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Adultery एक पत्नी का सफर
#33
बस्ती का वो छोटा सा कमरा – दोपहर 12:30 से शाम 5:45 तक  
(लगभग 5 घंटे, पर दोनों को लगा जैसे पूरी ज़िंदगी एक पल में सिमट आई हो)

पूजा दरवाज़े पर खड़ी थी।  
नीला सलवार-सूट बदन से चिपक गया था।  
पसीने की बूँदें गर्दन से होती हुईं सूट के गले में समाती जा रही थीं।  
सीने पर गीले धब्बे बन गए थे।  
साँसें तेज़ थीं – डर, अपराधबोध और एक अजीब सी बेचैनी की मिली-जुली।

*पूजा का मन:
“अगर वो सच में कुछ कर ले तो…?  
मैंने ही तो उसे नाली का कीड़ा कहा था…  
मैंने ही तो उसका दिल तोड़ा था…  
अगर आज यहाँ कुछ गलत हुआ तो…  
सारी ज़िंदगी खुद को माफ़ नहीं कर पाऊँगी…”

वो खटखटाती है।  
कोई जवाब नहीं।  
फिर ज़ोर से।  
दरवाज़ा अंदर से खुला हुआ था – हल्का सा धक्का, और खुल गया।

अंदर घना अँधेरा।  
दारू की तेज़ बू।  
फर्श पर राजू पड़ा था।  
हाथ-पाँव फैले हुए।  
एक खाली क्वार्टर पास में लुढ़का हुआ।  
उसका चेहरा पीला, होंठ नीले।  
पूजा का दिल मुँह को आ गया।

“राजू…!!!”  
वो दौड़कर उसके पास बैठ गई।  
हाथ काँप रहे थे।  
उसने उसका सीना टटोला – साँस चल रही थी, धीमी, पर चल रही थी।  
फिर लोटे से पानी लिया और उसके मुँह पर छिड़का।

राजू ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।  
धुंधली नज़र।  
पूजा को देखकर पहले लगा सपना है।  
फिर कड़वाहट भरी हँसी।

“क्यों… सपने में भी आ गई मेरी बेज्ज़ती करने…?  
मैं तो तुम्हें अपना हमदर्द समझता था…  
और तुमने मुझे बस एक नाली का कीड़ा समझा…”

उसकी आवाज़ फटी हुई थी।  
हर शब्द में दारू नहीं, दर्द बोल रहा था।

**राजू का मन:**  
“ये वही पूजा है… जिसकी एक मुस्कुराहट के लिए मैं रात-रात भर जागता था…  
जिसके लिए मैं चाय बनाता था, बिना कुछ लिए…  
और उसने एक पल में मुझे कीड़ा बोल दिया…  
मैं मर क्यों नहीं गया…?”

पूजा की आँखें भर आईं।  
वो उसके गाल पर हाथ रखते हुए बोली,  
“नहीं राजू… ऐसा कुछ नहीं है…  
मैं… मैं सच में यहाँ हूँ…”

राजू ने हाथ बढ़ाया।  
उसके गाल पर उँगलियाँ फेरीं।  
पसीने से गीले।  
फिर चौंका।  
“हैं…? तुम सच में यहाँ हो…?”

“हाँ… देखो… क्या हालत कर रखी है तुमने अपनी…  
उठो ना… प्लीज़…”

उसकी आवाज़ में ममता थी, अपराधबोध था, और बहुत सारा डर।

राजू ने खुद को दीवार से टिकाया।  
सिर हिलाया।  
“अरे चले जाओ यहाँ से…  
तुम अमीर लोग क्या जानो हम गरीबों का दर्द…  
बस एक मज़ाक किया था…  
और तुमने मुझे क्या-क्या बोल दिया…  
हाँ… मेरी औकात यही है…  
ऐसे ही पड़े रहने की…”

उसकी आँखें नम थीं।  
वो रो नहीं रहा था – मर्द था ना।  
पर उसकी आवाज़ में वो दर्द था जो सालों से दबा हुआ था।

पूजा ने उसके गालों पर हाथ रखा।  
पसीना, दारू की बू, पर उसे कुछ नहीं लग रहा था।  
“नहीं राजू… ऐसा मत कहो…  
मेरे साथ क्या बीती थी, तुम्हें नहीं पता…”

“तुम निकल जाओ मेरे घर से…  
शक्ल भी नहीं देखनी थी ना तुमने मेरी…?  
जाओ मैडम जी… जाओ…”

वो कोने में सरका और दीवार से सटकर लेट गया।  
जैसे दुनिया से मुँह छिपा लिया हो।

पूजा ने एक पल सोचा।  
फिर उसके बगल में फर्श पर ही लेट गई।  
दोनों कंधे से कंधा मिलाकर।  
सूट का दुपट्टा नीचे सरक गया।  
पसीने से भीगा हुआ सीना ऊपर-नीचे हो रहा था।

“देखो… तुम्हें नहीं मिलना मुझसे, मत मिलो…  
बस एक बार सुन लो…”

उसकी आवाज़ काँप रही थी।  
आँसू गालों पर लुढ़क रहे थे।

“कल मैं अपना फ़ोन ठीक कराने मुन्ना की दुकान पर गई थी…  
उसने मेरे फ़ोन से हमारी चैट्स… हमारी वो फोटोज़… सब निकाल लिया…  
और मुझे ब्लैकमेल किया…”

राजू ने एकदम से उसकी ओर देखा।  
आँखों में डर, गुस्सा, और रहम।

“फिर… फिर उसने मेरे बदन को छुआ…  
मेरी इज़्ज़त के साथ खेला…  
मुझे दुकान पर ही आधा नंगा कर दिया…  
मैं रो रही थी… गिड़गिड़ा रही थी…  
पर वो हँस रहा था…”

पूजा की आवाज़ फट गई।  
वो सिसकियाँ लेने लगी।

“वो तो सिक्युरिटी समय पर आ गई…  
वरना आज मैं यहाँ नहीं होती…  
मैं खुद को मार देती…”

राजू ने अचानक चीखा,  
“नहीं…!!!”

और पूजा को ज़ोर से गले लगा लिया।  
जैसे कोई टूटा हुआ बच्चा अपनी माँ को पकड़ ले।  
दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे।  
राजू की छाती पर पूजा का सिर।  
उसकी सिसकियाँ राजू के कंधे भिगो रही थीं।

“मुझे माफ़ कर दो पूजा…  
मुझे नहीं पता था तुम ये सब सह रही हो…  
मैं उस मुन्ना को जान से मार डालूँगा…”

पूजा ने उसके गालों को पोंछा।  
उसके आँसुओं से भीगे हाथों से।  
“वो जेल में है… सिक्युरिटी सज़ा देगी…  
और मेरी भी गलती है…  
मुझे तुमसे गलत नहीं बोलना चाहिए था…  
आई एम सॉरी राजू…”

“नहीं… आप क्यों सॉरी बोल रही हो मैडम…”

“फिर मैडम…?”  
पूजा ने मुस्कुराने की कोशिश की।  
“मैं जा रही हूँ…”

उठने लगी तो राजू ने उसका हाथ पकड़ा और ज़ोर से खींचा।  
पूजा उसके ऊपर गिर पड़ी।  
दोनों की साँसें एक-दूसरे पर।  
पूजा का पसीने से भीगा सीना राजू की छाती से सटा हुआ।

“सॉरी पूजा… क्या तुमने मुझे माफ़ किया…?”

“मैंने तुम्हें कल के लिए किया…  
पर कहा तुमने मुझे किया माफ…?”

“हाँ पूजा… मैंने तुम्हें माफ़ कर दिया…”

“पर कल के लिए क्या मतलब…?”

“मतलब ये… कि आज तुम ऐसे लेटे हो, दारू पीके…  
अगर कुछ हो जाता तो…?”

“तो क्या… मर ही तो जाता…”

पूजा ने तुरंत अपना हाथ उसके मुँह पर रख दिया।  
“मरेंगे तुम्हारे दुश्मन…!”

“अच्छा जी…?”

“हाँ जी…”

दोनों की साँसें तेज़।  
होंठ करीब।  
और फिर…  
एक गहरा, लंबा, बहुत लंबा किस।  
जैसे सालों से बिछड़े हों।  
राजू के मुँह से दारू की महक, बदन से पसीना और शराब की बू…  
पर पूजा को कुछ नहीं लग रहा था।  
उसके हाथ राजू की पीठ पर फिर रहे थे।  
राजू के हाथ पूजा की कमर पर, पसीने से भीगे सूट को चिपकाते हुए।

*पूजा सोचती है
“ये गलत है…  
मैं शादीशुदा हूँ…  
पर इस पल में…  
मुझे कोई नहीं बचा रहा…  
मैं खुद को बचा रही हूँ…  
इसके दर्द में डूबकर…  
अपना दर्द भूल रही हूँ…”

**राजू मन मे:
“ये सपना नहीं है…  
ये वही पूजा है…  
जो मेरे लिए रो रही है…  
जो मेरे गंदे बदन को गले लगा रही है…  
मैं इसके लायक नहीं…  
पर इस पल में…  
मैं इसे कभी नहीं छोड़ूँगा…”

किस ख़त्म हुआ।  
दोनों की आँखें बंद।  
माथे से माथा टिका हुआ।

राजू ने फुसफुसाया,  
“तुम मेरे लिए इतना कुछ…  
और मैंने तुम्हें जाने को बोला…?”

पूजा ने उसका मुँह बंद कर दिया।  
“बस… अब एक शब्द नहीं…  
बस मुझे गले लगा लो…  
और मुझे माफ़ कर दो…”

राजू ने उसे और ज़ोर से गले लगाया।  
जैसे पूरी दुनिया से बचा रहा हो।

कमरे में सिर्फ़ उनकी साँसें थीं।  
और बाहर की गर्मी में भी…  
दो दिल बहुत ठंडे पड़ चुके थे।  
एक-दूसरे की गर्मी में पिघलकर।  
पूरी तरह।
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RE: एक पत्नी का सफर - by Tiska jay - 25-11-2025, 10:31 PM



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