23-11-2025, 10:00 PM
शुक्रवार फिर आ गया।
जैसे कोई भारी पत्थर कैलेंडर पर लुढ़कता हुआ त्रिप्ति के सीने पर आकर रुका। सीमा ने ऑफिस में बता दिया था की इस वीक कहा पर और कब मिलना है । सीमा पूछने का भी जहमत नहीं उठा रही थी उसको पता था की तृप्ति अब सर के चक्कर में फसी हुई है वो आएगी ही और सीमा अपनी ज़िंदगी की सारी फैंटेसी सर और तृप्ति के साथ पुत्र कर लेना चाहती थी । तृप्ति गिल्ट में भी थी लेकिन वो आगे भी जाना चाह रही थी क्योंकि आख़िर बार जैसा मजा उसने लाइफ में नहीं लिया और वो ये भी जान रही थी की सर से जायदा कोई इस अफेयर को छुपा के नहीं रखना चाहेगा इसीलिए बात बाहर आने की संभावना ही नहीं थी।लेकिन वो गिल्ट को खत्म कैसे करे ये समझ नहीं पा रही थी । अपने मन में चल रहे उफान को दबा कर वो अपना काम करती रही ।
सुबह से ही उसका शरीर अलग-थलग सा चल रहा था।
हाथ अपने आप रेड लिपस्टिक की तरफ़ बढ़ गए, जिसे उसने पिछले दो साल से नहीं छुआ था।
आईने में देखा तो लगा कोई दूसरी औरत उसकी जगह खड़ी है, आँखें चमकती हुईं, होंठ लाल, मंगलसूत्र के बीच में एक छोटा-सा लाल बिंदी सा टीका, जैसे सुहागरात की दुल्हन और रंडी एक साथ।
रोहन (त्रिप्ति का पति )ने ऑफिस जाते वक़्त पूछा, “आज कुछ ख़ास है क्या? इतना तैयार हो रही हो?”
उसने हँसकर टाल दिया, “सीमा का बर्थडे है ना, सरप्राइज़ प्लान है। रात में लेट हो जाऊँगी।”
रोहन ने माथे पर हल्का-सा किस किया, “मज़े करना, जान।”
उसके जाते ही त्रिप्ति बाथरूम में घुसकर उल्टी कर आई। अपराधबोध और उत्तेजना दोनों एक साथ गले में अटक गए थे।
शाम सात बजे गेस्ट हाउस।
लाल बनारसी साड़ी, लाल ब्लाउज़ जिसके हुक पीछे से सिर्फ़ दो थे, आसानी से खुल जाएँ। अंदर कुछ नहीं और सर के हुक्म के मुताबिक़ उसने पेंटी भी नहीं पहनी थी ।
सीमा ने दरवाज़ा खोला तो उसकी आँखें चमक उठीं।
“वाह रंडी, आज तो पूरी दुल्हन बनी है।” तृप्ति चौकी लेकिन वो सीमा को जानती थी की अब वो रुकने वाली नहीं है रास्ते में ही उसने सोच लिया था की आज सारी हदे पर करके मजा लेना है ।
पहला चुम्मा सीमा का था, इतना गहरा कि त्रिप्ति की साँस रुक गई। तृप्ति को सीमा के छूने से परहेज नहीं था हालाकि उसको सर का छूना ज़्यादा पसंद था लेकिन औरत के शरीर का मुलायम टच भी उसको अलग अनुभूति देता था ।
अविनाश सर कमरे के बीच में खडे था, शर्ट की बटन खुली हुईं, आँखों में वो भूख जो पिछले हफ़्ते से बढ़ती ही जा रही थी।
उसने एक शब्द नहीं बोला। बस उँगली से इशारा किया, घुटनों पर।
त्रिप्ति घुटनों पर बैठी।
साड़ी का पल्लू नीचे सरका। मंगलसूत्र लहराता हुआ उसके स्तनों के बीच लटक रहा था।
अविनाश सर ने ज़िप खोली। उसका लंड पहले से ही पूरा तना हुआ था, नसें फूली हुईं।
सीमा पीछे से उसके बाल पकड़कर सिर आगे धकेली।
“पति को गुड नाइट किस किया था ना ? अब असली मर्द को गुड इवनिंग दे।”
पहला धक्का गले में इतना गहरा गया कि त्रिप्ति की आँखों से पानी निकल आया।
फिर भी उसने मना नहीं किया।
वह चूसती रही, आँसुओं के साथ लार, दोनों मिलकर उसके मंगलसूत्र को भिगो रहे थे। उसको लग रहा था की आख़िर बार से लंड और मोटा हो चुका है , वो साथ देती रही पसीने मूत्र और सेक्स की ख़ुश्बू तृप्ति को उत्तेजित कर रही थी , सर आज रहम के मूड में नहीं थे , पिछला सेक्स अचानक हुआ था लेकिन इस बार इंतज़ार के कारण सर की भूख भी बढ़ गई थी । शादी शुदा ग़द्दारी औरत को रगड़ने का सुख कोन मर्द नहीं चाहता होगा । जमकर सर ने तृप्ति के मुंह में अपनी मलाई रगड़ी फिर वे लोग उसे बिस्तर पर ले गए।
साड़ी नहीं उतारी। पिछले बार की तरह बस कमर तक ऊपर उठा दी।
सीमा ने उसकी टाँगें चौड़ी कीं और सर के सामने उसकी गांड पर थप्पड़ मारा।
“याद है ना पिछले हफ़्ते की ट्रेनिंग? आज ग्रेजुएशन है, रंडी।”
ल्यूब ठंडा था। उँगलियाँ तीन पहले से ही आसानी से चली गईं।
त्रिप्ति सिसकियाँ ले रही थी, तकिए में मुँह दबाए।
सीमा उसके कान में फुसफुसाई, “आज दो-दो लंड लेंगे तेरी गांड में। एक असली, एक मेरे स्ट्रैप-ऑन वाला। तैयार है?”
त्रिप्ति ने सहमति में सिर हिलाया।
उसे लगा उसका शरीर अब उसका नहीं रहा। वह बस एक छेद बन चुकी थी, जिसे भरने के लिए दो शैतान बेकरार थे।
सर पहले घुसे
धीरे-धीरे, पर इस बार बिना रुके। पूरा लंड एक ही बार में जड़ तक।
त्रिप्ति की चीख़ कमरे में गूँजी, फिर सीमा ने अपना स्ट्रैप-ऑन (मोटा, काला, चमकता हुआ) उसके मुँह में ठूँस दिया।
दोनों तरफ़ से एक साथ।
वह बीच में फँसी हुई थी, जैसे कोई मांस का टुकड़ा दो भूखे जानवरों के बीच।
कमरे में सिर्फ़ तीन आवाज़ें थीं,
अविनाश की भारी साँसें,
सीमा की गंदी-गंदी गालियाँ,
और त्रिप्ति की टूटी-फूटी सिसकियाँ, “हाँ… और… फाड़ दो… मैं तुम्हारी रंडी हूँ…”
जब अविनाश मीना झड़ा, उसने बाहर नहीं निकाला।
गर्म वीर्य उसकी आँतरी दीवारों पर फैलता हुआ अंदर ही छोड़ दिया।
सीमा ने स्ट्रैप-ऑन निकालकर उसकी जगह लिया। प्लास्टिक था, पर इतना मोटा कि त्रिप्ति फिर चीख़ी।
दूसरे राउंड में उसकी चूत और गांड दोनों एक साथ भरी गईं, अविनाश की उँगलियाँ और सीमा का खिलौना।
रात के तीन बजे त्रिप्ति बाथरूम में खड़ी थी।
लाल साड़ी फटी हुई, बदन पर लाल-नीले निशान, मंगलसूत्र टूटकर बेसिन में पड़ा था।
वह रो रही थी, पर समझ नहीं आ रहा था कि दर्द से या सुख से।
सीमा अंदर आई, पीछे से गले लगाया।
“घर जाना है कि यहीं रह जाएगी आज?”
त्रिप्ति ने आईने में अपनी सूरत देखी।
लाल लिपस्टिक पूरे चेहरे पर फैली हुई, आँखों में एक ख़ालीपन जो पहले कभी नहीं था।
उसने फुसफुसाया, “मुझे घर जाना है… पर मुझे नहीं पता अब वहाँ मेरा कौन-सा चेहरा जाएगा।”
सीमा ने उसके गाल पर किस किया।
“जो चेहरा घर जाता है, उसे सुबह तक वापस मार डालना। यह वाला चेहरा अब हमारा है।”
त्रिप्ति ने टूटा मंगलसूत्र उठाया।
सोने की चेन दो टुकड़ों में।
वह उसे जेब में रख लिया।
जैसे कोई ताबीज़।
जैसे कोई लानत।
सुबह पाँच बजे वह घर पहुँची।
रोहन अभी सो रहा था।
वह उसके बग़ल में लेटी, उसकी पीठ से सटकर।
उसके शरीर से अभी भी अविनाश और सीमा की महक आ रही थी।
वह धीरे से फुसफुसाई,
“सॉरी रोहन… मैं अब वो त्रिप्ति नहीं हूँ जिससे तुमने शादी की थी।”
रोहन ने नींद में करवट बदली और उसकी कमर में बाँह डाल ली।
जैसे कुछ हुआ ही न हो।
त्रिप्ति की आँखें बंद नहीं हुईं।
वह बस छत को देखती रही।
और सोचती रही कि अगले शुक्रवार को वह कौन-सी साड़ी पहनेगी।
और कब तक यह दोहरी ज़िंदगी चल पाएगी।
या शायद यह सवाल अब बेमानी हो चुका था।
क्योंकि एक त्रिप्ति पहले ही मर चुकी थी।
और दूसरी अभी-अभी जन्मी थी, लाल साड़ी में लिपटी, टूटे मंगलसूत्र के साथ।
जैसे कोई भारी पत्थर कैलेंडर पर लुढ़कता हुआ त्रिप्ति के सीने पर आकर रुका। सीमा ने ऑफिस में बता दिया था की इस वीक कहा पर और कब मिलना है । सीमा पूछने का भी जहमत नहीं उठा रही थी उसको पता था की तृप्ति अब सर के चक्कर में फसी हुई है वो आएगी ही और सीमा अपनी ज़िंदगी की सारी फैंटेसी सर और तृप्ति के साथ पुत्र कर लेना चाहती थी । तृप्ति गिल्ट में भी थी लेकिन वो आगे भी जाना चाह रही थी क्योंकि आख़िर बार जैसा मजा उसने लाइफ में नहीं लिया और वो ये भी जान रही थी की सर से जायदा कोई इस अफेयर को छुपा के नहीं रखना चाहेगा इसीलिए बात बाहर आने की संभावना ही नहीं थी।लेकिन वो गिल्ट को खत्म कैसे करे ये समझ नहीं पा रही थी । अपने मन में चल रहे उफान को दबा कर वो अपना काम करती रही ।
सुबह से ही उसका शरीर अलग-थलग सा चल रहा था।
हाथ अपने आप रेड लिपस्टिक की तरफ़ बढ़ गए, जिसे उसने पिछले दो साल से नहीं छुआ था।
आईने में देखा तो लगा कोई दूसरी औरत उसकी जगह खड़ी है, आँखें चमकती हुईं, होंठ लाल, मंगलसूत्र के बीच में एक छोटा-सा लाल बिंदी सा टीका, जैसे सुहागरात की दुल्हन और रंडी एक साथ।
रोहन (त्रिप्ति का पति )ने ऑफिस जाते वक़्त पूछा, “आज कुछ ख़ास है क्या? इतना तैयार हो रही हो?”
उसने हँसकर टाल दिया, “सीमा का बर्थडे है ना, सरप्राइज़ प्लान है। रात में लेट हो जाऊँगी।”
रोहन ने माथे पर हल्का-सा किस किया, “मज़े करना, जान।”
उसके जाते ही त्रिप्ति बाथरूम में घुसकर उल्टी कर आई। अपराधबोध और उत्तेजना दोनों एक साथ गले में अटक गए थे।
शाम सात बजे गेस्ट हाउस।
लाल बनारसी साड़ी, लाल ब्लाउज़ जिसके हुक पीछे से सिर्फ़ दो थे, आसानी से खुल जाएँ। अंदर कुछ नहीं और सर के हुक्म के मुताबिक़ उसने पेंटी भी नहीं पहनी थी ।
सीमा ने दरवाज़ा खोला तो उसकी आँखें चमक उठीं।
“वाह रंडी, आज तो पूरी दुल्हन बनी है।” तृप्ति चौकी लेकिन वो सीमा को जानती थी की अब वो रुकने वाली नहीं है रास्ते में ही उसने सोच लिया था की आज सारी हदे पर करके मजा लेना है ।
पहला चुम्मा सीमा का था, इतना गहरा कि त्रिप्ति की साँस रुक गई। तृप्ति को सीमा के छूने से परहेज नहीं था हालाकि उसको सर का छूना ज़्यादा पसंद था लेकिन औरत के शरीर का मुलायम टच भी उसको अलग अनुभूति देता था ।
अविनाश सर कमरे के बीच में खडे था, शर्ट की बटन खुली हुईं, आँखों में वो भूख जो पिछले हफ़्ते से बढ़ती ही जा रही थी।
उसने एक शब्द नहीं बोला। बस उँगली से इशारा किया, घुटनों पर।
त्रिप्ति घुटनों पर बैठी।
साड़ी का पल्लू नीचे सरका। मंगलसूत्र लहराता हुआ उसके स्तनों के बीच लटक रहा था।
अविनाश सर ने ज़िप खोली। उसका लंड पहले से ही पूरा तना हुआ था, नसें फूली हुईं।
सीमा पीछे से उसके बाल पकड़कर सिर आगे धकेली।
“पति को गुड नाइट किस किया था ना ? अब असली मर्द को गुड इवनिंग दे।”
पहला धक्का गले में इतना गहरा गया कि त्रिप्ति की आँखों से पानी निकल आया।
फिर भी उसने मना नहीं किया।
वह चूसती रही, आँसुओं के साथ लार, दोनों मिलकर उसके मंगलसूत्र को भिगो रहे थे। उसको लग रहा था की आख़िर बार से लंड और मोटा हो चुका है , वो साथ देती रही पसीने मूत्र और सेक्स की ख़ुश्बू तृप्ति को उत्तेजित कर रही थी , सर आज रहम के मूड में नहीं थे , पिछला सेक्स अचानक हुआ था लेकिन इस बार इंतज़ार के कारण सर की भूख भी बढ़ गई थी । शादी शुदा ग़द्दारी औरत को रगड़ने का सुख कोन मर्द नहीं चाहता होगा । जमकर सर ने तृप्ति के मुंह में अपनी मलाई रगड़ी फिर वे लोग उसे बिस्तर पर ले गए।
साड़ी नहीं उतारी। पिछले बार की तरह बस कमर तक ऊपर उठा दी।
सीमा ने उसकी टाँगें चौड़ी कीं और सर के सामने उसकी गांड पर थप्पड़ मारा।
“याद है ना पिछले हफ़्ते की ट्रेनिंग? आज ग्रेजुएशन है, रंडी।”
ल्यूब ठंडा था। उँगलियाँ तीन पहले से ही आसानी से चली गईं।
त्रिप्ति सिसकियाँ ले रही थी, तकिए में मुँह दबाए।
सीमा उसके कान में फुसफुसाई, “आज दो-दो लंड लेंगे तेरी गांड में। एक असली, एक मेरे स्ट्रैप-ऑन वाला। तैयार है?”
त्रिप्ति ने सहमति में सिर हिलाया।
उसे लगा उसका शरीर अब उसका नहीं रहा। वह बस एक छेद बन चुकी थी, जिसे भरने के लिए दो शैतान बेकरार थे।
सर पहले घुसे
धीरे-धीरे, पर इस बार बिना रुके। पूरा लंड एक ही बार में जड़ तक।
त्रिप्ति की चीख़ कमरे में गूँजी, फिर सीमा ने अपना स्ट्रैप-ऑन (मोटा, काला, चमकता हुआ) उसके मुँह में ठूँस दिया।
दोनों तरफ़ से एक साथ।
वह बीच में फँसी हुई थी, जैसे कोई मांस का टुकड़ा दो भूखे जानवरों के बीच।
कमरे में सिर्फ़ तीन आवाज़ें थीं,
अविनाश की भारी साँसें,
सीमा की गंदी-गंदी गालियाँ,
और त्रिप्ति की टूटी-फूटी सिसकियाँ, “हाँ… और… फाड़ दो… मैं तुम्हारी रंडी हूँ…”
जब अविनाश मीना झड़ा, उसने बाहर नहीं निकाला।
गर्म वीर्य उसकी आँतरी दीवारों पर फैलता हुआ अंदर ही छोड़ दिया।
सीमा ने स्ट्रैप-ऑन निकालकर उसकी जगह लिया। प्लास्टिक था, पर इतना मोटा कि त्रिप्ति फिर चीख़ी।
दूसरे राउंड में उसकी चूत और गांड दोनों एक साथ भरी गईं, अविनाश की उँगलियाँ और सीमा का खिलौना।
रात के तीन बजे त्रिप्ति बाथरूम में खड़ी थी।
लाल साड़ी फटी हुई, बदन पर लाल-नीले निशान, मंगलसूत्र टूटकर बेसिन में पड़ा था।
वह रो रही थी, पर समझ नहीं आ रहा था कि दर्द से या सुख से।
सीमा अंदर आई, पीछे से गले लगाया।
“घर जाना है कि यहीं रह जाएगी आज?”
त्रिप्ति ने आईने में अपनी सूरत देखी।
लाल लिपस्टिक पूरे चेहरे पर फैली हुई, आँखों में एक ख़ालीपन जो पहले कभी नहीं था।
उसने फुसफुसाया, “मुझे घर जाना है… पर मुझे नहीं पता अब वहाँ मेरा कौन-सा चेहरा जाएगा।”
सीमा ने उसके गाल पर किस किया।
“जो चेहरा घर जाता है, उसे सुबह तक वापस मार डालना। यह वाला चेहरा अब हमारा है।”
त्रिप्ति ने टूटा मंगलसूत्र उठाया।
सोने की चेन दो टुकड़ों में।
वह उसे जेब में रख लिया।
जैसे कोई ताबीज़।
जैसे कोई लानत।
सुबह पाँच बजे वह घर पहुँची।
रोहन अभी सो रहा था।
वह उसके बग़ल में लेटी, उसकी पीठ से सटकर।
उसके शरीर से अभी भी अविनाश और सीमा की महक आ रही थी।
वह धीरे से फुसफुसाई,
“सॉरी रोहन… मैं अब वो त्रिप्ति नहीं हूँ जिससे तुमने शादी की थी।”
रोहन ने नींद में करवट बदली और उसकी कमर में बाँह डाल ली।
जैसे कुछ हुआ ही न हो।
त्रिप्ति की आँखें बंद नहीं हुईं।
वह बस छत को देखती रही।
और सोचती रही कि अगले शुक्रवार को वह कौन-सी साड़ी पहनेगी।
और कब तक यह दोहरी ज़िंदगी चल पाएगी।
या शायद यह सवाल अब बेमानी हो चुका था।
क्योंकि एक त्रिप्ति पहले ही मर चुकी थी।
और दूसरी अभी-अभी जन्मी थी, लाल साड़ी में लिपटी, टूटे मंगलसूत्र के साथ।


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