29-11-2025, 07:41 AM
सीमा का मैसेज आया था बुधवार रात को:
“मम्मी की तबीयत खराब है, गाँव जा रही हूँ दस-बारह दिन के लिए। तुम दोनों अकेले मज़े करना, रंडी। मुझे फोटो-वीडियो भेजना मत भूलना।”
त्रिप्ति ने रिप्लाई में सिर्फ़ एक लाल दिल भेजा था।
दिल के अंदर उसकी चूत में आग लगी हुई थी।
शुक्रवार शाम 6:45।
अविनाश का मैसेज:
“काले रंग की साड़ी। अंदर कुछ नहीं। 7:30 बजे, सिविल लाइंस वाले फ्लाईओवर के नीचे। कार मैं भेज रहा हूँ। ड्राइवर को बोलने की ज़रूरत नहीं, वो मेरा पुराना वाला है।”
त्रिप्ति ने काँपते हाथों से काली जॉर्जेट की साड़ी निकाली। पतली, पारदर्शी। ब्लाउज़ सिर्फ़ धागों वाला, पीठ पूरी नंगी। मंगलसूत्र उसने जानबूझकर नहीं पहना। अब वो टूटा हुआ उसकी ड्राइंग-रूम की दराज में पड़ा था, जैसे कोई मरा साँप।
सात बजकर अट्ठाईस मिनट पर काली मर्सिडीज़ रुकी।
पीछे की सीट पर अविनाश अकेला बैठा था। सफेद शर्ट, आस्तीनें मुड़ी हुईं, आँखों में वो भूख जो अब त्रिप्ति पहचानने लगी थी।
ड्राइवर ने शीशा चढ़ाया, आईने में एक बार देखा, फिर गाड़ी स्टार्ट कर दी।
अविनाश ने दरवाज़ा खोला भी नहीं, सिर्फ़ आँखों से इशारा किया।
त्रिप्ति अंदर घुसी। दरवाज़ा बंद होते ही अविनाश ने उसकी कमर पकड़कर अपनी गोद में खींच लिया।
“दो हफ़्ते से तेरी गांड की याद में मुठ मार रहा हूँ, रंड,” उसने उसके कान में फुसफुसाया। “आज तेरी चूत और गांड दोनों फाड़ दूँगा।”
गाड़ी फ्लाईओवर के नीचे से निकलकर रिंग रोड पर थी।
जयपुर की लाइटें बाहर धुंधली पड़ रही थीं। अंदर अंधेरा, सिर्फ़ डैशबोर्ड की हल्की नीली रोशनी।
अविनाश ने उसका पल्लू एक झटके में नीचे खींच दिया।
काले ब्लाउज़ में उसके मम्मे उछलकर बाहर आए। निप्पल पहले से ही पत्थर जैसे कड़े।
उसने एक मम्मा मुँह में लिया, इतना ज़ोर से चूसा कि त्रिप्ति की चीख़ निकल गई।
“आह… सर… धीरे…”
“धीरे? तेरी तरह की रंडियों को धीरे नहीं, लंड से ठोका जाता है।”
उसने उसकी साड़ी कमर तक ऊपर उठा दी।
पैंटी नहीं थी। चूत पहले से ही रस से लबालब।
अविनाश ने दो उँगलियाँ एक साथ अंदर ठूँस दीं।
“हरामज़ादी, कितना पानी छोड़ रही है। सीमा के बिना भी तैयार बैठी है मेरे लंड के लिए?”
त्रिप्ति ने सिसकारी भरी, उसकी गोद में पीसते हुए, “हाँ सर… आपका लंड चाहिए… रोज़ सोचती हूँ… घर में पति के साथ लेटती हूँ तो भी आपकी याद आती है…”
अविनाश ने ज़िप खोली। उसका लंड बाहर आया, मोटा, नसें फूली हुईं, सुपारा लाल और चमकदार।
उसने त्रिप्ति का सिर नीचे दबाया।
“चूस, कुतिया। पूरा गले तक ले।”
गाड़ी मालवीय नगर की तरफ़ बढ़ रही थी। बाहर ट्रैफिक, हॉर्न, लोग।
अंदर त्रिप्ति का सिर अविनाश की गोद में ऊपर-नीचे हो रहा था। लार की लंबी डोरियाँ उसके होंठों से लटक रही थीं।
हर बार जब वो पूरा लंड गले में लेती, उसकी नाक अविनाश के प्यूबिक बालों से टकराती।
अविनाश उसके बाल पकड़कर और ज़ोर से धक्का देता, “गले में घुसा पूरा, रंड। आज तुझे साँस भी मेरी मर्ज़ी से लेनी है।”
दस मिनट बाद उसने सिर ऊपर खींचा। त्रिप्ति की आँखें लाल, होंठ सूजे हुए, मुँह से लार टपक रही थी।
अविनाश ने उसे अपनी गोद में उल्टा बिठा लिया, पीठ उसकी छाती से सटी हुई।
साड़ी पूरी कमर तक चढ़ी हुई। उसकी गांड नंगी, दो गोल मोटे चूतड़।
उसने थप्पड़ मारा, इतना ज़ोर से कि आवाज़ गाड़ी में गूँजी।
“तेरी गांड देखकर मेरा लंड पागल हो जाता है, साली।”
उसने ल्यूब की छोटी बोतल निकाली, सुपारे पर लगाया, बाकी त्रिप्ति की गांड के छेद पर डाला।
फिर एक ही झटके में पूरा लंड जड़ तक घुसा दिया।
त्रिप्ति की चीख़ गाड़ी में घूम गई, “आआआह्ह… मर गई… सर… फट गई मेरी गांड…”
अविनाश ने उसकी कमर पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से धक्के मारने शुरू कर दिए।
हर धक्के में उसका लंड जड़ तक जाता और बाहर आता तो सुपारा चमकता हुआ।
गाड़ी की सीटें हिल रही थीं। बाहर वैशाली नगर की लाइटें धुंधली पड़ रही थीं।
ड्राइवर ने आईना ऊपर कर लिया था, पर त्रिप्ति को लगा वो सब देख-सुन रहा है।
उसने शर्म से मुँह बंद कर लिया, पर अविनाश ने उसका सिर पीछे खींचा।
“चीख़, रंडी। सबको पता चलना चाहिए कि सर अपनी सेक्रेटरी की गांड मार रहा है।”
गाड़ी अब सी-स्कीम की तरफ़ जा रही थी।
अविनाश ने उसकी गांड मारते-मारते उसकी चूत में चार उँगलियाँ ठूँस दीं।
दोनों छेद एक साथ। त्रिप्ति का दिमाग़ सुन्न पड़ गया।
“हाँ… फाड़ दो… दोनों छेद फाड़ दो… मैं आपकी रंड हूँ सर… रोज़ आपका लंड खाऊँगी…”
उसकी चूत से रस की फुहारें छूटने लगीं।
हर धक्के में पिच-पिच की आवाज़। गाड़ी में सेक्स की तेज़ महक।
अविनाश ने अचानक लंड बाहर निकाला।
“मुँह खोल।”
त्रिप्ति ने घुटनों के बल मुड़ी, मुँह खोला।
अविनाश ने अपना लंड, जो अभी उसकी गांड से निकला था, उसके मुँह में ठूँस दिया।
“चख अपना गांड का स्वाद, कुतिया।”
त्रिप्ति ने आँखें बंद करके चूसा। स्वाद गंदा था, पर उसका शरीर और गर्म हो गया।
फिर अविनाश ने उसे फिर उल्टा बिठाया, इस बार चूत में लंड घुसाया।
धीरे-धीरे नहीं, एक ही झटके में।
“आज तेरी चूत में भी पूरा माल छोड़ूँगा। घर जाकर पति के सामने बैठना, उसका बच्चा मेरे वीर्य से पलेगा।”
ये सुनते ही त्रिप्ति झड़ गई।
उसकी चूत ने लंड को इतना कस लिया कि अविनाश भी सिसकियाँ लेने लगा।
“हरामज़ादी… कितना कसती है… ले… पूरा माल ले अपनी बच्चेदानी में…”
और उसने झड़ना शुरू कर दिया।
गर्म वीर्य की धारें त्रिप्ति की चूत के अंदर, बाहर तक बहने लगीं।
गाड़ी राजापार्क के ट्रैफिक में रुकी थी। बाहर लोग, रिक्शे, गाड़ियाँ।
अंदर त्रिप्ति अविनाश की गोद में पड़ी थी, चूत से वीर्य टपक रहा था, साड़ी गीली, बाल बिखरे हुए।
अविनाश ने उसका चेहरा अपनी तरफ़ घुमाया, होंठ चूमा।
“अब हर शुक्रवार नहीं। अब जब मर्ज़ी मन किया, मैं बुलाऊँगा। तू आएगी। समझी?”
त्रिप्ति ने सहमति में सिर हिलाया, आँखें नम।
“जी सर… मैं आपकी रंड हूँ… जब चाहें बुला लीजिए… मेरी चूत और गांड दोनों आपकी हैं।”
गाड़ी अब उसके घर के मोहल्ले की तरफ़ मुड़ गई।
अविनाश ने उसकी साड़ी ठीक की, पल्लू डाला, होंठ पोछे।
पर चूत से वीर्य अभी भी बह रहा था।
उसने टिश्यू से पोछने की कोशिश की, पर अविनाश ने रोका।
“नहीं। ऐसे ही घर जाना। पति के सामने बैठना, उसका वीर्य तेरी चूत में रहेगा।”
गाड़ी घर के बाहर रुकी।
ड्राइवर ने दरवाज़ा खोला।
त्रिप्ति उतरी, पैर काँप रहे थे। साड़ी का पल्लू बार-बार सरक रहा था।
वह चलकर अंदर गई।
रोहन सोफे पर बैठा था, टीवी देख रहा था।
“इतनी लेट? सब ठीक?”
उसने मुस्कुराने की कोशिश की।
“हाँ… बहुत ट्रैफिक था।”
वह उसके पास बैठी।
चूत से अभी भी गर्म वीर्य रिस रहा था, उसकी जाँघों पर बहता हुआ।
रोहन ने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया, गले लगाने।
वह उससे लिपट गई, उसकी छाती पर सिर रखा।
और आँखें बंद करके सोचा,
“सीमा जब वापस आएगी, तब हम तीनों मिलकर क्या-क्या करेंगे…”
उस रात वह रोहन के साथ सोई, पर सपने में सिर्फ़ अविनाश का लंड था।
और उसकी चूत सुबह तक गीली रही।
जैसे अब उसका शरीर भी जान गया हो कि अब उसका मालिक कोई और है।
“मम्मी की तबीयत खराब है, गाँव जा रही हूँ दस-बारह दिन के लिए। तुम दोनों अकेले मज़े करना, रंडी। मुझे फोटो-वीडियो भेजना मत भूलना।”
त्रिप्ति ने रिप्लाई में सिर्फ़ एक लाल दिल भेजा था।
दिल के अंदर उसकी चूत में आग लगी हुई थी।
शुक्रवार शाम 6:45।
अविनाश का मैसेज:
“काले रंग की साड़ी। अंदर कुछ नहीं। 7:30 बजे, सिविल लाइंस वाले फ्लाईओवर के नीचे। कार मैं भेज रहा हूँ। ड्राइवर को बोलने की ज़रूरत नहीं, वो मेरा पुराना वाला है।”
त्रिप्ति ने काँपते हाथों से काली जॉर्जेट की साड़ी निकाली। पतली, पारदर्शी। ब्लाउज़ सिर्फ़ धागों वाला, पीठ पूरी नंगी। मंगलसूत्र उसने जानबूझकर नहीं पहना। अब वो टूटा हुआ उसकी ड्राइंग-रूम की दराज में पड़ा था, जैसे कोई मरा साँप।
सात बजकर अट्ठाईस मिनट पर काली मर्सिडीज़ रुकी।
पीछे की सीट पर अविनाश अकेला बैठा था। सफेद शर्ट, आस्तीनें मुड़ी हुईं, आँखों में वो भूख जो अब त्रिप्ति पहचानने लगी थी।
ड्राइवर ने शीशा चढ़ाया, आईने में एक बार देखा, फिर गाड़ी स्टार्ट कर दी।
अविनाश ने दरवाज़ा खोला भी नहीं, सिर्फ़ आँखों से इशारा किया।
त्रिप्ति अंदर घुसी। दरवाज़ा बंद होते ही अविनाश ने उसकी कमर पकड़कर अपनी गोद में खींच लिया।
“दो हफ़्ते से तेरी गांड की याद में मुठ मार रहा हूँ, रंड,” उसने उसके कान में फुसफुसाया। “आज तेरी चूत और गांड दोनों फाड़ दूँगा।”
गाड़ी फ्लाईओवर के नीचे से निकलकर रिंग रोड पर थी।
जयपुर की लाइटें बाहर धुंधली पड़ रही थीं। अंदर अंधेरा, सिर्फ़ डैशबोर्ड की हल्की नीली रोशनी।
अविनाश ने उसका पल्लू एक झटके में नीचे खींच दिया।
काले ब्लाउज़ में उसके मम्मे उछलकर बाहर आए। निप्पल पहले से ही पत्थर जैसे कड़े।
उसने एक मम्मा मुँह में लिया, इतना ज़ोर से चूसा कि त्रिप्ति की चीख़ निकल गई।
“आह… सर… धीरे…”
“धीरे? तेरी तरह की रंडियों को धीरे नहीं, लंड से ठोका जाता है।”
उसने उसकी साड़ी कमर तक ऊपर उठा दी।
पैंटी नहीं थी। चूत पहले से ही रस से लबालब।
अविनाश ने दो उँगलियाँ एक साथ अंदर ठूँस दीं।
“हरामज़ादी, कितना पानी छोड़ रही है। सीमा के बिना भी तैयार बैठी है मेरे लंड के लिए?”
त्रिप्ति ने सिसकारी भरी, उसकी गोद में पीसते हुए, “हाँ सर… आपका लंड चाहिए… रोज़ सोचती हूँ… घर में पति के साथ लेटती हूँ तो भी आपकी याद आती है…”
अविनाश ने ज़िप खोली। उसका लंड बाहर आया, मोटा, नसें फूली हुईं, सुपारा लाल और चमकदार।
उसने त्रिप्ति का सिर नीचे दबाया।
“चूस, कुतिया। पूरा गले तक ले।”
गाड़ी मालवीय नगर की तरफ़ बढ़ रही थी। बाहर ट्रैफिक, हॉर्न, लोग।
अंदर त्रिप्ति का सिर अविनाश की गोद में ऊपर-नीचे हो रहा था। लार की लंबी डोरियाँ उसके होंठों से लटक रही थीं।
हर बार जब वो पूरा लंड गले में लेती, उसकी नाक अविनाश के प्यूबिक बालों से टकराती।
अविनाश उसके बाल पकड़कर और ज़ोर से धक्का देता, “गले में घुसा पूरा, रंड। आज तुझे साँस भी मेरी मर्ज़ी से लेनी है।”
दस मिनट बाद उसने सिर ऊपर खींचा। त्रिप्ति की आँखें लाल, होंठ सूजे हुए, मुँह से लार टपक रही थी।
अविनाश ने उसे अपनी गोद में उल्टा बिठा लिया, पीठ उसकी छाती से सटी हुई।
साड़ी पूरी कमर तक चढ़ी हुई। उसकी गांड नंगी, दो गोल मोटे चूतड़।
उसने थप्पड़ मारा, इतना ज़ोर से कि आवाज़ गाड़ी में गूँजी।
“तेरी गांड देखकर मेरा लंड पागल हो जाता है, साली।”
उसने ल्यूब की छोटी बोतल निकाली, सुपारे पर लगाया, बाकी त्रिप्ति की गांड के छेद पर डाला।
फिर एक ही झटके में पूरा लंड जड़ तक घुसा दिया।
त्रिप्ति की चीख़ गाड़ी में घूम गई, “आआआह्ह… मर गई… सर… फट गई मेरी गांड…”
अविनाश ने उसकी कमर पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से धक्के मारने शुरू कर दिए।
हर धक्के में उसका लंड जड़ तक जाता और बाहर आता तो सुपारा चमकता हुआ।
गाड़ी की सीटें हिल रही थीं। बाहर वैशाली नगर की लाइटें धुंधली पड़ रही थीं।
ड्राइवर ने आईना ऊपर कर लिया था, पर त्रिप्ति को लगा वो सब देख-सुन रहा है।
उसने शर्म से मुँह बंद कर लिया, पर अविनाश ने उसका सिर पीछे खींचा।
“चीख़, रंडी। सबको पता चलना चाहिए कि सर अपनी सेक्रेटरी की गांड मार रहा है।”
गाड़ी अब सी-स्कीम की तरफ़ जा रही थी।
अविनाश ने उसकी गांड मारते-मारते उसकी चूत में चार उँगलियाँ ठूँस दीं।
दोनों छेद एक साथ। त्रिप्ति का दिमाग़ सुन्न पड़ गया।
“हाँ… फाड़ दो… दोनों छेद फाड़ दो… मैं आपकी रंड हूँ सर… रोज़ आपका लंड खाऊँगी…”
उसकी चूत से रस की फुहारें छूटने लगीं।
हर धक्के में पिच-पिच की आवाज़। गाड़ी में सेक्स की तेज़ महक।
अविनाश ने अचानक लंड बाहर निकाला।
“मुँह खोल।”
त्रिप्ति ने घुटनों के बल मुड़ी, मुँह खोला।
अविनाश ने अपना लंड, जो अभी उसकी गांड से निकला था, उसके मुँह में ठूँस दिया।
“चख अपना गांड का स्वाद, कुतिया।”
त्रिप्ति ने आँखें बंद करके चूसा। स्वाद गंदा था, पर उसका शरीर और गर्म हो गया।
फिर अविनाश ने उसे फिर उल्टा बिठाया, इस बार चूत में लंड घुसाया।
धीरे-धीरे नहीं, एक ही झटके में।
“आज तेरी चूत में भी पूरा माल छोड़ूँगा। घर जाकर पति के सामने बैठना, उसका बच्चा मेरे वीर्य से पलेगा।”
ये सुनते ही त्रिप्ति झड़ गई।
उसकी चूत ने लंड को इतना कस लिया कि अविनाश भी सिसकियाँ लेने लगा।
“हरामज़ादी… कितना कसती है… ले… पूरा माल ले अपनी बच्चेदानी में…”
और उसने झड़ना शुरू कर दिया।
गर्म वीर्य की धारें त्रिप्ति की चूत के अंदर, बाहर तक बहने लगीं।
गाड़ी राजापार्क के ट्रैफिक में रुकी थी। बाहर लोग, रिक्शे, गाड़ियाँ।
अंदर त्रिप्ति अविनाश की गोद में पड़ी थी, चूत से वीर्य टपक रहा था, साड़ी गीली, बाल बिखरे हुए।
अविनाश ने उसका चेहरा अपनी तरफ़ घुमाया, होंठ चूमा।
“अब हर शुक्रवार नहीं। अब जब मर्ज़ी मन किया, मैं बुलाऊँगा। तू आएगी। समझी?”
त्रिप्ति ने सहमति में सिर हिलाया, आँखें नम।
“जी सर… मैं आपकी रंड हूँ… जब चाहें बुला लीजिए… मेरी चूत और गांड दोनों आपकी हैं।”
गाड़ी अब उसके घर के मोहल्ले की तरफ़ मुड़ गई।
अविनाश ने उसकी साड़ी ठीक की, पल्लू डाला, होंठ पोछे।
पर चूत से वीर्य अभी भी बह रहा था।
उसने टिश्यू से पोछने की कोशिश की, पर अविनाश ने रोका।
“नहीं। ऐसे ही घर जाना। पति के सामने बैठना, उसका वीर्य तेरी चूत में रहेगा।”
गाड़ी घर के बाहर रुकी।
ड्राइवर ने दरवाज़ा खोला।
त्रिप्ति उतरी, पैर काँप रहे थे। साड़ी का पल्लू बार-बार सरक रहा था।
वह चलकर अंदर गई।
रोहन सोफे पर बैठा था, टीवी देख रहा था।
“इतनी लेट? सब ठीक?”
उसने मुस्कुराने की कोशिश की।
“हाँ… बहुत ट्रैफिक था।”
वह उसके पास बैठी।
चूत से अभी भी गर्म वीर्य रिस रहा था, उसकी जाँघों पर बहता हुआ।
रोहन ने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया, गले लगाने।
वह उससे लिपट गई, उसकी छाती पर सिर रखा।
और आँखें बंद करके सोचा,
“सीमा जब वापस आएगी, तब हम तीनों मिलकर क्या-क्या करेंगे…”
उस रात वह रोहन के साथ सोई, पर सपने में सिर्फ़ अविनाश का लंड था।
और उसकी चूत सुबह तक गीली रही।
जैसे अब उसका शरीर भी जान गया हो कि अब उसका मालिक कोई और है।


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