20-11-2025, 09:24 PM
College me
प्रोफेसर अवस्थी (56 साल)
डिपार्टमेंट ऑफ बॉटनी के हेड।
लंबे, दुबले, सफ़ेद बाल, मोटा चश्मा, हमेशा सफ़ेद कुर्ता-पायजामा।
उम्र 56, लेकिन आँखों में कुछ और ही था।
क्लास में जब भी पूजा कोई सवाल पूछती या जवाब देती, प्रोफेसर अवस्थी की नज़रें उस पर टिक जातीं।
बाकी स्टूडेंट्स की ओर देखते भी नहीं थे।
“पूजा जी, बहुत अच्छा एनालिसिस। आप तो हमारे डिपार्टमेंट की शान हैं।”
और फिर एक अजीब सी मुस्कान।
कभी प्रैक्टिकल में पूजा का ग्रुप अलग कर देते।
“आप मेरे साथ आइए, मैं आपको पर्सनली गाइड करूँगा।”
उसकी आवाज़ में एक अजीब सी मिठास।
जब पूजा माइक्रोस्कोप पर झुकती, तो वो पीछे से पास खड़े हो जाते — इतने पास कि उनकी साँसें पूजा की गर्दन पर महसूस होतीं।
“ये देखिए… ये सेल डिवीजन है…” कहते हुए उनका हाथ पूजा के हाथ के ऊपर से गुज़र जाता।
पूजा हर बार झटक के हट जाती।
“थैंक यू सर, मैं समझ गई।”
और तेज़ी से दूसरी तरफ़ चली जाती।
क्लास के बाद कभी-कभी कॉरिडोर में रोक लेते।
“पूजा, आपकी रिसर्च प्रपोज़ल बहुत अच्छी है। मेरे चैम्बर में आइए, मैं पर्सनली देख लूँगा।”
पूजा हर बार मना कर देती।
“सर, मैं बाद में मेल कर दूँगी।”
और सिर झुकाए तेज़ कदमों से निकल जाती।
लड़कियाँ पीछे हँसतीं — “देखा, अवस्थी सर को तो पूजा पर क्रश हो गया है।”
Renu: “अरे यार, 56 साल का बूढ़ा! तू तो बच के रहना।”
पूजा बस चुप रहती। मन में घिन्न।
विक्रम अब क्लास में या लॉन में देखते ही सिर झुका लेता।
लेकिन पूजा भी अब पूरी तरह इग्नोर नहीं कर पाती थी।
कैंटीन में लाइन में खड़े हों तो अचानक कंधे से कंधा टकरा जाता।
दोनों एकदम से हटते, लेकिन उस एक सेकंड के स्पर्श में बिजली सी दौड़ जाती।
एक बार लाइब्रेरी में दोनों एक ही बुक ढूंढ रहे थे।
हाथ आपस में टकराए।
विक्रम ने बुक छोड़ दी।
“तुम ले लो…”
पूजा ने भी छोड़ दी।
“नहीं तुम…”
दोनों की उंगलियाँ एक-दूसरे पर रुक गईं।
5 सेकंड।
कोई कुछ नहीं बोला।
फिर पूजा ने बुक उठाई और तेज़ी से चली गई।
लेकिन उसकी हथेली में विक्रम की उंगलियों की गर्मी घंटों तक बनी रही।
एक दिन प्रैक्टिकल में ग्रुप वर्क था।
विक्रम और पूजा एक ही टेबल पर।
पौधे का सैंपल काटते वक़्त विक्रम का हाथ पूजा की कमर से हल्का सा छू गया।
पूजा सिहर गई।
विक्रम ने तुरंत हाथ हटा लिया।
“सॉरी…”
पूजा ने सिर हिलाया, लेकिन आँखें मिलीं।
उस पल में बहुत कुछ था — नाराज़गी, शर्म, और वो पुरानी सी उत्तेजना।
क्लास के बाद लॉन में।
विक्रम ने हिम्मत करके पास आया।
“पूजा… बस दो मिनट।”
पूजा रुक गई, लेकिन पीठ फेर के खड़ी रही।
विक्रम: “मैं जानता हूँ तू मुझसे नाराज़ है। मैंने गलती की थी। लेकिन… मैं अब भी… वही सब महसूस करता हूँ।”
पूजा चुप।
उसके गले में कुछ अटक गया।
विक्रम: “मैं तुझसे दूर रहने की कोशिश कर रहा हूँ… लेकिन हो नहीं पाता।”
पूजा ने मुड़कर देखा। उसकी आँखें नम थीं।
“विक्रम… प्लीज़। मैं शादीशुदा हूँ। और मैं… मैं खुद को समझा चुकी हूँ।”
विक्रम ने सिर झुकाया।
“मैं समझता हूँ। बस… कभी-कभी दिल नहीं मानता।”
फिर दोनों अलग हो गए।
लेकिन वो एक झलक, वो एक स्पर्श, वो एक लंबी चुप्पी —
दोनों के दिलों में अभी भी ज़िंदा थी।
प्रोफेसर अवस्थी (56 साल)
डिपार्टमेंट ऑफ बॉटनी के हेड।
लंबे, दुबले, सफ़ेद बाल, मोटा चश्मा, हमेशा सफ़ेद कुर्ता-पायजामा।
उम्र 56, लेकिन आँखों में कुछ और ही था।
क्लास में जब भी पूजा कोई सवाल पूछती या जवाब देती, प्रोफेसर अवस्थी की नज़रें उस पर टिक जातीं।
बाकी स्टूडेंट्स की ओर देखते भी नहीं थे।
“पूजा जी, बहुत अच्छा एनालिसिस। आप तो हमारे डिपार्टमेंट की शान हैं।”
और फिर एक अजीब सी मुस्कान।
कभी प्रैक्टिकल में पूजा का ग्रुप अलग कर देते।
“आप मेरे साथ आइए, मैं आपको पर्सनली गाइड करूँगा।”
उसकी आवाज़ में एक अजीब सी मिठास।
जब पूजा माइक्रोस्कोप पर झुकती, तो वो पीछे से पास खड़े हो जाते — इतने पास कि उनकी साँसें पूजा की गर्दन पर महसूस होतीं।
“ये देखिए… ये सेल डिवीजन है…” कहते हुए उनका हाथ पूजा के हाथ के ऊपर से गुज़र जाता।
पूजा हर बार झटक के हट जाती।
“थैंक यू सर, मैं समझ गई।”
और तेज़ी से दूसरी तरफ़ चली जाती।
क्लास के बाद कभी-कभी कॉरिडोर में रोक लेते।
“पूजा, आपकी रिसर्च प्रपोज़ल बहुत अच्छी है। मेरे चैम्बर में आइए, मैं पर्सनली देख लूँगा।”
पूजा हर बार मना कर देती।
“सर, मैं बाद में मेल कर दूँगी।”
और सिर झुकाए तेज़ कदमों से निकल जाती।
लड़कियाँ पीछे हँसतीं — “देखा, अवस्थी सर को तो पूजा पर क्रश हो गया है।”
Renu: “अरे यार, 56 साल का बूढ़ा! तू तो बच के रहना।”
पूजा बस चुप रहती। मन में घिन्न।
विक्रम अब क्लास में या लॉन में देखते ही सिर झुका लेता।
लेकिन पूजा भी अब पूरी तरह इग्नोर नहीं कर पाती थी।
कैंटीन में लाइन में खड़े हों तो अचानक कंधे से कंधा टकरा जाता।
दोनों एकदम से हटते, लेकिन उस एक सेकंड के स्पर्श में बिजली सी दौड़ जाती।
एक बार लाइब्रेरी में दोनों एक ही बुक ढूंढ रहे थे।
हाथ आपस में टकराए।
विक्रम ने बुक छोड़ दी।
“तुम ले लो…”
पूजा ने भी छोड़ दी।
“नहीं तुम…”
दोनों की उंगलियाँ एक-दूसरे पर रुक गईं।
5 सेकंड।
कोई कुछ नहीं बोला।
फिर पूजा ने बुक उठाई और तेज़ी से चली गई।
लेकिन उसकी हथेली में विक्रम की उंगलियों की गर्मी घंटों तक बनी रही।
एक दिन प्रैक्टिकल में ग्रुप वर्क था।
विक्रम और पूजा एक ही टेबल पर।
पौधे का सैंपल काटते वक़्त विक्रम का हाथ पूजा की कमर से हल्का सा छू गया।
पूजा सिहर गई।
विक्रम ने तुरंत हाथ हटा लिया।
“सॉरी…”
पूजा ने सिर हिलाया, लेकिन आँखें मिलीं।
उस पल में बहुत कुछ था — नाराज़गी, शर्म, और वो पुरानी सी उत्तेजना।
क्लास के बाद लॉन में।
विक्रम ने हिम्मत करके पास आया।
“पूजा… बस दो मिनट।”
पूजा रुक गई, लेकिन पीठ फेर के खड़ी रही।
विक्रम: “मैं जानता हूँ तू मुझसे नाराज़ है। मैंने गलती की थी। लेकिन… मैं अब भी… वही सब महसूस करता हूँ।”
पूजा चुप।
उसके गले में कुछ अटक गया।
विक्रम: “मैं तुझसे दूर रहने की कोशिश कर रहा हूँ… लेकिन हो नहीं पाता।”
पूजा ने मुड़कर देखा। उसकी आँखें नम थीं।
“विक्रम… प्लीज़। मैं शादीशुदा हूँ। और मैं… मैं खुद को समझा चुकी हूँ।”
विक्रम ने सिर झुकाया।
“मैं समझता हूँ। बस… कभी-कभी दिल नहीं मानता।”
फिर दोनों अलग हो गए।
लेकिन वो एक झलक, वो एक स्पर्श, वो एक लंबी चुप्पी —
दोनों के दिलों में अभी भी ज़िंदा थी।


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