24-11-2025, 11:56 PM
(This post was last modified: 25-11-2025, 12:06 AM by Tiska jay. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
हॉस्टल, शाम 6:30 बजे
पूजा कमरे में घुसी।
दरवाज़ा बंद किया।
चटकनी लगाई।
फिर बेड पर गिर पड़ी।
साड़ी अभी भी वही गुलाबी थी, पर अब उसमें मुन्ना की गंदी उँगलियों के निशान थे।
ब्लाउज़ का एक हुक टूटा हुआ था।
पेटीकोट की नाड़ी ढीली।
होंठ सूजे हुए।
आँखें लाल।
वो तकिए को गले लगाकर रोने लगी।
“संजय… मुझे माफ़ कर दो… मैं कितनी गंदी हो गई…”
हॉस्टल आते वक्त राजू मिला था।
वो दूर से देखकर मुस्कुराया था।
“अरे पूजा… आज तो बहुत सेक्सी लग रही हो…
खा ही जाऊँगा तुम्हें… मौका दो तो…”
उस वक्त पूजा के अंदर जो आग भरी थी – मुन्ना की, अपनी बेबसी की – वो राजू पर फूट पड़ी।
“अपनी औकात में रहो थोड़ा!
क्या मैंने मीठी बातें कर दीं तो सिर चढ़ गए?
हाथ दिया तो गला पकड़ने लगे!
निकल जाओ यहाँ से… और दोबारा शक्ल मत दिखाना!”
राजू का चेहरा लटक गया।
“पूजा… मैं तो मज़ाक…”
पर पूजा ने दरवाज़ा बंद कर दिया था।
अब कमरे में अकेली…
पछतावा शुरू हो गया।
“मैंने क्या कर दिया…
राजू ने तो कभी ज़बरदस्ती नहीं की थी…
वो तो बस… दर्द बाँट रहे थे हम…
मैंने अपना गुस्सा उस पर निकाल दिया…”
संजय को कॉल किया।
पहली बार – नहीं उठा।
दूसरी बार – काट दिया।
तीसरी बार – मैसेज आया:
संजय:- मीटिंग में हूँ जान। रात को बात करते हैं। लव यू। ❤️
पूजा ने फोन साइड फेंका।
“कोई नहीं है मेरा…”
फिर राजू का ख़याल आया।
“गलती मेरी थी…
उसे माफ़ी माँग लूँ…”
राजू को कॉल किया।
पहली बार – रिंग गई, फिर कट।
दूसरी बार – स्विच ऑफ।
पूजा फिर रो पड़ी।
“मैंने सब खो दिया…
संजय दूर…
राजू नाराज़…
मुन्ना जैसा हरामी…
मैं अकेली… पूरी तरह अकेली…”
विक्रम का नंबर स्क्रीन पर आया-गया।
उसने सोचा – “अगर इसे कॉल कर दूँ…
मैं खुद को रोक नहीं पाऊँगी…
फिर वही गलती न कर बैठू खुद को रोक नहीं पाऊँगी उसके साथ। "
तकिया गले लगाया।
मुँह में दबाकर फूट-फूट कर रोने लगी।
“मैं मर क्यों नहीं जाती…”
दरवाज़े पर खटखट।
“पूजा… दरवाज़ा खोल ना यार…”
पूजा ने आँसू पोंछे।
दरवाज़ा खोला।
रेणु अंदर आई।
पूजा को देखते ही चौंकी।
“अरे… ये क्या हाल बना रखा है?
आँखें लाल… साड़ी फटी हुई…
क्या हुआ रे?”
पूजा ने कुछ नहीं कहा।
रेणु को गले लगा लिया।
और फिर…
सब कुछ उड़ेल दिया।
मुन्ना वाला ब्लैकमेल…
सिक्युरिटी वाला सीन…
सब।
### कमरा 204, रात 11:45 बजे
लाइट बंद थी।
सिर्फ़ रेणु के फोन की हल्की नीली रोशनी।
दोनों एक ही बेड पर लेटी थीं।
रेणु ने पूजा को पीठ से लिपटाया हुआ था।
पूजा का बदन अभी भी काँप रहा था।
रेणु ने बहुत धीरे से पूछा,
“पूजा… सब बता दे।
अंदर ही अंदर घुट रही है तू।
मैं हूँ… मैं सुनूँगी।
कोई जजमेंट नहीं करूँगी।
बस… बता दे।”
पूजा चुप रही।
फिर उसकी सिसकी निकली।
और फिर…
वो टूटकर बोल पड़ी।
हर शब्द आँसुओं में डूबा हुआ।
“रेणु… मैंने आज…
अपने आप को पूरी तरह खो दिया था…
मुन्ना… उसने मुझे…
जैसे कोई चीज़ नहीं…
जैसे कोई खिलौना…”
वो रुक गई।
साँसें तेज़।
फिर बोली,
"उसने मुझे ब्लैकमेल किया मैं फोन ठीक कराने गयी थी तो उसने मेरी pics रख ली अपने पास।
उसने मुझे शाम को आने को बोला जब मैं गयी तो
उसने पहले मेरा पल्लू खिचा
फिर साड़ी का पल्लू नीचे गिराया…
फिर साड़ी पूरी उतार दी…
मैं रो रही थी… हाथ जोड़ रही थी…
पर वो हँस रहा था…
उसकी आँखों में… कोई रहम नहीं था…
सिर्फ़ हवस…
और बदला…”
रेणु ने पूजा को और कसकर पकड़ लिया।
“फिर ब्लाउज़…
उसने हुक खोले…
धीरे-धीरे…
जैसे मज़ा ले रहा हो…
मेरे बूब्स… बाहर आ गए…
मैंने हाथों से छिपाने की कोशिश की…
पर उसने मेरे हाथ पीछे कर दिए…
और… और मुँह लगा दिया…
चूसा… काटा…
बहुत ज़ोर से…
दाँतों से निप्पल खींचे…
दर्द हो रहा था…
पर… पर बदन में एक अजीब सी सिहरन भी थी…
मैं खुद से नफ़रत करने लगी…
क्योंकि… मेरी चूत… गीली हो गई थी…
मैं रो रही थी…
पर बदन… मेरी मर्ज़ी के खिलाफ़…
उसके स्पर्श पर…
उसके मुँह पर…
सिहर रहा था…”
पूजा की आवाज़ फट गई।
वो रेणु के सीने में मुँह छिपाकर रोने लगी।
“फिर उसने पेटीकोट को उपर उठाया
उसने पैंटी में हाथ डाला…
उँगली… मेरी चूत में…
और बोला…
‘देख… कितनी गीली हो गई है…
शरीफ़ बनती है…
पर अंदर से रंडी है…’
मैंने मना किया…
रोई…
पर वो हँसता रहा…
और उँगली अंदर-बाहर करने लगा…
मेरे मुँह से…
आह… निकल रही थी…
मैं खुद को कोस रही थी…
कि मेरा बदन…
उसके स्पर्श पर…
क्यों जवाब दे रहा है…”
रेणु के भी आँसू बह रहे थे।
पर वो चुप थी।
बस पूजा को सहलाती रही।
“मैंने सोचा था…
आज वो मुझे…
पूरी तरह तोड़ देगा…
मुझे ज़मीन पर लिटाने ही वाला था…
तभी…
शटर ज़ोर से खुला…”
पूजा की आवाज़ में पहली बार राहत आई।
“विजय सर…
वो अंदर आए…
उनकी खाकी वर्दी…
उनकी तेज़ आवाज़…
‘हाथ ऊपर साले!’
मुन्ना डर गया…
उसकी पकड़ ढीली पड़ गई…
मैं दौड़कर उनके पीछे छिप गई…
और रोते हुए बोली…
‘मुझे बचा लो सर…’
मैं नंगी थी उपर से
बूब्स हाथ से छिपाए…
पर मुझे…
पहली बार लगा…
मैं सुरक्षित हूँ…”
“विजय सर ने मुन्ना को दो थप्पड़ मारे…
उसे ज़मीन पर गिरा दिया…
फिर मेरे कपड़े उठाए…
धीरे से मेरी ओर बढ़ाए…
बोले…
‘पहन लो… डरो मत… अब कोई कुछ नहीं करेगा…’
उनकी आँखों में…
गुस्सा था…
पर मेरे लिए…
सहानुभूति भी…”
“मुन्ना चीख रहा था…
‘ये रंडी पैसे के बदले आई थी…’
पर विजय सर ने उसे और मारा…
फिर मेरा नंबर लिया…
बोले…
‘कुछ भी हो… मुझे फ़ोन करना…’
और मुन्ना को घसीटकर ले गए…”
पूजा ने रेणु का हाथ पकड़ा।
उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
“रेणु…
मैं आज मरते-मरते बची…
पर मुझे…
खुद से घिन्न आ रही है…
मैंने संजय को धोखा दिया…
मुन्ना ने मेरे साथ जो किया…
उसकी वजह से भी…
मैं खुद को दोषी मान रही हूँ…
मैं…
मैं अब जीने लायक नहीं रही…”
रेणु ने पूजा का चेहरा अपने हाथों में लिया।
आँखों में आँखें डालीं।
और बहुत प्यार से बोली,
“सुन मेरी बात…
तूने कुछ गलत नहीं किया।
तू इंसान है।
अकेली थी।
कमज़ोर पल में बह गई।
पर आज…
तूने हिम्मत दिखाई।
तू चीखी नहीं…
पर तू लड़ी भी नहीं…
क्योंकि तू टूट चुकी थी।
पर अब…
तू फिर से खड़ी हो रही है।
और मैं तेरे साथ हूँ।
हम कल सुबह विजय सर से मिलेंगे।
पूरा केस लिखवाएँगे।
मुन्ना को सज़ा दिलवाएँगे।
और संजय को…
जब तू तैयार होगी…
तू खुद बता देगी।
वो तुझे छोड़ेगा नहीं।
क्योंकि वो तुझे प्यार करता है।
और प्यार…
गलतियों को माफ़ कर देता है।”
पूजा ने रेणु को फिर गले लगा लिया।
और पहली बार…
रात भर रोते-रोते…
क्या सच।
हाँ सच।
रेणु ने उसे देखा।
उसके माथे पर किस किया।
और फुसफुसाई,
“मेरी मजबूत लड़की…
अब कोई तुझे तोड़ नहीं पाएगा।
मैं हूँ ना…”
बाहर चाँद निकला था।
और कमरे में…
दो सहेलियाँ…
एक-दूसरे की ताकत बनी हुई थीं।
सब कुछ शांत था।
सिर्फ़ दो दिलों की धड़कनें और एक-दूसरे की साँसें सुनाई दे रही थीं।
रेणु पूजा के बालों में उँगलियाँ फेरे जा रही थी।
पूजा ने आँखें बंद कर रखी थीं, पर नींद अभी पूरी नहीं आई थी।
उसका बदन अब भी हल्का-हल्का काँप रहा था।
फिर अचानक पूजा ने आँखें खोलीं।
अँधेरे में भी रेणु की आँखें चमक रही थीं।
दोनों चुप।
बस एक-दूसरे को देखती रहीं।
पूजा ने बहुत धीरे से रेणु का हाथ अपने गाल पर रखा।
फिर उसकी उँगलियाँ रेणु के होंठों तक पहुँचीं।
हल्के से छुआ।
जैसे पूछ रही हो…
“क्या मैं… अब भी प्यार के लायक हूँ…?”
रेणु ने उसका हाथ पकड़ा।
अपने होंठों पर रखा।
और फिर…
धीरे से झुकी।
उनके होंठ मिले।
पहले सिर्फ़ छुअन…
जैसे दो पंखुड़ियाँ एक-दूसरे को सहलाती हों।
फिर थोड़ा दबाव।
नरम।
गर्म।
पूजा की साँस रुक गई।
रेणु ने उसका निचला होंठ हल्के से चूसा।
धीरे-धीरे।
बिना जल्दबाज़ी।
बिना हवस।
सिर्फ़ प्यार।
सिर्फ़ सुकून।
पूजा ने भी जवाब दिया।
उसके होंठ काँप रहे थे, पर उसने रेणु के होंठों को अपने में समेट लिया।
दोनों की आँखें बंद।
होंठ एक-दूसरे पर पिघलते जा रहे थे।
न कोई जीभ।
न कोई दाँत।
बस एक लंबा, गहरा, नरम किस।
जैसे सारी दुनिया को भूलकर…
बस एक-दूसरे को महसूस कर रही हों।
किस टूटा।
दोनों की साँसें तेज़।
माथे से माथा टिका हुआ।
पूजा ने फिर होंठ रेणु के होंठों पर रख दिए।
इस बार थोड़ा और गहरा।
उसके हाथ रेणु की पीठ पर।
रेणु के हाथ पूजा के गालों पर।
फिर दोनों अलग हुईं।
एक-दूसरे को देखकर हल्के से मुस्कुराईं।
आँसुओं भरी मुस्कान।
कमरा 204, रात के ठीक 1:47 बजे
अब एक भी शब्द नहीं बोला जा रहा था।
सिर्फ़ साँसें थीं…
और वो साँसें भी जैसे एक-दूसरे से पूछ रही हों,
“तू ठीक है ना…?”
रेणु ने पूजा को अपनी बाहों में इतनी कसकर लिया था कि दोनों के दिलों की धड़कन एक ही लय में बज रही थी।
पूजा का माथा रेणु की गर्दन पर था।
उसकी गर्म साँसें रेणु के गले पर लग रही थीं।
हर साँस के साथ पूजा का पूरा बदन हल्का सा काँप जाता।
रेणु ने बहुत धीरे से पूजा के माथे को चूमा।
फिर आँखों के कोनों को।
वहाँ अभी भी आँसुओं की नमी थी।
रेणु ने उन आँसुओं को अपने होंठों से सोख लिया।
और फुसफुसाई,
“तेरे ये आँसू… अब मेरे हैं।
कोई और नहीं पीएगा…
मैं पी लूँगी सारे…
जब तक एक भी बूंद नहीं बचेगी…”
पूजा ने आँखें बंद रखीं।
उसके होंठ काँप रहे थे।
वो धीरे से बोली,
“रेणु…
मैं आज…
सच में टूट गई थी…
जैसे कोई काँच का खिलौना…
जो ज़मीन पर गिरकर लाख टुकड़े हो गया हो…
मुझे लगा…
मैं कभी जुड़ नहीं पाऊँगी…”
रेणु ने पूजा के होंठों पर उँगली रखी।
“शशश…”
फिर अपना माथा पूजा के माथे से टिका दिया।
दोनों की नाकें आपस में छू रही थीं।
और फिर…
रेणु ने बहुत, बहुत धीरे से…
पूजा के ऊपरी होंठ को अपने होंठों में लिया।
जैसे कोई माँ अपने बच्चे के होंठों को चूमती है,
जब बच्चा बहुत रो चुका हो।
बस एक हल्का सा दबाव…
एक लंबी, गहरी साँस…
फिर निचले होंठ को…
धीरे से चूसा।
पूजा की आँखों से फिर आँसू गिरे।
पर इस बार…
वो दर्द के नहीं थे ही नहीं।
वो सुकून के थे।
वो किसी ने उसे बिना शर्त स्वीकार कर लिया था, ये एहसास था।
पूजा ने भी रेणु के होंठों को अपने में समेट लिया।
दोनों की साँसें एक हो गईं।
होंठ एक-दूसरे पर पिघल रहे थे।
न कोई जल्दी थी…
न कोई हवस…
बस एक बहुत गहरा, बहुत नरम, बहुत लंबा किस।
जैसे दो टूटी हुई आत्माएँ…
एक-दूसरे के टुकड़ों को जोड़ रही हों।
किस के बीच में ही पूजा ने फुसफुसाया,
“रेणु…
मैं… मैं अब भी प्यार के लायक हूँ ना…?”
रेणु ने होंठ नहीं हटाए।
बस उसी हालत में बोली,
“तू मेरे लिए सबसे पवित्र चीज़ है इस दुनिया में…
तेरे सारे दाग…
मैं अपने होंठों से मिटा दूँगी…
एक-एक करके…”
फिर दोनों ने एक-दूसरे को और कसकर जकड़ लिया।
होंठ फिर मिले।
इस बार थोड़ा ज़्यादा देर तक।
पूजा के हाथ रेणु की पीठ पर थे।
रेणु के हाथ पूजा के गालों और बालों में।
जब किस टूटा…
दोनों की आँखें खुलीं।
दोनों रो रहे थे।
पर मुस्कुरा भी रहे थे।
पूजा ने रेणु की हथेली पर अपना होंठ रखा।
और बोली,
“तू मेरी साँस है…
अगर तू न होती…
तो मैं आज सच में मर जाती…”
रेणु ने पूजा को फिर सीने से लगा लिया।
उसके कानों में फुसफुसाया,
“सो जा मेरी जान…
अब मैं तेरे हर सपने में रहूँगी…
हर साँस में…
हर धड़कन में…
तू अब कभी अकेली नहीं सोएगी…”
पूजा ने आँखें बंद कीं।
उसके चेहरे पर पहली बार…
एक शांत मुस्कान थी।
जैसे कोई बच्चा…
अपनी माँ की गोद में सो रहा हो।
और रेणु…
पूजा के बालों में उँगलियाँ फेरती रही…
पूरी रात।
बिना रुके।
बाहर चाँद ढल चुका था।
पर कमरे के अंदर…
दो दिलों ने एक नया सूरज उगा दिया था।
जो कभी नहीं डूबेगा।
रेणु ने पूजा को फिर सीने से लगा लिया।
पूजा ने अपना सिर रेणु की गर्दन पर रख दिया।
और नींद सच में आ गई।
![[Image: 6dde6c7b-28a9-4942-8040-eb0bddc7dcb1.png?cache=1]](https://imagine-public.x.ai/imagine-public/images/6dde6c7b-28a9-4942-8040-eb0bddc7dcb1.png?cache=1)
दो सहेलियाँ…
दो आत्माएँ…
एक-दूसरे में समा गई थीं।
बिना कुछ कहे।
बिना कुछ माँगे।
बस एक किस ने…
सारी दर्द भरी रात को…
प्यार में बदल दिया।
पूजा कमरे में घुसी।
दरवाज़ा बंद किया।
चटकनी लगाई।
फिर बेड पर गिर पड़ी।
साड़ी अभी भी वही गुलाबी थी, पर अब उसमें मुन्ना की गंदी उँगलियों के निशान थे।
ब्लाउज़ का एक हुक टूटा हुआ था।
पेटीकोट की नाड़ी ढीली।
होंठ सूजे हुए।
आँखें लाल।
वो तकिए को गले लगाकर रोने लगी।
“संजय… मुझे माफ़ कर दो… मैं कितनी गंदी हो गई…”
हॉस्टल आते वक्त राजू मिला था।
वो दूर से देखकर मुस्कुराया था।
“अरे पूजा… आज तो बहुत सेक्सी लग रही हो…
खा ही जाऊँगा तुम्हें… मौका दो तो…”
उस वक्त पूजा के अंदर जो आग भरी थी – मुन्ना की, अपनी बेबसी की – वो राजू पर फूट पड़ी।
“अपनी औकात में रहो थोड़ा!
क्या मैंने मीठी बातें कर दीं तो सिर चढ़ गए?
हाथ दिया तो गला पकड़ने लगे!
निकल जाओ यहाँ से… और दोबारा शक्ल मत दिखाना!”
राजू का चेहरा लटक गया।
“पूजा… मैं तो मज़ाक…”
पर पूजा ने दरवाज़ा बंद कर दिया था।
अब कमरे में अकेली…
पछतावा शुरू हो गया।
“मैंने क्या कर दिया…
राजू ने तो कभी ज़बरदस्ती नहीं की थी…
वो तो बस… दर्द बाँट रहे थे हम…
मैंने अपना गुस्सा उस पर निकाल दिया…”
संजय को कॉल किया।
पहली बार – नहीं उठा।
दूसरी बार – काट दिया।
तीसरी बार – मैसेज आया:
संजय:- मीटिंग में हूँ जान। रात को बात करते हैं। लव यू। ❤️
पूजा ने फोन साइड फेंका।
“कोई नहीं है मेरा…”
फिर राजू का ख़याल आया।
“गलती मेरी थी…
उसे माफ़ी माँग लूँ…”
राजू को कॉल किया।
पहली बार – रिंग गई, फिर कट।
दूसरी बार – स्विच ऑफ।
पूजा फिर रो पड़ी।
“मैंने सब खो दिया…
संजय दूर…
राजू नाराज़…
मुन्ना जैसा हरामी…
मैं अकेली… पूरी तरह अकेली…”
विक्रम का नंबर स्क्रीन पर आया-गया।
उसने सोचा – “अगर इसे कॉल कर दूँ…
मैं खुद को रोक नहीं पाऊँगी…
फिर वही गलती न कर बैठू खुद को रोक नहीं पाऊँगी उसके साथ। "
तकिया गले लगाया।
मुँह में दबाकर फूट-फूट कर रोने लगी।
“मैं मर क्यों नहीं जाती…”
दरवाज़े पर खटखट।
“पूजा… दरवाज़ा खोल ना यार…”
पूजा ने आँसू पोंछे।
दरवाज़ा खोला।
रेणु अंदर आई।
पूजा को देखते ही चौंकी।
“अरे… ये क्या हाल बना रखा है?
आँखें लाल… साड़ी फटी हुई…
क्या हुआ रे?”
पूजा ने कुछ नहीं कहा।
रेणु को गले लगा लिया।
और फिर…
सब कुछ उड़ेल दिया।
मुन्ना वाला ब्लैकमेल…
सिक्युरिटी वाला सीन…
सब।
### कमरा 204, रात 11:45 बजे
लाइट बंद थी।
सिर्फ़ रेणु के फोन की हल्की नीली रोशनी।
दोनों एक ही बेड पर लेटी थीं।
रेणु ने पूजा को पीठ से लिपटाया हुआ था।
पूजा का बदन अभी भी काँप रहा था।
रेणु ने बहुत धीरे से पूछा,
“पूजा… सब बता दे।
अंदर ही अंदर घुट रही है तू।
मैं हूँ… मैं सुनूँगी।
कोई जजमेंट नहीं करूँगी।
बस… बता दे।”
पूजा चुप रही।
फिर उसकी सिसकी निकली।
और फिर…
वो टूटकर बोल पड़ी।
हर शब्द आँसुओं में डूबा हुआ।
“रेणु… मैंने आज…
अपने आप को पूरी तरह खो दिया था…
मुन्ना… उसने मुझे…
जैसे कोई चीज़ नहीं…
जैसे कोई खिलौना…”
वो रुक गई।
साँसें तेज़।
फिर बोली,
"उसने मुझे ब्लैकमेल किया मैं फोन ठीक कराने गयी थी तो उसने मेरी pics रख ली अपने पास।
उसने मुझे शाम को आने को बोला जब मैं गयी तो
उसने पहले मेरा पल्लू खिचा
फिर साड़ी का पल्लू नीचे गिराया…
फिर साड़ी पूरी उतार दी…
मैं रो रही थी… हाथ जोड़ रही थी…
पर वो हँस रहा था…
उसकी आँखों में… कोई रहम नहीं था…
सिर्फ़ हवस…
और बदला…”
रेणु ने पूजा को और कसकर पकड़ लिया।
“फिर ब्लाउज़…
उसने हुक खोले…
धीरे-धीरे…
जैसे मज़ा ले रहा हो…
मेरे बूब्स… बाहर आ गए…
मैंने हाथों से छिपाने की कोशिश की…
पर उसने मेरे हाथ पीछे कर दिए…
और… और मुँह लगा दिया…
चूसा… काटा…
बहुत ज़ोर से…
दाँतों से निप्पल खींचे…
दर्द हो रहा था…
पर… पर बदन में एक अजीब सी सिहरन भी थी…
मैं खुद से नफ़रत करने लगी…
क्योंकि… मेरी चूत… गीली हो गई थी…
मैं रो रही थी…
पर बदन… मेरी मर्ज़ी के खिलाफ़…
उसके स्पर्श पर…
उसके मुँह पर…
सिहर रहा था…”
पूजा की आवाज़ फट गई।
वो रेणु के सीने में मुँह छिपाकर रोने लगी।
“फिर उसने पेटीकोट को उपर उठाया
उसने पैंटी में हाथ डाला…
उँगली… मेरी चूत में…
और बोला…
‘देख… कितनी गीली हो गई है…
शरीफ़ बनती है…
पर अंदर से रंडी है…’
मैंने मना किया…
रोई…
पर वो हँसता रहा…
और उँगली अंदर-बाहर करने लगा…
मेरे मुँह से…
आह… निकल रही थी…
मैं खुद को कोस रही थी…
कि मेरा बदन…
उसके स्पर्श पर…
क्यों जवाब दे रहा है…”
रेणु के भी आँसू बह रहे थे।
पर वो चुप थी।
बस पूजा को सहलाती रही।
“मैंने सोचा था…
आज वो मुझे…
पूरी तरह तोड़ देगा…
मुझे ज़मीन पर लिटाने ही वाला था…
तभी…
शटर ज़ोर से खुला…”
पूजा की आवाज़ में पहली बार राहत आई।
“विजय सर…
वो अंदर आए…
उनकी खाकी वर्दी…
उनकी तेज़ आवाज़…
‘हाथ ऊपर साले!’
मुन्ना डर गया…
उसकी पकड़ ढीली पड़ गई…
मैं दौड़कर उनके पीछे छिप गई…
और रोते हुए बोली…
‘मुझे बचा लो सर…’
मैं नंगी थी उपर से
बूब्स हाथ से छिपाए…
पर मुझे…
पहली बार लगा…
मैं सुरक्षित हूँ…”
“विजय सर ने मुन्ना को दो थप्पड़ मारे…
उसे ज़मीन पर गिरा दिया…
फिर मेरे कपड़े उठाए…
धीरे से मेरी ओर बढ़ाए…
बोले…
‘पहन लो… डरो मत… अब कोई कुछ नहीं करेगा…’
उनकी आँखों में…
गुस्सा था…
पर मेरे लिए…
सहानुभूति भी…”
“मुन्ना चीख रहा था…
‘ये रंडी पैसे के बदले आई थी…’
पर विजय सर ने उसे और मारा…
फिर मेरा नंबर लिया…
बोले…
‘कुछ भी हो… मुझे फ़ोन करना…’
और मुन्ना को घसीटकर ले गए…”
पूजा ने रेणु का हाथ पकड़ा।
उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
“रेणु…
मैं आज मरते-मरते बची…
पर मुझे…
खुद से घिन्न आ रही है…
मैंने संजय को धोखा दिया…
मुन्ना ने मेरे साथ जो किया…
उसकी वजह से भी…
मैं खुद को दोषी मान रही हूँ…
मैं…
मैं अब जीने लायक नहीं रही…”
रेणु ने पूजा का चेहरा अपने हाथों में लिया।
आँखों में आँखें डालीं।
और बहुत प्यार से बोली,
“सुन मेरी बात…
तूने कुछ गलत नहीं किया।
तू इंसान है।
अकेली थी।
कमज़ोर पल में बह गई।
पर आज…
तूने हिम्मत दिखाई।
तू चीखी नहीं…
पर तू लड़ी भी नहीं…
क्योंकि तू टूट चुकी थी।
पर अब…
तू फिर से खड़ी हो रही है।
और मैं तेरे साथ हूँ।
हम कल सुबह विजय सर से मिलेंगे।
पूरा केस लिखवाएँगे।
मुन्ना को सज़ा दिलवाएँगे।
और संजय को…
जब तू तैयार होगी…
तू खुद बता देगी।
वो तुझे छोड़ेगा नहीं।
क्योंकि वो तुझे प्यार करता है।
और प्यार…
गलतियों को माफ़ कर देता है।”
पूजा ने रेणु को फिर गले लगा लिया।
और पहली बार…
रात भर रोते-रोते…
क्या सच।
हाँ सच।
रेणु ने उसे देखा।
उसके माथे पर किस किया।
और फुसफुसाई,
“मेरी मजबूत लड़की…
अब कोई तुझे तोड़ नहीं पाएगा।
मैं हूँ ना…”
बाहर चाँद निकला था।
और कमरे में…
दो सहेलियाँ…
एक-दूसरे की ताकत बनी हुई थीं।
सब कुछ शांत था।
सिर्फ़ दो दिलों की धड़कनें और एक-दूसरे की साँसें सुनाई दे रही थीं।
रेणु पूजा के बालों में उँगलियाँ फेरे जा रही थी।
पूजा ने आँखें बंद कर रखी थीं, पर नींद अभी पूरी नहीं आई थी।
उसका बदन अब भी हल्का-हल्का काँप रहा था।
फिर अचानक पूजा ने आँखें खोलीं।
अँधेरे में भी रेणु की आँखें चमक रही थीं।
दोनों चुप।
बस एक-दूसरे को देखती रहीं।
पूजा ने बहुत धीरे से रेणु का हाथ अपने गाल पर रखा।
फिर उसकी उँगलियाँ रेणु के होंठों तक पहुँचीं।
हल्के से छुआ।
जैसे पूछ रही हो…
“क्या मैं… अब भी प्यार के लायक हूँ…?”
रेणु ने उसका हाथ पकड़ा।
अपने होंठों पर रखा।
और फिर…
धीरे से झुकी।
उनके होंठ मिले।
पहले सिर्फ़ छुअन…
जैसे दो पंखुड़ियाँ एक-दूसरे को सहलाती हों।
फिर थोड़ा दबाव।
नरम।
गर्म।
पूजा की साँस रुक गई।
रेणु ने उसका निचला होंठ हल्के से चूसा।
धीरे-धीरे।
बिना जल्दबाज़ी।
बिना हवस।
सिर्फ़ प्यार।
सिर्फ़ सुकून।
पूजा ने भी जवाब दिया।
उसके होंठ काँप रहे थे, पर उसने रेणु के होंठों को अपने में समेट लिया।
दोनों की आँखें बंद।
होंठ एक-दूसरे पर पिघलते जा रहे थे।
न कोई जीभ।
न कोई दाँत।
बस एक लंबा, गहरा, नरम किस।
जैसे सारी दुनिया को भूलकर…
बस एक-दूसरे को महसूस कर रही हों।
किस टूटा।
दोनों की साँसें तेज़।
माथे से माथा टिका हुआ।
पूजा ने फिर होंठ रेणु के होंठों पर रख दिए।
इस बार थोड़ा और गहरा।
उसके हाथ रेणु की पीठ पर।
रेणु के हाथ पूजा के गालों पर।
फिर दोनों अलग हुईं।
एक-दूसरे को देखकर हल्के से मुस्कुराईं।
आँसुओं भरी मुस्कान।
कमरा 204, रात के ठीक 1:47 बजे
अब एक भी शब्द नहीं बोला जा रहा था।
सिर्फ़ साँसें थीं…
और वो साँसें भी जैसे एक-दूसरे से पूछ रही हों,
“तू ठीक है ना…?”
रेणु ने पूजा को अपनी बाहों में इतनी कसकर लिया था कि दोनों के दिलों की धड़कन एक ही लय में बज रही थी।
पूजा का माथा रेणु की गर्दन पर था।
उसकी गर्म साँसें रेणु के गले पर लग रही थीं।
हर साँस के साथ पूजा का पूरा बदन हल्का सा काँप जाता।
रेणु ने बहुत धीरे से पूजा के माथे को चूमा।
फिर आँखों के कोनों को।
वहाँ अभी भी आँसुओं की नमी थी।
रेणु ने उन आँसुओं को अपने होंठों से सोख लिया।
और फुसफुसाई,
“तेरे ये आँसू… अब मेरे हैं।
कोई और नहीं पीएगा…
मैं पी लूँगी सारे…
जब तक एक भी बूंद नहीं बचेगी…”
पूजा ने आँखें बंद रखीं।
उसके होंठ काँप रहे थे।
वो धीरे से बोली,
“रेणु…
मैं आज…
सच में टूट गई थी…
जैसे कोई काँच का खिलौना…
जो ज़मीन पर गिरकर लाख टुकड़े हो गया हो…
मुझे लगा…
मैं कभी जुड़ नहीं पाऊँगी…”
रेणु ने पूजा के होंठों पर उँगली रखी।
“शशश…”
फिर अपना माथा पूजा के माथे से टिका दिया।
दोनों की नाकें आपस में छू रही थीं।
और फिर…
रेणु ने बहुत, बहुत धीरे से…
पूजा के ऊपरी होंठ को अपने होंठों में लिया।
जैसे कोई माँ अपने बच्चे के होंठों को चूमती है,
जब बच्चा बहुत रो चुका हो।
बस एक हल्का सा दबाव…
एक लंबी, गहरी साँस…
फिर निचले होंठ को…
धीरे से चूसा।
पूजा की आँखों से फिर आँसू गिरे।
पर इस बार…
वो दर्द के नहीं थे ही नहीं।
वो सुकून के थे।
वो किसी ने उसे बिना शर्त स्वीकार कर लिया था, ये एहसास था।
पूजा ने भी रेणु के होंठों को अपने में समेट लिया।
दोनों की साँसें एक हो गईं।
होंठ एक-दूसरे पर पिघल रहे थे।
न कोई जल्दी थी…
न कोई हवस…
बस एक बहुत गहरा, बहुत नरम, बहुत लंबा किस।
जैसे दो टूटी हुई आत्माएँ…
एक-दूसरे के टुकड़ों को जोड़ रही हों।
किस के बीच में ही पूजा ने फुसफुसाया,
“रेणु…
मैं… मैं अब भी प्यार के लायक हूँ ना…?”
रेणु ने होंठ नहीं हटाए।
बस उसी हालत में बोली,
“तू मेरे लिए सबसे पवित्र चीज़ है इस दुनिया में…
तेरे सारे दाग…
मैं अपने होंठों से मिटा दूँगी…
एक-एक करके…”
फिर दोनों ने एक-दूसरे को और कसकर जकड़ लिया।
होंठ फिर मिले।
इस बार थोड़ा ज़्यादा देर तक।
पूजा के हाथ रेणु की पीठ पर थे।
रेणु के हाथ पूजा के गालों और बालों में।
जब किस टूटा…
दोनों की आँखें खुलीं।
दोनों रो रहे थे।
पर मुस्कुरा भी रहे थे।
पूजा ने रेणु की हथेली पर अपना होंठ रखा।
और बोली,
“तू मेरी साँस है…
अगर तू न होती…
तो मैं आज सच में मर जाती…”
रेणु ने पूजा को फिर सीने से लगा लिया।
उसके कानों में फुसफुसाया,
“सो जा मेरी जान…
अब मैं तेरे हर सपने में रहूँगी…
हर साँस में…
हर धड़कन में…
तू अब कभी अकेली नहीं सोएगी…”
पूजा ने आँखें बंद कीं।
उसके चेहरे पर पहली बार…
एक शांत मुस्कान थी।
जैसे कोई बच्चा…
अपनी माँ की गोद में सो रहा हो।
और रेणु…
पूजा के बालों में उँगलियाँ फेरती रही…
पूरी रात।
बिना रुके।
बाहर चाँद ढल चुका था।
पर कमरे के अंदर…
दो दिलों ने एक नया सूरज उगा दिया था।
जो कभी नहीं डूबेगा।
रेणु ने पूजा को फिर सीने से लगा लिया।
पूजा ने अपना सिर रेणु की गर्दन पर रख दिया।
और नींद सच में आ गई।
![[Image: 6dde6c7b-28a9-4942-8040-eb0bddc7dcb1.png?cache=1]](https://imagine-public.x.ai/imagine-public/images/6dde6c7b-28a9-4942-8040-eb0bddc7dcb1.png?cache=1)
दो सहेलियाँ…
दो आत्माएँ…
एक-दूसरे में समा गई थीं।
बिना कुछ कहे।
बिना कुछ माँगे।
बस एक किस ने…
सारी दर्द भरी रात को…
प्यार में बदल दिया।


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