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Adultery एक पत्नी का सफर
#47
शाम 6:15 बजे – कॉलेज गेट के बाहर
पूजा बैग कंधे पर लटकाए, थकी-थकी चल रही थी।  
वो सिर झुकाए चल ही रही थी कि सामने से आती यूनिफॉर्म में एक परिचित शक्ल दिखी।
इंस्पेक्टर विजय।  
वही विजय जिसने उस दिन मुन्ना की दुकान पर उसे बचाया था।  
उसकी वर्दी, उसकी चौड़ी छाती, उसकी आवाज़ – सब याद आ गया।  
विजय ने भी उसे देख लिया।  
उसकी आँखों में एक पल को वही पुरानी तस्वीर कौंध गई –  
पूजा का डरा हुआ चेहरा, उसकी आधी नंगी हालत, उसके तने हुए निप्पल्स जो उसकी पीठ पर दब रहे थे।  
उसके बदन में एक हल्की सी सिहरन दौड़ गई।
"Hi पूजा जी…?” विजय ने मुस्कुराते हुए आवाज़ दी।
पूजा रुक गई।  उसका चेहरा शर्मा गया।  
“ह… हाय विजय जी…”
“अरे आप… आप यहाँ…?”
“वो… मैं यहीं कॉलेज में पढ़ती हूँ…”  
फिर एकदम से झुककर बोली,  
“उस दिन… सच में बहुत-बहुत शुक्रिया… आप न होते तो…”
विजय ने हाथ जोड़कर रोका।  
“अरे कोई बात नहीं पूजा जी… ड्यूटी थी।”
फिर थोड़ा रुककर, हल्की मुस्कान के साथ,  
“चाय पियोगी? पास में ही एक ढाबा है… बहुत अच्छी चाय मिलती है।”
पूजा एक पल सोची।  
फिर हल्के से सिर हिलाया।  
“अभी…?”
“हाँ… क्यों नहीं?”
विजय की बुलेट पर।  
पूजा पीछे बैठी।  
उसने दुपट्टा अच्छे से लपेटा, पर फिर भी विजय की चौड़ी पीठ से उसके बूब्स हल्के-हल्के रगड़ खा रहे थे।  
हर गड्ढे में एक झटका।  
पूजा की साँसें तेज़ हो गईं।  
विजय ने भी महसूस किया – उसकी पीठ पर दो मुलायम गोलाकार दबाव।
विजय का मन  
“यही बूब्स थे ना… उस दिन भी ऐसे ही दब रहे थे…  
आज भी तने हुए हैं…  
कितने मुलायम थे…  
काश मैं पलटकर…  
नहीं विजय… कंट्रोल कर…  
ये वो लड़की है जिसे तूने बचाया था…  
पर… पर आज ये खुद मेरे साथ है…”
ढाबे पर
दो कुल्हड़ वाली चाय।  टेबल पर।  
विजय ने बताया,  
“मुन्ना को जेल हो गई है।  
उसने कई लड़कियों को ब्लैकमेल किया था।  
आप चिंता मत करो… मैंने आपका नाम कहीं आने ही नहीं दिया।  
वरना खामखा बदनामी हो जाती।”
पूजा की आँखें नम हो गईं।  
“थैंक यू विजय जी… आप बहुत अच्छे हो…”
“अरे आप शर्मिंदा कर रही हैं…  बस विजय कहिए ना…”
“ओके… विजय…”  
पूजा ने शरमाते हुए कहा।
फिर हल्के मज़ाक में,  
“वैसे… तुम सबकी ऐसे ही मदद करते हो… या सिर्फ़ मेरी ही…?”
विजय हँसा।  “अरे सबकी करता हूँ…”
“मतलब मैं भी बाकियों की तरह ही हूँ…?”  
पूजा ने होंठ बनाते हुए कहा।
“अरे नहीं-नहीं पूजा जी… आप तो स्पेशल हो… इतनी खूबसूरत… और क्या ही कहूँ…”
पूजा शर्मा गई।  
“अरे बस मज़ाक मत करो… इतनी भी नहीं हूँ…  
और ये पूजा जी क्या… बस पूजा कहो ना…”
“ओके… पूजा…”
दोनों हँसे।  
चाय खत्म हुई।  
नंबर एक्सचेंज हुए।
विजय ने बाइक स्टार्ट की।  
पूजा फिर पीछे बैठी।  
इस बार उसने थोड़ा और करीब खिसककर बैठ गई।  
उसके बूब्स विजय की पीठ से पूरी तरह दबे हुए थे।  
हर ब्रेक में एक झटका।  
पूजा की साँसें तेज़।  
विजय का लंड पैंट में तन गया।
हॉस्टल से थोड़ा पहले पूजा ने कहा,  
“यहीं छोड़ दो…  
हॉस्टल में खाली लोग बातें बनाएँगे…”
विजय ने बाइक रोकी।  
पूजा उतरी।  
दुपट्टा संभालते हुए बोली,  
“थैंक यू विजय… सच में…”
विजय मुस्कुराया।  
“कोई नहीं पूजा… कभी ज़रूरत हो… कभी भी…  
फोन करना।  
मैं हूँ ना…”
पूजा ने हल्के से सिर हिलाया।  
और हॉस्टल की तरफ़ चल दी।  
पर उसके कदमों में एक अजीब सी हल्कापन था।  
जैसे कोई बोझ हल्का हो गया हो।
और विजय बाइक स्टार्ट करके चला गया।  
पर उसकी पीठ पर अभी भी पूजा के बूब्स का दबाव महसूस हो रहा था।
विजय का मन
“पूजा…  तुम्हें फिर से बचाने का मौका मिले… तो मैं ज़िंदगी भर बचाता रहूँगा…”  
और पूजा के मन में पहली बार कई दिनों बाद एक हल्की सी मुस्कान थी।  
शायद…  शायद कोई अपना फिर से मिल गया हो।
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RE: एक पत्नी का सफर - by Tiska jay - 01-12-2025, 11:56 PM



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