20-11-2025, 09:29 PM
जब पूजा बह गयी।
जयपुर की वो शाम, मई की आखिरी तारीखों में से एक। सूरज ढल चुका था, लेकिन हवा में अभी भी गर्मी की लहरें थीं। हॉस्टल का कमरा 204, जहाँ एसी की ठंडी हवा धीरे-धीरे फैल रही थी, लेकिन वो ठंडक पूजा के मन की उथल-पुथल को शांत नहीं कर पा रही थी। Renu बाहर किसी दोस्त की बर्थडे पार्टी में गई हुई थी, कमरा पूरी तरह अकेला था। पूजा ने सुबह से ही कॉलेज में दिन काटा था — लैब में प्लांट्स पर नोट्स बनाते हुए, विक्रम की नज़रें जो कभी-कभी चुराकर देखतीं, लेकिन वो इग्नोर करती। संजय का मैसेज आया था दोपहर को — "कहो जान, आज क्या बनाया खाने को? मिस कर रहा हूँ तुम्हारी बनाई चाय।" उसने जवाब दिया था, "बस कुछ नहीं, थक गई हूँ। लव यू।" लेकिन दिल में वो खालीपन... वो अकेलापन जो रात को और गहरा हो जाता था।
पूजा ने शाम को नहाया था। गर्म पानी के नीचे खड़ी होकर, वो सोच रही थी — संजय की बाहों की गर्मी, शादी की पहली रात का वो स्पर्श। लेकिन अब... तीन महीने हो चुके थे। फोन पर बातें, वीडियो कॉल पर मुस्कुराहटें, लेकिन वो नरमी, वो चिपकना... सब सपनों में सिमट गया था। उसने आईने के सामने खड़े होकर खुद को देखा। 5 फीट 4 इंच की हाइट, पतली कमर — 24 इंच की, जो संजय को इतनी पसंद थी। छाती 36 की, गोल, भरी हुई। त्वचा गोरी, जैसे दूध में डूबी हुई। लेकिन आज... वो उदास लग रही थी। आँखों के नीचे हल्के काले घेरे।
उसने हल्का गुलाबी टी-शर्ट पहना — पतला कॉटन का, आर्मलेस, जो उसके कंधों को नंगा छोड़ता था। ब्रा नहीं पहनी — गर्मी की वजह से, और शायद मन की थकान से। टी-शर्ट इतनी पतली कि उसके निप्पल्स की हल्की शेप दिख रही थी, गुलाबी-भूरे, सख्त नहीं लेकिन स्पष्ट। नीचे काले शॉर्ट्स — बॉय-शॉर्ट्स स्टाइल, जो उसकी जाँघों को आधा नंगा छोड़ते थे। कूल्हे गोल, मोटे लेकिन फिट। शॉर्ट्स की इलास्टिक कमर पर टाइट, लेकिन पेट का निचला हिस्सा थोड़ा बाहर — नाभि गहरी, गोल। बाल अभी भी गीले, हल्की लहरें पीठ पर लहरा रही थीं। पैर नंगे, नेल पॉलिश गुलाबी। वो बेड पर लेटी, फोन स्क्रॉल कर रही थी, लेकिन मन कहीं और। राजू के मैसेजेस याद आए — वो सादगी, वो भावुकता। "दोस्त हैं हम," सोचा उसने। लेकिन दिल में एक हल्की सी उत्तेजना... वो फ्लर्ट, वो डबल मीनिंग वाली बातें।
तभी दरवाज़े पर खटखट। वॉर्डन का मैसेज आया था — "राजू आ रहा है, फैन का स्विच ठीक करने।" पूजा उठी। दरवाज़ा खोला। राजू खड़ा था — 45 साल का, पेट बाहर निकला हुआ, पुरानी सफेद शर्ट जो पसीने से गीली थी, नीचे मैली पैंट। मुँह में गुटखा, दाँत लाल-भूरे। लेकिन आँखें... आज उदास। चेहरा थका, कंधे झुके। औजारों का बैग कंधे पर।
"नमस्ते पूजा जी। फैन का काम।" उसकी आवाज़ भारी, जैसे रात भर सोया न हो।
पूजा ने मुस्कुराने की कोशिश की। "आओ राजू। अंदर आओ। पहले बैठो, चाय बना रही हूँ। गर्मी बहुत है।"
राजू ने बैग नीचे रखा। बेड के किनारे बैठ गया। कमरे में उसकी मौजूदगी... अजीब सी। पूजा किचन कॉर्नर में गई — गैस ऑन की, चाय उबलने लगी। उसके पीछे से राजू देख रहा था — शॉर्ट्स में उसकी जाँघें, टी-शर्ट में कमर का कर्व। लेकिन वो नज़रें लालची नहीं, बस... उदास। पूजा ने चाय के दो कप बनाए — अदरक वाली, मीठी। कप लिए, झुककर राजू को दिया। झुकते वक़्त टी-शर्ट का गला थोड़ा खुला, उसके बूब्स का ऊपरी हिस्सा झलक गया — गोरा, नरम। राजू ने नज़रें हटाईं, लेकिन दिल में एक हल्की सी धड़कन। "ये पूजा जी... इतनी सुंदर, लेकिन उदास क्यों लग रही है?" सोचा उसने।
"लो राजू। पी लो।" पूजा उसके सामने बेड पर बैठ गई। शॉर्ट्स ऊपर सरक गए, जाँघें और नंगी। नाभि का किनारा दिख रहा था।
राजू ने चुस्की ली। आँखें बंद। साँस ली। "वाह पूजा जी... ये चाय तो... जैसे कोई पुरानी दोस्त लौट आई हो। गर्म, मीठी... मन को छू गई। थैंक यू।"
पूजा ने अपना कप थामा। स्टीम उसके चेहरे पर लग रही थी। "कैसा है दिन राजू? काम कैसा चला?"
राजू ने सिर झुकाया। चाय का कप हाथों में घुमाया। "काम तो चला पूजा जी। लेकिन... मन उदास है। आज सुबह बीवी का फोन आया। बच्चे पूछ रहे थे, 'पापा कब आएंगे?' मैंने कहा, 'जल्दी।' लेकिन कब? दो साल हो गए उसे देखे। वीडियो कॉल पर चेहरा दिखता है, हँसी सुनाई देती है... लेकिन बाकी सब... वो गर्माहट, वो नरमी... बस यादों में।"
पूजा का दिल पिघल गया। उसके हाथ काँपे। संजय की याद — दिल्ली की वो शामें, जब वो उसके पास लेटा रहता, हाथ कमर पर। "मैं समझती हूँ राजू। मुझे भी संजय को मिस करती हूँ। तीन महीने हुए, लेकिन लगता है जिंदगी रुक गई। फोन पर 'हाय जान' कहते हैं, लेकिन वो स्पर्श... वो चिपकना... रात को अकेली लेटी हूँ तो आँखों से आँसू बहते हैं। जैसे कोई हिस्सा खो गया हो।"
राजू ने ऊपर देखा। आँखें नम। "पूजा जी... तुम जैसी जवान औरत... इतना दर्द। मैं तो बूढ़ा हो गया हूँ। दो साल... बीवी को नंगी देखे दो साल हो गए। वीडियो में साड़ी पहने बैठी रहती है, बच्चे पास। मैं कहता हूँ, 'थोड़ा घूंघट हटा लो,' लेकिन वो हँस देती है। लेकिन वो बॉडी... वो जिसे मैं रोज़ छूता था, चूमता था... अब सपनों में ही आती है। कभी-कभी तो लगता है, पागल हो जाऊँगा। कोई ऐसा हो जो ये दर्द समझे।"
पूजा की आँखें भर आईं। उसके होंठ काँपे। "राजू... मैं समझती हूँ। संजय के साथ रातें... वो बाहों में लिपटना, सिर उसके सीने पर। अब तो बेड खाली लगता है। हाथ बढ़ाऊँ तो हवा। रात को नींद नहीं आती, बस यादें घेर लेती हैं। हम दोनों... इतने अकेले। लेकिन बात करके... थोड़ा सुकून मिलता है ना?"
राजू ने सिर हिलाया। लेकिन आवाज़ भारी हो गई। "हाँ पूजा जी। लेकिन कभी-कभी... वो दर्द इतना गहरा हो जाता है। जब बीवी के साथ था... रात को चिपककर सोता था। कभी हाथ न छोड़ता। कमर पकड़कर। होंठ चूसता... वो मीठा स्वाद, वो सिहरन। अब तो कोई गले लगाने को भी नहीं। बस... दीवार से सटकर सोता हूँ। लगता है, कोई तो हो जो...।"
राजू की आवाज़ रुक गई। आँखों से आँसू गिरने लगे। कंधे काँपने लगे। सिसकियाँ निकलीं। "मैं... मैं बहुत टूट गया हूँ पूजा जी। यहाँ कोई नहीं... बस काम और अकेलापन। बच्चे बड़े हो रहे हैं बिना मेरे। बीवी थक रही है। और मैं... बस कमाता हूँ।"
पूजा का दिल फट गया। उसके आँसू भी बहने लगे। संजय का चेहरा आँखों के सामने। वो पहली रात का किस, वो प्यार। "राजू... चुप हो जाओ। सब ठीक हो जाएगा।" वो आगे बढ़ी। राजू को गले लगा लिया। ममता से। "मैं हूँ ना... तुम्हारे साथ। रो मत।"
राजू का सिर उसके सीने पर टिक गया। ठीक बूब्स के ऊपर। टी-शर्ट के ऊपर से। उसकी सिसकियाँ... गर्म साँसें टी-शर्ट को भिगो रही थीं। गीले धब्बे बने — निप्पल्स के चारों ओर। पूजा की साँसें तेज़ हो गईं। राजू की साँसें... सीधे उसके बूब्स पर लग रही थीं। गर्म, नम, काँपती। टी-शर्ट पतली थी, ब्रा न होने से निप्पल्स सख्त हो गए — गुलाबी, छोटे, टी-शर्ट पर उभर आए। पूजा का बदन सिहर गया। लेकिन दया... वो भावना इतनी गहरी थी कि वो रुकी नहीं।
राजू को अहसास हुआ — पूजा का बदन... वो नरमी। गर्मी। सीने की धड़कन। उसके आँसू उसके बूब्स को भिगो रहे थे। और नीचे... पैंट में उसका लंड... धीरे-धीरे सख्त होने लगा। मोटा, 6 इंच का, नसें उभरीं। उभार बन गया। और वो... सीधा पूजा की चूत के पास लग गया। शॉर्ट्स के ऊपर से। गर्म, सख्त दबाव। पूजा को लगा — कुछ गर्म, मोटा... उसकी चूत पर। एक झटका सा लगा। चूत में हल्की सी गुदगुदी। लेकिन वो रुकी। राजू अभी भी रो रहा था।
"पूजा जी... तुम भी तो मिस करती होगी ना? पति को इतने दूर... मन करता होगा उन्हें छूने को, पास बुलाने को। वो रातें... वो प्यार। सिर उनके सीने पर रखना, हाथों की गर्मी। मैं तो बस... टूट रहा हूँ। दो साल... दो साल से वो स्पर्श नहीं। वीडियो में बस चेहरा। बॉडी... वो नंगी त्वचा... बस यादों में। कभी-कभी तो रात को करवटें बदलता रहता हूँ। लगता है, कोई तो हो जो... समझे।"
पूजा की आँखों में आँसू लुढ़क गए। उसके होंठ काँपे। "हाँ राजू... करती हूँ। संजय की बाहों में लिपटना... साँसें उनके गले में। अब तो बेड पर लेटकर फोन देखती हूँ, लेकिन वो खालीपन... जैसे दिल का एक हिस्सा दिल्ली में छूट गया हो। रात को नींद आती ही नहीं। बस आँसू। लेकिन चुप हो जाओ। तुम अकेले नहीं हो। मैं हूँ।" वो राजू को और ज़ोर से गले लगाया। रोते हुए चुप कराने की कोशिश। सिसकियाँ दबा रही थी। "मैं भी अकेली हूँ... हम दोनों... एक ही नाव में।"
राजू ने सिसकी ली। सिर ऊपर किया। आँखें नम, लाल। "मैं बस अकेला हूँ यहाँ। तुम्हारे साथ तो दोस्त भी हैं। लेकिन वो कमी... वो गर्माहट...।"
पूजा ने राजू का सिर उठाया। उँगलियों से आँसू पोछे। नरम स्पर्श। "चुप हो जाओ राजू। सब ठीक हो जाएगा। जाओगे गाँव... मिलोगे बीवी से। बच्चे गले लगेंगे। तुम अकेले नहीं हो। मैं भी अकेली हूँ। दोस्त हैं हम, लेकिन हसबैंड की बात... अलग होती है ना। वो प्यार... वो विश्वास।"
राजू ने आँखें पोंछीं। लेकिन फिर बोला, आवाज़ काँपती। "पर पूजा जी, तुम्हारे साथ तो कोई तो है। फोन पर... बातें। मैं तो... बस दीवारें।"
पूजा ने हल्के से मुस्कुराने की कोशिश की। आँसू अभी भी बह रहे थे। उसके गाल गीले। "अरे मैं हूँ तुम्हारे साथ। रो मत।" पोछते-पोछते... भावनाओं का सैलाब... पूजा ने राजू के माथे पर किस कर दिया। नरम, ममता भरा। जैसे माँ सांत्वना देती हो। फिर गाल पर। गीला, नम। राजू का चेहरा करीब। उसकी साँसें पूजा के होंठों पर।
और एकदम से... राजू ने होंठों पर होंठ रख दिए। गर्म। काँपते। गुटके का हल्का कड़वा स्वाद, लेकिन गहरा दर्द। पूजा चौंक गई। सिहरन सी गई। पीछे हट गई। आँखें फैलीं। साँस रुक गई। "राजू... ये क्या...?"
राजू का चेहरा सफेद। वो रोते हुए दीवार की तरफ़ मुड़ा। सिसकियाँ तेज़। "सॉरी... सॉरी पूजा जी। मैं... मैं पागल हो गया। कोई नहीं मेरे साथ... मैं अकेला हूँ।" कंधे काँपे। "तुम भी नहीं हो... सब सोचते हैं मैं गंदा हूँ। इलेक्ट्रिशियन... बूढ़ा। कौन गले लगाएगा?"
पूजा का मन फट गया। दया का सैलाब। अपराधबोध — संजय के साथ धोखा? लेकिन राजू का दर्द... वो आँसू... वो अकेलापन। वो उठी। राजू के पास गई। कंधे पकड़े। पलटा। राजू का चेहरा गीला, आँखें बंद। "देखो राजू... रो मत। मैं हूँ तुम्हारे साथ। क्या चाहिए? बोलो... चुप हो जाओ। मैं हूँ ना।"
राजू ने सिर झुकाया। रोते हुए बोला, "आप नहीं दे सकती पूजा जी। मैं अपनी पत्नी को मिस कर रहा हूँ। उसके चू... में बोल भी नहीं सकता आपके सामने। मुझे उसे बिना कपड़ों के देखे दो साल हो गए। नंगी त्वचा... वो नरमी... बस सपनों में। आपको तो बस तीन महीने हुए हैं। लेकिन मुझे... दो साल।" सिसकियाँ तेज़। हाथ मुँह पर। कंधे हिल रहे थे।
पूजा को समझ नहीं आया। दिल दुखा। आँसू उसके गालों पर। "राजू... चुप... मैं..." वो कुछ कह न सकी। भावनाएँ उफान पर।
राजू बाहर जाने लगा। दरवाज़ा खोला। कदम काँपते। पूजा ने झटके से हाथ बढ़ाया। दरवाज़ा बंद कर दिया। पीठ से सटकर। "नहीं... तुम ऐसे रोते हुए नहीं जाओगे यहाँ से। और ये पूजा जी क्या है? मैंने कहा ना, पूजा कहकर बात करो। दोस्त हैं हम।"
राजू रुका। पीठ से बोला, आवाज़ फूटी। "नहीं करूँगा मैं पूजा जी बोलूँगा। मैडम बोलूँगा। क्या कर लोगी? मैं तो... गंदा हूँ। तुम जैसी सुंदर औरत... मेरे जैसे को...।" सिसकी निकली।
पूजा का गुस्सा, दया, और वो छिपी उत्तेजना — सब मिक्स हो गया। दिल की धड़कन तेज़। चूत में वो दबाव अभी भी महसूस हो रहा था। वो पास आई। राजू को पलटा। चेहरा करीब। आँखें में आँखें। "ये..."
और होंठों पर होंठ रख दिए। जोर से। चूसने लगी। गर्मी का तूफान। जीभ अंदर। गुटके का कड़वा, लेकिन दर्द का मीठा स्वाद। राजू चौंक गया। हाथ पीछे हटाने की कोशिश। "नहीं... हटो ये क्या कर रही हो मैडम?" सिसकी रुक गई। साँसें तेज़।
पूजा ने और जोर से चूसा। जीभ घुमाई। "फिर मैडम?" उसकी आवाज़ काँपती, लेकिन दृढ़। भावनाएँ... दया... और वो छिपी हवस। संजय का चेहरा दिमाग़ में, लेकिन राजू का दर्द... बड़ा लग रहा था।
राजू का विरोध टूटा। वो भी चूसने लगा। हाथ पूजा की कमर पर। नंगी त्वचा पर। शॉर्ट्स के ऊपर से कूल्हे पकड़े। दोनों एक-दूसरे का साथ देने लगे। पूजा ने राजू का सिर पीछे से पकड़ा। किस गहरा। जीभें मिलीं। साँसें एक। कमरा गर्म हो गया। पूजा का बदन सिहर रहा था। बूब्स दब रहे थे राजू के सीने से। निप्पल्स सख्त, टी-शर्ट पर रगड़। चूत में गीलापन। शॉर्ट्स गीले हो रहे थे।
फिर पूजा ने राजू का एक हाथ उठाया। अपनी टी-शर्ट के नीचे डाला। नंगी त्वचा पर। फिर ऊपर... बूब्स पर। नरम, गर्म गोले। निप्पल्स सख्त। राजू पीछे हटा। आँखें फैलीं। "ये क्या मैडम..." हाथ काँप रहा था। लेकिन न छुड़ा।
"फिर मैडम?" पूजा ने टी-शर्ट के किनारे पकड़े। धीरे से ऊपर किया। सिर से निकाला। फेंक दिया। नंगी ऊपरी बॉडी। गोरी त्वचा, चमकदार। बूब्स गोल, भरे हुए — 36B, निप्पल्स गुलाबी, सख्त, ऊपर तने हुए। कमर पतली, नाभि गहरी। पसलियाँ हल्की उभरीं। कंधे नंगे, गोल। बाल कंधों पर गिरे। वो खड़ी थी, शॉर्ट्स में — जाँघें गोरी, चिकनी। पूजा का बदन... जैसे कोई मूर्ति। सेक्सी, लेकिन भावुक। आँखें नम, होंठ गीले। साँसें तेज़, छाती ऊपर-नीचे।
राजू की नज़रें अटक गईं। आँखें फाड़-फाड़ कर देख रहा था। उसके मन में तूफान। "ये... ये पूजा जी... कितनी सुंदर। बिना ब्रा के टी-शर्ट में तो लग रही थी जैसे कोई सपना। वो उभार... निप्पल्स की शेप। लेकिन अब... नंगी। बूब्स इतने परफेक्ट — गोल, नरम लेकिन सख्त। गोरी त्वचा... जैसे दूध। निप्पल्स गुलाबी, छोटे, चूमने को बुला रहे। कमर इतनी पतली... हाथ घेर लेगा। नाभि... गहरी, उँगली डालने लायक। ये शॉर्ट्स... जाँघें चिकनी, गोरी। कूल्हे गोल। अगर छू लूँ... तो स्वर्ग मिल जाए। लेकिन... ये गलत है। लेकिन दर्द... वो दर्द भूल गया। ये गर्मी... मेरी है।"
राजू का लंड पूरी तरह सख्त। पैंट में दर्द हो रहा था। लेकिन आँखें न हट रही थीं।
पूजा ने धीरे से कहा, आवाज़ काँपती। "अब देख लो। बस... रोंना मत। बीवी नहीं दिखने देती... मैं दिखा रही हूँ। छू भी लो... चू भी लो। लेकिन इससे ज़्यादा नहीं। दोस्त हैं हम... दर्द बाँट रहे हैं।" उसके मन में — अपराधबोध। संजय... "माफ़ कर दो।" लेकिन राजू का दर्द... बड़ा था। और ये उत्तेजना... चूत गीली, सिहरन।
राजू की आँखें पूजा के नंगी छाती पर ठहर गईं। समय जैसे रुक गया हो। कमरे में सिर्फ़ उनकी साँसें — तेज़, काँपती। एसी की ठंडी हवा पूजा के गोरे बदन पर लहरें चला रही थी, लेकिन वो गर्मी... अंदर की गर्मी... सब कुछ भूल गई। पूजा खड़ी थी, टी-शर्ट उतर चुकी थी, शॉर्ट्स में नीचे का हिस्सा अभी भी ढका, लेकिन ऊपर... पूरी तरह खुला। उसके बूब्स — गोल, भरे हुए, 36B के, जैसे दो परफेक्ट सफेद गोले। त्वचा इतनी चिकनी, गोरी कि राजू को लगा जैसे दूध की मलाई। निप्पल्स गुलाबी, छोटे-छोटे, लेकिन सख्त — हवा के स्पर्श से तने हुए, ऊपर की ओर इशारा कर रहे जैसे कोई न्योता दे रहे हों। बूब्स के बीच की गहरी घाटी, जहाँ पसीने की एक बूंद लुढ़क रही थी। कमर नीचे पतली, 24 इंच की, जो बूब्स को और उभारा रही थी। नाभि गहरी, गोल, जैसे कोई रहस्य छिपाए। बाल कंधों पर बिखरे, हल्के गीले, जो उसके बदन की गर्मी से भाप ले रहे थे। पूजा का पूरा बदन... सेक्सी, लेकिन भावुक — आँखें नम, होंठ गीले किस से, साँसें तेज़। वो खड़ी थी, हाथ साइड में, लेकिन मन में तूफान। "ये क्या कर रही हूँ मैं? संजय... माफ़ कर दो। लेकिन राजू का दर्द... वो आँसू... मैं तो बस सांत्वना दे रही हूँ। या... अपनी कमी भर रही हूँ?" चूत में वो गीलापन... सिहरन... उसे रोक नहीं पा रही थी।
राजू का मन... जैसे स्वर्ग खुल गया हो। "अरे बाप रे... ये पूजा... कितनी सुंदर। टी-शर्ट में तो लग रही थी जैसे कोई सपना — वो उभार, निप्पल्स की शेप चिपकी हुई। लेकिन अब... नंगी। बूब्स तो... कमाल के। इतने गोल, नरम लेकिन सख्त। गोरी त्वचा... जैसे कोई राजकुमारी। निप्पल्स गुलाबी, छोटे, चूमने को बुला रहे। घाटी के बीच... अगर जीभ फिराऊँ तो...। कमर इतनी पतली... हाथ घेर लेगा। ये शॉर्ट्स... जाँघें चिकनी, गोरी। कूल्हे गोल। अगर पकड़ लूँ... तो बीवी भूल जाऊँ। लेकिन... गलत है। वो शादीशुदा। लेकिन दर्द... दो साल का दर्द... ये गर्मी भर रही है। थैंक यू पूजा... तू देवी है।" उसका लंड पैंट में दर्द कर रहा था — मोटा, सख्त, नसें उभरीं। लेकिन हाथ काँप रहे थे।
पूजा ने धीरे से कहा, आवाज़ काँपती। आँखें नीची। "अब देख लो राजू। बस... रोंना मत। बीवी नहीं दिखने देती... मैं दिखा रही हूँ। छू भी लो... चू... चू भी लो। लेकिन इससे ज़्यादा नहीं। दोस्त हैं हम... दर्द बाँट रहे हैं।" उसके मन में — "संजय... ये मेरी गलती है। लेकिन राजू... वो रो रहा था। मैं... बस मदद कर रही हूँ। लेकिन ये सिहरन... चूत क्यों गीली हो रही है? आह... रोक लूँ?"
राजू ने सिर हिलाया। आँखें नम, लेकिन चमक। "पूजा... तू... तू कितनी दयालु है। तेरे बूब्स... अरे, कितने सुंदर। इतने गोल, नरम... जैसे फूल। गोरी त्वचा... छूने को जी चाहता है। निप्पल्स... गुलाबी, छोटे... जैसे कोई बच्चा चूमे। मैं... मैंने कभी सोचा भी नहीं... ऐसी सुंदरता। थैंक यू... तू स्वर्ग की परी है।" उसकी आवाज़ भारी, भावुक। हाथ धीरे से बढ़ा। उँगलियाँ काँपतीं। बूब्स पर रखीं। नरम। गर्म। जैसे रुई। धीरे से दबाया। उँगलियाँ फैलीं। एक बूब को घेरा। मसला। हल्के से। पूजा की साँस रुक गई। "आह..." मुँह से धीमी आह निकली। बदन सिहरा। निप्पल सख्त और।
राजू का मन: "ओह... कितनी नरम। दबाने पर जैसे लहरें उठ रही हों। गर्माहट... बीवी से भी ज़्यादा। ये गोरी त्वचा... उँगलियों पर फिसल रही। घाटी के बीच... पसीना... चाटना चाहूँ। लेकिन... धीरे। वो दर्द दे रहा था, अब सुकून दे रहा हूँ। पूजा... तेरा बदन... कमाल।" उसने दूसरा हाथ भी लगाया। दोनों बूब्स पकड़े। मसला। दबाया। उँगलियाँ गहराई में दबीं। पूजा की कमर हल्की सी पीछे झुकी। "उफ़... राजू..." आह लंबी। आनंद की। उसके मन में: "आह... संजय कभी इतना धीरे नहीं... लेकिन ये... दर्द का सुकून। चूत... क्यों इतनी गीली? रोक... लेकिन... और।"
राजू ने सर झुकाया। होंठ एक निप्पल पर। धीरे से चूमा। नरम किस। "पूजा... तेरे निप्पल्स... कितने प्यारे। गुलाबी... मीठे लग रहे। तू... कितनी परफेक्ट है। बूब्स इतने भरे, लेकिन सख्त। जैसे मेरे लिए बने।" जीभ निकली। निप्पल पर फेरी। गोल घुमाई। चूसा। हल्के से। पूजा का हाथ राजू के सिर पर गया। दबाया। "आह... हाँ... राजू..." मॉन लंबी, काँपती। बदन काँपा। निप्पल गीला हो गया। राजू ने दूसरा निप्पल मुँह में लिया। चूसा। काटा हल्के से। दाँतों से। "उफ़... आह... दर्द... लेकिन मज़ा..." पूजा की आह। उसके मन: "ये स्वाद... संजय का नहीं। लेकिन... ये दया... ये स्पर्श। चूत... उँगली डालूँ? नहीं... बस ये। आह... और चूसो।"
राजू ने खेलना शुरू किया। एक बूब मुँह में, दूसरा हाथ से मसलता। उँगली से निप्पल पिंच। घुमाया। दबाया। बूब को ऊपर उठाया। चूमा। नीचे दबाया। लहरें बनीं। "पूजा... तेरे बूब्स... कितने सॉफ्ट। दबाने पर जैसे पानी। लेकिन निप्पल्स... सख्त, चूमने लायक। तू... बॉम्ब है। कमर देख... इतनी पतली। बूब्स ऊपर उभरे। तेरा पूरा बदन... स्वप्न। मैं... भाग्यशाली हूँ।" उसकी साँसें तेज़। लंड दर्द कर रहा। लेकिन भावुकता... "ये दर्द भूल गया। पूजा... तूने बचा लिया।"
पूजा की मॉन बढ़ गईं। "आह... राजू... हाँ... वहाँ... उफ़..." कमर मचली। हाथ सिर पर दबा। शॉर्ट्स में गीलापन फैल गया। "ओह... संजय... सॉरी... लेकिन ये... सुकून। राजू का मुँह... गर्म। निप्पल... काटो... आह!" उसके मन: "ये गलत... लेकिन दर्द... राजू का दर्द मेरा भी। स्पर्श... कितना सालों बाद। चूत... सिहर रही। झड़ूँगी... बस।"
राजू ने बूब्स को एक-दूसरे से दबाया। घाटी बनी। जीभ वहाँ फेरी। चाटा। पसीना चखा। "मीठा... पूजा... तेरी त्वचा... नमकीन-मीठी। बूब्स... कितने भारी। हाथ भर आए। लेकिन नरम। तू... देवी। तेरी कमर... पकड़ूँ तो टूट जाए। लेकिन ये बूब्स... मजबूत। चूमते जाऊँ।" चूसा और। तेज़। काटा। मसला। पूजा की आहें: "आआह... राजू... बस... उफ़... हाँ... और..." बदन काँपा। चूत से पानी। झड़ गई। लंबी सिसकी। "ओह गॉड... आह..."
राजू ने पूजा के फोन से ही pic ली बूब्स के साथ। और कहा अगर आप को भरोसा हो तो भेज देना मुझे।
पूजा: बिल्कुल है। ये बोल के उसे भेज दिया।
राजू रुका। सिर उठाया। आँखें नम। "पूजा... थैंक यू। तू... मेरी जान बचा ली। तेरे बूब्स... कभी भूलूँगा नहीं। सुंदर... परफेक्ट।"
पूजा ने साँसें लीं। टी-शर्ट पहना। लेकिन मन... मिश्रित। आनंद। अपराध। "अब खुश?"
राजू मुस्कुराया। "हाँ... बहुत।"
राजू ने आँसू पोंछे। मुस्कुराया। आँखें चमकीं। "हाँ पूजा... बहुत-बहुत धन्यवाद। तुम जैसी कोई नहीं है। अब से हर काम फ्री में। तुम... स्वर्ग हो।"
पूजा ने हँसने की कोशिश की। लेकिन मन भारी। "अरे अब जाओ... कहीं कोई आ गया तो। कल बात करेंगे।"
राजू ने औजार उठाए। दरवाज़ा खोला। चला गया। कदम हल्के।
बेड पर गिर पड़ी। बदन अभी भी काँप रहा था। टी-शर्ट गीली, बूब्स पर राजू के होंठों का निशान — हल्का लाल। शॉर्ट्स में गीलापन। चूत अभी भी सिहर रही थी। लेकिन मन... तूफान। "ये क्या हो गया? संजय... मैंने धोखा दिया। वो किस... वो स्पर्श। राजू का मुँह... गर्म। लेकिन गलत। मैं शादीशुदा हूँ। मंगलसूत्र गले में है। लेकिन... उसका दर्द... मैंने सांत्वना दी। या... अपनी हवस?" आँसू बहने लगे। संजय का फोन उठाया। डायल किया, लेकिन कट कर दिया। "क्या कहूँगी? झूठ?" मन में उत्तेजना की लहर — राजू का लंड का दबाव याद। "नहीं... कभी नहीं।" लेकिन नींद में... सपने आए। राजू के। संजय के। मिक्स।
राजू बाहर सड़क पर। रात की हवा। पैंट में लंड अभी भी सख्त। "पूजा... कितनी सुंदर। वो बूब्स... स्वाद। मीठे। निप्पल्स... चूमने का मज़ा। कमर... पकड़ने लायक। लेकिन... गलत किया मैंने। वो शादीशुदा। लेकिन दर्द... वो दर्द भूल गया। वो गर्मी... मेरी बीवी जैसी, लेकिन... बेहतर। कल फिर जाऊँगा। काम का बहाना। लेकिन... बस देखूँगा। छूऊँगा?"
जयपुर की वो शाम, मई की आखिरी तारीखों में से एक। सूरज ढल चुका था, लेकिन हवा में अभी भी गर्मी की लहरें थीं। हॉस्टल का कमरा 204, जहाँ एसी की ठंडी हवा धीरे-धीरे फैल रही थी, लेकिन वो ठंडक पूजा के मन की उथल-पुथल को शांत नहीं कर पा रही थी। Renu बाहर किसी दोस्त की बर्थडे पार्टी में गई हुई थी, कमरा पूरी तरह अकेला था। पूजा ने सुबह से ही कॉलेज में दिन काटा था — लैब में प्लांट्स पर नोट्स बनाते हुए, विक्रम की नज़रें जो कभी-कभी चुराकर देखतीं, लेकिन वो इग्नोर करती। संजय का मैसेज आया था दोपहर को — "कहो जान, आज क्या बनाया खाने को? मिस कर रहा हूँ तुम्हारी बनाई चाय।" उसने जवाब दिया था, "बस कुछ नहीं, थक गई हूँ। लव यू।" लेकिन दिल में वो खालीपन... वो अकेलापन जो रात को और गहरा हो जाता था।
पूजा ने शाम को नहाया था। गर्म पानी के नीचे खड़ी होकर, वो सोच रही थी — संजय की बाहों की गर्मी, शादी की पहली रात का वो स्पर्श। लेकिन अब... तीन महीने हो चुके थे। फोन पर बातें, वीडियो कॉल पर मुस्कुराहटें, लेकिन वो नरमी, वो चिपकना... सब सपनों में सिमट गया था। उसने आईने के सामने खड़े होकर खुद को देखा। 5 फीट 4 इंच की हाइट, पतली कमर — 24 इंच की, जो संजय को इतनी पसंद थी। छाती 36 की, गोल, भरी हुई। त्वचा गोरी, जैसे दूध में डूबी हुई। लेकिन आज... वो उदास लग रही थी। आँखों के नीचे हल्के काले घेरे।
उसने हल्का गुलाबी टी-शर्ट पहना — पतला कॉटन का, आर्मलेस, जो उसके कंधों को नंगा छोड़ता था। ब्रा नहीं पहनी — गर्मी की वजह से, और शायद मन की थकान से। टी-शर्ट इतनी पतली कि उसके निप्पल्स की हल्की शेप दिख रही थी, गुलाबी-भूरे, सख्त नहीं लेकिन स्पष्ट। नीचे काले शॉर्ट्स — बॉय-शॉर्ट्स स्टाइल, जो उसकी जाँघों को आधा नंगा छोड़ते थे। कूल्हे गोल, मोटे लेकिन फिट। शॉर्ट्स की इलास्टिक कमर पर टाइट, लेकिन पेट का निचला हिस्सा थोड़ा बाहर — नाभि गहरी, गोल। बाल अभी भी गीले, हल्की लहरें पीठ पर लहरा रही थीं। पैर नंगे, नेल पॉलिश गुलाबी। वो बेड पर लेटी, फोन स्क्रॉल कर रही थी, लेकिन मन कहीं और। राजू के मैसेजेस याद आए — वो सादगी, वो भावुकता। "दोस्त हैं हम," सोचा उसने। लेकिन दिल में एक हल्की सी उत्तेजना... वो फ्लर्ट, वो डबल मीनिंग वाली बातें।
तभी दरवाज़े पर खटखट। वॉर्डन का मैसेज आया था — "राजू आ रहा है, फैन का स्विच ठीक करने।" पूजा उठी। दरवाज़ा खोला। राजू खड़ा था — 45 साल का, पेट बाहर निकला हुआ, पुरानी सफेद शर्ट जो पसीने से गीली थी, नीचे मैली पैंट। मुँह में गुटखा, दाँत लाल-भूरे। लेकिन आँखें... आज उदास। चेहरा थका, कंधे झुके। औजारों का बैग कंधे पर।
"नमस्ते पूजा जी। फैन का काम।" उसकी आवाज़ भारी, जैसे रात भर सोया न हो।
पूजा ने मुस्कुराने की कोशिश की। "आओ राजू। अंदर आओ। पहले बैठो, चाय बना रही हूँ। गर्मी बहुत है।"
राजू ने बैग नीचे रखा। बेड के किनारे बैठ गया। कमरे में उसकी मौजूदगी... अजीब सी। पूजा किचन कॉर्नर में गई — गैस ऑन की, चाय उबलने लगी। उसके पीछे से राजू देख रहा था — शॉर्ट्स में उसकी जाँघें, टी-शर्ट में कमर का कर्व। लेकिन वो नज़रें लालची नहीं, बस... उदास। पूजा ने चाय के दो कप बनाए — अदरक वाली, मीठी। कप लिए, झुककर राजू को दिया। झुकते वक़्त टी-शर्ट का गला थोड़ा खुला, उसके बूब्स का ऊपरी हिस्सा झलक गया — गोरा, नरम। राजू ने नज़रें हटाईं, लेकिन दिल में एक हल्की सी धड़कन। "ये पूजा जी... इतनी सुंदर, लेकिन उदास क्यों लग रही है?" सोचा उसने।
"लो राजू। पी लो।" पूजा उसके सामने बेड पर बैठ गई। शॉर्ट्स ऊपर सरक गए, जाँघें और नंगी। नाभि का किनारा दिख रहा था।
राजू ने चुस्की ली। आँखें बंद। साँस ली। "वाह पूजा जी... ये चाय तो... जैसे कोई पुरानी दोस्त लौट आई हो। गर्म, मीठी... मन को छू गई। थैंक यू।"
पूजा ने अपना कप थामा। स्टीम उसके चेहरे पर लग रही थी। "कैसा है दिन राजू? काम कैसा चला?"
राजू ने सिर झुकाया। चाय का कप हाथों में घुमाया। "काम तो चला पूजा जी। लेकिन... मन उदास है। आज सुबह बीवी का फोन आया। बच्चे पूछ रहे थे, 'पापा कब आएंगे?' मैंने कहा, 'जल्दी।' लेकिन कब? दो साल हो गए उसे देखे। वीडियो कॉल पर चेहरा दिखता है, हँसी सुनाई देती है... लेकिन बाकी सब... वो गर्माहट, वो नरमी... बस यादों में।"
पूजा का दिल पिघल गया। उसके हाथ काँपे। संजय की याद — दिल्ली की वो शामें, जब वो उसके पास लेटा रहता, हाथ कमर पर। "मैं समझती हूँ राजू। मुझे भी संजय को मिस करती हूँ। तीन महीने हुए, लेकिन लगता है जिंदगी रुक गई। फोन पर 'हाय जान' कहते हैं, लेकिन वो स्पर्श... वो चिपकना... रात को अकेली लेटी हूँ तो आँखों से आँसू बहते हैं। जैसे कोई हिस्सा खो गया हो।"
राजू ने ऊपर देखा। आँखें नम। "पूजा जी... तुम जैसी जवान औरत... इतना दर्द। मैं तो बूढ़ा हो गया हूँ। दो साल... बीवी को नंगी देखे दो साल हो गए। वीडियो में साड़ी पहने बैठी रहती है, बच्चे पास। मैं कहता हूँ, 'थोड़ा घूंघट हटा लो,' लेकिन वो हँस देती है। लेकिन वो बॉडी... वो जिसे मैं रोज़ छूता था, चूमता था... अब सपनों में ही आती है। कभी-कभी तो लगता है, पागल हो जाऊँगा। कोई ऐसा हो जो ये दर्द समझे।"
पूजा की आँखें भर आईं। उसके होंठ काँपे। "राजू... मैं समझती हूँ। संजय के साथ रातें... वो बाहों में लिपटना, सिर उसके सीने पर। अब तो बेड खाली लगता है। हाथ बढ़ाऊँ तो हवा। रात को नींद नहीं आती, बस यादें घेर लेती हैं। हम दोनों... इतने अकेले। लेकिन बात करके... थोड़ा सुकून मिलता है ना?"
राजू ने सिर हिलाया। लेकिन आवाज़ भारी हो गई। "हाँ पूजा जी। लेकिन कभी-कभी... वो दर्द इतना गहरा हो जाता है। जब बीवी के साथ था... रात को चिपककर सोता था। कभी हाथ न छोड़ता। कमर पकड़कर। होंठ चूसता... वो मीठा स्वाद, वो सिहरन। अब तो कोई गले लगाने को भी नहीं। बस... दीवार से सटकर सोता हूँ। लगता है, कोई तो हो जो...।"
राजू की आवाज़ रुक गई। आँखों से आँसू गिरने लगे। कंधे काँपने लगे। सिसकियाँ निकलीं। "मैं... मैं बहुत टूट गया हूँ पूजा जी। यहाँ कोई नहीं... बस काम और अकेलापन। बच्चे बड़े हो रहे हैं बिना मेरे। बीवी थक रही है। और मैं... बस कमाता हूँ।"
पूजा का दिल फट गया। उसके आँसू भी बहने लगे। संजय का चेहरा आँखों के सामने। वो पहली रात का किस, वो प्यार। "राजू... चुप हो जाओ। सब ठीक हो जाएगा।" वो आगे बढ़ी। राजू को गले लगा लिया। ममता से। "मैं हूँ ना... तुम्हारे साथ। रो मत।"
राजू का सिर उसके सीने पर टिक गया। ठीक बूब्स के ऊपर। टी-शर्ट के ऊपर से। उसकी सिसकियाँ... गर्म साँसें टी-शर्ट को भिगो रही थीं। गीले धब्बे बने — निप्पल्स के चारों ओर। पूजा की साँसें तेज़ हो गईं। राजू की साँसें... सीधे उसके बूब्स पर लग रही थीं। गर्म, नम, काँपती। टी-शर्ट पतली थी, ब्रा न होने से निप्पल्स सख्त हो गए — गुलाबी, छोटे, टी-शर्ट पर उभर आए। पूजा का बदन सिहर गया। लेकिन दया... वो भावना इतनी गहरी थी कि वो रुकी नहीं।
राजू को अहसास हुआ — पूजा का बदन... वो नरमी। गर्मी। सीने की धड़कन। उसके आँसू उसके बूब्स को भिगो रहे थे। और नीचे... पैंट में उसका लंड... धीरे-धीरे सख्त होने लगा। मोटा, 6 इंच का, नसें उभरीं। उभार बन गया। और वो... सीधा पूजा की चूत के पास लग गया। शॉर्ट्स के ऊपर से। गर्म, सख्त दबाव। पूजा को लगा — कुछ गर्म, मोटा... उसकी चूत पर। एक झटका सा लगा। चूत में हल्की सी गुदगुदी। लेकिन वो रुकी। राजू अभी भी रो रहा था।
"पूजा जी... तुम भी तो मिस करती होगी ना? पति को इतने दूर... मन करता होगा उन्हें छूने को, पास बुलाने को। वो रातें... वो प्यार। सिर उनके सीने पर रखना, हाथों की गर्मी। मैं तो बस... टूट रहा हूँ। दो साल... दो साल से वो स्पर्श नहीं। वीडियो में बस चेहरा। बॉडी... वो नंगी त्वचा... बस यादों में। कभी-कभी तो रात को करवटें बदलता रहता हूँ। लगता है, कोई तो हो जो... समझे।"
पूजा की आँखों में आँसू लुढ़क गए। उसके होंठ काँपे। "हाँ राजू... करती हूँ। संजय की बाहों में लिपटना... साँसें उनके गले में। अब तो बेड पर लेटकर फोन देखती हूँ, लेकिन वो खालीपन... जैसे दिल का एक हिस्सा दिल्ली में छूट गया हो। रात को नींद आती ही नहीं। बस आँसू। लेकिन चुप हो जाओ। तुम अकेले नहीं हो। मैं हूँ।" वो राजू को और ज़ोर से गले लगाया। रोते हुए चुप कराने की कोशिश। सिसकियाँ दबा रही थी। "मैं भी अकेली हूँ... हम दोनों... एक ही नाव में।"
राजू ने सिसकी ली। सिर ऊपर किया। आँखें नम, लाल। "मैं बस अकेला हूँ यहाँ। तुम्हारे साथ तो दोस्त भी हैं। लेकिन वो कमी... वो गर्माहट...।"
पूजा ने राजू का सिर उठाया। उँगलियों से आँसू पोछे। नरम स्पर्श। "चुप हो जाओ राजू। सब ठीक हो जाएगा। जाओगे गाँव... मिलोगे बीवी से। बच्चे गले लगेंगे। तुम अकेले नहीं हो। मैं भी अकेली हूँ। दोस्त हैं हम, लेकिन हसबैंड की बात... अलग होती है ना। वो प्यार... वो विश्वास।"
राजू ने आँखें पोंछीं। लेकिन फिर बोला, आवाज़ काँपती। "पर पूजा जी, तुम्हारे साथ तो कोई तो है। फोन पर... बातें। मैं तो... बस दीवारें।"
पूजा ने हल्के से मुस्कुराने की कोशिश की। आँसू अभी भी बह रहे थे। उसके गाल गीले। "अरे मैं हूँ तुम्हारे साथ। रो मत।" पोछते-पोछते... भावनाओं का सैलाब... पूजा ने राजू के माथे पर किस कर दिया। नरम, ममता भरा। जैसे माँ सांत्वना देती हो। फिर गाल पर। गीला, नम। राजू का चेहरा करीब। उसकी साँसें पूजा के होंठों पर।
और एकदम से... राजू ने होंठों पर होंठ रख दिए। गर्म। काँपते। गुटके का हल्का कड़वा स्वाद, लेकिन गहरा दर्द। पूजा चौंक गई। सिहरन सी गई। पीछे हट गई। आँखें फैलीं। साँस रुक गई। "राजू... ये क्या...?"
राजू का चेहरा सफेद। वो रोते हुए दीवार की तरफ़ मुड़ा। सिसकियाँ तेज़। "सॉरी... सॉरी पूजा जी। मैं... मैं पागल हो गया। कोई नहीं मेरे साथ... मैं अकेला हूँ।" कंधे काँपे। "तुम भी नहीं हो... सब सोचते हैं मैं गंदा हूँ। इलेक्ट्रिशियन... बूढ़ा। कौन गले लगाएगा?"
पूजा का मन फट गया। दया का सैलाब। अपराधबोध — संजय के साथ धोखा? लेकिन राजू का दर्द... वो आँसू... वो अकेलापन। वो उठी। राजू के पास गई। कंधे पकड़े। पलटा। राजू का चेहरा गीला, आँखें बंद। "देखो राजू... रो मत। मैं हूँ तुम्हारे साथ। क्या चाहिए? बोलो... चुप हो जाओ। मैं हूँ ना।"
राजू ने सिर झुकाया। रोते हुए बोला, "आप नहीं दे सकती पूजा जी। मैं अपनी पत्नी को मिस कर रहा हूँ। उसके चू... में बोल भी नहीं सकता आपके सामने। मुझे उसे बिना कपड़ों के देखे दो साल हो गए। नंगी त्वचा... वो नरमी... बस सपनों में। आपको तो बस तीन महीने हुए हैं। लेकिन मुझे... दो साल।" सिसकियाँ तेज़। हाथ मुँह पर। कंधे हिल रहे थे।
पूजा को समझ नहीं आया। दिल दुखा। आँसू उसके गालों पर। "राजू... चुप... मैं..." वो कुछ कह न सकी। भावनाएँ उफान पर।
राजू बाहर जाने लगा। दरवाज़ा खोला। कदम काँपते। पूजा ने झटके से हाथ बढ़ाया। दरवाज़ा बंद कर दिया। पीठ से सटकर। "नहीं... तुम ऐसे रोते हुए नहीं जाओगे यहाँ से। और ये पूजा जी क्या है? मैंने कहा ना, पूजा कहकर बात करो। दोस्त हैं हम।"
राजू रुका। पीठ से बोला, आवाज़ फूटी। "नहीं करूँगा मैं पूजा जी बोलूँगा। मैडम बोलूँगा। क्या कर लोगी? मैं तो... गंदा हूँ। तुम जैसी सुंदर औरत... मेरे जैसे को...।" सिसकी निकली।
पूजा का गुस्सा, दया, और वो छिपी उत्तेजना — सब मिक्स हो गया। दिल की धड़कन तेज़। चूत में वो दबाव अभी भी महसूस हो रहा था। वो पास आई। राजू को पलटा। चेहरा करीब। आँखें में आँखें। "ये..."
और होंठों पर होंठ रख दिए। जोर से। चूसने लगी। गर्मी का तूफान। जीभ अंदर। गुटके का कड़वा, लेकिन दर्द का मीठा स्वाद। राजू चौंक गया। हाथ पीछे हटाने की कोशिश। "नहीं... हटो ये क्या कर रही हो मैडम?" सिसकी रुक गई। साँसें तेज़।
पूजा ने और जोर से चूसा। जीभ घुमाई। "फिर मैडम?" उसकी आवाज़ काँपती, लेकिन दृढ़। भावनाएँ... दया... और वो छिपी हवस। संजय का चेहरा दिमाग़ में, लेकिन राजू का दर्द... बड़ा लग रहा था।
राजू का विरोध टूटा। वो भी चूसने लगा। हाथ पूजा की कमर पर। नंगी त्वचा पर। शॉर्ट्स के ऊपर से कूल्हे पकड़े। दोनों एक-दूसरे का साथ देने लगे। पूजा ने राजू का सिर पीछे से पकड़ा। किस गहरा। जीभें मिलीं। साँसें एक। कमरा गर्म हो गया। पूजा का बदन सिहर रहा था। बूब्स दब रहे थे राजू के सीने से। निप्पल्स सख्त, टी-शर्ट पर रगड़। चूत में गीलापन। शॉर्ट्स गीले हो रहे थे।
फिर पूजा ने राजू का एक हाथ उठाया। अपनी टी-शर्ट के नीचे डाला। नंगी त्वचा पर। फिर ऊपर... बूब्स पर। नरम, गर्म गोले। निप्पल्स सख्त। राजू पीछे हटा। आँखें फैलीं। "ये क्या मैडम..." हाथ काँप रहा था। लेकिन न छुड़ा।
"फिर मैडम?" पूजा ने टी-शर्ट के किनारे पकड़े। धीरे से ऊपर किया। सिर से निकाला। फेंक दिया। नंगी ऊपरी बॉडी। गोरी त्वचा, चमकदार। बूब्स गोल, भरे हुए — 36B, निप्पल्स गुलाबी, सख्त, ऊपर तने हुए। कमर पतली, नाभि गहरी। पसलियाँ हल्की उभरीं। कंधे नंगे, गोल। बाल कंधों पर गिरे। वो खड़ी थी, शॉर्ट्स में — जाँघें गोरी, चिकनी। पूजा का बदन... जैसे कोई मूर्ति। सेक्सी, लेकिन भावुक। आँखें नम, होंठ गीले। साँसें तेज़, छाती ऊपर-नीचे।
राजू की नज़रें अटक गईं। आँखें फाड़-फाड़ कर देख रहा था। उसके मन में तूफान। "ये... ये पूजा जी... कितनी सुंदर। बिना ब्रा के टी-शर्ट में तो लग रही थी जैसे कोई सपना। वो उभार... निप्पल्स की शेप। लेकिन अब... नंगी। बूब्स इतने परफेक्ट — गोल, नरम लेकिन सख्त। गोरी त्वचा... जैसे दूध। निप्पल्स गुलाबी, छोटे, चूमने को बुला रहे। कमर इतनी पतली... हाथ घेर लेगा। नाभि... गहरी, उँगली डालने लायक। ये शॉर्ट्स... जाँघें चिकनी, गोरी। कूल्हे गोल। अगर छू लूँ... तो स्वर्ग मिल जाए। लेकिन... ये गलत है। लेकिन दर्द... वो दर्द भूल गया। ये गर्मी... मेरी है।"
राजू का लंड पूरी तरह सख्त। पैंट में दर्द हो रहा था। लेकिन आँखें न हट रही थीं।
पूजा ने धीरे से कहा, आवाज़ काँपती। "अब देख लो। बस... रोंना मत। बीवी नहीं दिखने देती... मैं दिखा रही हूँ। छू भी लो... चू भी लो। लेकिन इससे ज़्यादा नहीं। दोस्त हैं हम... दर्द बाँट रहे हैं।" उसके मन में — अपराधबोध। संजय... "माफ़ कर दो।" लेकिन राजू का दर्द... बड़ा था। और ये उत्तेजना... चूत गीली, सिहरन।
राजू की आँखें पूजा के नंगी छाती पर ठहर गईं। समय जैसे रुक गया हो। कमरे में सिर्फ़ उनकी साँसें — तेज़, काँपती। एसी की ठंडी हवा पूजा के गोरे बदन पर लहरें चला रही थी, लेकिन वो गर्मी... अंदर की गर्मी... सब कुछ भूल गई। पूजा खड़ी थी, टी-शर्ट उतर चुकी थी, शॉर्ट्स में नीचे का हिस्सा अभी भी ढका, लेकिन ऊपर... पूरी तरह खुला। उसके बूब्स — गोल, भरे हुए, 36B के, जैसे दो परफेक्ट सफेद गोले। त्वचा इतनी चिकनी, गोरी कि राजू को लगा जैसे दूध की मलाई। निप्पल्स गुलाबी, छोटे-छोटे, लेकिन सख्त — हवा के स्पर्श से तने हुए, ऊपर की ओर इशारा कर रहे जैसे कोई न्योता दे रहे हों। बूब्स के बीच की गहरी घाटी, जहाँ पसीने की एक बूंद लुढ़क रही थी। कमर नीचे पतली, 24 इंच की, जो बूब्स को और उभारा रही थी। नाभि गहरी, गोल, जैसे कोई रहस्य छिपाए। बाल कंधों पर बिखरे, हल्के गीले, जो उसके बदन की गर्मी से भाप ले रहे थे। पूजा का पूरा बदन... सेक्सी, लेकिन भावुक — आँखें नम, होंठ गीले किस से, साँसें तेज़। वो खड़ी थी, हाथ साइड में, लेकिन मन में तूफान। "ये क्या कर रही हूँ मैं? संजय... माफ़ कर दो। लेकिन राजू का दर्द... वो आँसू... मैं तो बस सांत्वना दे रही हूँ। या... अपनी कमी भर रही हूँ?" चूत में वो गीलापन... सिहरन... उसे रोक नहीं पा रही थी।
राजू का मन... जैसे स्वर्ग खुल गया हो। "अरे बाप रे... ये पूजा... कितनी सुंदर। टी-शर्ट में तो लग रही थी जैसे कोई सपना — वो उभार, निप्पल्स की शेप चिपकी हुई। लेकिन अब... नंगी। बूब्स तो... कमाल के। इतने गोल, नरम लेकिन सख्त। गोरी त्वचा... जैसे कोई राजकुमारी। निप्पल्स गुलाबी, छोटे, चूमने को बुला रहे। घाटी के बीच... अगर जीभ फिराऊँ तो...। कमर इतनी पतली... हाथ घेर लेगा। ये शॉर्ट्स... जाँघें चिकनी, गोरी। कूल्हे गोल। अगर पकड़ लूँ... तो बीवी भूल जाऊँ। लेकिन... गलत है। वो शादीशुदा। लेकिन दर्द... दो साल का दर्द... ये गर्मी भर रही है। थैंक यू पूजा... तू देवी है।" उसका लंड पैंट में दर्द कर रहा था — मोटा, सख्त, नसें उभरीं। लेकिन हाथ काँप रहे थे।
पूजा ने धीरे से कहा, आवाज़ काँपती। आँखें नीची। "अब देख लो राजू। बस... रोंना मत। बीवी नहीं दिखने देती... मैं दिखा रही हूँ। छू भी लो... चू... चू भी लो। लेकिन इससे ज़्यादा नहीं। दोस्त हैं हम... दर्द बाँट रहे हैं।" उसके मन में — "संजय... ये मेरी गलती है। लेकिन राजू... वो रो रहा था। मैं... बस मदद कर रही हूँ। लेकिन ये सिहरन... चूत क्यों गीली हो रही है? आह... रोक लूँ?"
राजू ने सिर हिलाया। आँखें नम, लेकिन चमक। "पूजा... तू... तू कितनी दयालु है। तेरे बूब्स... अरे, कितने सुंदर। इतने गोल, नरम... जैसे फूल। गोरी त्वचा... छूने को जी चाहता है। निप्पल्स... गुलाबी, छोटे... जैसे कोई बच्चा चूमे। मैं... मैंने कभी सोचा भी नहीं... ऐसी सुंदरता। थैंक यू... तू स्वर्ग की परी है।" उसकी आवाज़ भारी, भावुक। हाथ धीरे से बढ़ा। उँगलियाँ काँपतीं। बूब्स पर रखीं। नरम। गर्म। जैसे रुई। धीरे से दबाया। उँगलियाँ फैलीं। एक बूब को घेरा। मसला। हल्के से। पूजा की साँस रुक गई। "आह..." मुँह से धीमी आह निकली। बदन सिहरा। निप्पल सख्त और।
राजू का मन: "ओह... कितनी नरम। दबाने पर जैसे लहरें उठ रही हों। गर्माहट... बीवी से भी ज़्यादा। ये गोरी त्वचा... उँगलियों पर फिसल रही। घाटी के बीच... पसीना... चाटना चाहूँ। लेकिन... धीरे। वो दर्द दे रहा था, अब सुकून दे रहा हूँ। पूजा... तेरा बदन... कमाल।" उसने दूसरा हाथ भी लगाया। दोनों बूब्स पकड़े। मसला। दबाया। उँगलियाँ गहराई में दबीं। पूजा की कमर हल्की सी पीछे झुकी। "उफ़... राजू..." आह लंबी। आनंद की। उसके मन में: "आह... संजय कभी इतना धीरे नहीं... लेकिन ये... दर्द का सुकून। चूत... क्यों इतनी गीली? रोक... लेकिन... और।"
राजू ने सर झुकाया। होंठ एक निप्पल पर। धीरे से चूमा। नरम किस। "पूजा... तेरे निप्पल्स... कितने प्यारे। गुलाबी... मीठे लग रहे। तू... कितनी परफेक्ट है। बूब्स इतने भरे, लेकिन सख्त। जैसे मेरे लिए बने।" जीभ निकली। निप्पल पर फेरी। गोल घुमाई। चूसा। हल्के से। पूजा का हाथ राजू के सिर पर गया। दबाया। "आह... हाँ... राजू..." मॉन लंबी, काँपती। बदन काँपा। निप्पल गीला हो गया। राजू ने दूसरा निप्पल मुँह में लिया। चूसा। काटा हल्के से। दाँतों से। "उफ़... आह... दर्द... लेकिन मज़ा..." पूजा की आह। उसके मन: "ये स्वाद... संजय का नहीं। लेकिन... ये दया... ये स्पर्श। चूत... उँगली डालूँ? नहीं... बस ये। आह... और चूसो।"
राजू ने खेलना शुरू किया। एक बूब मुँह में, दूसरा हाथ से मसलता। उँगली से निप्पल पिंच। घुमाया। दबाया। बूब को ऊपर उठाया। चूमा। नीचे दबाया। लहरें बनीं। "पूजा... तेरे बूब्स... कितने सॉफ्ट। दबाने पर जैसे पानी। लेकिन निप्पल्स... सख्त, चूमने लायक। तू... बॉम्ब है। कमर देख... इतनी पतली। बूब्स ऊपर उभरे। तेरा पूरा बदन... स्वप्न। मैं... भाग्यशाली हूँ।" उसकी साँसें तेज़। लंड दर्द कर रहा। लेकिन भावुकता... "ये दर्द भूल गया। पूजा... तूने बचा लिया।"
पूजा की मॉन बढ़ गईं। "आह... राजू... हाँ... वहाँ... उफ़..." कमर मचली। हाथ सिर पर दबा। शॉर्ट्स में गीलापन फैल गया। "ओह... संजय... सॉरी... लेकिन ये... सुकून। राजू का मुँह... गर्म। निप्पल... काटो... आह!" उसके मन: "ये गलत... लेकिन दर्द... राजू का दर्द मेरा भी। स्पर्श... कितना सालों बाद। चूत... सिहर रही। झड़ूँगी... बस।"
राजू ने बूब्स को एक-दूसरे से दबाया। घाटी बनी। जीभ वहाँ फेरी। चाटा। पसीना चखा। "मीठा... पूजा... तेरी त्वचा... नमकीन-मीठी। बूब्स... कितने भारी। हाथ भर आए। लेकिन नरम। तू... देवी। तेरी कमर... पकड़ूँ तो टूट जाए। लेकिन ये बूब्स... मजबूत। चूमते जाऊँ।" चूसा और। तेज़। काटा। मसला। पूजा की आहें: "आआह... राजू... बस... उफ़... हाँ... और..." बदन काँपा। चूत से पानी। झड़ गई। लंबी सिसकी। "ओह गॉड... आह..."
राजू ने पूजा के फोन से ही pic ली बूब्स के साथ। और कहा अगर आप को भरोसा हो तो भेज देना मुझे।
पूजा: बिल्कुल है। ये बोल के उसे भेज दिया।
राजू रुका। सिर उठाया। आँखें नम। "पूजा... थैंक यू। तू... मेरी जान बचा ली। तेरे बूब्स... कभी भूलूँगा नहीं। सुंदर... परफेक्ट।"
पूजा ने साँसें लीं। टी-शर्ट पहना। लेकिन मन... मिश्रित। आनंद। अपराध। "अब खुश?"
राजू मुस्कुराया। "हाँ... बहुत।"
राजू ने आँसू पोंछे। मुस्कुराया। आँखें चमकीं। "हाँ पूजा... बहुत-बहुत धन्यवाद। तुम जैसी कोई नहीं है। अब से हर काम फ्री में। तुम... स्वर्ग हो।"
पूजा ने हँसने की कोशिश की। लेकिन मन भारी। "अरे अब जाओ... कहीं कोई आ गया तो। कल बात करेंगे।"
राजू ने औजार उठाए। दरवाज़ा खोला। चला गया। कदम हल्के।
बेड पर गिर पड़ी। बदन अभी भी काँप रहा था। टी-शर्ट गीली, बूब्स पर राजू के होंठों का निशान — हल्का लाल। शॉर्ट्स में गीलापन। चूत अभी भी सिहर रही थी। लेकिन मन... तूफान। "ये क्या हो गया? संजय... मैंने धोखा दिया। वो किस... वो स्पर्श। राजू का मुँह... गर्म। लेकिन गलत। मैं शादीशुदा हूँ। मंगलसूत्र गले में है। लेकिन... उसका दर्द... मैंने सांत्वना दी। या... अपनी हवस?" आँसू बहने लगे। संजय का फोन उठाया। डायल किया, लेकिन कट कर दिया। "क्या कहूँगी? झूठ?" मन में उत्तेजना की लहर — राजू का लंड का दबाव याद। "नहीं... कभी नहीं।" लेकिन नींद में... सपने आए। राजू के। संजय के। मिक्स।
राजू बाहर सड़क पर। रात की हवा। पैंट में लंड अभी भी सख्त। "पूजा... कितनी सुंदर। वो बूब्स... स्वाद। मीठे। निप्पल्स... चूमने का मज़ा। कमर... पकड़ने लायक। लेकिन... गलत किया मैंने। वो शादीशुदा। लेकिन दर्द... वो दर्द भूल गया। वो गर्मी... मेरी बीवी जैसी, लेकिन... बेहतर। कल फिर जाऊँगा। काम का बहाना। लेकिन... बस देखूँगा। छूऊँगा?"


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