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Adultery एक पत्नी का सफर
#67
पूजा अब रोज़ अवस्थी सर के घर आने लगी थी।
पहले तो सिर्फ़ पढ़ाई के बहाने।
फिर धीरे-धीरे…
उसकी देखभाल के बहाने।

वो सर की बीवी के बारे में पूछती।
“सर… शालिनी मैम कैसी थीं?”

अवस्थी सर आँखें नम करके बताते।
“बहुत अच्छी थी बेटा…
मुझे अपने हाथ से खाना खिलाती थी…
उसके जाने के बाद…
अच्छा खाना तक नहीं मिला…
बस होटल का… या बाहर का…”

पूजा का दिल पिघल जाता।
उसका अपराधबोध और बढ़ जाता।
“मैंने सर पर शक किया…
और सर इतने अकेले हैं…”

एक दिन।
पूजा ने कहा,
“सर… आज मैं आपके लिए खाना बनाती हूँ…”

अवस्थी सर ने मुस्कुराकर मना किया।
“अरे नहीं बेटा… तुम्हारी तकलीफ़…”

पर पूजा ज़िद करने लगी।
“नहीं सर… आपने मेरी इतनी मदद की…
मैं आपके लिए इतना तो कर ही सकती हूँ…”

किचन में – 6:30 बजे
पूजा किचन में गई।
अवस्थी सर बाहर बैठे देख रहे थे।
पूजा ने रोटी बनाई।
दाल।
सब्ज़ी।
चावल।
उसके हाथ तेज़ चल रहे थे।
पर मन में उधेड़बुन।

**पूजा का मन**
“ये ठीक है ना…?
सर अकेले हैं…
मैं बस मदद कर रही हूँ…
संजय को पता चलेगा तो बुरा नहीं मानेगा…
ये तो बस एक बूढ़े की देखभाल है…”

पर कुर्ता पसीने से चिपक गया था।
बूब्स का शेप साफ़।
निप्पल्स हल्के उभरे हुए।
गर्मी में पसीने की बूँदें गर्दन से होती हुईं क्लीवेज में लटक रही थीं।
मंगलसूत्र उस घाटी में लटका हुआ – हर साँस में हिल रहा था।

पूजा ने प्लेट सजाई।
रोटी, दाल, सब्ज़ी।
अवस्थी सर के सामने रखी।

अवस्थी सर ने प्लेट देखी।
उनकी आँखें भर आईं।
फिर वो रोने लगे।
ज़ोर-ज़ोर से।
“ये… ये खाना…
शालिनी के हाथ का खाना…
20 साल बाद…
कोई मेरे लिए…
अपने हाथ से…”

पूजा घबरा गई।
“सर… क्या हुआ…?
रोइए मत…”

अवस्थी सर ने आँसू पोंछे।
“बेटा… शालिनी मुझे अपने हाथ से खिलाती थी…
मुँह के आगे रोटी रखती…
और मैं खाता…
उसके बाद…
किसी ने नहीं खिलाया…”

पूजा का दिल फट गया।
उसकी आँखें भी नम।
वो बोली,
“सर… मैं आपके लिए इतना तो कर ही सकती हूँ…”

वो प्लेट उठाई।
रोटी का टुकड़ा तोड़ा।
दाल-सब्ज़ी लगाकर।
अवस्थी सर के मुँह के आगे किया।

अवस्थी सर ने मुँह खोला।
पूजा ने रोटी उनके मुँह में डाली।
अवस्थी सर ने चबाया।
उनकी आँखें बंद।
आँसू बह रहे थे।

**अवस्थी का मन**
“साली… आज मेरे मुँह में खाना डाल रही है…
कल मेरे मुँह में अपना निप्पल डालेगी…
ये क्लीवेज…
पसीने की बूँदें…
मंगलसूत्र लटक रहा है…
मैं तो इसे यहीं झुका दूँ…
इसके बूब्स मुँह में ले लूँ…
पर रुक…
इसे और पिघलने दे…
ये खुद ही मेरे पास आएगी…”

पूजा एक-एक निवाला खिलाती गई।
अवस्थी सर की नज़रें उसके क्लीवेज पर।
पसीने की बूँदें मंगलसूत्र पर लटक रही थीं।
हर बार जब पूजा झुकती, क्लीवेज और गहरा हो जाता।
अवस्थी सर का लंड पैंट में तन गया।
पर वो रोने का नाटक करते रहे।

पूजा का मन उधेड़बुन में।
“ये ठीक है ना…?
सर रो रहे हैं…
मैं बस उन्हें खिला रही हूँ…
जैसे बेटी अपने पिता को…
पर क्यों मेरी चूत में सिहरन हो रही है…?
क्यों मेरे निप्पल्स सख्त हो रहे हैं…?
नहीं पूजा… ये गलत नहीं है…
तू बस मदद कर रही है…”

खाना खत्म हुआ।
अवस्थी सर ने पूजा का हाथ चूमा।
“बेटा… तुमने मुझे आज 20 साल बाद घर का एहसास कराया…”

पूजा की आँखें नम।
“सर… मैं कल फिर आऊँगी…
आपके लिए खाना बनाकर…”

अवस्थी सर ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।
पर उनकी आँखों में भूख थी।
और पूजा…
पूजा घर लौटी तो उसका अपराधबोध और बढ़ गया था।
“मैंने सर को खुशी दी…
पर क्यों मुझे अजीब लग रहा है…?
क्यों मेरी चूत अभी भी गीली है…?”

और अवस्थी सर अकेले हँस रहे थे।
“साली खुद मेरे जाल में आ रही है…
कल इसे और करीब बुलाऊँगा…
फिर देखता हूँ कितने दिन टिकती है…”
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RE: एक पत्नी का सफर - by Tiska jay - 21-12-2025, 11:35 PM



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