04-12-2025, 11:50 PM
अब पूजा अवस्थी सर से काफी बात करती थी। अवस्थी पूजा का जिस्म देख पागल हो जाता था।
एक दिन पूजा का दरवाज़े पर आई extra class केलिए
हवा में गर्मी थी।
जून की उस शाम में भी उष्णता थी।
पूजा ने बस स्टॉप से पैदल चलकर अवस्थी सर के क्वार्टर तक का रास्ता तय किया था।
उसके पैरों में हल्की-हल्की थकान थी, पर मन में एक अजीब सा डर भी।
पिछले कुछ दिनों से अवस्थी सर का व्यवहार बदल रहा था।
पर पूजा ने खुद को समझाया था –
“सर तो बेचारे हैं… अकेले हैं… शायद अनजाने में…”
वो दरवाज़े पर खड़ी हुई।
उसने नीले रंग का कुर्ता पहना था – थोड़ा टाइट।
उसके भरे हुए बूब्स कुर्ते में साफ़ उभरे हुए थे।
सफेद सलवार पतली कॉटन की – गांड का हर कर्व दिख रहा था।
पैंटी की लाइन भी।
दुपट्टा गले में तीन बार लपेटा हुआ था।
पसीने की वजह से कुर्ता पीठ से चिपक गया था।
ब्रा की स्ट्रिप्स साफ़ दिख रही थीं।
गर्दन पर पसीने की बूँदें।
होंठ सूखे हुए।
उसने दरवाज़ा खटखटाया।
एक बार।
दो बार।
तीसरी बार।
अंदर से आवाज़ आई –
“आओ बेटा… दरवाज़ा खुला है।” दरवाज़ा खुला।
अवस्थी सर ने खुद नहीं खोला।
वो अंदर थे। कुर्सी पर। सफेद कुर्ता-पायजामा। चश्मा।
बाल सफेद। पर आँखें – लाल। भूखी।
पूजा ने जूते उतारे। अंदर कदम रखा।
घर में हल्की-हल्की अगरबत्ती की खुशबू थी।
पर उस खुशबू में कुछ और भी था –
अकेलेपन की बू।
और कुछ गंदा।
“आओ बेटा… बैठो।”
अवस्थी सर ने मुस्कुराते हुए कहा।
उनकी नज़रें पूजा के बूब्स पर एक सेकंड रुकीं।
फिर आँखें मिलाईं।
पूजा सिर झुकाकर “नमस्ते सर…”
अवस्थी की आँखे पूजा के cleavge मे घुस गयी
टेबल पर किताबें बिखरी हुई थीं।
अवस्थी सर ने पूजा को अपने बगल में बिठाया।
उनकी जाँघ पूजा की जाँघ से सटी हुई।
पूजा ने दुपट्टा और कस लिया।
पर अवस्थी सर का हाथ “पेन लेने” के बहाने पूजा की जाँघ पर।
धीरे से ऊपर सरकता हुआ।
पूजा सिहर गई।
उसकी साँसें तेज़ हो गईं।
पर वो कुछ नहीं बोली।
वो खुद को समझा रही थी –
“शायद अनजाने में…”
अवस्थी मन में
“साली आज बहुत टाइट कुर्ता पहनी है… निप्पल्स साफ़ दिख रहे हैं…
आज इसे पूरा निपटा दूँगा… "
अवस्थी बोला-“पूजा बेटा, ऊपर वाली अलमारी में एक ज़रूरी बुक है… तुम ले आओ ना। मेरी कमर दुख रही है।”
पूजा उठी। स्लिप पर चढ़ी।
हर कदम पर उसकी गांड हिल रही थी।
अवस्थी सर नीचे खड़े।
उनका लंड पहले से तना हुआ।
उनकी साँसें तेज़।
जब पूजा सबसे ऊपर पहुँची,
कुर्ता कमर तक ऊपर उठ गया।
पूरा कमर और गांड का निचला हिस्सा दिख रहा था।
पैंटी की इलास्टिक भी।
अवस्थी सर ने बोला मैं सहारा दे देता हूँ, अपने दोनों हाथ उसकी गांड पर रखे। पूजा ने सोचा नहीं ज्यादा
और जान-बूझकर ज़ोर से दबाया।
गांड का पूरा गोश्त उनके हाथों में था।
“आह्ह… सर…!!!”
पूजा की चूत में बिजली दौड़ गई।
“ओह सॉरी सॉरी…मुझे लगा तुम गिर जाओगी क्या करू बुढा हु ना तो जोर ज्यादा लगाना पड़ता है, वैसे इन बूढ़ी हथेलियों में अभी भी जान है ना…?”
पूजा ने हँस दिया। "है सर बिल्कुल है"
पर उसकी साँसें तेज़ थीं।
नीचे उतरते वक्त।
अवस्थी सर ने अपनी मोटी तर्जनी उंगली
सीधे पूजा की गांड की दरार में घुसा दी।
कपड़े के ऊपर से ही, पर इतनी ज़ोर से कि पूजा चीखी।
“आआआह्ह्ह…!!!!!”
बैलेंस बिगड़ा।
पूजा सीधे अवस्थी सर के ऊपर गिरी।
उसके बूब्स अवस्थी सर के मुँह पर। कपड़े के उपर से ही।
अवस्थी सर ने तुरंत मुँह खोला।
एक निप्पल पूरा मुँह में।
ज़ोर-ज़ोर से चूसा।
दोनु हाथ से पूजा की गांड को और ज़ोर से दबाया।
पूजा की सिसकियाँ निकल रही थीं।
“आह्ह… सर… आह्ह… छोड़ो…”
पर उसका बदन काँप रहा था।
अवस्थी मन में
“साली की चूचियाँ मेरे मुँह में… काश बीच मे कपड़े न होते
इसकी गांड मेरे हाथ में…
अभी इसे यहीं चोद डालूँ…
इसकी चूत फाड़ दूँ…
पूजा ने अचानक झटका दिया।
खुद को अलग किया।
उसका चेहरा लाल।
निप्पल्स कीजगह पर गिला हो गया था।
अवस्थी बोला "सॉर्री, मैं संभाल नहीं पाया शायद इन बुढी हड्डियों मे इतनी जान नहीं है"
“सॉरी, मैं… मैं जाती हूँ…”
वो भागी।
बिना कुछ बोले।
अवस्थी ने सोचा साला ज्यादा तो नहीं कर दिया। कहीं बुरा न मान ले।
हॉस्टल आके पूजा बेड पर गिर पड़ी।
उसकी साँसें तेज़। वो फूट-फूट कर रोने लगी।
“ये क्या हो रहा है मेरे साथ…? सर जान-बूझकर कर रहे हैं… मेरी गांड में उंगली… मेरे बूब्स चूसे… मैं सिसक रही थी…?
छिः… छिः… कितने गंदे हैं सर। अब मैं उनके पास कभी नहीं जाऊंगी"
अवस्थी सर का घर
अवस्थी सर अकेले। बेड पर लेटे। अपना लंड सहला रहे थे।
पूजा के जिस्म को याद कर रहे थे। उसके बूब्स का स्वाद।
उसकी गांड की गर्मी।
अवस्थी मन में
“आज तो बस शुरुआत थी… साली की चूचियाँ मेरे मुँह में थीं…
इतना मज़ा… अगली बार इसे पूरी नंगी करूँगा… इसकी चूत चाटूँगा…
अपना लंड इसके मुँह में दूँगा… फिर इसे घोड़ी बनाकर…
इसकी चूत और गांड दोनों फाड़ दूँगा…”
और वो झड़ गए। पूजा का नाम लेते हुए।
पूजा का कमरा ,पूजा बेड पर। तकिया गले लगाकर। रो रही थी।
और खुद से पूछ रही थी –
“अब मैं क्या करूँ…? ये क्या हुआ था इसमें किसकी गलती थी।”
एक दिन पूजा का दरवाज़े पर आई extra class केलिए
हवा में गर्मी थी।
जून की उस शाम में भी उष्णता थी।
पूजा ने बस स्टॉप से पैदल चलकर अवस्थी सर के क्वार्टर तक का रास्ता तय किया था।
उसके पैरों में हल्की-हल्की थकान थी, पर मन में एक अजीब सा डर भी।
पिछले कुछ दिनों से अवस्थी सर का व्यवहार बदल रहा था।
पर पूजा ने खुद को समझाया था –
“सर तो बेचारे हैं… अकेले हैं… शायद अनजाने में…”
वो दरवाज़े पर खड़ी हुई।
उसने नीले रंग का कुर्ता पहना था – थोड़ा टाइट।
उसके भरे हुए बूब्स कुर्ते में साफ़ उभरे हुए थे।
सफेद सलवार पतली कॉटन की – गांड का हर कर्व दिख रहा था।
पैंटी की लाइन भी।
दुपट्टा गले में तीन बार लपेटा हुआ था।
पसीने की वजह से कुर्ता पीठ से चिपक गया था।
ब्रा की स्ट्रिप्स साफ़ दिख रही थीं।
गर्दन पर पसीने की बूँदें।
होंठ सूखे हुए।
उसने दरवाज़ा खटखटाया।
एक बार।
दो बार।
तीसरी बार।
अंदर से आवाज़ आई –
“आओ बेटा… दरवाज़ा खुला है।” दरवाज़ा खुला।
अवस्थी सर ने खुद नहीं खोला।
वो अंदर थे। कुर्सी पर। सफेद कुर्ता-पायजामा। चश्मा।
बाल सफेद। पर आँखें – लाल। भूखी।
पूजा ने जूते उतारे। अंदर कदम रखा।
घर में हल्की-हल्की अगरबत्ती की खुशबू थी।
पर उस खुशबू में कुछ और भी था –
अकेलेपन की बू।
और कुछ गंदा।
“आओ बेटा… बैठो।”
अवस्थी सर ने मुस्कुराते हुए कहा।
उनकी नज़रें पूजा के बूब्स पर एक सेकंड रुकीं।
फिर आँखें मिलाईं।
पूजा सिर झुकाकर “नमस्ते सर…”
अवस्थी की आँखे पूजा के cleavge मे घुस गयी
टेबल पर किताबें बिखरी हुई थीं।
अवस्थी सर ने पूजा को अपने बगल में बिठाया।
उनकी जाँघ पूजा की जाँघ से सटी हुई।
पूजा ने दुपट्टा और कस लिया।
पर अवस्थी सर का हाथ “पेन लेने” के बहाने पूजा की जाँघ पर।
धीरे से ऊपर सरकता हुआ।
पूजा सिहर गई।
उसकी साँसें तेज़ हो गईं।
पर वो कुछ नहीं बोली।
वो खुद को समझा रही थी –
“शायद अनजाने में…”
अवस्थी मन में
“साली आज बहुत टाइट कुर्ता पहनी है… निप्पल्स साफ़ दिख रहे हैं…
आज इसे पूरा निपटा दूँगा… "
अवस्थी बोला-“पूजा बेटा, ऊपर वाली अलमारी में एक ज़रूरी बुक है… तुम ले आओ ना। मेरी कमर दुख रही है।”
पूजा उठी। स्लिप पर चढ़ी।
हर कदम पर उसकी गांड हिल रही थी।
अवस्थी सर नीचे खड़े।
उनका लंड पहले से तना हुआ।
उनकी साँसें तेज़।
जब पूजा सबसे ऊपर पहुँची,
कुर्ता कमर तक ऊपर उठ गया।
पूरा कमर और गांड का निचला हिस्सा दिख रहा था।
पैंटी की इलास्टिक भी।
अवस्थी सर ने बोला मैं सहारा दे देता हूँ, अपने दोनों हाथ उसकी गांड पर रखे। पूजा ने सोचा नहीं ज्यादा
और जान-बूझकर ज़ोर से दबाया।
गांड का पूरा गोश्त उनके हाथों में था।
“आह्ह… सर…!!!”
पूजा की चूत में बिजली दौड़ गई।
“ओह सॉरी सॉरी…मुझे लगा तुम गिर जाओगी क्या करू बुढा हु ना तो जोर ज्यादा लगाना पड़ता है, वैसे इन बूढ़ी हथेलियों में अभी भी जान है ना…?”
पूजा ने हँस दिया। "है सर बिल्कुल है"
पर उसकी साँसें तेज़ थीं।
नीचे उतरते वक्त।
अवस्थी सर ने अपनी मोटी तर्जनी उंगली
सीधे पूजा की गांड की दरार में घुसा दी।
कपड़े के ऊपर से ही, पर इतनी ज़ोर से कि पूजा चीखी।
“आआआह्ह्ह…!!!!!”
बैलेंस बिगड़ा।
पूजा सीधे अवस्थी सर के ऊपर गिरी।
उसके बूब्स अवस्थी सर के मुँह पर। कपड़े के उपर से ही।
अवस्थी सर ने तुरंत मुँह खोला।
एक निप्पल पूरा मुँह में।
ज़ोर-ज़ोर से चूसा।
दोनु हाथ से पूजा की गांड को और ज़ोर से दबाया।
पूजा की सिसकियाँ निकल रही थीं।
“आह्ह… सर… आह्ह… छोड़ो…”
पर उसका बदन काँप रहा था।
अवस्थी मन में
“साली की चूचियाँ मेरे मुँह में… काश बीच मे कपड़े न होते
इसकी गांड मेरे हाथ में…
अभी इसे यहीं चोद डालूँ…
इसकी चूत फाड़ दूँ…
पूजा ने अचानक झटका दिया।
खुद को अलग किया।
उसका चेहरा लाल।
निप्पल्स कीजगह पर गिला हो गया था।
अवस्थी बोला "सॉर्री, मैं संभाल नहीं पाया शायद इन बुढी हड्डियों मे इतनी जान नहीं है"
“सॉरी, मैं… मैं जाती हूँ…”
वो भागी।
बिना कुछ बोले।
अवस्थी ने सोचा साला ज्यादा तो नहीं कर दिया। कहीं बुरा न मान ले।
हॉस्टल आके पूजा बेड पर गिर पड़ी।
उसकी साँसें तेज़। वो फूट-फूट कर रोने लगी।
“ये क्या हो रहा है मेरे साथ…? सर जान-बूझकर कर रहे हैं… मेरी गांड में उंगली… मेरे बूब्स चूसे… मैं सिसक रही थी…?
छिः… छिः… कितने गंदे हैं सर। अब मैं उनके पास कभी नहीं जाऊंगी"
अवस्थी सर का घर
अवस्थी सर अकेले। बेड पर लेटे। अपना लंड सहला रहे थे।
पूजा के जिस्म को याद कर रहे थे। उसके बूब्स का स्वाद।
उसकी गांड की गर्मी।
अवस्थी मन में
“आज तो बस शुरुआत थी… साली की चूचियाँ मेरे मुँह में थीं…
इतना मज़ा… अगली बार इसे पूरी नंगी करूँगा… इसकी चूत चाटूँगा…
अपना लंड इसके मुँह में दूँगा… फिर इसे घोड़ी बनाकर…
इसकी चूत और गांड दोनों फाड़ दूँगा…”
और वो झड़ गए। पूजा का नाम लेते हुए।
पूजा का कमरा ,पूजा बेड पर। तकिया गले लगाकर। रो रही थी।
और खुद से पूछ रही थी –
“अब मैं क्या करूँ…? ये क्या हुआ था इसमें किसकी गलती थी।”


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