01-12-2025, 11:46 PM
अगले कुछ दिन – कॉलेज और हॉस्टल
(धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे… सब कुछ बदल रहा था)
पूजा अब हर सुबह उठकर तैयार होती।
साड़ी की जगह अब सलवार-सूट।
दुपट्टा कंधे पर नहीं, गले में लपेटकर।
जितना हो सके, उतना ढँककर।
विक्रम को देखते ही नज़रें झुकाकर निकल जाती।
उसका मैसेज आता तो डिलीट कर देती।
राजू का नाम भी मन में नहीं लाना चाहती थी।
पर रात को जब रेणु और रमेश की फ़ोन सेक्स की आवाज़ें आतीं –
रेणु की सिसकारियाँ, “आह्ह… रमेश… और ज़ोर से…”
तो पूजा तकिए में मुँह दबाकर रोने लगती।
और फिर राजू की याद आ जाती –
उसका मोटा लंड, उसकी गर्म साँसें, उसका वीर्य उसकी चूत में…
पूजा की उंगलियाँ अनजाने में अपनी चूत पर चली जातीं।
वो खुद को रोकती, पर रोक नहीं पाती।
हर रात वो झड़कर सोती।
और हर सुबह खुद से नफ़रत करती।
अवस्थी सर अब खुलकर आगे बढ़ रहे थे।
क्लास में पूजा को बोर्ड पर बुलाते।
पीछे से खड़े होकर उसकी कमर को “गलती से” छूते।
“अरे पूजा… तुम थोड़ी कमज़ोर हो गई हो ना…
प्राइवेट क्लास लेनी पड़ेगी…
मेरे चैंबर में… शाम 4 बजे के बाद…”
पूजा को लगा – शायद सच में पढ़ाई में मदद मिलेगी।
वो बहुत इज़्ज़त करती थी अवस्थी सर की।
“जी सर… ठीक है।”
हर शाम 4 से 6 बजे।
अवस्थी सर का चैंबर।
दरवाज़ा बंद।
कूलर की आवाज़।
और अवस्थी सर की नज़रें पूजा की छाती पर।
कुर्ते का गला जितना भी ढँका होता, वो उसे नीचे खींचने की कोशिश करते।
“अरे पूजा… यहाँ लिखो…”
कहकर उसकी पीठ पर हाथ फेरते।
कभी कलम गिराकर झुकते और पूजा की जाँघों को घूरते।
पूजा समझ नहीं पा रही थी।
उसका मन कहता – सर तो मदद कर रहे हैं।
पर बदन सिहर जाता।
हर लेक्चर में पूजा जब भी बोर्ड पर जाती, अवस्थी सर की कुर्सी से उठते ही नहीं।
बस घूरते रहते।
उसकी नज़रें पूजा के पतले कुर्ते के गले से शुरू होतीं –
वो गला जो पसीने से हल्का गीला होकर चिपक जाता था।
उसके गोरे-गोरे बूब्स का आकार साफ़ दिखता।
निप्पल्स हर बार खड़े हो जाते –
कभी ठंडी हवा से, कभी डर से, कभी अनजानी उत्तेजना से।
अवस्थी सर की जीभ होंठों पर फिरती।
उसकी आँखें लालच से चमकतीं।
अवस्थी का मन (हर बार)
“साली के निप्पल्स आज फिर खड़े हैं…
इतने सख्त…
जैसे चिल्ला रहे हों – ‘चूसो हमें…’
इसे तो रोज़ चोदने का मन करता है…
इसके बूब्स को मुँह में लेकर दाँत से काटूँ…
इतना चूसूँ कि ये मेरे नाम की आहें भरे…
फिर इसकी चूत…
कितनी तंग होगी…
मेरा 9 इंच का लंड इसके अंदर पेलूँगा…
इसे इतना चोदूँगा कि ये मेरे नीचे लेटकर गिड़गिड़ाएगी…
‘सर… और… सर… और ज़ोर से…’
हाहाहा… बस थोड़ा और इंतज़ार…”
क्लास खत्म होते ही अवस्थी सर पूजा को रोकते।
“पूजा… ज़रा मेरे साथ आना… कुछ डाउट है ना?”
कॉरिडोर में लोग कम।
अवस्थी सर पूजा के बिल्कुल पीछे-पीछे चलते।
उनका लंड पहले से ही तना हुआ।
पूजा चलती तो उसकी गांड हल्की-हल्की हिलती।
अवस्थी सर का हाथ “गलती से” उसकी कमर पर टच होता।
फिर धीरे से नीचे सरकता।
गांड के कर्व पर रुक जाता।
हल्का सा दबाव।
पूजा सिहर जाती।
अवस्थी का मन कहता
“क्या माल है…इतनी मुलायम गांड…इसे तो मैं दोनों हाथों से पकड़कर…
अपना लंड इसके बीच में रगड़ूँगा…फिर धीरे-धीरे अंदर करूँगा…
ये चीखेगी…पर मज़ा आएगा…”
(धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे… सब कुछ बदल रहा था)
पूजा अब हर सुबह उठकर तैयार होती।
साड़ी की जगह अब सलवार-सूट।
दुपट्टा कंधे पर नहीं, गले में लपेटकर।
जितना हो सके, उतना ढँककर।
विक्रम को देखते ही नज़रें झुकाकर निकल जाती।
उसका मैसेज आता तो डिलीट कर देती।
राजू का नाम भी मन में नहीं लाना चाहती थी।
पर रात को जब रेणु और रमेश की फ़ोन सेक्स की आवाज़ें आतीं –
रेणु की सिसकारियाँ, “आह्ह… रमेश… और ज़ोर से…”
तो पूजा तकिए में मुँह दबाकर रोने लगती।
और फिर राजू की याद आ जाती –
उसका मोटा लंड, उसकी गर्म साँसें, उसका वीर्य उसकी चूत में…
पूजा की उंगलियाँ अनजाने में अपनी चूत पर चली जातीं।
वो खुद को रोकती, पर रोक नहीं पाती।
हर रात वो झड़कर सोती।
और हर सुबह खुद से नफ़रत करती।
अवस्थी सर अब खुलकर आगे बढ़ रहे थे।
क्लास में पूजा को बोर्ड पर बुलाते।
पीछे से खड़े होकर उसकी कमर को “गलती से” छूते।
“अरे पूजा… तुम थोड़ी कमज़ोर हो गई हो ना…
प्राइवेट क्लास लेनी पड़ेगी…
मेरे चैंबर में… शाम 4 बजे के बाद…”
पूजा को लगा – शायद सच में पढ़ाई में मदद मिलेगी।
वो बहुत इज़्ज़त करती थी अवस्थी सर की।
“जी सर… ठीक है।”
हर शाम 4 से 6 बजे।
अवस्थी सर का चैंबर।
दरवाज़ा बंद।
कूलर की आवाज़।
और अवस्थी सर की नज़रें पूजा की छाती पर।
कुर्ते का गला जितना भी ढँका होता, वो उसे नीचे खींचने की कोशिश करते।
“अरे पूजा… यहाँ लिखो…”
कहकर उसकी पीठ पर हाथ फेरते।
कभी कलम गिराकर झुकते और पूजा की जाँघों को घूरते।
पूजा समझ नहीं पा रही थी।
उसका मन कहता – सर तो मदद कर रहे हैं।
पर बदन सिहर जाता।
हर लेक्चर में पूजा जब भी बोर्ड पर जाती, अवस्थी सर की कुर्सी से उठते ही नहीं।
बस घूरते रहते।
उसकी नज़रें पूजा के पतले कुर्ते के गले से शुरू होतीं –
वो गला जो पसीने से हल्का गीला होकर चिपक जाता था।
उसके गोरे-गोरे बूब्स का आकार साफ़ दिखता।
निप्पल्स हर बार खड़े हो जाते –
कभी ठंडी हवा से, कभी डर से, कभी अनजानी उत्तेजना से।
अवस्थी सर की जीभ होंठों पर फिरती।
उसकी आँखें लालच से चमकतीं।
अवस्थी का मन (हर बार)
“साली के निप्पल्स आज फिर खड़े हैं…
इतने सख्त…
जैसे चिल्ला रहे हों – ‘चूसो हमें…’
इसे तो रोज़ चोदने का मन करता है…
इसके बूब्स को मुँह में लेकर दाँत से काटूँ…
इतना चूसूँ कि ये मेरे नाम की आहें भरे…
फिर इसकी चूत…
कितनी तंग होगी…
मेरा 9 इंच का लंड इसके अंदर पेलूँगा…
इसे इतना चोदूँगा कि ये मेरे नीचे लेटकर गिड़गिड़ाएगी…
‘सर… और… सर… और ज़ोर से…’
हाहाहा… बस थोड़ा और इंतज़ार…”
क्लास खत्म होते ही अवस्थी सर पूजा को रोकते।
“पूजा… ज़रा मेरे साथ आना… कुछ डाउट है ना?”
कॉरिडोर में लोग कम।
अवस्थी सर पूजा के बिल्कुल पीछे-पीछे चलते।
उनका लंड पहले से ही तना हुआ।
पूजा चलती तो उसकी गांड हल्की-हल्की हिलती।
अवस्थी सर का हाथ “गलती से” उसकी कमर पर टच होता।
फिर धीरे से नीचे सरकता।
गांड के कर्व पर रुक जाता।
हल्का सा दबाव।
पूजा सिहर जाती।
अवस्थी का मन कहता
“क्या माल है…इतनी मुलायम गांड…इसे तो मैं दोनों हाथों से पकड़कर…
अपना लंड इसके बीच में रगड़ूँगा…फिर धीरे-धीरे अंदर करूँगा…
ये चीखेगी…पर मज़ा आएगा…”


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