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Adultery एक पत्नी का सफर
#42
पूजा रेणु से नज़रें मिलाने से डर रही थी।
संजय से फ़ोन पर हँसकर बात की, “हाँ जान, सब ठीक है, बस पढ़ाई का प्रेशर है।”
पर हर रात वो तकिया भीगोती रही।

राजू का कोई मैसेज नहीं आया था।
पूजा ने कई बार लिखा –
“राजू… तुम ठीक हो ना…?”
पर टाइप करके डिलीट कर दिया।
उसे लगता था – अगर उसने मैसेज किया तो राजू फिर लौट आएगा,
और वो फिर टूट जाएगी।

आज कॉलेज आई तो बेंच पर बैठी ही थी कि विक्रम दिख गया।
वो मुस्कुराया।
पूजा का दिल ज़ोर से धड़क गया।
उसके होंठों की वो गर्मी याद आ गई।
उसके हाथों की पकड़।
पर तुरंत राजू की याद भी आई –
राजू का नंगा बदन।
उसका चौड़ा सीना।
उसके मुँह से आती दारू की तेज़ बू।
उसकी उंगलियाँ पूजा के बूब्स पर।
उसका मोटा, लंबा लंड जो संजय से कहीं ज़्यादा बड़ा था।
और फिर वो धक्के…
हर धक्के में पूजा की चूत फटती हुई महसूस हो रही थी।
उसका मंगलसूत्र उसके बूब्स के बीच उछल रहा था –
जैसे चिल्ला रहा हो –
“धोखेबाज़… धोखेबाज़… धोखेबाज़…”

पूजा ने आँखें बंद कीं।
उसके बदन में सिहरन दौड़ गई।
उसकी चूत अभी भी हल्की गीली थी –
राजू का वीर्य सूख चुका था, पर उसकी गंध अभी भी थी।
हर बार जब वो पैर हिलाती, चिपचिपाहट महसूस होती।
उसके निप्पल्स सख्त हो गए थे।
कुर्ते के अंदर बिना ब्रा के, वो साफ़ दिख रहे थे।
“नहीं… नहीं सोचना मुझे…
पर याद आ रहा है…
राजू का लंड मेरे मुँह में…
उसकी नसें… उसकी गर्मी…
मैंने उसे चूसा था…
उसके मुँह से दारू की बू आ रही थी…
पर मुझे अच्छा लग रहा था…
उसने मेरी चूत चाटी थी…
उसकी जीभ अंदर तक…
मैं झड़ गई थी… दो बार…
फिर उसने मुझे चोदा…
धीरे-धीरे… फिर तेज़…
हर धक्के में मुझे लगा मैं टूट जाऊँगी…
पर मुझे और चाहिए था…
मैंने उससे कहा था…
‘राजू… और तेज़…’
मैंने खुद अपनी कमर ऊपर की थी…
मैंने खुद उसे अपने अंदर गहराई तक लिया था…
और जब वो झड़ा…
उसका गर्म वीर्य मेरी चूत में…
मुझे लगा मैं पूरी हो गई…
पर अब…
अब मैं खाली हूँ…
संजय… मुझे माफ़ कर दो…”

पूजा ने खुद से कहा,
“नहीं पूजा… नहीं…
तू फिर से नहीं तोड़ सकती संजय से किए वादे…
नहीं…”

ठीक उसी पल फ़ोन वाइब्रेट हुआ।
राजू का मैसेज।
“पूजा जी,
आपके साथ बिताए पल मेरे लिए सबसे बेहतरीन थे।
मैं आपसे प्यार करने लगा था।
और ना चाहते हुए भी शायद आपने मुझे खुद को सौंप दिया था।
मैं नहीं चाहता कि आपके साथ ये फिर हो
और मैं भी अपनी पत्नी को धोखा दूँ।
तो मैं वापस अपने गाँव जा रहा हूँ।
आप हमेशा खुश रहना।
अलविदा।
आपका राजू”

पूजा की आँखें भर आईं।
उसने फ़ोन सीने से लगाया।
होंठ काँप रहे थे।
आँसू टपकने लगे।
तभी प्रोफेसर अवस्थी आए।
56 साल के।
सफेद बाल, मोटा चश्मा, पर आँखों में हमेशा वही गंदी चमक।
कैंपस में सब जानते थे – अवस्थी सर लड़कीबाज़ हैं।
पूजा को पहले भी कई बार गंदी नज़र से देखते पकड़ा गया था।
उसके बूब्स को घूरते, उसकी कमर को नापते।
एक बार तो लाइब्रेरी में उसकी जाँघ पर हाथ रख दिया था।

“अरे पूजा… आँखों में आँसू…?”
उनकी आवाज़ में बनावटी चिंता थी।

“कुछ नहीं सर…”

“अरे बताओ तो… अपने टीचर से कुछ नहीं छिपाते…”

उन्होंने पूजा की पीठ पर हाथ रखा।
धीरे-धीरे सहलाने लगे।
हाथ नीचे सरक रहा था।
पूजा की कमर तक पहुँच गया।
उसके कुर्ते के नीचे हाथ डालने की कोशिश कर रहे थे।
पूजा सिहर गई।
उसके बदन में फिर वही सिहरन –
राजू की उंगलियों की याद।
पर अब ये गंदा था।

“सर… प्लीज़…”

“अरे शर्मा मत… मैं तुम्हारा दर्द समझता हूँ…”
हाथ और नीचे।
पूजा की गांड पर पहुँच गया।
हल्के से दबाया।

तभी कोई बोला,
“सर… प्रिंसिपल साहब बुला रहे हैं।”

अवस्थी सर ने हाथ हटाया।
पर जाते-जाते पूजा के कान में फुसफुसाए,
“कभी अकेलापन लगे…
मेरे कमरे में आ जाना…
मैं तुम्हें बहुत आराम दूँगा…”
और बहुत गंदी, बहुत भूखी मुस्कान के साथ चले गए।
पूजा काँप रही थी।
उसने अपना दुपट्टा कसकर ओढ़ लिया।
जैसे कोई ढाल हो।
तभी विक्रम पास आके बोला।
“हाय पूजा… क्या हुआ? रो रही हो?”
उसकी मुस्कान पहले जैसी ही थी।
पूजा ने सिर उठाया।
उसकी आँखें लाल थीं।
वो कुछ नहीं बोली।
बस फ़ोन अपनी गोद में छिपा लिया।
और आँसू पोंछते हुए बोली,
“कुछ नहीं… बस घर की याद आ गई…”
विक्रम उसके बगल में बैठ गया।
उसकी जाँघ पूजा की जाँघ से सटी हुई।
“अगर दिल करे तो बता देना… मैं हूँ ना…”
पूजा ने उसकी ओर देखा।
उसके होंठ फिर से करीब थे।
पूजा का मन हुआ की इनको चूम लू।
"नहीं। पूजा तू अपने पति को फिर धोख़ा नहीं देगी। चाहे उसके लिए तुझे कुछ भी करना पड़े। "
वो धीरे से बोली,
“विक्रम… मुझे अकेला छोड़ दो प्लीज़…”
विक्रम चौंका।
फिर मुस्कुराया।
“ठीक है… जब मन करे बुला लेना…”
और चला गया।
पूजा अकेली बेंच पर बैठी रही।
राजू का मैसेज फिर पढ़ा।
फिर फ़ोन बंद कर दिया।
और धीरे से फुसफुसाई,
“अलविदा राजू…
तू सही था…
हम दोनों ने एक-दूसरे को बचा लिया था…
और अब…
हम दोनों को दूर जाना ही था…”

उसने अपना मंगलसूत्र छुआ।
और पहली बार बहुत देर तक उसे कसकर पकड़े रही।
जैसे संजय को वापस पकड़ रही हो।
जैसे खुद को वापस पकड़ रही हो।
वो उठी।
बैग उठाया।
और बिना किसी को देखे हॉस्टल चली गई।
उस दिन के बाद…
राजू का नंबर उसने ब्लॉक कर दिया।
और खुद से वादा किया –
“बस एक आखिरी बार टूटी थी मैं…
अब फिर कभी नहीं…”
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RE: एक पत्नी का सफर - by Tiska jay - 30-11-2025, 07:04 PM



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