस बारे में बापू?" मैं उलझ सा गया मगर जल्दी ही मुझे समझ आ गया कि बापू किस बारे में बोल रहे हैं।

"अ..अभी जो तूने यहां देखा है।" बापू अपनी शर्म और झिझक को किसी तरह दबा कर खुद को मेरे सामने थोड़ा सख्त जाहिर करते हुए बोले─"उस बारे ने किसी से भूल कर भी कुछ मत कहना।"

मेरी अजीब सी हालत थी। मैं अपने बापू को ऐसे देखने लगा था जैसे अचानक ही मेरा बापू मुझे कोई अंजान आदमी लगने लगा हो जिसे मैं पहचानने की कोशिश कर रहा हूं।

"अरे चुप क्यों है बोल न।" मुझे अजीब तरह से अपनी तरफ देखते देख बापू शायद अंदर ही अंदर घबरा गए─"तूने ठीक से सुना न मैने क्या कहा है?"

"ह..हां क्या...ब बापू???" मैं एकदम चौंक सा पड़ा।

बापू की हालत एकाएक खराब होती नजर आई। शायद उन्हें ये एहसास होने लगा था कि कहीं मैं ये बात किसी से बता न दूं। इतना तो वो भी जानते थे कि मैं भोला और नादान हूं। सबसे ज्यादा मैं अपनी मां को ही मानता हूं और उनसे करीब करीब सारी बातें बता दिया करता हूं। 

मेरी इस आदत का एहसास होते ही बापू की हालत खराब होने लगी थी। ऐसा नहीं था कि वो मां से डरते थे लेकिन ये बात ही ऐसी थी कि इसके चलते कोई कितना ही बड़ा सूरमा क्यों न हो वो भी भीगी बिल्ली बन जाएगा। कोई नहीं चाहेगा कि इस तरह की बात किसी को भी पता चले। घर में मां को या काका को पता चला तो परिवार ने बहुत बड़ा क्लेश हो जाएगा। इस क्लेश की वजह से बात घर परिवार से बाहर निकल जाएगी और अगर गांव वालों को पता चल गया तो बहुत बड़ी बदनामी वाली बात हो जाएगी। बिरादरी के लोग ही क्या बल्कि पूरा का पूरा गांव ही जीना हराम कर देगा।

बापू लपक कर मेरे पास आए और मेरे दोनों कंधे पकड़ कर मुझे समझाने लगे। समझाने के साथ साथ मुझे कई ऐसी चीजों का प्रलोभन भी देने लगे जो पास के गांव में लगने वाले मेले में मैं अक्सर उनसे लेने की बात किया करता था और वो मुझे डांट दिया करते थे।

कहने का मतलब ये कि बापू ने मुझे हर तरह से समझाया और हर तरह का लालच दिया। मैं भोला और नादान जरूर था लेकिन मूर्ख नहीं था बल्कि थोड़ा समझदार भी था। इस लिए उनके समझाने पर मैं समझ गया। मगर शायद उन्हें इतने पर भी संतुष्टि नहीं मिली थी तभी तो आखिर में उन्होंने मुझे मां की कसम खिला दी। मैं भौचक्का और अवाक सा देखता रह गया था उन्हें।


जारी है.......
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RE: आप-बीती ~ Truth is Dark - by Rajan Raghuwanshi - 31-12-2025, 07:09 AM



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