02-12-2025, 12:13 AM
अवस्थी सर के घर – शाम 5:45 बजे
Extra classes
अवस्थी सर का घर कॉलेज से थोड़ा दूर, पुराने क्वार्टर में था।
एक छोटा सा दो कमरों का फ्लैट।
दीवारें पुरानी, फर्नीचर पुराना, पर साफ़-सुथरा।
हवा में हल्की-हल्की अगरबत्ती की खुशबू।
पूजा टेबल पर बैठी नोट्स देख रही थी।
अवस्थी सर बोले,
“ज़रा पानी लाता हूँ…”
और वो किचन की तरफ़ चले गए।
तभी डोरबेल बजी।
डिलीवरी बॉय था।
बड़ा सा पार्सल।
“अवस्थी सर के लिए…”
पूजा उठी।
“मैं बुलाती हूँ…”
वो अंदर के कमरे में गई।
वो कमरा देखते ही रुक गई।
दीवार पर एक बड़ी सी फोटो लगी थी।
अवस्थी सर – जवान, हँसते हुए।
उनके बगल में एक सुंदर औरत – साड़ी में, मंगलसूत्र, सिंदूर।
उस फोटो पर ताज़ा फूलों का हार चढ़ा हुआ था।
पास में ही एक छोटी फोटो – सिर्फ़ औरत की।
उस पर भी हार।
और सामने एक छोटा सा दीया जल रहा था।
पूजा की साँस रुक गई।
वो बस देखती रही।
“सर…?”
उसकी आवाज़ अपने आप धीमी हो गई।
अवस्थी सर अंदर आए।
डिलीवरी बॉय को पार्सल लिया और वापस भेज दिया।
फिर पूजा वहीँ खड़ी थी – फोटो के सामने।
“सर… ये…?”
अवस्थी सर ने एक लंबी साँस ली।
उनकी आँखें नम थीं, पर मुस्कान थी।
“ये मेरी पत्नी थी… शालिनी…
बीस साल पहले एक एक्सीडेंट में चली गईं…
हमारी शादी को सिर्फ़ पाँच साल हुए थे… बच्चे नहीं हुए… तब से मैं अकेला हूँ…”
उन्होंने फोटो को प्यार से देखा।
“हर साल उनकी बरसी पर मैं फूल चढ़ाता हूँ… और बाकी दिन… दूसरों के बच्चों को पढ़ाकर… उनकी कमी पूरी करने की कोशिश करता हूँ…”
पूजा की आँखें भर आईं।
वो कुछ बोल नहीं पाई।
बस अवस्थी सर को देखती रही।
“सर… मुझे… मुझे माफ़ करना… मैंने कभी नहीं सोचा था…”
अवस्थी सर ने हल्के से सिर हिलाया।
बस एक उदासी।
“कोई बात नहीं पूजा…
तुम क्या जानती… मैं भी… मैं भी कभी-कभी भूल जाता हूँ कि मैं कौन हूँ…”
फिर वो मुस्कुराए।
उस मुस्कान में दर्द था, पर सच्चाई भी।
“तुम पढ़ो… अच्छे से पढ़ो… मेरे लिए नहीं… अपने लिए… और शालिनी के लिए भी…”
पूजा की आँखों से आँसू बह निकले।
वो कुछ नहीं बोली।
बस सिर झुकाकर बोली,
“मैं बहुत अच्छे से पढ़ूँगी सर… पक्का…”
अवस्थी सर ने उसका सिर सहलाया।
पूजा उस दिन घर लौटी तो उसका दिल भारी था।
पर पहली बार कई दिनों बाद… सुकून महसूस किया।
क्योंकि अब उसे पता था –
हर इंसान के अंदर कोई न कोई दर्द छिपा होता है।
और शायद… अवस्थी सर भी सिर्फ़ अकेलेपन में डूबे हुए थे।
Extra classes
अवस्थी सर का घर कॉलेज से थोड़ा दूर, पुराने क्वार्टर में था।
एक छोटा सा दो कमरों का फ्लैट।
दीवारें पुरानी, फर्नीचर पुराना, पर साफ़-सुथरा।
हवा में हल्की-हल्की अगरबत्ती की खुशबू।
पूजा टेबल पर बैठी नोट्स देख रही थी।
अवस्थी सर बोले,
“ज़रा पानी लाता हूँ…”
और वो किचन की तरफ़ चले गए।
तभी डोरबेल बजी।
डिलीवरी बॉय था।
बड़ा सा पार्सल।
“अवस्थी सर के लिए…”
पूजा उठी।
“मैं बुलाती हूँ…”
वो अंदर के कमरे में गई।
वो कमरा देखते ही रुक गई।
दीवार पर एक बड़ी सी फोटो लगी थी।
अवस्थी सर – जवान, हँसते हुए।
उनके बगल में एक सुंदर औरत – साड़ी में, मंगलसूत्र, सिंदूर।
उस फोटो पर ताज़ा फूलों का हार चढ़ा हुआ था।
पास में ही एक छोटी फोटो – सिर्फ़ औरत की।
उस पर भी हार।
और सामने एक छोटा सा दीया जल रहा था।
पूजा की साँस रुक गई।
वो बस देखती रही।
“सर…?”
उसकी आवाज़ अपने आप धीमी हो गई।
अवस्थी सर अंदर आए।
डिलीवरी बॉय को पार्सल लिया और वापस भेज दिया।
फिर पूजा वहीँ खड़ी थी – फोटो के सामने।
“सर… ये…?”
अवस्थी सर ने एक लंबी साँस ली।
उनकी आँखें नम थीं, पर मुस्कान थी।
“ये मेरी पत्नी थी… शालिनी…
बीस साल पहले एक एक्सीडेंट में चली गईं…
हमारी शादी को सिर्फ़ पाँच साल हुए थे… बच्चे नहीं हुए… तब से मैं अकेला हूँ…”
उन्होंने फोटो को प्यार से देखा।
“हर साल उनकी बरसी पर मैं फूल चढ़ाता हूँ… और बाकी दिन… दूसरों के बच्चों को पढ़ाकर… उनकी कमी पूरी करने की कोशिश करता हूँ…”
पूजा की आँखें भर आईं।
वो कुछ बोल नहीं पाई।
बस अवस्थी सर को देखती रही।
“सर… मुझे… मुझे माफ़ करना… मैंने कभी नहीं सोचा था…”
अवस्थी सर ने हल्के से सिर हिलाया।
बस एक उदासी।
“कोई बात नहीं पूजा…
तुम क्या जानती… मैं भी… मैं भी कभी-कभी भूल जाता हूँ कि मैं कौन हूँ…”
फिर वो मुस्कुराए।
उस मुस्कान में दर्द था, पर सच्चाई भी।
“तुम पढ़ो… अच्छे से पढ़ो… मेरे लिए नहीं… अपने लिए… और शालिनी के लिए भी…”
पूजा की आँखों से आँसू बह निकले।
वो कुछ नहीं बोली।
बस सिर झुकाकर बोली,
“मैं बहुत अच्छे से पढ़ूँगी सर… पक्का…”
अवस्थी सर ने उसका सिर सहलाया।
पूजा उस दिन घर लौटी तो उसका दिल भारी था।
पर पहली बार कई दिनों बाद… सुकून महसूस किया।
क्योंकि अब उसे पता था –
हर इंसान के अंदर कोई न कोई दर्द छिपा होता है।
और शायद… अवस्थी सर भी सिर्फ़ अकेलेपन में डूबे हुए थे।


![[+]](https://xossipy.com/themes/sharepoint/collapse_collapsed.png)