02-12-2025, 05:45 PM
रेशम जैसी रेशमा पार्ट 2
रेशमा का असली नाम था राकेश।
जन्म हुआ था उदयपुर जिले के एक छोटे से गाँव में, जहाँ आज भी लोग किन्नर शब्द सुनकर मुँह फेर लेते हैं। माँ ने उसे जन्म देते ही देख लिया था कि कुछ अलग है—न लड़के जैसा पूरा, न लड़की जैसा। गाँव के बुजुर्गों ने कहा, “ये तो हिजड़ा है।” पिता ने घर में घुसने नहीं दिया। माँ चुपके-चुपके दूध पिलाती रही, पर जब राकेश पाँच साल का हुआ तो पिता ने उसे घर से निकाल दिया। माँ ने रोते हुए एक सौ का नोट हाथ में थमाया और कहा, “जा बेटा, जहाँ किस्मत ले जाए।”
फिर वो दिन आया जब उदयपुर के हिजड़ा गुरु मिस बबीता ने उसे देखा। राकेश उस वक्त नौ साल का था, फटे कपड़ों में स्टेशन पर भीख माँग रहा था। बबीता ने उसे गोद लिया। नाम रखा गया—रेशमा।
“रेशमा मतलब रेशम जैसी मुलायम। तू एक दिन चाँदनी रातों का चाँद बनेगी,” बबीता ने कहा था।
उसके बाद शुरू हुआ निर्बंधन का सिलसिला।
तेरह साल की उम्र में ऑपरेशन। दिल्ली के एक पुराने घर में, बिना एनेस्थीसिया के। सिर्फ़ दो बोतल देशी शराब और एक गंदा चाकू। दर्द इतना था कि रेशमा तीन दिन तक होश में नहीं आई। जब आँख खुली तो बबीता उसके माथे पर हाथ फेर रही थी।
“अब तू पूरी औरत है बेटी। अब दुनिया तुझे रेशमा कहेगी।”
सोलह साल की उम्र तक वो बबीता के साथ बधाइयाँ देती रही—शादियों में, बच्चों के जन्म पर। नाचती, गाती, दुआएँ देती। पर कमाई का बड़ा हिस्सा गुरु को देना पड़ता था। जब अठारह की हुई तो बबीता ने कहा, “अब तू बड़ी हो गई। अपना धंधा कर। मैंने तुझे पाला है, अब मेरी बारी है आराम करने की।”
रेशमा उदयपुर से चित्तौड़गढ़ आई। पहले रेलवे स्टेशन, फिर बस स्टैंड, फिर आखिर में मदार हाईवे। यहाँ ट्रक ड्राइवर ज्यादा मिलते थे। पैसे अच्छे देते थे।
पहले-पहले बहुत रोई। हर रात को लगता कि अब मर जाएगी। पर धीरे-धीरे जीना सीख गई। अब वो बीस-पच्चीस साल की हो चुकी है—कोई पूछे तो कहती है, “पच्चीस पार कर चुकी, अब जवानी ढलान पर है।”
उसके पास एक छोटा सा किराए का कमरा है चित्तौड़गढ़ के किन्नर मोहल्ले में। दीवार पर बॉलीवुड हीरोइनों के पोस्टर। एक पुराना स्टील का बक्सा जिसमें उसकी साड़ियाँ, मेकअप, कंडोम का पैकेट और थोड़े-बहुत गहने हैं। एक गैस सिलेंडर, दो बर्तन और एक मनी प्लांट जो कभी हरा था, अब सूखने को है।
रेशमा का एक सपना है—एक दिन अपना खुद का मकान।
“बस एक छोटा सा घर, जिसमें कोई मुझे निकाल न सके। जहाँ मैं बिना डरे सो सकूँ।”
इसके लिए वो हर महीने पाँच-दस हज़ार बचाती है। बाकी पैसे मेकअप, कपड़े, कभी-कभी गुरु को “गुरु-दक्षिणा” और अपने छोटे भाई को, जो गाँव में पढ़ रहा है। हाँ, उसी माँ का दूसरा बेटा, जिसे पिता ने रख लिया था। रेशमा उससे मिलती नहीं, बस हर महीने वेस्टर्न यूनियन से पैसे भेजती है। नाम लिखती है—“आपकी बहन रेशमा”।
उसे शराब नहीं पीती, सिगरेट नहीं पीती। बस चाय बहुत पसंद है—अदरक वाली, तेज़ मसाला।
और उसे प्यार बहुत पसंद है। सच्चा वाला नहीं, वो जानती है कि मिलना मुश्किल है। बस थोड़ा सा ढोंग भी चलेगा। जब कोई ग्राहक प्यार से बात करता है, उसका हाथ पकड़ता है, उसका नाम लेता है—उसे अच्छा लगता है।
“बस पाँच मिनट को भी कोई मुझे इंसान समझ ले, तो दिन बन जाता है।”
उसने कई बार सोचा कि ये धंधा छोड़ दे। कोई दुकान खोल ले, सिलाई सीख ले। पर पास में इतने पैसे नहीं। और समाज उसे कहीं नौकरी नहीं देगा। सिक्युरिटी वाले भी परेशान करते हैं, कभी-कभी बिना पैसे के ही ले जाते हैं। इसलिए हाईवे ही उसकी दुनिया है।
रेशमा को पता है कि उसका शरीर अब पहले जैसा नहीं रहा। ऑपरेशन के बाद कई इंफेक्शन हुए। अब कभी-कभी पेशाब में जलन होती है। पर दवा के पैसे नहीं होते। वो हँस कर बात टाल देती है।
“अरे भैया, मरना तो सबको है। मैं तो आज जी रही हूँ, कल की कौन देखी?”
उसे गाना बहुत पसंद है। जब अकेली होती है तो पुराने लता मंगेशकर के गाने गाती है—“लग जा गले कि फिर ये हसीन रात हो न हो…”
और कभी-कभी रोते हुए गाती है।
उस रात जब मैंने उसे सात सौ रुपये दिए और कुछ नहीं माँगा, तो वो सच में रो पड़ी थी।
एक्टिवा से उतरते वक्त उसने मेरे कंधे पर सिर रखा और फुसफुसा कर कहा,
“तूने मुझे आज पहली बार इंसान होने का अहसास कराया, विकास भैया।
अगर कभी सच में प्यार करना हो तो याद करना। मैं मुफ्त में भी आ जाया करूँगी।”
फिर वो लाल साड़ी लहराते हुए अंधेरे में चली गई।
पर उसकी वो बात मेरे कान में आज भी गूँजती है।
रेशमा कोई हीरोइन नहीं है।
वो बस एक टूटी-फूटी जिंदगी जी रही है,
जिसमें प्यार, दर्द, भूख और हँसी—सब एक साथ हैं।
और फिर भी वो हर रात मुस्कुरा कर हाईवे पर खड़ी हो जाती है।
क्योंकि उसे पता है—
जिंदगी ने भले ही उसे धोखा दिया हो,
पर वो जिंदगी को अभी हार नहीं मानने वाली।
रेशमा का असली नाम था राकेश।
जन्म हुआ था उदयपुर जिले के एक छोटे से गाँव में, जहाँ आज भी लोग किन्नर शब्द सुनकर मुँह फेर लेते हैं। माँ ने उसे जन्म देते ही देख लिया था कि कुछ अलग है—न लड़के जैसा पूरा, न लड़की जैसा। गाँव के बुजुर्गों ने कहा, “ये तो हिजड़ा है।” पिता ने घर में घुसने नहीं दिया। माँ चुपके-चुपके दूध पिलाती रही, पर जब राकेश पाँच साल का हुआ तो पिता ने उसे घर से निकाल दिया। माँ ने रोते हुए एक सौ का नोट हाथ में थमाया और कहा, “जा बेटा, जहाँ किस्मत ले जाए।”
फिर वो दिन आया जब उदयपुर के हिजड़ा गुरु मिस बबीता ने उसे देखा। राकेश उस वक्त नौ साल का था, फटे कपड़ों में स्टेशन पर भीख माँग रहा था। बबीता ने उसे गोद लिया। नाम रखा गया—रेशमा।
“रेशमा मतलब रेशम जैसी मुलायम। तू एक दिन चाँदनी रातों का चाँद बनेगी,” बबीता ने कहा था।
उसके बाद शुरू हुआ निर्बंधन का सिलसिला।
तेरह साल की उम्र में ऑपरेशन। दिल्ली के एक पुराने घर में, बिना एनेस्थीसिया के। सिर्फ़ दो बोतल देशी शराब और एक गंदा चाकू। दर्द इतना था कि रेशमा तीन दिन तक होश में नहीं आई। जब आँख खुली तो बबीता उसके माथे पर हाथ फेर रही थी।
“अब तू पूरी औरत है बेटी। अब दुनिया तुझे रेशमा कहेगी।”
सोलह साल की उम्र तक वो बबीता के साथ बधाइयाँ देती रही—शादियों में, बच्चों के जन्म पर। नाचती, गाती, दुआएँ देती। पर कमाई का बड़ा हिस्सा गुरु को देना पड़ता था। जब अठारह की हुई तो बबीता ने कहा, “अब तू बड़ी हो गई। अपना धंधा कर। मैंने तुझे पाला है, अब मेरी बारी है आराम करने की।”
रेशमा उदयपुर से चित्तौड़गढ़ आई। पहले रेलवे स्टेशन, फिर बस स्टैंड, फिर आखिर में मदार हाईवे। यहाँ ट्रक ड्राइवर ज्यादा मिलते थे। पैसे अच्छे देते थे।
पहले-पहले बहुत रोई। हर रात को लगता कि अब मर जाएगी। पर धीरे-धीरे जीना सीख गई। अब वो बीस-पच्चीस साल की हो चुकी है—कोई पूछे तो कहती है, “पच्चीस पार कर चुकी, अब जवानी ढलान पर है।”
उसके पास एक छोटा सा किराए का कमरा है चित्तौड़गढ़ के किन्नर मोहल्ले में। दीवार पर बॉलीवुड हीरोइनों के पोस्टर। एक पुराना स्टील का बक्सा जिसमें उसकी साड़ियाँ, मेकअप, कंडोम का पैकेट और थोड़े-बहुत गहने हैं। एक गैस सिलेंडर, दो बर्तन और एक मनी प्लांट जो कभी हरा था, अब सूखने को है।
रेशमा का एक सपना है—एक दिन अपना खुद का मकान।
“बस एक छोटा सा घर, जिसमें कोई मुझे निकाल न सके। जहाँ मैं बिना डरे सो सकूँ।”
इसके लिए वो हर महीने पाँच-दस हज़ार बचाती है। बाकी पैसे मेकअप, कपड़े, कभी-कभी गुरु को “गुरु-दक्षिणा” और अपने छोटे भाई को, जो गाँव में पढ़ रहा है। हाँ, उसी माँ का दूसरा बेटा, जिसे पिता ने रख लिया था। रेशमा उससे मिलती नहीं, बस हर महीने वेस्टर्न यूनियन से पैसे भेजती है। नाम लिखती है—“आपकी बहन रेशमा”।
उसे शराब नहीं पीती, सिगरेट नहीं पीती। बस चाय बहुत पसंद है—अदरक वाली, तेज़ मसाला।
और उसे प्यार बहुत पसंद है। सच्चा वाला नहीं, वो जानती है कि मिलना मुश्किल है। बस थोड़ा सा ढोंग भी चलेगा। जब कोई ग्राहक प्यार से बात करता है, उसका हाथ पकड़ता है, उसका नाम लेता है—उसे अच्छा लगता है।
“बस पाँच मिनट को भी कोई मुझे इंसान समझ ले, तो दिन बन जाता है।”
उसने कई बार सोचा कि ये धंधा छोड़ दे। कोई दुकान खोल ले, सिलाई सीख ले। पर पास में इतने पैसे नहीं। और समाज उसे कहीं नौकरी नहीं देगा। सिक्युरिटी वाले भी परेशान करते हैं, कभी-कभी बिना पैसे के ही ले जाते हैं। इसलिए हाईवे ही उसकी दुनिया है।
रेशमा को पता है कि उसका शरीर अब पहले जैसा नहीं रहा। ऑपरेशन के बाद कई इंफेक्शन हुए। अब कभी-कभी पेशाब में जलन होती है। पर दवा के पैसे नहीं होते। वो हँस कर बात टाल देती है।
“अरे भैया, मरना तो सबको है। मैं तो आज जी रही हूँ, कल की कौन देखी?”
उसे गाना बहुत पसंद है। जब अकेली होती है तो पुराने लता मंगेशकर के गाने गाती है—“लग जा गले कि फिर ये हसीन रात हो न हो…”
और कभी-कभी रोते हुए गाती है।
उस रात जब मैंने उसे सात सौ रुपये दिए और कुछ नहीं माँगा, तो वो सच में रो पड़ी थी।
एक्टिवा से उतरते वक्त उसने मेरे कंधे पर सिर रखा और फुसफुसा कर कहा,
“तूने मुझे आज पहली बार इंसान होने का अहसास कराया, विकास भैया।
अगर कभी सच में प्यार करना हो तो याद करना। मैं मुफ्त में भी आ जाया करूँगी।”
फिर वो लाल साड़ी लहराते हुए अंधेरे में चली गई।
पर उसकी वो बात मेरे कान में आज भी गूँजती है।
रेशमा कोई हीरोइन नहीं है।
वो बस एक टूटी-फूटी जिंदगी जी रही है,
जिसमें प्यार, दर्द, भूख और हँसी—सब एक साथ हैं।
और फिर भी वो हर रात मुस्कुरा कर हाईवे पर खड़ी हो जाती है।
क्योंकि उसे पता है—
जिंदगी ने भले ही उसे धोखा दिया हो,
पर वो जिंदगी को अभी हार नहीं मानने वाली।
✍️निहाल सिंह


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