26-11-2025, 03:27 PM
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Episode 7 : के तुम मेरी बाहों में हो...
हाइडअवे रिज़ॉर्ट का प्राइवेट विला उस तंग हिमालयी घाटी में एकान्त का आखिरी ठिकाना था। चारों तरफ़ देवदारों की ऊँची दीवारें, नीचे ब्यास का क्रोधी शोर, और ऊपर चाँदनी जो बर्फ को दूधिया चाँदी बना रही थी।
हाइवे से उनकी गाड़ी अब कच्ची सड़क थी और चारों तरफ अंधेरा। कार की हेडलाइट्स ने लोहे का भारी गेट रोशन किया।
गेट पर बूढ़ा गार्ड शेर सिंह लालटेन लटकाए खड़ा था। उसने सलाम ठोका और गेट खोल दिया।
आर्यन की कार अंदर दाखिल हुई।
कार रुकी। आर्यन बाहर निकला, फिर गुलमोहर की तरफ हाथ बढ़ाया। उसने लाल बनारसी का पल्लू ठीक किया, हाथ थामा और कार से उतरी। ठंडी हवा ने झपट्टा मारा तो आर्यन ने अचानक उसकी कमर पकड़कर उसे गोद में उठा लिया।
“अरे… आर्यन…!” गुलमोहर की हल्की चीख निकली और शरमाकर उसने मुँह उसकी छाती में छुपा लिया।
आर्यन की चौड़ी, बालों वाली छाती गुलमोहर की नरम छातियों से रगड़ रही थी। कमीज के खुले बटन के बीच से काले बाल झाँक रहे थे। हर कदम पर मंगलसूत्र उसकी छाती से टकरा-टकरा कर खनक रहा था। गुलमोहर की साँसें तेज़ हो गईं।
“चल, बीवी,” आर्यन ने धीरे कहा, आवाज में हल्की काँप थी।
अन्दर आते ही रसोइया विमल ने हाथ जोड़े।
“डिनर तैयार है साहब, कुछ भी चाहिए तो घंटी दबाना।”
आर्यन ने मुस्कुरा कर टाल दिया। विमल साइड दरवाज़े से चला गया।
दो नौजवान नौकर, राजू और मोहन, सामान अन्दर रखकर फायरप्लेस में ताजी लकड़ियाँ डाल गए।
दोनों ने हाथ जोड़े और क्वार्टर्स की ओर बढ़ गए। जाते-जाते पगडंडी पर उनकी फुसफुसाहट शुरू हो गई।
ठंड थी, पर उनकी बातें गर्म।
राजू (फुसफुसाते हुए): अरे मोहन, देखा तूने दुल्हन को? लाल साड़ी में लग रही थी जैसे कोई बॉलीवुड की हिरोइन उतर आई हो पहाड़ पर! मंगलसूत्र तक हिल रहा था जब वो चल रही थी… उफ्फ़!
मोहन (हँसते हुए, कोहनी मारते हुए): चुप बेवकूफ! साहब सुन लेंगे तो दोनों की नौकरी गई। पर सच कहूँ… वो जो पल्लू सरका था ना कार से उतरते वक़्त, एक सेकंड को कमर दिखी… भाई, मैं तो पागल हो गया। सालों तक याद रखूँगा ये हनीमून।
राजू: और साहब भी कोई कम नहीं। गोद में उठाकर ले जा रहे थे दुल्हन को , जैसे हम हैं ही नहीं। आज रात तो बेचारी की चीखें यहाँ तक आएँगी क्या?
मोहन (आँख मारते हुए): नहीं आएँगी , दीवारें पत्थर की हैं, काँच भी डबल ग्लेज्ड है। ऊपर से ब्यास नदी का शोर। चीख ले दुल्हन जितनी जोर से, बाहर एक चूड़ी की खनक भी नहीं जाएगी। शेर सिंह चाचा भी गेट पर सो जाएँगे, उन्हें कान से कम सुनाई देता है।
राजू (सिगरेट सुलगाते हुए): सोच… अभी तो पहली रात है। दस दिन हैं। दस दिन! हम तो बस झाड़ू-पोंछा करेंगे, बाकी ये दोनों… पूरा विला हिला देंगे। सुबह जब जाएँगे सफाई करने, बिस्तर देखकर ही समझ जाएँगे कितनी तूफानी रात गई।
मोहन (हँसते-हँसते लड़खड़ाते हुए): चादरें तो रोज बदलनी पड़ेंगी भाई। और वो काँच की दीवार… कहीं दाग न लग जाएँ। कल सुबह मैं ही साफ करूँगा, तू बाहर रहना। मैं तो करीब से देख लूँगा निशान।
राजू: हरामी कहीं का! चल, आज रात सोने से पहले एक-एक पैग मार लेते हैं। पहाड़ी वाली। आज की रात तो जश्न की है… किसी और की सुहागरात का जश्न!
दोनों हँसते हुए क्वार्टर्स के दरवाजे पर पहुँचे। लालटेन जलाई, देशी शराब की बोतल खोली।
मोहन: चल, दुल्हन और दूल्हे के नाम!
राजू: और उनकी दस रातों के नाम!
गिलास टकराए। ठ ठ ठ की हँसी। बाहर ब्यास गर्जना कर रही थी, पर उनकी हँसी उसमें भी डूब नहीं रही थी। क्योंकि उन्हें पता था… असली गर्जना तो अभी विला के अन्दर शुरू होने वाली थी।
नशा चढ़ा तो बातें और खुलकर बोली जाने लगीं।
राजू (हँसते हुए): अरे साला, साहब का लंड तो पक्का बड़ा होगा! देखा ना कैसे पैंट में उभार बना हुआ था? जब वो दुल्हन उठा रहे थे, पैंट टाइट हो गई थी पीछे से… गांड की लाइन तक साफ दिख रही थी, पर सामने वो टेंट साफ बना हुआ था। दुल्हन की नजर भी बार-बार वहीं जा रही थी। आज रात जब वो पैंट उतारेंगे ना… दुल्हन के मुँह में पानी आ जाएगा।
मोहन (गिलास पटकते हुए): बिल्कुल! साहब की उँगलियाँ कितनी मोटी-मोटी थीं। सोच, वो उँगलियाँ आज दुल्हन की चूत में घुसेंगी, पहले दो, फिर तीन… दुल्हन की चीख निकलेगी। फिर अपना लंड अन्दर ठूँसेंगे… पूरा का पूरा। पहली बार में ही दुल्हन की चूत फट जाएगी।
राजू: और साहब की छाती… कमीज के अन्दर से बाल झाँक रहे थे। जब दुल्हन को गोद में उठाया तो उसकी छाती दुल्हन की छातियों से रगड़ रही थी। आज रात वो बालों वाली छाती दुल्हन के मुँह पर रगड़ेंगे, दुल्हन चाटेगी, चूसेगी। फिर साहब अपना लंड दुल्हन की छातियों के बीच में डालकर टिटजॉब लेंगे… मंगलसूत्र उछलेगा, लार टपकेगी।
मोहन (आँखें चमकाते हुए): और पीछे से जब चोदेंगे ना… साहब की गांड कितनी टाइट और गोल है, हर धक्के में सिकुड़ेगी। दुल्हन घुटनों पर होगी, चूड़ियाँ खनकेंगी, साहब बाल पकड़कर खींचेंगे और लंड पूरा जड़ तक घुसाएँगे। “ले… ले मेरी रंडी… आज से तू मेरी” बोलते हुए झड़ेंगे अन्दर। दुल्हन की चूत से वीर्य लहराएगा सुबह तक।
राजू (हँसते हुए): और साहब की मूंछें… जब दुल्हन की चूत चाटेंगे तो मूंछें गीली हो जाएँगी। दुल्हन पागल होकर साहब का सिर दबाएगी।
मोहन: दस रातें हैं भाई… दस रातें! पहली रात चूत, दूसरी गांड, तीसरी मुँह… हर दिन नया खेल। सुबह जब हम चादरें बदलने जाएँगे तो गंध से ही पता चल जाएगा… वीर्य, रस, पसीना सब मिला हुआ। काँच की दीवार पर दाग, गलीचे पर स्पॉट… हम साफ करेंगे और जलेंगे।
राजू (गिलास ऊँचा करके): चल साला, आखिरी पैग…साहब के मोटे, लम्बे, लंड के नाम!
मोहन: और उसकी गर्म वीर्य की बौछार के नाम जो आज दुल्हन की चूत, मुँह और गांड में भरेगा!
दोनों ने गिलास एक घूँट में खाली किए। ठ ठ ठ की हँसी फिर गूँजी। बोतल खाली। उनकी जलन पूरी। लालटेन बुझाई।
इधर विला के अंदर।
मुख्य दरवाज़े की कुंडी पड़ी। “क्लिक”।
फायरप्लेस चटकने लगा।
लकड़ी की गर्म, नशीली खुशबू फैल गई।
गुलमोहर अभी भी लाल बनारसी में लिपटी खड़ी थी, जैसे कोई जीती-जागती आग। साड़ी उसके जिस्म से इस तरह चिपकी हुई थी कि हर उभार, हर गोलाइ, हर साँस की लय साफ़ दिख रही थी। मंगलसूत्र उसकी गहरी गर्दन से लटक रहा था, दो भरी हुई छातियों के बीच झूलता। लाल चूड़ियाँ पतली कलाइयों में खनक रही थीं।
उसने शरमाते, फिर भी भूखी नजरों से आर्यन को देखा।
“अब…?” उसकी आवाज़ काँप गई।
आर्यन ने एक कदम बढ़ाया।
“अब सुहागरात है, मेरी गुल… मेरी बीवी। आज तुझे एक-एक साँस, एक-एक रोम तक अपनी बना लूँगा।”
उसने उसे गोद में उठा लिया। लाल साड़ी का पल्लू फर्श पर लहराता हुआ बिछ गया, जैसे खून की नदी।
फिर शुरू हुई वो लम्बी, जंगली, अनन्त रात…
जिसकी गूँज बाहर तक नहीं पहुँची।
अन्दर लकड़ी की गर्म, नशीली खुशबू थी। दीवारें हिमालयी पत्थर की, फर्श पर मोटे कश्मीरी गलीचे, और सामने पूरी दीवार काँच की—उसके पार चाँदनी में नहाई चोटियाँ जैसे कोई पुराना सपना जाग रहा हो। बीच कमरे में किंग-साइज बेड, मखमली सफेद चादरें, चारों कोनों पर लालटेनों की मद्धम सुनहरी रोशनी। बेड के ठीक सामने फायरप्लेस में लाल-नीली लपटें नाच रही थीं, लकड़ियाँ चटक-चटक कर प्रेम की प्राचीन भाषा बोल रही थीं।
गुलमोहर अभी भी लाल बनारसी में लिपटी खड़ी थी—जैसे कोई जीती-जागती आग। साड़ी उसके जिस्म से इस तरह चिपकी हुई थी कि हर उभार, हर गोलाइ, हर साँस की लय साफ़ दिख रही थी। मंगलसूत्र उसकी गहरी गर्दन से नीचे लटक रहा था, दो भरी हुई छातियों के बीच झूलता, हर साँस पर हल्का उछलता। लाल चूड़ियाँ पतली कलाइयों में खनक रही थीं, मानो कह रही हों—आज रात हम नहीं रुकेंगी।
उसने शरमाते, फिर भी भूखी नजरों से आर्यन को देखा।
“अब…?” उसकी आवाज़ काँप गई।
आर्यन ने एक कदम बढ़ाया। उसकी आँखें गुलमोहर के होंठों से नीचे, फिर और नीचे उतरती गईं।
“अब सुहागरात है, मेरी गुल… मेरी बीवी। आज तुझे एक-एक साँस, एक-एक रोम तक अपनी बना लूँगा।”
उसने उसे गोद में उठा लिया। लाल साड़ी का पल्लू फर्श पर लहराता हुआ बिछ गया, जैसे खून की कोई नदी बह निकली हो। बेड पर लिटाते ही आर्यन उसके ऊपर झुक गया। उसकी उँगलियाँ गुलमोहर की कमर पर रेंगती हुईं ब्लाउज़ के नीचे चली गईं। जैसे ही उसने छातियों को छुआ, गुलमोहर की साँस रुक गई, आँखें बंद हो गईं, होंठ काँपे। आर्यन ने ब्लाउज़ के हुक एक-एक कर खोले—हर हुक के साथ गुलमोहर के गले से हल्की सिसकारी निकल रही थी।
जब ब्लाउज़ खुल गया तो उसने उसे धीरे से उतारा। लाल ब्रा के ऊपर से भी उभरी छातियाँ साफ़ दिख रही थीं, निप्पल्स पहले से सख़्त। आर्यन ने ब्रा का हुक पीछे से खोला और उसे भी फेंक दिया। अब गुलमोहर की नंगी छातियाँ उसके सामने थीं—गोरी, भरी हुई, हल्की हिलोर लेती हुईं। उसने एक को मुँह में लिया, जीभ से चूसने लगा, दाँतों से हल्का काटा, फिर गोल-गोल घुमाया। गुलमोहर की पीठ ऊपर को उठ गई, उँगलियाँ आर्यन के बालों में उलझ गईं।
“आह… आर्यन… उफ़्फ़…”
आर्यन नीचे उतरता गया। पेटीकोट का नाड़ा खींचा। साड़ी और पेटीकोट एक साथ फर्श पर गिर गए। अब गुलमोहर सिर्फ़ लाल रेशमी पैंटी और मंगलसूत्र में थी। पैंटी पहले से ही गीली थी—बीच में गहरा धब्बा। आर्यन ने उँगली से उस गीलेपन को सहलाया। गुलमोहर सिहर उठी।
उसने पैंटी भी नीचे सरका दी। अब गुलमोहर पूरी तरह नंगी थी। उसकी चिकनी, गीली चूत आर्यन के सामने खुली थी—होंठ थोड़े फैले, अन्दर से गुलाबी चमक। आर्यन ने मुँह नीचे ले गया। जीभ से पहले हल्का छुआ, फिर पूरा अन्दर घुसा दिया। गुलमोहर की तीखी चीख गूँज गई। उसने आर्यन का सिर अपनी जाँघों से दबा लिया।
“आर्यन… नहीं… वहाँ… आह्ह्ह… मर जाऊँगी…”
आर्यन ने क्लिट को जीभ से रगड़ा, दो उँगलियाँ अन्दर डालकर तेज़ी से अन्दर-बाहर करने लगा। गुलमोहर की कमर बार-बार ऊपर उछल रही थी, चूड़ियाँ पागलों की तरह खनक रही थीं। कुछ ही पलों में वो पहली बार झड़ गई—उसकी चूत से गर्म रस की बौछार निकली, आर्यन ने उसे पूरा पी लिया।
अब आर्यन ने अपने कपड़े उतारे। उसका लंड पूरी तरह तना हुआ था, नसें उभरी हुईं, सिरा गीला चमक रहा था। गुलमोहर ने उसे देखा और डरते-डरते हाथ बढ़ाया। उसने उसे सहलाया, फिर होंठों से छुआ। आर्यन की साँस फट पड़ी।
“गुल… मुँह में ले…”
गुलमोहर ने शरमाते हुए उसे मुँह में लिया। पहले सिर्फ़ सिरा, फिर आधा, फिर जितना समाया। आर्यन के हाथ उसके बालों में थे, धीरे-धीरे धक्के मार रहा था। गुलमोहर की लार उसके लंड पर लहरा रही थी, चूड़ियाँ हर झटके में खनक रही थीं।
फिर आर्यन ने उसे बेड पर लिटाया, टांगें चौड़ी कीं। अपना लंड उसकी चूत पर रगड़ा, गीलेपन में पूरी तरह लथपथ कर लिया।
“तैयार है, गुल?”
गुलमोहर ने सिर्फ़ सिर हिलाया, आँखें बंद।
आर्यन ने धीरे से अन्दर घुसाया—पहले सिरा, फिर आधा, फिर पूरा। गुलमोहर की चीख निकल गई, नाखून उसकी पीठ पर गड़ गए।
“आह्ह… आर्यन… फट रही हूँ… पर… और अन्दर… और ज़ोर से…”
आर्यन ने रिदम पकड़ा—पहले कोमल, जैसे कोई पुराना राग, फिर तेज़, फिर जंगली। हर धक्के में उसका लंड गुलमोहर की चूत की सबसे गहरी दीवार से टकरा रहा था। मंगलसूत्र उसकी छातियों पर उछल रहा था, चूड़ियाँ बेड से टकरा रही थीं, और चाप-चाप-चाप की गीली आवाज़ कमरे में गूँज रही थी।
गुलमोहर बार-बार झड़ रही थी—दूसरी, तीसरी, चौथी बार। हर बार उसकी चूत आर्यन के लंड को और कसकर जकड़ लेती। आखिरकार आर्यन भी नहीं रुका—गुलमोहर की चूत के सबसे गर्म, सबसे गहरे कोने में अपनी सारी गर्मी उड़ेलता हुआ झड़ गया। दोनों एक साथ चीखे, एक-दूसरे से लिपट गए, पसीने और रस से पूरी तरह लथपथ।
रात अभी बहुत लम्बी थी।
आर्यन ने उसे फिर पलटा—इस बार घुटनों के बल। उसकी गांड ऊपर, चूत पीछे से अभी भी वीर्य और रस से चमक रही थी। आर्यन ने फिर घुसाया, इस बार और गहरा, और तेज़। गुलमोहर की चीखें अब दर्द और सुख की मिली-जुली थीं। वो बेड पर, फायरप्लेस के गलीचे पर लोटते हुए, काँच की दीवार से सटाकर, कभी खड़े-खड़े, कभी आर्यन की गोद में—हर जगह, हर मुद्रा में चुदाई करते रहे। कभी उसका लंड उसकी चूत में, कभी मुँह में, कभी छातियों के बीच।
सुबह की पहली सुनहरी किरण जब चोटियों को छूने लगी, तब जाकर दोनों थक कर, चूर-चूर होकर एक-दूसरे से लिपट कर गिरे। गुलमोहर की चूत से आर्यन का वीर्य अभी भी लहरा रहा था, उसकी छातियाँ लाल दाँतों के निशानों से भरी थीं, होंठ सूजे हुए, माँग में सिंदूर पूरी तरह स्मज होकर फैल चुका था, मंगलसूत्र पसीने से उसकी छाती पर चिपका हुआ। आर्यन का हाथ अभी भी उसकी कमर पर कसा हुआ था, जैसे छोड़ना पाप हो।
बाहर ब्यास नदी अब भी गर्जना कर रही थी।
अन्दर सिर्फ़ दो नवविवाहितों की थकी, गहरी साँसें और चूड़ियों की आखिरी सुस्त खनक थी।
दस दिन अभी बाकी थे।
कहानी जारी रहेगी....
हाइडअवे रिज़ॉर्ट का प्राइवेट विला उस तंग हिमालयी घाटी में एकान्त का आखिरी ठिकाना था। चारों तरफ़ देवदारों की ऊँची दीवारें, नीचे ब्यास का क्रोधी शोर, और ऊपर चाँदनी जो बर्फ को दूधिया चाँदी बना रही थी।
हाइवे से उनकी गाड़ी अब कच्ची सड़क थी और चारों तरफ अंधेरा। कार की हेडलाइट्स ने लोहे का भारी गेट रोशन किया।
गेट पर बूढ़ा गार्ड शेर सिंह लालटेन लटकाए खड़ा था। उसने सलाम ठोका और गेट खोल दिया।
आर्यन की कार अंदर दाखिल हुई।
कार रुकी। आर्यन बाहर निकला, फिर गुलमोहर की तरफ हाथ बढ़ाया। उसने लाल बनारसी का पल्लू ठीक किया, हाथ थामा और कार से उतरी। ठंडी हवा ने झपट्टा मारा तो आर्यन ने अचानक उसकी कमर पकड़कर उसे गोद में उठा लिया।
“अरे… आर्यन…!” गुलमोहर की हल्की चीख निकली और शरमाकर उसने मुँह उसकी छाती में छुपा लिया।
आर्यन की चौड़ी, बालों वाली छाती गुलमोहर की नरम छातियों से रगड़ रही थी। कमीज के खुले बटन के बीच से काले बाल झाँक रहे थे। हर कदम पर मंगलसूत्र उसकी छाती से टकरा-टकरा कर खनक रहा था। गुलमोहर की साँसें तेज़ हो गईं।
“चल, बीवी,” आर्यन ने धीरे कहा, आवाज में हल्की काँप थी।
अन्दर आते ही रसोइया विमल ने हाथ जोड़े।
“डिनर तैयार है साहब, कुछ भी चाहिए तो घंटी दबाना।”
आर्यन ने मुस्कुरा कर टाल दिया। विमल साइड दरवाज़े से चला गया।
दो नौजवान नौकर, राजू और मोहन, सामान अन्दर रखकर फायरप्लेस में ताजी लकड़ियाँ डाल गए।
दोनों ने हाथ जोड़े और क्वार्टर्स की ओर बढ़ गए। जाते-जाते पगडंडी पर उनकी फुसफुसाहट शुरू हो गई।
ठंड थी, पर उनकी बातें गर्म।
राजू (फुसफुसाते हुए): अरे मोहन, देखा तूने दुल्हन को? लाल साड़ी में लग रही थी जैसे कोई बॉलीवुड की हिरोइन उतर आई हो पहाड़ पर! मंगलसूत्र तक हिल रहा था जब वो चल रही थी… उफ्फ़!
मोहन (हँसते हुए, कोहनी मारते हुए): चुप बेवकूफ! साहब सुन लेंगे तो दोनों की नौकरी गई। पर सच कहूँ… वो जो पल्लू सरका था ना कार से उतरते वक़्त, एक सेकंड को कमर दिखी… भाई, मैं तो पागल हो गया। सालों तक याद रखूँगा ये हनीमून।
राजू: और साहब भी कोई कम नहीं। गोद में उठाकर ले जा रहे थे दुल्हन को , जैसे हम हैं ही नहीं। आज रात तो बेचारी की चीखें यहाँ तक आएँगी क्या?
मोहन (आँख मारते हुए): नहीं आएँगी , दीवारें पत्थर की हैं, काँच भी डबल ग्लेज्ड है। ऊपर से ब्यास नदी का शोर। चीख ले दुल्हन जितनी जोर से, बाहर एक चूड़ी की खनक भी नहीं जाएगी। शेर सिंह चाचा भी गेट पर सो जाएँगे, उन्हें कान से कम सुनाई देता है।
राजू (सिगरेट सुलगाते हुए): सोच… अभी तो पहली रात है। दस दिन हैं। दस दिन! हम तो बस झाड़ू-पोंछा करेंगे, बाकी ये दोनों… पूरा विला हिला देंगे। सुबह जब जाएँगे सफाई करने, बिस्तर देखकर ही समझ जाएँगे कितनी तूफानी रात गई।
मोहन (हँसते-हँसते लड़खड़ाते हुए): चादरें तो रोज बदलनी पड़ेंगी भाई। और वो काँच की दीवार… कहीं दाग न लग जाएँ। कल सुबह मैं ही साफ करूँगा, तू बाहर रहना। मैं तो करीब से देख लूँगा निशान।
राजू: हरामी कहीं का! चल, आज रात सोने से पहले एक-एक पैग मार लेते हैं। पहाड़ी वाली। आज की रात तो जश्न की है… किसी और की सुहागरात का जश्न!
दोनों हँसते हुए क्वार्टर्स के दरवाजे पर पहुँचे। लालटेन जलाई, देशी शराब की बोतल खोली।
मोहन: चल, दुल्हन और दूल्हे के नाम!
राजू: और उनकी दस रातों के नाम!
गिलास टकराए। ठ ठ ठ की हँसी। बाहर ब्यास गर्जना कर रही थी, पर उनकी हँसी उसमें भी डूब नहीं रही थी। क्योंकि उन्हें पता था… असली गर्जना तो अभी विला के अन्दर शुरू होने वाली थी।
नशा चढ़ा तो बातें और खुलकर बोली जाने लगीं।
राजू (हँसते हुए): अरे साला, साहब का लंड तो पक्का बड़ा होगा! देखा ना कैसे पैंट में उभार बना हुआ था? जब वो दुल्हन उठा रहे थे, पैंट टाइट हो गई थी पीछे से… गांड की लाइन तक साफ दिख रही थी, पर सामने वो टेंट साफ बना हुआ था। दुल्हन की नजर भी बार-बार वहीं जा रही थी। आज रात जब वो पैंट उतारेंगे ना… दुल्हन के मुँह में पानी आ जाएगा।
मोहन (गिलास पटकते हुए): बिल्कुल! साहब की उँगलियाँ कितनी मोटी-मोटी थीं। सोच, वो उँगलियाँ आज दुल्हन की चूत में घुसेंगी, पहले दो, फिर तीन… दुल्हन की चीख निकलेगी। फिर अपना लंड अन्दर ठूँसेंगे… पूरा का पूरा। पहली बार में ही दुल्हन की चूत फट जाएगी।
राजू: और साहब की छाती… कमीज के अन्दर से बाल झाँक रहे थे। जब दुल्हन को गोद में उठाया तो उसकी छाती दुल्हन की छातियों से रगड़ रही थी। आज रात वो बालों वाली छाती दुल्हन के मुँह पर रगड़ेंगे, दुल्हन चाटेगी, चूसेगी। फिर साहब अपना लंड दुल्हन की छातियों के बीच में डालकर टिटजॉब लेंगे… मंगलसूत्र उछलेगा, लार टपकेगी।
मोहन (आँखें चमकाते हुए): और पीछे से जब चोदेंगे ना… साहब की गांड कितनी टाइट और गोल है, हर धक्के में सिकुड़ेगी। दुल्हन घुटनों पर होगी, चूड़ियाँ खनकेंगी, साहब बाल पकड़कर खींचेंगे और लंड पूरा जड़ तक घुसाएँगे। “ले… ले मेरी रंडी… आज से तू मेरी” बोलते हुए झड़ेंगे अन्दर। दुल्हन की चूत से वीर्य लहराएगा सुबह तक।
राजू (हँसते हुए): और साहब की मूंछें… जब दुल्हन की चूत चाटेंगे तो मूंछें गीली हो जाएँगी। दुल्हन पागल होकर साहब का सिर दबाएगी।
मोहन: दस रातें हैं भाई… दस रातें! पहली रात चूत, दूसरी गांड, तीसरी मुँह… हर दिन नया खेल। सुबह जब हम चादरें बदलने जाएँगे तो गंध से ही पता चल जाएगा… वीर्य, रस, पसीना सब मिला हुआ। काँच की दीवार पर दाग, गलीचे पर स्पॉट… हम साफ करेंगे और जलेंगे।
राजू (गिलास ऊँचा करके): चल साला, आखिरी पैग…साहब के मोटे, लम्बे, लंड के नाम!
मोहन: और उसकी गर्म वीर्य की बौछार के नाम जो आज दुल्हन की चूत, मुँह और गांड में भरेगा!
दोनों ने गिलास एक घूँट में खाली किए। ठ ठ ठ की हँसी फिर गूँजी। बोतल खाली। उनकी जलन पूरी। लालटेन बुझाई।
इधर विला के अंदर।
मुख्य दरवाज़े की कुंडी पड़ी। “क्लिक”।
फायरप्लेस चटकने लगा।
लकड़ी की गर्म, नशीली खुशबू फैल गई।
गुलमोहर अभी भी लाल बनारसी में लिपटी खड़ी थी, जैसे कोई जीती-जागती आग। साड़ी उसके जिस्म से इस तरह चिपकी हुई थी कि हर उभार, हर गोलाइ, हर साँस की लय साफ़ दिख रही थी। मंगलसूत्र उसकी गहरी गर्दन से लटक रहा था, दो भरी हुई छातियों के बीच झूलता। लाल चूड़ियाँ पतली कलाइयों में खनक रही थीं।
उसने शरमाते, फिर भी भूखी नजरों से आर्यन को देखा।
“अब…?” उसकी आवाज़ काँप गई।
आर्यन ने एक कदम बढ़ाया।
“अब सुहागरात है, मेरी गुल… मेरी बीवी। आज तुझे एक-एक साँस, एक-एक रोम तक अपनी बना लूँगा।”
उसने उसे गोद में उठा लिया। लाल साड़ी का पल्लू फर्श पर लहराता हुआ बिछ गया, जैसे खून की नदी।
फिर शुरू हुई वो लम्बी, जंगली, अनन्त रात…
जिसकी गूँज बाहर तक नहीं पहुँची।
अन्दर लकड़ी की गर्म, नशीली खुशबू थी। दीवारें हिमालयी पत्थर की, फर्श पर मोटे कश्मीरी गलीचे, और सामने पूरी दीवार काँच की—उसके पार चाँदनी में नहाई चोटियाँ जैसे कोई पुराना सपना जाग रहा हो। बीच कमरे में किंग-साइज बेड, मखमली सफेद चादरें, चारों कोनों पर लालटेनों की मद्धम सुनहरी रोशनी। बेड के ठीक सामने फायरप्लेस में लाल-नीली लपटें नाच रही थीं, लकड़ियाँ चटक-चटक कर प्रेम की प्राचीन भाषा बोल रही थीं।
गुलमोहर अभी भी लाल बनारसी में लिपटी खड़ी थी—जैसे कोई जीती-जागती आग। साड़ी उसके जिस्म से इस तरह चिपकी हुई थी कि हर उभार, हर गोलाइ, हर साँस की लय साफ़ दिख रही थी। मंगलसूत्र उसकी गहरी गर्दन से नीचे लटक रहा था, दो भरी हुई छातियों के बीच झूलता, हर साँस पर हल्का उछलता। लाल चूड़ियाँ पतली कलाइयों में खनक रही थीं, मानो कह रही हों—आज रात हम नहीं रुकेंगी।
उसने शरमाते, फिर भी भूखी नजरों से आर्यन को देखा।
“अब…?” उसकी आवाज़ काँप गई।
आर्यन ने एक कदम बढ़ाया। उसकी आँखें गुलमोहर के होंठों से नीचे, फिर और नीचे उतरती गईं।
“अब सुहागरात है, मेरी गुल… मेरी बीवी। आज तुझे एक-एक साँस, एक-एक रोम तक अपनी बना लूँगा।”
उसने उसे गोद में उठा लिया। लाल साड़ी का पल्लू फर्श पर लहराता हुआ बिछ गया, जैसे खून की कोई नदी बह निकली हो। बेड पर लिटाते ही आर्यन उसके ऊपर झुक गया। उसकी उँगलियाँ गुलमोहर की कमर पर रेंगती हुईं ब्लाउज़ के नीचे चली गईं। जैसे ही उसने छातियों को छुआ, गुलमोहर की साँस रुक गई, आँखें बंद हो गईं, होंठ काँपे। आर्यन ने ब्लाउज़ के हुक एक-एक कर खोले—हर हुक के साथ गुलमोहर के गले से हल्की सिसकारी निकल रही थी।
जब ब्लाउज़ खुल गया तो उसने उसे धीरे से उतारा। लाल ब्रा के ऊपर से भी उभरी छातियाँ साफ़ दिख रही थीं, निप्पल्स पहले से सख़्त। आर्यन ने ब्रा का हुक पीछे से खोला और उसे भी फेंक दिया। अब गुलमोहर की नंगी छातियाँ उसके सामने थीं—गोरी, भरी हुई, हल्की हिलोर लेती हुईं। उसने एक को मुँह में लिया, जीभ से चूसने लगा, दाँतों से हल्का काटा, फिर गोल-गोल घुमाया। गुलमोहर की पीठ ऊपर को उठ गई, उँगलियाँ आर्यन के बालों में उलझ गईं।
“आह… आर्यन… उफ़्फ़…”
आर्यन नीचे उतरता गया। पेटीकोट का नाड़ा खींचा। साड़ी और पेटीकोट एक साथ फर्श पर गिर गए। अब गुलमोहर सिर्फ़ लाल रेशमी पैंटी और मंगलसूत्र में थी। पैंटी पहले से ही गीली थी—बीच में गहरा धब्बा। आर्यन ने उँगली से उस गीलेपन को सहलाया। गुलमोहर सिहर उठी।
उसने पैंटी भी नीचे सरका दी। अब गुलमोहर पूरी तरह नंगी थी। उसकी चिकनी, गीली चूत आर्यन के सामने खुली थी—होंठ थोड़े फैले, अन्दर से गुलाबी चमक। आर्यन ने मुँह नीचे ले गया। जीभ से पहले हल्का छुआ, फिर पूरा अन्दर घुसा दिया। गुलमोहर की तीखी चीख गूँज गई। उसने आर्यन का सिर अपनी जाँघों से दबा लिया।
“आर्यन… नहीं… वहाँ… आह्ह्ह… मर जाऊँगी…”
आर्यन ने क्लिट को जीभ से रगड़ा, दो उँगलियाँ अन्दर डालकर तेज़ी से अन्दर-बाहर करने लगा। गुलमोहर की कमर बार-बार ऊपर उछल रही थी, चूड़ियाँ पागलों की तरह खनक रही थीं। कुछ ही पलों में वो पहली बार झड़ गई—उसकी चूत से गर्म रस की बौछार निकली, आर्यन ने उसे पूरा पी लिया।
अब आर्यन ने अपने कपड़े उतारे। उसका लंड पूरी तरह तना हुआ था, नसें उभरी हुईं, सिरा गीला चमक रहा था। गुलमोहर ने उसे देखा और डरते-डरते हाथ बढ़ाया। उसने उसे सहलाया, फिर होंठों से छुआ। आर्यन की साँस फट पड़ी।
“गुल… मुँह में ले…”
गुलमोहर ने शरमाते हुए उसे मुँह में लिया। पहले सिर्फ़ सिरा, फिर आधा, फिर जितना समाया। आर्यन के हाथ उसके बालों में थे, धीरे-धीरे धक्के मार रहा था। गुलमोहर की लार उसके लंड पर लहरा रही थी, चूड़ियाँ हर झटके में खनक रही थीं।
फिर आर्यन ने उसे बेड पर लिटाया, टांगें चौड़ी कीं। अपना लंड उसकी चूत पर रगड़ा, गीलेपन में पूरी तरह लथपथ कर लिया।
“तैयार है, गुल?”
गुलमोहर ने सिर्फ़ सिर हिलाया, आँखें बंद।
आर्यन ने धीरे से अन्दर घुसाया—पहले सिरा, फिर आधा, फिर पूरा। गुलमोहर की चीख निकल गई, नाखून उसकी पीठ पर गड़ गए।
“आह्ह… आर्यन… फट रही हूँ… पर… और अन्दर… और ज़ोर से…”
आर्यन ने रिदम पकड़ा—पहले कोमल, जैसे कोई पुराना राग, फिर तेज़, फिर जंगली। हर धक्के में उसका लंड गुलमोहर की चूत की सबसे गहरी दीवार से टकरा रहा था। मंगलसूत्र उसकी छातियों पर उछल रहा था, चूड़ियाँ बेड से टकरा रही थीं, और चाप-चाप-चाप की गीली आवाज़ कमरे में गूँज रही थी।
गुलमोहर बार-बार झड़ रही थी—दूसरी, तीसरी, चौथी बार। हर बार उसकी चूत आर्यन के लंड को और कसकर जकड़ लेती। आखिरकार आर्यन भी नहीं रुका—गुलमोहर की चूत के सबसे गर्म, सबसे गहरे कोने में अपनी सारी गर्मी उड़ेलता हुआ झड़ गया। दोनों एक साथ चीखे, एक-दूसरे से लिपट गए, पसीने और रस से पूरी तरह लथपथ।
रात अभी बहुत लम्बी थी।
आर्यन ने उसे फिर पलटा—इस बार घुटनों के बल। उसकी गांड ऊपर, चूत पीछे से अभी भी वीर्य और रस से चमक रही थी। आर्यन ने फिर घुसाया, इस बार और गहरा, और तेज़। गुलमोहर की चीखें अब दर्द और सुख की मिली-जुली थीं। वो बेड पर, फायरप्लेस के गलीचे पर लोटते हुए, काँच की दीवार से सटाकर, कभी खड़े-खड़े, कभी आर्यन की गोद में—हर जगह, हर मुद्रा में चुदाई करते रहे। कभी उसका लंड उसकी चूत में, कभी मुँह में, कभी छातियों के बीच।
सुबह की पहली सुनहरी किरण जब चोटियों को छूने लगी, तब जाकर दोनों थक कर, चूर-चूर होकर एक-दूसरे से लिपट कर गिरे। गुलमोहर की चूत से आर्यन का वीर्य अभी भी लहरा रहा था, उसकी छातियाँ लाल दाँतों के निशानों से भरी थीं, होंठ सूजे हुए, माँग में सिंदूर पूरी तरह स्मज होकर फैल चुका था, मंगलसूत्र पसीने से उसकी छाती पर चिपका हुआ। आर्यन का हाथ अभी भी उसकी कमर पर कसा हुआ था, जैसे छोड़ना पाप हो।
बाहर ब्यास नदी अब भी गर्जना कर रही थी।
अन्दर सिर्फ़ दो नवविवाहितों की थकी, गहरी साँसें और चूड़ियों की आखिरी सुस्त खनक थी।
दस दिन अभी बाकी थे।
कहानी जारी रहेगी....
✍️निहाल सिंह


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