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Adultery गुलमोहर... एक अल्हड़ सी लड़की
#12
Episode 8.... ये शाम मस्तानी 

सुबह दस बज चुके थे, फिर भी सूरज विला के ग्लास वॉल पर धीरे-धीरे ही चढ़ पाया था। कमरे में अब भी फायरप्लेस की राख ठंडी हो रही थी, हवा में लकड़ी की हल्की-सी जलने की खुशबू और उनके जिस्मों की गंध मिली हुई थी।
गुलमोहर सबसे पहले हिली। उसकी आँखें खुलीं तो सबसे पहले मंगलसूत्र उसकी छाती पर चिपका हुआ दिखा। फिर आर्यन का हाथ उसकी कमर पर, उँगलियाँ अभी भी हल्के से दबाए हुए। वो शरमाई, मुस्कुराई, फिर धीरे से उठने की कोशिश की। कमर में हल्की-सी खिंचाव थी, जाँघों में मीठा-सा दर्द। चूड़ियाँ खनकीं, आवाज़ से आर्यन की नींद टूटी।
"उठ गई मेरी बीवी?" उसने आलस भरी आवाज़ में कहा, आँखें अभी भी बंद थीं। 
"हाँ… तुम्हारी बीवी को बहुत भूख लगी है," गुलमोहर ने हँसते हुए कहा, फिर शरमाकर सिर झुका लिया।
आर्यन ने आँखें खोलीं। गुलमोहर को देखते ही उसका चेहरा चमक उठा। वो बिल्कुल नंगी थी, सिर्फ मंगलसूत्र और चूड़ियाँ। बाल बिखरे हुए, होंठ अभी भी सूजे हुए, गले और छाती पर हल्के-हल्के निशान। 
"भूख? पहले मैं खा लूँ," कहते हुए उसने झटके से उसे फिर अपनी ओर खींच लिया।
गुलमोहर चीखी, हँसी, "अरे… नहाए बिना? गंदे हो दोनों!" 
"तेरे साथ गंदे रहना भी अच्छा लग रहा है।" 
फिर भी उसने छोड़ दिया। दोनों हँसते हुए बेड से उतरे।
बाथरूम बड़ा था, बाहर की ओर खुला ग्लास वॉल, जहाँ से ब्यास नदी सीधी दिखती थी। आर्यन ने शावर चालू किया—गर्म पानी की भाप कमरे में भर गई। गुलमोहर शरमाते हुए अंदर आई। आर्यन ने उसका हाथ पकड़कर खींच लिया। दोनों एक-दूसरे पर पानी डालने लगे। साबुन का झाग, चूड़ियों की खनक, हँसी-मजाक। आर्यन ने उसके बालों में शैम्पू लगाया, फिर पीठ पर हाथ फेरते हुए नीचे आया। गुलमोहर ने उसकी छाती पर झाग लगाया, फिर शरमाकर उससे लिपट गई।
पानी के नीचे ही एक और किस शुरू हो गया—इस बार धीमा, प्यार भरा। आर्यन ने उसे दीवार से सटाया, गुलमोहर की एक टाँग उठाई, और फिर… पानी की बौछारों के बीच, नदी की आवाज़ के साथ, एक और बार वो एक हो गए। इस बार कोई जल्दी नहीं थी। बहुत देर तक, जैसे समय रुक गया हो।
नहाकर बाहर आए तो दोनों ने वही सफेद बाथरोब पहने थे जो विला में रखे थे।
आर्यन ने कॉफी,ब्रेड टोस्ट ऑमलेट ऑर्डर किया। दोनों बालकनी में बैठे। सामने बर्फीली चोटियाँ, नीचे नदी का शोर, और ठंडी हवा।
गुलमोहर ने कॉफी का मग हाथ में लिया, आर्यन के कंधे पर सिर रखा। 
"कल रात… सच था न? मैं सच में आपकी बीवी हूँ?" 
आर्यन ने उसका हाथ चूमा। "सच से भी ज्यादा सच। देख…" उसने अपना फोन निकाला, सेल्फी मोड में कैमरा ऑन किया।
स्क्रीन पर दोनों दिख रहे थे—गुलमोहर की माँग में सिंदूर, मंगलसूत्र, चूड़ियाँ। उसने फोटो ली। 
"ये हमारी शादी की पहली तस्वीर है।"
गुलमोहर की आँखें भर आईं। उसने फोन छीना और उसे किस कर लिया।
खाना खाने के बाद दोनों सोफे पर लेट गए। बाहर हल्की-हल्की बर्फबारी शुरू हो गई थी। आर्यन ने टीवी ऑन किया, लेकिन देखा कुछ नहीं। बस एक-दूसरे को देखते रहे। 
फिर आर्यन ने धीरे से बाथरोब का नाड़ा खींचा। गुलमोहर ने टोका नहीं। बस शरमाकर आँखें बंद कर लीं।
इस बार सोफे पर, फिर फर्श पर गलीचे पर, फिर ग्लास वॉल से सटाकर—जहाँ बाहर बर्फ गिर रही थी और अंदर दो जिस्म पिघल रहे थे। गुलमोहर अब शरमाती कम थी, बोलती ज्यादा थी। 
"यहाँ… कोई देख लेगा…" 
"कोई नहीं देख सकता। सिर्फ पहाड़ और नदी गवाह हैं।"
शाम पाँच बजे तक दोनों थककर चूर थे। बाहर अँधेरा हो चला था। आर्यन ने फायरप्लेस फिर जलाई। गुलमोहर ने लाल रेशमी नाइट गाउन पहना था जो विला में रखा था—पतला, पारदर्शी। उसमें से मंगलसूत्र और चूड़ियाँ साफ दिख रही थीं।
आर्यन ने वाइन की बोतल खोली, दो गिलास भरे। दोनों फायरप्लेस के सामने गलीचे पर बैठ गए। 
"पहला दिन बीता… नौ दिन और हैं," आर्यन ने कहा। 
गुलमोहर ने गिलास उसके गिलास से टकराया। "और नौ रातें…" 
फिर हँसी, फिर लिपट गए।
रात का खाना —साधारण मगर साथ में। म्यूज़िक चल रहा था—पुराने हिंदी गाने। गुलमोहर ने आर्यन की गोद में सिर रखकर लेट गई। 
"आर्यन… मुझे डर लग रहा है।" 
"किस बात का?" 
"कि ये सपना न टूट जाए। दस दिन बाद दुनिया फिर शुरू हो जाएगी।" 
आर्यन ने उसके बालों में उँगलियाँ फिराईं। 
"दुनिया चाहे जो कर ले। तू मेरी बीवी है। ये मंगलसूत्र, ये सिंदूर, ये चूड़ियाँ—कोई नहीं उतार सकता। न दुनिया, न वक्त।"
गुलमोहर ने उसकी छाती पर सिर रख दिया। बाहर बर्फ गिर रही थी, अंदर आग जल रही थी। 
पहला पूरा दिन ऐसे ही बीता—प्यार में डूबा हुआ, बिना किसी जल्दी के, बिना किसी डर के।
रात फिर गहराई। 

तीसरा दिन — बर्फ, नदी और सिर्फ़ हम
सुबह सात बजे, पहाड़ों पर अभी धूप नहीं पहुँची थी। रात भर हल्की बर्फ़बारी होती रही थी। विला के बाहर सब कुछ सफ़ेद हो चुका था। देवदार की पत्तियों पर बर्फ़ जमी थी, ब्यास नदी का शोर अब भी ज़ोर था, पर उसकी सतह पर बर्फ़ की पतली चादर तैर रही थी।
गुलमोहर सबसे पहले जागी। उसने खिड़की खोली तो ठंडी हवा का एक झोंका अंदर आया। वो काँप गई, फिर मुस्कुराई। उसने आर्यन को हल्के से हिलाया। 
"उठो ना… बाहर बर्फ़ गिरी है। पहली बार देख रही हूँ इतनी!"
आर्यन ने आँखें मलीं, फिर उसे अपनी ओर खींच लिया। 
"बर्फ़ बाद में देखेंगे। पहले तुझे गर्म करना है।" 
गुलमोहर हँस पड़ी, "हर सुबह यही बहाना?"
फिर भी वो उठे। दोनों ने मोटे वूलन स्वेटर पहने, गुलमोहर ने लाल ऊनी शॉल ओढ़ी, मंगलसूत्र ऊपर से झलक रहा था। आर्यन ने उसका हाथ थामा और बाहर ले गया।
#### सुबह की बर्फ़ में खेल
विला के लॉन में क़रीब चार इंच बर्फ़ जमी थी। गुलमोहर ने पहली बार बर्फ़ को हाथ लगाया, चीखी, "बहुत ठंडी!" 
आर्यन ने पीछे से उसकी कमर पकड़ी और बर्फ़ में धकेल दिया। गुलमोहर गिर पड़ी, हँसते-हँसते लोट-पोट। फिर उसने बर्फ़ का गोला बनाया और आर्यन पर फेंका। 
पाँच मिनट में दोनों बच्चे बन चुके थे। बर्फ़ के गोले उड़ रहे थे, गुलमोहर की चूड़ियाँ बर्फ़ से टकरा कर अलग आवाज़ कर रही थीं। आख़िर में आर्यन ने उसे गोद में उठा लिया और बर्फ़ में लिटा दिया। 
"अब हार मानो, बीवी।" 
गुलमोहर ने उसका गला पकड़ा और होंठों पर किस कर लिया। 
"हार गई… ले जाओ मुझे अंदर।"
#### गर्म चाय और गर्म किस
अंदर आकर फायरप्लेस जलाया। गुलमोहर ने अदरक वाली चाय बनाई। दोनों कंबल ओढ़कर सोफ़े पर बैठे। गुलमोहर ने आर्यन की गोद में सिर रखा। 
"तीसरा दिन है… लगता है सालों से तेरे साथ हूँ।" 
आर्यन ने उसके बालों में उँगलियाँ फेरते हुए कहा, "तेरी माँग में मेरा सिंदूर है, तेरे गले में मेरा नाम… सालों नहीं, जन्मों से मेरा है तू।"
चाय पीते-पीते किस शुरू हो गया। कंबल के अंदर हाथ चलने लगे। गुलमोहर ने शॉल उतारी, स्वेटर ऊपर किया। दस मिनट बाद दोनों फिर नंगे थे, कंबल के अंदर लिपटे हुए। इस बार बहुत धीरे, बहुत प्यार से। जैसे कोई जल्दी ही न हो।
#### दोपहर — नदी किनारे
दोपहर में धूप निकली। बर्फ़ पिघलने लगी थी। आर्यन ने कहा, "चल, नदी तक चलते हैं।" 
विला से नीचे एक गुप्त रास्ता था, सीधे ब्यास के किनारे। वहाँ कोई नहीं आता था।
दोनों हाथ में हाथ डाले उतरे। नदी का पानी बिल्कुल पारदर्शी, नीचे गोल पत्थर चमक रहे थे। किनारे पर एक बड़ा-सा चिकना पत्थर था। आर्यन ने गुलमोहर को वहाँ बिठाया। 
"याद है, तूने कहा था कि पहाड़, नदी, बस हम दोनों?" 
गुलमोहर ने मुस्कुरा कर सिर हिलाया।
आर्यन ने उसकी शॉल उतारी, फिर स्वेटर। गुलमोहर ने कुछ नहीं कहा। ठंड थी, पर उसकी आँखों में कुछ और था। 
"यहाँ… कोई देख लेगा…" 
"देख ले। आज मैं अपनी बीवी को नदी के सामने प्यार करना चाहता हूँ।"
फिर वही हुआ। नदी की कल-कल के बीच, ठंडी हवा में, गुलमोहर की चूड़ियाँ पानी की आवाज़ में घुल गईं। आर्यन ने उसे पत्थर पर लिटाया, उसकी कमर के नीचे अपना स्वेटर रख दिया। इस बार बहुत देर तक। जब दोनों चरम पर पहुँचे, गुलमोहर की चीख नदी में गूँज गई, जैसे कोई पक्षी उड़ गया हो।
#### शाम — सिर्फ़ खामोशी और आग
शाम को वापस विला। दोनों थके हुए थे। गुलमोहर ने सिर्फ़ आर्यन की शर्ट पहनी थी, नीचे कुछ नहीं। आर्यन ने शॉर्ट्स। फायरप्लेस के सामने बैठे, वाइन पी, कुछ नहीं बोले। बस एक-दूसरे को देखते रहे।
रात के आठ बजे गुलमोहर ने कहा, 
"आज कुछ नहीं बनाना। बस तुझे खाना है।" 
आर्यन हँसा, "मैं भी यही सोच रहा था।"
फिर बेड पर नहीं गए। फायरप्लेस के सामने गलीचे पर ही। इस बार कोई जल्दी नहीं, कोई शब्द नहीं। सिर्फ़ आँखें, साँसें और दो जिस्म। गुलमोहर ने ऊपर रहने को कहा। आर्यन ने हँस कर हाँ कर दी। वो खुद बैठ गई उस पर, धीरे-धीरे हिलने लगी। उसके बाल आग की लपटों में लाल हो रहे थे। मंगलसूत्र उसकी छाती पर झूल रहा था। चूड़ियाँ हर हरकत में खनक रही थीं।
जब दोनों थक कर गिर पड़े, गुलमोहर ने आर्यन की छाती पर सिर रखा। 
"तीसरा दिन… और अभी भी लगता है पहला दिन है।" 
आर्यन ने उसके माथे पर किस किया। 
"हर दिन पहला दिन रहेगा। मैं वादा करता हूँ।"
बाहर बर्फ़ फिर गिरने लगी थी। 
अंदर सिर्फ़ दो दिलों की एक धड़कन थी।
तीसरा दिन ख़त्म हुआ। 
सात दिन अभी बाकी थे। 
और हर दिन पहले से ज़्यादा गहरा, ज़्यादा अपना होता जा रहा था।


### चौथा दिन — बारिश, गरम तेल और एक दूसरे का नाम
सुबह पाँच बजे तेज़ आवाज़ से दोनों की नींद खुली। 
बाहर बादल फट रहे थे। मनाली में अचानक मौसम पलटा था। रात भर हल्की बर्फ थी, अब मूसलाधार बारिश। ब्यास नदी का शोर दोगुना हो गया था, जैसे कोई जंगली जानवर गरज रहा हो। बिजली कड़की, कमरे में एक पल के लिए सब सफ़ेद हो गया।
गुलमोहर डर कर आर्यन से लिपट गई। 
"बहुत तेज़ बारिश है…" 
आर्यन ने उसे और कस कर पकड़ा, "अच्छा है। आज बाहर कहीं नहीं जाना। आज पूरा दिन बस बेड और हम।"
बारिश की लय शुरू हो गई थी। टप-टप-टप… छत पर, पेड़ों पर, ग्लास वॉल पर।
#### सुबह — गरम तेल और धीमी मालिश
आर्यन उठा, किचन से बादाम का तेल गर्म करके लाया। फायरप्लेस जला दी। 
"लेट जा, बीवी। आज मैं तेरी हर मांसपेशी को ढीला कर दूँगा।"
गुलमोहर ने सिर्फ़ एक पतला सा सफ़ेद साटन का गाउन पहना था। आर्यन ने उसे उल्टा लिटाया। गाउन ऊपर सरका दिया। उसकी पीठ, कमर, जाँघें… सब नंगे। उसने गर्म तेल हाथ में लिया और धीरे-धीरे मालिश शुरू की।
गर्दन से शुरू करके कंधे, फिर रीढ़ की हड्डी के साथ-साथ नीचे। जब उँगलियाँ उसकी कमर की गड्ढी पर पहुँचीं, गुलमोहर ने सिसकारी ली। 
"आर्यन… ये मालिश है या…?" 
"दोनों।"
फिर जाँघों की भीतरी तरफ़ तेल लगाया। गुलमोहर की साँसें तेज़ हो गईं। उसने तकिया मुँह में दबा लिया। आर्यन ने हँस कर उसे पलट दिया। अब सामने थी। गाउन पूरी तरह खुला हुआ। उसने तेल छाती पर डाला, फिर धीरे-धीरे गोल-गोल घुमाया। गुलमोहर की आँखें बंद थीं, होंठ काँप रहे थे।
मालिश कब खत्म हुई और कब प्यार शुरू हुआ, पता ही नहीं चला। 
बारिश की लय के साथ उनका रिदम मिल गया। बहुत धीरे, बहुत गहराई तक। गुलमोहर ने आर्यन का नाम बार-बार लिया, कभी फुसफुसा कर, कभी चीख कर। जब दोनों चोटी पर पहुँचे, बाहर बिजली कड़की और गुलमोहर की चीख उसमें घुल गई।
#### दोपहर — बारिश में भीगना
बारिश थमी नहीं थी। दोपहर ढाई बजे आर्यन ने कहा, "चल, भीगते हैं।" 
गुलमोहर हिचकिचाई, "पागल हो गए हो?" 
"तेरी साड़ी भीग जाएगी तो और सेक्सी लगेगी।"
उसने वही लाल साड़ी पहना दी जो शादी के दिन की थी। कुछ नहीं पहना अंदर। दोनों विला के बाहर निकले। बारिश इतनी तेज़ थी कि दो कदम में ही दोनों तरबतर। लाल साड़ी गुलमोहर के जिस्म से चिपक गई, हर उभार साफ़ दिख रहा था। मंगलसूत्र पानी से चमक रहा था।
आर्यन ने उसे दीवार से सटाया। बारिश की बूँदें उनके चेहरे पर, होंठों पर। किस शुरू हुआ। साड़ी का पल्लू नीचे गिर गया। आर्यन ने उसे गोद में उठा लिया, दीवार से टिकाया और वहीं… बारिश में, ठंडे पानी के नीचे, गर्म जिस्मों ने एक-दूसरे को जला दिया। 
गुलमोहर की चूड़ियाँ बारिश में अलग ध्वनि कर रही थीं। उसकी चीख बादलों में खो गई।
#### शाम — लकड़ियों की आग और पुराना रेडियो
शाम पाँच बजे तक बारिश हल्की हो गई। दोनों भीगते हुए अंदर आए। कपड़े छोड़ दिए, सिर्फ़ एक मोटा कंबल ओढ़ लिया। फायरप्लेस के सामने लेट गए। आर्यन ने पुराना रेडियो ऑन किया जो विला में रखा था। 70 के दशक के गाने बजने लगे।
किशोर कुमार की आवाज़… “ये शाम मस्तानी…”
गुलमोहर ने आर्यन की छाती पर सिर रखा। 
"ये गाना… मेरे लिए बज रहा है।" 
आर्यन ने उसका हाथ चूमा। "हर गाना अब तेरे लिए है।"
फिर धीरे-धीरे कंबल के अंदर हाथ चलने लगे। इस बार कोई जल्दी नहीं थी। बहुत देर तक सिर्फ़ छूना, चूमना, सहलाना। गुलमोहर ने खुद आर्यन को ऊपर खींचा। बारिश फिर तेज़ हो गई थी। उनकी साँसें और बादलों की गड़गड़ाहट एक हो गईं।
#### रात — सिर्फ़ एक नाम
रात के दस बज चुके थे। बाहर तूफ़ान आया हुआ था। बिजली बार-बार जा रही थी। एक बार अचानक सब अंधेरा हो गया। सिर्फ़ फायरप्लेस की लपटें बाकी थीं।
गुलमोहर डर कर आर्यन से और लिपट गई। 
आर्यन ने उसे बाहों में उठाया और बेड पर ले गया। 
"डर मत। मैं हूँ ना।"
उस रात बिजली नहीं आई। सिर्फ़ आग की लपटें और दो जिस्म। 
गुलमोहर ने आर्यन के कान में फुसफुसाया, 
"मुझे सिर्फ़ तेरा नाम लेना है… बार-बार… आज रात भर।"
और उसने लिया। 
हर बार चोटी पर पहुँचते ही वो चीखती, "आर्यन…!" 
और आर्यन जवाब देता, "गुल… मेरी गुल…"
रात भर बारिश नहीं थमी। 
रात भर उनका नाम भी नहीं थमा।
चौथा दिन खत्म हुआ। 
बाहर तूफ़ान था। 
अंदर सिर्फ़ सुकून और एक-दूसरे का नाम।
छह दिन अभी बाकी थे। 
और हर दिन पहले से ज़्यादा तीव्र, ज़्यादा गहरा, ज़्यादा अपना होता जा रहा था।
✍️निहाल सिंह 
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Episode 8... ये शाम मस्तानी - by Nihal1504 - 05-12-2025, 12:32 PM



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