25-11-2025, 04:37 PM
Episode 6: तारे हैं बाराती, चाँदनी है ये बारात
हरिया ठाकुर — नाम सुनते ही गाँव के आस-पास के दस-बारह गाँवों में लोग सहम जाते थे। उम्र साठ के पार, लेकिन कद अभी भी सीधा, आँखें लाल-लाल, मूँछें घनी और सफ़ेद, हाथ में हमेशा चाँदी की मूठ वाली लाठी।
जमीन उसकी थी सैकड़ों बीघा, लेकिन पैसा उससे कहीं ज्यादा। आजादी से पहले उसके बाप-दादा अंग्रेजों के मुखबिर थे। जमीनें हड़पते थे, गरीबों को कर्ज़ देते थे और फिर सूद के जाल में फँसाकर सब छीन लेते थे। हरिया ने वही विरासत संभाली, बस तरीके बदल लिए।
सत्तर-अस्सी के दशक में हरिया ने शराब की अवैध भट्टियाँ लगवाईं। गाँव की औरतों को पहले कर्ज़ दिया, फिर जब वापस न दे पाईं तो उनके मर्दों को मार-मारकर अधमरा कर दिया। कई घर उजड़ गए। नब्बे के दशक में उसने देह-व्यापार का धंधा शुरू किया। गाँव की गरीब, अनाथ या सौतेली माँओं वाली लड़कियों को पहले डराया-धमकाया, फिर बेच दिया। सिक्युरिटी? उसकी जेब में थी। दो थानेदार तो उसके यहाँ नौकरों की तरह रहते थे।
लोग कहते हैं कि उसके घर के पीछे वाले पुराने कुएँ में दस-बारह लाशें दबी हैं — जिन्होंने विरोध किया था। कोई सबूत नहीं, क्योंकि गवाह जीवित नहीं बचते।
शादी नहीं की हरिया ने कभी। कहता था, “औरत तो बस इस्तेमाल की चीज है।” उसके यहाँ दो-तीन रखैलें रहती थीं, जो बाहर नहीं निकलती थीं। गाँव की औरतें आज भी उसके नाम से बच्चों को डराती हैं — “सो जा नहीं तो हरिया ठाकुर आ जाएगा।”
अब बूढ़ा हो चला है, लेकिन हवस नहीं गई। उल्टा और भयानक हो गई है। पचास-साठ हजार में एक जवान लड़की खरीदता है, कुछ महीने रखता है, फिर बेच देता है दिल्ली या दुबई के कोठे पर। गुलमोहर उसकी लिस्ट में सबसे ऊपर थी — गोरा रंग, लंबी, जवान, और सबसे जरूरी — कोई अपना नहीं।
लोग कहते हैं कि हरिया ठाकुर मरने से पहले एक आखिरी बड़ा सौदा करना चाहता है — ताकि उसका नाम हमेशा के लिए काला रहे। और इस बार उसने गलती की — उसने गुलमोहर को चुना, जिसके पास अब आर्यन है… और आर्यन के पास उसकी हिम्मत।
अब हरिया ठाकुर की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है।
उधर मनाली हाइवे पर
कार हाईवे पर तेजी से दौड़ रही थी। सूरज ढलने को था, हिमालय की लंबी छायाएँ सड़क पर फैल रही थीं, जैसे कोई काला कालीन बिछाया जा रहा हो। ठंडी हवा खिड़कियों से अंदर झोंके मार रही थी, गुलमोहर के बाल उसकी हवा में लहरा रहे थे, कभी उसके गालों को छूते, कभी होंठों को। आर्यन का एक हाथ स्टीयरिंग पर था, दूसरा गुलमोहर की जांघ पर—गहरी काली साड़ी के ऊपर से, उँगलियाँ धीरे-धीरे कपड़े में दब रही थीं।
तभी फोन बजा। रोहित।
"भाई, गुंडे अभी दिल्ली-NCR में ही मुँह मार रहे हैं। तुम बेफिक्र रहो। मनाली का हाइडअवे रिजॉर्ट बुक है—प्राइवेट विला।
पहाड़, बर्फ, नदी और तुम दोनों। एंजॉय करो।"
आर्यन ने होंठ सिकोड़े, मुस्कुराया, "समझ गया। थैंक्स भाई।"
फोन कटा। गुलमोहर ने उत्सुकता से पूछा, "क्या कहा?"
आर्यन ने उसकी जांघ पर हाथ और ऊपर सरका दिया, साड़ी का पल्लू हल्का खिसका, "कहा कि अब 10 दिन तक दुनिया हमें ढूँढ भी नहीं पाएगी। सिर्फ तू, मैं और ये पहाड़।"
गुलमोहर शर्मा कर सिकुड़ गई, किंतु उसकी आँखों में एक अजीब-सी बेचैनी थी। उसने आर्यन का हाथ हल्के से दबाया, फिर खिड़की की ओर मुँह कर लिया। हवा में देवदार की महक थी, पर उसके मन में कुछ और ही चल रहा था।
आधे घंटे तक कार में सन्नाटा रहा। फिर गुलमोहर ने धीरे से कहा, आवाज काँपती हुई,
"आर्यन… तुमने रोहित भैया के सामने मुझे बीवी कहा था… पर सच में… क्या तुम मुझसे शादी करना चाहते हो? या बस…" उसने रुक कर साँस ली, "बस 10 दिन की मौज के लिए ले जा रहे हो?"
आर्यन का चेहरा एकदम सख्त हो गया। उसने ब्रेक नहीं मारा, बस स्पीड थोड़ी कम की। जवाब नहीं दिया। गुलमोहर की आँखें नम हो आईं।
"मैं एक कमरे में तुम्हारे साथ रहूँगी… बिना मंगलसूत्र, बिना सिंदूर… मुझे अच्छा नहीं लग रहा। लगता है मैं कोई रखैल हूँ… तुम्हारी नहीं।"
शब्द तीर की तरह लगे। आर्यन की उँगलियाँ स्टीयरिंग पर सफ़ेद पड़ गईं। उसने होंठ भींचे, पर चुप रहा। गुलमोहर खिड़की से बाहर देखती रही—उसके गाल पर एक आंसू लुढ़का, हवा ने उसे उड़ा दिया।
फिर अचानक, मनाली से कोई 15 किलोमीटर पहले, पहाड़ी पर एक प्राचीन मंदिर दिखा। ऊँची चोटी पर, देवदार के घने जंगल के बीच, घंटियों की मधुर ध्वनि हवा में तैर रही थी। मंदिर प्रसिद्ध पर बेहद पवित्र स्थान: श्री शिव-पार्वती विवाह मंदिर। कहते हैं यहाँ शिव-पार्वती ने गंधर्व विवाह किया था।
आर्यन ने अचानक ब्रेक मारा। कार रुकी। धूल उड़ी।
गुलमोहर चौंकी, "क्या हुआ?"
आर्यन ने उसका हाथ कस कर पकड़ा, दरवाजा खोला और बाहर खींच लिया। उसका चेहरा पत्थर जैसा था, पर आँखें जल रही थीं।
"तेरे सारे सवालों का जवाब यहाँ है। चल।"
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए गुलमोहर का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। ठंडी हवा में उसकी काली साड़ी लहरा रही थी, पर मन में डर था—कहीं आर्यन गुस्से में कुछ…
मंदिर के गर्भगृह में पहुँचे। प्राचीन शिवलिंग, पार्वती की मूर्ति, दीवारों पर उकेरी हुई उनकी प्रेम कहानी। एक बुजुर्ग पंडित जी पूजा कर रहे थे।
आर्यन ने बिना एक पल गँवाए कहा,
"पंडित जी, हम आज शादी करना चाहते हैं। अभी। सात फेरे। कोई मेहमान नहीं, कोई रजिस्ट्रेशन नहीं। बस शिव-पार्वती के सामने।"
गुलमोहर की साँस रुक गई। उसने अपनी काली साड़ी देखी। फिर काँपती आवाज में बोली,
"पर… ये काली साड़ी… दुल्हन लाल पहनती है… मैं… मैं तैयार नहीं हूँ।"
पंडित जी मुस्कुराए, "बेटी, सही कह रही हो। काला अशुभ है विवाह में। लाल साड़ी, सिंदूर, चूड़ियाँ, मंगलसूत्र—ये सब सुहागन का श्रृंगार है।"
आर्यन ने एक पल सोचा, फिर दृढ़ स्वर में कहा, "ठीक है। इंतज़ाम हो जाएगा।"
पंडित जी बोले, "नीचे पार्किंग में अभी एक नवविवाहित जोड़ा आया है—हनीमून मनाकर लौट रहा है। मैं बात करता हूँ।"
पार्किंग में एक सफेद इनोवा खड़ी थी। दुल्हन लाल बनारसी में थी, दूल्हा उसके कंधे पर हाथ रखे हँस रहा था।
आर्यन ने हाथ जोड़कर कहा,
"बहन, हमें आपकी मदद चाहिए। मेरी… मेरी होने वाली बीवी के पास लाल साड़ी नहीं है। अगर आपके पास कोई एक्स्ट्रा साड़ी दे सकें… हम आज यहीं मंदिर में शादी कर रहे हैं।"
दुल्हन की आँखें चमक उठीं। उसने अपनी सूटकेस खोली, एक नई लाल बंगाली तांत की साड़ी निकाली—सोने की कढ़ाई, भारी बॉर्डर।
"ये मेरी स्पेयर थी। ले लो। और हाँ… ये मेरी शादी वाली चूड़ियाँ भी ले लो, और मंगलसूत्र भी है मेरे पास एक्स्ट्रा ।आज तुम्हारी शादी है, मेरा आशीर्वाद समझ रख लो।"
गुलमोहर की आँखें भर आईं। उसने दुल्हन के पैर छुए।
मंदिर के पीछे एक छोटा-सा कमरा था। गुलमोहर अंदर गई।
साड़ी बदली। लाल रंग उसके गेहुँए रंग पर ऐसा चमका जैसे कोई अग्नि प्रज्वलित हो गई हो। साड़ी को कमर पर लपेटा—पतली कमर और गहरी नाभि पर बॉर्डर रुका। ब्लाउज़ टाइट था, कढ़ाई वाले कप से उसके उरोज और भी उभरे। पल्लू कंधे पर। उसने दुल्हन से मिली लाल चूड़ियाँ पहनीं, कानों में सोने के झुमके। काजल, बिंदी, लाल लिपस्टिक।
आईने में देखा—वो कोई और ही थी। दुल्हन। साक्षात् पार्वती।
बाहर आई तो आर्यन की साँस रुक गई।
वो उसे देखता रह गया—लाल साड़ी में लिपटी उसकी गुलमोहर, जैसे कोई स्वप्न साकार हो गया हो।
"गुल… तू… तू देवी लग रही है। मेरी।"
फिर मंदिर में।
हवन कुंड जलाया गया। लकड़ियाँ चटक रही थीं, धुआँ ऊपर उठ रहा था।
पंडित जी ने मंत्र शुरू किए।
पहला फेरा।
आर्यन ने गुलमोहर का हाथ थामा, धीरे से कहा, "धर्म के पथ पर… मैं तेरी रक्षा करूँगा, हर जन्म में।"
गुलमोहर की आँखें नम, पर होंठों पर मुस्कान।
दूसरा फेरा।
"अर्थ के लिए… तेरी हर इच्छा पूरी करूँगा। तुझे कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होगी।"
तीसरा फेरा।
आर्यन ने उसकी कमर पर हाथ रखा, धीरे से कान में फुसफुसाया, "काम के लिए… तेरी हर रात को स्वर्ग बनाऊँगा।"
गुलमोहर का चेहरा लाल हो गया, चूड़ियाँ खनकीं।
चौथा, पाँचवाँ, छठा, सातवाँ।
फेरे पूरे हुए।
आर्यन ने मंगलसूत्र उठाया—सोने का, काले-सफेद मोतियों वाला। गुलमोहर ने सिर झुकाया। उसने गले में डाला, हुक बंद किया। फिर सिंदूर की डिब्बी ली। लाल सिंदूर उसकी माँग में भरा—गहराई तक।
"अब तू मेरी पत्नी है। कानून भले ही बाद में माने, शिव-पार्वती आज गवाह हैं।"
गुलमोहर ने उसकी छाती पर सिर रख दिया, फफक कर रो पड़ी—खुशी के आँसू।
"मैं… तेरी बीवी हूँ… सच में।"
पंडित जी ने अंतिम मंत्र पढ़ा, "ॐ नमः शिवाय… यह जोड़ा सदा सुखी रहे।"
बाहर निकले। सूरज डूब चुका था, पर आकाश में लालिमा बाकी थी—जैसे गुलमोहर की साड़ी का प्रतिबिंब। नदी की कल-कल, घंटियों की गूँज, और पहाड़ खामोश गवाह बने खड़े थे।
कार में बैठे। अब गुलमोहर का मंगलसूत्र चमक रहा था, चूड़ियाँ हर हरकत में खनक रही थीं। आर्यन ने उसका हाथ चूमा।
"श्रीमती आर्यन सिंह… अब हनीमून शुरू।"
गुलमोहर ने शरमाते हुए उसकी जांघ पर हाथ रखा, धीरे से कहा,
"जल्दी चलाओ… विला पहुँचो… तुम्हारी बीवी अब इंतज़ार नहीं कर सकती।"
कार फिर दौड़ी।
इस बार सन्नाटा नहीं—चूड़ियों की खनक, दो धड़कनों की एक लय, और मनाली की ठंडी रात का स्वागत।
कहानी जारी रहेगी...
हरिया ठाकुर — नाम सुनते ही गाँव के आस-पास के दस-बारह गाँवों में लोग सहम जाते थे। उम्र साठ के पार, लेकिन कद अभी भी सीधा, आँखें लाल-लाल, मूँछें घनी और सफ़ेद, हाथ में हमेशा चाँदी की मूठ वाली लाठी।
जमीन उसकी थी सैकड़ों बीघा, लेकिन पैसा उससे कहीं ज्यादा। आजादी से पहले उसके बाप-दादा अंग्रेजों के मुखबिर थे। जमीनें हड़पते थे, गरीबों को कर्ज़ देते थे और फिर सूद के जाल में फँसाकर सब छीन लेते थे। हरिया ने वही विरासत संभाली, बस तरीके बदल लिए।
सत्तर-अस्सी के दशक में हरिया ने शराब की अवैध भट्टियाँ लगवाईं। गाँव की औरतों को पहले कर्ज़ दिया, फिर जब वापस न दे पाईं तो उनके मर्दों को मार-मारकर अधमरा कर दिया। कई घर उजड़ गए। नब्बे के दशक में उसने देह-व्यापार का धंधा शुरू किया। गाँव की गरीब, अनाथ या सौतेली माँओं वाली लड़कियों को पहले डराया-धमकाया, फिर बेच दिया। सिक्युरिटी? उसकी जेब में थी। दो थानेदार तो उसके यहाँ नौकरों की तरह रहते थे।
लोग कहते हैं कि उसके घर के पीछे वाले पुराने कुएँ में दस-बारह लाशें दबी हैं — जिन्होंने विरोध किया था। कोई सबूत नहीं, क्योंकि गवाह जीवित नहीं बचते।
शादी नहीं की हरिया ने कभी। कहता था, “औरत तो बस इस्तेमाल की चीज है।” उसके यहाँ दो-तीन रखैलें रहती थीं, जो बाहर नहीं निकलती थीं। गाँव की औरतें आज भी उसके नाम से बच्चों को डराती हैं — “सो जा नहीं तो हरिया ठाकुर आ जाएगा।”
अब बूढ़ा हो चला है, लेकिन हवस नहीं गई। उल्टा और भयानक हो गई है। पचास-साठ हजार में एक जवान लड़की खरीदता है, कुछ महीने रखता है, फिर बेच देता है दिल्ली या दुबई के कोठे पर। गुलमोहर उसकी लिस्ट में सबसे ऊपर थी — गोरा रंग, लंबी, जवान, और सबसे जरूरी — कोई अपना नहीं।
लोग कहते हैं कि हरिया ठाकुर मरने से पहले एक आखिरी बड़ा सौदा करना चाहता है — ताकि उसका नाम हमेशा के लिए काला रहे। और इस बार उसने गलती की — उसने गुलमोहर को चुना, जिसके पास अब आर्यन है… और आर्यन के पास उसकी हिम्मत।
अब हरिया ठाकुर की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है।
उधर मनाली हाइवे पर
कार हाईवे पर तेजी से दौड़ रही थी। सूरज ढलने को था, हिमालय की लंबी छायाएँ सड़क पर फैल रही थीं, जैसे कोई काला कालीन बिछाया जा रहा हो। ठंडी हवा खिड़कियों से अंदर झोंके मार रही थी, गुलमोहर के बाल उसकी हवा में लहरा रहे थे, कभी उसके गालों को छूते, कभी होंठों को। आर्यन का एक हाथ स्टीयरिंग पर था, दूसरा गुलमोहर की जांघ पर—गहरी काली साड़ी के ऊपर से, उँगलियाँ धीरे-धीरे कपड़े में दब रही थीं।
तभी फोन बजा। रोहित।
"भाई, गुंडे अभी दिल्ली-NCR में ही मुँह मार रहे हैं। तुम बेफिक्र रहो। मनाली का हाइडअवे रिजॉर्ट बुक है—प्राइवेट विला।
पहाड़, बर्फ, नदी और तुम दोनों। एंजॉय करो।"
आर्यन ने होंठ सिकोड़े, मुस्कुराया, "समझ गया। थैंक्स भाई।"
फोन कटा। गुलमोहर ने उत्सुकता से पूछा, "क्या कहा?"
आर्यन ने उसकी जांघ पर हाथ और ऊपर सरका दिया, साड़ी का पल्लू हल्का खिसका, "कहा कि अब 10 दिन तक दुनिया हमें ढूँढ भी नहीं पाएगी। सिर्फ तू, मैं और ये पहाड़।"
गुलमोहर शर्मा कर सिकुड़ गई, किंतु उसकी आँखों में एक अजीब-सी बेचैनी थी। उसने आर्यन का हाथ हल्के से दबाया, फिर खिड़की की ओर मुँह कर लिया। हवा में देवदार की महक थी, पर उसके मन में कुछ और ही चल रहा था।
आधे घंटे तक कार में सन्नाटा रहा। फिर गुलमोहर ने धीरे से कहा, आवाज काँपती हुई,
"आर्यन… तुमने रोहित भैया के सामने मुझे बीवी कहा था… पर सच में… क्या तुम मुझसे शादी करना चाहते हो? या बस…" उसने रुक कर साँस ली, "बस 10 दिन की मौज के लिए ले जा रहे हो?"
आर्यन का चेहरा एकदम सख्त हो गया। उसने ब्रेक नहीं मारा, बस स्पीड थोड़ी कम की। जवाब नहीं दिया। गुलमोहर की आँखें नम हो आईं।
"मैं एक कमरे में तुम्हारे साथ रहूँगी… बिना मंगलसूत्र, बिना सिंदूर… मुझे अच्छा नहीं लग रहा। लगता है मैं कोई रखैल हूँ… तुम्हारी नहीं।"
शब्द तीर की तरह लगे। आर्यन की उँगलियाँ स्टीयरिंग पर सफ़ेद पड़ गईं। उसने होंठ भींचे, पर चुप रहा। गुलमोहर खिड़की से बाहर देखती रही—उसके गाल पर एक आंसू लुढ़का, हवा ने उसे उड़ा दिया।
फिर अचानक, मनाली से कोई 15 किलोमीटर पहले, पहाड़ी पर एक प्राचीन मंदिर दिखा। ऊँची चोटी पर, देवदार के घने जंगल के बीच, घंटियों की मधुर ध्वनि हवा में तैर रही थी। मंदिर प्रसिद्ध पर बेहद पवित्र स्थान: श्री शिव-पार्वती विवाह मंदिर। कहते हैं यहाँ शिव-पार्वती ने गंधर्व विवाह किया था।
आर्यन ने अचानक ब्रेक मारा। कार रुकी। धूल उड़ी।
गुलमोहर चौंकी, "क्या हुआ?"
आर्यन ने उसका हाथ कस कर पकड़ा, दरवाजा खोला और बाहर खींच लिया। उसका चेहरा पत्थर जैसा था, पर आँखें जल रही थीं।
"तेरे सारे सवालों का जवाब यहाँ है। चल।"
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए गुलमोहर का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। ठंडी हवा में उसकी काली साड़ी लहरा रही थी, पर मन में डर था—कहीं आर्यन गुस्से में कुछ…
मंदिर के गर्भगृह में पहुँचे। प्राचीन शिवलिंग, पार्वती की मूर्ति, दीवारों पर उकेरी हुई उनकी प्रेम कहानी। एक बुजुर्ग पंडित जी पूजा कर रहे थे।
आर्यन ने बिना एक पल गँवाए कहा,
"पंडित जी, हम आज शादी करना चाहते हैं। अभी। सात फेरे। कोई मेहमान नहीं, कोई रजिस्ट्रेशन नहीं। बस शिव-पार्वती के सामने।"
गुलमोहर की साँस रुक गई। उसने अपनी काली साड़ी देखी। फिर काँपती आवाज में बोली,
"पर… ये काली साड़ी… दुल्हन लाल पहनती है… मैं… मैं तैयार नहीं हूँ।"
पंडित जी मुस्कुराए, "बेटी, सही कह रही हो। काला अशुभ है विवाह में। लाल साड़ी, सिंदूर, चूड़ियाँ, मंगलसूत्र—ये सब सुहागन का श्रृंगार है।"
आर्यन ने एक पल सोचा, फिर दृढ़ स्वर में कहा, "ठीक है। इंतज़ाम हो जाएगा।"
पंडित जी बोले, "नीचे पार्किंग में अभी एक नवविवाहित जोड़ा आया है—हनीमून मनाकर लौट रहा है। मैं बात करता हूँ।"
पार्किंग में एक सफेद इनोवा खड़ी थी। दुल्हन लाल बनारसी में थी, दूल्हा उसके कंधे पर हाथ रखे हँस रहा था।
आर्यन ने हाथ जोड़कर कहा,
"बहन, हमें आपकी मदद चाहिए। मेरी… मेरी होने वाली बीवी के पास लाल साड़ी नहीं है। अगर आपके पास कोई एक्स्ट्रा साड़ी दे सकें… हम आज यहीं मंदिर में शादी कर रहे हैं।"
दुल्हन की आँखें चमक उठीं। उसने अपनी सूटकेस खोली, एक नई लाल बंगाली तांत की साड़ी निकाली—सोने की कढ़ाई, भारी बॉर्डर।
"ये मेरी स्पेयर थी। ले लो। और हाँ… ये मेरी शादी वाली चूड़ियाँ भी ले लो, और मंगलसूत्र भी है मेरे पास एक्स्ट्रा ।आज तुम्हारी शादी है, मेरा आशीर्वाद समझ रख लो।"
गुलमोहर की आँखें भर आईं। उसने दुल्हन के पैर छुए।
मंदिर के पीछे एक छोटा-सा कमरा था। गुलमोहर अंदर गई।
साड़ी बदली। लाल रंग उसके गेहुँए रंग पर ऐसा चमका जैसे कोई अग्नि प्रज्वलित हो गई हो। साड़ी को कमर पर लपेटा—पतली कमर और गहरी नाभि पर बॉर्डर रुका। ब्लाउज़ टाइट था, कढ़ाई वाले कप से उसके उरोज और भी उभरे। पल्लू कंधे पर। उसने दुल्हन से मिली लाल चूड़ियाँ पहनीं, कानों में सोने के झुमके। काजल, बिंदी, लाल लिपस्टिक।
आईने में देखा—वो कोई और ही थी। दुल्हन। साक्षात् पार्वती।
बाहर आई तो आर्यन की साँस रुक गई।
वो उसे देखता रह गया—लाल साड़ी में लिपटी उसकी गुलमोहर, जैसे कोई स्वप्न साकार हो गया हो।
"गुल… तू… तू देवी लग रही है। मेरी।"
फिर मंदिर में।
हवन कुंड जलाया गया। लकड़ियाँ चटक रही थीं, धुआँ ऊपर उठ रहा था।
पंडित जी ने मंत्र शुरू किए।
पहला फेरा।
आर्यन ने गुलमोहर का हाथ थामा, धीरे से कहा, "धर्म के पथ पर… मैं तेरी रक्षा करूँगा, हर जन्म में।"
गुलमोहर की आँखें नम, पर होंठों पर मुस्कान।
दूसरा फेरा।
"अर्थ के लिए… तेरी हर इच्छा पूरी करूँगा। तुझे कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होगी।"
तीसरा फेरा।
आर्यन ने उसकी कमर पर हाथ रखा, धीरे से कान में फुसफुसाया, "काम के लिए… तेरी हर रात को स्वर्ग बनाऊँगा।"
गुलमोहर का चेहरा लाल हो गया, चूड़ियाँ खनकीं।
चौथा, पाँचवाँ, छठा, सातवाँ।
फेरे पूरे हुए।
आर्यन ने मंगलसूत्र उठाया—सोने का, काले-सफेद मोतियों वाला। गुलमोहर ने सिर झुकाया। उसने गले में डाला, हुक बंद किया। फिर सिंदूर की डिब्बी ली। लाल सिंदूर उसकी माँग में भरा—गहराई तक।
"अब तू मेरी पत्नी है। कानून भले ही बाद में माने, शिव-पार्वती आज गवाह हैं।"
गुलमोहर ने उसकी छाती पर सिर रख दिया, फफक कर रो पड़ी—खुशी के आँसू।
"मैं… तेरी बीवी हूँ… सच में।"
पंडित जी ने अंतिम मंत्र पढ़ा, "ॐ नमः शिवाय… यह जोड़ा सदा सुखी रहे।"
बाहर निकले। सूरज डूब चुका था, पर आकाश में लालिमा बाकी थी—जैसे गुलमोहर की साड़ी का प्रतिबिंब। नदी की कल-कल, घंटियों की गूँज, और पहाड़ खामोश गवाह बने खड़े थे।
कार में बैठे। अब गुलमोहर का मंगलसूत्र चमक रहा था, चूड़ियाँ हर हरकत में खनक रही थीं। आर्यन ने उसका हाथ चूमा।
"श्रीमती आर्यन सिंह… अब हनीमून शुरू।"
गुलमोहर ने शरमाते हुए उसकी जांघ पर हाथ रखा, धीरे से कहा,
"जल्दी चलाओ… विला पहुँचो… तुम्हारी बीवी अब इंतज़ार नहीं कर सकती।"
कार फिर दौड़ी।
इस बार सन्नाटा नहीं—चूड़ियों की खनक, दो धड़कनों की एक लय, और मनाली की ठंडी रात का स्वागत।
कहानी जारी रहेगी...
✍️निहाल सिंह


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