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Adultery एक पत्नी का सफर
#13
फ्रेशर्स पार्टी के बाद की वो रात
हॉस्टल का कमरा 204।
रात के 1:27 बज रहे थे।
बाहर जयपुर की सड़कें ख़ामोश, सिर्फ़ दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़।
कमरे में सिर्फ़ पंखे की आवाज़ और Pooja की सिसकियाँ।

Pooja बेड पर घुटनों के बल बैठी थी।
साड़ी ज़मीन पर पड़ी थी, जैसे उसकी शादी की सारी पवित्रता भी वहीं गिर गई हो।
ब्लाउज़ खुला हुआ, कंधे पर लटका हुआ।
उसके हाथ में मंगलसूत्र था — जो उसने आज पहनने से इनकार कर दिया था।
अब वो उसे इतनी ज़ोर से पकड़े थी कि हथेली पर निशान पड़ गए थे।

उसकी आँखें सूजी हुईं।
होंठ काँप रहे थे।
हर साँस के साथ सीने में एक तेज़ दर्द।

“संजय...”
उसने फुसफुसाया।
और फिर एक लंबी, दर्द भरी सिसकी।

उसके दिमाग़ में वो पल बार-बार चल रहा था —
वो पहला किस।
Vikram के होंठों की गर्मी।
उसकी जीभ का स्वाद।
उसकी उंगलियाँ उसकी कमर पर।
और सबसे भयानक —
उसने भी जवाब दिया था।
उसने भी जीभ बढ़ाई थी।
उसने भी आँखें बंद कर ली थीं।

“मैंने धोखा कर दिया...”
उसकी आवाज़ फटी।
“मैंने संजय का विश्वास तोड़ दिया...”

उसे याद आया —
शादी की पहली रात।
संजय का डर। उसका प्यार।
उसने कितनी मुश्किल से उसे छुआ था।
कितने प्यार से।
और आज...
उसने किसी और को...

उसकी छाती में एक खालीपन।
जैसे कोई बहुत बड़ी चीज़ हमेशा के लिए खो गई हो।

वो बेड से उठी।
आईने के सामने खड़ी हुई।
अपने होंठ देखे — अभी भी सूजे हुए।
गालों पर लाली — शर्म की नहीं, अपराधबोध की।

“मैं कौन हूँ अब?”
उसने खुद से पूछा।
“संजय की Pooja? या... वो औरत जो आज किसी और के साथ...”

उसने मंगलसूत्र गले में डाला।
ठंडा सोना उसकी गर्म त्वचा पर छुआ।
और फिर वो ज़मीन पर बैठ गई।
सिर घुटनों में छिपाया।
और रोई।
ऐसी रोई जैसे कभी रुकेगी नहीं।

उसे याद आया —
संजय का फोन।
“जान, तुम ठीक तो हो ना?”
और उसने झूठ बोला था।
“हाँ... बस थक गई हूँ।”

उसके मन में एक तूफ़ान था —
एक तरफ़ Vikram की मुस्कान।
उसकी आवाज़।
उसकी गर्मी।
दूसरी तरफ़ संजय का चेहरा।
उसकी शादी की रात।
उसका प्यार।

“मैं पागल हूँ...”
“मैं बहुत बुरी हूँ...”
“मैंने सब कुछ बर्बाद कर दिया...”

Renu की नींद खुली।
उसने देखा — Pooja ज़मीन पर बैठी रो रही है।

“Pooja...?”
Renu उठी।
उसने उसे गले लगाया।

“क्या हुआ रे?”

Pooja ने कुछ नहीं कहा।
बस रोती रही।

Renu समझ गई।
“Vikram...?”

Pooja ने सिर हिलाया।
फिर फुसफुसाई,
“मैंने... किस कर लिया...”

Renu चुप हो गई।
उसने उसे और ज़ोर से गले लगाया।

“तूने कुछ गलत नहीं किया... बस... इंसान है तू।”

लेकिन Pooja के लिए ये बातें मायने नहीं रखती थीं।
उसके लिए —
उसने अपने पति का दिल तोड़ दिया था।
भले ही संजय को पता ना चले।
लेकिन उसे पता था।

और ये अपराधबोध —
उसे ज़िंदगी भर खाएगा।

वो बेड पर लेट गई।
मंगलसूत्र को सीने से चिपकाया।
और आँखें बंद कीं।

उसे संजय का चेहरा दिखा।
उसकी मुस्कान।
उसकी आवाज़ —
“तुम मेरी हो... सिर्फ़ मेरी...”

और फिर आँसू फिर बहने लगे।

“माफ़ कर दो मुझे संजय...”
“मैं बहुत गलत हूँ...”
“मैं तुम्हारे लायक नहीं...”

रात गुज़रती गई।
लेकिन उसका दिल —
उस रात में कहीं खो गया।

और सुबह होने पर भी —
उसके अंदर अंधेरा ही था।

कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई थी।
बल्कि अब शुरू हुई थी —
एक ऐसी औरत की,
जो अपने प्यार और अपनी गलती के बीच फँस गई थी।
हमेशा के लिए।
अगले दिन सुबह के 8:30 बजे।
जयपुर की सड़कें अभी भी धुंधली थीं, लेकिन पूजा का मन उससे भी ज़्यादा धुंधला।
रात भर की नींद टूटी-फूटी रही थी। आँखें सूजी हुईं, गालों पर सूखे आँसुओं के निशान।
उसने आईने के सामने खड़े होकर खुद को देखा।
“क्या कर रही हूँ मैं?”
फिर एक गहरी साँस ली।

आज वो सिंपल सलवार-सूट में थी — हल्का नीला, कॉटन का, दुपट्टा सिर पर।
ब्लाउज़ लूज़, लेकिन उसकी पतली कमर और गोरी त्वचा फिर भी झलक रही थी।
बाल चोटी में बाँधे, माथे पर छोटी सी बिंदी।
होंठों पर कोई लिपस्टिक नहीं — सिर्फ़ प्राकृतिक गुलाबी।
चप्पलें साधारण, बैग में किताबें।

कॉलेज पहुँचते ही पूजा ने सिर झुकाए रखा।
क्लास में बैठी, लेकिन दिमाग़ कहीं और।
Vikram का चेहरा, उसका किस, और संजय की मुस्कान — सब घूम रहे थे।

क्लास के बाद लॉन में।
Vikram वहाँ खड़ा था। सफ़ेद शर्ट, जींस। आँखों में चिंता।
उसने पूजा को देखा और आगे बढ़ा।

“Pooja... सुनो ना...”

पूजा ने सिर झटका। बिना रुके चलती रही।
उसकी चोटी हवा में लहराई।

Vikram ने कंधे पकड़ने की कोशिश की।
“प्लीज़... कल की बात के लिए सॉरी। मैंने गलती की। लेकिन...”

पूजा ने झटक दिया।
“मुझसे बात मत करो विक्रम।”
उसकी आवाज़ कठोर, लेकिन काँप रही थी।
“मैं नहीं मिलना चाहती तुमसे। कभी नहीं।”

Vikram रुक गया।
उसकी आँखें नम हो गईं।
“Pooja... मैं...”

लेकिन पूजा चली गई।
उसकी पीठ सीधी, कदम तेज़।
दिल में एक तूफ़ान — गुस्सा विक्रम पर, गुस्सा खुद पर।
“मैंने क्या सोचा था? वो मेरा दोस्त था... बस दोस्त।”

पूजा ने कैंटीन में अकेले बैठकर चाय पी।
फोन पर संजय का मैसेज आया — “गुड मॉर्निंग जान। आज कॉलेज कैसा?”
उसने जवाब दिया — “ठीक है। मिस यू।”
लेकिन मन में अपराधबोध।

हॉस्टल में लौटते ही वॉर्डन का फोन आया।
“पूजा, इलेक्ट्रिक का काम है। राजू आ रहा है।”

पूजा ने हामी भरी।
कमरे में पहुँची। Renu बाहर गई थी।
वो बेड पर लेटी, नीले सूट को उतारकर हल्का कुर्ता पहन लिया।
पसीना अभी भी था — कुर्ता उसकी छाती से चिपक गया।

दरवाज़े पर खटखट।
राजू।
आज वो सफाई से था — पुरानी शर्ट, पैंट। लेकिन गुटखा अभी भी मुँह में।
उसकी आँखें पूजा पर ठहरीं।
“नमस्ते मैडम। स्विच का प्रॉब्लम है?”

पूजा ने मुस्कुराने की कोशिश की।
“हाँ राजू जी। अंदर आओ।”

राजू ने औज़ार निकाले।
कमरे में काम करते हुए बात शुरू हुई।
पूजा पास बैठी, चाय बना रही थी।

“राजू जी, आपकी फैमिली कहाँ है?”

राजू ने पान की पिचकारी बाहर थूकी।
“गाँव में मैडम। बीवी और दो बच्चे। मैं यहाँ कमाता हूँ, वो वहाँ रहते हैं।”

पूजा ने चाय का कप दिया।
“मिस करते होंगे ना?”

राजू ने सिर हिलाया। आँखें नीची।
“बहुत मैडम। रात को अकेला पड़ा हूँ तो मन उदास हो जाता है। बीवी की याद आती है... उसके साथ खाना खाने की, बातें करने की।”

पूजा का दिल पिघला।
उसका भी वही हाल था।
“मैं भी अपने पति को बहुत मिस करती हूँ। दिल्ली में हैं वो। फोन पर बात होती है, लेकिन...”

राजू ने मुस्कुराया।
“जी हाँ मैडम। शादीशुदा का दर्द तो वही जानता है।”

पूजा ने हल्के से पूछा,
“और क्या मिस करते हो तुम राजू?”

राजू चुप हो गया।
फिर धीरे से बोला,
“अब क्या कहूँ मैडम... बस अकेले मन नहीं लगता। दिल की बात कहने को कोई नहीं। रात को सोते वक़्त लगता है, कोई पास हो तो अच्छा लगे।”

पूजा ने सहानुभूति से कहा,
“कोई बात नहीं राजू। तुम मुझसे कह लेना। हम दोस्त हैं ना?”

राजू की आँखें चमकीं।
“सच में मैडम?”
“हाँ। तो मैं आपको मैसेज कर दूँगा। अगर मन उदास हो तो।”

पूजा ने हँस दी।
“ठीक है। नंबर तो है ही।”

राजू ने काम खत्म किया। पैसे लिए। लेकिन जाते वक़्त मुस्कुराया।
“थैंक यू मैडम। आप जैसी दोस्त मिली तो अच्छा लगा।”


शाम को पहला मैसेज आया।
राजू: “मैडम, आज काम खत्म करके घर आया। थकान है। बीवी का फोन आया था, बच्चे पूछ रहे थे पापा कब आएंगे।”

पूजा ने तुरंत जवाब दिया।
“अरे राजू जी, मैंने तो कहा था मैडम मत बोलो। पूजा बोलो। हाँ, बच्चे छोटे होते हैं ना, मिस करते हैं। मेरे पति भी कहते हैं, जल्दी आ जाओ।”

राजू: “ठीक है पूजा जी। आज क्या किया आपने?”

पूजा: “कॉलेज गई। पढ़ाई। शाम को Renu के साथ घूमी। तुम्हारा खाना खा लिया?”

ऐसे ही बातें शुरू हो गईं।
रोज़ शाम को।
राजू दिन भर के काम बताता — “आज एक बड़े घर में AC ठीक किया। अमीर लोग हैं, लेकिन बात करने लायक कोई नहीं।”
पूजा शेयर करती — “आज लैब में प्लांट्स पर काम किया। थक गई हूँ।”

धीरे-धीरे...
राजू की बातें गहरी होने लगीं।

एक रात 10 बजे।
राजू: “पूजा जी, आज रात उदास हूँ। बीवी का फोन आया, लेकिन आवाज़ सुनकर और मिस हो गई।”

पूजा: “हाँ राजू, मुझे भी होता है। संजय का मैसेज आया, लेकिन फोन पर सब कुछ कह नहीं पाती।”

राजू: “पूजा जी, आप बहुत अच्छी हैं। बात करके मन हल्का हो जाता है।”

फिर एक दिन।
राजू: “पूजा, आज एक लड़की को देखा काम पर। लेकिन तुम्हारी तरह ख़ूबसूरत नहीं। तुम तो बहुत सुंदर हो।”

पूजा का दिल धड़का।
फ्लर्ट?
लेकिन अकेलापन...
“थैंक यू राजू जी। और मुझे मैडम नहीं पूजा बोलो। कितनी बार कहा है, अब हम दोस्त हैं।”

राजू: “बस दोस्त पूजा जी।”

पूजा हँस दी।
“ये जी क्यों लगाया आपने? आपने भी तो जी लगाया ना।”

राजू: “ओके ठीक है। अबसे मैं राजू ही बोलूँगा।”

पूजा: “और मैं पूजा।”

फिर अगली रात।
राजू: “पूजा, मुझे बीवी की बहुत याद आती है। उसके साथ पकड़ के सोने का मन करता है। रात को अकेला पड़ा हूँ तो लगता है कोई पास हो।”

पूजा चुप हो गई।
उसके मन में संजय की याद।
उसकी बाहों की गर्मी।
लेकिन राजू की बात...
एक अजीब सी सहानुभूति।
और हल्की सी गुदगुदी।

पूजा: “हाँ राजू... मुझे भी। लेकिन सब ठीक हो जाएगा। गुड नाइट।”

राजू: “गुड नाइट पूजा। कल बात करेंगे।”

पूजा ने फोन रखा।
दिल में एक नई उलझन।
विक्रम से दूर भागी, और अब राजू?
“ये क्या हो रहा है मेरे साथ?”
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RE: एक पत्नी का सफर - by Tiska jay - 19-11-2025, 09:03 PM



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