03-12-2025, 10:29 PM
चौथा पन्ना... हीना की रजाई
मोहल्ले की तंग गलियाँ दिसंबर की रात में कोहरे में डूबी हुई थीं। ठंड इतनी कि हड्डियाँ तक जम जाएँ, पर दो दिलों में आग धधक रही थी। एक तरफ़ हीना – जिसकी आँखें चाँदनी में भी चमकती थीं, और दूसरी तरफ़ अकरम – जिसकी नज़रें हमेशा से हीना पर अटकी रहती थीं। दोनों की छतें जुड़ी हुई थीं। बस एक दीवार का फ़र्क था। इकबाल के लिए वो दीवार बहुत ऊँची थी, अकरम के लिए वो बस एक कदम।
सब कुछ उस रात से शुरू हुआ था जब इकबाल दीवार फाँदकर हीना के घर में घुसा था। सब सो रहे थे। अचानक शोर हुआ। टॉर्च की रोशनियाँ इधर-उधर दौड़ीं। चोर आया था, चोर भाग गया था। मोहल्ले वाले सुबह तक यही बात करते रहे। लेकिन अकरम सब जानता था। वो छत पर था। उसने देखा था इकबाल को छत से कूदते हुए। और उसके पास एक वीडियो भी था – खेतों का, पाँच दिन पुराना, जिसमें हीना और इकबाल एक-दूसरे में पूरी तरह खोए हुए थे।
अगले दिन दोपहर में अकरम का फोन आया।
“सलाम वालेकुम चाची!”
हीना ने हँसकर टोका, “चाची नहीं, हीना बोल रही है।”
फिर बात उस रात के चोर तक पहुँची। मज़ाक चलता रहा, फिर अकरम ने धीरे से कहा,
“हमें सब पता है, हीना। इकबाल ही था ना? दीवार चढ़कर तुमसे मिलने आया था। और हाँ… खेतों वाला वीडियो भी मेरे पास है। पूरा। जब तुमने उसकी शर्ट खींची थी और उसने तुम्हारी कमीज के बटन खोले थे… वो पूरा वीडियो।”
हीना की साँस रुक गई।
“अकरम… प्लीज़… किसी को मत बताना। मेरी ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी।”
अकरम ने हल्के से हँसा, पर उस हँसी में आग थी।
“नहीं बताऊँगा। बस एक शर्त है – आज रात तुम मुझसे मिलो। वही करो जो इकबाल के साथ करती हो।”
लंबी खामोशी।
फिर हीना ने फुसफुसाया, “तुम मुझे सच में चाहते हो… या सिर्फ़ बदला?”
अकरम की आवाज़ गहरी हो गई, “पहले दिन से चाहता हूँ। जब तुम दुपट्टा ठीक करते हुए मुस्कुराई थीं, उसी दिन से मेरे अंदर आग लगी है। इकबाल ने सिर्फ़ मौका मार लिया। आज मेरी बारी है।”
बात आगे बढ़ी। अकरम ने कहा,
“इकबाल की बात छोड़ो… हमारी नज़र तो हमेशा तुम्हारे ‘दो कबूतरों’ पर रहती है। बहुत प्यारे लगते हैं।”
हीना शरमाई, “हमने बहुत प्यार से पाले हैं…”
अकरम ने हँसकर कहा, “हमें पता है तुमने नहीं पाले – इकबाल ने पाले हैं। शुरू से। जब से तुम्हारी-उसकी पहली मुलाकात हुई, तभी से वो सहला रहा है… दबा रहा है… मसल रहा है… है ना?”
हीना की साँसें फोन में तेज़ सुनाई देने लगीं।
अकरम ने और करीब लाते हुए कहा, “अब ये कबूतर पूरी तरह उड़ने लायक हो गए हैं। तेज़ उड़ते हैं ना? हम भी थोड़ा सहला लें? एक बार हाथ लगा लें तो पता चले कितने नरम हैं… कितने गरम हैं… जब तेज़ उड़ते हैं तभी तो कस के आग लगती है। हम आग लगवाने आ जाएँ आज रात? तुम्हारे कबूतरों को खुला छोड़ देंगे… पूरा आसमान देंगे उड़ने को…”
हीना ने धीरे से कहा, “इकबाल की तो आज आग लग जाती पिछवाड़े में… मैंने मना किया था उसे…”
अकरम ने फुसफुसाया, “अब इकबाल की छोड़ो। आज हमें मौका दो। दोनों कबूतरों को इतना सहलाएँगे, इतना दबाएँगे, इतना मसलेंगे कि तुम भूल जाओगी इकबाल ने कभी छुआ भी था। और जब ये कबूतर पूरी तरह खुल जाएँगे… तो हम अपनी चोंच से दाना चुगाएँगे… धीरे-धीरे… फिर तेज़-तेज़… जब तक तुम्हारी सारी आग, सारी प्यास न बुझ जाए।”
हीना की साँस अब हाँफ रही थी। वो बस एक शब्द बोली, “कहाँ…?”
फिर बात छत पर पहुँची।
“हमारे छत तो जुड़ी हुई हैं ना…” हीना ने खुद ही कहा।
“हाँ। इकबाल को दीवार चढ़नी पड़ी थी… मुझे तो बस एक कदम।”
“ठंड बहुत है…”
“फुल सज वाली डबल रजाई ले आऊँगा। दो तकिए। और अपने बदन की पूरी गर्मी। तुझे ठंड नहीं लगेगी, हीना। मैं वादा करता हूँ… आज रात तुझे इतना गरम करूँगा कि सुबह तक पसीने से तर रहेगी।”
हीना ने हामी भरी, “11:30 बजे सब सो जाएँगे… तुम आ जाना। मैं दरवाज़ा खुला छोड़ दूँगी।”
रात 11:27 बजे।
अकरम ने कंधे पर मोटी रजाई डाली, हाथ में दो तकिए। सीढ़ियाँ चढ़ते वक्त उसका दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि लगा पूरा मोहल्ला सुन लेगा। छत पर पहुँचा तो कोहरा और घना था। चाँद बादलों के पीछे छिपा हुआ। अंधेरे में एक हल्की-सी छाया खड़ी थी।
हीना सफ़ेद सलवार-कमीज़, काला दुपट्टा। होंठ काँप रहे थे। आँखें चमक रही थीं।
अकरम ने रजाई ज़मीन पर बिछाई। तकिए रखे। फिर धीरे से उसके पास गया।
हीना ने एक कदम पीछे हटाया। “डर लग रहा है…”
अकरम ने उसकी कलाई पकड़ी, हल्के से खींचा। “मुझसे डर रही हो… या अपने आप से?”
हीना ने कुछ नहीं कहा। बस उसकी आँखों में देखती रही।
अगले ही पल अकरम ने उसे अपनी बाहों में खींच लिया। रजाई उनके ऊपर चढ़ गई।
पहला चुंबन लंबा था, गहरा। फिर अकरम का हाथ सीधा उसकी छाती पर गया। उसने धीरे से दबाया… फिर मसलना शुरू किया। हीना की सिसकी निकल गई।
अकरम ने उसके कान में फुसफुसाया, “देखो… कितने नरम… कितने गरम… आज तक इकबाल ने सहलाए, आज से हम सहलाएँगे… रोज़… रात-रात भर…”
हीना ने उसकी गर्दन में मुँह छिपा दिया और बस एक शब्द बोला, “अकरम…”
फिर रजाई के अंदर वही हुआ जो कबूतरों को सच में उड़ना सिखाता है।
दो कबूतर खुल गए। कपड़े एक-एक करके उतरते गए। हीना की उंगलियाँ अकरम की पीठ पर निशान बना रही थीं। अकरम का मुँह उसके बदन पर हर उस जगह पहुँचा जहाँ पहले सिर्फ़ इकबाल का हक़ था। सिसकियाँ दबी हुई चीखों में बदल गईं। रजाई हिल रही थी। कोहरा बाहर झाँक रहा था। चाँद शरम से छिपा हुआ था।
एक बार… दो बार… तीन बार।
हीना की आँखों में आँसू थे – खुशी के।
अकरम ने उसके माथे पर लंबा चुंबन किया। “अब रोज़ आना… ये छत हमारी है।”
सुबह चार बजे।
हीना ने रजाई से सिर निकाला। होंठ सूजे हुए थे। गला लाल। बदन पर निशान।
उसने अकरम की छाती पर सिर रखकर कहा, “अब ये कबूतर तुम्हारे हैं… इकबाल को बोल दूँगी – कोई और दाना डाल रहा है।”
अकरम ने उसे एक आखिरी बार कसकर गले लगाया। “कल फिर… इसी वक्त।”
हीना ने मुस्कुराकर हामी भरी।
रजाई अभी भी गरम थी। बाहर कोहरा और घना हो गया था।
पर दो जुड़ी हुई छतों के बीच एक नई कहानी शुरू हो चुकी थी –
जो जाड़े भर नहीं, हमेशा के लिए जलने वाली थी।
मोहल्ले की तंग गलियाँ दिसंबर की रात में कोहरे में डूबी हुई थीं। ठंड इतनी कि हड्डियाँ तक जम जाएँ, पर दो दिलों में आग धधक रही थी। एक तरफ़ हीना – जिसकी आँखें चाँदनी में भी चमकती थीं, और दूसरी तरफ़ अकरम – जिसकी नज़रें हमेशा से हीना पर अटकी रहती थीं। दोनों की छतें जुड़ी हुई थीं। बस एक दीवार का फ़र्क था। इकबाल के लिए वो दीवार बहुत ऊँची थी, अकरम के लिए वो बस एक कदम।
सब कुछ उस रात से शुरू हुआ था जब इकबाल दीवार फाँदकर हीना के घर में घुसा था। सब सो रहे थे। अचानक शोर हुआ। टॉर्च की रोशनियाँ इधर-उधर दौड़ीं। चोर आया था, चोर भाग गया था। मोहल्ले वाले सुबह तक यही बात करते रहे। लेकिन अकरम सब जानता था। वो छत पर था। उसने देखा था इकबाल को छत से कूदते हुए। और उसके पास एक वीडियो भी था – खेतों का, पाँच दिन पुराना, जिसमें हीना और इकबाल एक-दूसरे में पूरी तरह खोए हुए थे।
अगले दिन दोपहर में अकरम का फोन आया।
“सलाम वालेकुम चाची!”
हीना ने हँसकर टोका, “चाची नहीं, हीना बोल रही है।”
फिर बात उस रात के चोर तक पहुँची। मज़ाक चलता रहा, फिर अकरम ने धीरे से कहा,
“हमें सब पता है, हीना। इकबाल ही था ना? दीवार चढ़कर तुमसे मिलने आया था। और हाँ… खेतों वाला वीडियो भी मेरे पास है। पूरा। जब तुमने उसकी शर्ट खींची थी और उसने तुम्हारी कमीज के बटन खोले थे… वो पूरा वीडियो।”
हीना की साँस रुक गई।
“अकरम… प्लीज़… किसी को मत बताना। मेरी ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी।”
अकरम ने हल्के से हँसा, पर उस हँसी में आग थी।
“नहीं बताऊँगा। बस एक शर्त है – आज रात तुम मुझसे मिलो। वही करो जो इकबाल के साथ करती हो।”
लंबी खामोशी।
फिर हीना ने फुसफुसाया, “तुम मुझे सच में चाहते हो… या सिर्फ़ बदला?”
अकरम की आवाज़ गहरी हो गई, “पहले दिन से चाहता हूँ। जब तुम दुपट्टा ठीक करते हुए मुस्कुराई थीं, उसी दिन से मेरे अंदर आग लगी है। इकबाल ने सिर्फ़ मौका मार लिया। आज मेरी बारी है।”
बात आगे बढ़ी। अकरम ने कहा,
“इकबाल की बात छोड़ो… हमारी नज़र तो हमेशा तुम्हारे ‘दो कबूतरों’ पर रहती है। बहुत प्यारे लगते हैं।”
हीना शरमाई, “हमने बहुत प्यार से पाले हैं…”
अकरम ने हँसकर कहा, “हमें पता है तुमने नहीं पाले – इकबाल ने पाले हैं। शुरू से। जब से तुम्हारी-उसकी पहली मुलाकात हुई, तभी से वो सहला रहा है… दबा रहा है… मसल रहा है… है ना?”
हीना की साँसें फोन में तेज़ सुनाई देने लगीं।
अकरम ने और करीब लाते हुए कहा, “अब ये कबूतर पूरी तरह उड़ने लायक हो गए हैं। तेज़ उड़ते हैं ना? हम भी थोड़ा सहला लें? एक बार हाथ लगा लें तो पता चले कितने नरम हैं… कितने गरम हैं… जब तेज़ उड़ते हैं तभी तो कस के आग लगती है। हम आग लगवाने आ जाएँ आज रात? तुम्हारे कबूतरों को खुला छोड़ देंगे… पूरा आसमान देंगे उड़ने को…”
हीना ने धीरे से कहा, “इकबाल की तो आज आग लग जाती पिछवाड़े में… मैंने मना किया था उसे…”
अकरम ने फुसफुसाया, “अब इकबाल की छोड़ो। आज हमें मौका दो। दोनों कबूतरों को इतना सहलाएँगे, इतना दबाएँगे, इतना मसलेंगे कि तुम भूल जाओगी इकबाल ने कभी छुआ भी था। और जब ये कबूतर पूरी तरह खुल जाएँगे… तो हम अपनी चोंच से दाना चुगाएँगे… धीरे-धीरे… फिर तेज़-तेज़… जब तक तुम्हारी सारी आग, सारी प्यास न बुझ जाए।”
हीना की साँस अब हाँफ रही थी। वो बस एक शब्द बोली, “कहाँ…?”
फिर बात छत पर पहुँची।
“हमारे छत तो जुड़ी हुई हैं ना…” हीना ने खुद ही कहा।
“हाँ। इकबाल को दीवार चढ़नी पड़ी थी… मुझे तो बस एक कदम।”
“ठंड बहुत है…”
“फुल सज वाली डबल रजाई ले आऊँगा। दो तकिए। और अपने बदन की पूरी गर्मी। तुझे ठंड नहीं लगेगी, हीना। मैं वादा करता हूँ… आज रात तुझे इतना गरम करूँगा कि सुबह तक पसीने से तर रहेगी।”
हीना ने हामी भरी, “11:30 बजे सब सो जाएँगे… तुम आ जाना। मैं दरवाज़ा खुला छोड़ दूँगी।”
रात 11:27 बजे।
अकरम ने कंधे पर मोटी रजाई डाली, हाथ में दो तकिए। सीढ़ियाँ चढ़ते वक्त उसका दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि लगा पूरा मोहल्ला सुन लेगा। छत पर पहुँचा तो कोहरा और घना था। चाँद बादलों के पीछे छिपा हुआ। अंधेरे में एक हल्की-सी छाया खड़ी थी।
हीना सफ़ेद सलवार-कमीज़, काला दुपट्टा। होंठ काँप रहे थे। आँखें चमक रही थीं।
अकरम ने रजाई ज़मीन पर बिछाई। तकिए रखे। फिर धीरे से उसके पास गया।
हीना ने एक कदम पीछे हटाया। “डर लग रहा है…”
अकरम ने उसकी कलाई पकड़ी, हल्के से खींचा। “मुझसे डर रही हो… या अपने आप से?”
हीना ने कुछ नहीं कहा। बस उसकी आँखों में देखती रही।
अगले ही पल अकरम ने उसे अपनी बाहों में खींच लिया। रजाई उनके ऊपर चढ़ गई।
पहला चुंबन लंबा था, गहरा। फिर अकरम का हाथ सीधा उसकी छाती पर गया। उसने धीरे से दबाया… फिर मसलना शुरू किया। हीना की सिसकी निकल गई।
अकरम ने उसके कान में फुसफुसाया, “देखो… कितने नरम… कितने गरम… आज तक इकबाल ने सहलाए, आज से हम सहलाएँगे… रोज़… रात-रात भर…”
हीना ने उसकी गर्दन में मुँह छिपा दिया और बस एक शब्द बोला, “अकरम…”
फिर रजाई के अंदर वही हुआ जो कबूतरों को सच में उड़ना सिखाता है।
दो कबूतर खुल गए। कपड़े एक-एक करके उतरते गए। हीना की उंगलियाँ अकरम की पीठ पर निशान बना रही थीं। अकरम का मुँह उसके बदन पर हर उस जगह पहुँचा जहाँ पहले सिर्फ़ इकबाल का हक़ था। सिसकियाँ दबी हुई चीखों में बदल गईं। रजाई हिल रही थी। कोहरा बाहर झाँक रहा था। चाँद शरम से छिपा हुआ था।
एक बार… दो बार… तीन बार।
हीना की आँखों में आँसू थे – खुशी के।
अकरम ने उसके माथे पर लंबा चुंबन किया। “अब रोज़ आना… ये छत हमारी है।”
सुबह चार बजे।
हीना ने रजाई से सिर निकाला। होंठ सूजे हुए थे। गला लाल। बदन पर निशान।
उसने अकरम की छाती पर सिर रखकर कहा, “अब ये कबूतर तुम्हारे हैं… इकबाल को बोल दूँगी – कोई और दाना डाल रहा है।”
अकरम ने उसे एक आखिरी बार कसकर गले लगाया। “कल फिर… इसी वक्त।”
हीना ने मुस्कुराकर हामी भरी।
रजाई अभी भी गरम थी। बाहर कोहरा और घना हो गया था।
पर दो जुड़ी हुई छतों के बीच एक नई कहानी शुरू हो चुकी थी –
जो जाड़े भर नहीं, हमेशा के लिए जलने वाली थी।
✍️निहाल सिंह


![[+]](https://xossipy.com/themes/sharepoint/collapse_collapsed.png)